प्रवचनों से
जहां ओशो इस प्रश्न पर बोले — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है।
तुमने पूछा है: प्रेम को कैसे उपलब्ध हुआ जाए?
प्रेम का मार्ग कठिन लगता है, क्योंकि तुम उल्टे खड़े हो। अगर कोई आदमी शीर्षासन कर रहा हो, तो तुम्हें उससे कहना पड़ेगा कि चलना बहुत कठिन है। और तुम कह भी क्या सकते हो? अगर तुम कहो, “चलना तो बहुत आसान है,” तो वह उत्तर देगा, “अगर आसान है, तो मैं एक इंच भी क्यों नहीं चल पाता?” जो सिर के बल खड़ा है, उसके लिए चलना कठिन है। जो पैरों के बल खड़ा है, उसके लिए चलना आसान है। तुम सब सिर के बल खड़े हो। समाज की व्यवस्थाओं ने—पुरोहितों, पंडितों, राजनीतिज्ञों ने—तुम्हें उल्टा खड़ा कर दिया है; इसलिए चलना कठिन हो गया है। अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, और चलना सरल हो जाता है। लेकिन अब अपने पैरों पर खड़ा होना कठिन लगता है, क्योंकि तुम सोचते हो कि सिर के बल खड़ा होना ही खड़े होने का एकमात्र ढंग है। आदमी उसी से भर जाता है जो उसे सिखाया जाता है। वह उन्हीं दीक्षाओं, उन्हीं संस्कारों से बंध जाता है जो उसे मिलते हैं। और तुम्हारे संस्कार लगते हैं कि…
तुमने पूछा है कि प्रेम साधा कैसे जा सकता है?
प्रेम का पंथ कठिन है, क्योंकि तुम उलटे खड़े हो। अब जैसे कोई आदमी शीर्षासन कर रहा हो, तो उससे कहना ही पड़ेगा कि चलना बहुत कठिन है। और क्या करोगे? जो आदमी शीर्षासन कर रहा है, उससे तुम यह कहो कि चलना बहुत सरल है। वह कहेगा, अगर सरल है, तो मैं क्यों नहीं चल सकता? सरल है तो मैं इंच भर नहीं सरक पा रहा हूं! सिर के बल जो खड़ा है, उसे चलना कठिन है। पैर के बल जो खड़ा है, उसे चलना सरल है। तुम सब सिर के बल खड़े हो। समाज की व्यवस्था ने, पंडित-पुरोहित-राजनीतिज्ञों की व्यवस्था ने तुम्हें सिर के बल खड़ा कर दिया है, अब चलना तुम्हें कठिन है। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
प्रश्न: प्रिय ओशो, मैं और बेहतर प्रेम कैसे कर सकता हूँ? प्रेम शाश्वत है। यह बुद्धों का अनुभव है, उन अचेतन लोगों का नहीं जिनसे सारा संसार भरा हुआ है। बहुत थोड़े-से लोगों ने ही जाना है कि प्रेम क्या है, और ये वही लोग हैं जो सबसे अधिक जागे हुए हैं, सबसे अधिक संबुद्ध हैं, मानवीय चेतना की सर्वोच्च चोटियां हैं। यदि तुम सचमुच प्रेम को जानना चाहते हो, तो प्रेम को भूल जाओ और ध्यान को याद रखो। यदि तुम अपने बगीचे में गुलाब लाना चाहते हो, तो गुलाबों को भूल जाओ, और गुलाब की झाड़ी की देखभाल करो। उसे पोषण दो, उसे पानी दो, ध्यान रखो कि उसे धूप और पानी की सही मात्रा मिलती रहे। यदि हर चीज की ठीक से देखभाल की जाए, तो सही समय पर गुलाबों का आना निश्चित है। तुम उन्हें पहले नहीं ला सकते, तुम उन्हें जल्दी खिलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, और तुम किसी गुलाब के फूल से यह नहीं कह सकते कि वह और अधिक पूर्ण हो जाए।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, आपने इन प्रवचनों की शृंखला का शीर्षक “सहज योग” रखा है। क्या “सहज” और “योग” एक-दूसरे के विरोधी नहीं लगते?
आनंद मैत्रेय! वे केवल विरोधी दिखाई ही नहीं देते, वे विरोधी हैं। लेकिन जीवन का कोई भी परम सत्य विरोधाभास के बिना प्रकट नहीं हो सकता। जीवन विपरीतों से बना है—अंधकार और प्रकाश, दिन और रात, स्त्री और पुरुष, ऋणात्मक विद्युत और धनात्मक विद्युत, जन्म और मृत्यु। जीवन की पूरी संरचना ही विपरीतों से बुनी हुई है। इसलिए विपरीत केवल विरोधी ही नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि तुमने पूरे दिन कठोर श्रम किया है, तो तुम गहरी नींद सो सकोगे। श्रम और विश्राम विपरीत हैं, फिर भी जिसने श्रम किया है, वही गहरा विश्राम कर सकता है—और जिसने श्रम नहीं किया, वह नहीं कर सकता। इसलिए विपरीत केवल विरोधी ही नहीं हैं, वे एक-दूसरे को पूरा करते हैं। और जिसने रात को गहरा विश्राम किया है, वही सुबह उठकर फिर काम में लग सकता है। जिसने रात भर विश्राम नहीं किया, वह सुबह काम नहीं कर सकेगा। जरा ध्यान से देखो…
पहला प्रश्न: ओशो, आपने इस प्रवचनमाला का शीर्षक दिया है--सहज-योग। क्या सहज और योग परस्पर-विरोधी नहीं लगते?
आनंद मैत्रेय! विरोधी लगते ही नहीं, विरोधी हैं। लेकिन जीवन का कोई भी परम सत्य बिना विरोधाभास के प्रगट हो ही नहीं सकता। जीवन बना है विरोधों से--अंधेरा और प्रकाश, दिन और रात, स्त्री और पुरुष, ऋण विद्युत-धन विद्युत, जन्म-मृत्यु। जीवन की संरचना विरोधों से है। इसलिए विरोधी विरोधी ही नहीं हैं, एक-दूसरे के परिपूरक भी हैं। दिन भर श्रम किया खूब तो गहरी नींद सो सकोगे। श्रम और विश्राम विरोधी हैं, पर जिसने श्रम किया है वही गहरा विश्राम कर सकेगा। और जिसने श्रम नहीं किया वह गहरा विश्राम भी न कर सकेगा। तो विरोधी विरोधी ही नहीं हैं, एक-दूसरे के परिपूरक भी हैं। और जिसने रात्रि गहरा विश्राम किया है वही सुबह जागकर फिर श्रम में संलग्न हो सकेगा। जो रात-भर विश्राम नहीं कर सका वह सुबह श्रम में भी न लग सकेगा।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
बीज बोने पड़ते हैं; मिट्टी तैयार करनी पड़ती है। बहुत प्रेमपूर्ण होना पड़ता है, बहुत सावधान। नए अंकुरों की रक्षा करनी पड़ती है, क्योंकि हजारों खतरे हैं, और प्रेम बहुत नाजुक है। उसे बहुत संभालकर रखना पड़ता है: प्रेम बहुत सूक्ष्म है और संसार बहुत स्थूल। प्रेम एक फूल की तरह है, और संसार में तुम्हें केवल चट्टानें ही चट्टानें मिलेंगी। फूल बहुत आसानी से कुचला जा सकता है। उसकी सुंदरता किसी भी क्षण नष्ट की जा सकती है। यह एक चमत्कार है कि इतने कठोर संसार में वह घटता है, लेकिन वह घटता है। प्रेम मनुष्य को सजग करता है कि चमत्कार संभव हैं। प्रेम से बड़ा कोई और चमत्कार नहीं है। प्रेम के माली बनो। अपने हृदय को मिट्टी होने दो। बगीचे की ठीक समय पर सावधानी से देखभाल करो, जब वसंत आता है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
और केवल तभी, जब कोई प्रकाश से भर जाता है.... प्रकाश की पहली संतान प्रेम है। और प्रेम में वह सब समाया है जो सुंदर है, जो दिव्य है: करुणा, प्रार्थना, सृजनशीलता, अनुग्रह। वे सब प्रेम के पीछे-पीछे चले आते हैं; तुम्हें उनके बारे में सोचने की जरूरत नहीं। वे प्रेम के उपफल हैं, प्रेम के परिणाम हैं। लेकिन प्रेम स्वयं केवल प्रकाश के माध्यम से घटित होता है। ध्यान की सारी विधियां तुम्हें तुम्हारी नींद से बाहर लाने के उपाय हैं, तुम्हें जागने में मदद करने के उपाय हैं। ओशो (आइगे से): तुम्हारा हृदय एक अलग लय में धड़कने लगता है। सारा संसार वही रहता है, लेकिन तुम्हारी आंखें अब वही नहीं रहतीं; इसलिए तुम वे चीजें देखने लगते हो जो तुमने पहले कभी नहीं देखी थीं, और वे चीजें देखना बंद कर देते हो जिन्हें तुम सदा से देखते आए थे। इसलिए एक अर्थ में संसार वही रहता है, और दूसरे अर्थ में वह वही नहीं रह जाता, क्योंकि जब द्रष्टा बदल जाता है, तो दृश्य बदल जाता है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।