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Questions in this Discourse
यदि कोई व्यक्ति वृत्तियों का ऑब्जर्वेशन, निरीक्षण, देखना, साक्षी होना, इसीलिए कर रहा है कि वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाए, तो यह देखना दमन बन जाएगा, सप्रेशन बन जाएगा। यदि आपकी आकांक्षा निरीक्षण में केवल इतनी ही है कि मैं वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाऊं? मुक्त होने की बात आपने पहले ही तय कर रखी है, वृत्तियों को देखने के पूर्व आप एक पक्ष लेकर ही वृत्तियों को देखने जा रहे हैं कि ये वृत्तियां बुरी हैं, इनसे छुटकारा चाहिए; ये वृत्तियां नरक हैं, इनसे मुक्ति चाहिए; ये वृत्तियां ही दुख हैं, इनसे पार होना है; ऐसा आपने निरीक्षण के पहले ही तय कर रखा हुआ मत है, आपकी पहले से ही एक पक्षपात की दृष्टि है, वृत्तियों की शत्रुता आपके मन में है, कंडेमनेशन, निंदा आपके मन में है, तो फिर वृत्तियों का देखना भी दमन बन जाएगा।
और जो देखना दमन बन जाए, वह देखना नहीं है। क्योंकि ऑब्जर्वेशन का, निरीक्षण का, साक्षी होने का एक ही अर्थ है कि निष्पक्ष दर्शन हो सके।
तो तय न करें पहले से कि वृत्तियों से मुक्त होना है। तय न करें पहले से कि वृत्तियां बुरी हैं। पहले से वृत्तियों के संबंध में निष्पक्ष भाव रखें। पता नहीं बुरी हों, न हों! और पता नहीं उनसे मुक्त होना है या मुक्त नहीं होना है! यह तो निरीक्षण से निष्कर्ष आने दें। निरीक्षण होने दें। यदि निरीक्षण गहरा जाएगा, तो आप वृत्तियों को समझने में सफल हो पाएंगे।
और छोड़ें निरीक्षण के निष्कर्ष पर मुक्ति या अमुक्ति, वृत्तियों में रहना या पार हो जाना। और आश्चर्य की बात यह है कि जो व्यक्ति निरीक्षण के निष्कर्ष के लिए प्रतीक्षा करता है, और पहले से ही मत, निर्णय नहीं कर लेता, वह अचानक वृत्तियों से मुक्त हो जाता है। वृत्तियों से मुक्त होना नहीं पड़ता, हो जाता है। निरीक्षण का सहज फल वृत्तियों से मुक्ति में ले जाता है।
लेकिन हम पहले से ही तय कर लेते हैं। और पहले से तय करके फिर हम निरीक्षण में भी पक्षपाती की तरह खड़े हैं, हम साक्षी नहीं हैं फिर।
सुना है मैंने कि अपने जीवन के आखिरी चरण में साठ-पैंसठ वर्ष का जब मुल्ला नसरुद्दीन हुआ, तो उसके गांव के लोगों ने उसे गांव का ऑनरेरी मजिस्ट्रेट चुना।
पहला ही मुकदमा उसके हाथ में आया। तो वकील ने अपराधी के संबंध में अपना वक्तव्य दिया। वक्तव्य सुनने के बाद मुल्ला अपना निर्णय लिखने लगा, जजमेंट लिखने लगा। तो कोर्ट के क्लर्क ने उससे कहा कि ठहरिए, अभी दूसरे वकील का वक्तव्य तो आपने सुना ही नहीं!
मुल्ला ने कहा कि दूसरा मुझे कनफ्यूज कर देगा। और दो-दो वक्तव्य सुनने के बाद तय करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। तो मुझे एक की ही बात करके साफ-सुथरा निर्णय दे देने दो।
हम सब भी अपने संबंध में इसी तरह के निर्णय लिए हुए हैं। आपने शास्त्र में पढ़ लिया है कि वृत्तियां बुरी हैं। शिक्षकों से सुन लिया है, महात्माओं के सत्संग में पकड़ लिया है कि वृत्तियां बुरी हैं। वृत्तियों का आपने कभी निरीक्षण नहीं किया और वृत्तियों को कभी मौका नहीं दिया कि वे अपनी पूर्ण नग्नता में आपके सामने प्रकट हो जाएं।
आपके निर्णय पक्षपातग्रस्त हैं। वृत्तियों से बिना पूछे लिए गए हैं। वृत्तियों को बिना जाने लिए गए हैं। तो अगर कोई आपसे कहे कि ऑब्जर्व करिए! तो आप ऑब्जर्व भी, निरीक्षण भी इसीलिए करते हैं कि कैसे छुटकारा हो।
एक मित्र मेरे पास, कोई तीन महीने हुए, आए थे। साठ साल के हो गए हैं। लेकिन कामवासना से उम्र से कोई छुटकारा नहीं होता। और आदमी बड़े अदभुत हैं इस दुनिया में। जब मैं ‘संभोग से समाधि की ओर’ इस संबंध में बोल रहा था, तो वे पहले दिन ही सभा छोड़ कर चले गए थे। और मुझे उन्होंने एक पत्र लिखा था कि आप इस तरह की बातें कह रहे हैं जिनसे मनुष्य-जाति का पतन हो जाएगा।
और अभी तीन महीने पहले, दो साल बाद--दो साल तक वे दिखाई नहीं पड़े--अभी आए थे और कहने लगे कि कामवासना पीछा नहीं छोड़ती!
मैंने कहा, मैं कामवासना पर बोल रहा था, तो आप मेरे सामने बैठे थे, आप हाल छोड़ कर चले गए थे। और दो दिन बाद मुझे पत्र लिखा था कि आप इस तरह की बातें कह रहे हैं। क्योंकि बाहर वे इस तरह का प्रचार कर रखे हैं अपने बाबत कि बड़े संयमी हैं, और भीतर...
संयमी जो अपने को प्रचारित किए होते हैं, अक्सर भीतर उबलते हुए ज्वालामुखी पर खड़े रहते हैं।
मैंने पूछा कि कामवासना अभी तक आपकी छूटी नहीं?
वे कहने लगे, यही मैं पूछने आया हूं कि यह कैसे छूटे?
तो मैंने उनसे कहा, आप निर्णय तो पहले ही ले चुके हैं कि कामवासना बुरी है, तो आप निरीक्षण कैसे कर सकेंगे?
उन्होंने मुझसे कहा कि मैं निरीक्षण करने को क्या, कुछ भी करने को राजी हूं, बस यह किसी भांति छूटे। वह निर्णय पक्का है।
मैंने उनसे कहा, निरीक्षण अगर करना है तो पहले तो अपना निर्णय छोड़ दो। कामवासना के संबंध में निष्पक्ष हो जाओ। उसे भी परमात्मा की एक देन समझो। है भी वह देन। नासमझ हैं जो उसे पाप कहते हैं। क्योंकि पाप कहने के कारण हम परमात्मा की एक देन का जो उपयोग कर सकते हैं महत, वह नहीं कर पाते हैं। जिस चीज को हमने बुरा कहा, उसका हम उपयोग करने में असमर्थ हो जाते हैं।
कामवासना बुरी नहीं है। इस जगत में कुछ भी बुरा नहीं है। इस जगत में किसी चीज का उपयोग न करना बुरा है, सदुपयोग न करना बुरा है। कोई चीज बुरी नहीं है।
कामवासना का भी सदुपयोग जो कर लेता है, वह कामवासना की सीढ़ी से ही परमात्मा की उपलब्धि को पहुंच जाता है। कामवासना का जो उपयोग नहीं कर पाता है, वह कामवासना में ही सड़ जाता है। जो शक्ति उसे परमात्मा तक पहुंचा सकती थी, वही शक्ति उसे पाप के गर्त में गिरा देती है। लेकिन शक्ति का कोई दोष नहीं है। उपयोग करने वाले का दोष है।
वृत्ति बुरी नहीं होती। आप बुरे होते हैं तो वृत्ति का दुरुपयोग हो जाता है, आप भले होते हैं तो वृत्ति का सदुपयोग हो जाता है। शक्तियां न्यूट्रल हैं, तटस्थ हैं।
आपके हाथ में एक तलवार दे दें। तलवार बुरी नहीं है, तलवार में क्या बुरा हो सकता है! लेकिन तलवार से आप किसी की गर्दन भी काट सकते हैं। तब बुरा हो जाएगा। लेकिन बुरापन आपके हाथ में और आपके मन में है, तलवार में नहीं। और उसी तलवार से, किसी की गर्दन कटती हो, तो आप उसे बचा भी सकते हैं। तब भी भलापन तलवार में नहीं, आप में ही है।
वृत्तियां शक्तियां हैं। उनका न दमन करना जरूरी है, न उनसे लड़ना जरूरी है, न उनकी निंदा करना जरूरी है। उन्हें समझना जरूरी है। और उनके भीतर जो छिपे हुए राज हैं, उनको पहचानना जरूरी है। और उनकी शक्तियों का कैसे हम ऊर्ध्वगमन के लिए उपयोग कर सकते हैं, यह निरीक्षण से स्पष्ट होना शुरू हो जाता है। निरीक्षण दमन बन जाएगा, अगर आप निरीक्षण इसीलिए कर रहे हैं कि कैसे छुटकारा हो? निरीक्षण मुक्ति बन जाता है, अगर आप निरीक्षण इसलिए कर रहे हैं, ताकि मैं जान सकूं यह वृत्ति क्या है? इसकी शक्ति क्या है? और परमात्मा ने इसे मुझे क्यों दिया है?
दुर्भाव छोड़ें। सदभाव से वृत्तियों के पास जाएं। और तब एक क्रांति घटित होती है। जिन्हें आपने अपना शत्रु जाना था, वे ही आपके सबसे बड़े मित्र सिद्ध होते हैं। निष्पक्ष निरीक्षण चाहिए। चुनाव-रहित निरीक्षण चाहिए। मत-शून्य निरीक्षण चाहिए। पूर्व-पक्ष से रिक्त निरीक्षण चाहिए। फिर निरीक्षण मुक्ति बन जाता है। और निरीक्षण के बाद मुक्त होने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता, निरीक्षण ही मुक्ति बन जाता है--दि वेरी ऑब्जर्वेशन। ऐसा नहीं कि निरीक्षण करने के बाद फिर आपको कुछ करना पड़ेगा, तब आप मुक्त होंगे।
रास्ते पर सांप हो, सांप का दिखाई पड़ना ही आपकी छलांग बन जाता है। ऐसा नहीं कि पहले सांप दिखाई पड़ता है, फिर खड़े होकर आप अपनी नोट-बुक निकालते हैं, फिर गणित करते हैं कि सांप सामने है, क्या मुझे कूदना चाहिए, नहीं कूदना चाहिए? क्या करना चाहिए? किस गुरु से पूछूं? कहां जाऊं?
सांप दिखाई पड़ा और छलांग घटित हो जाती है। छलांग और सांप का दिखना दो चीजें नहीं हैं। इधर बाहर सांप का दिखना और भीतर छलांग का लग जाना--एक साथ, युगपत, साइमलटेनियस घटित हो जाता है।
जैसे ही कोई व्यक्ति अपनी वृत्तियों के निरीक्षण को उपलब्ध होता है, वैसे ही छलांग भीतर लग जाती है। निरीक्षण, निष्पत्ति और परिणाम, सब एक साथ घटित होते हैं। इसलिए ऐसा नहीं कि पहले आप जान लेंगे कि यह वृत्ति कैसी है, फिर इससे कैसे छुटकारा पाएं, इसकी कोशिश लगेगी। नहीं; इसकी कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती।
और अगर आप कहते हों, मुझे पता तो है कि वृत्ति बुरी है, अब छुटकारा कैसे पाऊं? तो आप सिर्फ एक खबर देते हैं कि आपको पता नहीं है कि वृत्ति बुरी है। सिर्फ आपने सुन लिया होगा। किसी ने कह दिया होगा।
और हम सब एक-दूसरे के मस्तिष्क को भ्रष्ट करने में संलग्न हैं। हम सब एक-दूसरे को बताए जा रहे हैं वे बातें जिनका हमें भी पता नहीं है। ज्ञानी होने का इतना मजा है कि इस जगत में अज्ञानी इतना नुकसान नहीं पहुंचाते जितना ज्ञान का मजा लेने वाले ज्ञानी नुकसान पहुंचा देते हैं। इतना मजा है दूसरे को बताने में कि हम इसकी फिक्र ही नहीं करते कि यह मुझे भी पता है या नहीं। अगर ज्ञानी ईमानदार हो जाएं, तो अज्ञान का खतरा समाप्त हो जाए। लेकिन ज्ञानी ईमानदार नहीं हो पाता। उन्हें खुद भी पता नहीं है।
एक संन्यासी ने ध्यान पर किताब लिखी थी। दस साल पहले मैंने पढ़ी थी। अदभुत किताब है। लेकिन दो-तीन बिंदु ऐसे थे जो बताते थे कि इस आदमी ने ध्यान नहीं किया। किताब बहुत अदभुत है। सारी बातें बिलकुल ठीक हैं, लेकिन दो-तीन जगह गैप हैं। और वे गैप, खाली स्थान बताते हैं कि इस आदमी ने ध्यान नहीं किया।
पूरब के सभी शास्त्र बहुत कुशल लोगों ने लिखे हैं। और पूरब के सभी शास्त्रों में गैप्स हैं, अंतराल हैं। जैसे पतंजलि का योग-सूत्र है, इस पर जो आदमी केवल पतंजलि के योग-सूत्र और योग के संबंध में साहित्य को पढ़ कर किताब लिखेगा, वह गैप्स को नहीं भर पाएगा। क्योंकि किताब में वे खाली स्थान जान कर छोड़े गए हैं। सिर्फ वही आदमी पतंजलि के योग-सूत्र पर लिखेगा जिसने ध्यान करके जाना है, तो पतंजलि ने जो अंतराल छोड़े हैं उनको वह भर सकेगा। और वही कसौटी है कि आदमी ने जाना है या बिना जाने कहा है।
किताब बहुत अदभुत थी। ध्यान पर जितनी किताबें लिखी गई हैं, उन सबको जान कर, पढ़ कर लिखी गई थी। लेकिन एक बात साफ थी कि उसमें जो खाली जगह सदा छोड़ी जाती है, उनके ऊपर कोई भी इशारा नहीं था। उस व्यक्ति ने ध्यान किया नहीं है।
दस साल बाद एक नगर में उन संन्यासी का मुझसे मिलना हुआ। अपने पचास-साठ शिष्यों को लेकर वे मुझसे मिलने आए थे। बातचीत हुई। मैंने उनसे कहा, किताब आपकी बहुत अदभुत है। लेकिन आपने ध्यान को बिना जान कर लिखा है। आपने कोई अनुभव नहीं किया।
वे थोड़े बेचैन हुए, रेस्टलेस हुए, क्योंकि उनके शिष्य चारों तरफ थे। फिर उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य को कहा कि तुम लोग बाहर जाओ। मैं जरा एकांत में बात कर लूं। एकांत में उनकी आंखों में आंसू आ गए। ईमानदार थे। और उन्होंने कहा कि आपको कैसे पता चला कि मैंने ध्यान जान कर नहीं लिखा है? क्योंकि मैंने आज तक किसी से नहीं कहा कि मैंने ध्यान को नहीं जाना। और मेरी किताब के कारण हजारों मेरे शिष्य हैं। आपने कोई किताब में भूल देखी?
मैंने कहा, किताब में कोई भूल नहीं है। किताब बहुत अदभुत है। किताब बिलकुल निर्भूल है। आपने बिलकुल ठीक-ठीक अध्ययन किया है। लेकिन अनुभव नहीं किया है। अनुभव की कोई खबर किताब में नहीं है।
पर उनके हजारों शिष्य हैं! और उनकी बात मान कर हजारों लोग ध्यान कर रहे हैं! और यह आदमी रो रहा है, क्योंकि इसे ध्यान का कोई अनुभव नहीं है। अब यह जिन लोगों को बता रहा है, उनको गड्ढे में गिरने का कारण हो जाएगा।
इस आदमी को क्या मिल रहा है?
इस आदमी को बताने का सुख मिल रहा है, बिना इस बात को समझे हुए कि जो मैंने नहीं जाना है उसे बताने का कोई भी उपाय नहीं है।
तो आप सुन लेते हैं। किसी ने कह दिया, क्रोध बुरा है। बाप ने कह दिया, यद्यपि बाप भी क्रोध करता था। मां ने कह दिया, यद्यपि मां भी क्रोध करती थी। स्कूल में शिक्षक ने कहा, क्रोध बुरा है, यद्यपि वह भी क्रोध करता था। तो बढ़ता हुआ बच्चा दो बातें सीख लेता है। वह सीख लेता है कि क्रोध बुरा है, सब कहते हैं, इसलिए बुरा होना चाहिए। और क्रोध सब करते हैं, इसलिए करना भी चाहिए। डबल तर्क, दोहरी बातें, डबल माइंड हो जाता है। क्रोध करने जैसी चीज है, यह भी तय हो जाता है; और क्रोध बुरी चीज है, यह भी तय हो जाता है। अब यह फंस गया। अब यह जिंदगी भर क्रोध करेगा और जिंदगी भर क्रोध को गाली भी देगा।
जिस दिन हमारी ठीक शिक्षा होगी, सम्यक, उस दिन हम ‘क्रोध बुरा है’, ऐसा सिखाएंगे नहीं; हम क्रोध की वृत्ति में प्रवेश सिखाएंगे। और जब भी क्रोध आए, तो क्रोध में कैसे प्रवेश करना है, इसकी प्रक्रिया सिखाएंगे। और प्रक्रिया ही बता देगी कि क्रोध क्या है। क्रोध बुरा है, ऐसा नहीं बता देगी। जैसे ही जाना जाता है कि क्रोध क्या है, क्रोध के पार व्यक्ति हो जाता है।
गुरजिएफ के पास कोई भी जाता था, पश्चिम में। वह एक जीवित सदगुरुओं में से, दो-चार सदगुरुओं में जमीन पर इस सदी में एक व्यक्ति था। तो वह कहता था कि तुम्हारी मूल कमजोरी क्या है? अगर वह कहता, वृत्ति मेरी मूल है--क्रोध की, लोभ की, मोह की, काम की, तो जो भी मूल कमजोरी होती, वह कहता कि अब पंद्रह दिन तुम अपनी मूल कमजोरी को प्रकट करने की कोशिश करो, जितना कर सको।
अगर वह कहता, क्रोध है। तो वह कहता कि तुम जितना क्रोध कर सकते हो, करो। और गुरजिएफ ऐसी सिचुएशंस, ऐसी स्थितियां पैदा कर देता कि उस आदमी को क्रोध में बिलकुल पागल हो जाना पड़ता। और जब वह आदमी बिलकुल पागल होता और कंप रहा होता उसका रोआं-रोआं क्रोध की आग में, तब गुरजिएफ कहता, नाउ ऑब्जर्व! अब निरीक्षण करो! जब क्रोध अपनी पूरी स्थिति में, लपटों में खड़ा होता और आदमी बीच में होता, तब गुरजिएफ उसे हिला कर कहता, यही है मौका! अब, अब निरीक्षण करो! अब जानो कि क्रोध क्या है!
और अक्सर ऐसा हुआ कि उस जलते हुए बिंदु से जिस आदमी ने निरीक्षण किया, दुबारा उस वृत्ति में गिरना असंभव हो गया।
तो वृत्ति का निरीक्षण करें निष्पक्ष, तो दमन फलित नहीं होगा।
ओशो, कल रात मैंने कहा कि संकल्प की साधना, दक्षिणायन, नीचे के मार्ग पर ले जाती है और समर्पण की साधना, उत्तरायण, ऊपर के मार्ग पर ले जाती है। मित्र ने पूछा है कि हम जो प्रयोग कर रहे हैं सुबह, वह भी तो संकल्प का प्रयोग है। क्या उससे हम, दक्षिणायन, नीचे की तरफ जाएंगे? या संकल्पों में भी कुछ भेद है?
यह प्रयोग संकल्प से ही शुरू होता है। सभी ध्यान संकल्प से शुरू होते हैं, लेकिन सभी ध्यान समर्पण पर समाप्त नहीं होते। जो ध्यान संकल्प से शुरू होते हैं और संकल्प पर ही पूर्ण होते हैं, वे दक्षिणायन में ले जाते हैं। जो ध्यान की विधियां संकल्प से शुरू होती हैं और समर्पण पर पूर्ण होती हैं, वे उत्तरायण में ले जाती हैं।
यह जो प्रयोग हम कर रहे हैं, यह भी संकल्प का ही प्रयोग है। लेकिन क्रमशः संकल्प छूटता चला जाता है और आप समर्पण में प्रवेश करते हैं। अंतिम क्षण में आप सिर्फ समर्पण की स्थिति में होते हैं, संकल्प छूट चुका होता है।
संकल्प हमारी स्थिति है। अभी हम जहां खड़े हैं, वह संकल्प हमारी स्थिति है। हमें जहां भी जाना हो, ऊपर या नीचे, संकल्प से ही जाना पड़ेगा।
यदि आप संकल्प के लिए ही संकल्प कर रहे हैं, विल फॉर विल्स सेक, तो आप नीचे उतर जाएंगे। और विल फॉर सरेंडर्स सेक, तो आप ऊपर चढ़ जाएंगे। अंतिम लक्ष्य समर्पण हो तो संकल्प की सीढ़ी का उपयोग भी किया जा सकता है। और अगर अंतिम लक्ष्य संकल्प हो तो आप समर्पण का भी उपयोग कर सकते हैं और नीचे उतर जाएंगे।
दूसरी बात भी खयाल में ले लें। पहली बात मैंने कहा, संकल्प भी समर्पण के लिए मार्ग बन सकता है। समर्पण भी संकल्प के लिए मार्ग बन सकता है। एक आदमी सिर्फ परमात्मा के लिए इसलिए समर्पण करता है, ताकि मेरी संकल्प की शक्ति विराट हो जाए। एक आदमी कहता है, हे प्रभु, सब तेरे हाथों में छोड़ता हूं। लेकिन भीतर इच्छा होती है...
स्त्रैण चित्त, समर्पण से वह शुरू करता है और संकल्प पर पूरा होता है। और जिस दिन आपने स्त्री का समर्पण स्वीकार कर लिया, उसी दिन आप उसके गुलाम हो गए। सोचा था कि मालिक हो जाएंगे। इसी भ्रम में आप गुलाम हुए हो। स्त्री की कीमिया, उसकी केमिस्ट्री, उसके काम करने का स्त्री के चित्त का ढंग ही यही है कि जिसे बांधना हो, पहले उसे मालिक होने का खयाल दो।
पुरुष का चित्त उलटा है। वह संकल्प से शुरू करता है और समर्पण पर पूरा होता है। इसीलिए स्त्री और पुरुषों में मेल बन जाता है। नहीं तो मेल बनना मुश्किल हो जाए। अपोजिट, विरोध में उनमें मेल बन जाता है। पुरुष का चित्त उलटा है। वह पहले संकल्प से शुरू करता है। वह पहले स्त्री को जीतने की कोशिश करता है। उसे पता नहीं कि आखिर में हारोगे। यह जीतने से उनकी हार शुरू हो रही है।
इसलिए जो पुरुष स्त्री के चरणों में सिर रख दे, उसका स्त्री से कभी तालमेल नहीं बन सकता। और जो स्त्री पुरुष के चरण में सिर रखने के लिए राजी न हो, उसका भी कभी तालमेल नहीं बन सकता। इसलिए पश्चिम में स्त्री और पुरुष के बीच के संबंध रोज-रोज शिथिल और विकृत होते चले जा रहे हैं। क्योंकि स्त्री ने तय किया है कि मैं अब समर्पण नहीं करूंगी। लेकिन जिस दिन स्त्री तय कर लेती है, अब मैं समर्पण नहीं करूंगी, उसी दिन पुरुष को जीतना मुश्किल हो जाएगा। और पुरुष ने भी तय कर लिया है कि स्त्री को बराबर मौका देना है, इसलिए मैं इसको जीतूंगा नहीं। और जिस दिन पुरुष स्त्री को जीतता नहीं, उसी दिन पुरुष की हार का कोई उपाय नहीं रह जाता।
डाइलेक्टिक्स है, जीवन का एक द्वंद्वात्मक नियम है: विपरीत आकर्षित करते हैं। स्त्री और पुरुष बिलकुल विपरीत ढंग से जीते हैं। उनके जीने के ढंग की विपरीतता की गहराई यही है कि स्त्री शुरू करती है समर्पण से और पूर्ण करती है संकल्प पर। पुरुष शुरू करता है संकल्प से और पूर्ण करता है समर्पण पर। इसलिए दोनों के बीच आकर्षण है।
आप दोनों काम शुरू कर सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्त्री भी छिपी है और पुरुष भी। सब आदमी बाइसेक्सुअल हैं। कोई आदमी यूनिसेक्सुअल नहीं है। नवीनतम मनोविज्ञान की खोजें और नवीनतम बायोलाजी के अन्वेषण इस बात को सिद्ध करते हैं कि कोई आदमी न तो पुरुष है पूरा और न कोई स्त्री पूरी स्त्री है। फर्क डिग्रीज के हैं। आप साठ परसेंट पुरुष हैं और चालीस परसेंट स्त्री हैं, इसलिए आप पुरुष मालूम पड़ते हैं। आपकी पत्नी साठ परसेंट स्त्री है और चालीस परसेंट पुरुष है, इसलिए स्त्री मालूम पड़ती है। जो भेद हैं, वे परसेंटेज के हैं। आपके भीतर भी स्त्री छिपी है, पुरुष के भीतर भी, और स्त्री के भीतर भी पुरुष छिपा है। इसलिए ऐसी घटना घटती है कि कभी-कभी हम पाते हैं कि कोई पुरुष बिलकुल स्त्रैण मालूम होता है और कोई स्त्री बिलकुल पुरुष जैसी मालूम होती है।
मुल्ला नसरुद्दीन रास्ते पर एक स्त्री को चलते देखा है, उसके पास जाकर उसे घूर कर देखने लगा। उस स्त्री ने पूछा कि आप क्या देख रहे हैं?
उसने कहा कि बड़ी हैरानी की बात है, तुम स्त्री हो, लेकिन स्त्री जैसी मालूम नहीं पड़ती हो!
उस स्त्री ने, जिसे मुल्ला ने स्त्री समझा था, कहा, माफ करिए, मैं स्त्री नहीं हूं, मैं पुरुष हूं!
मुल्ला ने कहा, तब तो बड़ी हैरानी की बात है! तुम्हारी शक्ल मेरी पत्नी से बिलकुल मिलती-जुलती है, सिर्फ दाढ़ी-मूंछ का भेद है।
पर उस व्यक्ति ने कहा, दाढ़ी-मूंछ तो मुझे हैं ही नहीं!
मुल्ला ने कहा, मेरी पत्नी को हैं।
स्त्रैण पुरुष हैं, पुरुष जैसी स्त्रियां हैं, अनुपात अगर ज्यादा है। और इसलिए कभी ऐसी दुर्घटना भी घटती है कि कोई पुरुष पुरुष की तरह शुरुआत करता है और बाद की उम्र में स्त्री हो जाता है। कोई स्त्री स्त्री की तरह शुरुआत करती है, बाद की उम्र में पुरुष हो जाती है। तीन वर्ष पहले लंदन में एक बहुत अजीब मुकदमा चला। और वह मुकदमा यह था कि एक लार्ड परिवार के व्यक्ति ने एक स्त्री से विवाह किया। साल भर बाद उसने डायवोर्स के लिए, तलाक के लिए कोर्ट को कहा। और कोर्ट को तलाक के वक्त उसने यह कहा कि यह स्त्री नहीं है। साल भर में वह स्त्री पुरुष हो गई थी।
फिर सारे परीक्षण हुए। लंबी खोज-बीन हुई। उस स्त्री ने कोई धोखा नहीं दिया था। लेकिन अनुपात बहुत कम रहा होगा। इक्यावन-उनचास जैसा कोई अनुपात रहे, तो अनुपात गिर सकता है, बढ़ सकता है। और अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि इंजेक्शन देकर हम किसी भी पुरुष को स्त्री और किसी भी स्त्री को पुरुष बना सकते हैं। क्योंकि हार्मोन का ही फर्क है। तो हार्मोन कम-ज्यादा किए जा सकते हैं।
मैं यह इसलिए कह रहा हूं--बाइसेक्सुअलिटी है, प्रत्येक व्यक्ति दोनों यौन एक साथ है--यह मैं इसलिए कह रहा हूं ताकि आपको खयाल में आ सके कि आप संकल्प से भी शुरू कर सकते हैं और समर्पण से भी। अगर आप संकल्प से शुरू करते हैं और अंतिम लक्ष्य आपका समर्पण है, तो आप उत्तरायण पर निकल जाएंगे। और अगर आप संकल्प से शुरू करते हैं और अंतिम लक्ष्य संकल्प ही है, तो आप दक्षिणायन पर निकल जाएंगे। अगर आप समर्पण से शुरू करते हैं और अंतिम लक्ष्य समर्पण ही है, तो भी आप उत्तरायण पर निकल जाएंगे। और अगर आप समर्पण से शुरू करते हैं और अंतिम लक्ष्य संकल्प ही है, तो भी आप...
देखने वालों से प्रेम से प्रार्थना है, चुपचाप देखते रहेंगे। और ध्यान करने वाले लोग दूर-दूर फैल जाएं। जगह बना लें और दूर-दूर फैल जाएं। ध्यान करने वाले दूर-दूर फैल जाएं, जगह बना लें, फासले पर हो जाएं।
(पहले चरण में पंद्रह मिनट संगीत की धुन के साथ कीर्तन चलता रहता है।)
गोविंद बोलो, हरि गोपाल बोलो
गोविंद बोलो, हरि गोपाल बोलो
गोविंद बोलो, हरि गोपाल बोलो...
राधा रमण हरि गोपाल बोलो
राधा रमण हरि गोपाल बोलो
राधा रमण हरि गोपाल बोलो...
(दूसरे चरण में पंद्रह मिनट सिर्फ धुन चलती रहती है और भावों की तीव्र अभिव्यक्ति में रोना, हंसना, नाचना, चिल्लाना आदि चलता रहता है। तीस मिनट के बाद तीसरे चरण में ओशो पुनः सुझाव देना प्रारंभ करते हैं।)
बस शांत हो जाएं। आवाज बंद कर दें। शांत हो जाएं। आवाज बंद, हलन-चलन बंद। आवाज बिलकुल बंद कर दें। शक्ति जाग गई है, उसे भीतर रोकें।
आंख बंद कर लें, सब इंद्रियों को शिथिल छोड़ दें। आंख बंद कर लें, आवाज बंद कर दें। और जरा भी हिलें-डुलें नहीं, बिलकुल मुर्दे की भांति हो जाएं। जो शक्ति भीतर जाग गई है, उसे ऊपर की यात्रा पर जाने दें। सब तरफ से द्वार बंद कर दें।
आंख बंद। हलन-चलन बंद। आवाज बंद। अब अपने दाएं हाथ को माथे पर रख लें, दाएं हाथ को ले जाएं दोनों आंखों के बीच, तीसरे नेत्र के पास। नाउ पुट योर राइट हैंड पाम ऑन दि फोरहेड बिट्वीन दि आइब्रोज एंड रब दि थर्ड आई स्पॉट अपसाइड डाउन एंड साइडवेज। रब इट, रब इट, एंड विद दि वेरी रबिंग समथिंग हैपन्स इनसाइड, ए न्यू डोर ओपन्स, ए न्यू परसेप्शन इज़ हैपनिंग...
रगड़ें, आहिस्ता-आहिस्ता दोनों आंखों के बीच के स्थान को माथे पर रगड़ें... भीतर बहुत कुछ होगा, जैसे कोई नया द्वार खुल जाए और एक नया दर्शन उपलब्ध हो। रगड़ते ही रगड़ते भीतर प्रकाश फैलना शुरू हो जाएगा, अनंत प्रकाश...
रगड़ें, रगड़ें, भीतर अनंत प्रकाश फैल जाएगा, जैसे एक द्वार खुल गया और पिंजड़े से बाहर हो गए...
नाउ बी वन विद दि लाइट...नाउ फॉरगेट योरसेल्फ एंड रिमेंबर दि लाइट...नाउ यू आर नॉट, ओनली लाइट रिमेन्स...बी वन विद इट, बी कंप्लीटली डिजाल्व इन इट...
छोड़ दें, खो दें अपने को प्रकाश में, एक हो जाएं...अनुभव करें, अनुभव करें... प्रकाश है, प्रकाश ही प्रकाश है, प्रकाश ही प्रकाश है और प्रकाश के साथ एक हुए जा रहे हैं...एक हुए जा रहे हैं...
जिन्हें प्रकाश का खयाल न आ रहा हो, वे अपने दोनों हाथों को आंखों पर रख कर आंखों को आहिस्ता से दबाएं और प्रकाश की लहरें भीतर शुरू हो जाएंगी। दोज हू कैन नॉट फील दि लाइट, दे शुड पुट देयर बोथ हैंड्स ऑन देयर आइज एंड प्रेस योर पाम, प्रेस वेरी स्लोली...आंखों को दबाएं, दोनों आंखों पर रख कर हाथ और आहिस्ता दबाएं और भीतर प्रकाश की तरंगें शुरू हो जाएंगी...प्रकाश ही प्रकाश, अनंत प्रकाश... प्रकाश ही प्रकाश, अनंत प्रकाश...भीतर प्रकाश ही प्रकाश हो गया और आप उस भीतरी प्रकाश में खो गए...
दर्शक यहां बातचीत जरा भी न करें, देखते रहें चुपचाप, कोई बातचीत न करें। और जरा हट कर खड़े हों, किसी को भी बाधा आपसे नहीं होनी चाहिए।
प्रकाश ही प्रकाश, अनंत प्रकाश, अनुभव करें, अनुभव करें...प्रकाश को रोएं-रोएं में भर जाने दें, तन-मन में, सब ओर...प्रकाश के सागर में डूब जाएं, डूब जाएं, जैसे मछली सागर में हो, ऐसे प्रकाश के साथ एक हो जाएं...
अनुभव करें, अनुभव करें...प्रकाश के साथ ही साथ आनंद उतरना शुरू हो जाता है...प्रकाश के अनुभव के साथ ही साथ आनंद की तरंगें उतरनी शुरू हो जाती हैं... अनुभव करें, अनुभव करें...प्रकाश ही प्रकाश, प्रकाश ही प्रकाश...अनुभव करें... प्रकाश...और प्रकाश...और प्रकाश...आप खो गए, प्रकाश ही रह गया...
और प्रकाश के पीछे-पीछे ही आनंद की तरंगें भीतर फैलने लगेंगी, आनंद की लहरें भीतर उठने लगेंगी, आनंद रोएं-रोएं में छाने लगेगा...प्रकाश के पीछे ही आता है आनंद...प्रकाश के पीछे ही आता है आनंद...अनुभव करें, अनुभव करें, आनंद उतर रहा, आनंद छा रहा, सब ओर से आनंद झर रहा...बिलकुल खाली घड़े की भांति हो जाएं, खाली घड़े में जैसे वर्षा की बूंदें भरती हों, आनंद भरता चला जाता है...
नाउ बी जस्ट ए नथिंगनेस, एन एंप्टी वेसल, एंड लेट दि वेसल बी फिल्ड टोटली विद ब्लिस...तन-मन-प्राण सब ओर आनंद को भर जाने दें, आनंद को भर जाने दें, आनंद के साथ एक हो जाएं...
आनंद ही आनंद शेष रह गया है...आनंद को अनुभव करें, अनुभव करें, रोएं-रोएं तक आनंद की तरंगों को फैलने दें...हृदय के भीतर हृदय की धड़कन-धड़कन को आनंद सेभर जाने दें...श्वास-श्वास आनंद से भर जाने दें... आनंद...
नाउ फील दि ब्लिस, नाउ बी फिल्ड विद ब्लिस, नाउ बी वन विद दि ब्लिस...एक हो जाएं, एक हो जाएं, एक हो जाएं...
जो लोग आनंद को अनुभव न कर पा रहे हों, वे अपने दाएं हाथ को हृदय पर रख लें और आहिस्ता से दबाएं। पुट योर राइट हैंड पाम ऑन योर हार्ट एंड प्रेस दि स्पॉट। दोज हू आर नॉट फीलिंग ब्लिस, दे शुड पुट देयर राइट हैंड पाम ऑन दि हार्ट, एंड देन प्रेस दि स्पॉट, प्रेस दि स्पॉट...
दबाते ही भीतर आनंद की तरंगें फैलनी शुरू हो जाएंगी। जैसे कोई पत्थर फेंक दे झील में और लहरें उठ जाएं, ऐसा ही हृदय को दबाते ही तरंगें फैलनी शुरू हो जाएंगी...जस्ट बाइ प्रेसिंग योर हार्ट, वेव्स ऑफ ब्लिस आर कमिंग...एंड दे गो ऑन स्प्रेडिंग, दे गो ऑन स्प्रेडिंग...
आनंद अनुभव करें, आनंदित हों, आनंद अनुभव करें, आनंद में डूब जाएं, एक हो जाएं...आनंद अनुभव करें, आनंद अनुभव करें, आनंदित हों, आनंद अनुभव करें, आनंदित हों...रोएं-रोएं में, श्वास-श्वास में आनंद को भर जाने दें...
आनंद...आनंद...आनंद...फील ब्लिस...मोर ब्लिस...मोर ब्लिस...एंड बिकम वन विद इट...एक हो जाएं, एक हो जाएं, एक हो जाएं इस आनंद के साथ...
और आनंद के पीछे-पीछे ही परमात्मा की मौजूदगी अनुभव होने लगती है...और आनंद की सघनता ही परमात्मा की मौजूदगी बन जाती है...आनंद को अनुभव करें, और पीछे-पीछे परमात्मा का स्पर्श आने लगता है...डीपर वन इज़ इन ब्लिस, डीपर वन गोज इनटु दि डिवाइन...परमात्मा को अनुभव करें, चारों ओर वही घेरे खड़ा है, चारों ओर उसी का स्पर्श है, बाहर-भीतर वही स्पर्श कर रहा है...
नाउ डिजाल्व योरसेल्फ कंप्लीटली एंड फील दि प्रेजेंस ऑफ दि डिवाइन...आती श्वास में वही है, जाती श्वास में वही है...अनुभव करें, परमात्मा के स्पर्श को अनुभव करें और उसका स्पर्श तन-प्राणों को नृत्य से भर देगा और एक नई सुवास से...स्पर्श अनुभव करें और भीतर अनुभूति उतरनी शुरू हो जाएगी...उसकी मौजूदगी अनुभव करें और भीतर हृदय नाचने लगेगा...उसकी मौजूदगी अनुभव करें और भीतर सुगंधित हो उठेगा...अनुभव करें, उसकी मौजूदगी अनुभव करें, और आप एक मंदिर बन जाते हैं...उसकी मौजूदगी अनुभव करें...फील दि डिवाइन आल अराउंड एंड यू बिकम दि डिवाइन्स टेंपल...अनुभव करें...
जिन लोगों को मौजूदगी अनुभव न होती हो, वे एक सेकेंड के लिए श्वास को रोक दें जहां है वहीं। दोज हू आर नॉट एबल टु फील दि डिवाइन, दे शुड स्टॉप देयर ब्रेथ एज इट इज़, स्टॉप फॉर ए मोमेंट। एंड दि मोमेंट ब्रेथ इज़ स्टॉप्ड, दि पे्रजेंस इज़ फेल्ट।
एक सेकेंड को श्वास को रोकें वहीं जहां है, श्वास के रुकते ही उसकी मौजूदगी अनुभव होगी...परमात्मा चारों ओर मौजूद है...अनुभव करें, अनुभव करें...वही मौजूद है, चारों ओर वही मौजूद है...परमात्मा मौजूद है, वही मौजूद है, वही मौजूद है...अब आप मिट गए, वही है...
और ध्यान की अंतिम स्थिति अनुभव करें। अब उसकी मौजूदगी ही नहीं, आप स्वयं परमात्मा हैं। मैं स्वयं परमात्मा हूं। अनुभव करें: अहं ब्रह्मास्मि! उसकी मौजूदगी ही नहीं, अब मैं तो मिट गया, अब वही है...मैं स्वयं परमात्मा हूं...अनुभव करें--मैं स्वयं परमात्मा हूं...नाउ नॉट ओनली दि प्रेजेंस ऑफ दि डिवाइन, नाउ फील दैट यू आर दि डिवाइन...व्हेन यू आर नॉट, यू आर दि डिवाइन...नाउ फील, नाउ रिमेंबर, नाउ रियलाइज--आई एम दि डिवाइन...मैं ही प्रभु हूं, मैं ही प्रभु हूं...अनुभव करें, आनंद को अनुभव करें, आनंद को अनुभव करें, आनंद को...मैं ही प्रभु हूं...
अब दुबारा अपने दाएं हाथ की हथेली को माथे पर रख लें और आहिस्ता से रगड़ें। नाउ पुट अगेन योर राइट हैंड पाम ऑन दि फोरहेड बिट्वीन दि टू आइब्रोज एंड रब दि स्पॉट, रब दि थर्ड आई स्पॉट, एंड मच विल हैपन इनसाइड...रगड़ें, भीतर बहुत कुछ होगा, जैसे अचानक कोई द्वार खुल जाए, जैसे अचानक रात के अंधेरे में बिजली चमक जाए...नाउ रब, रब दि थर्ड आई स्पॉट एंड सम डोर, अननोन डोर ओपन्स इनसाइड... रगड़ें, रब दि स्पॉट, रब दि स्पॉट एंड फील दि ट्रांसफार्मेशन इनसाइड...भीतर होते परिवर्तन को अनुभव करें...भीतर बहुत कुछ बदलेगा, सब कुछ बदलेगा, सारी चेतना ही बदल जाती है, आप किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं...
ठीक, अब दोनों हाथ आकाश की ओर ऊपर उठा लें। नाउ रेज़ योर बोथ हैंड्स टुवर्ड्स दि स्काई। आंखें आकाश की ओर उठा लें, आंखें खोलें, आकाश को देखें और आकाश को आपके भीतर देखने दें...
नाउ रेज़ योर बोथ हैंड्स टुवर्ड्स दि स्काई, ओपन योर आइज, नाउ सी दि स्काई एंड लेट दि स्काई सी इनटु यू...लेट देयर बी ए कम्यूनियन बिट्वीन यू एंड दि स्काई... आकाश और आपके बीच एक संवाद को घटित होने दें...आलिंगन में दोनों हाथ फैला दें और आकाश के हृदय को आपके हृदय के पास आने दें...नाउ बी इन एन एम्ब्रेस विद दि स्काई...
और अब हृदय में जो भी भाव उठता हो उसे पूरी तरह प्रकट होने दें। नाउ एक्सप्रेस योरसेल्फ टोटली, व्हाट सो एवर इज़ इनसाइड, लेट इट बी एक्सप्रेस्ड...बिलकुल पागल हो जाएं, जो भी भीतर हो रहा हो उसे प्रकट करें...
नाउ जस्ट बी मैड इन एक्सप्रेसिंग...रोकें नहीं, पूरे पागल हो जाएं, सब प्रकट कर दें, जो भी भीतर हो रहा हो...
बस, अब रुक जाएं। दोनों हाथ जोड़ लें और परमात्मा के चरणों में सिर रख दें, धन्यवाद दे दें। दोनों हाथ जोड़ लें और परमात्मा के चरणों में सिर रख दें, धन्यवाद दे दें। दोनों हाथ जोड़ लें। नाउ रेज़ योर बोथ हैंड्स इन ए नमस्कार पोस्चर एंड पुट योर हेड इनटु दि डिवाइन्स फीट। दोनों हाथ जोड़ लें, परमात्मा के चरणों में सिर झुका लें।
आदमी अकेला काफी नहीं, परमात्मा की सहायता चाहिए। उसकी अनुकंपा के बिना कुछ भी न हो सकेगा, उसकी अनुकंपा चाहिए। हृदय में भीतर-भीतर भाव को फैलने दें: प्रभु की अनुकंपा अपार है, प्रभु की अनुकंपा अपार है, प्रभु की अनुकंपा अपार है। दाइ ग्रेस इज़ इनफिनिट, दाइ ग्रेस इज़ इनफिनिट, दाइ ग्रेस इज़ इनफिनिट। प्रभु की अनुकंपा अपार है, प्रभु की अनुकंपा अपार है, प्रभु की अनुकंपा अपार है, प्रभु की अनुकंपा अपार है।
दो-चार गहरी श्वास ले लें और ध्यान से वापस लौट आएं। दो-चार गहरी श्वास ले लें और ध्यान से वापस लौट आएं। हमारी सुबह की बैठक पूरी हुई।
दो-तीन बातें आपसे कहनी हैं।...इस प्रयोग को आप घर जारी रखें, ठीक ऐसे ही जैसे हम यहां कर रहे हैं। पड़ोसियों का भय छोड़ दें, इस प्रयोग को जारी रखें। बहुत मित्रों को तो यहां परिणाम हो रहे हैं, कोई सत्तर प्रतिशत लोगों को परिणाम हुए। जो तीस प्रतिशत लोगों को परिणाम नहीं हुए, उसका कुल कारण इतना है कि वे पूरा साहस और पूरी हिम्मत नहीं जुटा पाए। परमात्मा तक पहुंचने में साहस की कमी के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। जिन्हें यहां न भी हो पाया हो, वे भी घर पर जारी रखें। दो-चार-आठ दिन, पंद्रह दिन बीतते, कभी भी घटना घट जाएगी। और एक बार घट जाए, तो फिर आपकी आगे की यात्रा प्रारंभ हो जाती है।
हमारी सुबह की बैठक पूरी हुई।
Questions this discourse answers
Short AI-written summaries of what Osho says in this discourse. Read the full text above for his own words.
Is watching the tendencies a form of repression or suppression?
According to Osho, watching tendencies becomes repression when it is done with a hidden agenda to get rid of them—prejudging them as bad and standing as a partisan. True witnessing is dispassionate, neutral, and conclusion-free; you simply see, without deciding beforehand. From such choiceless observation, understanding flowers and freedom from tendencies happens by itself, as a natural consequence, not as a forced outcome.
In simple terms: If you watch your habits just to make them go away, you’re fighting them; instead, look calmly without judging, and they loosen on their own.
What is the difference between the discipline of resolve and the discipline of surrender?
According to Osho, resolve and surrender are complementary disciplines: practice begins with resolve, focused will and effort, but should culminate in surrender, egoless letting go. Will for will's sake hardens ego and descends; will in service of surrender ascends. Even 'surrender' used to gain power secretly feeds resolve and falls. The right arc: use resolve as a ladder, then drop it; the summit is pure surrender.
In simple terms: Start by trying, but finish by letting go; effort should serve trust, not your ego.

Osho's Commentary
ध्यान के संबंध में थोड़े से प्रश्न हैं। एक मित्र ने पूछा है कि