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Questions in this Discourse
ओशो, यदि ध्यान से जीवन में शांति हो जाती है, तो फिर ध्यान सारे देश में फैल क्यों नहीं जाता है?
हमारी बीमारी भी इतनी कम है कि हम चिकित्सा की तलाश में भी नहीं निकलते। जब बीमारी बढ़ जाती है तो चिकित्सक की खोज शुरू होती है। लेकिन हम बचपन से ही इस भांति पाले जाते हैं कि हम कुछ भी पूरी तरह नहीं कर पाते। न तो हम क्रोध पूरी तरह कर पाते हैं कि अशांत हो जाएं। न ही चिंता पूरी तरह कर पाते हैं कि मन व्यथित हो जाए। न हम द्वेष पूरी तरह कर पाते हैं, न घृणा पूरी तरह कर पाते हैं कि मन में आग लग जाए और नरक पैदा हो जाए। हम इतने कुनकुने जीते हैं कि कभी आग जल ही नहीं पाती और इसलिए पानी खोजने भी हम नहीं निकलते जो उसे बुझा दे। हमारा कुनकुना जीना ही, ल्यूक वार्म लिविंग ही हमारी कठिनाई है।
जब कोई मुझसे पूछता है कि जब शांत होना इतना आसान है तो बहुत लोग शांत क्यों नहीं हो जाते। तो पहली बात तो यह है कि वे अभी ठीक से अशांत ही नहीं हुए हैं। उन्हें अशांत होना पड़ेगा। शांत तो आदमी क्षण भर में हो जाता है, अशांत होने के लिए जन्म-जन्म लेने पड़ते हैं, लंबी यात्रा है। यह इतने जन्मों की हमारी जो यात्रा है, यह शांति की यात्रा नहीं है, शांति तो क्षण भर में घटित हो जाती है। यह इतने जन्मों की यात्रा हमारे अशांत होने की यात्रा है जो हम पूरी तरह अशांत हो जाते हैं। जब अशांति की चरम अवस्था आ जाती है, क्लाइमेक्स आ जाता है, तब हम लौटना शुरू करते हैं।
बुद्ध एक गांव में गए--और जो आज मुझसे आपने पूछा है, एक आदमी ने उनसे भी आकर पूछा। और उस आदमी ने उनसे कहा था कि चालीस वर्षों से निरंतर आप गांव-गांव घूमते हैं, कितने लोग शांत हुए? कितने लोग मोक्ष गए? कितने लोगों का निर्वाण हो गया? कुछ गिनती है? कुछ हिसाब है? वह आदमी बड़ा हिसाबी रहा होगा। बुद्ध को उसने मुश्किल में डाल दिया होगा, क्योंकि बुद्ध जैसे लोग खाताबही लेकर नहीं चलते हैं कि हिसाब लगा कर रखें कि कौन शांत हो गया, कौन नहीं शांत हो गया। बुद्ध की कोई दुकान तो नहीं है कि हिसाब रखें। बुद्ध मुश्किल में पड़ गए होंगे। उस आदमी ने कहा: बताइए, चालीस साल से घूम रहे हैं, क्या फायदा घूमने का? बुद्ध ने कहा: एक काम करो, सांझ आ जाना, तब तक मैं भी हिसाब लगा लूं। और एक छोटा सा काम है, वह भी तुम कर लाना। फिर मैं तुम्हें उत्तर दे दूंगा। उस आदमी ने कहा: बड़ी खुशी से, क्या काम है वह मैं कर लाऊंगा। और सांझ आ जाता हूं, हिसाब पक्का रखना। मैं जानना ही चाहता हूं कि कितने लोगों को मोक्ष के दर्शन हुए? कितने लोगों ने परमात्मा पा लिया? कितने लोग आनंद को उपलब्ध हो गए? क्योंकि जब तक मुझे यह पता न लग जाए कि कितने लोग हो गए हैं, तब तक मैं निकल भी नहीं सकता यात्रा पर। क्योंकि पक्का पता तो चल जाए कि किसी को हुआ भी है या नहीं हुआ।
बुद्ध ने उससे कहा कि यह कागज ले जाओ और गांव में एक-एक आदमी से पूछ आओ, उसकी जिंदगी की आकांक्षा क्या है? वह चाहता क्या है? वह आदमी गया। उसने गांव में--एक छोटा सा गांव था, सौ-पचास लोगों की छोटी सी झोपड़ियां थीं--उसने एक-एक घर में जाकर पूछा। किसी ने कहा कि धन की बहुत जरूरत है। और किसी ने कहा कि बेटा नहीं है, बेटा चाहिए। और किसी ने कहा, और सब तो ठीक है लेकिन पत्नी नहीं है, पत्नी चाहिए। किसी ने कहा, और सब ठीक है, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, बीमारी पकड़े रहती है, इलाज चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए। कोई बूढ़ा था, उसने कहा कि उम्र चुकने के करीब आ गई, अगर थोड़ी उम्र मिल जाए और तो बस, और सब ठीक है। सारे गांव में घूम कर सांझ को जब वह लौटने लगा तो रास्ते में डरने लगा कि बुद्ध से क्या कहूंगा जाकर। क्योंकि उसे खयाल आ गया कि शायद बुद्ध ने उसके प्रश्र्न का उत्तर ही दिया है। गांव भर में एक आदमी नहीं मिला जिसने कहा, शांति चाहिए; जिसने कहा, परमात्मा चाहिए; जिसने कहा, आनंद चाहिए। बुद्ध के सामने खड़ा हो गया। सुबह बुद्ध मुश्किल में पड़ गए कि सांझ वह आदमी मुश्किल में पड़ गया।
बुद्ध ने कहा: ले आए हो? उसने कहा: ले तो आया हूं। बुद्ध ने कहा: कितने लोग शांति चाहते हैं? उस आदमी ने कहा: एक भी नहीं मिला गांव में। बुद्ध ने कहा: तू चाहता है शांति? तो रुक जा। उसने कहा: लेकिन अभी तो मैं जवान हूं, अभी शांति लेकर क्या करूंगा? जब उम्र थोड़ी ढल जाए तो मैं आऊंगा आपके चरणों में, अभी तो वक्त नहीं है, अभी तो जीने का समय है। तो बुद्ध ने कहा, फिर पूछता है वही सवाल कि कितने लोग शांत हो गए? उसने कहा, अब नहीं पूछता हूं।
कोई किसी को शांत नहीं कर सकता, लेकिन हम शांत हो सकते हैं। पर अशांत हो गए हों तभी। असल में हम अशांत ही नहीं हो पाते हैं, चरम नहीं हो पाती अशांति। बीमारी वहां नहीं पहुंच जाती जहां बीमारी टूट जाती हो। हमने कुछ भी कभी पूरी तरह नहीं किया है। इसलिए मेरी दृष्टि में हिसाब और है। मेरी दृष्टि में हिसाब यह है कि आने वाली जो मनुष्यता होगी उसमें हम एक-एक बच्चे को पूरी तरह क्रोध करना सिखाएंगे। यह नहीं सिखाएंगे बचपन से कि क्रोध बुरा है। क्योंकि क्रोध बुरा है, इसका सिर्फ एक ही परिणाम होता है, क्रोध तो नहीं मिटता, केवल क्रोध अधूरा लटका रह जाता है। न वह पूरा हो पाता, न वह मिटता। जिंदगी भर क्रोध, और क्रोध, और क्रोध--क्रोध भी और पश्र्चात्ताप भी। आदमी को हमने बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। क्रोध भी नहीं मिटता और क्रोध के लिए पश्र्चात्ताप भी करना पड़ता है। क्रोध एक बीमारी है, पश्र्चात्ताप दूसरी बीमारी है। क्रोध करो, फिर दुखी होओ, फिर पछताओ, फिर क्रोध करो। फिर दुखी होओ, फिर पछताओ, फिर एक विसियस सर्कल, एक चक्कर जो जिंदगी भर चलता है। सुबह क्रोध करो, सांझ पछताओ, रात भर में फिर तैयारी करो, सुबह फिर क्रोध करो, दिन भर फिर पछताओ। रात भर में फिर तैयारी करो, और ऐसा ही जिंदगी भर चलता है। कितनी बार आप पछताए? लेकिन पछताने से क्या बना-बिगड़ा?
पछताने से सिर्फ एक फायदा होता है कि पछता कर आप फिर पुरानी अवस्था में पहुंच जाते हैं जहां क्रोध के पहले थे ताकि अब फिर क्रोध कर सकें। पछताना सिर्फ क्रोध को लीपना-पोतना है। रिपेंटेंस, पछतावा, प्रायश्र्चित, वह जो हमारे अहंकार को चोट लग गई है। मैंने किसी को गाली दे दी है, अब मैं क्रोध से भर गया हूं। मेरे अहंकार को बड़ी चोट लग गई, क्योंकि मैं अपने को भला आदमी समझता था, जो गाली नहीं दे सकता। जो क्रोध नहीं कर सकता, अब क्रोध कर दिया, अब गाली दे दी। अब मैं पछता कर फिर भला आदमी होने की कोशिश करता हूं। पछता कर मैं कहता हूं, यह कुछ भूल हो गई, कुछ नासमझी हो गई। मुझसे कैसे हो सकता है? कुछ बेहोशी हो गई। वह तो कुछ स्थिति ऐसी थी कि मुझ से निकल गया। अन्यथा मुझ से कैसे निकल सकता है? मैं क्षमा भी मांगता हूं, जाकर हाथ भी जोड़ता हूं कि मुझे माफ कर दो। मैं असल में अपने बिखरे अहंकार को फिर से जुड़ाने की कोशिश कर रहा हूं। जब मैं माफ हो जाऊंगा और पछता लूंगा और दुखी हो लूंगा और एक दिन उपवास कर लूंगा पछतावे में, दूसरे दिन मैं फिर पुरानी जगह वापस लौट जाऊंगा। अब मैं फिर अच्छा आदमी हो गया। जो न गाली देता है, न क्रोध करता है। अब मैं फिर गाली देने की तैयारी कर लिया। अब मैं गाली दे सकता हूं। अब मैं क्रोध कर सकता हूं। मैं फिर अच्छा आदमी हो गया। अच्छा आदमी हुआ ही इसलिए कि तब फिर गाली देने की सुविधा जुटा सकूं।
हम बच्चों को सिखाते हैं, क्रोध बुरा है, क्रोध पाप है, क्रोध मत करो। परिणाम यह नहीं होता है कि क्रोध न करते हों। यह तो हो नहीं सकता। सिर्फ क्रोध अधूरा रह जाता है, कभी पूरा नहीं हो पाता। और कभी वे क्रोध की पीड़ा को पूरा अनुभव नहीं कर पाते, वे क्रोध की अग्नि से पूरे गुजर नहीं पाते। और तब, अक्रोध तक पहुंचने का सवाल नहीं उठता। तब शांति की खोज का सवाल नहीं उठता। अभी जो अशांत ही नहीं हो सका है, वह शांत कैसे हो सकता है? अभी जिसकी इतनी भी पात्रता नहीं है कि अशांत हो जाए, अभी उसकी इतनी पात्रता कैसे होगी कि वह शांत हो सके? ये बातें उलटी लगेंगी देखने में। लेकिन मैं आपसे यह कह रहा हूं कि जो ठीक से अशांत हो सकता है वही केवल शांति के मार्ग पर यात्रा करता है। और जो ठीक से क्रोध करके क्रोध को जी लेता है; उसके पूरे जहर को.उसके कांटे-कांटे में छिद जाता है; उसकी आग की लपटों में जल जाता है; जो क्रोध को पूरी तरह जी लेता है; क्रोध को पूरी तरह पी लेता है, वह फिर दुबारा क्रोध करने में असमर्थ हो जाता है। वह शांति की यात्रा पर निकल जाता है।
मेरी दृष्टि में बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि ठीक से वे कैसे क्रोध करें, जोर से, ठीक से, पूर्णता से। ताकि क्रोध का पूरा अनुभव उन्हें बता दे कि क्रोध करना अपने को जलाना है। ताकि उन्हें दर्शन हो जाए क्रोध का, क्रोध की पूरी प्रतीति हो जाए, क्रोध के कीड़े उनको दिखाई पड़ जाएं और क्रोध की जहरीली लपटें उन्हें चारों तरफ से घेर लें, उन्हें दर्शन हो जाए कि यह है क्रोध। और जिस आदमी ने एक दफे पूरे क्रोध को देख लिया वह दुबारा क्रोध करने की क्षमता नहीं जुटाता। कौन पागल है जो अपने को आग में डालता है। लेकिन हम आग में ही नहीं डाल पाए इसलिए निकलने का सवाल नहीं।
हमारे सारे बुनियादी संस्कार गलत हैं, और उनकी वजह से हम अशांत ही नहीं हो पाते तो शांत होने की बात कैसे उठेगी। निश्र्चित ही, ध्यान से शांति उपलब्ध हो सकती है, लेकिन ध्यान की तरफ वे ही आकर्षित होंगे जो अशांत हो चुके हैं। हम अशांत ही नहीं हुए हैं पूरी तरह से। वहां नहीं पहुंच गए हैं जहां अशांति हमें जिंदगी को मिटाती हुई मालूम पड़ती हो। हम उस कगार पर नहीं पहुंच गए हैं जहां आगे खड्ड है और एक कदम उठाएंगे तो अंतहीन खड्ड में गिर जाएंगे। हम वहां नहीं पहुंच गए हैं। अगर हम वहां पहुंच गए होते तो हम वापस लौटेंगे। कौन गिरेगा उस खड्ड में जहां अंतहीन गहराइयां हों और जहां मृत्यु के सिवाय कुछ दिखाई न पड़ रहा हो?
आपने कभी ऐसी अशांति का अनुभव किया है जहां से एक कदम और आगे उठाने पर सिवाय मृत्यु के कुछ शेष न रह जाए? अगर नहीं किया है तो अभी आप अशांत ही नहीं हुए हैं। अभी आप अशांति के रास्ते पर भी आधे ही पहुंचे हैं। और गुरुजन मिल जाते हैं इसी आधे रास्ते पर कहने वाले, कि चलिए हम आपको शांत होने का मार्ग बताए देते हैं, शांत हो जाइए। तो आपके कदम तो अशांति की तरफ बढ़ते रहते हैं और आप सोचते हैं कि चलो रास्ते चलते अगर शांति भी मिलती हो तो दो हाथ उस पर भी मार लिए जाएं। चलते रहते हैं अशांति की तरफ, क्योंकि अभी अशांति का रस ही नहीं ले पाए कि उससे मुक्त हो सकें।
असल में जिस चीज से भी मुक्त होना हो उसके पूरे रस का अनुभव जरूरी है। अगर बुराई से भी मुक्त होना हो तो बुराई की गहराइयों में उतरना जरूरी है। असल में पापी हुए बिना कोई कभी महात्मा न हुआ है, न हो सकता है। असल में जिसे आकाश की ऊंचाइयां छूनी हों, उसे पाताल की गहराइयां भी छूनी होती हैं। देखे हैं दरख्त, जो आकाश की तरफ उठते हैं और चांद-तारों को छूते हुए मालूम पड़ने लगते हैं। वह उनकी जड़ें नीचे पाताल में उतर जाती हैं, तभी वे ऊपर उठ पाते हैं। जिस दरख्त को आकाश छूना हो, उस दरख्त को पाताल भी छूना ही पड़ता है। जितनी जड़ नीचे गहरी जाती है उतना दरख्त ऊपर ऊंचा चला जाता है।
हम कुछ ऐसे लोग हैं कि जड़ें ही पूरी गहरी नहीं जा पातीं, आकाश की तरफ उठने का सवाल कहां है? और ध्यान रहे, जितनी नीचे गहराई होगी उतनी ही ऊपर ऊंचाई हो सकती है, इससे अन्यथा कोई उपाय नहीं है। तो हमें जो संस्कृति मिली है अधूरी, इंपोटेंट, नपुंसक, जो कुछ भी करना नहीं सिखाती; जो ठीक अर्थों में क्रोध भी करना नहीं सिखाती--अधूरे, अधजले, न इस पार, न उस पार, आदमी अटका रह जाता है। मैं तो कहता हूं, क्रोध करना तो ठीक से करना, एक ही बार कर लेना ताकि बार-बार करने की जरूरत न रहे। और चिंतित होना हो तो ठीक से चिंतित हो लेना, और द्वेष करना हो, दुश्मनी करनी हो तो ठीक से ही कर लेना; क्योंकि ठीक से कर लेना ही बाहर हो जाने का रास्ता है। लेकिन कुछ भी हमने ठीक से नहीं किया। इसलिए मैं कहता हूं, अशांत ही हम नहीं हैं। हां, जो अशांत हैं वे शांत हो सकते हैं।
इसलिए मुझे लगता है कि पश्र्चिम के मुल्कों में शांति की लहरें हर वर्ष बढ़ती चली जाएंगी। क्योंकि पश्र्चिम के लोग बड़े खुले दिल से अशांत हुए हैं। आज अमरीका में ध्यान के लिए जैसी अभीप्सा है, जैसी प्यास है, वैसी हमारे भीतर नहीं है। आज यूरोप में, यूरोप के बुद्धिमान वर्ग में जिस भांति योग की खोज है, समाधि की खोज है, वैसी हमारे बुद्धिमान वर्ग में नहीं है। उसका कारण है। उन्होंने अगर अशांत भी होना चाहा है तो ठीक से वे अशांत हुए हैं। अगर उन्होंने भौतिकवादी होना चाहा है तो फिर उन्होंने कुछ बकवास नहीं सुनी, वे ठीक से भौतिकवादी हो गए हैं। और जब कोई आदमी ठीक से भौतिकवादी हो जाता है तो वह सीमा आ जाती है जहां से अध्यात्म शुरू होता है। लेकिन ठीक से भौतिकवादी ही कोई नहीं हो पाता हमारे मुल्क में, अध्यात्मवादी होना असंभव है। पहले कम से कम भौतिकवादी तो कोई हो जाए। वह भी नहीं हम हो पाते। तो हम अधूरे मकान बनाते हैं।
मैंने सुना है, एक फकीर के पास कोई पूछने गया था कि तुम कैसे उपलब्ध हो गए परमात्मा को? तो उस फकीर ने कहा कि मैंने परमात्मा की फिकर ही न की। मैंने संसार की ही पूरी फिकर की। लेकिन जब मैं संसार में गहरा उतरा, और गहरा, और गहरा उतरा तो सीमा आ गई। और सीमा पर मुश्किल हो गई, फिर पीछे लौटना जरूरी हो गया।
उस आदमी ने कहा: मैं समझा नहीं। तो उसने कहा: आओ, मैं तुम्हें पास के एक खेत पर ले चलता हूं। जैसा उस खेत का मालिक है, ऐसे दुनिया के लोग हैं। वह उसे खेत पर ले गया। उस खेत का मालिक बड़ा अदभुत होगा, ठीक आप जैसा होगा, हम जैसा होगा। उस खेत के मालिक ने खेत में आठ गड्ढे खोदे थे कुआं बनाने के लिए। आठ हाथ पहले एक गड्ढा खोदा, आधा खोदा, फिर छोड़ दिया; सोचा अब तक पानी नहीं आया, दूसरा गड्ढा खोदूं। फिर उसने खोदा, सोचा इसमें भी पानी नहीं आता; उसने तीसरा गड्ढा खोदा। उसने आठ गड्ढे खोदे थे, पूरा खेत खराब हो गया आठ गड्ढों में, लेकिन अभी कुआं नहीं खुदा था। फकीर ने कहा, देखते हो इस खेत के मालिक को? यह कभी कुआं न खोद पाएगा। क्योंकि यह पूरा खोदता ही नहीं है। खोदे तो पानी आ जाए, मिट्टी खत्म हो जाए। लेकिन अधूरा खोदता है, फिर दूसरा खोदना शुरू कर देता है, फिर तीसरा खोदना शुरू कर देता है। एक ही कुआं खोदने से काम हो सकता था, आठ से भी काम नहीं हुआ। क्योंकि कुआं तो आया नहीं, यह तो बीच से ही लौट आया था। और जितनी खुदाई इसने की उतनी खुदाई से एक कुआं कभी का खुद गया होता। खुदाई तो इसने काफी की। लेकिन अलग-अलग जगह की है, एक ही गड्ढे पर नहीं की।
हम भी उस खेत के मालिक जैसे लोग हैं। हम जिंदगी में जाते हैं, लेकिन कहीं भी हम पूरे नहीं गए। किसी भी आयाम में, किसी भी दिशा में हमारी गति पूरी नहीं है। अगर एक आदमी धन ही कमा ले पूरी तरह से तो धन से मुक्त हो जाएगा। लेकिन इधर धन कमाता है, उधर किताब में पढ़ता है कि धन बिलकुल पाप है। इधर रोज किताब भी पढ़ता है, उस गुरु के पास भी जाता है जो धन को गाली दे रहा है और दिन भर दुकान में धन कमाता है और सांझ गुरु के चरणों में बैठ कर धन की निंदा सुनता है। ऐसे दोहरे गड्ढे खोदता है जो कभी पूरे नहीं हो पाते, क्योंकि उलटे गड्ढे कैसे पूरे हो सकते हैं। इधर स्त्रियों के पीछे भागता रहता है और उधर किताबों में ब्रह्मचर्य के उपदेश पढ़ता रहता है। वह उलटे गड्ढे खोदता है, वह कभी अर्थ नहीं लाता। तो दोनों काम साथ चलते हैं। दोनों काम ही साथ चलते रहते हैं।
यह जो हमने अधूरा-अधूरा आदमी पैदा किया है, इसकी वजह से कठिनाई पैदा हो गई है। इसलिए हम पुरानी संस्कृतियों से दबे हुए लोग हैं। धार्मिक भी नहीं हो पा रहे हैं। अधार्मिक होने की हिम्मत ही खो दी है तो धार्मिक होने की हिम्मत तो बहुत बड़ी चीज है। मेरी बात आप समझ रहे हैं? अधार्मिक होने की हिम्मत तक हमारी नहीं है। झूठ बोलने तक की हिम्मत नहीं है, सच बोलना तो बहुत दूर की बात है। झूठ बोलने में भी हिम्मत की जरूरत पड़ती है। झूठ भी हर कोई नहीं बोल देता। झूठ बोलने तक में कमजोर हो गए हैं, और सच बोलने के उपाय खोज रहे हैं। सच बोलना तो बहुत हिम्मत की बात है। उसका तो मुकाबला ही नहीं है। वह तो पूरी हिम्मत आए तभी कोई सच बोल सकता है। लेकिन जो झूठ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, उनको हम कहते हैं कि ये बड़े सच बोलने वाले हैं। जो चोरी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वे अचोर बन गए हैं। और जो हिंसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वे अहिंसा के पुजारी हैं। सब हमने विकृत और उलटा कर लिया है। और अधूरा करके उलटा कर लिया है।
मेरी बात इसीलिए बहुत अजीब मालूम पड़ती है, क्योंकि मैं यह कहता हूं कि अगर धार्मिक होना हो तो पहले अधार्मिक होने की पूरी हिम्मत से यात्रा करो। रुकना मत, किसी के बुलाए मत रुकना, किसी के चिल्लाए मत रुकना। कहना कि अभी ठहरो, पहले इस यात्रा को हम पूरा कर ही लें। इसे हम जान लें कि यह अधर्म का आकर्षण क्या है। तुम कहते हो कि झूठ बुरा है, हम भी देख लें कि झूठ बुरा है या नहीं। और तुम कहते हो कि धन बुरा है, तो हम भी देख लें कि धन बुरा है या नहीं।
निश्र्चित ही एक जगह आती है जहां धन मिट्टी हो जाता है। लेकिन उसके लिए कभी यह जगह नहीं आती जो धन की यात्रा में गया ही नहीं। जो पहले से ही रोक कर अपने को, साध कर संयम करके खड़ा हो गया हो। उस संयमी आदमी की बड़ी मुश्किल है।
संयमी आदमी से ज्यादा फजीहत किसी की भी नहीं है। क्योंकि उसका मन होता है उस तरफ जाने को और विचार होते हैं इस तरफ जाने को। वह ऐसा आदमी है, समझें, ऐसी बैलगाड़ी है जिसमें दोनों तरफ बैल जोत दिए हों और बैलगाड़ी को दोनों तरफ खींच रहे हैं। वह बैलगाड़ी कभी कहीं जा नहीं पाती। कभी दो फीट इधर जाती है, जरा बैल ताकतवर हो गए, दूसरे बैल सुस्ताने लगे। कभी दो फीट इधर आती है, वे बैल थक गए और इन बैलों ने खींच लिया। जिंदगी भर बस बैलगाड़ी इसी तरह हमारी होती रहती है। इधर थोड़ा अधर्म करते हैं, फिर मन डर जाता है, थोड़ा धर्म कर लेते हैं। फिर मन ऊब जाता है, फिर थोड़ा अधर्म कर लेते हैं। बस ऐसा चलता रहता है। धर्म और अधर्म के बीच हम कभी भी एक यात्रा पर नहीं निकले।
मेरी अपनी समझ यह है कि अधर्म का अनुभव ही धर्म में ले जाता है, अशांति का अनुभव शांति में ले जाता है। हिंसा का अनुभव अहिंसा में ले जाता है। और भौतिकता का अनुभव अध्यात्म में ले जाता है। भोग का अनुभव योग का आधार बनता है। ये बातें उलटी दिखाई पड़ती हैं। ये उलटी नहीं हैं। यह जिंदगी का नियम है। इसलिए मैं इस प्रश्र्न के संदर्भ में जीवन का दूसरा नियम भी आपसे कह दूं। जीवन के गणित का दूसरा नियम यह है कि जो भी करना हो, पूरा करना। अधूरा करने के अतिरिक्त और कोई पाप नहीं है। अधूरा करने के अतिरिक्त और कोई बुराई नहीं है। बुराई भी करनी हो तो पूरी करनी है। एक और बहुत मजे की बात इससे निकलती है और वह यह कि बुराई आप पूरी कर सकते हैं, भलाई आप कभी पूरी नहीं कर सकते हैं। इसलिए बुराई से मुक्त हो जाएंगे, भलाई से कभी मुक्त न होंगे। यह कभी खयाल में न आया होगा कि बुराई बड़ी छोटी चीज है, उसका अंत बहुत जल्दी आ जाता है। लेकिन भलाई बहुत अनंत है, उसका अंत आता ही नहीं। इसलिए संसार से कोई ऊपर उठ सकता है, भौतिकवाद से ऊपर उठ सकता है। लेकिन धर्म और अध्यात्म के ऊपर कभी भी नहीं उठ सकता है। उसमें सिर्फ प्रवेश होता है, फिर अंत आता ही नहीं।
परमात्मा में सिर्फ प्रवेश होता है, अंत कभी नहीं आता। ऐसा कभी नहीं होता कि एक आदमी यह कह दे कि ठीक है अब, परमात्मा को भी पूरा जान लिया, अब। अब आगे। नहीं, ऐसा कभी होता नहीं। असल में बुराई वह है जिसका अंत आ जाता है, जिसकी बड़ी छोटी सी सीमा है।
इसे थोड़ा सोचें। अगर आप एक आदमी से दुश्मनी करें और पूरी दुश्मनी करें तो ज्यादा से ज्यादा अंत क्या हो सकता है, उस आदमी को मार डालें। और क्या हो सकता है? दुश्मनी अगर पूरी ही करे कोई मुझसे और मुझे मार डाले, यही कर सकता है न। आखिर और क्या कर सकता है? लेकिन अगर कोई मुझसे मित्रता करे तो बड़ी लंबी यात्रा है। उसका अंत कभी भी नहीं आएगा। वह कुछ भी करता चला जाए, कुछ भी करता चला जाए, लेकिन अंतिम मित्रता का क्या मतलब हो सकता है। मित्रता का कोई अंतिम मतलब नहीं हो सकता है। कितना ही करो, फिर भी करने को बाकी रह जाएगा। कितना ही करो, फिर भी शेष, फिर शेष रह जाता है। शत्रुता का अंत आ जाता है, मित्रता का कोई अंत नहीं है।
अशांत आप हो जाएं, फिर कितनी देर अशांत रह सकते हैं? अगर एक आदमी को हम कहें, तुम अशांत रहो, कितनी देर अशांत रह सकते हो? तो आप पाएंगे, घड़ी, आधा घड़ी में शिथिल हो जाएगा। करेगा क्या? क्योंकि अशांति इतनी शक्ति व्यय करवाती है कि आप बहुत देर अशांत नहीं रह सकते। न बहुत देर क्रोधित रह सकते हैं। लेकिन शांत होने का कोई अंत है? आप शांत कितने ही रह सकते हैं, उसका कोई अंत नहीं है। वह अंतहीन है।
अशांति का अंत आ जाएगा, शांति का कोई अंत नहीं आएगा। शांत कितना ही रह सकते हैं, अशांत कितना ही नहीं रह सकते। क्योंकि अशांति एक तनाव है, तनाव में श्रम है, श्रम में शक्ति का व्यय है। शांति तनाव नहीं है, विश्राम है। शांति में कोई शक्ति का व्यय नहीं है। कोई तनाव नहीं है, कितना ही शांत रहा जा सकता है। प्रेम का कोई अंत नहीं है, घृणा का अंत है। लेकिन हम घृणा के ही अंत पर नहीं पहुंचे जिसका अंत है; हम अशांति के ही अंत पर नहीं पहुंचे जिसकी सीमा है। तो हम शांति की खोज में नहीं निकल पाएंगे।
तो मैं आपसे नहीं कहता हूं कि शांति की खोज पर निकल जाइए, मैं तो यह कहता हूं, ठीक से अशांत ही हो जाइए। मंद-मंद मत चलिए, धीमे-धीमे मत चलिए, ठीक से हो जाइए। अशांति ही आपको धक्का दे देगी। कोई गुरु धक्का नहीं दे सकता। अशांति ही आपको धक्का दे देगी। वह अंतिम धक्का जो शांति की यात्रा पर ले जा सकता है।
ध्यान तो शांति ला सकता है। लेकिन शांति की तरफ वे आते हैं जो अशांत हो गए हैं। अगर आप अशांत हो गए हैं तो अब कोई उपाय न रहेगा, आपको ध्यान की तरफ जाना ही पड़ेगा। किसी भी द्वार से आप ध्यान की यात्रा करेंगे ही। बचाव नहीं है कोई।
ओशो, आप कहते हैं कि ईश्र्वर को खोया नहीं, सिर्फ भूल गए हैं। और आप कहते हैं, ईश्र्वर से ही हम आए हैं और ईश्र्वर में ही चले जाएंगे। और फिर यह भी कहते हैं कि ईश्र्वर और हम एक हैं। ये बातें तो बड़ी उल्टी हैं। अगर हम एक ही हैं तो ईश्र्वर से आना कैसा और जाना कैसा? ये तो बातें बड़ी उलटी मालूम पड़ती हैं।
इसलिए तीन बातें खयाल रखने जैसी हैं--पहली बात, लहर सागर के बिना नहीं हो सकती। इसलिए सागर मूल है, और लहर मूल नहीं है। लहर आती है और जाती है, सागर है। सागर न आता है, न जाता है। लहर कभी जन्मती है, कभी मरती है। सागर न जन्मता है और न मरता है। सागर है। सागर के लिए हम अतीत या भविष्य का प्रयोग नहीं कर सकते हैं, सागर के लिए सदा वर्तमान का ही, प्रेजेंट टेंस का ही उपयोग करना पड़ेगा। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सागर था। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सागर होगा। हम ऐसा ही कह सकते हैं, सागर है। क्योंकि था उसको कह सकते हैं जो फिर नहीं हो जाए। होगा उसको कह सकते हैं जो अभी न हो। हां, लहर को कह सकते हैं--थी, है, होगी; सागर को नहीं कह सकते। सागर सदा है। सागर सदा वर्तमान है।
ध्यान रहे, अतीत, भविष्य और वर्तमान में वर्तमान परमात्मा का काल है; भविष्य और अतीत हमारे काल हैं। वर्तमान हमारा काल नहीं है। वर्तमान परमात्मा का है, परमात्मा हमेशा वर्तमान में है। ईश्र्वर था, ऐसा कहने का कोई भी अर्थ नहीं होता। ईश्र्वर है। ईश्र्वर होगा, इसका भी कोई अर्थ नहीं होता। ईश्र्वर है। सागर से समझने की थोड़ी कोशिश करें। सागर से लहर एक है। लेकिन फिर भी उठती है और गिरती है। तो परमात्मा से हम एक हैं, और आते हैं, जाते हैं। कठिनाई क्या है? अड़चन क्या है? क्यों नहीं आ सकते और जा सकते? क्यों नहीं उठ सकते और गिर सकते? लेकिन आने-जाने से हमें ऐसा खयाल आता है कि आने-जाने का मतलब है, अलग हो गए। लहर जब उठती है तब अलग है सागर से? और लहर नहीं उठती है तब एक है और जब उठती है तब अलग है? नहीं, जब लहर उठती है तब भी एक है, तब भी अलग नहीं है। हम जब आते हैं तब उसका मतलब इतना ही है कि हम लहर की भांति उठते हैं चेतना के सागर में। चेतना के सागर में, वह जो कांशसनेस का सागर है, उसमें हम उठते हैं और गिरते हैं। अलग लेकिन हम नहीं होते हैं। लेकिन उठने और गिरने में अलग होने का भ्रम पैदा हो सकता है। अगर लहर को भी चेतना हो तो लहर उठते वक्त सोच सकती है कि मैं हूं, क्योंकि लहर अपने भीतर तो देख न सकेगी, अपने बाहर देखेगी और लहरें दिखाई पड़ेंगी, सागर तो दिखाई न पड़ेगा। यह भी ध्यान रखें। अगर कोई लहर देख सकेगी तो उसे सागर दिखाई कभी नहीं पड़ेगा, लहरें दिखाई पड़ेंगी। क्योंकि छाती पर सागर के लहरें ही होती हैं। सागर तो नहीं होता। और जब एक लहर उठेगी तो आस-पास लहरें उठेंगी, क्योंकि कोई लहर अकेली नहीं उठ सकती।
यह भी ध्यान में रख लेना कि कोई लहर अकेली नहीं उठ सकती। मैं अकेला पैदा नहीं हो सकता हूं, और न आप अकेले पैदा हो सकते हैं। करोड़ों-करोड़ों लहर के बीच में हमारा होना है। आपके पिता थे इसलिए आप हैं, उनके भी पिता थे इसलिए वे थे। उनके भी पिता थे, उनके भी पिता थे। लंबी कहानी है, जिसमें अरबों-खरबों लोगों का हाथ है एक आदमी के होने में। अरबों-खरबों लहरों ने धक्के देकर आप की लहर को उठाया है। तो आप कभी ऐसा मत सोच लेना कि अकेले आप हो सकते हैं। आपके होने का कोई अर्थ ही नहीं है।
जब एक लहर पैदा होती है तो लहर अकेली कभी पैदा नहीं होती, करोड़ों-करोड़ों लहर के जाल में पैदा होती है। उसे चारों तरफ लहरें दिखाई पड़ती हैं, सागर दिखाई नहीं पड़ता। अगर लहर देख सके तो उसे सागर कभी दिखाई नहीं पड़ेगा। उसे लहरें दिखाई पड़ेंगी।
हमको भी परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता, प्राणी दिखाई पड़ते हैं। वे लहरें हैं, जो हमारे चारों तरफ हैं--मनुष्यों की, पौधों की, पक्षियों की। चारों तरफ लहरें दिखाई पड़ती हैं, परमात्मा हमें भी दिखाई नहीं पड़ता है।
अब यहां हम इतने लोग बैठे हुए हैं, इतनी लहरें हैं। और हम चारों तरफ देखेंगे तो परमात्मा कहां दिखाई पड़ेगा, लहरें ही लहरें दिखाई पड़ेंगी। कोई लहरें उठती हुई होंगी, बच्चे होंगे, जवान होंगे। कुछ लहरें गिरती होंगी, बूढ़े हो गए, विदा हो गए। कुछ लहरें उठ चुकी होंगी, कुछ जाने के करीब आ गई होंगी, कुछ उठ रही होंगी। हमारे चारों तरफ हम देखेंगे तो परमात्मा कहां दिखाई पड़ेगा, लहरें दिखाई पड़ेंगी। सघन लहरों का जाल है।
तो अगर कोई लहर होश से भर जाए तो पहली तो बात यह है कि उसे सागर दिखाई नहीं पड़ेगा। हमें भी परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता है।
दूसरी बात यह है कि उसे दूसरी लहरें दिखाई पड़ेंगी जिनसे वह भिन्न मालूम पड़ेगी कि मैं अलग हूं। स्वाभाविक है। एक लहर उठी है सागर पर, वह देखती है कि पड़ोस की लहर तो गिर रही है, मिट रही है और मैं तो अभी उठ रही हूं, तो हम दोनों एक कैसे हो सकते हैं?
एक आदमी पड़ोस में मेरे मर गया है, मैं उससे एक कैसे हो सकता हूं! अगर एक होता तो मैं भी मर जाता। और अगर एक होता तो उसको भी जिंदा रहना चाहिए था। हम एक नहीं हो सकते, क्योंकि पड़ोस का तो मर गया और मैं जिंदा हूं। हम एक नहीं हो सकते। एक लहर गिर रही है, एक छोटी है और एक बड़ी है, एक बूढ़ी है। लहरों को दिखाई पड़ता है लहरें अलग-अलग हैं। मैं अलग हूं, चारों तरफ की लहरें अलग हैं।
ऐसा ही हमें भी दिखाई पड़ता है कि मैं अलग हूं। चारों तरफ के जीवन में प्राण के स्रोत, मूल स्रोत से टूटे हुए टुकड़े अलग-अलग हैं। और बाहर देखने को बहुत कुछ है, लहर भीतर क्यों देखे? अगर लहर भीतर देखे तो शायद सागर मिल जाए, क्योंकि भीतर उतरने पर कोई लहरें तो नहीं मिलेंगी। अगर एक लहर अपने भीतर उतर सके तो सागर मिलेगा उसे, लहरें नहीं मिलेंगी फिर, क्योंकि नीचे सागर है। इसलिए जब कोई अपने भीतर उतरता है तो परमात्मा का अनुभव कर पाता है। अपने बाहर तो लहरें-लहरें ही दिखाई पड़ती हैं।
ध्यान जो है, वह भीतर उतरने की कला है जिसमें हम बाहर की लहरों की फिकर छोड़ देते हैं और उसी लहर में उतर जाते हैं जो मैं हूं। और जैसे-जैसे हम भीतर उतरते हैं वैसे-वैसे पता चलता है कि लहर नहीं है, सागर है; लहर नहीं है, सागर है। और जितने भीतर जाते हैं, पता चलता है, लहर थी ही नहीं, सागर ही था, सागर ही है, सागर ही होगा। लहर नहीं है। जो व्यक्ति अपने भीतर जाता है उसे सागर का पता चल जाता है। परमात्मा का पता चल जाता है।
ओशो, लेकिन हम जानें ही क्यों? अगर उसी से आए हैं और उसी में लौट जाना है, तो ठीक है, आ गए और लौट जाएंगे। अब हम इस झंझट में क्यों पड़ें कि हम जानें उसे?
जिंदगी पूछती है, जानना चाहती है, क्योंकि जान लें हम पूरी तरह तो ही पूरी तरह जी सकते हैं। वह जीने की ही खोज का हिस्सा है कि हम जान लें ताकि हम पूरे जी सकें। अगर मुझे पता चल जाए कि मैं लहर नहीं हूं, सागर हूं, तो मेरे जीने का मतलब ही, अर्थ ही बदल जाएगा। क्योंकि तब मुझे कोई डर न रहेगा मिटने का, क्योंकि सागर कभी नहीं मिटता। तब मौत से मुझे कोई डरवा न सकेगा, क्योंकि मैं हंसूंगा, कहूंगा कि ठीक है, मिटा दो लहर को, क्योंकि मैं तो लहर हूं ही नहीं। तुम जिसे मिटाओगे, वह मैं नहीं हूं। और तुम मिटा भी न पाओगे और मैं रहूंगा वहीं के वहीं, जहां मैं था। अगर मुझे पता चल जाए कि मैं सागर हूं और लहर नहीं, तो लहर की चिंताएं विदा हो जाएंगी। लहर बड़ी चिंता में पड़ी है। सबसे बड़ी चिंता तो यह है कि वह विदा हो जाएगी, समाप्त हो जाएगी, नष्ट हो जाएगी।
हर आदमी मरने से डरा हुआ है। हम डरे हुए हैं कि मर न जाएं। यह मरने का डर इसीलिए है कि हमें पता नहीं है कि नीचे कुछ है जो मर ही नहीं सकता। उसका पता चल जाए तो यह भय विदा हो जाए।
सिकंदर हिंदुस्तान से लौटता था तो एक फकीर को पकड़ कर ले जाना चाहता था। उसके मित्रों ने कहा था उससे कि जब हिंदुस्तान से लौटो तो एक संन्यासी को ले आना। तो उसने खबर की गांव में कि कोई संन्यासी हो तो मैं ले जाऊं। लेकिन गांव के लोगों ने कहा: बहुत मुश्किल है। संन्यासी तो है, लेकिन संन्यासी को ले जाना बहुत मुश्किल है। सिकंदर ने कहा: तुम इसकी फिकर मत करो। हमारे पास नंगी तलवारें हैं। हम किसी को भी ले जा सकते हैं। गांव के लोगों ने कहा: फिर आप संन्यासियों को जानते नहीं। क्योंकि नंगी तलवार देख कर संन्यासी हंसेंगे और कुछ भी न होगा। सिकंदर ने कहा: तुम फिकर ही मत करो। तुम मुझे बता दो कि वह कहां है। उसने सिपाही भेजे नंगी तलवारें लेकर और कहा कि उसे पकड़ लाओ। वे सिपाही गए और उन्होंने कहा कि महान सिकंदर की आज्ञा है कि आप हमारे साथ चलें। संन्यासी बहुत हंसने लगा, उसने कहा, जो खुद ही को महान कहता हो उससे ज्यादा नासमझ और कौन हो सकता है! उससे ज्यादा पागल और कौन हो सकता है! कौन कहता है अपने को महान? वे सिपाही एक क्षण तो डर गए, क्योंकि उनके महान सिकंदर को कोई ऐसा कहेगा! एक नंगा फकीर नदी के किनारे खड़ा हुआ, एक बूढ़ा आदमी। उन सिपाहियों ने कहा: तुम क्या कह रहे हो? गर्दन अलग कर देंगे अगर तुमने इस तरह की बात की! उस फकीर ने कहा: गर्दन मैं बहुत पहले अलग कर चुका हूं। अब अलग करने को कुछ बचा नहीं है। हमने वह काम दूसरों के लिए छोड़ा ही नहीं। तुम अपने सिकंदर को बुला लाओ। हम तुम्हारे मालिक से ही बात करेंगे।
वे सिपाही सिकंदर से कहे कि वह बहुत अजीब आदमी है। अपना वश उस पर न चलेगा, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा हम मार सकते हैं, बस इतना हमारा वश है और वह आदमी मरने से जरा भी नहीं डरता। सिकंदर ने कहा: फिर भी मैं चलना चाहूंगा। सिकंदर गया उस आदमी के सामने और तलवार उसकी गर्दन पर रख दी और कहा कि चलते हो कि गर्दन अलग कर दूं? उस फकीर ने कहा: गर्दन अलग कर दो। और उस फकीर ने कहा कि बड़ा मजा आएगा, तुम भी गर्दन को गिरते देखोगे कि गिर गई और मैं भी देखूंगा कि गिर गई। सिकंदर ने कहा: तुम भी देखोगे? उस फकीर ने कहा: मैं भी देखूंगा। क्योंकि यह गर्दन मैं नहीं हूं। यह जब से जान लिया तब से बात ही खत्म हो गई। अब मुझे कोई सिकंदर डरा नहीं सकता। तलवार भीतर रख ले। उस फकीर ने कहा: तलवार म्यान के भीतर रख, बेकार हाथ थक जाएगा। और सिकंदर का पहला मौका था यह कि किसी के डर में तलवार भीतर रख ली उसने। क्योंकि यह आदमी बेकार था, इसके सामने तलवार निकालना खुद ही मूढ़ता मालूम पड़ने लगी। उसने कहा: तू गर्दन काट ही दे, जरा मजा आ जाएगा। गिर जाएगी तो बहुत अच्छा होगा।
लहर अपने को जान ले कि सागर है तो सब बदल जाएगा। सारी जिंदगी बदल जाएगी। जिंदगी के रहने का मजा ही और हो जाएगा, क्योंकि तब हम लहर की तरह नहीं, सागर की तरह रहेंगे। तब हम आदमी की तरह नहीं, परमात्मा की तरह रहेंगे। और परमात्मा की तरह रहने का मजा! तब हम पूरे ऐश्र्वर्य में रहेंगे। ऐश्र्वर्य का मतलब?
ऐश्र्वर्य का मतलब बड़ा मकान नहीं होगा। ऐश्र्वर्य का मतलब बड़ा मकान, कितना ही बड़ा मकान हो फिर भी छोटा ही होगा। और धन कितना ही ज्यादा हो फिर भी थोड़ा ही होगा। असल में जो गिना जा सकेगा वह थोड़ा ही होगा। ऐश्र्वर्य का मतलब है कि यह सारा जगत जिसका मकान हो गया। सारे चांद-तारे जिसके घर पर रोशनी देने लगे, और हवाएं जिसकी बगिया की सेवा करने लगीं, जो सारे जीवन का मालिक हो गया। मालिक इसीलिए कि उसका मालिक के साथ ऐक्य का अनुभव हो गया। खयाल है आपको, ईश्र्वर शब्द ऐश्र्वर्य से बना हुआ है। ईश्र्वर शब्द और ऐश्र्वर्य शब्द एक ही सत्य के रूपांतरण हैं। ईश्र्वर का मतलब है मालिक, सब ऐश्र्वर्य जिसका है; सारा जगत जिसका है।
संन्यासी वह नहीं है जिसने एक घर छोड़ दिया, संन्यासी वह है जिसके सारे घर अपने हो गए। संन्यासी वह नहीं है जिसने कि एक बेटा-बेटी, एक मां-बाप छोड़ दिया, जिसका सब अपना परिवार हो गया--सब।
यह जो अनुभव है ऐश्र्वर्य का, यह सब कुछ अपना ही हो जाने का है। यह कैसे होगा? यह होगा लहर भीतर उतरे और जान ले। बच नहीं सकते हैं परमात्मा की खोज से। खोज करनी ही पड़ेगी। गलत भी कर सकते हैं, ठीक भी कर सकते हैं, वह दूसरी बात है।
एक आदमी धन खोज कर सोचता है कि ऐश्र्वर्य को पा लेगा। वह गलत खोज है। क्योंकि धन कितना ही खोज लो, कितना ही खोज लो, फिर भी गिना जा सकेगा। और जो गिना जा सकेगा वह कभी असीम नहीं हो सकेगा। और धन कितना ही इकट्ठा कर लो, वह छीना जा सकेगा, क्योंकि जो छीना गया है वह छीना जा सकता है। आखिर मैं भी छीन कर ही इकट्ठा करूंगा। तो जो मैंने छीना है, वह मुझसे छिन जा सकता है, छिनेगा ही।
धन खोज कर भी आदमी ईश्र्वर को ही खोज रहा है, मैं यह कह रहा हूं--गलत ढंग से खोज रहा है। धन खोज कर भी वह ऐश्र्वर्य की खोज में गया है--लेकिन गलत चला गया है। लहर भीतर की तरफ नहीं गई है, बाहर की लहरों पर कब्जा करने निकल गई है, कि मैं कब्जा कर लूंगी लहरों पर। लहर कहती है, मैं राष्ट्रपति हो जाऊंगी, चालीस करोड़ लहरों पर कब्जा कर लूंगी। लहर पागल हो गई है। सभी राष्ट्रपति पागल हो जाते हैं। वह पागलपन की दौड़ है। और अगर पागलों को खोजना हो तो पागलखानों में नहीं जाना चाहिए, राजधानियों में चला जाना चाहिए। वहां वे सब इकट्ठे मिल जाते हैं। लेकिन वे भी ईश्र्वर की खोज में लगे हैं, गलती से राजधानी पहुंच गए। वे गलत रास्ते पर जा रहे हैं ईश्र्वर को खोजने को।
जो पद को खोज रहा है, वह भी ईश्र्वर को ही खोज रहा है, क्योंकि ईश्र्वर परम पद है। उसके आगे फिर कोई पद नहीं है। लेकिन गलत ढंग से खोज रहा है। वह जो धन को खोज रहा है, वह भी ईश्र्वर को खोज रहा है; लेकिन गलत ढंग से खोज रहा है। वह जो प्रेम में, पत्नी में, बेटे में खोज रहा है, वह भी गलत ढंग से खोज रहा है, क्योंकि वह इतने छोटे में खोज रहा है कि मिल नहीं सकता है। इतनी बड़ी आकांक्षा है और इतनी छोटी खोज है। आकांक्षा तो यह है कि सारे जगत की उपलब्धि हो जाए। सारे विश्र्व की उपलब्धि हो जाए। इतनी बड़ी आकांक्षा है तो बिना परमात्मा को खोजे वह पूरी नहीं होगी।
दोनों रास्ते अलग हैं। अगर लहर दूसरी लहरों पर कब्जा करने निकल जाए तो यह एक रास्ता है जो गलत रास्ता है, और अगर लहर अपने भीतर उतर जाए और पता पा ले कि कौन है नीचे, तो सारी लहरों पर कब्जा मिल ही गया, क्योंकि सारी लहरें अलग न रहीं। अब कब्जा करने की कोई जरूरत न रही। वह हम ही हैं। जैसे ही लहर नीचे उतरती है, सागर मिल जाता है और उसे पता चल जाता है कि सब लहरें सागर की ही हैं। अब झंझट न रही, जब सागर ही हम हैं तो अब और दूसरी लहर पर कब्जा करने की क्या बात है। अब सबके भीतर हम ही हो गए।
इसलिए यह तो पूछें मत कि हम झंझट में क्यों पड़ें? कोई नहीं कहता कि पड़ें। लेकिन आप पड़े ही हुए हैं। उपाय नहीं झंझट के बाहर होने का। झंझट से गुजरेंगे तो बाहर हो भी सकते हैं। जब आप यह पूछते हैं, हम झंझट में क्यों पड़ें, तो ऐसा लगता है जैसे पड़ने का निर्णय आप कर रहे हैं अब। नहीं, आप पड़े ही हुए हैं। जीवन में होना ही झंझट में होना है। यह कोई मेरी बात सुन कर आप ईश्र्वर की खोज पर नहीं चले गए हैं। ईश्र्वर की खोज पर चले गए होंगे इसलिए मेरी बात सुनने चले आए हैं। यह कोई मेरी बातें सुन कर आपके मन में प्रश्र्न पैदा नहीं हो जाएंगे, प्रश्र्न होंगे आपके मन में इसलिए मेरी बातें सुनने आए हैं। खोज है जारी, चल रही है। खोज पूरी हो सकती है। अगर हम भीतर की तरफ जाएं तो हम पा लेंगे। और अगर हम बाहर की तरफ खोजते रहें तो और खो देंगे, पाना तो बहुत दूर है। और खो देंगे। कुछ लोग हैं जो भिखारी ही पैदा होते हैं और भिखारी ही मर जाते हैं। धन हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यश हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पद हो, प्रतिष्ठा हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि ये सारी की सारी बाहर की खोजें हैं जिनकी सीमाएं हैं और असीम की आकांक्षा है मन में। और सीमित से तृप्ति कभी भी नहीं हो सकती। कोई किसी प्रेमी से तृप्त नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रेम की आखिरी खोज परम प्रेमी के लिए है। जब तक परमात्मा ही प्रेमी की तरह न मिल जाए तब तक तृप्ति का कोई उपाय नहीं है। खोज तो चल ही रही है।
ओशो, यह खोज है ही क्यों? इसकी जरूरत ही क्या है?
मैंने सुना है, एक समुद्र के किनारे एक मेला भरा हुआ था। बहुत लोग गए थे। दो नमक के पुतले भी गए थे वहां। लोगों में विवाद होने लगा, सागर की गहराई कितनी है? तो नमक के पुतले गुस्से में आ गए, तेजी में आ गए। तो उन्होंने कहा: हम अभी कूद कर पता लगा आते हैं। एक पुतला कूद गया। फिर लोग किनारे पर खड़े देखते रहे। वह नहीं लौटा, नहीं लौटा, नहीं लौटा। बहुत परेशानी हुई। दूसरे पुतले ने कहा: मैं अभी उसका पता लगा कर आता हूं। वह भी कूद गया। वह भी नहीं लौटा, नहीं लौटा, नहीं लौटा। फिर मेला बिछुड़ गया। अब हर साल उसी दिन मेला लगता है, उस समुद्र के तट पर, इसी प्रतीक्षा में कि शायद वे नमक के पुतले अब तक लौट आएं। वे लौटते ही नहीं, क्योंकि सागर में नमक का पुतला जाएगा तो घुलेगा, बह जाएगा, मिट जाएगा, खो जाएगा। लौट कर खबर नहीं दे पाएगा। और भीतर जितना जाएगा उतना मिटता चला जाएगा। ठीक गहराई तक पहुंचते-पहुंचते बचेगा कौन जो पूछ ले कि गहरे कितने हो? कितनी है गहराई? यह पूछने को बचेगा कौन?
ये सब लहर के सुख हैं जो पूछ रही है। प्रश्र्न सब लहर के हैं, उत्तर सब सागर में हैं। लेकिन प्रश्र्न लहरें पूछती हैं, सागर के पास सब उत्तर हैं। और जब लहर सागर में उतरती जाती है तो प्रश्र्न खो जाते हैं, पूछने को कुछ नहीं रह जाता।
यह जो आप पूछते हैं, यह है ही क्यों? यह जगत क्यों है? यह प्रकृति क्यों है? यह होना क्यों है? यह जीवन क्यों है? हम बने क्यों हैं? यह आप पूछते रहें, पूछते रहें, पूछते रहें, कोई उत्तर नहीं है। और कोई उत्तर देता हो तो बेईमान है। उत्तर है नहीं। अब तक दिया नहीं गया, दिया जा सकता नहीं। हां, एक कोई दे सकता है उत्तर जो नीचे है सबके भीतर फैला, जो सब देखा है--आना और जाना और होना। अनंत लीला देखी है। वह दे सकता है उत्तर। तो वहां पहुंच जाएं और उससे पूछ लें। लेकिन अभी तक कोई पूछ नहीं पाया। जो जाता है, मिट जाता है। यानी ऐसा कुछ है कि जब हम उसके सामने खड़े होते हैं तो हम मिट जाते हैं। और जब तक हम होते हैं तब तक वह सामने नहीं होता। मुलाकात सीधी-सीधी नहीं हो पाती कि सामने खड़े हो जाएं और पूछ लें कि क्यों है यह सब?
सच यह है कि यह प्रश्र्न जो है, एब्सर्ड, यह प्रश्र्न जो है गलत ही है। गलत क्यों? गलत इसलिए है कि हम जीवन के अंतिम ‘क्यों’ का उत्तर नहीं पा सकते हैं। वह जो अल्टीमेट वॉय, जो आखिरी ‘क्यों’ है, उसका उत्तर हम नहीं पा सकते हैं। क्यों नहीं पा सकते हैं?
इसलिए नहीं पा सकते हैं कि कोई भी उत्तर मिले, हम फिर उसमें ‘क्यों’ पूछ सकते हैं। कोई भी उत्तर मिले, ‘क्यों’ पूछने में क्या तकलीफ होगी? कोई कहता है, ईश्र्वर ने जगत को बनाया और हम पूछते हैं कि ईश्र्वर को किसने बनाया? अब कोई कहता है कि ‘अ’ नाम के आदमी ने ईश्र्वर को बनाया? हम पूछते हैं, अ नाम के आदमी को किसने बनाया? अब यह पूछना चलता रहे, चलता रहे, चलता रहे, तो इसका अंत कैसे आ सकता है। इसका अंत नहीं आ सकता, क्योंकि जो प्रश्र्न है वह ऐसा है जो हर उत्तर पर लागू हो जाएगा। कैसा भी उत्तर दिया जाए, क्यों फिर भी पूछा जा सकता है, कि क्यों? इसलिए जो बहुत बुद्धिमान हैं, वे क्यों के संबंध में चुप ही रह गए हैं। क्योंकि उनका कहना है कि क्यों की बात ही व्यर्थ है। इसमें पूछा ही नहीं जा सकता। इनफिनिट रिग्रेस, यह अंतहीन हो जाएगी, इसका कोई अर्थ नहीं है।
बच्चों की कहानी पढ़ी होगी। छोटे बच्चे क्यों-क्यों पूछते ही चले जाते हैं। वे पूछते हैं, और आगे? अगर कोई छोटे बच्चों को कहानी सुनाए और कहे कि राजा रानी का विवाह हो गया और फिर वे दोनों आनंद से रहने लगे। हालांकि यह बिलकुल झूठी बात है, विवाह के बाद कोई आनंद से रहता नहीं। लेकिन सब कहानियां यही कहती हैं और इसके आगे कुछ भी नहीं बताती हैं। क्योंकि इसके आगे बताना खतरनाक है, वह तो आदमियों को खुद ही पता चल जाता है कि आगे क्या होता है। इसलिए सब कहानियां यहां खत्म हो जाती हैं कि उनका विवाह हुआ और वे दोनों आनंद से रहने लगे। आगे बात ही नहीं। फिल्म भी यहीं खत्म होती है, कहानी, उपन्यास, सब यहीं खत्म हो जाते हैं। क्योंकि इसके आगे बहुत खतरनाक दुनिया शुरू होती है जिसको कि बताना ठीक नहीं है। लेकिन बच्चे फिर भी पूछते हैं कि फिर क्या हुआ? फिर क्या हुआ? बच्चे हैं कि पूछते ही चले जाते हैं।
मैं एक कहानी पढ़ रहा था बच्चों की। वह कहानी बहुत बढ़िया है। वह आपने भी सुनी होगी। बच्चों ने तो बहुतों ने जानी है। एक बूढ़ी स्त्री है, वह अपने नाती-पोतों को कहानियां सुनाती है। वे नाती-पोते उसका सिर खाए जाते हैं। वे पूछते हैं, फिर? फिर क्या हुआ? वह बूढ़ी थक जाती है। थक जाती है, लेकिन वे पूछते हैं, फिर क्या हुआ? फिर उस बूढ़ी ने एक कहानी ईजाद की। उसने कहा: एक वृक्ष है एक सागर के किनारे। उस पर अनंत पक्षी बैठे हुए हैं। एक पक्षी उड़ा, फुर्र.। तो उसके बेटों ने पूछा, फिर क्या हुआ? उसने कहा: दूसरा पक्षी उड़ा, फुर्र.। पूछे, फिर क्या हुआ? वह बुढ़िया उत्तर देती चली जाती है। फिर सब बेटे धीरे-धीरे थक जाते हैं। उन्होंने कहा, बस यही होता रहा? फिर क्या हुआ? वह बुढ़िया कहती है, एक पक्षी उड़ा फुर्र.। और वह बुढ़िया कहती है, अनंत पक्षी बैठे हैं उस वृक्ष पर, इसलिए अब थकेगी नहीं, यह कहानी, अब खत्म नहीं होगी यह कहानी, यह चलती रहेगी। फिर सब बेटे थक जाते हैं और सो जाते हैं।
हम जो क्यों पूछते हैं, वह अंतहीन हो जाएगा, उसका कोई अर्थ नहीं है। हम पूछते हैं, आदमी क्यों हुआ? हम बेमानी प्रश्र्न पूछ रहे हैं। हम कोई भी उत्तर देंगे, हम फिर पूछेंगे, वह क्यों हुआ? हमें लगेगा, हम बहुत बुद्धिमानी का प्रश्र्न पूछ रहे हैं। बहुत से तथाकथित बुद्धिमान ऐसे प्रश्र्न पूछते भी रहे हैं। शास्त्र भरे हैं इस तरह के प्रश्र्नों से। लेकिन सब बच्चों के प्रश्र्न हैं, बुद्धिमानों के प्रश्र्न नहीं हैं। क्योंकि बुद्धिमान एक बात समझ लेगा कि ‘क्यों’ का उत्तर संभव नहीं है। क्योंकि ‘क्यों’ हर उत्तर पर लागू हो सकता है। इसलिए पहले ही क्यों का उत्तर क्यों देना? क्योंकि उससे कोई मतलब ही नहीं है--आगे, आगे, आगे होता चला जाएगा।
मैं नहीं देता उत्तर। मैं यह कहता हूं, जीवन है। आना हुआ है, जाना होगा। क्यों है, मुझे पता नहीं है। किसी को भी पता नहीं है। लेकिन अज्ञान को स्वीकार करने में भी बड़ी कठिनाई है। सभी पंडितों को यह खयाल है कि उनको सभी पता होना चाहिए। सभी ज्ञानियों को यह भ्रम है कि उन्हें सर्वज्ञ होना चाहिए। वे परमात्मा को जानने के लिए कुछ बचने ही नहीं देना चाहते हैं। वे पूरा खुद ही जान लेना चाहते हैं। लेकिन वे कितना ही जान लें, आखिरी क्यों का उत्तर आज तक किसी शास्त्र में नहीं है और न किसी बुद्ध ने दिया, न किसी महावीर ने, न किसी कृष्ण ने, न किसी क्राइस्ट ने। आज तक आखिरी क्यों का उत्तर दिया ही नहीं गया है। इसलिए नहीं कि वे लोग नहीं जानते थे, बल्कि इसलिए कि वह दिया ही नहीं जा सकता है। वह अल्टीमेट क्वेश्र्चन, आखिरी, अंतिम प्रश्र्न का अर्थ ही यह होता है कि उसका उत्तर नहीं है। और अगर आप उसे खोजने जाएंगे तो प्रश्र्न मिटेगा और साथ ही आप भी मिट जाएंगे। अगर आप चरम प्रश्र्न की खोज में गए तो आप भी खो जाएंगे, जैसे नमक का पुतला सागर में खो गया।
कबीर ने कहा है कि बहुत खोजता था; बहुत खोजता था; खोजते-खोजते फिर खुद ही खो गया। बहुत खोजा, बहुत खोजा, फिर खोजते-खोजते खुद ही खो गया। और जब खुद खो गया तब वह मिल गया जिसकी खोज थी। और जब तक खोजता था वह न मिला, क्योंकि तब तक मैं था। इन दोनों का मिलना नहीं होता। वह गली बहुत संकरी है, कबीर कहते हैं, बहुत संकरी है, क्योंकि उसमें दो नहीं समाते। उसमें जब तक हम समाए रहते हैं, तब तक वह लापता रहता है, और जब वह आ जाता है तब अचानक हम पाते हैं कि हम गए। क्योंकि लहर जब तक लहर की तरह अपने को जानती है, तब तक अपने को सागर की तरह नहीं जान सकती है। यह दोनों जानना एक साथ कैसे हो सकते हैं कि एक लहर अपने को लहर की तरह भी जाने और साथ ही अपने को सागर की तरह भी जान ले। जिस क्षण वह जानेगी कि मैं सागर हूं उस क्षण जानेगी कि अब मैं लहर न रही। और जब तक वह जानती है, मैं लहर हूं, तब वह जानती है, मैं लहर हूं और सागर नहीं हूं। इसलिए लहर की और सागर की कभी मुलाकात नहीं होती। लहर और सागर का मिलन होता है, मुलाकात नहीं होती। लहर खो जाती है, सागर हो जाती है। लेकिन मुलाकात नहीं होती, क्योंकि मुलाकात होने के लिए लहर को अब भी होना जरूरी है।
इसलिए आदमी और ईश्र्वर की अभी तक कोई वार्ता, कोई डायलॉग, कोई बातचीत नहीं हुई, आमने-सामने बैठ कर कोई बात नहीं हुई। लेकिन अगर कभी हो जाए तो सब हो सकता है। जीवन इतना रहस्यपूर्ण है कि पता नहीं, क्या हो जाए। कभी हो जाए तो कागज में ठीक से लिख कर रखना, ताकि वह वक्त पर भूल न जाओ। वह भूल सकता है। यह ध्यान में रहे कि हमारे अधिकतम प्रश्र्न, जो जीवन के संबंध में उठते हैं, वे हमारे दुख, हमारी बेचैनी, हमारी चिंता, हमारी परेशानी के प्रश्र्न हैं।
जैसे एक आदमी को सन्निपात हो गया, उसे बुखार चढ़ा और डिग्रियां बढ़ती चली गईं और थर्मामीटर अपनी आखिरी सीमा बताने लगा और घर के लोगों से वह आदमी पूछता है कि मेरी खाट उड़ रही है--पूरब उड़ रही है कि पश्र्चिम उड़ रही है, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मुझे बताओ, मेरी खाट पूरब उड़ती है कि पश्र्चिम? तो घर के लोग कहते हैं, शांत पड़े रहो, थोड़ी देर में ठीक हो जाओगे। लेकिन वह आदमी कहता है, ठीक और गलत का सवाल नहीं है। अभी तो सवाल यह है कि मेरी खाट उड़ रही है, वह पूरब उड़ रही है कि पश्र्चिम उड़ रही है? अब घर के लोग क्या करें? उसे उत्तर दें? और क्या कोई ठीक उत्तर दिया जा सकता है? अगर घर के लोग कहें, पूरब उड़ रही है तो भी गलत है, क्योंकि खाट उड़ ही नहीं रही है। अगर घर के लोग कहें पश्र्चिम उड़ रही है तो भी गलत है। अगर घर के लोग कहें, उड़ ही नहीं रही है तो सन्निपात वाला हंसता है। वह कहता है, पागल हो? न उड़ रही होती तो मैं पूछता क्यों? उड़ रही है, यह तो पक्का रहा, इसकी तो बात ही मत उठाओ। सवाल यह नहीं है कि उड़ रही है कि नहीं उड़ रही है। सवाल यह है कि पूरब उड़ रही है कि पश्र्चिम उड़ रही है। तो घर के लोग उसके सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखते हैं, डाक्टर को भागते हैं लेने। क्योंकि घर के लोग उसके प्रश्र्न का उत्तर देने नहीं बैठ जाते, क्योंकि वे कहते हैं, उत्तर देने में खतरा हो सकता है। वह आदमी मरने के करीब है। वे भागते हैं, वे उससे कहते हैं, जरा ठहरो, बुखार उतर जाने दो फिर बता देंगे। वह इस आशा में यह कहते हैं कि बुखार उतर जाने पर वह पूछेगा ही नहीं। बता तो फिर भी न सकेंगे, क्योंकि खाट उड़ ही न रही थी। सिर्फ एक आशा है कि बुखार उतर जाएगा तो वह पूछेगा नहीं। और क्या आप को खयाल है कि बुखार उतर जाने पर वह पूछेगा? बुखार उतर जाने पर घर के लोग ही पूछेंगे कि क्या खयाल है? खाट पश्र्चिम उड़ रही है कि पूरब? तो वह हंसेगा। वह कहेगा, पागल हो गए हो? खाट उड़ ही नहीं रही।
हमारे जो प्रश्र्न हैं--जिनको हम मेटाफिजिकल कहते हैं, बड़े दार्शनिक कहते हैं, बड़े गहरे प्रश्र्न कहते हैं, बहुत गहरे-वहरे नहीं हैं। हमारे चित्त की बेचैनी और अशांति से उठे हुए प्रश्र्न हैं। क्या आपको पता है कि कभी आपने सुख की हालत में पूछा हो कि सुख क्यों है? कभी नहीं। एक आदमी ने नहीं पूछा आज तक। जब कोई आदमी पूरे सुख की हालत में होता है तो वह यह नहीं पूछता कि सुख क्यों है। लेकिन जब दुख की हालत में होता है तो पूछता है कि दुख क्यों है? जब कोई आदमी स्वस्थ होता है तो कभी पूछता है कि स्वास्थ्य क्यों है? नहीं। लेकिन जब बीमार होता है तो पूछता है कि बीमारी क्यों है? जब कोई आदमी किसी को प्रेम करता है और प्रेम में जीता है और प्रेम में होता है तो वह यह नहीं पूछता है कि प्रेम क्यों है। लेकिन जब प्रेम टूट जाता है और चित्त दर्पण की तरह खंड-खंड होकर बिखर जाता है तब वह पूछता है कि प्रेम टूट क्यों जाता है? जब किसी मां का बेटा जिंदा होता है तो वह कभी नहीं पूछती कि बेटा जिंदा क्यों है, लेकिन जब वह मर जाता है तो वह छाती पीटती है और कहती है कि मेरा बेटा मर क्यों गया?
कभी आपने सोचा कि यह ‘क्यों’ हमेशा दुख में ही उठता है? यह क्यों, कभी सुख में नहीं उठता। असल में जीवन हमारा इतने दुख में है कि हम पूरे जीवन के संबंध में पूछते हैं कि जीवन क्यों है? यह प्रश्र्न जो है, मेटाफिजिकल नहीं है, दार्शनिक नहीं है, साइकोलॉजिकल है, मानसिक है। और इसका उत्तर दर्शनशास्त्र में नहीं है, इसका उत्तर मनसशास्त्र में है। मनसशास्त्र यह कहता है कि जब कोई आदमी पूछे किसी चीज के संबंध में कि यह क्यों है, तो उसका उत्तर मत देना, समझना कि उसकी स्थिति गड़बड़ी में पड़ गई है। उसका इलाज करना। एक मां पूछती कि मेरा बेटा क्यों मर गया है? तो हम क्या उत्तर देते हैं? उसने बेटे के होने को तो चुपचाप स्वीकार किया था, न होने को वह स्वीकार नहीं कर पाती। वह दुख से भर गई है, वह पीड़ा से भर गई है।
हम जब प्रश्र्न पूछते हैं पूरे जीवन के संबंध में तो उसका मतलब है कि पूरा जीवन हमारा दुख, चिंता, उदासी और गहरी पीड़ा से भर गया है। इसलिए प्रश्र्न उठ रहा है। अगर आनंद से भर जाएगा, प्रश्र्न खो जाएगा। जिस दिन पूरे आनंद को कोई जीता है, उस दिन प्रश्र्न पूछता ही नहीं। असल में सब दर्शन, सब फिलासफी दुख से पैदा होते हैं। सब दुखी चित्त के जन्म हैं। आनंदित क्यों पूछें, क्यों? सवाल ही नहीं उठता, खयाल ही नहीं आता। आनंद तो स्वीकृत हो जाता है। तब क्यों का सवाल नहीं उठता है।
मैं आपसे यह नहीं कहता हूं कि आप न पूछें। जब तक चित्त दुखी है, पूछेंगे ही। पूछते ही रहेंगे। लेकिन ध्यान रहे, दुखी चित्त रहेगा, पूछते रहें, उत्तर नहीं मिलेगा। न दुखी चित्त मिटेगा। इस ‘क्यों’ को एक सिंबल, एक प्रतीक समझना दुखी चित्त का और प्रश्र्नों की खोज में न जाकर दुखी चित्त को मिटाने की खोज में चले जाना। जिस दिन चित्त आनंद से भर जाएगा, उसी दिन प्रश्र्न विदा हो जाएंगे। ऐसे गिर जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कभी थे भी।
जो लोग ज्ञान को उपलब्ध हुए हैं, हम समझते हैं कि उनको सभी प्रश्र्नों के उत्तर मिल गए होंगे, तो हम बहुत गलत समझते हैं। जो लोग ज्ञान को उपलब्ध हुए हैं, वे वे लोग नहीं हैं जिन्हें सभी प्रश्र्नों के उत्तर मिल गए। वे वे लोग हैं, जिनके सभी प्रश्र्न गिर गए। जिनके पास कोई प्रश्र्न ही न रहा।
प्रश्र्न पूछता है अज्ञान से भरा चित्त। ज्ञान से भरा चित्त प्रश्र्न नहीं पूछता। ऐसा नहीं है कि उत्तर मिल जाते हैं। मैंने कहा न, सन्निपात से उतर आया आदमी वापस, तो अब यह थोड़े ही है कि उसको उत्तर मिल जाता है कि खाट पूरब उड़ती थी कि पश्र्चिम। उत्तर नहीं मिलता है, सिर्फ प्रश्र्न गिर जाते हैं।
यह खयाल रखना, ज्ञान में प्रश्र्न गिरते हैं, उत्तर नहीं मिलते। सिर्फ प्रश्र्न गिर जाते हैं। और जिसे मैं ध्यान कह रहा हूं वह प्रश्र्नों को गिरा देने की प्रक्रिया है। वहां सब प्रश्र्न गिर जाते हैं और चित्त उस आनंद में पहुंच जाता है जो निष्प्रश्र्न है, जो अनक्वेश्र्चंड है, जो बिना प्रश्र्न पूछे भीतर खड़ा होगा और जिसमें हम इस भांति लीन हो जाते हैं कि प्रश्र्न पूछ कर भी उसका खंडन करने की हिम्मत हम न करेंगे, क्योंकि प्रश्र्न पूछने से बाधा हो जाएगी। इतने रस में विभोर जब चित्त हो जाता है तो प्रश्र्न नहीं पूछता, क्योंकि डरता है कि प्रश्र्न पूछा तो कहीं रस खंडित न हो जाए। कहीं प्रश्र्न पूछा तो संगीत का बहाव टूट न जाए, कहीं प्रश्र्न पूछा.। यह भी सवाल नहीं उठता कि मैं पूछूं कि न पूछूं। सब खो जाता है। सब चुप हो जाता है, सब मौन हो जाता है।
उस मौन में हम जानते हैं, उत्तर नहीं, यही कि हमारे सब प्रश्र्न गलत थे। अज्ञान से उठे थे। यही कि हमने पूछा, वही भूल थी। और तब हमें गुरुओं पर बहुत हंसी आती है। क्योंकि तब पता लगता है कि जो हमने पूछा था, वह तो पागलपन था ही, लेकिन जिन्होंने उत्तर दिए थे वे भी गजब के पागल थे।
अब एक आदमी सन्निपात से नीचे उतर आया, अब उसे पता चला कि खाट उड़ती ही न थी, सिर्फ सन्निपात में प्रतीत होती थी कि उड़ रही है।
अब अगर घर में किसी ने उसको उत्तर दिया होगा कि पूरब उड़ती है तेरी खाट, तो वह आदमी कहेगा, यह आदमी पागल मालूम होता है। मैं तो सन्निपात में था, यह ठीक। लेकिन इस आदमी ने कहा कि पूरब उड़ती है।
इसलिए मैं कहता हूं, जिस दिन जीवन में वह क्रांति उतरती है जिसे परमात्मा का मिलन कहें, उस दिन सभी गुरु एकदम पागल मालूम होते हैं। उस दिन बड़ी हैरानी होती है कि कैसे-कैसे जवाब देने वाले थे।
कोई कहता था सात स्वर्ग हैं, कोई कहता था सात नरक हैं। कोई कहता था तीन हैं, कोई कहता था छह हैं। कोई कुछ कहता था, कोई कुछ कहता था। हजार उत्तर थे, लाख उत्तर थे। हजार संप्रदाय थे, लाख गुरु थे। न मालूम कितने-कितने पंथ थे, न मालूम क्या-क्या जवाब थे। और मजा यह है कि वह जो प्रश्र्न पूछा था वह अज्ञान में पूछा गया था। उसका कोई उत्तर ही न था। वह प्रश्र्न ही गलत था। असल में अज्ञान में ठीक प्रश्र्न पूछे ही नहीं जा सकते।
अज्ञान में ठीक प्रश्र्न कैसे पूछे जा सकते हैं? अंधा आदमी प्रकाश को नहीं जानता तो प्रकाश के संबंध में ठीक सवाल कैसे पूछ सकता है? और आंख वाला प्रकाश को जानता है इसलिए सवाल ही नहीं पूछता। सवाल पूछने की कोई जरूरत नहीं है।
अब यह दिक्कत है जीवन की कि आंख वाला सवाल नहीं पूछता प्रकाश के संबंध में। जो कि पूछे तो कुछ मतलब हो। और अंधा पूछता है जिसके पूछने का कोई मतलब नहीं है। यहां हालतें ऐसी हैं कि लंगड़े चलने की कोशिश करते हैं और जिनके पैर हैं वे आराम से बैठे हुए हैं। अंधे रास्ता खोज रहे हैं और जिनके पास आंखें हैं वे विश्राम कर रहे हैं, वे रास्ता ही नहीं खोजते।
ज्ञानी वह नहीं है जिसको सब प्रश्र्नों के उत्तर मिल गए। ज्ञानी वह है जो उस जगह पहुंचा शांति की जहां उसने पाया सब प्रश्र्न फिजूल हैं। और चुप हो गया, और नहीं पूछा, और पा गया सब।
जानना, प्रश्र्नों का उत्तर नहीं है। जानना, प्रश्र्नों का अभाव है, एब्सेंस है, अनुपस्थिति है। ध्यान यही प्रयोग है जहां सब अनुपस्थित हो जाता है और लहर धीरे से उतर कर सागर के साथ एक हो जाती है।
और बहुत से प्रश्र्न रहे, वह कल मैं बात करूंगा।
सुबह हम यहां ध्यान के लिए बैठ जाएंगे। तो जिनको उस जगह पहुंचना हो जहां कि उससे प्रश्र्न पूछा जा सके--परमात्मा से, सागर से--वे सुबह आ जाएं। लेकिन सुबह सिर्फ वे ही लोग आएं जो लहर छोड़ कर सागर में उतरने के लिए उत्सुक हों। जो इतने अशांत हो गए हैं कि अब शांति की तरफ जाने का जिन्हें खयाल आए।
मेरी बातों को इतनी शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
What is the relationship between God and our existence?
According to Osho, God is the ocean of consciousness; we are its waves—arising and subsiding without ever being separate. The ocean (Divine) simply is, eternally present; waves (individuals) come and go, imagining separateness because they perceive only other waves. Our existence depends wholly on this source and on all other waves; God can be without us, but we cannot be without God.
In simple terms: We are like waves in a vast ocean called God—appearing and disappearing, but never separate from the water that holds us.
Why is it important to seek knowledge if we ultimately return to the source?
According to Osho, seeking is vital because the urge to know is built into life itself: life asks, “What is it?” When we inquire and discover our true nature—the ocean, not the wave—we live totally. This knowing dissolves fear of death and anxiety, transforms our meaning of living, and grants a fearless, joyful freedom no outer power can threaten.
In simple terms: We look for answers because life wants to know itself, and when we realize we’re the big ocean, not a tiny wave, fear fades and living becomes free and joyful.
Why doesn't meditation spread across the whole country if it brings peace to life?
According to Osho, meditation doesn’t spread because very few truly long for peace. We live lukewarmly—never fully restless or aflame—so the inner fire that compels the search for silence never ignites. Desires scatter toward money, status, family, and health. Only when restlessness matures to its peak does the turning inward begin; peace comes in a flash when the longing is total.
In simple terms: Most people aren’t desperate for peace yet, so they chase other things and don’t start meditating until their longing becomes strong and clear.
What is the need for the search?
According to Osho, the search is needed not to collect answers to “why,” but to arrive at the source where the questioner dissolves. Questions belong to the wave; answers belong to the ocean. On meeting the divine, the urge to ask disappears into silence. True resolution is experiential—merging with what is—because verbal answers spawn endless whys and keep you outside reality.
In simple terms: Search not for explanations, but to melt into the ocean where all questions naturally disappear.

Osho's Commentary
मेरे प्रिय आत्मन्!