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Questions in this Discourse
ओशो, आप विश्वास को सतही और गलत कहते हैं। आप कहते हैं कि सत्य को मानना नहीं, जानना है। लेकिन मनस्विद कहते हैं कि मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है। इस दृष्टि से क्या साधना में विचार और विश्वास का उपयोग किया जा सकता है?
अगर कोई व्यक्ति निरंतर किसी बात को अपने ऊपर आरोपित करता रहे तो वह आत्म-सम्मोहन है, ऑटो-हिप्नोसिस है। उसे भी लगेगा वैसा ही हो गया, दूसरों को भी लगेगा वैसा ही हो गया। दूसरों को तो स्वभावतः लगेगा क्योंकि दूसरे केवल तुम्हारे बहिरंग को ही देख सकते हैं, तुम्हारे अंतरंग को तो केवल तुम ही देख सकते हो। लेकिन भीतर अगर कोई जरा झांकेगा तो पाएगा ऊपर-ऊपर सब बदल गया, सब रंग ऊपर-ऊपर है; और भीतर? भीतर तो जो था, जैसा था वैसा का वैसा है; उसमें अंतर नहीं पड़ता है।
विचार आत्मा को रूपांतरित नहीं करते हैं, न कर सकते हैं। विचार की सामर्थ्य क्या है? विचार की सामर्थ्य आत्मा से बड़ी नहीं है। लहरें कहीं सागर को रूपांतरित कर सकती हैं? हां, सागर रूपांतरित हो तो लहरें रूपांतरित हो जाती हैं। विचार तो तरंगे हैं तुम्हारे अनंत चैतन्य के सागर की, बस लहरें हैं--ऊपर-ऊपर, इनको तुम रंग भी डालो, इनको तुम बदल भी डालो, तो भी तुम्हारा जीवन-अस्तित्व वैसा का वैसा रहेगा जैसा था। हां, एक भ्रांति जरूर पैदा हो जाएगी, और भयंकर भ्रांति पैदा हो सकती है, और भ्रांति महंगंी चीज है, बहुत महंगा सौदा है क्योंकि तुम भ्रांति में जीओगे और जीवन हाथ से खिसकता चला जाएगा।
कोई व्यक्ति अभ्यास करे शांत होने का और निरंतर अभ्यास करे, कोई भी अवस्था में अशांति को प्रकट न होने दे--कोई गाली भी दे तो पी जाए, पत्थर आएं सह जाए, अपमान हो, अपने को अछूता रखे; भीतर तो तिलमिलाहट होगी मगर उसे बाहर न आने दे; ऐसा साधता रहे, अशांति के किसी भी अवसर को अशांति पैदा न करने दे और जहां-जहां शांति का कोई अवसर मिले वहां शांति को प्रकट करे; कम से कम अभिनय करे, तो धीरे-धीरे, केवल समय की बात है, शांति उसका अभ्यास हो जाएगी। और उस अभ्यास से सबसे बड़ा खतरा यही है कि उसे भ्रांति होगी कि मैं शांत हो गया।
एक गांव में एक बहुत अशांत और बहुत क्रोधी व्यक्ति था। इतना क्रोधी, इतना अशांत कि गांव ने ऐसा व्यक्ति नहीं जाना था। पूरा गांव उससे पीड़ित था। दुष्ट था, शक्तिशाली भी था, धनी भी था। क्रोध में जो न कर गुजरे...एक दफे घर को ही उसने अपने आग लगा दी। और एक बार अपनी पत्नी को धक्का देकर कुएं में गिरा दिया। पत्नी की मृत्यु हो गई। उसी समय गांव में एक जैन मुनि आए थे, दिगंबर जैन मुनि। पत्नी की मृत्यु ने उसे भी झकझोर दिया, बड़ा वैराग्य उदय हुआ। जाकर जैन मुनि के चरणों में सिर रख दिया और कहा कि मुझे भी दीक्षा दें, मैं मुनि होना चाहता हूं। हो गया बहुत, देख लिया संसार बहुत, दुख ही दुख है, पाप ही पाप है, इस गर्हित गड्ढे से मुझे उबारो!
दिगंबर जैन मुनि होने की तो सीढ़ियां हैं--पहले कोई ब्रह्मचारी होता है फिर कोई छुल्लक होता है, फिर एलक...ऐसी सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते कोई नग्न दिगंबर अवस्था तक पहुंचता है। लेकिन उस आदमी ने कहा कि नहीं, मैं तो अभी, इसी वक्त मुनि होने को तैयार हूं।
मुनि भी चमत्कृत हुए--ऐसा संकल्प, ऐसी दृढ़ता! यद्यपि वे समझ न पाए कि न तो यह संकल्प है, न यह दृढ़ता है; यह वही पुराना क्रोधी स्वभाव है, जो क्षण में पत्नी को कुएं में ढकेल दे, वह क्षण में अपने को भी मुनित्व में ढकेल सकता है। जो घर में आग लगा दे, जरा से क्रोध में, वह अपनी जिंदगी में भी आग लगा सकता है। लेकिन मुनि तो बहुत आह्लादित हुए, उन्होंने तत्क्षण उसे दीक्षा दी। और कहा, बहुत लोग आते हैं, बहुत खोजी आते हैं मगर तुम जैसा खोजी नहीं। और चूंकि तुमने क्रोध के जीवन का परित्याग किया है, तुम्हें मैं नाम देता हूं--मुनि शांतिनाथ।
शांतिनाथ की ख्याति बहुत फैली क्योंकि दूसरे मुनि अगर दिन में एक बार आहार करते तो शांतिनाथ दो दिन में एक बार आहार करते। दूसरे मुनि अगर सीधे-सपाट रास्तों पर चलते तो शांतिनाथ इरछे-तिरछे, कंकड़-पत्थरों, कांटों से भरे रास्तों पर चलते। दूसरे मुनि अगर वृक्षों की छाया में बैठते तो शांतिनाथ सूरज के नीचे, जलती हुई आग बरसती हो, वहां खड़े होते। सर्दी के दिन होते तो दूसरे मुनि घास-फूस को ओढ़ कर सो रहते मगर शांतिनाथ खुले आकाशे के नीचे, नग्न पड़े रहते। ख्याति बढ़ने लगी, लेकिन इस सबके पीछे वही क्रोधी स्वभाव था, वही अहंकारी स्वभाव था। क्योंकि क्रोध अहंकार की छाया है, क्रोध अहंकार की ही परिणति है--जितना अहंकार होता है, उतना ही क्रोध होता है। अब क्रोध ने नया रूप लिया था--तपस्वी का, तपश्चर्या का, पुण्य का। अहंकार ने अब नये आभूषण पहने थे--दिगंबरत्व के, नग्नता के, त्याग के, व्रत के, नियम के।
कल ही भीखा ने कहा न--कि करो त्याग, करो तपश्चर्या, करो दान, करो नियम, करो व्रत, कुछ भी न होगा। अगर अहंकार न मरे तो कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि अहंकार इन सबका अपशोषण कर लेता है। अहंकार इतना कुशल है कि श्रेष्ठतम वस्तु को भी पचा जाता है। और यह तो शुद्ध अहंकारी आदमी था। इसकी ख्याति फैलती चली गई, फैलती चली गई। दूर-दूर से इसे निमंत्रण आने लगे।
वर्षों बाद मुनि शांतिनाथ दिल्ली में विराजमान थे। उनके गांव का एक युवक जो उनके साथ ही पढ़ा था, उनके साथ ही बड़ा हुआ था, उनके दर्शन को आया। देखते ही शांतिनाथ उसे पहचान तो गए, लेकिन क्या पहचानना दो कौड़ी के इस आदमी को! न पहचानते यह सवाल ही न था, वर्षों साथ थे, लंगोटिया यार थे, लड़े थे, झगड़े थे, दोस्ती की थी, साथ-साथ वर्षों जीए थे। मित्र ने देख तो लिया कि पहचान गए हैं मगर नहीं पहचानना चाहते हैं। क्योंकि कहां अब मुनि शांतिनाथ और कहां तुम संसारी, जमीन-आसमान का फर्क हो गया; कहां तुम नारकीय और कहां वे मोक्ष में विराजमान! तुम्हें पहचानें, यह भी अपमानजनक है; कभी तुमसे कोई संबंध रहा, यह भी दीनता प्रकट करेगा तो मुंह फेर लिया, औरों से बात करने लगे।
वह आदमी आया था बड़े भाव से; यह ढंग देखा तो खयाल उठा कि कुछ फर्क हुआ नहीं, बात वहीं की वहीं है। नग्नता क्या करेगी? तपश्चर्या क्या करेगी? ऊपर से आरोपित आचरण क्या करेगा? आत्मा वही की वही है। उसने परीक्षा के लिए पूछा कि महाराज, क्या मैं आपका नाम पूछ सकता हूं?
शांतिनाथ तो एकदम आगबबूला हो गए, बाहर नहीं आई आग, अभ्यास काफी था, मगर भीतर तो एक लपट आ गई। भलीभांति पता है इस आदमी को कि मेरा नाम क्या है! पुराना नाम भी पता है, नया नाम भी पता है। लेकिन प्रत्यक्ष में इतना ही कहा: अरे मूढ़! अखबार नहीं पढ़ता? सारी दुनिया जानती है मैं कौन हूं, तुझे पता नहीं है! मेरा नाम है शांतिनाथ!
मित्र को तो पक्का भरोसा आ गया कि जो सोचा था, ठीक ही सोचा था। मैंने तो नाम ही पूछा था, इतना क्रुद्ध हो जाने की क्या जरूरत थी। थोड़ी देर इधर-उधर की बात हुई, उस आदमी ने फिर कहा: महाराज, मेरी जरा स्मृति कमजोर है, मैं भूल गया, आपने क्या नाम बताया था?
पास में कोई कुआं होता तो शांतिनाथ धक्का दे देते मगर वहां कोई कुआं था भी नहीं। फिर अभ्यास, तपश्चर्या, नियम, व्रत की बड़ी दीवाल भी थी बीच में; एकदम उसको छलांग भी नहीं सकते थे। वही प्रतिष्ठा भी थी, उसको तोड़ भी नहीं सकते थे। कहा: मूढ़ मैंने बहुत देखे मगर तू महामूढ़ है। सुना नहीं तूने, ठीक से सुन ले, एक बार और कहे देता हूं, मेरा नाम मुनि शांतिनाथ।
फिर थोड़ी देर इधर-उधर की बात चली और उस आदमी ने कहा: महाराज, बस एक बार और, आपका नाम क्या है?
इतना सुनना ही था कि टूट गए सब नियम-व्रत, भूल गई सब साधना, उठा लिया पास में पड़ा एक डंडा, मार दिया उसकी खोपड़ी में और कहा कि अब समझ तभी तुझे याद रहेगा, मेरा नाम शांतिनाथ।
उस आदमी ने कहा: महाराज, नाम तो मुझे आपका भलीभांति याद है, मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि नाम ही है, आप वही के वही हैं, कहीं कोई अंतर नहीं पड़ा है।
ऊपर से आदमी साध ले सकता है। मनस्विद ठीक कहते हैं कि तुम जैसा विचार करोगे वैसे हो जाओगे, मगर विचार में ही हो पाओगे। और विचार जरूर तुम्हारे आस-पास एक वर्तुल बना देंगे, मगर विचार तुम्हारी आत्मा को रूपांतरित नहीं करते। आत्मा तो रूपांतरित होती है निर्विचार में, शून्य में, ध्यान में, समाधि में। लेकिन मनस्विद इस संबंध में कुछ भी नहीं कह सकते क्योंकि मनस्विद विचार के पार जाते ही नहीं। यही तो दुर्भाग्य है आधुनिक मनोविज्ञान का कि वह मन के पार और कोई अस्तित्व मानता नहीं है, बस मन पर समाप्ति है। इसलिए मनस्विद मनुष्य के संबंध में जो भी कहता है, वे अधूरे सत्य हैं। और स्मरण रहे अधूरे सत्य झूठों से भी ज्यादा घातक होते हैं, क्योंकि उनमें सत्य की थोड़ी सी झलक होती है; झूठ तो बिलकुल झलक रहित होता है, उसे पहचान लेने में कठिनाई नहीं। अधूरे सत्य, अधकचरे सत्य बहुत खतरनाक होते हैं क्योंकि भ्रांति देते हैं सत्य की, आभा, झलक सत्य की देते हैं और सत्य होते भी नहीं।
मनोविज्ञान आधे में अटका है--न तो मनोविज्ञान पदार्थवादी है कि कह सके हिम्मत से कि सिर्फ पदार्थ है और कुछ भी नहीं; और न आत्मवादी है कि कह सके कि आत्मा ही है परम सत्य, शेष सब सीढ़ियां हैं। मनोविज्ञान दोनों के मध्य में अटका है। मनोविज्ञान है धोबी का गधा, न घर का, न घाट का। न तो शरीर को ही परिसमाप्ति मानता है और न आत्मा तक आंखें उठाता है। दोनों के बीच में है मन, शरीर और आत्मा के बीच में है विचार का जगत, मनोविज्ञान अभी विचार के जगत में ही उलझा है। इसलिए मनोविज्ञान की जो उपलब्धियां हैं, कोई बड़ी उपलब्धियां नहीं हैं।
मनोविश्लेषक तीन साल, चार साल, पांच साल के मनोविश्लेषण के बाद भी कोई बड़ी सहायता मानसिक रूप से रुग्ण लोगों को नहीं पहुंचा पाता। इतनी सहायता तो कुछ दिनों के ध्यान से ही मिल जाती है। इतनी सहायता तो जापान में एक पुरानी परंपरागत व्यवस्था है, कि जब भी कोई पागल या विक्षिप्त हो जाता है तो उसे ले जाते हैं बौद्ध आश्रम में। हर बौद्ध आश्रम में आश्रम निवासियों से दूर कुछ झोपड़े होते हैं। उनमें पागलों को रख देते हैं, उनको खाना पहुंचा देते हैं, न उनसे कोई बात करता, न उनसे कोई चीत करता, उन्हें बिलकुल अकेला छोड़ देते हैं। और हैरानी की बात है कि तीन-चार सप्ताह में पागल ठीक हो जाता है। सिर्फ अकेला छोड़ देते हैं। परिवार, समाज से अलग खींच लेते हैं, उसकी जरूरतें पूरी कर देते हैं लेकिन उससे कोई बातचीत नहीं करता।
मनोवैज्ञानिक चार-पांच साल बातचीत और सिर फोड़ने के बाद--खुद का भी और मरीज का भी--इतनी सहायता नहीं पहुंचा पाता जितना झेन फकीर जापान में तीन-चार सप्ताह के एकांत निवास से पहुंचा देते हैं। अब तो पश्चिम से इस प्रक्रिया को समझने के लिए लोग जापान जा रहे हैं।
क्या कारण होगा? इतनी आसानी से हल हो जाता है! बड़े सत्य अगर स्वीकार किए जाएं तो छोटी बीमारियां क्षण में तिरोहित हो जाती हैं। लेकिन अगर तुम बीमारियों के ऊपर देखो ही न तो बीमारियां बहुत बड़ी मालूम होती हैं। जिसने अपना आंगन ही देखा है और आकाश नहीं, उसे आंगन बहुत बड़ा मालूम होता है।
पुरानी कहानी है। एक लोमड़ी सुबह-सुबह उठी। भूख लग आई थी, नाश्ते की तलाश में चली। उसने लौट कर अपनी छाया देखी। बड़ी छाया बन रही थी। सुबह का सूरज उग रहा था सामने, बड़ी छाया बनी। उस लोमड़ी ने कहाकि आज तो एक ऊंट मिले शिकार के लिए तो ही नाश्ता हो सकेगा। दोपहर तक ऊंट को खोजती रही। ऊंट मिल भी जाता तो क्या करती? ऊंट मिला भी नहीं, भूख बढ़ती भी गई, फिर उसने लौट कर एक बार छाया को देखा। अब दोपहरी थी, सूरज ऊपर आ गया था, छाया बिलकुल सिकुड़ कर नीचे पड़ रही थी, करीब-करीब न के बराबर। वह लोमड़ी कहने लगी अब तो एक चींटी भी मिल जाए तो काफी!
छाया को देख कर अगर तुम निर्णय करोगे तो तुम्हारे निर्णय बहुत कीमती नहीं हो सकते। विचार तो छाया मात्र हैं, और विचार तो तुम्हारी विक्षिप्तता है। विक्षिप्तता को ही अगर अंतिम मान लेना है तो फिर इस विक्षिप्तता से समाधान कैसे होगा? समाधान कहां से आएगा? इसलिए सिग्मंड फ्रायड ने, इस सदी के सबसे बड़े मनस्विद ने, अपने अंतिम निष्कर्षों में यह बात कही है कि मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता, ज्यादा से ज्यादा हम इतना ही कर सकते हैं कि मनुष्य को सामान्य रूप से दुखी रहने का अभ्यास करवा दें। सामान्य दुख से संतुष्ट रहना सिखा दें, इतना ही कर सकते हैं, मनुष्य सुखी कभी नहीं हो सकता। यह निष्कर्ष इस बात का सबूत है कि बस आंगन को ही सब मान लिया तो अब हल कैसे हो?
हल हमेशा पार से आते हैं। हल हमेशा विराट से आते हैं। समाधान के लिए तुम ही सब कुछ नहीं हो, तुमसे भी ऊपर कुछ है--तो ही मार्ग खुलता है। अन्यथा मार्ग नहीं खुलता। परमात्मा को स्वीकार किए बिना मनुष्य कभी आनंदित नहीं हो सकता और परमात्मा को अस्वीकार किया कि फिर मनुष्य अपनी विक्षिप्तता में ही जी सकता है। फिर सिग्मंड फ्रायड ही सत्य है कि ज्यादा से ज्यादा हम मनुष्य को सामान्य विक्षिप्तता का पाठ सिखा सकते हैं कि ज्यादा विक्षिप्त न हो जाओ, कम से कम विक्षिप्त रहो। अंतर, स्वस्थ आदमी में और विक्षिप्त आदमी में मात्रा का ही होगा, फ्रायड के हिसाब से, गुण का नहीं होगा। फ्रायड बुद्ध को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि बुद्धत्व का अर्थ होता है: परम स्वास्थ्य। हमारे पास स्वास्थ्य शब्द बड़ा कीमती है। स्वास्थ्य का अर्थ होता है: स्वयं में स्थित हो जाना। लेकिन स्वयं को तो स्वीकार ही नहीं करता मनोविज्ञान, वह तो विचार की भीड़ को ही स्वीकार करता है!
पश्चिम का एक बड़ा विचारक डेविड ह्यूम, डेविड ह्यूम नास्तिकों के लिए ऐसे ही है जैसे आस्तिकों के लिए कृष्ण, क्राइस्ट। इसलिए मैं डेविड ह्यूम को कहता हूं: संत डेविड ह्यूम। डेविड ह्यूम ने बहुत बार पढ़ा, सुकरात से लेकर इकहार्ट तक सारे संतों ने एक ही बात कही--भीतर जाओ, परम आनंद है वहां, आत्मा का राज्य, कि प्रभु का राज्य; बस, भीतर जाओ, सब पाओगे--धनों का धन, पदों का पद!...पढ़ते-पढ़ते एक दिन, जानते हुए भी कि भीतर क्या रखा है, उसने भी आंखें बंद कीं और भीतर देखा। एक ही दिन देखा बस और डायरी में लिखा: कुछ नहीं है, सिर्फ विचार ही विचार हैं--स्मृतियां, विचार, कल्पनाएं, ऊहापोह; न कोई आत्मा है, न कोई परमात्मा है; न कोई स्वर्ग का राज्य है, न कोई सच्चिदानंद है; कुछ भी नहीं है।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Can thought and belief be used in spiritual practice?
According to Osho, thought, belief, and affirmations can only rearrange the surface of your personality; they cannot touch the depth of being. Using them becomes self-hypnosis—like acting peaceful while boiling inside. Such conditioning breeds ego and delusion. Real transformation happens when the ocean changes, not its waves; therefore rely on direct inner seeing rather than manufactured attitudes.
In simple terms: Using thoughts to change yourself is like painting water—it may look different briefly, but nothing inside really changes.
