प्रवचनों से
जहां ओशो इस प्रश्न पर बोले — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है।
ओशो, प्रेम अवर्णनीय क्यों है? जैसे ही हृदय में उसका स्मरण उठता है, वाणी मौन हो जाती है। फिर क्या घटता है, कहा नहीं जा सकता। आंखें अधमुंदी हो जाती हैं और सब कुछ खो जाता है! ऐसा क्यों होता है? मैं इसे समझ नहीं पाता। प्रेम का यह कैसा रूप है?
जितना विज्ञान आगे बढ़ता है, जीवन उतना ही बोझिल हो जाता है। सब कुछ समझ में आने लगता है, और फिर जीने योग्य कुछ भी नहीं रह जाता। यदि जीवन सारा का सारा गद्य हो जाए, तो आत्महत्या के सिवाय कुछ नहीं बचता। जीवन में थोड़ी कविता होनी ही चाहिए। कविता का अर्थ है: जो पकड़ में न आए—एक झलक मिलती है, लेकिन पकड़ी नहीं जाती। जीवन में पारे जैसा भी कुछ होना चाहिए—मुट्ठी बंद करो और वह बिखर जाता है। और जीवन में ऐसा बहुत है। प्रेम ठीक पारे जैसा है: जितना तुम उसे व्याख्याओं में पकड़ने की कोशिश करते हो, उतना ही वह फिसल जाता है। निस्तब्ध रात में, यह कैसे हुआ कि अचानक मेरा हृदय लबालब भर आया? मैं नहीं जानता कि कौन-से मधुर स्वप्न भीतर के परदे पर फैल गए। किस अपरिचित स्मृति ने मेरे प्राणों को सावन की वर्षाओं से भर दिया? अपनी ही आंखों की रिमझिम से मैंने वर्षा-ऋतु को लजा दिया; और संसार ने भी, भीगी पलकों से, यह भोला-सा प्रश्न उठाया: ये छोटी-छोटी गागरें, मेरी आंखें—इन्होंने कैसे समेट लिया…
दूसरा प्रश्न: ओशो, प्रेम अव्याख्य क्यों है? हृदय में याद होते ही वाणी मौन हो जाती है। कुछ बता नहीं सकती क्या हो जाता है तब। आंखें अर्धोन्मीलित हो जाती हैं और सब खो जाता है! ऐसा क्यों हो जाता है? मेरी समझ में नहीं आता। प्रेम का यह ऐसा रूप कैसा?
जितना विज्ञान बढ़ता है, उतनी जिंदगी बोझिल हो जाती है। सब समझ में आ जाता है। और जब सब समझ में आ जाता है, तो जीने योग्य कुछ नहीं रह जाता। जीवन एकदम गद्य ही गद्य हो जाए तो आत्महत्या के सिवाय कुछ नहीं बचता। जीवन में कुछ पद्य भी होना चाहिए। पद्य का अर्थ होता है: बेबूझ। झलक तो मिले, मगर पकड़ में न आए। कुछ पारे की तरह भी होना चाहिए--मुट्ठी बंधे और छितर-छितर जाए। और जिंदगी में ऐसा बहुत कुछ है। प्रेम बिलकुल पारे जैसा है। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
परमात्मा को अवर्णनीय क्यों कहा जाता है?
जो जानते हैं, वे विधियों की बात करते हैं—कि परमात्मा को कैसे जाना जा सकता है। जो नहीं जानते, वे परमात्मा को सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। वे प्रमाण देते हैं, कहते हैं, “देखो, यह प्रमाण है। परमात्मा इस तरह अस्तित्व में है। उसके हजार हाथ हैं, या चार हाथ हैं, या तीन सिर हैं।” ये सब मूर्खतापूर्ण बातें हैं। उसके हाथों को हजार हाथों में नहीं नापा जा सकता। तीन सिर पर्याप्त नहीं होंगे, क्योंकि सभी सिर उसी के हैं, और सभी हाथ उसी के हैं। और केवल वे हाथ ही नहीं जो आज अस्तित्व में हैं। वे हाथ भी उसी के हैं जो अभी अस्तित्व में नहीं आए हैं। जो आज हैं वे उसके हैं, और जो अनंत भविष्य में होंगे वे भी उसके हैं। उसे हजार हाथों में कैसे व्यक्त किया जा सकता है? और केवल मनुष्य के हाथ ही उसके नहीं हैं; पक्षियों और पशुओं के हाथ भी उसी के हैं। वृक्षों की शाखाएं—वृक्षों के ये हाथ भी उसी के हैं। सब कुछ उसी का है। यह विराटता कैसे समा सकती है…
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
प्रश्न: पहला प्रश्न: ओशो, परमात्मा को अनिर्वचनीय क्यों कहा जाता है? जीवन में सब कुछ अनिर्वचनीय है। परमात्मा जीवन की समग्रता है। जब जीवन की एक-एक चीज अनिर्वचनीय है, तो उन सबका जोड़ तो परम अनिर्वचनीय होगा ही। क्या तुम प्रेम को परिभाषित कर सकते हो? कोई पूछे, “प्रेम क्या है?” और ऐसा नहीं है कि तुमने प्रेम जाना नहीं है। शायद मानसून न बरसा हो, लेकिन फुहार तो तुम्हें जरूर छू गई है। किसी न किसी ढंग से, किसी न किसी द्वार से, प्रेम का थोड़ा-सा स्वाद तुम्हें मिला है। तुमने किसी मित्र का प्रेम जाना होगा, पति का, पत्नी का, बेटे का, मां का, पिता का। कहीं न कहीं से प्रेम की एक किरण उतरी ही होगी, क्योंकि प्रेम की एक किरण के बिना कोई जी नहीं सकता। पहचान हुई है, एक छोटी-सी खिड़की खुली है। लेकिन अगर कोई पूछे, “प्रेम क्या है?” तो तुम गूंगे हो जाओगे। क्या कहोगे?
तुम प्रेम का निर्वचन कर सकते हो, कोई पूछे प्रेम क्या है? और ऐसा भी नहीं है कि तुमने प्रेम न जाना हो। न बरसी हो वर्षा, बूंदाबांदी जरूर हुई होगी। किसी-न-किसी ढंग, किसी-न-किसी द्वार से प्रेम की थोड़ी अनुभूति हुई होगी। मित्र का प्रेम जाना होगा, पति का, पत्नी का, बेटे का, मां का, पिता का। कहीं-न-कहीं से प्रेम की कोई किरण उतरी ही होगी, क्योंकि बिना प्रेम की किरण के तो कोई जी ही नहीं सकता। पहचान हुई होगी, झरोखा खुला होगा। पर अगर कोई पूछे प्रेम क्या है, तो एकदम अवाक रह जाओगे न, क्या कहोगे?
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, परम प्रियतम को परिभाषित क्यों नहीं किया जा सकता? यदि किसी चीज़ का अनुभव किया जा सकता है, तो उसे अभिव्यक्त क्यों नहीं किया जा सकता?
हम यह प्रयोग किसी बच्चे के साथ कर सकते हैं: बच्चा पैदा हो और हम वे सारे तंतु निकाल दें जो मिठास को अनुभव करते हैं—प्लास्टिक सर्जरी से उन्हें काट दें, जीभ को छील दें। फिर उससे कहें, “चीनी की डली मीठी है।” वह कहेगा, “कुछ और कहिए; इससे कोई मदद नहीं मिलती। ‘मीठा’ से आपका मतलब क्या है? ‘मीठा’ का अर्थ क्या होता है?” तुम भी चकरा जाओगे: “मीठा” के बारे में समझाने को है ही क्या? “मीठा, मीठा है!” वह कहेगा, “इससे कुछ हल नहीं होता—यह तो केवल दोहराना हुआ। ‘मीठा, मीठा है’—इससे क्या स्पष्ट हुआ? कृपा करके समझाइए।” तुम कैसे समझाओगे? नहीं; कुछ अनुभव होते हैं, और फिर भी उन्हें परिभाषित नहीं किया जा सकता। और जिन अनुभवों को परिभाषित किया जा सकता है, उनका अर्थ केवल इतना है: वे सामान्य अनुभव हैं—हर कोई उनमें सहभागी है। लेकिन दिव्य का अनुभव परम असामान्य है। वह कभी-कभार, बहुत विरले, किसी दुर्लभ व्यक्ति को घटता है। उस विरले की स्थिति समझो। उसने जान लिया है—अब वह तुम्हें कैसे बताए?…
पांचवां प्रश्न: ओशो, उस परमप्रिय का निर्वचन क्यों नहीं हो सकता है? जिसका अनुभव हो सकता है, उसका निर्वचन क्यों नहीं?
नहीं; अनुभव होते हैं और फिर भी निर्वचन नहीं हो पाता। और जिन अनुभवों का निर्वचन हो जाता है, उसका केवल इतना ही अर्थ है कि वे सामान्य अनुभव हैं, सभी को उनका अनुभव हो रहा है। लेकिन परमात्मा का अनुभव तो बड़ा असामान्य अनुभव है। कभी-कभार इक्के-दुक्के विरले व्यक्ति को होता है। उस विरले व्यक्ति की मुसीबत समझो। उसने जान लिया। लेकिन अब तुमसे कैसे कहे? गूंगे केरी सरकरा! बिलकुल गूंगा हो जाता है वैसा आदमी। और ऐसा भी नहीं है कि नहीं बोलता।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, मुझे च्वांग त्ज़ु से, जोशु से, मुमोन से, बोधिधर्म से प्रेम हो गया है। मैं उनका अनुसरण कैसे न करूं? मुझे लगता है, उन्होंने मुझे पहले ही रूपांतरित कर दिया है। मैं कृतज्ञ कैसे न होऊं?
पहले मैं तुम्हें एक छोटा-सा प्रसंग सुनाऊं। जब रब्बी मौदेकाई के बेटे, रब्बी नोर ने अपने पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संभाला, तो उनके शिष्यों ने देखा कि कई बातों में उनका आचरण अपने पिता से भिन्न है। उन्होंने उनसे इस बारे में पूछा। उन्होंने उत्तर दिया, “मैं ठीक वही करता हूं जो मेरे पिता करते थे। उन्होंने अनुकरण नहीं किया, और मैं भी अनुकरण नहीं करता।” इस प्रसंग पर ध्यान करो। उन्होंने कहा, “मैं ठीक वही करता हूं जो मेरे पिता करते थे। उन्होंने अनुकरण नहीं किया, और मैं भी अनुकरण नहीं करता।” अगर तुम सचमुच जोशू को, बोधिधर्म को, या मुझे समझते हो, तो तुम अनुकरण नहीं करोगे—क्योंकि मैंने अनुकरण नहीं किया है, क्योंकि बोधिधर्म ने कभी किसी का अनुकरण नहीं किया। जोशू अपने शिष्यों से कहा करते थे, “अगर तुम बुद्ध का नाम भी लो, तो तुरंत जाकर अपना मुंह धो लेना।” जोशू यह भी कहा करते थे, “अगर रास्ते में बुद्ध मिल जाएं, तो तुरंत उन्हें मार डालना।” और वे रोज बुद्ध की पूजा किया करते थे। सामान्यतः ज़ेन उलझनभरा लगता है, लेकिन…
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।