कानों सुनी सो झूठ सब — प्रवचन 4 Kano Suni So Juth Sab #4
Questions in this Discourse
ओशो, दरिया साहिब के कल के सूत्र सूरता की प्रशस्ति के सूत्र थे। केवल एक शब्द-प्रेमी को ध्यानी से बदल कर वे सूत्र बहुत मजे में जिनेश्वर महावीर के सूत्र कहे जा सकते हैं। भक्ति भी क्या इतनी जुझारू होती है? और क्या भक्ति और ध्यान में इतना ही फर्क है?
प्रेम के मार्ग पर भी उतना ही साहस चाहिए। कोई ऐसा न सोचे कि प्रेम या भक्ति के मार्ग पर साहस की क्या जरूरत? शायद थोड़ा और ज्यादा ही साहस चाहिए, क्योंकि भक्ति है समर्पण। भक्ति है विसर्जन। ध्यान कहता है: स्वयं हो जाओ। भक्ति कहती है: स्वयं को मिटा दो। स्वयं को बिलकुल मिटा दो। मिटने के लिए तो और भी साहस चाहिए। ध्यानी को तो थोड़ी आशा है कि मैं बचूंगा। भक्त उतनी आशा भी नहीं रख सकता। ध्यानी भी मिटता है, अंतिम चरण में मिटता है। भक्त पहले चरण में ही मिट जाता है।
ध्यानी भी समर्पण करता है लेकिन आखिरी चरण में। शुरुआत से तो अपने अहंकार को शुद्ध करता है। सारे जीवन के जितने भी दोष हैं उन्हें दूर करता है। संघर्ष करता है दोषों से। अंत में बचता है शुद्ध अहंकार। वह अंतिम घड़ी है। उसे भी छोड़ना होता है क्योंकि वह आखिरी दोष है—मैं भाव। अब न चोरी रही अब न क्रोध रहा, न लोभ रहा, न काम रहा, सब गए। लेकिन सबकी जगह बस एक अस्मिता छूट गई—मैं हूं। अंततः उसे भी छोड़ता है ज्ञानी। उस आखिरी घड़ी में क्रांति घटती है।
लेकिन भक्त और प्रेमी तो पहले ही चरण में छोड़ देता है उसे। फर्क इतना ही है, ध्यानी और बुराइयों को पहले छोड़ता है और अहंकार की बुराई अंत में छोड़ता है। भक्त अहंकार की बुराई पहले छोड़ता है और उसी बुराई को छोड़ने के बाद अपने आप दूसरी बुराइयां छूटती चली जाती हैं। क्योंकि सभी बीमारियों की जड़ अहंकार है। तुमने कभी क्रोध भी किया है तो अहंकार के कारण ही किया है। और तुमने अगर कभी लोभ भी किया है तो भी अहंकार के कारण ही किया है। तो भक्त तो सीधा जड़ पर चोट करता हैं। और भी साहस चाहिए। ज्ञानी तो शाखाएं काटता है। धीरे-धीरे-धीरे काटते-काटते ऐसी घड़ी आती है, जब सारा वृक्ष कट जाता है, केवल जड़ें रह जाती हैं। तब अंततः जड़ों को काट देता है। ज्ञानी की प्रक्रिया तो बहुत क्रमिक है—कदम-कदम। लेकिन भक्त की प्रक्रिया अक्रमिक है—एक ही छलांग में। तो भक्त को तो साहस और भी चाहिए।
तो ऐसा तो भूल कर भी मत सोचना कि संकल्प के मार्ग पर साहस ठीक, लेकिन यह दरिया तो प्रेम की बात करते हैं, यह इतने जुझारू होने की बात कर रहे हैं? भक्त को मिटना है। इससे बड़ा और साहस क्या होगा? भक्त को स्वयं को खोना है। इससे बड़ा और दुस्साहस क्या होगा? इसलिए जो प्रतीक दरिया ने चुना है ठीक है, प्यारा है। कि जैसे पतंगा दीपशिखा पर आकर मर जाता है, ऐसे ही भक्त सदगुरु की शिखा पर आकर मर जाता है, मिट जाता है। सदगुरु में मर कर ही परमात्मा में जन्म होता है।
ओशो, क्या संप्रदाय से धर्म प्रवेश हो ही नहीं सकता?
जैसे कोई कारागृह में बंद है, तो क्या कारागृह से छुटकारे का कोई उपाय नहीं है? छुटकारे का उपाय है: कारागृह की दीवाल को फांदो और निकलो; कि कारागृह का दरवाजा तोड़ो; कि कारागृह के सींकचे काटो; कि कोई उपाय करो कि दीवाल तुम्हें बाधा न बने, दीवाल में सेंध लगाओ ताकि बाहर निकल जाओ। मार्ग तो कारागृह से भी है; खोजना पड़ेगा। जिसे नहीं जाना है वह तो स्वतंत्र भी बैठा हो खुले आकाश के नीचे तो नहीं जाएगा। तो तो मार्ग वहां भी नहीं है तुम खुले आकाश के नीचे बैठे हो, गंगा सामने बहती है और तुम्हें पानी नहीं पीना है, या तुम्हें प्यास ही नहीं लगी है, तो तुम उठोगे भी नहीं। गंगा बहती रहे, बहती रहे। या तो तुम्हें प्यास नहीं है, या तुम सोचते हो प्यास इस पानी से बुझेगी नहीं। तुम किसी और पानी की तलाश में बैठे हो। तुम्हारी आंखें कहीं और भटक रही हैं तो जो खुला बैठा है, वह भी जरूरी नहीं कि परमात्मा में पहुंच जाए। और जो संप्रदाय के कारागृह में बंद है, वह भी जरूरी नहीं कि बंद ही रह जाए। इस पर निर्भर करता है कि परमात्मा को पाने की कितनी प्रबल आकांक्षा है। तो कोई बंधन न रोकेगा। जंजीरें भी नहीं रोकती। जिसको रुकना ही नहीं है उसे कोई भी नहीं रोकता। और जिसे रुकना है, कुछ भी रोक लेता है; कुछ भी छोटी-मोटी बात रोक लेती है।
कारागृह से भी लोग छूटते हैं। आखिर सभी लोगों का जन्म संप्रदाय में होता है। बुद्ध हिंदू घर में पैदा हुए, नानक हिंदू घर में पैदा हुए, दरिया मुसलमान घर में पैदा हुए, लेकिन छूट गए। खोज हो तो इस जगत में काई चीज बांधती ही नहीं। खोजी को कभी किसी ने नहीं बांधा है। खोज न हो तो जंजीरें नहीं, बेड़ियां नहीं, तुम खुले आकाश के नीचे बैठे हो, मगर बैठे रहो, इससे कुछ यात्रा नहीं होगी।
संप्रदाय का अर्थ क्या होता है? संप्रदाय का अर्थ इतना ही होता है, सांप था कभी, निकला था कभी, अब सांप तो नहीं है, धूल पर लकीर रह गई है। सांप गुजरा था कभी। कभी महावीर थे, अब जैन संप्रदाय है। सांप गुजरा था कभी इस राह से, रेत पर छूटा हुआ चिह्न रह गया है। बुद्ध गुजरे थे कभी, उनके चरणचिह्न रह गए हैं समय की रेत पर। उन्हीं चरण चिह्नों का नाम संप्रदाय है।
चरण-चिह्नों में चरण तो नहीं है ध्यान रखना, चिह्न ही हैं! तुम लाख इन्हें पूजो। अगर तुमने बुद्ध के जीवित पैर पकड़ लिए होते तो उनकी गति के साथ तुम्हारी गति भी जुड़ जाती। वे गत्यात्मक थे, प्रवाह थे, तुम उनके साथ बहे होते। लेकिन अगर तुमने चरणचिह्न पकड़ा तो चरण-चिह्न कहीं भी नहीं जाता, वहीं के वहीं पड़ा रहेगा; सदा वहीं पड़ा रहेगा। चरण-चिह्न में कोई गति नहीं है।
तुमने अगर बुद्ध को पकड़ा होता तो वे तुम्हें जगाते। तुमने अगर बुद्ध की मूर्ति पकड़ी तो वह तुम्हें कैसी जगाएगी? वह खुद ही जागी नहीं है। तुमने अगर कृष्ण के पास बैठने का सौभाग्य पाया होता, तो शायद उनके वे मधुर शब्द तुम्हारे जीवन को परमात्मा की खोज की अभीप्सा से भर देते। लेकिन गीता से यह बात न हो सकेगी। कोई जीवित आंखें चाहिए जो तुम्हारी आंखों में झांकें, और तुम्हें झकझोरें। कोई जीवंत शब्द चाहिए जो सिर्फ ओंठों से न उठा हो, किताबों से न उठा हो। रंजी सास्तर ग्यान की—शास्त्र-ज्ञान की धूल से यह न हो सकेगा। यह तो कहीं कोई हृदय धड़कता हो शब्दों के पीछे, कहीं कोई शून्य विराजमान हो शब्दों के पीछे, उसी शून्य से उठता हो शब्द और तुम्हारे अंत:स्थल में जाता हो, तो शायद तुम्हारे जीवन में रोमांच हो जाए, तो शायद तुम भी नाचने लगो; पैर में तुम्हारे भी घूंघर बंधें।
मीरा ने भजन गाए। निश्चित ही लता मंगेशकर उन्हीं भजनों को ज्यादा ढंग से गाती है, लेकिन लता मंगेशकर का भजन सुन कर तुम्हारे जीवन में भगवान का पदार्पण नहीं होगा। मीरा को शायद इतना ढंग-ढौल न भी आता हो, शायद संगीत की पूरी कला न भी आती हो, लेकिन जो मस्ती थी, जो जीवंतता थी, वह तो किसी गायक के स्वर में नहीं हो सकती। गायक के स्वर में संगीत होगा, छंद होगा, मात्रा होगी, संगीत के नियमों का अनुसरण होगा, पालन होगा, सब होगा, मगर कुछ बात चूकी-चूकी रह जाएगी।
जैसे लाश पड़ी हो, सजी-संवरी, गहने पहनाए हुए, सुंदर वस्त्रों में ढंकी, चेहरे पर भी पाउडर लगाया हो, लालिमा लगाई हो, ओठों पर लिपस्टिक हो और लाश पड़ी हो—ऐसा ही होगा गायक का गीत। लेकिन जीवंत नहीं। यह लाश उठ न सकेगी। यह लाश बोल न सकेगी। तुम पुकारोगे तो यह लाश जवाब न देगी। और इन गहनों और आभूषणों और इन वस्त्रों के भीतर सिर्फ सड़ रही है लाश, जल्दी ही बदबू उठेगी। मृत है।
संप्रदाय मरे हुए धर्म का नाम है। जैसे तुम अपनी मां को प्रेम करते हो लेकिन जब मां मर जाती है तो क्या करते हो? उसे घर में तो नहीं रख लेते। उसे मरघट ले जाते हो। रोते हो, छाती पीटते हो, विदा कर आते हो। ऐसा ही है संप्रदाय। जिस दिन धर्मगुरु जा चुके, जिस दिन जीवंत प्राण उड़ गए हों, ज्योति विलीन हो गई हो और सिर्फ बुझा हुआ दीया रह जाए उस दिन उसकी पूजा करते जाना, लाश को घर में विराजमान कर लेना है। इसलिए संप्रदाय से मुक्ति नहीं होती।
और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि संप्रदाय का जो दीया है, उसमें कभी ज्योति नहीं थी, यह मैं नहीं कह रहा हूं। इसमें ज्योति कभी थी; नहीं तो तुम पूजते ही नहीं। दीये को भी नहीं पूजते। तुमने कभी किसी ने ज्योति देखी थी, उसी से पूजा शुरू हुई थी। फिर पूजा जारी है। ज्योति कब की बुझ गई। जिन्होंने देखी थी वे भी हजारों साल हुए विदा हो गए। फिर उनके बेटों के बेटे, बेटों के बेटे, बेटों के बेटे, इस आशा में कि उनके पूर्वजों की ज्योति दिखी थी, होगी जरूर, अब भी बुझे दीये को पूजे चले जाते हैं। इस तरह वेद पुजता है इस तरह कुरान पुजती है, इस तरह बाइबिल पुजती है।
दरिया कहते हैं: रंजी सास्तर ग्यान की अंग रही लिपटाए।
यह सब धूल है, जो अंग से लिपटी है। खोजो किसी गुरु का झरना कि उसमें डुबकी ले लो, यह धूल बह जाए। खोजो किसी गुरु की संगति कि उसके अंधड़ में तुम्हारी धूल उड़ जाए; कि तुम स्वच्छ हो जाओ। शास्त्र से स्वच्छ हो जाओ। शब्द से मुक्त हो जाओ। धारणा और सिद्धांतों का बोझ हट जाए तो तुम्हारा चित्त निर्मल हो। उसी निर्मल चित्त में परमात्मा की छवि बनती है।
लेकिन लाशों को पूजते-पूजते तुम खुद ही लाश हो गए हो। ऐसा हो जाता है। तुम जो पूजोगे वही हो जाओगे। इसलिए अपनी पूजा बहुत ध्यानपूर्वक चुनना। हर कुछ मत पूजने लगना। पत्थर पूजोगे, पत्थर हो जाओगे। तुम जो पूजोगे वही हो जाओगे। क्योंकि तुम पूज रहे हो उसका अर्थ ही यही है कि तुम अपने से श्रेष्ठ वहां कुछ देख रहे। अगर लाश पूजी तो तुम जीवन के भक्त नहीं हो, तुम मृत्यु के भक्त हो। तुम जल्दी ही मर जाओगे।
आप अपनी सरहदों में खो गया है आदमी
चीन की दीवार जैसा हो गया है आदमी
शीशियों में भर लिए हैं इसने कुछ चेहरों के घोल
जिससे हर पहचान अपनी धो गया है आदमी
सींपियों को विष की बूंदें, जुल्म को नैनों का नीर
कौन सा मोती कहां पर पो गया है आदमी
एक टुकड़ा छांव भी है हादसा जिसके लिए
धूप के पैबंद पहने सो गया है आदमी
रोज बनकर टूटता है गर्दिशों के चाक पर
वक्त के हाथों खिलौना हो गया है आदमी
जिस्म से मन को अलग रखकर गए सदियां हुई
आज तक लौटा नहीं है जो गया है आदमी
कौन सी इच्छा बनी थी मकबरा पहले पहल
मकबरों का सिलसिला सा हो गया है आदमी
कब्र जैसे हो गए हो, मकबरे जैसे हो गया हो। मकबारे पूजोगे, मकबरे हो जाओगे। कब्रों की पूजा से सावधान। संप्रदाय अतीत की पूजा है, बीत गए की—जो कभी था और अब नहीं है। संप्रदाय का अर्थ होता है, सत्य को समूह के द्वारा खोजा जा सकता है। और सत्य जब भी खोजा गया है तो व्यक्ति के द्वारा खोजा गया है, समूह के द्वारा नहीं।
सिंहों के नहीं लेहड़े—सिंह तो अकेले होते हैं। उनके लेहड़े नहीं होते। कबीर अकेले, नानक अकेले, दादू अकेले, दरिया अकेले। जब पाया तो अकेले में पाया। जब भी किसी ने पाया है तो नितांत अकेलेपन में पाया है। जहां दूसरे की कोई छाया भी न पड़ती थी। महावीर ने पाया, बुद्ध ने पाया, क्राइस्ट ने पाया, मोहम्मद ने पाया, अकेले में पाया।
मोहम्मद पर जब पहली दफा कुरान उतरी तो पहाड़ पर अकेले थे, कोई भी न था। महावीर को जब अनुभव हुआ तो वह बारह साल तक मौन जंगल में खड़े रहे थे, चुपचाप। शब्द भी छोड़ दिए थे, बोलना भी छोड़ दिया था, क्योंकि बोलो तो दूसरा आ जाता है। दूसरे को इस तरह विसर्जित कर दिया था कि बोलेंगे ही नहीं तो दूसरा आएगा कैसे? बुद्ध को जब मिला तो एकांत में अकेले बोधिवृक्ष के नीचे बैठे थे। कोई दूसरा न था। पांच संगी-साथी थे, वे भी छोड़कर चले गए थे।
यह कथा भी प्यारी है। प्रतीकात्मक भी हो सकती है, क्योंकि ऐसे बुद्ध पुरुषों के पास जो भी कथाएं बनती हैं, वे प्रतीकात्मक हो जाती हैं। ये पांच संगी साथी थे बुद्ध के। जो सदा उनके साथ रहे थे। पांचों को साथ लेकर वे सत्य की खोज पर निकले थे। लेकिन जब बुद्ध ने देखा कि बहुत तपश्चर्या करके भी कुछ नहीं मिलता। सब तरह से शरीर को सुखा लिया और कुछ भी नहीं हुआ तो उन्होंने तपश्चर्या त्याग दी। संसार छोड़ दिया था एक दिन फिर एक दिन तपश्चर्या भी छोड़ दी। जिस दिन तपश्चर्या छोड़ी, वे पांचों नाराज हो गए। उन्होंने कहा: यह गौतम भ्रष्ट हो गया, पहले इतनी तपश्चर्या करता था और अब कुछ भी ले लेता है। भिक्षा भी स्वीकार कर लेता है। अब पुरानी कठोरता न रही। वे छोड़ कर चले गए। जिस दिन वे छोड़ कर चले गए, उसी रात बुद्ध को ज्ञान हुआ।
यह पांच का प्रतीक पांच इंद्रियों का प्रतीक भी हो सकता है—होना चाहिए। यह पांच इंद्रियों को साथ लेकर जैसे बुद्ध खोज रहे थे तब तक अड़चन रही। पहले इन पांच इंद्रियों के भोग से खोजते थे, फिर इन पांच इंद्रियों के त्याग में खोजते थे लेकिन यह पांच इंद्रियों का साथ बना रहा था। उस रात इन पांच का साथ छूट गया, अतींद्रिय हो गए, उसी रात घटना घट गई।
मगर वे पांच शिष्य थे उनके। वे छोड़ कर चले गए कि गौतम भ्रष्ट हो गया। जिस दिन वे छोड़ कर गए उसी दिन घटना घट गई। ऐसा भी हो सकता है, उन पांच की मौजूदगी बाधा बन रही थी। ऐसी ही मेरी प्रतीति है। उन पांच की मौजूदगी बाधा बन रही थी। भीड़-भाड़ थी। जमात हो गई थी। बातचीत भी करते होंगे, विवाद भी करते होंगे। सन्नाटा नहीं था, शून्य नहीं था। समाधि बनना मुश्किल थी। जब भी सत्य अवतरित हुआ है तो नितांत एकांत में व्यक्ति की अंतरात्मा में अवतरित हुआ है।
संप्रदाय का अर्थ होता है, तुम सोच रहे हो कि भीड़-भाड़ में खड़े होने से सत्य मिल जाएगा। हिंदू होने से सत्य मिल जाएगा कि मुसलमान होने से सत्य मिल जाएगा, नहीं, न हिंदू होने से सत्य मिलता है, न मुसलमान होने से सत्य मिलता है; अकेले होने से सत्य मिला है। हिंदू भी भीड़ है, मुसलमान भी भीड़ है। भीड़ तो राजनीति है। इसलिए संप्रदाय राजनीति है, धर्म कम। यह धर्म के नाम पर बड़ी सूक्ष्म राजनीति है।
अपना नन्हा चिराग जलाए बिना कोई चारा नहीं
कोई चारा नहीं कि जिस प्रकाश के भुलावे में
हमने अपने चिराग बुझा दिए
सारे शक-शुबहा सायाम सुला दिए
वह झूठा निकला
झूठा निकला यह विश्वास
कि सूरज सबको रास्ता दिखाएगा
मूर्ख होगा जो अपना अलग-अलग चिराग जलाएगा
क्या है जरूरत नन्हे नन्हे चिराग लिए अंधेरे में
टामक-टोए मारने की,
अलग-अलग रास्ता खोजने की,
जीतने की कोशिश में बार-बार हारने की?
जब कि नये सूरज की किरणों में जगमगाता आसमान खुल गया है
अंधेरा हमेशा-हमेशा के लिए धुल गया है
कोटि-कोटि जन बढ़े जा रहे हैं
जयकारे बुलाते
और नारे लगाते
और अपने नन्हे चिराग सहर्ष बुझाते
झूठा निकला वह विश्वास
जनपथ बियाबान में खो गया
और प्रकाश अंधेरे की चादर ओढ़ कर सो गया
अपना नन्हा चिराग जलाए बिना कोई चारा नहीं
रोशनी सामूहिक नहीं है। सत्य का सूरज नहीं है। सत्य का तो छोटा सा चिराग जलता है तुम्हारी अंतरात्मा में, तुम्हारे एकांत में, तुम्हारे निबिड़ शांति में। छोटे-छोटे चिराग ही जलाने होते हैं सत्य के। समाधि के दीये होते हैं, सूरज नहीं।
यहां तुम इतने लोग हो, अगर तुम सभी भी ध्यान करने बैठे जाओ तो जैसे ही ध्यान घटेगा, तुम अकेले रह जाओगे, बाकी सब लोग भूल जाएंगे। साथ भला बैठे हो, देह ही साथ होती है। जैसे ही तुम भीतर गए, अकेले हो जाते हो। भीतर तो एकदम अकेलापन है। वहां तुम किसी दूसरे को ले भी न जा सकोगे। चाहो तो भी न ले जा सकोगे। अपने प्रीतम को भी बुलाना चाहो तो न बुला सकोगे। वहां दूसरे के पहुंचने की संभावना ही नहीं है। वहां बस तुम ही विराजमान हो।
उस परम-सत्ता को खोज लेना है जहां तुम ही विराजमान हो। उसी को ज्ञानी आत्मा कहते हैं, भक्त परमात्मा कहते हैं। वह तुम्हारा ही निज स्वरूप है। लेकिन उसे पाने के लिए भीड़-भाड़ तो छोड़नी होगी। भीड़-भाड़ से तो बचना होगा। भीड़-भाड़ के उपयोग हैं। और उपयोग हैं, धार्मिक कोई उपयोग नहीं है भीड़-भाड़ का। राजनैतिक उपयोग हैं; अगर बड़ी भीड़ के हिस्सेदार हो तो तुम ताकतवर हो। अगर छोटी भीड़ के हिस्सेदार हो तो ताकत कम हो गई। तो ये ताकत की बातें हैं। लेकिन अगर तुम अकेले हो तो धार्मिक हो गए।
और एक बार तुम उस अकेलेपन को जान लो, एक बार तुम्हारा नन्हा सा चिराग जल जाए, तो फिर तुम भीड़ों में रहो, बाजारों में रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसका चिराग जला है उसके लिए बाजार कहीं है ही नहीं। उसके लिए सभी जगह परमात्मा का वास है। उसके लिए सभी जगह हिमालय फैल गया है। उसके लिए सभी जगह सन्नाटा है। और जिसकी अपनी रोशनी जली है उसे कहीं भी अंधेरा नहीं है। तुमने देखा न! छोटा सा दीया हाथ में लेकर तुम चलो तो तुम जहां जाओ, तुम्हें रोशनी घेरे रहती है। तुम्हारा छोटा सा दीया पर्याप्त है। कम से कम कुछ कदमों तक, चार-छह कदमों तक रोशनी तुम्हें घेरे रहती है। रोशनी का एक वर्तुल तुम्हारे साथ चलता है। जिसके भीतर का दीया जल रहा है उसके लिए अंधेरा है ही नहीं। वह जहां भी जाएगा वहीं रोशनी है। बाजार में बैठे तो बाजार में रोशनी है। पहाड़ पर बैठे तो पहाड़ पर रोशनी है। परिवार में रहे तो परिवार में रोशनी है। परिव्राजक हो जाए तो परिव्राजक होने में रोशनी है। असली बात भीतर की रोशनी का जल जाना है। लेकिन यह संप्रदाय से नहीं होता है, इसके लिए तो तुम्हें स्वयं ही चेष्टा करनी होगी।
दुनिया में धर्म के नाम पर संप्रदाय खोटे सिक्के की भांति है, झूठे सिक्के की भांति है। यह प्रलोभन दे देता है। यह कहता है, देखो, सम्मिलित हो जाओ। इस संप्रदाय में सम्मिलित हो जाओ, या उस संप्रदाय में सम्मिलित हो जाओ। और पा लोगे, जो तुम्हें पाना है। लेकिन कभी किसी ने पाया? जीसस पैदा हुए थे यहूदी घर में लेकिन यहूदी संप्रदाय में नहीं मिला। खोजना पड़ा एकांत में। आज तक दुनिया में जितने लोगों ने पाया है, सब ने एकांत में पाया।
और सबके साथ यह दुर्भाग्य घटता है कि जब उनको मिल जाता है तो उनके दीये की रोशनी देख कर हजारों लोग दौड़े आते हैं, पतंगे आते हैं। पतंगे मरते हैं उनकी ज्योति में आकर; उनकी ज्योति में लीन होते हैं। फिर समय रहते उनकी ज्योति बुझ जाती है। इस जगत में कोई भी चीज शाश्वत नहीं है। सदगुरु भी घटते हैं और विदा हो जाते हैं। घड़ी भर को द्वार खुलता है, फिर बंद हो जाता है। लेकिन लोगों को पता नहीं चलता।
लोग तो पुरानी लकीर के फकीर। सुनते हैं कि उनके बापदादा फलां दीये पर गिर कर और निर्वाण को पा गए थे तो वे भी उसी दीये पर गिरते जाते हैं, और यह भी नहीं देखते हैं कि दीया अब जला नहीं रहा है। पतंगा पतंगा बना रहता है। दीये पर गिरता जाता है, सिर पटक लेता है। बल्कि और भी प्रसन्न होता है कि यह अच्छी रही। मरने से भी बचे और दीये पर गिरने का साहस दिखाने का भी मजा ले लिया। असली दीयों से बचता है। जहां ज्योति जल रही है अब, वहां नहीं जाता। वह कहता है, हमारा अपना ही दीया है, हम उसी पर गिरते हैं। हमारा अपना मंदिर है, अपना गुरुद्वारा है, अपनी मस्जिद है, हम वहीं जाते हैं। हम क्यों जाएं दूसरी जगह? मगर तुम यह तो देखो कि जिस मंदिर से तुम लौट आते हो वह मंदिर न होगा। जो मस्जिद तुम्हें मिटाती नहीं वह मस्जिद नहीं है अब। जिस गुरुद्वारे से तुम वैसे के वैसे लौट आते हो जैसे गए थे, वह गुरुद्वारा कहां रहा? वह गुरु का द्वार अब कहां रहा? जब गुरु नहीं रहा तो गुरु का द्वार कहां रह जाएगा? गुरुद्वारे से तो जो गया सो गया; फिर लौटे कैसे? असली दीये पर गिरोगे तो गए।
तो इस संप्रदाय के नाम पर एक झूठ प्रक्रिया चलनी शुरू होती है। एक थोथा जाल फैलता है। अगर कभी कोई लोग इस संप्रदाय के नाम पर किसी तरह ठोक-पीट कर अपने को थोड़ा शांत भी कर लेते हैं, तो भी वह शांति मुर्दे की शांति होती है, जीवित आदमी की शांति नहीं। शांति शांति में फर्क है, ध्यान रखना। एक मरघट की भी शांति होती है। एक हिमालय की भी शांति है। एक शांत बैठे आदमी की शांति होती है और एक मुर्दा लाश की भी शांति होती है। ऊपर से देखने में दोनों शांतियां मालूम पड़ती हैं। तुम अपने कमरे में मर गए तो भी सन्नाटा हो जाता है, और तुम अपने कमरे में समाधि में चले गए तो भी सन्नाटा हो जाता है। लेकिन क्या ये दोनों समाधियां, ये दोनों शांतियां एक जैसी हैं? ये सन्नाटे एक जैसे हैं? लाश का सन्नाटा और समाधिस्थ व्यक्ति के सन्नाटे में कुछ फर्क करोगे या न करोगे? समाधिस्थ व्यक्ति का सन्नाटा जीवंत है, परम ऊर्जा से आंदोलित है। मुर्दे का सन्नाटा सिर्फ सन्नाटा है; सिर्फ शोरगुल का अभाव है, नकारात्मक है। उसमें कुछ विधायकता नहीं है।
ऐसी आग भी होती है जो औरों को नहीं जलाती है
पर अपनी परिधि में रुकी
अपनी मर्यादा में बंधी दिप-दिप जलती है
हमें राख की शांति नहीं चाहिए
ऐसी आग भी होती है जो चिटकती नहीं
शोर नहीं मचाती
अपनी गरिमा से पुष्ट
अपनी शक्ति से संतुष्ट
अनवरत शांत मगन दहकती है
हमें राख की शांति नहीं चाहिए
शांति चाहो ऐसी आग की, जो दिप-दिप जलती है। ऐसी आग की, जो अपने में संतुष्ट, परितुष्ट, अनवरत शांत और मगन दहकती है। आग की शांति चाहो, राख की नहीं। राख की भी शांति होती है—मुर्दा, ठंडी; जहां जीवन जा चुका। हां, कभी वहां भी आग थी।
संप्रदाय राख है। कभी वहां आग थी, कभी अंगारे थे, अब नहीं हैं। धर्म की खोज में व्यक्ति को हमेशा अंगारे खोजने पड़ते हैं; और यही अड़चन है। क्योंकि राख में तो तुम पैदा होते हो, अंगारा तुम्हें खोजना पड़ता है। हिंदू घर में पैदा हुए इसके लिए तुम्हें कुछ करना तो नहीं पड़ा। यह तो संयोग की बात थी। कि जैन घर में पैदा हुए, संयोग की बात थी। बचपन से एक संप्रदाय तुम्हें मिल गया। बचपन से एक संप्रदाय का संस्कार पड़ गया। लेकिन अगर तुम्हें सदगुरु खोजना है तो खोजना पड़ेगा। सदगुरु जन्म से नहीं मिलते। सदगुरु के लिए तो आंखें खोल कर भटकना पड़ता है, यात्रा करनी पड़ती है। सदगुरु तीर्थयात्रा से मिलते हैं। खतरा उठाना पड़ता है, जोखम लेनी पड़ती है। क्योंकि कौन जाने, जिसको तुमने सदगुरु माना, है भी या नहीं! तो जुआरी बनना पड़ता है। दांव लगाना पड़ता है। चूक भी हो सकती है।
संप्रदाय में भूल-चूक नहीं होती। बापदादों से चला आता है, उधार है। तुम्हें मिल जाता है मुफ्त—वसीयत की तरह; खुद नहीं कमाना होता। इस फर्क को समझ लेना। संप्रदाय मुफ्त मिलता है वसीयत की तरह। धर्म कमाना पड़ता, धर्म खोजना पड़ता है, धर्म पर दांव लगाना होता है, इसलिए थोड़े से ही लोग धार्मिक हो पाते हैं।
अब जिन्होंने नानक को चुना—जिंदा नानक को, उनकी बात और थी। अब जो सिक्ख हैं उनकी बात और है। जिन्होंने नानक को चुना था—जिंदा नानक को, उन्होंने बड़ी अड़चन से चुना था; बड़ी मुश्किल से चुना था। क्योंकि कोई हिंदू घर में पैदा हुआ होगा। नानक का तो कोई घर ही नहीं था तब तक। कोई मुसलमान घर में पैदा हुआ था, कोई जैन घर में पैदा हुआ था कोई गोरख पंथी था, कोई और था, कोई और था, हजार संप्रदाय थे, उनमें लोग पैदा हुए थे। फिर नानक की ज्योति जली, यह अंगारा प्रगटा। इस अंगारे के गीत जन्मे। तब तो जिन्होंने चुना, बड़े हिम्मतवर लोग रहे होंगे। बहुत नहीं हो सकते, बिरले हो सकते हैं। इसलिए तो दरिया कहते हैं, पूरी फौज में कोई एकाध सूरमा होता है। फौज की फौज वीरों की नहीं होती, कोई एकाध वीर पुरुष होता है।
तो थोड़े से लोगों ने नानक का गीत सुना। थोड़े से लोगों ने पहचान बताई। थोड़े से लोगों ने हिम्मत की, अपने अतीत को दांव पर लगाया। अतीत सुरक्षित था। गीता दांव पर लगा दी इस आदमी के प्रेम में, इस आदमी के मोह में। कहा कि छोड़ते हैं गीता। क्योंकि कृष्ण ठीक थे या नहीं यह सवाल नहीं है। गीता में अब कृष्ण कहां? राख बची है। महावीर को छोड़ दिया, बुद्ध को छोड़ दिया, मोहम्मद को छोड़ दिया इस आदमी के साथ सगाई कर ली। इस आदमी के साथ विवाह रचा लिया। यह खतरे का काम था। क्योंकि गीता की पुरानी साख थी—हजारों साल पुरानी। यह आदमी तो अभी-अभी हुआ। पता नहीं ठीक भी हो कि न हो। इसके पीछे कोई पुरानी साख तो नहीं है। बाजार में इसकी कोई साख तो नहीं है। इसको कोई जानता तो है नहीं अभी। इस अनजान के साथ प्रेम बांध लिया। हिम्मतवर लोग थे। उनको अगर नानक ने शिष्य कहा—सिक्ख उसी से बना—तो ठीक कहा; वे शिष्य थे। जो गुरु खोजता है, वह शिष्य है।
लेकिन अब जो सिक्ख हैं वे सिक्ख नहीं हैं। अब उन्होंने गुरु थोड़े ही खोजा। अब तो वे सिक्ख घर में पैदा हुए। अब तो उनको गुरु खोजना पड़े तो फिर झंझट होगी। अब तो उन्हें नानक को छोड़ कर गुरु खोजना पड़ेगा, यह झंझट होगी। और तुम्हें यह हैरानी होगी बात जान कर कि जो नानक को छोड़ कर गुरु खोजेंगे वही सिक्ख हैं। क्योंकि सिक्ख का अर्थ ही यह होता है कि जो गुरु को खोजे। जीवित गुरु को खोजे। अब तो जो असली सिक्ख है, वह सिक्ख संप्रदाय के बाहर हो जाएगा। जो असली जैन है वह जैन संप्रदाय के बाहर हो जाएगा। जो असली हिंदू है वह हिंदू संप्रदाय के बाहर हो जाएगा। क्योंकि संप्रदाय में कहां असली? वह असली को खोजेगा। असली तो सदा किसी जीवित गुरु के प्राणों में होता है। मगर नुकसान तो उसे उठाने पड़ते हैं।
किसी संप्रदाय को छोड़ना इतना आसान तो नहीं। फिर संप्रदाय के साथ बहुत से न्यस्त स्वार्थ हैं, औपचारिकताएं हैं, व्यवस्थाएं हैं, सुरक्षाएं हैं, सुविधाएं हैं। फिर संप्रदाय इसे क्षमा भी नहीं करता। संप्रदाय इसका ठीक से बदला लेता है। जब तुम किसी संप्रदाय को छोड़ते हो तो तुम संप्रदाय के अहंकार को चोट पहुंचाते हो कि तुमने समझा क्या? तुम अपने को अक्लमंद समझ रहे हो? हम सब गलत हैं? हम हजारों साल से मान रहे हैं और गलत हैं? और तुम एक अकेले समझदार हो गए हो? तो सारा संप्रदाय तुम्हारे खिलाफ खड़ा हो जाता है। भीड़ उनकी है, वह तुम्हें अड़चन देती है। यह अड़चन सत्य के मार्ग पर साहसी आदमी को उठानी ही पड़ती है। इसलिए दरिया ठीक ही कहते हैं कि कुछ सूरमा ही होते हैं, जो धर्म के मार्ग पर जाते हैं।
धर्मगुरु सदगुरु नहीं है, धर्मगुरु सदगुरु का धोखा है। पंडित है, पुरोहित है, मौलवी है, वे धोखे हैं। उनके भीतर की आग जलती हुई नहीं है। उन्हें खुद भी कुछ पता नहीं है। वे उतने ही अज्ञान में हैं जितने तुम। कभी-कभी तो ऐसा होता है, तुमसे भी ज्यादा अज्ञान में हैं। क्योंकि तुम्हें कम से कम इतनी समझ है कि मुझे कुछ पता नहीं है, उनको यह खयाल है कि उन्हें सब पता है और पता कुछ भी नहीं। उनकी हालत तुम से बदतर है।
फिर धर्म के साथ उनका संबंध क्या है? धर्म के साथ उनका कोई संबंध नहीं है। धर्म के पाखंड के साथ उनका संबंध है क्योंकि उससे लाभ है; उससे व्यवसाय है। धर्मगुरु धर्म का व्यवसाय कर रहा है।
मैंने सुना, मुल्ला नसरुद्दीन के पास एक आदमी आया, बड़ा डरा हुआ था। मुल्ला मौलवी! उसने कहा कि मुल्ला, बचाओ। बड़ी भूल हो गई। आज सात दिन से सोया भी नहीं। एक बकरा चुरा लिया किसी का, और मित्रों ने मिल कर खा-पी भी लिया। अब मुझे यह पाप कचोटता है कि मित्रों ने खाने-पीने में तो हाथ बंटाया लेकिन फसूंगा तो मैं ही आखिर में। निर्णय के दिन, कयामत के दिन पुकारा तो मैं जाऊंगा। चुराया तो मैंने था बकरा। खा तो ये सब गए। मुझे थोड़ा बहुत मिला है, इसमें ठीक है, मगर ये तो खा-पी कर विदा हो गए, फंस मैं गया। चोरी मैंने की थी। मुल्ला, मुझे कुछ रास्ता बताओ कि मैं निकल आऊं?
मुल्ला तो बहुत चिल्लाया, नाराज हुआ एकदम। उसने पूरा का पूरा नरक का दृश्य खड़ा कर दिया कि दोजख में सड़ोगे, जलाए जाओगे कड़ाहों में, कीड़े-मकोड़े काटेंगे, जन्मों-जन्मों तक दुख पाओगे। खूब डराया उस आदमी को। वह बहुत घबड़ा गया। उसने कहा कि मुल्ला, अब और मत घबड़ाओ। मैं वैसे ही सात दिन से सोया नहीं, तुम तो ऐसी हालत किए दे रहे हो। मैं क्या करूं, यह बताओ। मुल्ला ने कहा: कुछ करना है अगर तो केवल बातचीत से न होगा, कुछ नगद प्रमाण चाहिए।
नगद प्रमाण? उस आदमी ने कहा: तुम्हारा मतलब क्या है?
मुल्ला ने कहा: नगद नहीं समझते?
उसकी अकल में आया, उसने पांच रुपये का नोट निकाल कर मुल्ला को दिया कि लो। मुल्ला ने उसे खीसे में रखा और कहा घबड़ाओ मत, हर झंझट के बाहर मार्ग है, लेकिन तुम समय पर आ गए। कयामत में बुलाए तो जाओगे। ईश्वर पूछेगा कि बकरा क्यों चुराया? तो तुम साफ मुकर जाना। तुम कहना चुराया ही नहीं। वह आदमी बोला: साफ मुकर जाना? मुल्ला ने कहा: कोई गवाह है? कहा: गवाह कहां? किसी ने देखा तुम्हें चुराते? उस आदमी ने कहा: किसी ने नहीं देखा। मुल्ला ने कहा: फिर बेफिकर रहो। जब कोई गवाह ही नहीं है तो फिर कोई छोटी-मोटी अदालत भी कुछ नहीं कर सकती। तो उसकी तो बड़ी अदालत है। गवाह तो पूछेगा ही कि कोई गवाह है, जिसने देखा?
वह आदमी बोला कि बात तो ठीक है, लेकिन परमात्मा तो सभी विराट शक्तिमान है, उसके लिए क्या कमी है? वह चाहे तो बकरे को ही बुला सकता है कि यह बकरा खड़ा है। बकरे ने तो देखा। मुल्ला ने कहा: यह अड़चन आ गई। नगद प्रमाण फिर से दो। तो उस आदमी ने फिर पांच रुपये का नोट निकाला। वह खीसे में रख कर मुल्ला ने कहा: देखो ऐसा है, अगर वह बकरे को बुलाए सामने तो जल्दी से बकरे को पकड़ कर उस आदमी को दे देना, जिसका चुराया है। कहना झंझट मिटी। बात ही खतम हो गई। लेना देना पूरा। अब कैसा मामला! वह आदमी भी खुश हुआ, मुल्ला भी प्रसन्न है। उस आदमी को भी बात जंच गई कि यह बात ठीक है।
जिसको तुम धर्मगुरु कहते हो वह व्यवसाय कर रहा है। उसकी रोटी-रोजी है। उसे तुमसे कुछ मतलब नहीं है, न तुम्हारे भविष्य से कुछ प्रयोजन है। उसे अपने ही भविष्य का पता नहीं है, तुम्हारे भविष्य का क्या प्रयोजन होगा? लेकिन व्यवसाय है, संप्रदाय है। जल्दी ही पंडित-पुरोहितों का व्यवसाय बन जाता है।
स्वभावतः पंडित-पुरोहित सदा ही सदगुरु के विरोध में खड़े रहते हैं—खड़े ही रहेंगे। क्योंकि जब भी सदगुरु पैदा होगा, जब भी किसी व्यक्ति में फिर से अंगारा जलेगा, तो वे सब घबड़ा जाएंगे, जो राख का धंधा कर रहे हैं। उसको भभूत कहो, विभूति कहो, जो भी कहना हो कहो, लेकिन जो भी राख का धंधा कर रहे हैं वे सब घबड़ा जाएंगे। वे सब एकजुट विरोध में हो जाएंगे। वे कहेंगे, यह अंगारा खतरनाक है। जाना मत, जलोगे। मुश्किल में पड़ोगे। यह राख अच्छी है, ठंडी है, शीतल है, फिर बापदादे भी यही पूजते रहे हैं, तुम भी यही पूजो। अपने बापदादों को मत छोड़ो। अपनी निष्ठा मत गंवाओ। भटक मत जाना। यह मार्ग सुनिश्चित है, इस पर अनेक लोग गए हैं। यह नये मार्ग के झंझट में मत पड़ो। क्या पता कोई जाता हो, न जाता हो। नई बातें खतरनाक हो सकती हैं। पुरानी जांची-परखी गई बातें में ही रहो।
तुम पूछते हो: ‘क्या संप्रदाय से धर्म प्रवेश हो ही नहीं सकता?’
हो सकता है, संप्रदाय के बाहर आना उपाय है। संप्रदाय को भी सीढ़ी बना लो। उस पर चढ़ जाओ, उससे पार निकल आओ। और तुम संप्रदाय के भीतर बंध कर जिसे खोज रहे थे उसे तुम संप्रदाय के बाहर रह कर किसी दिन पा लोगे। जिस दिन तुम पा लोगे उस दिन तुम जान लोगे—अगर तुम हिंदू थे तो तुम जान लोगे कि अब मैं हिंदू हुआ। अगर मुसलमान थे तो पाओगे कि अब मैं मुसलमान हुआ। अगर जैन थे तो पाओगे, अब मैं जैन हुआ। लेकिन जैन रहते कोई जैन नहीं होता, न हिंदू रहते कोई हिंदू होता है। यह विरोधाभास है। छूट कर संप्रदाय से व्यक्ति धार्मिक बनता है। क्षुद्र शब्दों और शास्त्रों की सीमाओं से उठ कर सत्य का खुला आकाश उपलब्ध होता है।
ओशो, आप कहते हैं कि सुख का समय अनंत है और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दुख का समय अनंत है। कृपा करके समझाएं अनंत के प्रति यह दो विपरीत दृष्टिकोण किस कारण है।
प्रियजन से मिलना हो गया, रात ऐसे बीत जाती है बात में, गपशप में, कब सुबह हो गई, पता नहीं चलता। ऐसा लगता है कि घड़ी बड़ी तेजी से चल गई। कांटों ने बड़ा धोखा किया, जल्दी-जल्दी घूम गए। कांटे तो अपने ही तरह से घूम रहे हैं, समय तो अपने ही गति से जा रहा है। कोई फर्क तुम्हारे लिए नहीं किया है। तुम्हारे मन में फर्क हो गया है क्योंकि इस मित्र को पाकर तुम्हें जो रस आ रहा है उसे तुम चाहते हो सदा आता रहे आता ही रहे। तुम्हारी मांग इतनी बड़ी है, उस मांग की तुलना में जो सुख मिल रहा है वह इतना छोटा मालूम पड़ता है कि यह गया...यह गया...। अभी आया मित्र अभी जाने की घड़ी आ गई। अभी सुख आया था, उपजा था, यह चला।
तो जब सुख बीत रहा होता है, जब तुम सुख की घड़ी में होते हो तब ऐसा लगता है बड़ी जल्दी जा रहा है, क्षणभंगुर है।
ठीक इससे विपरीत दशा दुख की होती है। जब तुम दुख की घड़ी में होते हो तो लगता है, घड़ी चल ही नहीं रही। अटका है कांटा। घूमता ही नहीं कांटा।
तुम्हारा प्रियजन मर रहा है, मृत्युशय्या पर पड़ा है, तुम किनारे बैठे हो खाट के उसके, रात ऐसी लगती है कि बीतेगी ही नहीं। लगता है कि लंबी होती जा रही है, क्या मामला क्या है? क्या कयामत की रात आ गई? आखिरी रात आ गई? आज सुबह होती नहीं दिखाई पड़ती। आज सुबह होगी या नहीं होगी? अब सूरज निकलेगा कि नहीं निकलेगा? कारण क्या है? कोई फर्क नहीं पड़ा। घड़ी अपने ढंग से चल रही है। सुबह भी होगी। चाल समय की वही है जो थी लेकिन तुम्हारा मन आज बड़ा दुख में भरा है। तुम चाहते हो जल्दी यह रात कट जाए। जल्दी कट जाए। सुख में तुम चाहते हो, कहीं जल्दी न कट जाए। दुख में तुम चाहते हो, जल्दी कट जाए। अब कट ही जाए। किसी तरह सुबह हो जाए, किसी तरह सूरज निकल आए।
जब तुम दुख में होते हो तो तुम जल्दी पार होना चाहते हो। तुम्हारी जल्दी के कारण देरी मालूम पड़ती है कि दुख की घड़ी बड़ी धीरे-धीरे जा रही है। जा ही नहीं रही, चल ही नहीं रही। समय ठहर गया है। सुख में तुम चाहते हो समय ठहर जाए, सो समय भागता मालूम पड़ता है। यह तुम्हारे ही मन की कल्पना के कारण होता है। समय तो वैसा ही चलता है, जैसा चलता है। न सुख की फिकर है, न दुख की फिकर है।
तो यह पहली बात। फिर जब तुम पीछे लौट कर देखते हो सुख की घड़ी को या दुख की घड़ी को, तो फिर एक फर्क हो जाता है। जब तुम पीछे लौट कर देखते हो सुख की कोई घड़ी....रात जिस दिन, जब कोई प्रियजन आ गया था और तुम गीत गाते रहे थे, और साथ बैठ कर चांद निहारते रहे थे, नाचे थे साथ-साथ, मग्न हुए थे, एक-दूसरे में डुबकी ली थी, जब तुम पीछे लौट कर देखते हो तो वह सुख बड़ा लंबा मालूम पड़ेगा। जब तुम सुख में गुजरे थे तो बड़ा छोटा मालूम पड़ता था। जब तुम लौट कर देखोगे तो सुख बहुत लंबा मालूम पड़ेगा। और जब तुम दुख को लौट कर देखोगे तो दुख छोटा मालूम पड़ेगा। जब दुख में से गुजरे थे तो बड़ा लंबा मालूम पड़ता था।
क्यों? क्योंकि हम कल्पना में भी दुख को बड़ा नहीं करना चाहते। हम कल्पना में तक दुख को छोटा करना चाहते हैं। असलियत में तो कर नहीं सकते, कल्पना में तो कर सकते हैं। असली दुख जब सामने खड़ा है तब तो वह गुजरेगा तब गुजरेगा। जितना समय लेगा, लेगा। हम चाहते हैं जल्दी गुजर जाए, तो लगता है, धीरे गुजर रहा है। हमारी अपेक्षा अड़चन डाल देती है। लेकिन जब तुम लौट कर देखते हो तब तो तुम मालिक हो गए। अब तुम चाहो जितने जल्दी कैलेंडर को फाड़ दो। एक क्षण में दिन बीत जाए। एक क्षण में रात बीत जाए एक क्षण में वर्ष बीत जाए। अब तुम्हारे हाथ में है। तो तुम दुख को छोटा कर लेते हो। तुम सदा से छोटा करना चाहते थे। असलियत में तो न कर सके थे, स्मृति में कम कर लेते हो।
इसलिए लोग स्मृति में दुख की बातों को भूल जाते हैं। खूब दुख घटे है जिंदगी में लेकिन उनको भूल जाते हैं। और सुख को कभी नहीं भूलते हैं। सुख को खूब याद रखते हैं, संजो कर रखते हैं। उसकी तिजोड़ी बना लेते हैं। और सुख को खूब लंबा-लंबा कर देखते हैं। वह तुम्हारी कल्पना की बात, जैसा तुम्हें देखना हो। इसलिए लोग पीछे लौट-लौट कर देखते हैं और कहते हैं, कैसे अच्छे दिन थे वे पुराने दिन। अब बीत गए। बचपन कैसा प्यारा था। इसी मनोवैज्ञानिक आधार पर सारी दुनिया में यह एक प्रवृत्ति है कि अतीत में स्वर्ण-युग था, सतयुग था, वह बीत गया। कैसे प्यारे दिन! कैसे आनंद के दिन! वे सब चले गए।
वर्तमान सदा दुख मालूम होता है और अतीत सुख मालूम पड़ता है। क्योंकि अतीत से तुमने दुख तो अलग कर दिए, छांट दिए। स्मृति तो तुम्हारी है, तुम जो चाहो। करो। पन्ने फाड़ दिए तुमने स्मृति के किताब से जो दुख के थे, या उनको संक्षिप्त कर दिया, या बिलकुल छोटा कर दिया, फुटनोट रह गए। और सुख के जो पन्ने थे उनको खूब बड़े कर दिए। उनके अध्याय के अध्याय बना दिए। फुटनोट जो थे, अध्याय बन गए। अध्याय जो थे, फुटनोट हो गए। यह फिर तुम मालिक हो पीछे। फिर तुम्हारे हाथ में है। तुम अस्तित्व को तो नहीं बदल सकते लेकिन स्मृति को बदल सकते हो। और हम सब स्मृति को बदलते रहते हैं।
तो ये दो बातें हैं। जब सुख बीतता है, क्षणभंगुर मालूम पड़ता है। जब दुख बीतता है तो अनंत मालूम पड़ता है और जब बीत गए को तुम लौट कर याद करते हो तो हालत बिलकुल उलटी हो जाती है। सुख खूब लंबा मालूम पड़ता है, दुख छोटा सा मालूम पड़ता है।
लेकिन ये दोनों ही स्थितियां अज्ञान की हैं। ज्ञानी को सुख-दुख दोनों बराबर मालूम पड़ते हैं; न कोई लंबा, न कोई छोटा। क्योंकि ज्ञानी की कोई अपेक्षा नहीं है। उसकी कोई मांग नहीं है। वह कहता नहीं कि यह रात बड़ी हो जाए कि यह रात छोटी हो जाए। वह कहता है जैसी है, उससे वह राजी है। उसके मन में तथाता का भाव है। सर्व स्वीकार है। कांटा गड़े तो स्वीकार है। फूल की गंध नासापुटों में भर जाए तो स्वीकार है। सुख बरसे तो ठीक, दुख बरसे तो ठीक। वह हर हालत में राजी है। चूंकि हर हालत में राजी है इसलिए दुख भी उतना ही मालूम होता है, जितना है। और सुख भी उतना ही मालूम होता है, जितना है।
और एक बड़ी चमत्कार की बात घटती है। तब आदमी को पहली दफा पता चलता है कि जिंदगी में पचास-पचास प्रतिशत है दोनों। उतना ही दुख है, उतना ही सुख है। आधा-आधा है। संतुलन है। अज्ञानी को यह कभी पता नहीं चलता कि दोनों बराबर हैं। अज्ञानी कहता है कि जब बीत रहा है तब दुख बहुत ज्यादा है, सुख बहुत कम है। और जब बीत जाता है तो सुख बहुत ज्यादा हो जाता है, दुख बहुत कम। अज्ञान के तराजू के पलड़े कभी समतुल हो जाते हैं। ज्ञानी की कोई अपेक्षा नहीं है। वह यह नहीं कहता, ऐसा हो। वह कहता है जैसा है, वैसा है। इसमें होने की कोई बात ही नहीं है।
जब कोई ऐसा स्थिर मति हो जाता है, स्थितप्रज्ञ हो जाता है, ऐसा शांत समचित्त हो जाता है, सम्यकत्व को उपलब्ध हो जाता है, जब देखता है जैसा है वैसा है, तो अचानक एक अपूर्व घटना घटती है—दुख और सुख दोनों बराबर हैं। अब यह बहुत हैरानी की बात है। इसे तुम्हें समझने में अड़चन होगी।
इसलिए जैसे सुख बढ़ता है वैसे ही दुख भी बढ़ जाता है। अमीर आदमी ज्यादा दुखी होता है बजाय गरीब आदमी के। संपन्न देश ज्यादा दुखी होते हैं बजाय विपन्न देशों के। आज अमरीका में जैसा दुख है वैसा भारत में नहीं है; हो नहीं सकता। कारण? कारण एक बहुत बहुमूल्य नियम है। जैसे सुख बढ़ता है वैसे दुख बढ़ जाता है, क्योंकि दोनों सदा अनुपात में होते हैं। एक तरफ सुख बढ़ा, दूसरी तरफ दुख बढ़ा। ऐसा ही समझो कि जितना ऊंचा पहाड़ होगा उतनी ही गहरी खाई होगी न उसके पास! पहाड़ बड़ा होने लगा तो खाई बड़ी होने लगी। अब हम एक उपद्रव की आकांक्षा करते रहते हैं सदा, कि खाई तो बिलकुल न हो, पहाड़ खूब ऊंचा हो। यह हो नहीं सकता। अगर खाई नहीं चाहिए तो पहाड़ को भी मिटा देना होगा; तब समतल हो जाएगा।
दुनिया में आदमी सुख बढ़ाने के उपाय करता है और साथ ही साथ दुख बढ़ता जाता है, दुख बढ़ेगा। इससे तुम्हें एक बात समझ में आ जाएगी, समस्त महाज्ञानियों ने यह कहा है कि दुख को घटाने की फिकर मत करो और सुख को बढ़ाने की फिकर मत करो। सुख और दुख को स्वीकार कर लो। तुम घटाने-बढ़ाने की बात ही छोड़ दो। तुमने सुख बढ़ाया तो दुख भी बढ़ जाएगा, इधर तिजोरी में रुपये बढ़ेंगे, वहां शरीर में बीमारियां बढ़ेंगी। इधर बिस्तर सुंदर हो जाएगा और नींद तिरोहित हो जाएगी। यह रोज हो रहा है। यह तुम जानते हो। यह तुम्हारी जिंदगी में हो रहा है। मगर यह सत्य इतना कडुवा है कि तुम इसे स्वीकार करना नहीं चाहते। तुम इसको मद्देनजर किए रहते हो। तुम इसको उपेक्षा से टाले रहते हो। तुम कहते हो कि नहीं, ऐसे कैसे? सुख बढ़ जाएगा, दुख को घटा लेंगे। सुख को बड़ा कर लेंगे।
पर तुमने देखा? जितनी बड़ी सफलता होती है उतनी ही बड़ी विफलता की संभावना बढ़ जाती है। तुम जितनी ऊंचाई पर चलोगे उतने ही नीचे गिर जाने का डर भी साथ ही साथ बड़ा हो गया है। गिरोगे तो बहुत नीचे गिरोगे। और गिरना पड़ता ही है। गिरना पड़ेगा ही। मगर आदमी सोचता है कुछ होता कुछ है। आदमी जिंदगी के नियम को देखता ही नहीं।
यहां जीवन में सब चीजें समतुल हैं, नहीं तो जिंदगी बिखर जाए। अनुपात है। दिन है तो रात है, सर्दी है तो गर्मी है, जन्म है तो मृत्यु है, सुख है तो दुख है, सफलता है तो विफलता है। इसीलिए तो सारे ज्ञानी कहते रहे हैं—समभाव। दोनों को बराबर मानो। दोनों बराबर हैं। तुमने एक को बढ़ाया तो दूसरा भी बढ़ जाएगा। तुम्हारी आकांक्षा का कोई संबंध नहीं है। जीवन का नियम यह है। जैसे किसी वृक्ष को अगर आकाश में ऊंचा उठना हो, तो उसको अपनी जड़ें पाताल में गहरी भेजनी पड़ेंगी। अब वृक्ष चाहे कि जड़ें तो गहरी न जाएं और मैं ऊंचा उठ जाऊं तो यह नहीं हो सकता। जितना ऊपर उठेगा उतना पाताल में गहरा भी उतरेगा।
नीत्शे का बहुत प्रसिद्ध वचन है: जो स्वर्ग को छूना चाहता है, उसे अपनी जड़ें नरक तक पहुंचानी होंगी। बिना नरक को छुए कोई स्वर्ग को नहीं छू सकता। इसलिए एक बड़ा अपूर्व जीवन का नियम समझ में आ जाए तो काम का होगा, बहुत काम का होगा। सुख को बढ़ाने की फिकर मत करना, दुख को घटाने की फिकर मत करना। इसमें हम व्यर्थ ही समय खराब करते हैं। अगर तुम दुख घटाने की फिकर करोगे तो सुख घट जाएगा। अगर तुम सुख को बढ़ाने की कोशिश करोगे, दुख बढ़ जाएगा। दोनों साथ चलेंगे। ये गाड़ी के दो चाक हैं। एक को छोटा और एक को बड़ा तुम न कर सकोगे। नहीं तो गाड़ी टूट कर गिर जाएगी। यह साथ ही साथ बड़े-छोटे होते हैं, तो ही गाड़ी चल पाती है।
तो फिर आदमी क्या करे? आदमी स्वीकार करे। जैसा है उसे वैसा स्वीकार कर ले। अपनी तरफ से चेष्टा ही न करे। बजाय बदलाहट करने के देखे कि जीवन का रहस्य क्या है। और जिस दिन तुम्हें यह दिख जाएगा, दोनों चीजें समान हैं, तब तुम चमत्कृत हो जाओगे। तब आखिरी हिसाब में भिखमंगा भी उतने ही दुख पाता है, उतने ही सुख, जितना सम्राट दुख पाता है और सम्राट सुख। अनुपात बराबर होता है। अनुपात में जरा भी फर्क नहीं होता। अगर भिखमंगे के पास दो दुख हैं तो दो सुख हैं। अगर सम्राट के पास दो करोड़ सुख हैं तो दो करोड़ दुख हैं। अनुपात बराबर है; वह दो और दो का ही है। इसमें कोई अंतर नहीं पड़ता। तुम दुख के ऊपर एक आंकड़ा बढ़ाओ, एक आंकड़ा सुख पर बढ़ जाता है।
यह तुम्हें समझ में आ जाए तो तुम बड़े चकित होओगे। तो यहां भिखमंगे और सम्राटों में कोई बहुत फर्क नहीं है। माना कि सम्राट के पास सोने के लिए बड़ी सेज सुंदर है, मगर नींद कहां? और माना कि भिखमंगे के पास सेज है ही नहीं, सो जाएगा कहीं पटरी पर, लेकिन नींद है। सोएगा तो घोड़े बेच कर सो जाता है; हालांकि घोड़े नहीं हैं, मगर घोड़े बेच कर सो जाता है। सम्राट के पास घोड़े बहुत हैं लेकिन घोड़े बेच कर नहीं सो पाता। सो ही नहीं पाता। सम्राट के पास भोजन तो सभी तरह के हैं सुस्वादु लेकिन भूख खो गई है। भूख लगती ही नहीं। भिखमंगे के पास भोजन तो बिलकुल नहीं है। रूखा-सूखा मिल जाए तो बहुत धन्यभाग। मगर जब मिल जाता है तो जो स्वाद उपलब्ध होता है वह किसी सम्राट को उपलब्ध नहीं होता। साथ-साथ है, अनुपात बराबर है।
जगत में सभी कुछ संतुलित है। इस संतुलन को देख लेना सम्यकत्व है। इस संतुलन को देखने से आदमी समता में थिर हो जाता है। तब एक अलग घटना घटती है—न तो सुख ज्यादा है, न दुख ज्यादा है, सब बराबर है। अचुनाव पैदा होता है। आदमी निर्विकल्प होने लगता है। चुनना ही क्या है, जब सब बराबर है! मित्र बढ़ाओ, शत्रु बढ़ जाते हैं; तो फायदा क्या है? तो फिर जैसा है, ठीक है। जैसा है ठीक है, ऐसी चित्त की दशा शांत, निर्विघ्न हो जाता है। निर्धूम जलने लगती है भीतर की ज्योतिशिखा।
तो ज्ञानी को न तो सुख ज्यादा, न दुख ज्यादा। और जिसको यह दिखाई पड़ गया कि सुख-दुख बराबर हैं, जिसने दोनों को ठीक से देख लिया, उसे एक तीसरी बात दिखाई पड़ती है कि मैं सुख-दुख के पार हूं। मैं अलग हूं। सुख आते, दुख जाते, दुख आते, सुख जाते, लेकिन मैं तो खड़ा देखता रहता मैं साक्षी मात्र हूं। इस साक्षी में आनंद का जन्म होता है।
आनंद सुख नहीं है। आनंद सुख से उतना ही भिन्न है जितना दुख से भिन्न है। आनंद को तुम यह मत समझना कि महासुख। कि बहुत-बहुत सुख जोड़ दिए तो आनंद बन जाएगा। आनंद का कोई संबंध सुख से नहीं है। आनंद उस चित्त-दशा का नाम है जहां तुमने सुख और दुख दोनों की सचाई पहचान ली और तुम दोनों से अलग हो गए। आनंद स्वभाव है। सुख-दुख आते हैं, आनंद है। सुख-दुख घटते हैं, आनंद सदा से है। जिस दिन भी तुम समतुल हो जाओगे उसी दिन आनंद का अनुभव शुरू हो जाएगा। आनंद मौजूद ही है तुम्हारे भीतर; सिर्फ तुम बाहर उलझे हो। कभी दुख में उलझे हो कि दुख न हो; कभी सुख में उलझे हो कि जरा ज्यादा देर रह जाए; तो तुम भीतर लौट कर नहीं देख पाते।
और जिसको यह दिखाई पड़ गया कि मैं आनंद हूं, उसके लिए समय मिट जाता है। सुख में लगता है, क्षण में गया। दुख लगता है खूब टिकता है। बीत जाने पर अज्ञानी को लगता है सुख खूब था, दुख बिलकुल नहीं था। ज्ञानी को पता चलता है, न तो सुख-दुख है, न समय है। कालातीत समय-शून्य अवस्था उपलब्ध होती है। न कुछ अतीत है, न कुछ वर्तमान है, न कुछ भविष्य है, सब ठहरा हुआ है। सब थिर है, अचल है। जिस दिन अपने भीतर की अचलता का अनुभव होता है उसी दिन ठहर जाता है। तो ज्ञानी को समय ही मिट जाता है।
ओशो, काम की अनुभूति होती है, प्रेम की अनुभूति भी होती है लेकिन भक्ति-रस की अनुभूति कैसे होती है?
नास्तिक को, भौतिकवादी को, चार्वाकवादी को, प्रेम की अनुभूति भी नहीं होती। फ्रायड तो कहता है कि प्रेम कुछ भी नहीं है, बस काम का ही विकार है। प्रेम की भी कोई अनुभूति नहीं है। जो मानता कि मनुष्य शरीर पर ही समाप्त है, उसके पार, इसके भीतर कुछ है ही नहीं उसे प्रेम की अनुभूति भी कैसे होगी? बस काम ही की अनुभूति हो सकती है।
चार्वाक ने कहा है, जरा भी फिकर न करें पाप की या पुण्य की; और जरा भी चिंता न करें कर्मफलों की, क्योंकि आत्मा तो है ही नहीं। न तो कोई आएगा लौट कर, न कोई फल लेने वाला बचेगा। ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत। अगर ऋण लेकर भी घी पीने को मिले तो छोड़ें ना, पी लें। इसकी भी फिकर न करें कि चुकाना है, क्या चुकाना है, किसको चुकाना है! और इससे डरें नहीं कि मरने के बाद कोई कयामत होगी, कोई परमात्मा होगा। न कोई परमात्मा है, न कोई पूछने वाला है। ऋण लेकर भी घी पी लें। चोरी करके भी अपनी कामवासना को तृप्त कर लें। किसी भी भांति हो, येन केन प्रकारेण। किसी भी विधि से हो, अपने भोग को सिद्ध करें। तो जिसने मान रखा है कि मैं शरीर हूं उसे तो प्रेम की भी अनुभूति नहीं होती।
मैं तुम्हें इसलिए यह कह रहा हूं ताकि तुम्हें पता चल जाए कि तुम्हारी मान्यता से अंतर पड़ता है। तुमने पूछा है, काम की अनुभूति होती है, और प्रेम की भी अनुभूति होती है। क्योंकि दो बातें तुम मानते हो। एक तो तुम मानते हो कि मैं शरीर हूं और एक तुम मानते हो कि मैं मन हूं। तो प्रेम की अनुभूति होती है। अगर तुम्हारे जीवन में तीसरी बात की प्रतीति भी उठ आए कि मैं आत्मा हूं तो भक्ति की अनुभूति होनी शुरू होगी, उसके पहले नहीं होगी।
ये तीन तल है—शरीर यानी काम, मन यानी प्रेम, आत्मा यानी भक्ति। तो जब तक तुम शरीर ही मानोगे तब तक काम ही काम रहेगा। जब तुम थोड़े शरीर से ऊपर उठोगे, मन को भी स्वीकार करोगे तो फिर प्रेम की किरणें उठेंगी। जब तुम मन के भी पार उठोगे और आत्मा को स्वीकार करोगे तो—तो ही केवल भक्ति-रस का स्वाद आएगा।
तुम्हारा प्रश्न ईमानदारी का है। ऐसा ही हो रहा है। अधिक लोगों को काम की ही अनुभूति होती है, प्रेम की भी नहीं होती। थोड़े से लोगों को प्रेम की अनुभूति होती है। और विरले लोगों को भक्ति की अनुभूति होती है। भक्ति कामवासना का आमूल रूपांतरण है। प्रेम में कामवासना थोड़ी सी बदलती है, बहुत थोड़ी सी बदलती है। बहुत ज्यादा नहीं, थोड़ी बदलाहट होती है। लेकिन फिर फिर वापस कामवासना में गिर जाती है ऊर्जा। लेकिन थोड़ी बदलाहट होती है। भक्ति में आमूल बदलाहट हो जाती है। जड़ों से बदलाहट हो जाती है। फिर गिरने का उपाय नहीं रह जाता है। जो भक्ति में पहुंच गया है फिर उसके जीवन में कामवासना नहीं रह जाती। जो कामवासना में है उसके जीवन में भक्ति नहीं हो सकती। प्रेम दोनों के बीच का सेतु है, दोनों को जोड़ता है।
तो तुम घबड़ाना मत, अगर प्रेम की अनुभूति होती है तो तुम ठीक रास्ते पर हो। सेतु तक तो पहुंच गए हो। एक किनारे काम है। दूसरे किनारे भक्ति है। बीच में यह सेतु है, यह पुल है प्रेम का। तुम इसमें मध्य में आकर खड़े हो गए हो। थोड़ी चेष्टा करो तो भक्ति की धारा बहेगी।
क्या चेष्टा करो जिससे भक्ति की धारा बहे? तुमने देखा? चौदह साल तक बच्चा बड़ा होता है तब तक काम की धारा नहीं बहती। क्योंकि अभी उसका काम पुष्ट नहीं है। अभी काम ऊर्जा तैयार नहीं है। चौदह वर्ष की उम्र में अचानक काम ऊर्जा पकेगी और एक विस्फोट होगा। चौदह वर्ष तक लड़के लड़कियों के साथ खेलना भी पसंद नहीं करते। कोई लड़का खेलता भी हो लड़कियों के साथ तो कहते हैं कि तू लड़की है क्या?
मैंने सुना, एक घर में एक आठ साल के बच्चे ने, मां से नाराज हो गया और अपने को जाकर बाथरूम में बंद कर लिया भीतर से। लाख मां ने सिर पटका, चिल्लाई, रोई, डांटा, समझाया, बुझाया, फुसलाया की, रिश्वत देने की बात की, मगर वह गुपचुप खड़ा ही रह गया अंदर। वह बोले ही नहीं। तब तो मां घबड़ाई। पति परदेस गए। वह और मुश्किल में पड़ी। पड़ोसियों को बुला लिया। पड़ोसी भी...जब देखा लड़के ने कि पड़ोसी भी आ गया तो उसको और मजा आया होगा। वह बिलकुल ही सन्नाटा बांध कर खड़ा हो गया। वह बिलकुल ध्यानी हो गया। वे दरवाजा पीटें मगर वह बोले ही नहीं। तो और घबड़ाहट बढ़ने लगी कि श्वास चल रही है इसकी कि नहीं! जिंदा है कि मर गया? हुआ क्या? सब उसकी मां को डांटने लगे कि ऐसा थोड़े ही व्यवहार करना चाहिए! उसने कहा: कुछ खास व्यवहार नहीं किया। जैसा रोज का व्यवहार है...किसी बात पर नाराज हो गई। इतना बिगड़ जाएगा यह तो सोचा नहीं।
कोई उपाय न देख कर किसी ने सलाह दी कि अब तो एक ही रास्ता है कि आग बुझाने वालों को खबर करो। उनको पता रहता है कैसे दरवाजा तोड़ें, या ऊपर से उतरें या क्या करें, या खिड़की से जाएं। तो आग बुझाने वालों को खबर की वे आए। उनके प्रधान ने आकर पूछा, आग कहां लगी है? महिला ने कहा: आग कहीं भी नहीं लगी। आप क्षमा करें, मगर मामला यह है। यह बच्चा अंदर हमें पता ही नहीं चल रहा कि जीवित है, या बेहोश हो गया, या मूर्च्छित हो गया या क्या हुआ। बोलता ही नहीं है, न आवाज जवाब देता है।
उसने कहा: कोई फिकर नहीं, मैं अभी देखता हूं। वह जाकर अंदर पहुंचा। दरवाजा खटखटाया। और कहा: लड़की बाहर निकल। वह लड़का बोला: कौन कह रहा है मुझसे लड़की? अभी तक बोला ही नहीं था वह। जल्दी से दरवाजा खोल कर बाहर आ गया। उसने कहा किसने मुझसे लड़की कहा? मैं लड़का हूं।
चौदह साल की उम्र तक तो लड़के लड़कियों के साथ खेलने में भी डरते हैं, संकोच भी करते हैं। और बात ही फिजूल लगती है। लड़कों को लड़कों में रस होता है। लड़कियों को लड़कियों में रस होता है। अभी काम-ऊर्जा पकी नहीं।
अगर आठ साल का बच्चा तुमसे पूछे कि काम का संबंध कैसा होता है। तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। कैसे समझाओगे? तुम मुझसे पूछ रहे हो भक्ति का रस कैसा होता है? वैसा ही मुश्किल में तुम मुझे डाल रहे हो। आठ साल के बच्चे को कैसे समझाओगे कि संभोग का रस कैसा होता है? समझाओगे भी तो समझा न पाओगे। कहोगे भी तो खुद भी समझोगे साथ-साथ कि यह बात बेकार की कह रहा हूं, यह इस तक पहुंचेगी नहीं। अनुभव ही अनुभव को समझ पाता है। तुम उससे कहोगे, रुक, थोड़ा ठहर। जरा बड़ा हो जा, खुद ही जान लेगा। यह तो संयोग—सौभाग्य है, चौदह साल में सभी काम की दृष्टि से प्रौढ़ हो जाते हैं, लेकिन भक्ति की दृष्टि से तो बहुत कम लोग प्रौढ़ होते हैं। पूरी जिंदगी निकल जाती है। होना तो नहीं चाहिए। दुर्भाग्य है।
चौदह साल की उम्र में काम-ऊर्जा परिपक्व होती है और पहली दफा कामवासना उठती है। लड़के लड़कियों में उत्सुक होने लगते हैं, लड़कियां लड़कों में उत्सुक होने लगती हैं। अब उनकी पुरानी दोस्तियां ढीली पड़ने लगती हैं—लड़कों से लड़कों की, लड़कियों से लड़कियों की। एक नया रस पैदा होता है विपरीत में। जिसमें कल तक कोई रस नहीं था, जिससे कल तक बचे थे, आज उसमें ही रस जगता है। आज उसमें ही सारे जीवन का सुख मालूम होता है। इसीलिए चौदह साल के पहले जो दोस्ती बन गई, बन गई। उसके बाद फिर दोस्तियां नहीं बनतीं। बचपन की दोस्ती टिकती है। चौदह साल के बाद जो दोस्तियां बनती हैं, बस कामचलाऊ होती हैं। बचपन की दोस्ती बात ही और है। बचपन की दोस्ती तो ऐसी भी होती है कि अगर बचपन का दोस्त तुम्हारे घर आ जाए तो तुम्हारी पत्नी ईर्ष्या करती है क्योंकि वह उससे पहले तुम्हारे जीवन में आया था और उससे गहरी उसकी जड़ें गई हैं। बचपन के दोस्त पत्नियां पसंद नहीं करतीं। बचपन की सहेलियां को पति भी पसंद नहीं करते। क्योंकि उनसे भी पहले कोई, यह बात जरा कष्ट देती है, अहंकार को चोट पहुंचाती है।
लेकिन चौदह साल के बाद फिर दोस्ती नहीं बनती। क्योंकि अब एक नई दुनिया शुरू हो गई। अब कामचलाऊ क्लब की दोस्ती होगी, बाजार की दोस्ती होगी, दुकान की दोस्ती होगी, मगर कामचलाऊ। इसलिए तो तुम कहते हो बचपन की दोस्ती फिर क्यों नहीं बनती? अब एक नया प्रयोग शुरू हुआ जीवन में। अब स्त्री की पुरुष से दोस्ती बनेगी, स्त्री की पुरुष से। पुरुष की स्त्री से दोस्ती बनेगी। विजातीय लिंग में रस शुरू हुआ। अगर यह गति ठीक से बढ़ती रहे तो एक दिन प्रेम का भी जन्म होता है—लेकिन अगर ठीक से बढ़ती रहे। अक्सर ऐसा हो नहीं पाता।
अगर तुम किसी स्त्री के प्रेम में बहुत गहरे उतर गए, उसकी वासना में बहुत गहरे उतर गए तो आज नहीं कल उसकी देह के साथ-साथ उसके भीतर के चैतन्य की भी थोड़ी तो झलक मिलनी शुरू होगी। तो धीरे-धीरे काम प्रेम में रूपांतरित होता है। इसलिए जिन लोगों ने भी मनुष्य को समझने की कोशिश की उन सब ने यह कहा है कि अगर एक ही व्यक्ति से काम के संबंध ज्यादा देर तक रह जाएं तो अच्छा। नहीं तो प्रेम पैदा ही नहीं हो पाएगा कभी। इसलिए पश्चिम में प्रेम खो रहा है। दो-तीन साल में स्त्री बदल ली, दो तीन साल में पुरुष बदल लिया।
तो ऐसे ही हो गया जैसे आदमी कार बदल लेता है। नया मॉडल आया तो कार बदल ली। तो प्रेम का रोपा जम ही नहीं पाएगा। प्रेम के रोपे के जमने के लिए थोड़ा समय चाहिए, थोड़ी अवधि चाहिए। पश्चिम से प्रेम खो रहा है हालांकि प्रेम की बहुत बातचीत हो रही है। अक्सर ऐसा होता है कि जो चीज खो जाती है उसकी खूब बातचीत होती है। फिर बातचीत ही रह जाती है। बातचीत ही इसीलिए होती है कि चीज खो गई। जब चीज होती है तो कौन बात करता है? जब चीज खो जाती है तो लोग बात करते हैं। ऐसे ही जैसे तुम्हारा एक दांत टूट जाए तो जीभ वहीं-वहीं जाती है। जब तक था तब तक कभी नहीं जाती थी। अब नहीं है, वहीं-वहीं जाती है—चौबीस घंटे। तुम हजार बार हटा लेते हो। इधर तुम जरा भूले कि जीभ वहां गई। खाली जगह खलती है। पश्चिम में प्रेम की चर्चा हो रही है। बड़ी किताबें लिखी जाती हैं, बड़े विवाद, बड़ा विचार, बड़े वैज्ञानिक परीक्षण। दांत टूट गया है, जीभ वहीं-वहीं जाती है। प्रेम खो गया है। अब सिर्फ बातचीत रह गई है।
प्रेम के लिए जरूरी है कि काम का संबंध एक अवधि तक गहरा हो। एक स्त्री, एक पुरुष का संबंध खूब गहराई में जाए। इतनी गहराई में जाए कि धीरे-धीरे वह एक-दूसरे के शरीर को छूने की बजाय एक-दूसरे के मन को छूने लगें। मन गहरे में है, उतनी गहराई के लिए थोड़ा समय चाहिए। प्रेम मौसमी फूल नहीं है। काम तो मौसमी फूल है। डाल दिया, छह सप्ताह में फूल आ जाएंगे; मगर बाकी छह सप्ताह में चले भी जाएंगे। तीन चार महीने की जिंदगी ही है। जल्दी खिल आएंगे, जल्दी मुरझा भी जाएंगे। लेकिन अगर तुम्हें कोई वृक्ष लगाना हो जो आकाश छूता हो, चांद-तारों से बात करता हो तो छह सप्ताह में नहीं लगते ऐसे वृक्ष। वर्षों लगते हैं, पीढ़ियां लगती हैं। समय बीतता। अवधि चाहिए।
तो अगर काम का संबंध गहरा हो जाए, इतना गहरा हो जाए कि तुम्हें अपनी पत्नी की देह स्मरण ही न रहे, पत्नी को तुम्हारी देह स्मरण न रहे तो धीरे-धीरे प्रेम की झलकें, प्रेम झलक मारना शुरू करेगा। अगर ठीक से सब चलता रहे तो मेरे हिसाब में अट्ठाइस साल की उम्र में प्रेम की पहली झलक मिलती है। जैसे चौदह साल की उम्र में काम की पहली झलक मिलतीहै। चौदह साल अगर कामवासना का संबंध बड़ी निष्ठा से, पूजा से, तांत्रिक-भाव से—सिर्फ काम-भोग से नहीं बल्कि एक गहन जीवन के प्रयोग की भांति चले तो अट्ठाइस वर्ष के करीब कहीं झलक मिलनी शुरू होती है प्रेम की। पहली दफा प्रेम का अवतरण होता है। पहली दफा तुम्हें लगता है कि देह मूल्यवान नहीं रही, देह गौण हो गई।
और अगर यह न हो जाए अट्ठाइस साल की उम्र में तो अट्ठाइस साल की उम्र के करीब तलाक आना निश्चित है क्योंकि शरीर से तो चुक गए तुम। अगर प्रेम का संबंध जुड़ गया तो ठीक है, शरीर से तो चुक गए। अब यह शरीर तो देख लिया चौदह साल तक। अब इसमें कुछ रस नहीं रहा। अगर नया संबंध गहरे तल पर बन गया तो ही विवाह टिकेगा, अन्यथा तुम नई पत्नी खोजोगे, नया पति खोजोगे, जिससे फिर से शरीर का रस शुरू हो। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि तुम फिर जिस दिन नई पत्नी खोजी उस दिन तुम फिर चौदह साल की उम्र में गिर गए। इसलिए अमरीकन आदमी में तुम पाओगे प्रौढ़ता की कमी। वह बचकाना लगता है, अप्रौढ़ लगता है। बूढ़ा भी हो जाए तो बचकाना लगता है, कुछ बात कम लगती है। जैसे कुछ बुद्धिमत्ता पैदा नहीं होती। क्या कारण होगा?
पैंसठ साल की एक स्त्री ने मुझे कुछ दिन पहले पूछा कि मैं यहां आई हुई हूं, तीन महीने हो गए, और कोई पुरुष यहां मुझसे प्रेम करता ही नहीं। तो मैं वापस चली। पैंसठ साल...! वह प्रसन्न नहीं थी यहां क्योंकि कोई पुरुष उसको प्रेम नहीं करता। पश्चिम में उसे प्रेम करने वाले मिल जाएंगे। पूरब में मुश्किल होगी। क्योंकि पश्चिम में जो पैंसठ साल के हो गए हैं, सत्तर साल के हो गए हैं, उनकी भी मानसिक उम्र चौदह साल से ऊपर नहीं गई है। वे मिल जाएंगे। पश्चिम में बूढ़ों के लिए जो स्थान बनाए जाते हैं—वृद्धाश्रम जैसी चीजें, वहां खूब प्रेम चलता है। बूढ़े अस्सी साल के बूढ़े प्रेम में पड़ जाते हैं। ज्यादा कुछ अब कर भी न सकेंगे।
मैंने सुना है, एक बूढ़े आदमी ने नब्बे साल की उम्र में शादी कर ली। पचासी साल की स्त्री, नब्बे साल का बूढ़ा, शादी कर ली। पहली रात सुहागरात! बूढ़े ने बुढ़िया का हाथ पकड़ा, खूब दबाया। फिर दोनों बड़े मग्न होकर सो गए। दूसरी रात उतना नहीं दबाया। बूढ़े ही...! बस थोड़ा सा दबाया, सो गए। तीसरी रात जब बूढ़ा दबाने लगा तो बुढ़िया ने कहा: मेरे सिर में दर्द है; और करवट लेकर सो गई। नब्बे साल की उम्र में कामवासना होगी तो इसी तरह की मूढ़ता होगी। होनी स्वाभाविक है क्योंकि अप्राकृतिक है यह घटना।
अगर जीवन का विकास ठीक से चले तो अट्ठाइस साल की उम्र में प्रेम का स्वर पहली दफा सुनाई देगा। जिसके साथ चौदह साल तुम रहे हो, जिसके शरीर के साथ तुम्हारा शरीर हिल-मिल गया, एक हो गया, जिसके शरीर की वीणा तुम्हारे शरीर की वीणा से लयबद्ध हो गई, दो देहें अब दो देहें जैसी नहीं रह गई। अब दोनों देहों के बीच एक सेतु बन गया है। अब पहली दफा समझ में आएगा कि दूसरा एक प्राणवान मन है। देह गौण हो जाएगी, मन महत्वपूर्ण हो जाएगा।
तो पति-पत्नी अगर सच में एक-दूसरे के प्रेम में हों, तो एक-दूसरे के मन की उन्हें समझ आनी शुरू हो जाती है। पति कहता भी नहीं और पत्नी समझ लेती है कि उसके मन में क्या है। पत्नी कहती भी नहीं और पति समझ लेता है कि उसके मन में क्या है। ऐसी बात न आ जाए तो समझना कि अभी तुम पति-पत्नी हुए ही नहीं। अभी असली बात नहीं घटी। एक-दूसरे के भीतर बात उठती है। और दूसरा समझ लेता है। एक तरह की विशिष्ट टेलीपैथी शुरू हो जाती है। विचारों का संप्रेषण शुरू हो जाता है। पति उदास है तो पत्नी को धोखा नहीं दे पाता। सारी दुनिया को धोखा दे ले, उसकी मुस्कुराहट सब जगह उसके लिए सुविधा बना देती है लेकिन पत्नी को वह मुस्कुराएगा तो भी पत्नी जानती है कि आज तुम्हारी मुस्कुराहट में उदासी है। कुछ बात है, तुम कहो। पत्नी पति को धोखा नहीं दे पाती। जिस दिन पति पत्नी एक-दूसरे को धोखा भी देना चाहें, छिपाना भी चाहें और न छिपा पाएं, दूसरे तक बात पहुंच ही जाए, संक्रमण हो ही जाए, उस दिन समझना कि प्रेम हुआ।
तो मैं नहीं जानता जिन्होंने प्रश्न पूछा है उन्होंने प्रेम को जाना है या नहीं। उन्होंने कहा तो मैं मान लेता हूं कि जाना होगा। लेकिन प्रेम को जानना भी दुरूह है—दुरूह हो गया है। और अगर प्रेम फिर चौदह साल तक साथ चल जाए तो करीब बयालीस साल की उम्र के पास भक्ति-रस पैदा होता है। चौदह साल कामवासना का गहरा संबंध, प्रेम की तरंग को उठाता है, चौदह साल का दो मनों के बीच गहरा संबंध आत्मा की तरंग को उठाता है, भक्ति-रस शुरू होता है।
यह कुछ लकीर के फकीर मत बन जाना कि मैं कहता हूं कि बयालीस तो बयालीस। सिर्फ काम के लिए कह रहा हूं ताकि तुम्हारी समझ में आ जाए। पैंतालीस हुआ तो चलेगा, अड़तालीस हुआ तो चलेगा। मरने के एक दिन पहले भी अगर भक्ति रस हो जाए तो भी चलेगा। मगर वह भी नहीं हो पाता। अकसर लोग कामवासना में ही उलझे रह जाते हैं। कुछ लोग जो कामवासना से उठने में सौभाग्यशाली हैं, वे फिर भी प्रेम में पड़े रह जाते हैं। बहुत कम लोगों के जीवन में हरिभक्ति पैदा होती है।
‘अब तुम मुझसे पूछते हो कि भक्ति-रस की अनुभूति कैसे होती है?’
अगर तुम्हें प्रेम का अनुभव हुआ है—तुम कहते हो मैं मान लेता हूं—तो अब इस प्रेम के अनुभव में गहरे उतरो। अब इस प्रेम को जीयो, इसकी सर्वांगीणता में जीयो। इस प्रेम में बाधाएं खड़ी न करो। छोटी-छोटी झंझटें, छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे उपद्रव खड़े मत करो। सारी बाधाएं हटा दो। अब इस प्रेम को पूरा तरंगित होने दो। यही तरंग बड़ी होते-होते...काम की तरंग बड़ी होकर प्रेम बन जाती है, प्रेम की तरंग बड़ी होकर भक्ति बन जाती है।
इसलिए तो मैं कहता हूं, किसी को संसार छोड़ कर भागने की जरूरत नहीं है। इसी संसार में परमात्मा छिपा है। जैसे दूध को तुम दही बना लेते हो। दही दूध में छिपा था। फिर दही से तुम मक्खन निकाल लेते। मक्खन भी दही में छिपा था। ऐसा ही मामला है। कामवासना यानी दूध। इसे जमाया तो दही बनता है—प्रेम। फिर दही को मथा तो नवनीत—भक्ति।
प्रेम को मथो। प्रेम को खूब मथो। अहर्निश मथो। और भूल कर भी मत सोचना कि परमात्मा तुम्हारी पत्नी या पति के विपरीत है। परमात्मा का आगमन तुम्हारे प्रेम के द्वार से ही होगा। इसलिए मैं संसार के जरा भी विरोध में नहीं। अपने संन्यासियों को कहता हूं, कहीं भाग कर मत जाना, नहीं तो चूक जाओगे। यहीं है। यहीं ठीक से समझो। दूध से घबड़ा मत जाना, नहीं तो दही नहीं जमेगा। और दही को फेंक मत देना कि खट्टा है, नहीं तो नवनीत न निकाल पाओगे। नवनीत छिपा है, उसे खोजना है।
दो शरीर का संबंध--काम।
दो मनों का संबंध--प्रेम।
दो आत्माओं का संबंध--भक्ति।
स्वभावतः दो शरीर का संबंध क्षणभंगुर होगा! दो शरीर इतने स्थूल हैं, एक क्षण को भी करीब आ जाते हैं यह भी चमत्कार है। दो मनों का संबंध थोड़ा स्थाई होगा। शरीर से ज्यादा स्थाई होगा, ज्यादा सुखदायी होगा, ज्यादा रसपूर्ण होगा, ज्यादा तृप्ति लाएगा। लेकिन फिर भी दो मन अलग-अलग हैं।
दो आत्माएं जब मिलती हैं तो क्रांति घटती है, क्योंकि दो आत्माएं वस्तुतः दो नहीं हैं। आत्मा तो एक ही है संसार में। मेरी आत्मा अलग और तुम्हारी आत्मा अलग, ऐसा नहीं है। मेरा शरीर अलग, तुम्हारा शरीर अलग—सच, लेकिन मेरी आत्मा और तुम्हारी आत्मा अलग-अलग नहीं है। मेरा शरीर और तुम्हारा शरीर बिलकुल अलग-अलग, मेरा मन और तुम्हारा मन खूब मिला-जुला, और मेरी आत्मा और तुम्हारी आत्मा एक।
तो अगर एक आत्मा से भी तुम्हारा पूरा भक्ति का संबंध बन जाए, पत्नी में तुम्हें परमात्मा दिखाई पड़ जाए और पति में तुम्हें परमात्मा दिखाई पड़ जाए...वही तो अर्थ था पुराने दिनों में, जब हम कहते थे पति में परमात्मा। चूक इतनी ही हो गई थी कि वह अधूरी बात थी। पत्नी में भी परमात्मा कहा जाना चाहिए। जिस दिन तुम्हें अपने प्रिय में परमात्मा दिखाई पड़ जाए उस दिन तुम आंख खोल कर देखोगे और तुम्हें परमात्मा सब तरफ दिखाई पड़ेगा। पौधों में, पक्षियों में, पशुओं में, पहाड़ों में, सब तरफ परमात्मा दिखाई पड़ेगा आंख जब जान लेती है एक दफा भक्ति के रस को, आंख पर जब सावन उतर आता है भक्ति का, तो सब तरफ सावन दिखाई पड़ने लगता है।
ओशो, आपमें असंभव संभव हुआ है, अघट घटित हुआ है। और आपको समझना भी असंभव सा ही लगता है। ऐसा क्यों?
क्यों? क्योंकि जब तुम समझने बैठते हो तब तुम बुद्धि को बीच में ले आते हो। तुम पूरे वक्त सजग होकर देख रहे हो कि कौन सी बात ठीक, कौन सी बात ठीक नहीं। कौन सी बात ठीक नहीं। कौन सी बात तर्क के अनुकूल, कौन सी बात तर्क के प्रतिकूल। कौन सी बात मेरे शास्त्र के अनुकूल, कौन सी बात मेरे शास्त्र के प्रतिकूल। तुम इस सब उधेड़बुन में पड़ जाते हो। वह शास्त्र की धूल तुम्हारे भीतर अंधड़ होकर उठने लगती है। तुम मुझे तो भूल ही जाते हो। उस अंधड़ में तुम्हें कभी-कभी कुछ-कुछ सुनाई पड़ता है। कुछ का कुछ भी सुनाई पड़ता है। और फिर तुम व्याख्या कर लेते हो। फिर तुम अपने हाथ से उलझन खड़ी कर लेते हो।
ये बातें समझने की नहीं हैं। ये बातें प्रेम में उतरने की हैं। तुम सिर्फ सुनो। क्या फिकर समझने की? समझे तो ठीक, न समझे तो ठीक। यह समझने का हिसाब ही अलग रख दो। यह समझने की दुकानदारी की हटा दो। तुम सिर्फ सुन लो। ऐसे सुन लो, जैसे कोई झरने का कल-कल नाद सुनता है। वहां तो तुम समझने के लिए नहीं जाते। वहां तो तुम नहीं कहते कि यह झरना कुछ समझ में नहीं आ रहा। कल-कल-कल तो हो रही है, लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा है। समझने को है क्या? झरना है कल-कल है, और क्या समझना है, इसमें डूबो। जब पक्षी गुन-गुन करते तब तुम समझते तो नहीं। मगर कहते हो, बड़ा रस आता है। जब कोई वीणा बजाता है तो तुम क्या समझते हो? लेकिन डोलने लगते हो। ये बातें डोलने की हैं, समझने की नहीं।
मैंने सुना है, लखनऊ का एक पागल नवाब, उसके दरबार में एक संगीतज्ञ आया, बड़ा वीणावादक। उस संगीतज्ञ ने कहा कि बजाऊंगा तो वीणा लेकिन मेरी एक शर्त है। मैं इस बिना शर्त के कभी बजाता ही नहीं। मुझे सुनते वक्त कोई सिर न हिले। नवाब तो पागल था। शायद वाजिद अली हो या कोई और हो, मगर पक्का लखनवी था। उसने कहा: तुम फिकर मत करो। सिर हिला कि उसी वक्त उतरवा देंगे। तलवारें तैयार रखेंगे।
डुंडी पिटवा दी लखनऊ में कि जो लोग सुनने आएं, वे सोच कर आएं। अगर सिर हिला तो गर्दन उतार दी जाएगी। संगीतज्ञ का बड़ा नाम था और लखनऊ के रसिक लोग बड़े दिन से प्रतीक्षा करते थे कि कब यह शुभ घड़ी आएगी कि इसको सुनेंगे। लेकिन यह बड़ी झंझट खड़ी हो गई। लाखों लोग आए होते। दूर-दूर से लोग आए होते सुनने, लेकिन मुश्किल से हजार एक लोग आए। क्योंकि यह बड़ा खतरनाक था। हजार में भी ऐसे ही लोग आए होंगे, जो बिलकुल हर हालत में अपने पर काबू रख सकें। जिनको यम-नियम आसन इत्यादि का पता होगा कि बिलकुल मार कर सिद्धासन बैठ जाएंगे आंख बंद करके। हिलेंगे ही नहीं तो फिर क्या होगा?
आ गए, बैठ तो गए लोग लेकिन सब तैयार होकर बैठ गए। सबने अपने शरीर का अकड़ा लिया कि कभी भूल-चूक में भी हिल जाओ, तो यह पागल नवाब है। फिर यह भी नहीं तय करेगा कि भूल-चूक से कोई मक्खी आ गई थी इसलिए शरीर हिल गया था। यह तो पागल तो पागल। यह सुनेगा नहीं। और उसने चारों तरफ नंगी तलवारें लिए सिपाही खड़े कर दिए। वीणावादक ने वीणा बजाई। कोई दस-पंद्रह मिनट तक तो कोई नहीं हिला, मूर्तियों की तरह लोग बैठे रहे। फिर पांच-सात लोग हिलने लगे, फिर दस-पंद्रह लोग हिले, फिर बीस-पच्चीस लोग हिले, फिर कोई सौ लोग...
नवाब तो घबड़ाने लगा। उसने यह नहीं सोचा था कि कटवाना ही पड़ेगा। मगर अब तो मामला ऐसा है कि कटवाना ही पड़ेगा। अब तो अपना वचन दे दिया है। नवाब तो सुन ही न पाए। वह तो बार-बार यही देखता रहे कि और मरे। कितने लोग गए! सिपाही भी डरने लगे, खड़े थे आस-पास, कि यह नाहक की हत्या होगी। भले-अच्छे लोग हिल रहे हैं। इन पागलों को हुआ क्या है? लेकिन जैसे-जैसे लोग हिलने लगे, संगीतज्ञ डूबने लगा। फिर तो कोई दो-तीन सौ लोग डुबकी लगाने लगे, डोलने लगे, जैसे सांप बीन की आवाज सुन कर डोलने लगे।
आधी रात संगीतज्ञ ने वीणा बंद की। सम्राट ने कहा कि पकड़ लिए जाएं वे लोग। कोई तीन, साढ़े तीन सौ लोग पकड़ लिए गए। संगीतज्ञ ने कहा: बाकी को जाने दें, इनको रोक लें। बाकी चले गए। नवाब ने पूछा: इनका क्या करना? इनको कटवा दें? संगीतज्ञ ने कहा: नहीं, यही तो मेरे सुनने वाले हैं। अब इनको असली सुनाऊंगा। नकली गए। वे जो आसन इत्यादि लगा कर बैठे थे उनको संगीत का कुछ पता नहीं। यही...
पर सम्राट ने कहा: इसके पहले कि तुम इन्हें सुनाओ कुछ और, मैं इनसे पूछना चाहता हूं कि पागलो, हिले क्यों? तुम्हें जिंदगी का कोई लगाव नहीं है? तो उन लोगों ने कहा: हम हिले नहीं। हमें तो पता नहीं। जब तक हमें अपना पता था तब तक तो हम बिलकुल सम्हले बैठे रहे। कौन मरना चाहता है? जब हम लापता हो गए, जब वीणा ही रह गई, जब हम बचे ही नहीं तो फिर कौन रोके कौन सम्हाले? सम्हालने वाला ही विदा हो गया। तो हम यह नहीं कहते हैं कि हम हिले। हम तो नहीं हिले। हम तो जब तक थे तब तक नहीं हिले। फिर जब हम रहे ही नहीं तो फिर हिलना हुआ। परमात्मा ने हिलाया। संगीत ने हिलाया। हम नहीं हिले। हमारा कोई कसूर नहीं है। और संगीतज्ञ ने कहा: ये ठीक कहते हैं। इसलिए इनको चुना है। यही मेरे सुनने वाले हैं, यही मेरे समझने वाले हैं।
यही मैं तुमसे कहता हूं। समझना हो तो बुद्धि को एक तरफ रखो और समझ जाओगे। लेकिन अगर बुद्धि को बीच में लिया और समझने की बहुत खींचातानी की तो चूक जाओगे। ये कुछ बातें ऐसी हैं कि हिलोगे तो समझोगे। ये बातें कुछ ऐसी हैं कि डोलोगे तो समझोगे? ये बातें कुछ ऐसी हैं कि नाचोगे तो समझोगे। ये बातें बुद्धि की पकड़ में आने वाली बातें नहीं हैं। ये पागलों की, दीवानों की बातें हैं। तुम मेरी दीवानगी में सम्मिलित हो जाओ, तुम अगर मेरे पागलपन में हाथ बटाओ तो तो जरूर समझ में आएगी।
तो इस विरोधाभास को मैं फिर से दोहरा दूं—समझना चाहा, समझ में न आएंगी। हिलने की हिम्मत रखी तो कोई तुम्हें समझने से नहीं रोक सकता। यह समझ में आने ही वाली हैं। मगर यह समझ हृदय की है, भाव की है, प्राण की है; बुद्धि की नहीं, विचार की नहीं, भक्ति की है। रस निष्पन्न होती है। रस की निष्पत्ति से आती है, तर्क से नहीं। डोलो। इस मन-मयूर को नाचने दो, जरूर समझोगे।
आज इतना ही।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is it impossible to enter religion through a sect?
According to Osho, yes, you can enter religion even from within a sect—because the Divine is reachable from everywhere. But if you’re in a sect, the ‘way’ is to leave it: break the prison of dogma, don’t cling to footprints of past masters. What liberates is a burning thirst and contact with living truth, not statues, scriptures, or technique.
In simple terms: You can start anywhere, but to truly find God you must drop the group’s cage and follow a living, heartfelt hunger for truth.
More on this question ›Why is understanding Osho considered almost impossible?
According to Osho, understanding him becomes almost impossible when you try to understand, because the very effort recruits the intellect—comparison, logic, scripture—which raises a dust-storm of interpretations and fragments, creating distance and confusion. His message isn’t for analysis but for love-filled listening and immersion, like a waterfall or music; drop the bookkeeping of understanding, simply listen, and genuine understanding happens by itself.
In simple terms: If you stop trying to figure him out with your head and just listen with love, the meaning appears on its own.
More on this question ›How does one experience the rasa of devotion, bhakti-rasa?
According to Osho, bhakti-rasa arises when your identity shifts from body and mind to soul. Body-identity yields sex; mind-identity yields love; soul-identity flowers as devotion—the radical transmutation of sexual energy, with no falling back. Love is the bridge from sex to devotion. Nurture love and consciously disidentify from body-mind; with this third recognition—'I am the soul'—the current of devotion begins to flow.
In simple terms: See yourself as the soul (not just body or mind), let love mature, and devotion naturally appears.
More on this question ›What is the relationship between devotion and awareness?
According to Osho, devotion and awareness are complementary routes to the same disappearance of the ego. Awareness (the meditative, knowing path) purifies step by step, surrendering the 'I' only at the end, whereas devotion surrenders first—an immediate dissolution demanding even greater courage. Both require a fearless heart; devotion strikes the root, awareness trims the branches. When the ego dies—early or late—the divine is realized.
In simple terms: Devotion drops the ‘me’ in one brave jump, while awareness lets it go slowly—both reach the same truth.
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