मृत्योर्मा अमृतं गमय — प्रवचन 2 Mrityoma Amritam Gamaya #2
Questions in this Discourse
ओशो, संन्यास, ध्यान और प्रेम को आप छलांग कहते हैं। छलांग से आपका क्या आशय है?
दीये के जलने और अंधेरे के मिट जाने को मैं छलांग कहता हूं। अगर धीरे-धीरे जाता, क्रम से जाता, मात्रा में जाता, जाते-जाते जाता--तो क्रम होता।
ऐसा ही संन्यास कोई क्रम नहीं है। किसी बोध की घड़ी में अचानक जीवन की व्यर्थता दिखाई पड़ जाती है। ऐसी प्रगाढ़ता से दिखाई पड़ती है कि छोड़ना नहीं पड़ता कुछ, पकड़ने को ही कुछ नहीं रह जाता, पकड़ने योग्य कुछ नहीं रह जाता।
छोड़ना पड़े तो संन्यास सच्चा नहीं। छोड़ना पड़े तो फिर प्रक्रिया होगी, क्रमिक होगी। आज छोड़ोगे कुछ; कल छोड़ोगे कुछ; परसों छोड़ोगे कुछ। छोड़ते-छोड़ते जनम-जनम लग जाएंगे। बोध की प्रगाढ़ता में, जैसे भभक उठे ज्योति भीतर, दिखाई पड़ जाए कि जगत व्यर्थ है। यह सोच-विचार की निष्पत्ति नहीं, यह जागृति का अनुभव हो।
इसलिए संन्यास सत्संग में ही घट सकता है। जहां और-और दीये जले हों। जले दीये के पास बैठ कर घट सकता है।
कभी बुझे दीये को जले दीये के करीब लाए हो? अभी छह इंच की दूरी है; बुझा दीया बुझा दीया है, जला दीया जला दीया है। पांच इंच की दूरी है; अभी भी बुझा दीया बुझा दीया है। चार इंच, तीन इंच, दो इंच, एक इंच; अभी भी बुझा दीया बुझा दीया है। ऐसा नहीं कि थोड़ा-थोड़ा जलने लगा, क्योंकि अब पांच इंच करीब आ गया तो थोड़ा तो जला होगा! फिर और करीब लाए, आधा इंच की दूरी। अभी भी जला दीया जला, बुझा दीया बुझा। फिर और करीब लाए, और करीब लाए। एक सीमा है, जहां अचानक छलांग लगती है, जले दीये की ज्योति बुझे दीये को पकड़ लेती है।
यह क्रम से नहीं होता। इसकी कोई प्रक्रिया नहीं है। यह तो सत्संग में लग गया रंग है।
संन्यास परिणति है सत्संग की। गुरु के पास आते-आते, आते-आते एक दिन बस पीछे लौटने का कोई उपाय न रहा। ऐसा नहीं कि तुम लौटना चाहते हो और नहीं लौटते। नहीं, लौटना भी चाहो तो नहीं लौट सकते। एक क्षण के बाद बुझा दीया चाहे भी कि अब न जलूं, तो उपाय नहीं है। बस एक खास दूरी पूरी हो जाए, कि बुझे दीये को जलना ही होगा, जलना अनिवार्यता होगी।
इसलिए कहता हूं, विचार नहीं है संन्यास। जो लोग विचार करते हैं, वे नहीं ले पाते। और जो विचार करके ले लेते हैं, लेकर भी नहीं ले पाते। जो सोचते हैं आगा-पीछा, लाभ-हानि, क्या होगा परिणाम, क्या होगी समाज में स्थिति--बड़े अंधड़ में घिर जाते हैं। बहुत ऊहापोह चलता है। चित्त अनेक लहरों से भर जाता है। वैसे ही अशांत चित्त, और एक नई अशांति पैदा हो जाती है कि संन्यास लूं या न लूं। पहले से ही और न मालूम कितने विकल्प घेरे खड़े थे: यह करूं कि वह करूं? अब एक और महाविकल्प सामने आ गया: संन्यास लूं या न लूं?
सोचने-विचारने वाला तो ले ही न पाएगा। सोच-विचार कभी किसी अंतिम निर्णय पर लाते ही नहीं। सोच-विचार की प्रक्रिया में सभी निर्णय सापेक्ष होते हैं, सशर्त होते हैं। और सोचोगे-विचारोगे, तो निर्णय बदलना पड़ेंगे।
इसलिए विज्ञान में कोई निष्पत्ति कभी भी अंतिम नहीं होती, क्योंकि विज्ञान का आधार है सोच-विचार। विज्ञान कभी सिद्धांतों पर नहीं पहुंचता। सिद्धांत का अर्थ होता है: सिद्ध हो गया जो। विज्ञान तो केवल परिकल्पनाएं, हाइपोथीसिस पर पहुंचता है। परिकल्पना और सिद्धांत का भेद ठीक से समझ लेना।
परिकल्पना का अर्थ होता: अब तक जितना सोचा, उसमें यह ठीक मालूम पड़ता है। लेकिन कल और सोचेंगे। फिर कौन जाने--ठीक रहे, न रहे। परसों और सोचेंगे। फिर कौन जाने--नये तथ्य उघड़ेंगे, नये तथ्य हाथ में आएंगे, तो पुराने सत्य बदलने पड़ेंगे। लेकिन जिस सत्य को बदलना पड़े, वह तो सत्य ही नहीं, केवल सत्य की भ्रांति थी। जैसे एडीसन ने कुछ कहा। जब तक आइंस्टीन पैदा न हुआ, वह सत्य रहा। फिर आइंस्टीन पैदा हुआ, और न्यूटन असत्य हो गया।
सत्य कहीं असत्य हो सकता है! सत्य था ही नहीं; केवल विचार की निष्पत्ति थी। विचार की कोई निष्पत्ति अंतिम नहीं होती। और विचार होगा, निष्पत्ति बदलनी होगी। आइंस्टीन के बाद फिर कोई होगा, और आइंस्टीन के सिद्धांत फिर सिद्धांत न रह जाएंगे।
अच्छा हो, इनको हम सिद्धांत कहें ही न। और आइंस्टीन कहता भी नहीं। यही है उसका आधार-स्तंभ सापेक्षवाद का कि किसी भी सत्य में कोई परिपूर्णता नहीं है। आज की स्थिति में अब तक जो जाना, उसमें यह ठीक मालूम पड़ता है। कल के संबंध में कोई वक्तव्य नहीं है। कल आएगा, फिर देखेंगे। शायद ठीक रहे, शायद ठीक न रहे।
इसलिए महावीर ने स्यातवाद को जन्म दिया। स्यातवाद का अर्थ है: विचार से कोई भी निर्णय स्यात के पार नहीं जाता। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी विचार के द्वारा ली गई निष्पत्तियों को दावे के साथ घोषित नहीं करेगा। कहेगा: शायद ऐसा हो; शायद ऐसा न हो। अब तक जितना जाना-समझा, सोचा-विचारा है, जितना तौला-परखा-पहचाना है, उससे यह ठीक मालूम पड़ता है। लेकिन कल सुबह सूरज कौन सी नई खबरें लाएगा, हवाएं कौन से नये संदेश ले आएंगी, आकाश कौन से रहस्य खोलेगा--सब अज्ञात है।
लेकिन ऐसी हाइपोथीसिस, ऐसी परिकल्पनाओं से जीवन रूपांतरित नहीं हो सकते। लचर हैं, अथिर हैं, डांवाडोल हैं, तो तुम्हें क्या थिरता उनसे मिलेगी! थिरता तो मिल सकती है किसी ऐसे सत्य से, जो अपरिवर्तनीय हो, शाश्वत हो; समय की धार जिसे बदल न सके। पतझड़ हो तो सत्य; और वसंत हो तो सत्य। और जीवन हो तो सत्य; मृत्यु हो तो सत्य। बचपन कि जवानी कि बुढ़ापा; सफलता कि असफलता; सुख कि दुख--लेकिन सत्य अडिग, थिर; वैसा का वैसा; रत्ती भर भेद नहीं। रंच मात्र परिवर्तन की आवश्यकता नहीं।
ऐसे सत्य विचार से पैदा नहीं होते। ऐसे सत्य तो हृदय में आविर्भूत होते हैं। प्रेम ऐसा ही सत्य है। ध्यान ऐसा ही सत्य है। और संन्यास--प्रेम और ध्यान की अंतिम पराकाष्ठा है। जहां ध्यान और प्रेम का मिलन होता है उस संगम का नाम संन्यास है। संन्यास घटे तो प्रेम और ध्यान घट जाएगा। प्रेम और ध्यान घटे तो संन्यास घट जाएगा।
लेकिन यह रंग कहां लगेगा? जहां फाग मची हो, जहां होली खेली जाती हो, जहां पिचकारियां रंगों से भरी हों; जहां आनंद का महोत्सव चल रहा हो। अगर तुम बगीचे से निकलोगे फूलों से भरे, तो चाहे फूलों को छुओ या न छुओ, तुम्हारे वस्त्रों में बेला की गंध अटकी रह जाएगी, कि रातरानी की गंध तुम्हारे बालों में उलझी रह जाएगी। घर जाओगे, बगिया से दूर निकल जाओगे, तो भी तुम्हारे नासापुटों में बगिया की स्मृति आती रहेगी। तुम्हारे चारों तरफ बगिया का कुछ हिस्सा छाया की तरह मौजूद रहेगा।
सत्संग का अर्थ है: जहां खूब फूल खिले हैं। सत्संग का अर्थ है: जहां से गुजरोगे तो रंग जाओगे; गंध से आपूरित हो जाओगे। जहां बहुत दीप जले, वहां से अपना बुझा दीया कैसे ले जाओगे! जलना ही होगा। किसी जले हुए दीये के करीब सरकना होगा। जब तक सरक रहे हो, तब तक तुम बुझे ही हो। और एक छलांग होगी--अभी बुझे थे, अभी जल गए। इसलिए छलांग कहता हूं। छलांग शब्द को ठीक से समझना।
और चूंकि संन्यास छलांग है, ध्यान और प्रेम छलांग है, इसलिए दीवाने, परवाने, बस उनके ही सामर्थ्य की बात है।
सोच-विचार एक तरह की कायरता है। बैठे रहो। गणित बिठाते रहो। गुनते रहो। जिंदगी आई है और चली जाएगी। तुम गणित ही बिठालते रहना, बीज कभी बो न पाओगे। तुम हिसाब ही लगाते रहना लाभ-हानियों का। कहीं तुम्हारे जीवन का अवसर ऐसे ही न बीत जाए।
नींद बड़ी गहरी थी
झटके से टूट गई
तुमने पुकारा या द्वार आकर लौट गए!
जैसे किसी की नींद तोड़ दें हम झटका देकर। वह छलांग है। जब तुम्हें कोई झकझोर कर जगा देता है, तो बस एक क्षण में--अभी नींद थी, अभी नींद नहीं; अभी आंख बंद थी, अब आंख खुली; अभी बेहोश थे, अब होश।
परमात्मा तो पुकार रहा है, मगर परमात्मा की पुकार बड़ी सूक्ष्म है, इसलिए तुम्हें सुनाई नहीं पड़ती। कोई सदगुरु चाहिए, जो उसकी पुकार को बल दे दे, जो उसकी पुकार को जोर दे दे। परमात्मा तो हिला रहा है तुम्हें, लेकिन उसके हाथ अदृश्य हैं। कोई दृश्य हाथ चाहिए।
इंग्लैंड में ऐसा हुआ दूसरे महायुद्ध में, लंदन में एक चौराहे पर जीसस की प्रतिमा थी, उस पर बम गिर गया। प्रतिमा खंड-खंड होकर बिखर गई। बड़ी प्यारी प्रतिमा थी। बड़ी कलात्मक प्रतिमा थी। लोगों ने उसके सारे खंडों को इकट्ठा किया और एक मूर्तिकार को निवेदन किया कि तुम इन खंडों को फिर से जोड़ दो।
और सब खंड तो मिल गए, लेकिन दो हाथ जीसस की प्रतिमा के नहीं मिले। शायद बिलकुल चकनाचूर हो गए। उनका कुछ पता न चला। लोगों ने मूर्तिकार को कहा, तो हाथ दो नये बना दो और जोड़ दो। मगर इस पुरानी प्रतिमा से हमें प्रेम है बहुत।
लेकिन मूर्तिकार ने कुछ किया, जो बहुत अदभुत है। उसने नये हाथ नहीं बनाए। उसने प्रतिमा के नीचे पत्थर पर एक वचन खोदा, छोटा सा वचन: मेरे कोई हाथ नहीं हैं। अब से तुम्हारे हाथों से ही मैं अपने हाथों का काम लूंगा!
जीसस की प्रतिमा वह अब भी खड़ी है, बिना हाथों की; नीचे यह वक्तव्य है: मेरे अपने कोई हाथ नहीं हैं। तुम्हारे हाथों से ही मैं अब से काम लूंगा!
परमात्मा के हाथ तो और भी अदृश्य हैं। तुम्हें परमात्मा छुए भी तो तुम पहचान न पाओगे। सोचोगे: हवा का झोंका आया कि क्या हुआ? कौन छू गया? शायद तुम डर भी जाओ। पहली बार परमात्मा का स्पर्श होता है तो भय होता है, घबड़ाहट होती है।
किसी सदगुरु के हाथ चाहिए--पार्थिव, जो तुम्हें छू सकें और तुम्हें जगा सकें। परमात्मा की वाणी तो शून्य है, उसे शब्द कौन देगा? उस अनभिव्यक्त को व्यक्त कौन करेगा? कोई वेद, कोई उपनिषद, कोई कुरान, कोई बाइबिल उस परमात्मा को शब्द देती, रूप देती, ढंग देती, रंग देती--तब कहीं तुम्हारी पकड़ में आना शुरू होता है।
नींद बड़ी गहरी थी
झटके से टूट गई
तुमने पुकारा? या द्वार आकर लौट गए!
बार-बार आई मैं द्वार तक, न पाया कुछ
बार-बार सोई, सपना भी न आया कुछ
अनसोया अनजागा
हर क्षण तुमको सौंपा
तुमने स्वीकारा? या द्वार आकर लौट गए!
कुछ भी मैं कह न सकी, चुप भी मैं रह न सकी
जीवन की सरिता, बन झील रही, बह न सकी
रूठा मन राजहंस
तुम तक पहुंचा होगा
तुमने मनुहारा? या द्वार आकर लौट गए!
रात चली पुरवाई, ऋतु ने ली अंगड़ाई
मेरे मन पर किसने केसर सी बिखराई
सुधि की भोली अलकें
माथे घिर आई थीं
तुमने संवारा? या द्वार आकर लौट गए!
सझवाती बेला में कोयल जब कूकी थी
मेरे मन पर कोई पीड़ा सी हूकी थी
अनचाही पाहुनियां
पलकों में ठहर गईं
तुमने निहारा? या द्वार आकर लौट गए!
मन के इस सागर में सीप बंद मोती सी
मेरी अभिलाषा सपनों में भी सोती सी
पलकों के तट आकर
बार-बार डूबी थी
तुमने उबारा? या द्वार आकर लौट गए!
कितने ही दीपक, मैं अंचल के ओट किए
नदिया तक लाई थी, लहरों पर छोड़ दिए
लहरों की तरणी ने
दीपों के राही को
तट पर उतारा? या द्वार आकर लौट गए!
परमात्मा बहुत अदृश्य है। द्वार पर दस्तक भी दे, शायद द्वार हिलता मालूम भी पड़े, मगर तुम्हें उसके हाथ दिखाई न पड़ेंगे। शायद तुम्हारे हाथ पकड़ कर ले भी चले! चल ही रहा है, अन्यथा तुम चलते कैसे? कौन चलाता है तुम्हारी श्वास? कौन धड़कता है तुम्हारे हृदय में? कौन दौड़ता है तुम्हारे लहू में जीवन बन कर? यह कौन है जो तुम्हारी मांस-मज्जा बना है? यह कौन है जो तुम्हारा चैतन्य है? वही है। लेकिन बड़ी सूक्ष्म है उसके जगत की व्यवस्था।
तुम्हें चाहिए कोई मूर्तिवंत--कोई बुद्ध, कोई कृष्ण, कोई क्राइस्ट, कोई जरथुस्त्र--जिसकी आंखों में झांक कर तुम अदृश्य को थोड़ा सा देखने में समर्थ हो जाओ। जिसके हाथों में हाथ देकर तुम्हें परमात्मा के हाथों की थोड़ी सुधि आने लगे। जिसके पास बैठ कर, जिसकी सन्निधि में, जिसके सामीप्य में, तुम्हारे हृदय में नई तरंगें उठने लगें--आलोक की, आनंद की। जिसकी मौजूदगी में तुम्हारे भीतर स्फुरणा होने लगे। तुम्हारे रोएं सजग होने लगें। तुम्हारे कण-कण में कोई अदृश्य नाच जाए। तुम्हारे हृदय-तंत्री के तार छिड़ जाएं। तुम्हारा गीत बज उठे। बस वही है संन्यास।
संन्यास के पक्षी के दो पंख हैं: प्रेम और ध्यान। जहां संन्यास है, वहां प्रेम है, वहां ध्यान है।
ध्यान का अर्थ होता है: अकेले में आनंदित होने की क्षमता; एकांत में भी रसमग्न होने की पात्रता। और प्रेम का अर्थ होता है: संग-साथ में आनंदित होने की क्षमता। ध्यान तो है, जैसे कोई बांसुरी अकेली बजाए; और प्रेम है आर्केस्ट्रा--बांसुरी भी हो; तबला भी ताल दे; सितार भी बजे; और-और साज हों। प्रेम है: दो व्यक्तियों के बीच या अनेक व्यक्तियों के बीच जुगलबंदी। ध्यान है: एकांत में, अकेले में, अपने ही प्राणों के साथ आनंद-भाव। प्रेम है: वार्तालाप, संवाद, मैं और तू के बीच सेतु का बनाना। ध्यान है: स्वयं की पर्याप्तता। नहीं कुछ चाहिए; बस अपना होना काफी है।
और अब तक ऐसा हुआ है--जो कि सौभाग्यपूर्ण नहीं था, जिसके कारण बड़ा दुर्भाग्य घटित हुआ--अब तक ऐसा हुआ कि ध्यान और प्रेम के पंथ एक-दूसरे के विपरीत खड़े रहे हैं। ध्यानी भक्त को मूढ़ मानता है। भक्त ध्यानी को अज्ञानी मानता है। ध्यानियों की परंपरा पूजा, अर्चना, प्रार्थना को कोई जगह नहीं देती; परमात्मा को भी जगह नहीं देती।
इसलिए बुद्ध, महावीर, जो कि ध्यान के अप्रतिम शिखर हैं, उनकी भाषा में, उनकी अभिव्यक्ति में, उनके विचार में परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं है। बस स्वयं का होना काफी है। कोई परमात्मा आवश्यक नहीं है।
पतंजलि ने परमात्मा को स्वीकारा है, मगर बड़ी शर्त के साथ। कहा है कि परमात्मा भी एक आलंबन है ध्यान का; कोई लक्ष्य नहीं है जीवन का, एक आलंबन; चाहो तो उपयोग कर लो, चाहो तो उपयोग न करो। एक उपाय है। जैसे कोई चाहे तो यहां बैलगाड़ी में बैठ कर आ जाए। कोई चाहे, रेलगाड़ी में बैठ कर आ जाए। और किसी की मर्जी हो तो वह पद-यात्रा कर ले। कोई बैलगाड़ी अनिवार्य नहीं है कि बिना बैलगाड़ी के न आ सकोगे। हवाई जहाज भी है। और कुछ भी न हो तो पैदल ही आ सकते हो। आलंबन मात्र कहा है पतंजलि ने परमात्मा को। एक सहारा। जिनको लेना हो, ले लें। जिनको न लेना हो, उनकी मर्जी। बिना उसके भी चल जाएगा।
पतंजलि भी ध्यानी की भाषा बोल रहा है। हालांकि उतनी कठोर नहीं, जितनी बुद्ध और महावीर। पतंजलि बीच में खड़े हैं; प्रेम और ध्यान दोनों के मध्य में हैं। तो थोड़ी सी जगह देते हैं। मगर मौलिक स्वर ध्यान का है। क्योंकि आधार योग का ध्यान है।
बुद्ध तो स्पष्ट परमात्मा से छुटकारा पा लेते हैं। महावीर तो साफ कह देते हैं कि कोई परमात्मा नहीं है। ध्यानी को जरूरत नहीं है। क्योंकि ध्यानी को होना है अकेला। ध्यानी को करनी है आंख बंद। ध्यानी को डूबना है भीतर। भीतर डूबने के लिए परमात्मा की क्या जरूरत? और जब भीतर डूब जाएगा पूरा तो जो जानेगा वही परमात्मा है। लेकिन ध्यानी उसको परमात्मा अपने ही अर्थ में कहता है--परम आत्मा के अर्थ में परमात्मा; ईश्वर के अर्थ में नहीं।
महावीर ने परमात्मा शब्द का उपयोग किया है, लेकिन उस अर्थ में नहीं जिस अर्थ में कबीर, मीरा या कृष्ण करते हैं। महावीर ने अर्थ ही बदल दिया। महावीर ने परमात्मा कहा है आत्मा की विशुद्ध अवस्था को। महावीर ने कहा: तीन अवस्थाएं हैं आत्मा की। जीवावस्था--सोई हुई आत्मा। फिर आत्मावस्था--जागती, जागने के करीब, सुबह-सुबह नींद टूट भी गई और नहीं भी टूटी, वह तंद्रा की अवस्था। सोए भी हैं बिस्तर में अभी और इतना जाग भी गए हैं कि सड़क पर चलने वाले लोगों की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। बच्चे स्कूल की तैयारियां कर रहे हैं। पत्नी चाय बना रही है। केतली की गुनगुन सुनाई पड़ रही है। कुछ-कुछ एहसास भी हो रहा है, आभास भी हो रहा है कि सुबह हो गई। सूरज की किरणें चेहरे पर पड़ने लगी हैं, उनका ताप भी मालूम हो रहा है। मगर एक करवट और लेकर सो जाने का मन है। और कंबल खींच लिया है। और एक करवट ले ली है।
जीवात्मा--सोई हुई आत्मा। आत्मा--अर्ध जाग्रत जीव। और परमात्मा--आत्मा पूर्ण जाग्रत। मगर ये आत्मा की ही अवस्थाएं हैं--महावीर ने कहा।
परमात्मा कोई बाहर जगत को बनाने वाला स्रष्टा नहीं है। जगत को चलाने वाला नियंता नहीं है। तुम्हारे ही भीतर बैठा हुआ साक्षी है। यह ध्यानी का भाव रहा।
तो स्वभावतः ध्यानी ने कहा: कैसी पूजा? कैसी अर्चना? कैसी प्रार्थना? किसके लिए पूजा के थाल सजाते हो? पागल हो गए हो! अरे, भीतर जाओ! यह सब तो बाहर है।
और प्रेमी ने भी ध्यान को वर्जित किया। प्रेमी ने कहा: ये भीतर जाने की बातें, फिर पूजा का थाल कौन सजाएगा? फिर प्रार्थना कौन करेगा? फिर प्रेम में किसके गिरेंगे हम? और बिना प्रेम के सब सूखा हो जाएगा।
प्रेमी ने कहा: मूर्ति में परमात्मा है--काबा में, और काशी में, और कैलाश में। प्रेमी ने कहा: मैं तो उसे पुकारूंगा। आकाश उससे भरा है। चांद-तारों में वह मौजूद है। यह सारा अस्तित्व उसकी लीला है। मैं तो एक बूंद हूं। इस बूंद को इस सागर में डुबाना है। बूंद बूंद में ही डूबती रहे, तो सागर कैसे हो जाएगी? बूंद बूंद में ही डूबती रहे, तो भी बूंद ही रहेगी। सागर में बिना डूबे निस्तारा नहीं है।
इसलिए प्रेमी ने पुकारा परमात्मा को कि तू कहां है? तू उबार मुझे! ध्यानी भीतर गया; प्रेमी ने अपने आंखें खोलीं और दूर चांद-तारों में उसकी झलक देखनी चाही।
दोनों सही थे; लेकिन दोनों अधूरे सही थे। और उन दोनों के अधूरेपन के कारण दुनिया में अधूरे धर्म पैदा हुए। ध्यानी के धर्म पैदा हुए; उन्होंने प्रार्थना वर्जित कर दी; उनके कारण प्रेम मर गया। और जब प्रेम मर जाए, तो जगत मरुस्थल हो जाता है। फिर उसमें हरियाली नहीं होती। झरने नहीं होते। कोयल नहीं कूकती। पपीहा नहीं बोलता। फूल नहीं खिलते। रास बंद हो जाता है। सब निराशा हो जाती है। अस्तित्व एक मरघट हो जाता है।
और प्रेमियों ने प्रेम के गीत गाए, बांसुरी बजाई, पैरों में घूंघर बांधे, नाचे। लेकिन चूंकि ध्यान की कमी थी; तू को तो पुकारा, मगर मैं का कोई पता न था। पुकारने वाले का भी पता न हो, तो तुम किसको पुकारोगे? अपना ही पता न हो, तो परमात्मा का क्या खाक पता होगा! जब तक बूंद से पहचान न हो, किस बूंद को सागर में डुबाओगे? तो प्रेमी की दुनिया में थोड़ा रस तो दिखाई पड़ा, उसकी आंखों में थोड़ी मस्ती तो दिखाई पड़ी, लेकिन होश नहीं दिखाई पड़ा। उसके जीवन में गीत तो खूब बने, मगर गीतों में कुछ कमी रह गई। गीतों में ज्योति नहीं थी।
मैं चाहता हूं मेरा संन्यासी पूरा मनुष्य हो, अखंड मनुष्य हो। उसमें मरुस्थल जैसी शांति भी हो, सन्नाटा भी हो, विस्तार भी हो। बगिया जैसे फूल भी हों, झरने भी हों, कोयल भी बोले, पपीहा भी पुकारे। वह अपने को भी जाने और विराट को भी। कभी आंख बंद करके जाने; कभी आंख खोल कर जाने। क्योंकि बाहर भी वही है, भीतर भी वही है। ध्यान से भीतर को जाने, प्रेम से बाहर को जाने।
इसलिए मैं प्रेम और ध्यान को संन्यास के दो पंख कहता हूं। पर संन्यास घटता है छलांग की भांति। यह दीवानों का काम है। अगर परवाना सोचने लगे कि शमा पर गिरूं या न गिरूं? फायदा क्या है? मिट जाऊंगा। ज्योति के साथ एक हो जाऊंगा! बचूंगा तो नहीं। यह तो आत्महत्या है। तो परवाना ज्योति से दूर ही दूर रहने लगे; अंधेरे में ही जीने लगे; अंधा हो जाए। और ज्योति फिर कभी बन न पाए। परवाना तो देखता है शमा को, देखता है ज्योति को--और लगा जाता है छलांग। मिट जाता है। और मिट कर अपने को पा जाता है। मिट कर अंतरतम की अभीप्सा पूरी हो जाती है; ज्योति के साथ एक होने का आनंद पूरा हो जाता है। संन्यास छलांग है--सदगुरु की ज्योति में एक हो जाने की।
ओशो, आप कहते हैं कि प्रेम प्रगाढ़ होकर प्रार्थना बनता है और प्रार्थना परमात्मा की ओर ले जाती है। जब कि मेरे जीवन में प्रेम दुख बन गया है। कृपापूर्वक इस संबंध में मार्ग-दर्शन करें।
मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं, शायद तुम उस प्रेम की बात नहीं कर रहे हो। तुम किसी और ही प्रेम की बात कर रहे हो। मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूं जो प्रार्थना की तरफ ले जाता है। तुम उस प्रेम की बात कर रहे हो जो वासना की तरफ ले जाता है। और ये यात्राएं अलग-अलग हैं। ये यात्राएं विपरीत हैं।
प्रेम नीचे गिरे तो वासना बनता है; ऊपर उठे तो प्रार्थना बनता है। प्रेम उतार पर हो तो वासना; चढ़ाव पर हो तो प्रार्थना। प्रेम पहाड़ से लुढ़कने लगे पत्थर की भांति, तो वासना। और प्रेम को पंख लग जाएं और उड़ चले सूरज की तरफ, तो प्रार्थना।
नीचे उतरना तो दुखपूर्ण है। इसलिए तो सारे धर्म कहते हैं कि नरक नीचे है। नीचे का मतलब भौगोलिक मत समझना कि जमीन में गड्ढा खोदते चले जाएंगे, खोदते चले जाएंगे, खोदते चले जाएंगे, एक दिन नरक मिलेगा। नरक नहीं मिलेगा, अमरीका पहुंच जाओगे। और अमरीका के लोग अगर खोदते चले आएं, तो भारत-भूमि में, इस पुण्य भूमि में आ जाएंगे! वे भी यही सोचते हैं कि नरक नीचे है। दुनिया के सारे लोग सोचते हैं कि नरक नीचे है। नीचे की बात भौगोलिक नहीं है; नीचे की बात बड़ी गहरी है; उसका संदर्भ समझो। जब भी जीवन-चेतना नीचे की तरफ उतरती है, तो नरक में ले जाती है।
और यही अर्थ है स्वर्ग के ऊपर होने का। ऊपर होने का ऐसा अर्थ नहीं कि चले बैठ कर अंतरिक्ष यान में, और एक दिन स्वर्ग पहुंच जाएंगे! ऐसी भ्रांति रही होगी यूरी गागरिन को। क्योंकि उसने लौट कर जो पहली बात कही वह यह कही कि मैं चक्कर लगा आया चांद का, अंतरिक्ष की यात्रा कर आया, परमात्मा कहीं मिला नहीं। स्वर्ग इत्यादि कहीं भी नहीं है!
रूस में उन्होंने चंद्रयात्रा का पूरा का पूरा म्यूजियम तैयार किया है। तो चंद्रयात्री जो भी खबरें लाए हैं, चांद पर जाकर जो मिट्टी-पत्थर लाए गए हैं, वे सब वहां संगृहीत हैं। उस म्यूजियम के दरवाजे पर यूरी गागरिन का यही वचन खोदा गया है--कि मैं देख आया चांद तक; अंतरिक्ष का चक्कर मार आया। न कोई स्वर्ग है, न कोई ईश्वर है।
आस्तिक भी भ्रांति है--और नास्तिक भी। आस्तिक की भ्रांति है, वह सोचता है: स्वर्ग ऊपर। तो तुम जब प्रार्थना करते हो तो हाथ ऊपर उठा कर कि जैसे परमात्मा ऊपर।
परमात्मा तो सब तरफ है। नीचे भी वही, ऊपर भी वही। बाएं भी वही, दाएं भी वही। सब दिशाओं में वही। लेकिन ऊपर की बात सांकेतिक है, अर्थपूर्ण है। अर्थ को जोर से मुट्ठी बांध कर पकड़ोगे तो मर जाएगा।
कुछ अर्थ होते हैं जिनको मुट्ठी बांध कर नहीं पकड़ा जाता। नाजुक चीजें हैं ये। इनको झपट्टे से नहीं पकड़ते हैं। ‘नरक नीचे’--पकड़ लिया झपट्टे से। नक्शे लटके हैं मंदिरों में कि नरक नीचे, स्वर्ग ऊपर! और जिन धर्मों में अनेक नरकों की चर्चा है, वहां नरकों के नीचे नरक, सात नरक! तो चले जाओ नीचे, और नीचे। ड्रिलिंग करते जाओ। और स्वर्ग, सात स्वर्ग! चढ़ते जाओ! चढ़ाई पर चढ़ाई, पहाड़ पर पहाड़ आते जाते हैं। फिर सातवें स्वर्ग में ईश्वर विराजमान है।
ऊपर और नीचे काव्यात्मक प्रतीक हैं। नीचे का अर्थ है: चेतना का अधोगमन। ऊपर का अर्थ है: चेतना का ऊर्ध्वगमन। ऊर्ध्वरेतस हो जाना स्वर्गीय हो जाना है। तुम्हारे भीतर प्राण ऊपर की तरफ चलने लगें। वासना नीचे खींचने वाला तत्व है। वासना ऐसे है जैसे जमीन का गुरुत्वाकर्षण।
सत्यनारायण! तुम कहते हो: ‘मेरे जीवन में प्रेम दुख बन गया है।’
तुम्हारे जीवन में ही नहीं, सौ में से निन्यानबे प्रतिशत लोगों के जीवन में प्रेम दुख बनता है। क्योंकि बोते तो नीम हैं, और प्रतीक्षा करते हैं आम की! मैं कह रहा हूं: आम बोओ, तो आम की फसल आएगी। और फल से सिद्ध होता है कि वृक्ष क्या था। फल के पहले पता भी नहीं चलता।
जब नीम बोते हो, तब तो पता भी नहीं चलता कि क्या होने वाला है। जरा चख कर बोओ। जरा निबोली को चखो। जरा उसके कड़वेपन को चखो। और फिर जब पहले-पहले पत्ते आने लगें नीम के, तो उनको भी चखो। इस पर जीवन समाप्त मत करो। इसमें कड़वाहट ही कड़वाहट है।
स्वर्ग के दरवाजे पर एक आदमी ने दस्तक दी। द्वारपाल ने खिड़की खोली। पूछा, आप कौन हैं? उस आदमी ने कहा, मेरा नाम चंदूलाल!
आप क्या चाहते हैं? यह स्वर्ग है।
चंदूलाल ने कहा, और क्या चाहता हूं! दरवाजा खोलिए। उस देवदूत ने पूछा कि पहले एक बात का उत्तर देना होता है स्वर्ग में प्रवेश के पहले। शादीशुदा हो, गैर-शादीशुदा? चंदूलाल ने कहा कि शादीशुदा हूं। देवदूत ने कहा कि ठीक है फिर। नरक तुम देख चुके। अब आ जाओ स्वर्ग में। दरवाजा खोल दिया।
दरवाजा बंद ही कर पाया था कि फिर दस्तक। फिर खिड़की से झांका, आप कौन हैं? उसने कहा, मैं अभी वह जो चंदूलाल भीतर गया, उसका दोस्त ढब्बूजी! हम साथ ही साथ मरे कार एक्सिडेंट में। उसकी चाल जरा तेज है; मेरे पैर में जरा चोट ज्यादा आई है, तो मैं जरा घिसटता आ रहा हूं। दरवाजा खोलो! जब चंदूलाल भीतर चला गया तो मैं भी भीतर जाऊंगा। देवदूत ने पूछा कि पहले एक प्रश्न का जवाब दो। शादीशुदा कि गैर-शादीशुदा? ढब्बूजी ने कहा, चार बार शादी की। द्वारपाल ने दरवाजा बंद करते हुए कहा कि यह स्वर्ग है, कोई पागलखाना नहीं!
भूलों से सीखो। एक बार तक माफ किया जा सकता है। मगर चार बार! एक सीमा होती है भूलों की। लेकिन लोग भूल वही की वही भूल दोहराए चले जाते हैं जीवन भर। फिर-फिर नीम के बीज बो देते हैं। सोचते हैं कि इस बार फसल कड़वी हो गई, अगली बार ठीक हो जाएगी, मगर बीज वही! बीज बदलने होंगे।
वासना का अर्थ होता है: तुम भिखारी हो। और भिखारी प्रेम को नहीं जान सकते। वासना का अर्थ होता है: तुम मांग रहे हो। पुरुष हो, तो स्त्री से मांग रहे हो कुछ कि तू दे दे सुख। उसके पास खुद ही नहीं है। वह तुमसे मांग रही है कि मैं झोली फैलाती हूं, भर दो मेरी झोली सुख से। वह भी भिखमंगिन, तुम भी भिखमंगे। दो भिखमंगे एक-दूसरे के सामने झोली फैलाए खड़े हैं, अड़चन न होगी तो क्या होगा! न उसके पास है देने को, न तुम्हारे पास है देने को। तुम भी चाहते हो, वह भी चाहती है। दुनिया में लोग शिकायत करते हैं: प्रेम नहीं मिलता। ऐसी कोई शिकायत नहीं करता कि मैं प्रेम नहीं देता। मेरे पास कितने लोग आकर कहते हैं कि दुनिया में प्रेम नहीं। कोई देता ही नहीं तो दुनिया में प्रेम हो कैसे? सब चाहते हैं कि मिले।
वासना का अर्थ है--मिले। और प्रार्थना का अर्थ है--दो। प्रार्थना दान है। वासना भिक्षा है। लेकिन देने के पहले होना चाहिए न! वही तो दे सकते हो जो तुम्हारे पास है। तो प्रेम पैदा करो।
प्रेम को पैदा करना बड़ी कला है। जीवन का आमूल रूपांतरण करना होता है। जिनके चित्त घृणा से भरे हैं, भय से भरे हैं, ईर्ष्या से भरे हैं, वैमनस्य से भरे हैं, अहंकार से भरे हैं, वहां प्रेम के बीज पैदा कैसे होंगे? यह तो ऐसा समझो कि घास-पात, घास-पात ऊगा हुआ है तुम्हारे पूरे प्राणों में, और उसमें तुमने बीज डाले चमेली के कि चंपा के। घास-पात खा जाएगी बीजों को। घास-पात की एक खूबी है: उसे बोना नहीं पड़ता, वह अपने आप ऊगती है।
मुल्ला नसरुद्दीन के पड़ोसी ने मुल्ला नसरुद्दीन के बगीचे को देखा। पड़ोसी नया-नया। उसने कहा, बड़ा प्यारा बगीचा लगाया है! घास भी आपकी बड़ी प्यारी है। गुलाब के फूल भी बड़े सुंदर। मैं भी बगीचा बनाना चाहता हूं। मैंने भी गुलाब बोए हैं। लेकिन पता ही नहीं चलता, कौन गुलाब है, कौन घास-पात है! इसके पता चलाने का उपाय क्या है? नसरुद्दीन ने कहा, बड़ा सुगम उपाय है। तुम सबको उखाड़ कर फेंक दो। जो फिर से उग जाए वह घास-पात। जो फिर से न उगे, समझ लेना गुलाब था।
घास-पात की एक खूबी है: वह अपने से उग आता है। वासना की एक खूबी है: वह अपने से आ जाती है। वह जन्म के साथ ही आती है। सच तो यह है कि तुम्हारा जन्म ही उसी के कारण होता है। मरते वक्त जो वासनाएं तुम्हारे चित्त में थीं, वही तुम्हारे जन्म का कारण बनती हैं। वासनाएं तो पाश हैं, उनमें बंधे, उनमें खिंचे हम चले आते हैं।
हमारे पास एक शब्द है--पशु। वह बड़ा प्यारा शब्द है। दुनिया की किसी भाषा में वैसा शब्द नहीं है। अंग्रेजी में पशु को एनिमल कहते हैं। मगर एनिमल में वह बात नहीं है। उलटी ही बात है। एनिमल बनता है एनिमा से। एनिमा का मतलब होता है प्राणवान, जीवंतता। तो जो प्राणवान है वह एनिमल। जो सप्राण है वह एनिमल।
हमारा शब्द पशु बड़ा अदभुत है। पशु का अर्थ है जो पाश में बंधा है; जिस पर जंजीरें हैं; जो जंजीरों में खिंचा चला आया है। जैसे गाय को कोई रस्सी में बांध कर ले चले। तो गाय पशु है। लेकिन तुम भी रस्सियों से बंधे हो। और शायद रस्सियां भी ऐसी जो तुम्हीं बुनते हो। तुम्हारे जाल भी ऐसे जो तुम्हीं बनाते हो। जैसे मकड़ी जाला बुनती है और कभी-कभी खुद के बनाए जाले में फंस जाती है। और हम तो सब खुद के ही बनाए जालों में फंसे हैं। किसी और का बनाया जाला नहीं है।
थोड़ा सजग होना होगा, सत्यनारायण! तुमने जिसे प्रेम समझा है, वह प्रेम नहीं है--काम है, कामना है, वासना है। मांग है उसमें। तुम्हारे प्रेम का अर्थ अभी तक इतना ही है कि दूसरे से सुख मिल जाए, दूसरे का शोषण कर लूं। और दूसरा तुम्हारा शोषण करना चाह रहा है! तुम दोनों एक-दूसरे के शोषक हो। तुम एक-दूसरे को दुखी करोगे, और क्या करोगे! शोषण से दुख ही पैदा होता है।
तुम्हारा प्रेम दान बनना चाहिए। दान बनने के पहले तुम्हारे पास होना चाहिए। संपदा होनी चाहिए प्रेम की। उसी प्रेम की कला को मैं यहां सिखाने की कोशिश कर रहा हूं।
प्रेम की कला के कुछ सूत्र हैं। पहले तो घास-पात उखाड़ कर फेंको; नहीं तो गुलाब बढ़ेंगे ही नहीं। अगर किसी तरह बढ़ भी गए, तो उनमें फूल न आएंगे। अगर फूल आए भी, तो बड़े छोटे होंगे, मुर्दा होंगे; उनमें सुवास न होगी। क्योंकि घास-पात चारों तरफ सारी जमीन के रस को पी जाता है; फूलों तक रस पहुंच ही नहीं पाता। अपने जीवन को घास-पात से मुक्त करो। भय, क्रोध, वैमनस्य, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष, ये सब घास-पात हैं। इसको जब तक तुम छांट न दोगे, तब तक तुम्हारे जीवन में प्रेम का अनुभव होगा ही नहीं। इस सब में ही तुम्हारी ऊर्जा उलझी हुई है। प्रेम बने तो किस ऊर्जा से बने?
तो तुम इन्हीं के ऊपर प्रेम के लेबल लगा देते हो। तुम घृणा को ही प्रेम कहने लगते हो। तुम ईर्ष्या को ही प्रेम कहने लगते हो। तुम्हारी पत्नी किसी से बात कर रही है। बस ईर्ष्या जग जाती है। कि तुम्हारा पति किसी स्त्री के साथ तुमने देख लिया।
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी को लेकर निकला है बाजार से। एक बड़ी सुंदर युवती ने कहा, हलो नसरुद्दीन! नसरुद्दीन तो कुछ बोला ही नहीं। पतिदेव ऐसी अवस्था में बिलकुल चुप रहते हैं। मगर पत्नी तो आगबबूला हो गई। उसने कहा, यह औरत कौन है? मैं एक कदम आगे न बढूंगी। पहले इसके संबंध में मुझे समझाओ। नसरुद्दीन ने कहा कि देवी, तू मुझे माफ कर! असल में इससे भी बड़ी मुसीबत मेरे ऊपर है। उसकी पत्नी ने पूछा, वह क्या? उसने कहा, वह यह कि उस स्त्री को मुझे समझाना होगा कि वह कौन औरत थी जो तेरे साथ थी! अब तू मुझे छोड़। एक ही काफी है। उसने जो हलो नसरुद्दीन कहा है, उसका मतलब मैं जानता हूं कि बच्चू! यह कौन औरत? अब मुझे जो झंझट उसके साथ होगी वही काफी है। अब तू तो अपनी पत्नी है, कम से कम तू तो चुप रह।
स्त्रियों का प्रेम, तथाकथित प्रेम; पुरुषों का प्रेम, तथाकथित प्रेम--जरा उस प्रेम को कुरेदो और जरा उसके भीतर झांक कर देखो, तुम बड़े हैरान हो जाओगे! उसके भीतर कुछ और पाओगे।
मुल्ला नसरुद्दीन के घर मेहमान आए हुए हैं। पत्नी भोजन परोस रही है। नमक की जरूरत पड़ गई, तो मुल्ला भागा। पांच मिनट बीत गए, दस मिनट बीत गए; मेहमान बैठे हैं। पत्नी ने कहा कि अभी तक तुम्हें नमक का डिब्बा नहीं मिला? आंखें हैं कि नहीं!
नसरुद्दीन ने कहा, करीब-करीब सब डिब्बे खोल कर देख चुका। किसी में हल्दी। किसी में कुछ। किसी में जीरा। नमक का डिब्बा दिखता ही नहीं। पत्नी ने कहा, आंख के अंधे, सामने रखा है तुम्हारे! जिस पर मिर्ची लिखा है, उसी में नमक है!
डिब्बों पर कुछ लिखा है, भीतर कुछ है! तुम जिसको प्रेम कहते हो, उसके भीतर क्या है? तुमने सच में किसी को प्रेम किया है सत्यनारायण? तुमने सच में किसी को अपने को अर्पित किया है? तुमने प्रेम में समर्पण देखा है? तुम जिसे प्रेम किए हो, उसके लिए मर सकते हो, मिट सकते हो? तुमने अपने प्रेम को क्या दिया है?
देने की तो बात ही मत करो! लोग लेने की बात करते हैं। हर एक चाहता है कि मिले।
एक युवक अपने मित्र से पूछ रहा था कि मैं किससे शादी करूं? कोई पांच-छह स्त्रियां हैं। तय ही नहीं कर पा रहा हूं!
प्रेम भी तय करना होता है? प्रेम तो हो जाता है। तय करना पड़े तो प्रेम नहीं है, कुछ और है।
उसके मित्र ने पूछा, अड़चन क्या है? तो उसने कहा कि सबसे बड़ी अड़चन तो दो स्त्रियों के बीच है। असली सवाल उन दो में से तय हो जाए तो हल हो जाएगा। एक सुंदर है, लेकिन गरीब है। एक कुरूप है, बहुत कुरूप, लेकिन अमीर है।
उस मित्र ने कहा, तुम प्रेम का अर्थ समझते हो? अगर तुम्हें सच में प्रेम है, तो सुंदर स्त्री से प्रेम करो; उसी से विवाह करो। पैसे का क्या है? हाथ का मैल है।
उसने कहा, ठीक। तुमने ठीक सलाह दी। मित्र वही जो वक्त पर काम आए।
जब दोनों विदा होने लगे तो मित्र ने पूछा, और कृपा करके दूसरी स्त्री का पता-ठिकाना मुझे दे दो!
लोगों की उत्सुकताएं, अपेक्षाएं, आकांक्षाएं बड़ी और हैं। नाम कुछ भी हो।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उससे कह रही थी कि देखते नहीं चंदूलाल को सामने ही! ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता कि अपनी पत्नी को नई साड़ी लाकर न देता हो। इसको कहते हैं प्रेम! ऐसा कोई महीना नहीं जाता कि कोई आभूषण न खरीदता हो। इसको कहते हैं प्रेम! ऐसा कोई साल नहीं जाता जब उसने कुछ हीरे-जवाहरात न खरीदे हों। इसको कहते हैं प्रेम! एक तुम हो। मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, चाहता तो मैं भी हूं कि हर सप्ताह साड़ी खरीदूं; हर सप्ताह आभूषण खरीदूं; हर साल हीरे-जवाहरात खरीदूं। अरे कौन नहीं चाहता! मगर मैं चंदूलाल से डरता हूं। उसकी पत्नी ने कहा, चंदूलाल से इसमें डरने की क्या जरूरत? मुल्ला ने कहा, चंदूलाल पहलवान है, हट्टा-कट्टा है। हड्डी-पसली तोड़ देगा। उसकी पत्नी ने कहा, इसमें चंदूलाल आता ही कहां है? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, आता क्यों नहीं! क्योंकि मैं उसी की पत्नी को तो ये चीजें भेंट करूंगा।
लोग रह रहे हैं किसी के साथ, नजरें कहीं और लगी हैं। शरीर कहीं है, प्राण कहीं हैं। और इसको प्रेम कहते हैं! और प्रेम भी तौला जाता है--साड़ियों में, आभूषणों में, हीरे-जवाहरातों में।
यह सब प्रेम नहीं है। ईर्ष्या प्रेम के वस्त्र पहने खड़ी है। द्वेष प्रेम के वस्त्र पहने खड़ा है। इसीलिए तो तुम्हारा प्रेम कभी भी घृणा में बदल सकता है; क्षण भर में घृणा में बदल सकता है। जिसके लिए जान देने को तैयार थे, उसी की जान लेने को तैयार हो सकते हो! और प्रेमी चौबीस घंटे लड़ते हैं। अगर उनकी जिंदगी देखो, तो लड़ते ज्यादा हैं। लड़ना-झगड़ना ही जैसे एक प्रेम का ढंग उन्हें आता है। इसलिए अगर तुम्हारे जीवन में प्रेम ने दुख लाया, तो आश्चर्य तो नहीं। तुमने जैसा प्रेम किया, वैसा फल पाया।
मैं किसी और ही प्रेम की बात कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं, प्रेम बेशर्त होना चाहिए। मांगो मत कुछ। दे सको तो दो। जो भी दे सको तो दो।
और देने के पहले तुम्हारे पास होना चाहिए। इसलिए प्रेम के पहले ध्यान में उतरना जरूरी है। ध्यानी ही प्रेम कर सकता है। और प्रेमी ही ध्यानी हो सकता है। क्योंकि जो ध्यान में उतरेगा, वह अपने भीतर ऐसे अजस्र स्रोत पाएगा आनंद के कि बांटना ही होगा उन्हें। फिर बांटोगे किसे? उन्हीं को बांटोगे जो तुम्हारे निकट हैं, समीप हैं, अपने हैं। पत्नी हो, पति हो, मां हो, पिता हों, भाई-बहन हों, मित्र हों। बांटोगे कहां? अपने भीतर जाओगे तो आनंद के झरने पाओगे, तो फिर अपने मित्रों को भी निमंत्रित करोगे कि इन झरनों का थोड़ा स्वाद लो। फिर क्षुद्र से तुम्हारी आंखें उठेंगी। और जब अपने भीतर आत्मा को पाओगे, तो अपनी पत्नी में भी आत्मा को पाओगे। नहीं तो पत्नी देह ही रह जाएगी। और देह मिट्टी है। मिट्टी को लाख प्रेम करना चाहो कैसे प्रेम करोगे! प्रेम तो आत्मा से हो सकता है। प्रेम तो अदृश्य से ही हो सकता है। मगर अदृश्य का तो अपने भीतर ही पता नहीं चलता, तो दूसरे के भीतर कैसे पता चले!
तो पहले जरा अपने भीतर चलो। पहले जरा अपनी खोज करो। अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। अपना खजाना खोजो। फिर बांटो। और तब तुम पाओगे: तुम्हारे जीवन में प्रेम सुख ही सुख लाता है। और जब तुम पाओगे कि बांटने से प्रेम सुख लाता है, तो तुम फिर कंजूसी क्यों करोगे? फिर तुम बांटोगे। उलीचोगे दोनों हाथ। फिर जो भी लेने को राजी होगा, उसको तुम देने को राजी हो जाओगे। फिर अपनों को ही क्यों, परायों को भी। फिर कौन अपना, कौन पराया!
इसलिए जीसस कहते हैं: मित्र से ही नहीं, शत्रु से भी प्रेम। जब प्रेम पैदा होगा, तो मित्र मित्र रहते हैं, शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। फिर कोई और उपाय नहीं है।
सूफी फकीर स्त्री राबिया ने कुरान में एक वचन काट दिया था।
कुरान में वचन काटा नहीं जा सकता। वेद में तुम सुधार कर सकते हो? कि उठाई कलम और काट कर और ठिकाने कर दिया वेद को! हिंदू बहुत नाराज होंगे। और हिंदू चाहे इतने नाराज न भी हों, लेकिन मुसलमान तो बरदाश्त ही नहीं कर सकेंगे कि कुरान में कोई और तरमीम करे! वह तो आखिरी किताब है। परमात्मा ने आखिरी किताब भेज दी। चौदह सौ साल से परमात्मा को फिर कुछ सुधार करने की सूझी ही नहीं! दुनिया इतनी बदल गई। सब बदल गया। लेकिन कुछ लोग हैं जो किताबों में ही, पुरानी किताबों में ही खोजते रहते हैं।
एक स्कूल में कोई पढ़ा रहा है पादरी, बच्चों को, कि परमात्मा ने सब सरकने वाली चीजें बनाईं। एक छोटा सा लड़का खड़ा हो गया--बच्चे भी ऐसे सवाल पूछ देते हैं--कि रेलगाड़ी किसने बनाई? तो उसने कहा, अरे यही तो सरकने वाली चीज है!
सरकने वाली चीज में रेलगाड़ी भी आ गई! जिसने यह वचन लिखा है बाइबिल में कि परमात्मा ने सब सरकने वाली चीजें बनाईं, उसका मतलब है: सांप इत्यादि। उसने कभी कल्पना भी न की होगी कि रेलगाड़ी भी सरकने वाली चीजों में आ जाएगी! मगर जिनकी नजरें पुरानी किताबों पर अटकी हैं, वे तो हर अर्थ वहीं से निकालेंगे।
जब पहली दफा यह खोज हुई कि जमीन बहुत प्राचीन है, कोई चार अरब वर्ष पुरानी है, तो ईसाई बड़ी मुश्किल में पड़ गए। क्योंकि ईसाइयों की किताब तो कहती है कि जीसस से ठीक चार हजार चार साल पहले। जरूर रहा होगा सोमवार का दिन, पहली जनवरी। ठीक चार हजार साल पहले जीसस के। तो अब से समझो कि छह हजार साल पहले पृथ्वी बनी। और छह दिन में सब बना दिया परमात्मा ने। सातवें दिन तो आराम किया। इसलिए तो रविवार की छुट्टी! जब तक ईसाई हिंदुस्तान नहीं आए थे, तब तक हिंदुस्तान में रविवार की छुट्टी का कोई सवाल ही नहीं था। हिंदुस्तान में छुट्टी इस तरह होती ही नहीं थी, साप्ताहिक छुट्टी। क्योंकि हिंदुओं का परमात्मा सात दिन काम करता है। छुट्टी लेता ही नहीं! न रिटायर होता, न पेंशन पर जाता। लगा ही है! ईसाइयों का परमात्मा भी लचर-पचर रहा, छह ही दिन में ठंडा हो गया! सातवें दिन जो वह चादर ओढ़ कर सोया, तो फिर नहीं जगा। फिर उसने लौट कर भी नहीं देखा कि हालत क्या हुई! दुनिया की क्या हालत है!
मुल्ला नसरुद्दीन अपने दर्जी के पास गया था और दर्जी से कह रहा था कि भैया, अगर अब कोट बन गया हो तो दे दो। साथ में अपने लड़के को भी लाया था। कह रहा था कि सत्रह साल हो गए कोट बनने दिए। जब मैंने दिया था, मैं सत्रह साल का था। अब मेरा लड़का सत्रह साल का है। अभी भी दे दो, तो मेरे लड़के के काम आ जाएगा। कम से कम अपनी आंखों को तो तृप्ति मिलेगी; देख लूंगा कि पहन लिया लड़के ने।
दर्जी ने अपने असिस्टेंट की तरफ देखा और कहा कि हजार दफे कहा कि अर्जेंट काम मत लिया करो! और मुल्ला नसरुद्दीन से कहा कि तुमने समझा क्या है! अरे कोई चीज बनती है तो वक्त लगता है। कोई जादू तो है नहीं कि मार दी फूंक और बस कोट बन गया! मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा कि सत्रह साल काफी समय नहीं है? अरे परमात्मा ने सारी दुनिया छह दिन में बना दी थी! उस दर्जी ने कहा कि जरा एक दफा नजर डालो दुनिया की तरफ! छह दिन में बनाई, तो कैसी दुर्गति हो रही है! मैं तो जब काम करता हूं तो पुख्ता करता हूं! लड़का पहने, कि लड़के का लड़का पहने, कोई फिक्र नहीं। मगर चीज बनाऊंगा, तो एक चीज बनाऊंगा। छह दिन में जल्दबाजी हुई होगी। भाग-दौड़ में सब बना-बनु दिया होगा। तो सब उलटा-सीधा है!
राबिया को एक ऐसा वचन मिल गया कुरान में जो उसको जंचा नहीं, उसने काट दिया। फकीर हसन उसके घर ठहरा था। उसने कुरान पढ़ी। कुरान में सुधार देखा, लकीर कटी देखी, उसने राबिया को कहा कि हे राबिया, यह किस नासमझ ने कुरान में सुधार किया, तरमीम की? राबिया ने कहा, मैंने की। तब तो हसन और चौंका। उसने कहा, तू इतनी पवित्र, इतनी प्रार्थनापूर्ण, इतनी पहुंची हुई--और तूने कुरान में सुधार किया! उसने कहा, करना पड़ा। मजबूरी हो गई। पहुंचने के कारण ही करना पड़ा। अब यह कुरान में लिखा हुआ है--शैतान को घृणा करो। और जब से मेरे जीवन में प्रेम पैदा हुआ है, मुझे कोई शैतान दिखाई ही नहीं पड़ता। अब मेरे सामने शैतान आकर खड़ा हो जाए तो भी मैं प्रेम ही कर सकती हूं, क्योंकि मेरे पास घृणा ही न बची। मैं घृणा करूंगी कहां से! यह किताब मेरी है। यह कुरान मेरी है। मुझे आखिर अपनी स्थितियों को देख कर ही तो अपनी कुरान ठीक करनी पड़ेगी। इसलिए मैंने ठीक कर दी है यह कुरान। अब मेरे लिए न कोई शैतान है, न मेरे लिए कोई घृणा है। अब तो जो भी है परमात्मा है। और जो भी है, उसे मैं प्रेम ही दे सकती हूं, क्योंकि प्रेम के अतिरिक्त मेरे पास और कुछ भी बचा नहीं। मेरी सारी जीवन-ऊर्जा प्रेम हो गई है।
घृणा को विदा करो। वैमनस्य को विदा करो। ईर्ष्या-स्पर्धा को विदा करो। और अपने में डुबकी लगाओ। आत्मा से थोड़े परिचित होओ। तब तुम्हारे भीतर वह ध्यान जगेगा, जो प्रेम बन जाता है संबंधों में। ध्यान ही संबंधों में प्रेम बनता है। और ये एक-दूसरे के ऊपर अन्योन्याश्रित हैं। जितने तुम प्रेम में गहरे उतरोगे, उतनी तुम्हारी क्षमता स्वयं के भीतर जाने की गहरी हो जाएगी। क्योंकि प्रेम दर्पण है। जैसे दर्पण में कोई अपना चेहरा देख लेता है। अपना चेहरा तुम बिना दर्पण के देख भी नहीं सकते।
अमृतसर से एक ट्रेन दिल्ली की तरफ आ रही है। एक सरदार जी बार-बार जाकर संडास का दरवाजा खोलते हैं, भीतर देखते हैं; कहते हैं, क्षमा करिए! बंद करके वापस आ जाते। यह इतनी बार कर चुके कि टिकट कलेक्टर भी बैठा है, उसने कहा कि मामला क्या है? उन्होंने कहा कि एक सरदार जी अंदर घुसे हैं, सो निकलते ही नहीं। अब एक ही संडास में दो-दो आदमी कैसे घुस जाएं! सो मैं माफी मांग कर वापस आ जाता हूं।
टिकट कलेक्टर उठा। वह भी सरदार जी!
उसने भी जाकर धीरे से दरवाजा खोला। जल्दी से बंद किया। कहा, माफ करिए! लौट कर कहा कि आप ठीक कहते हैं। न केवल अंदर घुसा हुआ है, सरकारी कर्मचारी मालूम होता है! कम से कम सरकारी कर्मचारियों को, रेलवे के कर्मचारियों को तो ध्यान रखना चाहिए--कि अब घुसा है तो घुसा ही है! निकल ही नहीं रहा है!
तब पहले सरदार जी की पत्नी उठी थोड़ी देर बाद। जाकर दरवाजा खोला। भीतर झांक कर देखा। कहा, माफ करिए! दरवाजा बंद करके आई और लौट कर अपनी पति से बोली, मुझे पहले ही पता था कि तुम क्यों बार-बार वहां जा रहे हो। मुझे शक था कि कोई रांड वहां होनी ही चाहिए। और टिकट कलेक्टर से कहा कि तुम्हें भी शर्म नहीं आती!
दर्पण में तो चेहरा अपना दिखाई पड़ेगा। प्रेम में तुम्हें वही दिखाई पड़ेगा जो तुम हो। प्रेम दर्पण है। अगर तुम दुखी हो, तो दुख दिखाई पड़ेगा। अगर तुम आनंदित हो, तो आनंद दिखाई पड़ेगा। अगर तुम्हें परमात्मा का अनुभव हुआ है, तो तुम्हें हर प्रेम-पात्र में परमात्मा दिखाई पड़ेगा। और निश्चित ही प्रेम जब प्रगाढ़ होता है, तो परमात्मा तक पहुंचाने का सेतु बन जाता है।
मैंने जितने ही चित्र बनाए गीतों के
उतना ही प्राणों के समीप तू आया क्यों?
उस बंधन पर सौ-सौ मुक्तियां निछावर थीं
जिसको तैयार किया तेरे उच्छवासों ने।
उस कण में घिर हृदय-सुमन मुस्काता था
जिसका निर्माण किया तेरे विश्वासों ने।
जब-जब भी मझधारों ने मुझे डुबोया था
तब लहरों पर बिठला तट पर पहुंचाया क्यों?
मैं भटक रही अब तक मन की उन गलियों में
जिनमें स्वर गूंज रहा तेरी बांसुरिया का।
कैसे वे दृश्य भुला पाऊंगी कह निर्मम
जिनमें जादू बोला मेरी पायलिया का।
जितना नैराश्य-तिमिर से डर कर भागी मैं
उतना जीवन से करना प्यार सिखाया क्यों?
भागो कितने ही, परमात्मा तुम्हें वापस-वापस प्रेम में भेजेगा। क्योंकि प्रेम सीखना ही होगा। बिना उसके दर्पण नहीं मिलता। और प्रेम में अगर दुख भी भोगना पड़े, तो भोगना होगा। क्योंकि वह दुख निखारेगा। और प्रेम के रास्ते पर अगर कांटे मिलें, तो झेलने होंगे। क्योंकि वे ही कांटे फूलों की तरफ इशारा करते हैं।
जितना नैराश्य-तिमिर से डर कर भागी मैं
उतना जीवन से करना प्यार सिखाया क्यों?
यह परमात्मा ने झंझट क्यों दी! यह महात्माओं को इतना परेशान क्यों किया है! परमात्मा महात्माओं का दुश्मन मालूम होता है। महात्मा चाहते हैं सब तरह से प्रेम से छुटकारा हो जाए; झंझट छूटे; मुक्ति मिले। निश्चित ही परमात्मा के इरादे कुछ और हैं। अगर परमात्मा को महात्मा ही बनाने होते, तो प्रेम क्यों बनाता! परमात्मा जानता है कि बिना प्रेम के कोई महात्मा नहीं हो सकता। और जो महात्मा बिना प्रेम के हो गए हैं, उनका महात्मापन दो कौड़ी का है, थोथा है, छिछला है; उसकी कोई कीमत नहीं है। उन्होंने दर्पण में झांक कर ही नहीं देखा। उनको पता ही क्या चलेगा कि उनका चेहरा कैसा है! और उन्होंने प्रेम की पराकाष्ठा का स्वाद ही नहीं लिया, इसलिए प्रेम को गालियां दे रहे हैं।
संसार को वही गाली देता है जो यह जानने से वंचित रह गया है कि संसार एक परीक्षा है। परमात्मा प्रतिपल तुम्हें अनेक-अनेक परीक्षाओं से गुजार रहा है।
किसी भी चीज से भागना मत, सत्यनारायण। पलायन मत करना। प्रत्येक चीज को समझने का उपाय करो। अगर प्रेम दुख दे रहा है, तो समझने की फिक्र करो--क्यों? कहीं कुछ कारण होगा। और कारण तुममें होगा। प्रेम में तो कारण नहीं है। प्रेम तो अमृत है। लेकिन तुम्हारे पात्र में हो सकता है जहर हो। उस जहरीले पात्र में अगर प्रेम भी डाल दोगे, वह भी जहरीला हो जाएगा। गंदे बरतनों में शुद्ध पानी तो नहीं पी सकते हो। गंदी मटकियों में शुद्ध पानी भरोगे, तो गंदा हो जाएगा।
नीर खूब बरसा है,रोम-रोम तरसा है,
पीर नहीं जाने की,नींद नहीं आने की।
एक मेघ शेष रह गया न आसमान में,
खिल गए हजार फूल सांवरे वितान में,
किंतु और-और गात भीग रहा बात का,
गूंज रही बूंदों की झरर-झरर कान में,
आंख छलछलाती है,और सूख जाती है,
पर न मुस्कुराने की।
नैन आज झपते ही खुलते अनजान में,
लगता है रात गई, सो रहा विहान में,
दृष्टि घूम जाती, भ्रम होता बरसात का--
पात झरझराते हैं जब-जब सुनसान में,
खीझ कसमसाती है,
चेतना लजाती है,
पर न मुंह छिपाने की।
पानी में डूबा सा माटी का गेह है
लहरों में सिहर-सिहर तिरती सी देह है
सूख रहे प्राण, जब कि अंग-अंग गीला सा--
उड़ती सी जाती इन सांसों की खेह है
रोशनी न भाती है,
यह शिखा जलाती है,
पर न दम बुझाने की।
प्रेम जलाएगा। प्रेम डुबाएगा। प्रेम मिटाएगा। मिटो! डूबो! जलो! लेकिन प्रेम को मत छोड़ देना। प्रेम को निखारो। प्रेम में जो-जो अप्रेम जैसा है, उसे छोड़ो--और प्रेम को बचाओ।
संसारी हैं वे लोग, जो प्रेम के नाम पर सब तरह का अप्रेम किए जाते हैं। और भाग गए भगोड़े, त्यागी-व्रती हैं वे लोग, जो अप्रेम के डर से प्रेम को भी छोड़ भागे। माना कि सोना शुद्ध नहीं है, लेकिन शुद्ध किया जा सकता है; छोड़ कर भागने की क्या जरूरत है! दोनों ही मूढ़ हैं। भोगी भी मूढ़, तुम्हारा त्यागी भी मूढ़। इसलिए मैं तुमसे कहता हूं कि तुम न भोगी बनो, न त्यागी; दोनों का अतिक्रमण करो। भोग में भी परमात्मा छिपा है, उसे खोजो। और त्याग में भी परमात्मा छिपा है, उसे खोजो। और जिस दिन तुम परमात्मा को पाओगे, उस दिन तुम भोग और त्याग को अलग-अलग नहीं पाओगे। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। व्यर्थ का त्याग अपने आप हो जाता है। सार्थक का भोग अपने आप हो जाता है।
सत्यनारायण, पूछते हो: ‘आप कहते हैं, प्रेम प्रगाढ़ होकर प्रार्थना बनता है...।’
निश्चय ही। इसमें कोई दो मत नहीं हैं।
और तुम पूछते हो कि ‘प्रार्थना परमात्मा की ओर ले जाती है, ऐसा भी आप कहते हैं। जब कि मेरे जीवन में प्रेम दुख बन गया है!’
तो जरूर प्रेम के नाम से कुछ और प्रेम के आवरण पहन कर चल रहा है। पहचानो। आंख खोलो। जांच-परख करो। और आंख खोलनी है, तो ध्यान करना होगा। ध्यान के बिना आंख नहीं खुलती। ध्यान के बिना तो अंधे हो। फिर चाहे नैनसुख नाम ही क्यों न रख लो! नैनसुख नाम रखने से अंधे की आंख नहीं आ जाती। और हम नाम रखने में बड़े कुशल हैं। कोई आदमी अंधा होता है, तो उसको कहते हैं प्रज्ञाच्रु। आंख वालों को नहीं कहते प्रज्ञाच्रु। अंधे को कहते हैं। बेचारे अंधे को खूब सांत्वना दे रहे हो! उसके पास चमड़े की आंखें नहीं हैं इसका यह मतलब नहीं है कि उसके पास आत्मा की आंखें होंगी। जरूरी नहीं है। नहीं तो सभी अपनी आंखें फोड़ लें और प्रज्ञाच्रु हो जाएं।
आंखें फोड़ने से कुछ भी न होगा; आंखों का उपयोग करना है। अभी बाहर देखा, अब भीतर देखो। अभी बाहर आंखें भटकाते रहे, अब जरा भीतर ले चलो, जरा अंतर्यात्रा में उतरो।
ध्यान है अंतर्यात्रा। और जिसकी अंतर्यात्रा सफल है, उसकी बहिर्यात्रा भी सफल हो जाती है। क्योंकि फिर वे ही आंखें भीतर के रस को लेकर जब बाहर देखती हैं, तो उस परम रस का अनुभव होने लगता है। जिस दिन तुम्हें अपनी पत्नी में परमात्मा दिखाई पड़े, अपने पति में परमात्मा दिखाई पड़े, अपने बच्चों में परमात्मा दिखाई पड़े--उस दिन जानना कि धर्म का जन्म हुआ है, उस दिन जानना कि संन्यास हुआ। उसके पहले नहीं। उसके पहले सब पलायन है, कायरता है, भगोड़ापन है।
ओशो, मैं दुखी क्यों हूं?
हरिदास! दुख एक ही है--परमात्मा से पहचान न होना। और सब दुख तो बस नाममात्र के दुख हैं। और सब दुख तो उसी एक दुख के प्रतिफलन हैं, प्रतिध्वनियां हैं। घाव तो एक है--परमात्मा से टूट जाना। पीड़ा तो एक है--उसकी प्रतीति न होना।
क्योंकि तुम हो, और जरूरत से ज्यादा हो; वही तुम्हारा दुख है। परमात्मा को होने दो। खुद हटो, राह दो, बीच में खड़े न होओ, शून्य हो जाओ। इसीलिए तो तुम्हें नाम दिया हरिदास का। हरिदास का अर्थ है: तुम अब हो ही नहीं। बस एक चाकर। मीरा कहती है न--चाकर राखो जी! प्रभु के चाकर हो जाओ। उसको मालिक होने दो। तुम मिटो। तुम जगह खाली कर दो। सिंहासन को रिक्त कर दो। उसे विराजमान करो सिंहासन पर। और आनंद ही आनंद की वर्षा हो जाएगी।
अगर तुम खोजने चले कि दुख में क्यों हो, तो हजार-हजार कारण मिलेंगे। शरीर के दुख हैं अनंत। मन के दुख हैं अनंत। भाव के, भावना के दुख हैं अनंत। उनकी तो कोई गिनती नहीं। अगर एक-एक दुख को मिटाने चले, तो कब मिटा पाओगे? इधर एक को मिटा न पाओगे, तब तक दस और पैदा हो जाएंगे।
एक-एक दुख को मिटाने से काम नहीं चलेगा। रामबाण औषधि चाहिए। किस औषधि को रामबाण कहते हैं? राम ही रामबाण है। एक औषधि चाहिए जिससे सारी व्याधियां मिट जाएं, तो ही पार हो सकता है। अगर एक-एक दुख को मिटाने का उपाय करना पड़ा, तो जिंदगी बहुत छोटी है, दुख बहुत हैं। और तुम एक को किसी तरह सम्हाल पाओगे कि तुम अचानक पाओगे, दूसरी तरफ छेद हो गया, दूसरी तरफ दीवाल गिरने लगी। वहां टेका लगा पाओगे कि तीसरी तरफ मकान गिरने लगा! वहां किसी तरह सम्हाल पाओगे कि लगेगा जिंदगी हाथ से निकल गई, मौत करीब आ गई। सब सम्हालना-वम्हालना बेकार गया। रहने का अवसर ही न आया; घर कभी बन ही नहीं पाया।
एक है औषधि।
एक झेन फकीर से किसी ने पूछा, संक्षिप्त में कह दें धर्म का सार! तो वह फकीर कुछ बोला ही नहीं। वह चुपचाप बैठा रहा, पूछने वाले की आंखों में देखता रहा। पूछने वाला थोड़ा तिलमिलाया। बेचैन भी हुआ। पसीना-पसीना हो गया कि यह कैसा आदमी है! हम पूछते हैं कि ध्यान, धर्म, सत्य के संबंध में कुछ एक छोटी सी बात कह दें जो हमारे काम आ जाए। यह बोलता ही नहीं! और ऐसे देखता है आंखों में जैसे हमने कोई चोरी की हो! कहा कि आप कुछ बोलते क्यों नहीं? और आंख में क्या देख रहे हैं? और मुझको डरवाते क्यों हैं? फकीरों की आंख तीर की तरह चुभती है अगर देखे तो। उस फकीर ने कहा, कह तो रहा हूं। सुनते क्यों नहीं? उस आदमी ने कहा, आप अभी बोले भी नहीं। एक शब्द नहीं बोले। सुनूं तो क्या खाक सुनूं! फकीर ने कहा, मैंने यही कहा कि चुप हो जाओ, जैसे मैं चुप हूं। और जैसे मैं तुम्हारी आंखों में देख रहा हूं, ऐसे अपनी आंखों में देखो। भीतर जाओ। इसका ही नाम ध्यान है। और ध्यान क्या है!
हरिदास, थोड़ा भीतर देखो। कहां घाव है, जहां से रिस-रिस कर मवाद बह रही है। मवाद बहुत रास्तों से बह रही है, मगर घाव एक है। और वह घाव है: हम परमात्मा से दूर पड़ गए हैं। हम अपने ही जीवन-स्रोत के विमुख हो गए हैं।
तुम क्या रूठे, इस दुनिया के सब संकट साकार हो गए।
ऐसी हवा चली, नगरी के दीपक भी अंगार हो गए।
जिसने मुझको ठुकराया है
मैं तो उसका भी आभारी,
जिसने गले लगाया वह है
मेरे प्राणों का अधिकारी,
जाने क्या अपराध हो गया, अनुमानों को खबर नहीं है,
तूफानों से रिश्वत लेकर, मांझी भी मझधार हो गए।
पवन उड़ा सकती है मुझको
पानी नहीं डुबा पाएगा,
मैं तृण हूं मेरा हलकापन
मुझको लेकर तर जाएगा,
मैंने किए समर्पण अब तक, सहयोगों से भीख न मांगी,
फिर क्यों बगिया के चंदन पर, विषधर पहरेदार हो गए।
मैंने जिनकी पीड़ाओं पर
नित आंसू के अर्घ्य चढ़ाए,
आश्वासन देकर भी मुझको,
वह मेरे कुछ काम न आए,
बनकर सुमन हाथ पतझर के, सौ-सौ बार लुटा उपवन में,
उसी सुमन की आज्ञा के अब पालन भी इनकार हो गए।
जग सूरज का ताज दिखा कर
मुझसे आंखें मांग रहा है,
चांद गगन का राज दिखा कर
मुझसे पांखें मांग रहा है,
खुशियों पर अधिकार नहीं तो फिर कैसे उपहार लुटाऊं,
जीवन के मधुमास सभी जब मरघट के त्यौहार हो गए।
बाहर जो खोजता रहेगा, आज नहीं कल जीवन को मरघट होता हुआ पाएगा।
खुशियों पर अधिकार नहीं तो फिर कैसे उपहार लुटाऊं,
जीवन के मधुमास सभी जब मरघट के त्यौहार हो गए।
बाहर के सब वसंत, याद रखना, पतझड़ों को ही लाने वाले हैं। हर वसंत में पतझड़ छिपा है। हर फूल गिरने को है, बिखरने को है, धूल हो जाने को है।
दुख तो होगा ही। क्योंकि बाहर कुछ भी पकड़ोगे, छूट-छूट जाएगा। जो भी सम्हालोगे, टूट-टूट जाएगा। बाहर तुम लाख उपाय करो, सुखी न हो सकोगे। सुख तुम्हारा आंतरिक स्वभाव है। और अंतर की यात्रा को लोग जाते नहीं। दूर-दूर जाते हैं; चांद-तारों पर जाने को तैयार हैं। अपने भीतर जाने को तैयार नहीं। निकट को नहीं खोजते। और परमात्मा निकट से भी निकट है। और माना कि दूर से भी दूर वही है, मगर पहले उसे निकट जानना होगा, तब तुम उसे दूर भी जान पाओगे। और एक परमात्मा रूठ जाए, तो सब कुछ रूठ जाता है।
तुम क्या रूठे, इस दुनिया के सब संकट साकार हो गए।
ऐसी हवा चली, नगरी के दीपक भी अंगार हो गए।
जाने क्या अपराध हो गया, अनुमानों को खबर नहीं है,
तूफानों से रिश्वत लेकर, मांझी भी मझधार हो गए।
मैंने किए समर्पण अब तक, सहयोगों से भीख न मांगी,
फिर क्यों बगिया के चंदन पर, विषधर पहरेदार हो गए।
बनकर सुमन हाथ पतझर के, सौ-सौ बार लुटा उपवन में,
उसी सुमन की आज्ञा के अब पालन भी इनकार हो गए।
खुशियों पर अधिकार नहीं तो फिर कैसे उपहार लुटाऊं,
जीवन के मधुमास सभी जब मरघट के त्यौहार हो गए।
बाहर का तो सब व्यर्थ हो जाएगा। हरिदास, भीतर लौटो! भीतर तुम उस मालिक को पाओगे जो खुश हो जाए तो बाहर खुशियों के झरने फूटने लगते हैं। भीतर तुम्हारा उससे मिलन होगा जिससे बिछुड़न फिर नहीं होता।
अपने ही प्रति उन्मुख होओ। इसे ही मैं ध्यान कहता हूं। और जब ध्यान की गरिमा तुम्हारे भीतर पैदा होगी, तो प्रेम लुटेगा। प्रेम के न मालूम कितने झरने तुमसे फूट पड़ेंगे। जैसे हिमालय से गंगा बहती, ब्रह्मपुत्र बहती, यमुना बहती, सिंधु बहती। नदियां ही नदियां बह जातीं। ध्यान के हिमालय से न मालूम कितनी गंगाएं प्रेम की पैदा होती हैं। न केवल तुम आनंदित होओगे, तुम इस जगत को भी बहुत कुछ आनंद दे पाओगे।
जो दुखी है, वह दुख देगा। और बेचारा करेगा भी क्या! जो सुखी है, वही सुख दे सकता है।
पहली समझ ध्यान से पैदा होती है, आत्म-निरीक्षण से पैदा होती है, आत्म-अवलोकन से पैदा होती है। हम दूसरों की तो सब भूल देख लेते हैं; उसमें हम बड़े कुशल हैं। अपनी भूल नहीं दिखाई पड़ती। भूलों की भूल नहीं दिखाई पड़ती। मूल भूल नहीं दिखाई पड़ती। दूसरों की आंखों में पड़े तिनके पहाड़ों जैसे मालूम होते हैं। अपनी आंखों में पड़े पहाड़ भी तिनके जैसे भी नहीं मालूम होते। हमारी आंखें ही दूसरों पर टिकी हैं। कितनी चर्चा कर रहे हैं लोग! एक-दूसरे की निंदा में संलग्न हैं। और कोई यह नहीं सोच: रहा काश! इतनी चर्चा, इतनी आंख, इतनी परख अपने पर लौटा लेते, तो यह सारे अस्तित्व का साम्राज्य, यह सारा उत्सव, यह सारा आनंद तुम्हारा था। मगर तुम्हें बड़ी फिक्र है। तुम बड़ी सेवा में लगे हो। बड़े परार्थी हो।
ऐसे लोगों को मैं परार्थी कहता हूं! पर-अर्थ में संलग्न हैं! कौन कितनी भूलें कर रहा है? कौन कितने पाप कर रहा है? कौन शराब पीता है? कौन चाय पीता है? कौन सिगरेट पीता है? कौन किसकी पत्नी के साथ भाग गया है?
इतना बड़ा जगत है, इस बड़े जगत में अनंत लोग हैं। वे सब एक-दूसरे की चर्चा में लगे हैं। और तुम यह मत सोचना कि तुम्हारे संबंध में वे चर्चा नहीं कर रहे हैं। वे किसके संबंध में चर्चा करेंगे? तुम्हारे संबंध में कर रहे हैं। यहां सबके पीठ पीछे उसी की निंदा चल रही है।
सिग्मंड फ्रायड ने कहा है, अगर सारे लोग चौबीस घंटे के लिए ईमानदार हो जाएं और वही बात कह दें हर एक से जो उसके संबंध में सोचते हैं, तो दुनिया में चार दोस्तियां भी नहीं बचेंगी। चार अरब लोग हैं, चार दोस्तियां न बचेंगी।
बात सच है। अगर तुम वही कह दो, जो तुम सोचते हो दूसरे के संबंध में, वैसा का वैसा कह दो; चौबीस घंटे के लिए लोग अगर ईमानदार हो जाएं...।
फ्रेड्रिक नीत्शे ने कहा है कि सारे धर्म लोगों को समझाते हैं--ईमानदार हो जाओ। मगर बचना। इनकी बात मान मत लेना। नहीं तो दुनिया उजड़ जाएगी। दुनिया बेईमानी पर टिकी है। सारे धर्म समझाते हैं--सत्य बोलो। लेकिन नीत्शे ने कहा है कि भूल कर भी यह भूल मत करना। यहां सारे नाते-रिश्ते झूठ के हैं। यहां सच बोले कि सब नाते-रिश्ते नष्ट हो जाएंगे। अगर पत्नी पति से वही कह दे जो उसके संबंध में सोचती है, तो उसी दिन तलाक हो जाए। लेकिन पत्नी सोचती कुछ है, कहती है: हे पतिदेव! चिट्ठियां लिखती है तो उसमें लिखती है--आपकी दासी। और पतिदेव पढ़ कर बड़े प्रसन्न होते हैं। चित्त उनका एकदम बाग-बाग हो जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन की भाषा में ‘गार्डन-गार्डन’ हो जाता है। उसने बाग-बाग का अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया है।
और पत्नी वही कह दे जो सोचती है तुम्हारे संबंध में, या तुम पत्नी से वही कह दो जो तुम उसके संबंध में सोचते हो!
नहीं, कोई किसी के संबंध में सत्य नहीं कहता। यह सारा जगत झूठ पर चल रहा है।
चंदूलाल का जवान बेटा घंटालाल तीस वर्ष की उम्र में ही काल के गाल में समा गया। मुल्ला नसरुद्दीन की तबीयत कुछ खराब थी; सो उसने अपने बेटे फजलू को कहा, जाओ चंदूलाल के यहां, और सहानुभूति प्रकट करके आओ।
फजलू गया। रास्ते में उसे और लोग भी मिले जो चंदूलाल के यहां जा रहे थे। वे सभी घंटालाल की निंदा कर रहे थे। फजलू सब सुनता रहा। वह चंदूलाल के यहां पहुंचा। ऐसे मौकों पर क्या कहना चाहिए उसे कुछ पता नहीं था, अतः सुनी-सुनाई बातें ही उसने कह दीं।
फजलू रोनी सूरत बना कर बोला, डैडी को थोड़ा बुखार था इसलिए वे न आ सके और मुझे भेजा है। हम लोगों को ही नहीं, पूरे गांव को सुन कर यह बहुत खुशी हुई कि आपका बड़ा बेटा घंटालाल असमय में ही मर गया। उस जैसा नीच और धोखेबाज आदमी नहीं देखा! आस-पड़ोस के गांवों की सारी लड़कियों को उसने परेशान कर रखा था। कभी किसी की उधारी उसने नहीं चुकाई। वह जुआरी, शराबी और वेश्यागामी भी था। भगवान की बड़ी कृपा हुई कि उस दुष्ट से पिंड छूट गया। हमें आपके परिवार के दुख से हार्दिक सहानुभूति है!
चंदूलाल को बहुत क्रोध आया, मगर कुछ कहा नहीं। बाद में एक दिन नसरुद्दीन के घर जाकर उसने पूरा हाल सुनाया। नसरुद्दीन ने फौरन फजलू को बुला कर दो तमाचे मारे और कहा, क्यों बे उल्लू के पट्ठे! किसी की मृत्यु पर क्या ऐसी बातें कही जाती हैं! फिर मुल्ला नसरुद्दीन चंदूलाल की तरफ देख कर बोला, मित्र, इस बार क्षमा कर दो। दुख है कि मैंने इस गंवार को भेजा। मगर कोई बात नहीं, जब तुम्हारा छोटा बेटा भोंदूलाल मरेगा तो मैं स्वयं ही अफसोस जाहिर करने आऊंगा, चाहे मुझे बुखार ही क्यों न चढ़ा हो!
नीत्शे शायद ठीक कहता है। लोग सच-सच कह दें तो जीवन की बस्ती उखड़ जाए। यहां के सब नाते-रिश्ते झूठ, सब फरेब। पीठ पीछे लोग गालियां देते हैं, मुंह के सामने एकदम स्वागत करने लगते हैं। शायद दुनिया ऐसे ही चलेगी।
मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि लोगों से तुम सच-सच कहने लगो। मैं तुमसे इतना जरूर कहना चाहता हूं कि अपने संबंध में सच समझना शुरू करो। दूसरों से सच कहने की तो तुम्हारी भी इच्छा होती होगी। दबा जाते हो, क्योंकि झंझटें खड़ी होंगी। उतनी झंझटें लेने की हिम्मत नहीं है। छुपा जाते हो। मुखौटे लगा लेते हो। पी जाते हो भीतर ही भीतर। उठती है गाली, गीत गा देते हो। सिर तोड़ देने का मन होता है, फूलमाला पहना देते हो।
लेकिन अपने संबंध में सच तो जानना ही होगा। दूसरे के संबंध में सच कहने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। दूसरे ने तुमसे पूछा भी नहीं है। दूसरा तुम्हारा शिष्य भी नहीं है। दूसरे के संबंध में सत्य तो तभी कहा जा सकता है, जब वह शिष्य का भाव स्वीकार करता है। यह तो सदगुरुओं पर छोड़ दो। उनके पास लोग आकर सत्य सुनने को आतुर होते हैं, प्रार्थना करते हैं, तब भी बामुश्किल सदगुरु उनसे सत्य कहते हैं। तभी कहते हैं जब वे उस सत्य को झेलने के योग्य हो जाते हैं। और तब सत्य जरूर अपूर्व निखार लाता है, अपूर्व सौंदर्य लाता है, प्रसाद लाता है।
तुम्हें कोई जरूरत नहीं कि तुम जा-जा कर पड़ोस के लोगों को सत्य बताने लगो। तुम्हें उनका सत्य पता भी क्या हो सकता है? तुम उनके अंतस्तल में बैठे नहीं। तुमने उन्हें बाहर-बाहर से देखा। बाहर-बाहर से कुछ दिखाई पड़ता है? बाहर-बाहर उन्होंने भी धोखे बना रखे हैं, जैसे तुमने बना रखे हैं। अपने सत्य को जरूर जानो। अपने भीतर देखो। जरूर दुख है। और दुख का पहला कारण है कि तुम भीतर नहीं देख रहे हो, बाहर देख रहे हो। और सुख का पहला स्रोत खुलेगा भीतर से।
भीतर देखने का अर्थ है: बाहर का संसार ही नहीं छोड़ दो, थोड़ी देर के लिए दिन में चौबीस घंटे में भीतर का संसार भी--विचार का, कल्पना का, स्मृति का--वह भी छोड़ दो। साक्षी मात्र रह जाओ। बस देखते रहो। आंख बंद करके, जो हो रहा है भीतर, देखते रहो। विचार उठेंगे, भावनाएं उठेंगी, कल्पनाएं उठेंगी, देखते रहो। और ध्यान रखो, स्मरण रखो, कहते रहो: नेति-नेति। यह मैं नहीं हूं; यह मैं नहीं हूं। नेति-नेति ध्यान का मौलिक सूत्र है। यह विचार मैं नहीं; यह कल्पना मैं नहीं; यह स्मृति मैं नहीं। मैं कौन हूं? मैं इन सबको देखने वाला हूं। मैं इनका द्रष्टा हूं।
धीरे-धीरे जब समय आएगा, ठीक अवसर पर, विचार विदा हो जाएंगे; निर्विचार दशा फलित होगी। सन्नाटा हो जाएगा। एक अपूर्व शून्य घेर लेगा। भीतर का पूरा आकाश प्रकट होगा--निरावरण, नग्न, शीतल। अपूर्व है शीतलता उसकी। बस द्रष्टा रह जाएगा, देखने को कुछ भी न बचेगा। और जब देखने को कुछ भी नहीं बचता, तो द्रष्टा अपने पर ही लौट आता है, अपने को ही देखता है। जब देखने को कुछ भी नहीं बचता, तो एक क्रांति घटती है--महाक्रांति--द्रष्टा स्वयं को देखता है। वही है आत्म-दर्शन। और वही है प्रभु-दर्शन का द्वार।
हरिदास, फिर दुख खोजे भी नहीं मिलता। चाहो तो भी नहीं मिलता। फिर सुख ही सुख है। फिर महासुख है। सच्चिदानंद!
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Why am I unhappy?
According to Osho, you are unhappy because the 'you'—the ego—stands in the way of the Divine, your own source. Chasing separate causes is futile; miseries multiply. The single remedy is surrender: become nothing, a servant, and turn inward in silent meditation. Vacate the inner throne and let the Divine be master; in that egolessness, separation ends and bliss naturally showers.
In simple terms: You’re unhappy because your ego blocks the flow—be still inside, let go of control, and let the Divine lead.
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According to Osho, a ‘leap’ is the instantaneous ignition of awareness in the heart—an explosion, not a step-by-step method. In meditation, love, and sannyas, nothing happens by calculation or gradual renunciation; in one moment you see the futility of clinging and are transformed. This ripens in satsang: like an unlit lamp near a lit one, when the threshold is crossed, the flame jumps—effortless, irreversible.
In simple terms: It’s like a light suddenly turning on inside you, often by sitting near someone already glowing, not by slow steps.
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