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Osho

बिन घन परत फुहार — प्रवचन 7Bin Ghan Parat Phuhar #7

7 October 1975 Pune प्रवचन 7 of 10
Listen Original recording · Hindi · 1:36:18 on OshoWorld →
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मूल हिंदी

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Series Place: Pune
Series Dates: Oct 1975
Source Verified: Direct from the Osho Library Archives

सूत्र

मोह मिरग काया बसै, कैसे उबरै खेत।
जो बोवै सोई चरै, लगैं न हरि सूं हेत।।
प्रभुताई कूं चहत है, प्रभु को चहै न कोइ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊंच न होइ।।
सदा रहै चितभंग ही, हिरदै थिरता नाहिं।
रामनाम के फल जिते, काम लहर बहि जाहिं।।
पारस नाम अमोल है, धनवंते घर होय।
परख नहीं कंगाल हूं, सहजो डारे खोय।।
सहजो सुमिरन कीजिए, हिरदै माहिं दुराय।
होठ होठ सूं ना हिलै, सकै नहीं कोइ पाय।।
रामनाम यूं लीजिए, जानै सुमिरनहार।
सहजो कै करतार ही, जानै ना संसार।।

Osho's Commentary

एक अति प्राचीन कथा है।
एक महानगर था। बड़ा उसका विस्तार था। दूर क्षितिज तक फैली हुई उसकी सीमाएं थीं। लेकिन कहते हैं, हाथ की हथेली में समा जाए इतना बड़ा ही था वह। ऊंचे उसके भवन थे। आकाश को छूती गगनचुंबी इमारतें थीं। लेकिन प्याज की गांठ से ज्यादा उसकी ऊंचाई न थी। करोड़ों लोगों का वास था उसमें। लेकिन जो ठीक से गिनती कर सकते थे, उन्होंने सदा उसकी गिनती तीन मानी। तीन से ज्यादा लोग वहां नहीं थे।
संकट के क्षण थे। अफवाह थी कि दुश्मन हमला कर रहा है। तो सारी जनता इकट्ठी हुई, नगर के मध्य के विशाल मैदान में, निर्णय करने को--क्या करना है। लेकिन जिनके पास आंखें थीं उन्होंने देखा, केवल तीन लोग ही आए। और वे तीन लोग भी बड़े अजीब से थे। भिखमंगे मालूम पड़ते थे। चेहरे उनके विक्षिप्त जैसे लगते थे, जैसे वर्षों से नहाए-धोए न हों।
और उन तीनों ने विचार-विमर्श किया।
पहला बड़ा दूर-दृष्टि था। एक महाविचारक की तरफ उसकी ख्याति थी। उसे चांद-तारों पर चलती चींटियों के पैर भी दिखाई पड़ते थे, यद्यपि आंख के सामने खड़ा हिमालय दिखाई नहीं पड़ता था। कहते हैं, वह जो दूर-दृष्टि व्यक्ति था, वह निपट अंधा था। उसने दूर-दृष्टि के नाम से अपने अंधेपन को छिपा लिया था। पास का तो दिखाई नहीं पड़ता था, इसलिए वह दूर का दावा करता था। दूर का किसी को भी दिखाई नहीं पड़ता था, इसलिए कोई विवाद खड़ा नहीं होता था। छोटी-मोटी बातों में वह न पड़ता था। बड़े सिद्धांतों की उसकी चर्चा थी। जीवन के काम आ सके, ऐसी उसने कोई बात कभी कही ही नहीं। वह परमात्मा, स्वर्ग, मोक्ष, इनसे नीचे उतरता ही न था। था परिपूर्ण अंधा, लेकिन ख्याति थी दूर-दृष्टि दार्शनिक की।
उनमें जो दूसरा व्यक्ति था, उसे चांद-तारों का संगीत सुनाई पड़ता था; यद्यपि सिर के ऊपर गरजते बादलों की उसे कोई खबर न होती थी। वह महाबधिर था। उसे सुनाई पड़ता ही नहीं था। और अपने बहरेपन को छिपाने के लिए उसने सूक्ष्म संगीत के शास्त्र खोज लिए थे, जो किसी को भी सुनाई नहीं पड़ते थे, बस उसे ही सुनाई पड़ते थे।
और उनमें जो तीसरा आदमी था, वह बिलकुल नंगा था। कहने को उसके पास एक लंगोटी भी न थी। लेकिन वह सदा एक नंगी तलवार अपने हाथ में लिए रहता था, क्योंकि उसे डर था, कोई उसकी संपत्ति न छीन ले। चोरों से वह सदा भयभीत था।
इन तीनों ने विचार-विमर्श किया।
पहले ने अपनी अंधी आंखें दूर आकाश की तरफ लगाईं। उन आंखों में प्रकाश की कोई एक किरण भी न झलकती थी। पर उसने कहा कि मैं देख रहा हूं, दूर पहाड़ों में छिपा हुआ दुश्मन बढ़ रहा है, संकट करीब है। न केवल मैं यह देख रहा हूं कि किस जाति के लोग हमला करने आ रहे हैं, मैं उनकी संख्या भी बता सकता हूं। खतरा बहुत करीब है और जल्दी कुछ व्यवस्था करनी आवश्यक है।
बहरे ने अपने कान उस तरफ लगाए, जहां अंधे ने अपनी आंखें लगा दी थीं। न अंधे के पास आंखें थीं, न बहरे के पास कान थे। और उसने कहा कि मुझे उनकी आवाज सुनाई पड़ती है, पैरों की पगध्वनि सुनाई पड़ती है। इतना ही नहीं, वे क्या बात कर रहे हैं वह भी मुझे सुनाई पड़ रहा है। और इतना ही नहीं, कौन सी बातें उन्होंने हृदय में छिपा रखी हैं और किसी से भी नहीं कहीं, उन्हें भी मैं सुन पा रहा हूं। प्रकट तो मुझे सुनाई पड़ रहा है, अप्रकट भी मुझे सुनाई पड़ रहा है। खतरा भयंकर है।
नंगा आदमी उछल कर खड़ा हो गया। उसने अपनी तलवार घुमानी शुरू कर दी। उसने कहा कि मैं निश्चित जानता हूं दुश्मन किसलिए आ रहा है। हमारी संपत्ति पर उनकी नजर लगी है। चाहे प्राण रहें कि जाएं, लेकिन संपत्ति की रक्षा करनी ही होगी। और तुम बेफिकर रहो, यह मेरी तलवार, यह तलवार किसलिए है!
ऐसी एक बड़ी प्राचीन कथा है। इसे जब भी मैंने पढ़ा है, तभी बड़ी मधुर और प्रीतिकर लगी है। बड़े इंगित इसमें छिपे हैं, बड़ी अर्थपूर्ण है।
ये तीन आदमी तुम हरेक आदमी के भीतर पाओगे। मनुष्य को हमने ‘पुरुष’ कहा है। पुरुष का अर्थ होता है: महानगर। ‘पुर’ से बना है पुरुष। पुर का अर्थ होता है: नगर। मनुष्य एक नगर है। बड़ी वासनाएं हैं उसकी, बड़ी कामनाएं हैं, तृष्णाओं का जाल क्षितिज के आगे निकल जाता है। लेकिन एक हथेली में समा जाए, इतना ही उसका विस्तार है। और बड़े ऊंचे स्वप्न उठते हैं उसमें--आकाश को छू लें--लेकिन प्याज की गांठ से ऊंचाई ज्यादा नहीं जाती। और इस नगर में करोड़ों-करोड़ों जीवन हैं--एक व्यक्ति में कोई सात करोड़ जीवित अणु हैं। लेकिन अगर तुम गिनती करने जाओगे, तो तुम तीन ही पाओगे। उन तीन के नाम तुम्हें परिचित हैं। एक का नाम है काम, एक का नाम है लोभ, एक का नाम है मोह। और अगर इन तीन में भी तुम और गहरे झांकोगे, तो जैसे त्रिमूर्ति तो विदा हो जाती है और सिर्फ परमात्मा रह जाता है, ऐसा काम, लोभ, मोह इन तीनों में गौर से झांकोगे, तो ये सब भय की ही त्रिमूर्तियां हैं। इनके भीतर तुम भय को छिपा पाओगे।
भय ही लोभ बन जाता है। भय ही काम बन जाता है। भय ही मोह बन जाता है। क्योंकि भयभीत आदमी अकेले होने में डरता है, इसलिए मोह के संबंध निर्मित करता है। पत्नी, पति, भाई, मित्र, बंधु, बेटा, मां, जाति, वर्ण, समाज, देश ऐसे बनाता जाता है। ये मोह के फैलाव हैं। अकेले में डर लगता है। अकेले में भीतर का भय प्रकट होता है। किसी के साथ होते हैं, साथ-संग में भूल जाता है, डूब जाते हैं।
इसी भीतर के भय के कारण कामवासना का जन्म होता है। कामवासना का अर्थ है: भय चेष्टा कर रहा है कुछ पाने की, जिससे कि भय से साक्षात्कार न हो। धन पाने की, पद पाने की, प्रतिष्ठा पाने की, प्रेम पाने की चेष्टा कर रहा है, ताकि भीतर का खालीपन जो भयभीत कर देता है, वह भर जाए। बाहर भरने की कोशिश मोह, भीतर भरने की कोशिश काम। और लोभ पैदा होता है भय से। जो है वह छूटे न, जो नहीं है वह मिल जाए। जो है उसे पकड़े रहूं, उसमें से रत्ती भर खो न जाए; और जो नहीं है वह सब मिल जाए, उसमें से रत्ती भर छूट न जाए।
इस त्रिमूर्ति के पीछे--काम, मोह, लोभ के पीछे तुम भय को छिपा पाओगे। और बड़े आश्चर्य की तो बात यह है, जब तुम जन्मते हो कुछ लेकर नहीं आते, जब तुम मरोगे कुछ लेकर न जाओगे--नग्न आते हो तुम, नग्न जाते हो तुम--और बीच में नाहक ही तलवार घुमाते हो। पास कुछ भी नहीं है, लेकिन चोर से बड़े भयभीत हो। कोई छीन न ले।
जो तुम्हारे पास है ही नहीं, उसके छीनने का तुम्हें डर क्यों पैदा होता है? इसके पीछे बड़ी गहरी बात छिपी है। उस डर को पैदा करके तुम यह मान लेते हो, तुम्हारे पास जरूर कुछ है। अन्यथा लोग छीनने को उत्सुक क्यों हैं? इस जटिल तर्क को समझने की कोशिश करो।
पहले तुम सोचते हो कि दूसरा छीनने आ रहा है, बिना यह सोचे कि मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो कोई छीन ले। खाली हाथ हूं। है क्या तुम्हारे पास? किसके पास क्या है? और जो है, वह कभी छीना जा सकता है? तुम ही हो वह। उसे छीनने का कोई उपाय नहीं है। जो नहीं है वही छीना जा सकता है, क्योंकि वह भ्रांति है। लेकिन दूसरा पास आता है, तुम डरते हो कि शायद कुछ छीनने आ रहा है; ऐसे ही डर के कारण तुम्हें एक अहसास, एक भ्रांति पैदा होती है कि जरूर मेरे पास कुछ होना चाहिए, अन्यथा वह छीनने क्यों आ रहा है? तुम बचाने में लग जाते हो। तुम बचाने में लगते हो तो दूसरा आदमी भी सोचता है, वही जैसा तुम सोचते हो कि जरूर तुम छीनने का इंतजाम कर रहे हो।
बड़ी पुरानी मुल्ला नसरुद्दीन की कहानी है। गुजर रहा था एक गांव के पास से कि उधर से एक बारात आते देखी--बैंड-बाजे, नंगी तलवारें चमकती हुईं, लोग गाते-नाचते--डरा। समझा कि दुश्मन आ गया। तलवारें, बैंड-बाजे! और फिर जब भय होता है तो आंखें वह नहीं देखतीं जो है। उसे फिर युद्ध के ही सब साज-समान दिखाई पड़े।
और वैसे भी जब दूल्हा जाता है तो साज-समान सब युद्ध का ही होता है। छुरा लटका देते हैं दूल्हे के पास, क्योंकि पुराने दिनों में दुल्हन को लाना एक तरह का बलात्कार था। वह कोई प्रेम तो नहीं था, वह तो जबरदस्ती थी। घोड़े पर बैठ कर, छुरी-तलवार लटका कर, पागल दुल्हन को लेने जाएंगे। यह कोई समझ की बात है? और बैंड-बाजे--युद्ध का सबूत, और बाराती जो थे सब लफंगे गांव के। तो अभी भी बाराती में लफंगापन होता है; भला आदमी भी जाता है बारात में तो लफंगापन आ जाता है उसमें। क्योंकि बारात में प्राचीन समय से लफंगे ही जाते रहे। कोई सज्जन आदमी बारात में किसलिए जाएगा? और जाएगा तो उसमें लफंगापन उभर आएगा। अच्छे से भले लोग, भले से भले आदमियों को ले जाओ बारात में--मिनिस्टर हों, डॉक्टर हों, इंजीनियर हों--अचानक तुम पाओगे कि बारात कुछ बदल देती है, बारात में सम्मिलित होते से बाराती में कुछ गड़बड़ हो जाती है। वह बाराती लिया ही इसलिए जाता था कि वह दूल्हे के साथ लड़ने को तैयार था। लड़की को छीनना था। इसलिए लड़की का बाप झुकता है। वह पुराना हिसाब है। वह झुकने के पीछे इतना ही कारण है कि छीनने की कोई जरूरत नहीं, हम वैसे ही झुकने को राजी हैं। हम हार गए। इसलिए लड़की वाला नीचे और लड़के वाला ऊपर। वे विजेता, और लड़की वाला हारा हुआ।
आ रही थी बारात। नसरुद्दीन अकेला था। शांत, एकांत क्षण। गांव के मरघट के पास था, घबड़ा गया। एक तो मरघट। वैसे ही डर रहा था, और दूसरे ये दुश्मन चले आ रहे हैं। उचका, छलांग लगा कर मरघट की दीवाल से एक नई ताजी खोदी कब्र में लेट कर सो गया। मरे को कौन मारता है। वे लोग निकल जाएंगे, पता भी नहीं चलेगा। जहां इतने मुर्दे सो रहे हैं, एक और पड़ा है; कौन फिकर करता है? और दीवाल भी है।
लेकिन उन्होंने भी इस आदमी को देख लिया कि एकदम से यह चौंका, छलांग लगाई, दीवाल के पार गया--वे भी शंकित हो गए कि कोई दुश्मन मालूम होता है, छिपा है। बम फेंक दे, कुछ भी कर दे! बैंड-बाजे उन्होंने बंद कर लिए। जब उन्होंने बैंड-बाजे बंद किए तब तो नसरुद्दीन को पक्का भरोसा आ गया कि बात ठीक थी, इन्होंने देख लिया मालूम होता है। वह श्वास रोक कर पड़ रहा। बाराती सब आ गए, दीवाल पर चढ़ कर देखने लगे कि आदमी कहां गया। नसरुद्दीन के प्राण में और संकट पड़ गया कि जरूर मेरे ही पीछे पड़े हैं। अब तो बिलकुल पक्का है। अपने रास्ते से जाओ! तुम्हें दीवाल पर चढ़ने की क्या जरूरत है! और जब उन्होंने देखा कि यह आदमी एक ताजी खुदी कब्र में, जिंदा आदमी लेटा है--पेट हिल रहा है, श्वास चल रही है--उन्होंने कहा, कोई शरारती है। पता नहीं इसका क्या इरादा है! घेर ली कब्र, नीचे झुक गए चारों तरफ से। अब नसरुद्दीन कब तक श्वास रोके? आखिर उसने भी आंख खोली। तो उन्होंने पूछा: यहां क्या कर रहे हो? नसरुद्दीन ने कहा: यही हम पूछना चाहते हैं। आप यहां क्या कर रहे हो?
उन्होंने पूछा: तुम ठीक-ठीक जवाब दो, तुम यहां आए कैसे?
नसरुद्दीन ने कहा: वही मैं भी पूछना चाहता हूं। तुम अपने रास्ते से जा रहे थे। तुम यहां आए कैसे?
तब तक नसरुद्दीन को भी बात साफ हो गई कि न तो ये मारने वाले हैं, न मैं मारने वाला हूं, हम एक-दूसरे से भयभीत हो गए हैं।
नसरुद्दीन ने कहा: मैं अब तुम्हें बता देता हूं। अपनी तरफ से भी जवाब दे देता हूं, तुम्हारी तरफ से भी। तुम मेरे कारण यहां हो, मैं तुम्हारे कारण यहां हूं।
जीवन ऐसे ही चल रहा है। तुम दूसरे से डरते हो, दूसरा तुमसे डरा है। और ऐसा डर पर डर बढ़ता चला जाता है।
अमरीका रूस से डरता रहता है, रूस अमरीका से डरता रहता है। भारत पाकिस्तान से डरता रहता है, पाकिस्तान भारत से डरता रहता है। रोज नेतागण वक्तव्य देते रहते हैं कि तुमने हथियार खरीद लिए, तुमने यह कर लिया, तुमने वह कर लिया, तुम्हें यह सहायता वहां से कैसे मिली? जैसे कि प्राण कंप रहे हैं। जैसे भय के अतिरिक्त जीवन में कुछ अर्थ नहीं है और।
और इस भय के पीछे वे तीन चीजें छिपी हैं। जो नहीं है उसे मान लिया है, है। जो है--ना-कुछ, नंगापन, उसको जोर से पकड़ते हो कि कहीं कोई छीन न ले। एक तो वह है ही नहीं, हो भी तो दो कौड़ी का है। उसको इतने जोर से पकड़ते हो कि कहीं कोई छीन न ले! तुम्हारी पकड़ के कारण ही दूसरे को लगता है: कोहनूर हीरा होगा हाथ में। कोई कौड़ियों को इस तरह मुट्ठी बांधता है? कौड़ियां तो आदमी ऐसे ही छोड़ देता है।
दूसरा छीनने आता है, तुम्हें और भरोसा बढ़ता जाता है कि कोहनूर के पीछे पड़ा है, नहीं तो इतनी जान कोई जोखिम में डालता है? तुम खुद ही भूल जाते हो कि तुम्हारे हाथ में कौड़ियों के सिवाय कुछ भी नहीं है।
फिर लोभ है, जो ऐसी बातें सुन लेता है जो कही ही नहीं गईं। ऐसी धारणाएं बना लेता है जिनके लिए तथ्य में कोई सहारा नहीं है।
मेरे पास लोग आते हैं। यद्यपि ध्यान करने आते हैं, लेकिन आते तो बाजार से ही हैं। तो उनका लोभ तो भीतर होता ही है। वस्तुतः ध्यान में भी लोभ के कारण ही उत्सुक होते हैं। धन से नहीं मिला, शायद ध्यान से मिल जाए। घर बनाने से नहीं मिला, शायद मंदिर बसाने से मिल जाए। रुपये गिनने से नहीं मिला, शायद माला के मनके गिनने से मिल जाए। मगर गिनती वही है। तो कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि मैं किसी को कहता हूं कि मिल जाएगा, लेकिन यह मिलने की आकांक्षा बाधा है। परमात्मा से मिलने में बड़ी से बड़ी आकांक्षा जो बाधा बन सकती है, वह उसे पाने की। जरूरत से ज्यादा अधैर्य--कि मिल जाए, अभी मिल जाए। योग्यता के बिना शोरगुल मचाते हो। योग्यता होगी, उस दिन मिल जाएगा। ऐसे लोभियों को मैं एक कहानी कहता हूं।
मैं कहता हूं, एक फकीर परमात्मा को उपलब्ध हुआ। जब वह उपलब्ध हुआ, लोगों ने पूछा: कैसे पाया? उसने कहा: मैं तुम्हें अपनी कहानी कह देता हूं।
मेरे पास बहुत धन था, बहुत संपदा थी। और मैं परमात्मा को पाने की आकांक्षा करता था। एक रात मैंने देखा, एक देवदूत उतरा मेरे स्वप्न में और कहने लगा, तुम किस चेष्टा में लगे हो? तो मैंने कहा: मैं परमात्मा को खोज रहा हूं, बस, उसी की तरफ जा रहा हूं।
तो उस देवदूत ने कहा: इतना बोझ-सामान लेकर तुम न पहुंच पाओगे। यह तो बहुत भारी है। तुम आकाश में उड़ न सकोगे इसके कारण। यह सब छोड़ दो, तब तुम्हारी यात्रा हो सकती है। ऊंचाई पर चढ़ना हो तो बोझ लेकर नहीं जाया जाता। और परमात्मा से तो ऊंची कोई ऊंचाई नहीं। छोड़ो बोझ।
सुबह जागा, तो उस फकीर ने अपने शिष्यों को कहा कि मैं सुबह जागा तो मैंने सब धन छोड़ दिया, सिर्फ एक लंगोटी बचा ली। रात फिर सपना आया, फिर वही देवदूत। उसने पूछा: अब क्या इरादे हैं? तो मैंने कहा: जो तुमने कहा वह मैंने पूरा किया। सब छोड़ दिया। उस देवदूत ने कहा: लेकिन यह लंगोटी तुमने कैसे बचा ली?
सबमें लंगोटी न आई?
तो मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारा सब लंगोटी में बच जाएगा। तुम्हारी जीतनी पकड़ थी धन पर, मकान पर, वह सारी की सारी पकड़ अब लंगोटी में आ जाएगी। मुट्ठी तो तुम्हारी वही रहेगी। तुमने हीरे छोड़ दिए, लंगोटी पकड़ ली। इससे न चलेगा। लंगोटी की क्या जरूरत परमात्मा के पास ले जाने की? नग्न उसने तुम्हें भेजा, नग्न वह तुम्हें स्वीकार कर लेगा। वह कोई जमीन के कानून थोड़े ही मानता है कि नंगे कहां चले आ रहे हो? नहीं तो महावीर को प्रवेश ही नहीं करने देता। डायोजनीज को बाहर से निकाल देता।
उसने तुम्हें पैदा किया है, उससे क्या छिपाना है? लंगोटी किसलिए? या तो तुम कुछ छिपाना चाहते हो, या अपने मोह को छोड़ नहीं पाते, चलो लंगोटी पर ही लटका लेंगे।
इतनी खूंटी भी काफी है। यह भी छोड़ो। जिसको उसकी यात्रा करनी है, उसे परिपूर्ण शून्य होकर जाना होता है।
दूसरे दिन सुबह फकीर ने लंगोटी भी छोड़ दी। रात सोया, फिर स्वप्न पाया, देवदूत दिखाई पड़ा। उसने पूछा: अब क्या इरादे हैं? फकीर ने कहा: अब क्या इरादा है! वहीं जा रहा हूं, परमात्मा को खोजने को। उसने कहा: अब जाने की कोई जरूरत नहीं। अब तुम जहां हो वहीं रहो, परमात्मा खुद आ जाएगा। अब तक जाने की जरूरत थी, क्योंकि तुम बोझ से लदे थे। इसलिए मैंने तुमसे कहा: बोझ छोड़ो अगर जाना है। और अब तुमने सभी छोड़ दिया। अब जाने का कोई सवाल ही नहीं है। अब उसे जब आना होगा, आ जाएगा।
जिस दिन तुम्हारी पात्रता पूरी होती है, वह आ जाता है। उसमें क्षण भर देर नहीं होती। देर का कोई उपाय नहीं है।
तो मेरे पास आ जाते हैं ध्यान करने, वे कहते हैं, जल्दी है। कितने दिन में हो जाएगा? मूर्च्छा तुमने जन्मों-जन्मों तक साधी, ध्यान तुम पूछते हो कितनी देर में हो जाएगा? उनको मैं कहता हूं कि मत घबड़ाओ, थोड़ा धैर्य रखो, यह जल्दी मत करो। दो-चार दिन के बाद वे फिर पूछते हैं, अभी तक हुआ नहीं। मैं उनको कहता हूं, यही जल्दी बाधा है। चार दिन में परमात्मा को पाना चाहते हो, कुछ तो थोड़ा सोचो। कुछ हिसाब तो रखो। मांग की भी कोई सीमा तो हो। उनकी बात समझ में आ जाती है। समझ में आ जाती यानी उनके लोभ की समझ में आ जाती, तो वे कहते हैं, यानी, अगर हम बिलकुल ही खयाल छोड़ दें पाने का, तो मिल जाएगा? मैं कहता हूं, निश्चित मिल जाएगा। तो वे कहते हैं, अच्छा छोड़ा।
लेकिन छोड़ रहे हैं वे पाने के लिए ही। फिर दो-चार-आठ दिन बाद कहते हैं कि छोड़ कर भी नहीं मिला। आपने कहा था छोड़ दो, छोड़ दिया, फिर भी नहीं मिला।
अगर छोड़ ही दिया, तो अब मिलने का सवाल कहां से आता है! छोड़ा है ही नहीं। वह छोड़ा भी था लोभ के ही एक अंग की तरह कि चलो, अगर यही शर्त पूरी करनी है यह भी पूरी किए देते हैं, लेकिन पाकर रहेंगे।