प्रवचनों से
जहां ओशो इस प्रश्न पर बोले — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है।
ओशो, कल आपने कहा कि आदर में ईर्ष्या शामिल होती है। मेरे भीतर आपके प्रति अपार आदर है, लेकिन उसमें निहित ईर्ष्या उसे लगातार विषाक्त करती रहती है, और मुझे अपराध-बोध और पीड़ा महसूस होती है। क्या श्रद्धा इस विष-भरे आदर से पार ले जाती है?
इसकी थोड़ी व्याख्या चाहिए—बात बड़ी नाजुक है। जब भी तुम किसी का सम्मान करते हो, तो इसलिए करते हो कि तुम उस व्यक्ति में कुछ ऐसा देखते हो जो तुम्हारे पास नहीं है। तुम सम्मान इसलिए करते हो क्योंकि दूसरे में तुम्हें किसी ऐसी चीज की झलक मिलती है जिसे तुम भी पाना चाहोगे। एक भिखारी सम्राट का सम्मान करता है क्योंकि वह भी सम्राट होना चाहता है। इसलिए एक ओर वह सम्मान करता है, और भीतर ही भीतर ईर्ष्या भी करता है। क्योंकि वह अभी सम्राट नहीं है, लेकिन होना चाहता है। जो वह पाना चाहता है, वह तुमने पा लिया है। वह तुम्हें कुशल मानकर, सफल मानकर सम्मान देता है: “मैं कतार में बहुत पीछे खड़ा हूं; तुम आगे निकल गए हो, वहां पहुंच गए हो जहां मुझे होना चाहिए था।” इसलिए तुम शक्तिशाली हो, चतुर हो, बुद्धिमान हो, बलवान हो—वह तुम्हारा सम्मान करता है। लेकिन भीतर ईर्ष्या की आग भी जलती रहती है—यदि उसे अवसर मिले, तो वह तुम्हारी जगह लेना चाहेगा और तुम्हें हटाकर किनारे कर देना चाहेगा। और यदि भिखारी को वह अवसर मिल जाए, तो वह ऐसा करेगा…
तीसरा प्रश्न: ओशो, आपने कल कहा, आदर में ईर्ष्या सम्मिलित है। आपके प्रति मुझमें अपार आदर है, लेकिन उसमें निहित ईर्ष्या उसमें जहर घोलती रहती है और मैं ग्लानि और पीड़ा का अनुभव करता हूं। क्या श्रद्धा इस विष-भरे आदर का अतिक्रमण करती है?
भिखारी सम्राट का आदर करता है, क्योंकि उसकी भी आकांक्षा है कि सम्राट हो। तो एक तरफ आदर भी करता है, भीतर ईर्ष्या भी करता है। क्योंकि सम्राट अभी वह है नहीं, सम्राट होना चाहता है। तुम हो गए हो, तुमने वह पा लिया है जो वह पाना चाहता है। इसलिए तुम्हें आदर भी करता है कि तुम कुशल हो, सफल हो, मैं पंक्ति में बहुत पीछे खड़ा हूं, तुम आगे पहुंच गए हो, तुम उस जगह पहुंच गए हो जहां मुझे होना चाहिए था। इसलिए तुम शक्तिशाली हो, होशियार हो, बुद्धिमान हो, बलशाली हो, तुम्हारा आदर करता हूं। लेकिन एक भीतर ईर्ष्या की आग भी जलती है--अगर मुझे मौका मिले तो उस जगह मैं होना चाहूंगा, तुम्हें हटाना चाहूंगा। और जब मौका मिल जाएगा इस भिखारी को तो यह सम्राट को हटा कर धक्का दे देगा, सिंहासन पर बैठ जाएगा।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, आपने कहा कि जब जाग्रत पुरुषों के शब्द लोक-प्रचलन में आ जाते हैं, तो वे अपना अर्थ खो देते हैं। और आपने उल्लेख किया कि महावीर ने “अहिंसा” शब्द अपनाया, जीसस ने “प्रेम,” और सूफियों ने “इश्क।” भगवान, इस वर्तमान सदी में आप हमें कौन-सा शब्द देना चाहेंगे?
इसलिए जितने लोगों ने निषेध के मार्ग पर यात्रा की है, उन्होंने केवल अहंकार को ही मोटा किया है। उनके जीवन में आत्मा न खुली, न खिली। इसलिए मैं प्रेम को चुनता हूं। मुझे प्रेम से प्रेम है। मैं तुमसे कहता हूं: इस शब्द में हजार दोष हों तो हों—महावीर से कुछ सीखो। “प्रेम” शब्द से चिपके हुए दोषों को देखकर उन्होंने अहिंसा को चुना; लेकिन परिणाम और भी बुरे निकले। बीमारी तो बीमारी थी—लेकिन औषधि भी बीमारी बन गई। मैं तुमसे कहता हूं: प्रेम को चुनो। और प्रेम इतना शक्तिशाली है कि वह अपनी ही भूलों को पार कर सकता है। वह जीवंत है—इसलिए अगर मैला भी हो जाए, तो स्नान कर सकता है। अहिंसा एक मुर्दा है—वह मैली नहीं होगी, लेकिन उसकी स्वच्छता का मूल्य क्या है? उसकी स्वच्छता में जीवन की कोई सुगंध नहीं है। उसकी स्वच्छता अस्पताल जैसी है। मेरे लिए प्रेम शब्द में अमृत है। क्योंकि जैसा मैं देखता हूं, यह…
तीसरा प्रश्न: ओशो, आपने कहा कि लोक-व्यवहार में आकर प्रज्ञापुरुषों के शब्द अपना अर्थ खो बैठते हैं। और आपने बताया कि महावीर ने ‘अहिंसा’, जीसस ने ‘प्रेम’ और सूफियों ने ‘इश्क’ शब्द अपनाए। भगवान! वर्तमान शताब्दि में आप कौन-सा शब्द हमें देना पसंद करेंगे?
तो जिन्होंने भी निषेध की यात्रा की, उन्होंने सिर्फ अहंकार को भर लिया। उनके जीवन में आत्मा खुली नहीं, खिली नहीं। तो मैं तो प्रेम को ही चुनता हूं। मैं प्रेम के प्रेम में हूं। मैं तो तुमसे कहूंगा, लाख खराबियां हो इस शब्द में--महावीर से कुछ सीख लो। महावीर ने इस शब्द की खराबियों को देखकर अहिंसा चुना, लेकिन जो परिणाम हुए वे और भी बदतर हुए। बीमारी तो बीमारी, औषधि भी बीमारी बन गई। मैं तो तुमसे कहूंगा, प्रेम चुनो। और प्रेम इतना सबल है कि वह अपनी भूलों को पार करने की क्षमता रखता है। वह जिंदा है, तो गंदा भी हो जाये तो स्नान कर सकता है। अहिंसा लाश है, गंदी न होगी, लेकिन उसकी स्वच्छता का भी क्या मूल्य है? उसकी स्वच्छता में जीवन की सुवास नहीं है। उसकी स्वच्छता क्लिनिकल है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, अहिंसा का रचनात्मक, सकारात्मक रूप क्या है? और महावीर ने कभी किसी को शारीरिक सहायता क्यों नहीं दी?
‘अहिंसा’ शब्द से ही नकार का, निषेध का, “नहीं” का भाव आता है। इसका अर्थ है: हिंसा नहीं। इसलिए शब्द ही नकारात्मक है। महावीर ने यह शब्द क्यों चुना? वे प्रेम चुन सकते थे। प्रेम एक सृजनात्मक, सकारात्मक शब्द है। अहिंसा का अर्थ है: किसी को पीड़ा मत दो। प्रेम का अर्थ है: किसी को सुख दो। क्योंकि अहिंसा का अर्थ है “पीड़ा मत दो,” इसलिए वह निषेधात्मक है। यानी, अगर मैं केवल तुम्हें चोट नहीं पहुँचाता, तो मैं अहिंसक हो जाता हूँ। प्रेम एक विधायक शब्द है: उसका अर्थ है सुख देना। इसलिए अगर मैं सिर्फ तुम्हें चोट पहुँचाने से रुक जाता हूँ, तो बात पूरी नहीं होती; क्या मैंने तुम्हें आनंद भी दिया? केवल जब मैं आनंद देता हूँ, तभी प्रेम पूर्ण होता है। इस तरह प्रेम एक सृजनात्मक शब्द है। जीसस ने प्रेम का प्रयोग किया। अहिंसा एक नकारात्मक शब्द है, और महावीर ने उसका प्रयोग किया। इसलिए इसे बहुत गहराई से समझना जरूरी है। महावीर “किसी को पीड़ा मत दो” का सूत्र क्यों अपनाते हैं?…
प्रश्न: ओशो, अहिंसा का विधायक स्वरूप क्या है? और महावीर ने किसी की शारीरिक सहायता क्यों नहीं की?
‘अहिंसा’ शब्द से ही निगेटिव का, निषेध का, नकारात्मक का बोध होता है। बोध होता है, हिंसा नहीं। तो अहिंसा शब्द ही नकारात्मक है। महावीर ने क्यों उस शब्द को चुना? वे प्रेम भी चुन सकते थे। प्रेम विधायक शब्द है, वह पाजिटिव है। अहिंसा का मतलब होता है, किसी को दुख नहीं देना है। प्रेम का मतलब होता है, किसी को सुख देना है। अहिंसा का मतलब है, किसी को दुख नहीं देना है। इसलिए निषेधात्मक है। यानी अगर मैंने आपको दुख नहीं दिया तो मैं अहिंसक हो गया। प्रेम विधायक शब्द है। प्रेम का मतलब है, किसी को सुख देना है। तो मैंने आपको दुख नहीं दिया, इतने से ही काफी बात नहीं हल होती, मैंने आपको सुख दिया कि नहीं? अगर सुख दिया तो ही प्रेम पूरा होता है। तो प्रेम तो विधायक शब्द है। जीसस ने प्रेम का उपयोग किया। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, भगवान बुद्ध ने ‘अवैर’ के स्थान पर ‘प्रेम’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया?
बुद्ध के वचन सुनने योग्य हैं: “मैंने तुम्हें इसलिए प्रेम नहीं किया कि तुमने मुझ पर थूका नहीं। यदि यही कारण होता, तो एक थूक प्रेम को तोड़ देता। मैं तुम्हें प्रेम करता हूं क्योंकि मैं कुछ और कर ही नहीं सकता। यह मेरा स्वभाव है। तुम थूको या न थूको, यह तुम्हारा मामला है। तुम मेरे प्रेम को स्वीकार करो या न करो, यह भी तुम्हारा मामला है। मेरा प्रेम एक फूल की तरह है: वह खिलता है और सुगंध फैल जाती है। यदि कोई शत्रु पास से गुजरता है, तो उसके नथुने भी भर जाते हैं। वह अपनी नाक पर रूमाल रख ले—यह उसका मामला है। कोई मित्र गुजरता है; उसके नथुने भी भर जाते हैं। यदि मित्र फूल के पास ठहर जाए और उसके आनंद में सहभागी हो—यह दूसरी बात है। यदि मार्ग पर कोई भी न गुजरे, तो भी सुगंध झरती रहती है—खाली एकांत में। मेरा प्रेम मेरा स्वभाव है।” इसे समझो। जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह स्वभाव नहीं है; वह तुम्हारा कृत्य है, तुम्हारी एक मनोदशा है…
चौथा प्रश्न: ओशो, भगवान बुद्ध ने अवैर के स्थान पर प्रेम शब्द का व्यवहार क्यों नहीं किया?
बुद्ध का वचन सुनने जैसा है: मैं इसलिए थोड़े ही तुझे प्रेम करता था कि तू मेरे ऊपर थूकता नहीं था। अगर इसीलिए प्रेम करता था, तो थूकने से टूट जाएगा। मैं तुझे प्रेम करता था क्योंकि और कुछ मैं कर ही नहीं सकता हूं। वह मेरा स्वभाव है। तू थूकता है कि नहीं थूकता है, यह तेरी तू जान। तू मेरे प्रेम को लेता है या नहीं लेता है, यह भी तेरी तू जान। लेकिन मुझसे प्रेम वैसा ही है जैसे कि फूल खिलता है और गंध बिखर जाती है। अब दुश्मन पास से गुजरता है, तो उसके नासापुटों को भी भर देती है। वह खुद की रूमाल लगा ले, बात अलग। मित्र निकलता है, उसके नासापुटों को भी भर देती है। मित्र थोड़ी देर ठहर जाए फूल के पास और उसके आनंद में भागीदार हो जाए, बात अलग। कोई न निकले रास्ते से तो भी गंध गिरती रहती है, सूने एकांत में। तो बुद्ध ने कहा, मेरा प्रेम स्वभाव है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
प्रेम विधायक है — एक सृजनात्मक संबंध। अहिंसा नकारात्मक है। प्रेम का अर्थ है: मैं दूसरे का कल्याण चाहता हूं, दूसरे का मंगल चाहता हूं; मैं दूसरे के जीवन में आनंद बन जाता हूं; मैं दूसरे के पथ पर फूल बिछाता हूं। अहिंसा का अर्थ है: मैं दूसरे को दुख नहीं पहुंचाता, पीड़ा नहीं देता। यदि मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाता, तो अहिंसा पूरी हो जाती है — लेकिन प्रेम नहीं। प्रेम तब तक चैन नहीं ले सकता जब तक वह दूसरे को आनंद न दे दे। प्रेम दूसरे के मार्ग पर फूल बिछाता है। अहिंसा केवल इतना कहती है: कांटे मत बिखेरो। लेकिन यदि दूसरे के मार्ग पर कांटे पहले से ही बिखरे हुए हैं, तो अहिंसा के पास कहने को कुछ नहीं है कि तुम उन्हें उठाओ या न उठाओ। यदि दूसरे का मार्ग खाली है और तुम्हारे हाथ फूलों से भरे हैं, तो अहिंसा कुछ नहीं कहती कि तुम उन्हें वहां रखो या न रखो। अहिंसा नकारात्मक है — इतना पर्याप्त है कि मैं हानि न पहुंचाऊं।
प्रेम तो पाजिटिव है। प्रेम तो विधायक संबंध है। और अहिंसा निगेटिव है, नकारात्मक बात है। प्रेम का अर्थ है, मैं दूसरे का मंगल चाहूं, दूसरे का कल्याण चाहूं, दूसरे के जीवन में आनंद बनूं, दूसरे के मार्ग पर फूल बिछाऊं। अहिंसा का मतलब है, मैं दूसरे का दुख न करूं, दूसरे को दुख न दूं। दूसरे को दुख न दूं, तो अहिंसा पूरी हो जाती है, प्रेम पूरा नहीं होता। प्रेम जब तक दूसरे को सुख न दे सके तब तक चुप नहीं बैठ सकता। प्रेम दूसरे के रास्ते पर फूल बिछाता है। अहिंसा केवल दूसरे के रास्ते पर कांटे न बिछाऊं, इतने भर तक जाती है। अहिंसा कहती है, दूसरे के रास्ते पर कांटे मत बिछाना। लेकिन अगर दूसरे के रास्ते पर कांटे बिछे हों, तो अहिंसा का इससे कोई संबंध नहीं कि उनको तुम बीनना कि मत बीनना। अगर दूसरे का रास्ता खाली हो और तुम्हारे हाथ में फूल हों, तो अहिंसा का इससे कोई संबंध नहीं कि तुम उसके रास्ते पर फूल रखना कि नहीं रखना। अहिंसा निगेटिव बात है। मैं दूसरे को दुख न दूं बस इतना पर्याप्त है। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।