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Questions in this Discourse
ओशो, भारत में जनसंख्या के कारण गरीबी बढ़ती जा रही है और गरीबी के कारण जनसंख्या। यानी दोनों एक-दूसरे से बढ़ कर! मौजूदा हालात में जनसंख्या को कंट्रोल में कैसे लाया जाए, जब कि परिवार-नियोजन को यहां स्वैच्छिक रूप से ही अपनाया जाता है? कृपया अपनी ओर से कुछ सुझाव दें।
पहली बात, जो भारत की चेतना में प्रविष्ट हो जानी चाहिए, वह यह है कि जनसंख्या बढ़ती नहीं है, हम बढ़ाते हैं। गरीबी बढ़ती नहीं, हमारी सृष्टि है। और हमने सदियों तक गलत विचारों के अंतर्गत जीना सीखा है। जैसे, हमें बताया गया है कि बच्चे भगवान की देन हैं। यह भी समझाया गया है कि बच्चे प्रत्येक के भाग्य में लिखे हैं। और धर्मगुरु यह भी समझा रहे हैं सदियों से कि बच्चों को रोकना, पैदा होने से, ईश्र्वर का विरोध है। इन सब बातों का एक ही अर्थ होता है कि जैसे ईश्र्वर का एक ही काम है, और वह है कि लोग कैसे ज्यादा से ज्यादा गरीब हों। जो कि ईश्र्वर शब्द के बिलकुल विपरीत है। ईश्र्वर शब्द का मूल उदगम ही ऐश्र्वर्य है। ऐश्र्वर्य से ही ईश्र्वर शब्द बना है। तो ऐश्र्वर्य से गरीबी बढ़ती हो, ईश्र्वर गरीबी बढ़ाता हो, ये बातें सिर्फ पंडितों, पुरोहितों, धर्मगुरुओं, राजनीतिज्ञों--उन सारे लोगों की गढ़ी हुई बातें हैं, जो गरीबों के शोषण पर ही जी रहे हैं।
जब तक भारत के मानस से हम यह पर्दा नहीं हटा देते हैं कि परमात्मा का तुम्हारी गरीबी में कोई हाथ नहीं है...। और परमात्मा ही क्या जो तुम्हें गरीब बनाना चाहे! लेकिन, धर्मगुरु, जैसे जीसस चिल्ला-चिल्ला कर लोगों से कह रहे हैं कि धन्यभागी हैं वे जो गरीब हैं। इससे गरीब को थोड़ी देर के लिए सांत्वना तो मिल जाती है, जैसे चिंताओं में डूबे हुए आदमी को अफीम खा लेने से थोड़ी देर को राहत मिल जाती हो, लेकिन गरीबी नहीं मिटती, और न ही चिंताएं मिटती हैं। और अगर गरीबी धन्यता है, तब तो फिर गरीबी को वरण करना चाहिए, विनष्ट करने का तो सवाल ही कहां उठता है? जो गरीब नहीं हैं, उनको भी गरीब बना देना चाहिए, क्योंकि वे बेचारे क्यों धन्यता से अभागे रहें।
महात्मा गांधी गरीबों को कहते हैं दरिद्र नारायण, ये परमात्मा के रूप हैं, ईश्र्वर की संतान हैं। इन सारी बातों से गरीबों को थोड़ी देर के लिए राहत तो मिलती है, मगर उनके जीवन की असली समस्या का कोई हल नहीं होता। और ये राहत देने वाले, असली समस्या के हल होने में बाधा बनते हैं।
मैं चाहूंगा कि गरीबों से उनकी सारी राहत छीन ली जाए, उनकी सारी सांत्वनाएं छीन ली जाएं, उनसे सारे धोखे और सारे भ्रम छीन लिए जाएं और उनको स्पष्ट कह दिया जाए कि यदि गरीब हो तुम, तो तुम जिम्मेवार हो। और अगर जनसंख्या बढ़ती है, तो ‘तुम’ बढ़ाते हो। और अगर यही तुम्हारी मर्जी है, कि गरीब रहना है, और देश को और से और गरीबी की तरफ ले जाना है...और इस सदी के पूरे होते-होते सौ करोड़ संख्या होगी भारत की। आधा भारत भूखा मरता होगा। अगर यही तुम्हारी मर्जी है कि तुम्हारे सामने ही आधा भारत सड़कों पर भूखा बिलखे और मरे, तो ठीक है, तुम अपने पुराने विचारों से चिपके रहो। लेकिन हम यह मानने को कभी राजी नहीं हो सकते कि यह ईश्र्वर की मर्जी हो सकती है। और अगर यह ईश्र्वर की मर्जी है तो ऐसे ईश्र्वर को इनकार कर देना जरूरी है।
इसके पहले कि हम भारत के लोगों को संतति-निरोध के साधनों के लिए राजी करें, उनकी मानसिक, दार्शनिक, धार्मिक धारणाओं को बदल देना जरूरी है। और तब कोई कठिनाई न होगी कि वे स्वेच्छा से संतति-निरोध के उपायों को स्वीकार करेंगे।
मैं एक ईसाई पादरी से बात कर रहा था। और पादरी ने कहा कि संतति-निरोध के लिए किए गए कोई भी साधन, सब ईश्र्वर का विरोध है। मैंने उससे कहा, एक छोटी सी बात मैं आपसे पूछूं, कि आपकी ईश्र्वर की परिभाषा है कि वह सर्वशक्तिमान है। एक छोटी सी गोली तुम्हारे सर्वशक्तिमान परमात्मा को हरा देती है। परमात्मा बच्चा पैदा करना चाहता है, और गोली परमात्मा को बच्चा पैदा करने से रोक देती है। तो बेहतर होगा कि तुम परमात्मा की पूजा छोड़ कर अब इस गोली की पूजा शुरू करो। यह ज्यादा शक्तिमान है।
यह मूर्खतापूर्ण है कि परमात्मा सर्वशक्तिमान है और फिर भी हमसे कहा जाता है कि हम उसकी इच्छा का विरोध न करें। एक तरफ हमसे कहा जाता है कि उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, और दूसरी तरफ हमसे कहा जाता है कि हम उसकी इच्छा का विरोध न करें। इन दोनों बातों में विरोधाभास है। अगर उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो हम लाख उपाय करें, अगर वह बच्चा देना ही चाहता है तो बच्चा देगा। हमारे उपाय किसी काम में आने के नहीं हैं। और अगर हमारे उपाय काम में आते हैं, तो उसका अर्थ है कि बच्चा परमात्मा नहीं दे रहा था। बच्चा हम पैदा कर रहे थे, और जिम्मेवारी हम परमात्मा पर थोप रहे थे, और जब तक हम जिम्मेवारी दूसरों पर थोपते हैं, तब तक हम जीवन में कोई क्रांति नहीं ला सकते। जिम्मेवारी खुद लेनी होगी।
जैसे ही भारतीय मानस शिक्षित किया जा सके, और जो कि कठिन नहीं है, क्योंकि मेरे देखे भारत के लोग भला अशिक्षित हों, बुद्धिहीन नहीं हैं। भले ही आधुनिक जगत से दूर हों, लेकिन इतनी प्रतिभा उनमें है, कि वे ब्रह्म और ईश्र्वर, स्वर्ग और नरक, और मोक्ष की सूक्ष्मतम व्याख्या कर सकते हैं, समझ सकते हैं, तो इन छोटी-छोटी बातों को न समझ सकेंगे, ऐसा मैं नहीं मानता। मैं परिपूर्ण आशावादी हूं। जरूरत है केवल इस बात की कि हम गांव-गांव में...कालेज हैं, युनिवर्सिटीज हैं, स्कूल हैं, इनके शिक्षक हैं, प्रोफेसर हैं, विद्यार्थी हैं, हम इसे एक जरूरत बना दें कि जब तक कोई विद्यार्थी दो महीने तक गांव में जाकर लोगों को संतति-नियमन के संबंध में नहीं समझाएगा, वह सर्टिफिकेट पाने का अधिकारी नहीं होगा। और हर शिक्षक, दो महीने गर्मियों में जब तक गांव में जाकर लोगों को नहीं समझाएगा, तब तक वह आगे के किसी प्रमोशन का हकदार नहीं होगा। हिंदुस्तान में इतने शिक्षक हैं, इतने विद्यार्थी हैं, और बहुत से लोग जो शिक्षक और विद्यार्थी नहीं हैं, लेकिन चाहते हैं कि भारत की कोई सहायता करें, कोई सेवा करें, उनसे आग्रह किया जाना चाहिए कि वे गांव-गांव जाएं और लोगों को समझाएं कि इसमें ईश्र्वर का विरोध नहीं है। यह एक पहलू हुआ।
और दूसरा पहलू है, भारत की सरकार को निश्र्चित रूप से उन लोगों को अपराधी घोषित करना चाहिए जो भारत की जनता को गुमराह कर रहे हैं। ईसाई मिशनरी हैं, मदर टेरेसा है। अभी पोप का आगमन होने को है। इसके पहले भारत को यह तय करना चाहिए कि ये लोग हैं, जो जनता को समझा रहे हैं, किसी भी तरह के संतति-नियमन का उपयोग महा-अधर्म है, महापाप है। यह उनकी राजनीति है, कोई धर्म नहीं है। क्योंकि मदर टेरेसा को जितने अनाथ बच्चे मिल जाते हैं, उतनी कैथोलिकों की संख्या बढ़ जाती है। और हम ऐसे मूढ़ हैं कि हम मदर टेरेसा जैसी औरतों को पुरस्कार पर पुरस्कार दिए चले जाते हैं, बिना यह देखे कि गरीबों की सेवा के नाम के पीछे, अनाथों के नाम की सेवा के पीछे सिवाय ईसाइयत के प्रसार के और कुछ भी नहीं है।
पूरे हिंदुस्तान में मैंने एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जो सुसंस्कृत हो, सुसंपन्न हो और ईसाई बन गया हो। जो भी ईसाई बने हैं, वे भिखारी हैं, अनाथ हैं, आदिवासी हैं। और वे ईसाई इसलिए नहीं बने हैं कि वे समझ गए हैं कि ईसाइयत उनके धर्म से श्रेष्ठतर धर्म है, बल्कि इसलिए कि ईसाइयत उनको रोटी दे रही है, कपड़े दे रही है, अस्पताल दे रही है, स्कूल दे रही है।
जो भी व्यक्ति भारत में संतति-नियमन का विरोध सिखाता है, उसे दंडित किया जाना चाहिए।
इस समय सबसे बड़ा अपराध वही है। एक आदमी को मार डालने के लिए तो हम कितनी बड़ी सजा देते हैं कि उसकी जान ले लेते हैं अपराधी की, और जो लोग आज समझा रहे हैं कि जनसंख्या को बढ़ने दो, ये करोड़ों लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार होंगे, और इनके लिए हमारे पास कोई अपराध का नियम नहीं है। उलटे हम इन्हें नई-नई पदवियों, डाक्टरेट, और नोबल प्राइज से पुरस्कृत करते हैं। यह दोहरी चाल बंद करनी होगी। स्पष्ट रूप से प्रत्येक ईसाई मिशनरी को यह समझ लेना चाहिए कि अगर इस देश में रहना है तो इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातें नहीं चलेंगी। अन्यथा इसी क्षण इस देश को छोड़ कर चले जाओ। जाओ और अपने देशों में समझाओ।
यह बड़े मजे की बात है कि फ्रांस की जनसंख्या थिर है, और सब ईसाई हैं! यह मजे की बात है कि स्विटजरलैंड से और फ्रांस से मिशनरी भारत आते हैं। और यहां लोगों को समझा रहे हैं कि जनसंख्या को बढ़ने दो, क्योंकि यह ईश्र्वर की देन है। और उनके साथ ही साथ सुर मिलाने को शंकराचार्य हैं, मुस्लिम इमाम हैं, क्योंकि उन सबको यह भ्रांति है कि बच्चे के जन्म का कोई अनिवार्य संबंध ईश्र्वर से है। कोई अनिवार्य संबंध ईश्र्वर से नहीं है। एक बार हम भारत के मन से यह भ्रम तोड़ दें कि ईश्र्वर का कोई संबंध संतति से नहीं है तो भारत के लोगों को स्वेच्छा से संतति-निरोध को अपना लेने में कोई बाधा नहीं होगी।
साथ-साथ मैं यह भी कह देना चाहता हूं कि अब तक हमने एक ही किनारे से सोचा है, वह है जन्म। अभी हमने दूसरा किनारा नहीं सोचा है, वह है मृत्यु। यह अधूरा चिंतन है। मैं इसे पूरा करना चाहता हूं। संतति-निरोध का प्रचार करो। लोगों को समझाओ कि अब बच्चों को पैदा करने से बड़ा कोई और दूसरा अपराध नहीं है। और यह अपराध तुम अपने बच्चों के प्रति ही कर रहे हो, तुम्हारे बच्चे ही भूखे मरेंगे, तुम्हारे बच्चे ही सड़कों पर तड़फेंगे। तुम्हारे बच्चे ही इसी पृथ्वी पर नरक झेलेंगे और तुम जिम्मेवार होओगे। तुम चाहते तो यह सब रोक सकते थे। यह एक हिस्सा है।
दूसरा हिस्सा है कि पचहत्तर साल के बाद अगर कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से मृत्यु को ग्रहण करना चाहता है, तो हमें इसे कानूनन रूप से अंगीकार करना चाहिए। प्रत्येक अस्पताल में एक निश्र्चित मंदिर जैसी जगह होनी चाहिए। जहां कोई भी व्यक्ति जो पचहत्तर के पार हो चुका है, और चाहता है कि पूरी तरह जी चुका, जो भी जानना था, जान चुका, जो भी पाना था, पा चुका; और अब सिर्फ एक बोझ है, और चाहता है कि अपनी जगह अब किसी नये बच्चे को दे दे, और किसी क्रोध से आत्महत्या नहीं कर रहा है, किसी हार से, किसी पराजय से आत्महत्या नहीं कर रहा है, वरन चिंतन से, सोच-विचार से, तो अस्पताल में हमें उसे सारी सुविधा देनी चाहिए, जो उसे जीवन में भी नहीं मिली। उसे श्रेष्ठतम अवसर देना चाहिए, कि सुंदरतम संगीत सुन सके, अपने मित्रों, प्रियजनों से मिल सके, और हम उसे दवा दे सकें कि वह धीरे-धीरे नींद की गहराइयों में डूबता हुआ मृत्यु में उतर जाए, इसके साथ ही ध्यान जैसी प्रक्रिया जोड़ी जा सकती है कि उसका मरण सिर्फ मृत्यु ही न हो, बल्कि समाधि भी बन जाए।
तो एक तरफ हम बच्चों को आने से रोकें और दूसरी तरफ उनको, जो कि अब जबरदस्ती अपने को घसीटे जा रहे हैं, क्योंकि कानून रूप से जीना मजबूरी है, जीना ही पड़ेगा। अपने जीवन को छोड़ देने का जन्मसिद्ध अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को मिल जाना चाहिए। इन दोनों छोरों से अगर हम काटना शुरू करें, तो संभव है कि इस सदी के अंत तक हमारी संख्या संतुलित हो जाए। और संख्या संतुलित हो जाए तो दरिद्रता के मिट जाने में कोई कठिनाई नहीं है।
ओशो, जुलाई में जब मैं रजनीशपुरम गई थी, तब आपने अपने प्रवचनों में कहा था, भारत में कई सालों तक बच्चा पैदा नहीं होना चाहिए। यही बातें हिंदुस्तान आकर मैंने कई लोगों से कहीं। अलग-अलग लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं थीं, मगर ज्यादातर महिलाओं ने कहा, स्त्री में जो मातृत्व की भावना होती है, उसे वह कैसे सैटिस्फाई करे? कइयों ने कहा, नारी पूर्णता को प्राप्त नहीं करती, जब तक वह मां नहीं बनती। इस बारे में कुछ कहिए, ओशो।
दूसरी बात, कि स्त्री मां बनने से ही मातृत्व को पाती है, यह भी सही नहीं है। क्योंकि लगभग सारी स्त्रियां बच्चे पैदा करती हैं, मां बनती हैं, पर मातृत्व की कोई गरिमा, कोई ओज, कोई तेज दिखाई तो नहीं देता। इसलिए मेरी परिभाषा दूसरी है। मेरी परिभाषा में मां बन जाना जरूरी नहीं है, मातृत्व को उपलब्ध होने के लिए।
मां तो सारे जानवर अपनी मादाओं को बना देते हैं। सारी प्रकृति, जहां-जहां मादा है, वहां-वहां मां है। लेकिन मातृत्व कहां है? इसलिए मातृत्व को और मां को एकार्थी न समझें। यह हो सकता है कि कोई मां न हो और मातृत्व को उपलब्ध हो, और कोई मां हो और मातृत्व को न उपलब्ध हो।
मातृत्व कुछ बात ही और है। वह प्रेम की गरिमा है।
मैं चाहूंगा कि स्त्रियां मातृत्व को उपलब्ध हों, लेकिन उस उपलब्धि के लिए बच्चे पैदा करना बिलकुल गैर-जरूरी हिस्सा है। हां, उस मातृत्व को पाने के लिए हर बच्चे को अपने बच्चे जैसा देखना, निश्र्चित अनिवार्य जरूरत है। उस मातृत्व के लिए ईर्ष्या, द्वेष, जलन इनका छोड़ना जरूरी है। बच्चों की दर्जन इकट्ठी करनी नहीं!
और फिर हमारे देश में जहां इतने बच्चे बिना माताओं के हों, वहां जो स्त्री, अपना बच्चा पैदा करना चाहती हो, वह मातृत्व को कभी उपलब्ध नहीं होगी। जहां इतने बच्चे बिलख रहे हैं, अनाथ, मां की तलाश में, वहां तुम्हें सिर्फ इस बात की फिकर पड़ी हो कि बच्चा तुम्हारे शरीर से पैदा होना चाहिए। उस क्षुद्र विचार को पकड़ कर कोई मातृत्व जैसे महान विचार को नहीं पा सकता है। जहां इतने बच्चे बिलखते हों अनाथ, कोई जरूरत नहीं है बच्चा पैदा करने की। इन अनाथ बच्चों को अपना लो। इनके अपनाने में, इनको अपना बनाने में, वह जो दूरी अपने और पराए की है, वह गिर जाएगी। इनको अपना बनाने में, वह जो ईर्ष्या और जलन और द्वेष की क्षुद्र भावनाएं हैं, वे गिर जाएंगी। और इनको बड़ा करने में और इनको पल्लवित और पुष्पित होते देखने में जो आनंद उपलब्ध होगा, वह आनंद अपने ही बच्चों को चोर बनते, बेईमान बनते, भीख मांगते, जेलों में सड़ते देख कर नहीं हो सकता।
मातृत्व का कोई संबंध जैविक शास्त्र से नहीं है। इसलिए कोई पशु मनुष्य को छोड़ कर मातृत्व को उपलब्ध नहीं हो सकता। मां तो बन सकती है हर मादा, लेकिन मातृत्व की संभावना केवल स्त्री को उपलब्ध है। और वह उपलब्धि चारों तरफ फैली हुई है।
तो पहली बात, कि मातृत्व का कोई संबंध शारीरिक, जैविक उत्पत्ति से नहीं है, वरन एक आध्यात्मिक प्रेम से है, एक भाव से है। जिस क्षण तुम किसी दूसरे को अपने जैसा अपना लो, जैसे तुमने उसे जन्म दिया हो। और फर्क क्या है? किसने उसे जन्म दिया, इससे कोई भी भेद नहीं पड़ता है।
तो मातृत्व के लिए तो बहुत संभावना है। इतने अनाथ बच्चों को अगर माताएं मिल जाएं तो जरूरत न हो मदर टेरेसा जैसे लोगों की, जो कि शोषण कर रहे हैं इन अनाथ बच्चों का। और ये अनाथ बच्चे कैथोलिक परिवारों द्वारा गोद लिए जा रहे हैं। और हिंदुस्तान की स्त्रियां अपने ही बच्चों को पैदा करने में मातृत्व अनुभव कर रही हैं।
दूसरी बात, स्त्री की पूर्णता उसके मां बनने में है, यह सच है। इसलिए मैंने जब संन्यास देना शुरू किया, तो पुरुषों के लिए तो परंपरागत नाम था संन्यासी का: स्वामी। स्त्री के लिए कोई नाम न था। क्योंकि भारत में हजारों साल से स्त्री को इस तरह दबाया है, इस बुरी तरह मिटाया है, उसे कभी मौका भी नहीं दिया है कि वह संन्यास में दीक्षित हो सके। उसके लिए कोई नाम भी नहीं है। बहुत खोज कर मैंने ‘मां’ का ही वह नाम स्वीकार किया, क्योंकि ‘मां’ में ही उसकी पूर्णता है। लेकिन यह मां की पूर्णता इस बात का सबूत है कि तुम्हारा प्रेम इतना ऊंचा उठ जाए कि ये सारे जगत में तुम्हारे लिए सभी यूं हो जाएं, जैसे तुम्हारे बच्चे हैं--तुम्हारा पति भी। यही उपनिषद के ऋषियों का आशीर्वाद है। जब कभी कोई उपनिषद के ऋषियों के पास कोई जोड़ा आशीर्वाद के लिए जाता था, तो एक बहुत ही अनूठा आशीर्वाद, दुनिया के किसी शास्त्र में वैसा आशीर्वाद नहीं है। ऋषि आशीर्वाद देता है कि हे युवती, तू दस बच्चों की मां हो और अंततः तेरा पति तेरा ग्यारहवां बेटा हो। जब तक यह न हो जाए, तब तक तू समझना कि जीवन-यात्रा पूरी नहीं हुई है। और जिस दिन कोई स्त्री अपने पति को भी अपने बेटे की तरह मान सके, जान सके, जी सके, उस दिन उसके लिए सारे जगत में सिवाय बेटों के और कौन रह जाता है?
निश्र्चित ही मां, मातृत्व की पूर्णता स्त्री का आत्यंतिक गौरव है! लेकिन बच्चों की कतार लगाने से नहीं, वरन अपने प्रेम को इतना ऊपर उठाने से है कि जहां से प्रत्येक व्यक्ति अपना बच्चा ही मालूम हो। ये धारणाएं लोगों तक पहुंचानी जरूरी हैं, क्योंकि वे गलत धारणाओं के नीचे बच्चे को पैदा किए चले जा रहे हैं। और ये लौट कर भी नहीं देखते कि उनकी धारणाओं के लिए कोई भी सबूत नहीं है। करोड़ों स्त्रियां हैं, बच्चों की कतारें हैं, कौन सा मातृत्व है? करोड़ों स्त्रियां हैं, कौन सी पूर्णता है?
मुझसे लोग पूछते हैं कि आप अपनी संन्यासिनियों को मा कहते हैं?
यह तो बड़ी हैरानी की बात है, क्योंकि न उनके बच्चे हैं, न उनकी शादी हुई। आप छोटी सी बच्ची को भी संन्यास देते हैं तो मा कहते हैं! उनके आश्र्चर्य को मैं समझ सकता हूं। क्योंकि मेरी दृष्टि में छोटी सी बच्ची भी बीज लिए हुए है, अंतिम रूप से, इस सारे जगत की मां बनने का। उसे मा कह कर पुकारना उसके बीज को पुकारना है। उसकी संभावना को ललकार देना है, उसको चुनौती देनी है। और जिस दिन किसी मां का प्यार सबके लिए समान और सबके लिए आत्मिक हो जाता है। जिसमें शरीर की कोई बास भी नहीं, जिसमें काम की कोई दूर की गंध भी नहीं, उस दिन स्त्री पूर्णता को उपलब्ध होती है।
ओशो, गर्भ से पहले और गर्भकाल में यदि माता-पिता ध्यान करते हैं, तो बच्चे पर इसका क्या असर पड़ता है?
एक जमाना था, पिता नहीं था, और एक जमाना फिर होगा, पिता नहीं होगा। लेकिन मां पहले भी थी, और मां बाद में भी होगी।
मां प्राकृतिक है, पिता सामाजिक है।
पिता एक संस्था है। उसका काम बहुत ही साधारण है जो कि एक इंजेक्शन से भी किया जा सकता है। और इंजेक्शन से ही किया जाएगा भविष्य में। क्योंकि इंजेक्शन से ज्यादा बेहतर ढंग से किया जा सकता है।
एक संभोग में पुरुष करीब एक करोड़ जीवाणुओं को स्त्री-गर्भ की ओर छोड़ता है। जिनमें से एक इस दौड़ में मां के अंडे तक पहुंच पाता है। जो पहले पहुंच जाता है, वह प्रवेश कर जाता है। और अंडा बंद हो जाता है। बाकी जो एक करोड़ जीवाणु हैं, वे दो घंटे के भीतर मर जाते हैं। उनकी उम्र दो घंटे है। भयंकर दौड़ है, और लंबी दौड़ है। अगर अनुपात से हम देखें, अगर आदमी की ऊंचाई हम छह फुट मान लें, तो जीवाणु इतने छोटे हैं कि मां के गर्भ तक पहुंचने का मार्ग दो मील लंबा हो जाता है। इस दो मील लंबे मार्ग पर भयंकर प्रतिस्पर्धा है। इसे मैं राजनीति की शुरुआत कहता हूं। इसमें जो पहुंच जाते हैं, वे जरूरी रूप से श्रेष्ठ नहीं हैं।
संभव है, वे जो एक करोड़ पीछे छूट गए, उनमें कोई अलबर्ट आइंस्टीन हो, कोई रवींद्रनाथ टैगोर हो, कोई गौतम बुद्ध हो। कोई भी नहीं जानता कि कौन छूट गए। और जो पैदा हुआ है, वह आकस्मिक है। यह हो सकता है चूंकि वह आगे था, इसलिए पहुंच गया। यह हो सकता है कि वह ज्यादा शक्तिशाली था, इसलिए पहुंच गया। लेकिन ज्यादा शक्तिशाली होना, किसी को रवींद्रनाथ नहीं बनाता। रवींद्रनाथ खुद अपने मां-बाप के तेरहवें बेटे थे। यह संयोग की बात है कि इस लंबी दौड़ में रवींद्रनाथ पहुंच सके। अक्सर यह होता है कि रवींद्रनाथ जैसे लोग, या गौतम बुद्ध जैसे लोग, या अलबर्ट आइंस्टीन जैसे लोग, न तो बहुत दौड़ने में उत्सुक होंगे, न बहुत प्रतिस्पर्धा में उत्सुक होंगे। शायद मनुष्य का श्रेष्ठतम हिस्सा हम व्यर्थ ही खो रहे हैं--जो कि आसानी से चुना जा सकता है। यह काम विज्ञान करने को है। एक करोड़ जीवाणुओं में से जब हम श्रेष्ठतम को चुन सकते हैं, तब क्यों नंबर दो और नंबर तीन के लोगों को जगह दी जाए।
इसलिए पिता का काम तो समाप्त होने के करीब है। लेकिन मां का काम अपरिहार्य है। गर्भाधान के समय...
और यही मेरी पूरी शिक्षा रही है, जिसको हर भांति से विकृत करके उपस्थित किया गया है। मेरी सारी शिक्षा यही रही है कि कामवासना मनुष्य के जीवन का प्रारंभ है, मनुष्य के जीवन का सब कुछ है। और कामवासना को दबाने की बजाय, उसे हम कैसे सुंदर, श्रेष्ठ और शिवत्व की ओर ले चलें, कैसे उसका रूपांतरण हो सके, इस संबंध में चिंतन होना चाहिए। दमन से तो केवल हम रुग्ण व्यक्ति पैदा करते हैं।
और ध्यान प्रक्रिया है व्यक्ति की कामवासना के परिवर्तन की।
अगर कामवासना के क्षणों में स्त्री और पुरुष दोनों ही शांत हैं, मौन हैं, एक-दूसरे में ऐसे लीन हैं कि जैसे कहीं कोई दीवार न हो--उस क्षण में समय जैसे रुक गया, जैसे दुनिया भूल गई, न कोई विचार है, न कोई धारणा है, बस एक आनंद है, एक ज्योति है, जिसमें दोनों डूब गए हैं। ऐसे ज्योतिर्मय क्षण से अगर बच्चे का जन्म हो, तो हमने पहले ही कदम पर उसे महापाठ सिखा दिया। हमने उसे सिखा दिया कि कैसे अंधकार से ज्योति की ओर जाया जाता है। हमने उसे पहला ध्यान का अनुभव दे दिया कि कैसे सब कुछ मौन और शांत और आनंद से परिपूरित हो सकता है।
और अगर मां पूरे नौ महीने बच्चे को ध्यान में रख कर चले, ऐसा कुछ भी न करे जो ध्यान के विपरीत है, और ऐसा सब कुछ करे जो ध्यान के लिए सहयोगी है। तो निश्र्चित इन नौ महीनों में किसी भी बुद्ध को जन्म दिया जा सकता है। ये नौ महीने उस बच्चे के निर्माण के क्षण हैं। और इन नौ महीनों में सिर्फ उसे प्रेम का अनुभव हो, शांति का अनुभव हो, ज्योति का अनुभव हो। इन नौ महीनों में अगर उसे सिर्फ एक ही बात का अनुभव हो--अपनी आत्मशक्ति का, तो वह बच्चा पैदा होते ही साधारण बच्चा नहीं होगा। वह असाधारण होगा। और हमने उसके जीवन की बुनियाद रख दी है। और अब जो मंदिर खड़ा होगा उस बुनियाद पर, वह बुनियाद से भिन्न नहीं हो सकता।
इसलिए जब भी कोई मां-बाप अपने बच्चों के प्रति मुझसे शिकायत करने आते हैं, तो मैंने उन्हें कहा है कि तुम्हें चाहे बुरा लगे, मगर जिम्मेवार तुम हो। तुमने गलत बुनियाद रखी होगी। आज तुम्हारा बच्चा डकैत है, आज तुम्हारे बच्चे ने खून किया है, तो तुम कहो कि नौ महीने में जब बच्चा गर्भ में था, तुमने क्या किया था उसको ऐसी बुनियाद देने का, जिसमें खून असंभव हो, जिसमें डकैती असंभव हो। शायद तुमने सोचा भी नहीं था।
निश्र्चय ही ध्यान जीवन के प्रत्येक अनुभव में उपयोगी है। और जन्म तो जीवन की सबसे बड़ी घटना है।
और ध्यान प्रेम के क्षण में सबसे सरल, सबसे सुगम बात है।
क्योंकि प्रेम के क्षण में सहज ही विचार खो जाते हैं और एक तल्लीनता छा जाती है। और एक सन्नाटा घेर लेता है। और एक प्रतीति होती है, जैसे हम भिन्न नहीं हैं अस्तित्व से, जैसे हम एक हैं। यही विचार केवल भारत में पैदा हुआ।
अगर भारत ने दुनिया को कोई भी चीज दी है, जिसको वह कह सके कि वह बिलकुल उसकी अपनी है, तो वह है--तंत्र-शास्त्र।
और तंत्र-शास्त्र का सारा आधार एक है कि कैसे काम-ऊर्जा और ध्यान-ऊर्जा को एक कर दिया जाए।
और मैं अपने पूरे जीवन उस बात को दोहराता रहा हूं। लेकिन लोग अजीब हैं। आंखें हैं और आंखें नहीं हैं। कान हैं और कान नहीं हैं। और बीच में मध्यस्थ हैं उन्हें समझाने वाले।
मेरी एक-एक बात को गलत करके समझाया गया है। जब कि मैं मौजूद हूं और मुझसे पूछा जा सकता है। लेकिन किसी को फिकर नहीं पड़ी सत्य को जानने की। लोगों को फिकर सिर्फ एक बात की है कि उनकी धारणाओं पर कोई चोट न आए। फिर चाहे उनकी धारणाएं उन्हें गरीबी में ले जाएं, उनकी धारणाएं उन्हें अपराध में ले जाएं, उनकी धारणाएं उन्हें मनुष्य से गिरा दें और पशुता में ले जाएं; वह सब ठीक। लेकिन कोई उनकी धारणाओं को न छुए। उनकी धारणाएं बड़ी छुई-मुई हैं। और मेरा एक ही अपराध रहा पूरे जीवन में कि उनकी हर धारणा को, जो उन्हें गिराती है, किसी भी तरह उनसे छुटकारा दिला दूं।
यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात होगी कि हर युगल इसे अपनी कसम बना ले कि जब तक वह ध्यान में समर्थ नहीं हो जाता, किसी बच्चे को जन्म नहीं देगा। क्योंकि क्या फायदा है चंगीजखान और नादिरशाह और एडोल्फ हिटलर और मुसोलिनी, इनको पैदा करने से? अगर पैदा ही करना है तो कुछ पैदा करने योग्य--कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई नागार्जुन, कोई जो तुम्हारी प्रतिभा को निखार देगा, आगे ले चलेगा। मगर उसके लिए पहले तो मां-बाप को तैयार होना पड़ेगा।
और जब तक कोई ध्यान में स्वयं परिपक्व न हो जाए, उसे अधिकार नहीं मिलता बच्चे पैदा करने का।
और मेरा अपना अनुभव यह है हजारों लोगों के साथ काम करने का कि अगर पुरुष और स्त्री दोनों ध्यान में रसमग्न होना सीख गए हैं, तो संभोग के क्षण में उन करोड़ों जीवाणुओं में से केवल वही जीवाणु मां के अंडे तक पहुंचने में समर्थ होगा, जो उनके ध्यान के साथ एकरसता अनुभव कर रहा है। क्योंकि उनका ध्यान, उन दोनों की शक्ति, उसे शक्ति देगी। वह और सबको पीछे छोड़ जाएगा, वह उसकी गति बन जाएगी।
ध्यान के बिना बच्चों को पैदा करना, जीवन-ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट करना है।
ओशो, दुनिया भर में जनसंख्या विस्फोट है। मैंने सुना है, कुछ लोगों को यह कहते हुए कि धरती पर जब मनुष्यों का भार बढ़ जाता है तो प्रकृति उसे सहन नहीं करती। इसमें क्या सच्चाई है?
न तो परमात्मा संख्या बढ़ाता है, न प्रकृति संख्या बढ़ाती है, और न प्रकृति बदला लेती है। हम जिम्मेवार हैं।
मगर हमारी कहावतें बड़ी होशियारी से भरी हैं। हालांकि सिवाय नासमझी के उनमें कुछ भी नहीं, हम अपने को दूर ही रख लेते हैं। ऐसी बहुत कहावतें हैं। जब प्रकृति पर पाप बढ़ जाते हैं, तो परमात्मा जन्म लेते हैं। पाप जैसे अपने आप बढ़ जाते हैं। और तब भी हमसे कुछ किए नहीं होता, तब भी परमात्मा को जन्म लेना पड़ता है।
और कितनी बार परमात्मा जन्म ले चुका। और पाप घटते नहीं। लगता है परमात्मा की भी कोई सामर्थ्य नहीं है इन पापों को घटाने की। दुनिया की कोई शक्ति इन पापों को नहीं घटा सकती, क्योंकि बढ़ाने वाला मौजूद है, और बढ़ाने वाले हम हैं।
जीवन में सबसे बड़ा धार्मिक कृत्य मैं इस बात को मानता हूं कि व्यक्ति अपनी जिम्मेवारी को परिपूर्णता से स्वीकार करे। यह अंगीकार करे कि जो भी हम कर रहे हैं, वह हम कर रहे हैं, और जो भी परिणाम आएगा, वह हम ला रहे हैं। यह बात तीर की तरह प्रत्येक हृदय में चुभ जानी चाहिए। तो निश्र्चित ही बदलाहट हो सकती है। क्योंकि यदि हम ही कर रहे हैं, तो हम रोक सकते हैं। यदि हम ही ला रहे हैं गलत परिणाम, दुष्परिणाम, तो क्यों न बीज से ही बात को काट दिया जाए।
लेकिन ये कहावतें हमें सहारा देती हैं कि हम बैठ कर देखते रहें। जनसंख्या बढ़ती रहेगी, घबड़ाने की कोई बात नहीं। प्रकृति खुद बदला लेगी। प्रकृति क्या बदला लेगी? प्रकृति तो हमारे भार के तले दबी जाती है। एक सीमा है हर चीज की। जैसे बुद्ध के समय में भारत की कुल आबादी दो करोड़ थी। देश संपन्न था, सुखी था, आनंदित था और जीवन की ऊंचाई से ऊंचाई की बातें करता था। और ऊंचाई से ऊंचाई तक उड़ने की चेष्टा की थी। सारी दुनिया में एक ही बात जानी जाती थी कि भारत एक सोने की चिड़िया है।
बुद्ध के बाद हमारा पतन शुरू होता है। और मैं बुद्ध को और महावीर को माफ नहीं कर सकता। मैं उन्हें आदर करता हूं, सम्मान करता हूं लेकिन माफ नहीं कर सकता। चाहे अनजाने ही सही, उन्होंने भारत की गरीबी को बढ़ने में सहायता दी है। क्योंकि उन दोनों ने यह बात सिखाई कि दुनिया को त्याग देने में ही धर्म है। और अगर लोग दुनिया को त्यागने लगें, किसान खेती को त्याग दे, दुकानदार दुकान को त्याग दे, मूर्तिकार मूर्तियां न बनाएं, लोग अगर त्यागने लगें दुनिया को तो स्वभावतः दुनिया दरिद्र हो जाएगी। क्योंकि दुनिया को हम बनाते हैं। दुनिया हमारे सृजन पर निर्भर है।
और इन दोनों व्यक्तियों ने एक बात सिखायी कि तुम सब छोड़-छाड़ कर संन्यासी हो जाओ। करोड़ों लोग सब छोड़-छाड़ कर संन्यासी हो गए। उन करोड़ों लोगों से जो उत्पादन होता था, जो सृजन होता था, वह बंद हो गया। उन करोड़ों लोगों की पत्नियां और बच्चे अनाथ और भूखे हो गए। और वे करोड़ों लोग शेष सारी जनता पर बोझ हो गए। क्योंकि भिक्षा कौन देगा? वस्त्र कौन देगा? एक बहुत ऊंचे दिखने वाले खयाल के पीछे भारत की पूरी दासता और पूरी गरीबी और पूरी दीनता छिपी है। संसार का त्याग पुण्य हो गया, संन्यास हो गया।
इसलिए मैंने जब संन्यास देना शुरू किया, तो मैंने संन्यास की पूरी परिभाषा बदली। संसार का त्याग नहीं, वरन संसार के बीच रह कर यूं रहना, जैसे कि तुम वहां नहीं हो। संन्यास की मेरी परिभाषा पुराने संन्यास से बिलकुल उलटी है। छोड़ना नहीं है कुछ और पकड़ना भी नहीं है कुछ। यूं जीना है, जैसे कोई नाटक में अभिनय करता हो। राम बने, तो भी जानता है कि वह राम नहीं है।
और संसार में रह कर संसार का न होना, बड़ी से बड़ी कला है।
छोड़ कर भाग जाना तो कमजोरी है और कायरता है। और जो व्यक्ति संसार में यूं रह सके, जैसे अभिनय करता हो, वह अछूता जीता है। उस पर कोई दाग नहीं छूट जाते। और चूंकि उसे कुछ छोड़ना नहीं है, वह जीवन को कुछ देकर जाता है। सृजन करता है। जीवन उससे समृद्ध होता है। और चूंकि उसकी कोई आसक्ति, कोई लगाव, कोई मोह और कोई बंधन नहीं है संसार से वरन यह उसकी आनंद-लीला है।
कोई गरीबी की जरूरत नहीं है और न कोई गुलामी की जरूरत है। मेरे संन्यासी एक समस्या बन गए हैं धर्मों के लिए। क्योंकि उनकी पूरी धारणा संन्यास की जीवन-विरोधी है और मेरी धारणा जीवन के प्रति परिपूर्ण ओतप्रोत हो जाने की है।
ये सारी कहावतें बेमानी हैं। एक बात फिर से मैं दोहरा दूं, यह बात तीर की तरह हमारे हृदय में चुभी रहनी चाहिए कि हर कृत्य के लिए हम जिम्मेवार हैं। और हर कृत्य के परिणाम के लिए हम जिम्मेवार हैं। न तो हम किसी परमात्मा पर और न किसी प्रकृति पर अपने कृत्यों और अपने परिणामों को थोप सकते हैं। एक बार यह बात साफ हो जाए तो इस देश का सारा कचरा कट जाए। इस देश को हम फिर से नया जीवन, पुनरुज्जीवन दे सकते हैं। और जरूरी है कि वह दिया जाए। अन्यथा यह देश मरेगा। जिन धारणाओं में यह अब तक जीया है, आगे नहीं जी सकेगा। इस सदी तक, इसके पूर्ण होने तक, अगर यह इन्हीं धारणाओं से जीता रहा तो यह बुरी तरह मरेगा। इसने बहुत दुख झेले हैं, बहुत गुलामी झेली है, लेकिन अभी अंतिम दुख झेलने को बाकी है। उसे टाला जा सकता है।
और सरल सी बात है कि हमारे पास जो भी साधन हैं--न्यूजपेपर हों, रेडियो हों, टेलीविजन हों, जो भी साधन हैं, जनता तक ठीक-ठीक विचार पहुंचाने के, हम उन विचारों को जनता तक पहुंचने दें। और चिंता न करें। जैसे मेरे विचार हैं। सैकड़ों प्रश्र्न आएंगे, मैं उनके प्रत्युत्तर देने को राजी हूं। मैं एक भी प्रश्र्न को बिना उत्तर दिए नहीं छोड़ने की बात कर रहा हूं। ये सारे शिक्षा के साधन हो जाने चाहिए। न केवल समाज और समाचार वितरण के, बल्कि सामाजिक क्रांति के भी। तो जब तुम इन सारी बातों को प्रसारित करोगी, हजारों प्रश्र्न आएंगे। मैं हमेशा तैयार हूं। जो भी प्रश्र्न तुम ठीक समझो, जरूरी समझो, उसे सदा मेरे पास ले आ सकती हो।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
How can population be brought under control through voluntary family planning?
According to Osho, population can be controlled only by awakening responsibility, not coercion: dismantle fatalistic and religious beliefs that children are ‘God’s gift,’ expose the contradiction of an ‘omnipotent’ God blocked by a pill, and educate minds to see that poverty and births are human choices. Once this inner shift happens, people will voluntarily adopt contraception and rational family planning.
In simple terms: Switch from ‘God decides babies’ to ‘we decide responsibly,’ teach contraception clearly, and families will freely choose to have fewer children.
What effect does parental meditation before conception and during pregnancy have on the child?
According to Osho, when conception happens in a meditative, silent, love‑suffused union, the child receives its first taste of meditation—imprints of peace, joy, and egolessness. The mother’s ongoing meditation during pregnancy shapes ninety‑nine percent of the child, protecting it from anxiety and conflict and nurturing serenity and intelligence. Sustained nine months of meditative womb-life can even prepare the ground for a Buddha—an awakened, compassionate being.
In simple terms: If parents conceive in calm love and the mother stays peaceful and meditative while pregnant, the baby grows with inner peace and wisdom.
What truth is there about the impact of population explosion on nature?
According to Osho, there is no mystical ‘nature’s revenge.’ Neither God nor nature multiplies people or punishes us; we do. Overpopulation is our doing, and its ecological strain is simply the consequence of our choices. The moment we accept total responsibility, change becomes possible—cut the problem at the seed through conscious living, restraint, and creative engagement, instead of blaming fate while nature is crushed under our weight.
In simple terms: We’re the ones causing overpopulation and its harm; don’t blame nature—take responsibility and act wisely.
What are the implications of not allowing children to be born in India for many years?
According to Osho, pausing births in India would redirect love from biological possession to true motherhood: adopting and nurturing the countless orphans already crying for care. This shift dissolves jealousy and the mine-versus-others divide, curbs exploitative orphan industries, and brings deeper fulfillment and joy as children blossom. Motherhood becomes a spiritual quality of inclusive love, strengthening families and society without adding more births.
In simple terms: If we stop having new babies for a while, we can love and raise the many kids who already need parents, and our hearts grow bigger than just what’s mine.
