प्रवचनों से
जहां ओशो इस प्रश्न पर बोले — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है।
बहुत-से लोग प्रेम को लेकर बिल्कुल निराश महसूस करते हैं। क्या प्रार्थना तक पहुँचने का कोई और मार्ग नहीं है?
नहीं। अगर प्रेम के संबंध में तुम अपने को काफी निराश पाते हो, तो प्रार्थना के संबंध में तो तुम्हें बिलकुल ही निराश होना पड़ेगा, क्योंकि प्रार्थना प्रेम के सार के सिवाय और कुछ भी नहीं है। प्रेम फूल जैसा है और प्रार्थना सुगंध जैसी। यदि तुम फूल तक नहीं पहुंच सकते, तो सुगंध तक कैसे पहुंचोगे? कोई भी प्रेम को बाइपास नहीं कर सकता। और किसी को कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वहां असफलता के सिवाय और कुछ भी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है। तुम प्रेम के बारे में इतने निराश क्यों हो? वही समस्या प्रार्थना में भी आएगी, क्योंकि प्रार्थना का अर्थ है समग्र से प्रेम, ब्रह्मांड से प्रेम। इसलिए प्रेम की समस्या में और गहरे जाओ, और प्रार्थना के बारे में सोचने से पहले उसे सुलझा लो। अन्यथा तुम्हारी प्रार्थना झूठी होगी; वह एक धोखा होगी। निश्चय ही धोखा केवल तुम्हें ही होगा, किसी और को नहीं। तुम्हारी प्रार्थना सुनने वाला कोई ईश्वर नहीं है। जब तक तुम्हारी प्रार्थना प्रेम नहीं है, समग्र बहरा ही रहेगा। वह किसी और ढंग से नहीं खुल सकता…
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
प्रश्न: पहला प्रश्न: ओशो, प्रार्थना क्या है? अविनाश, प्रार्थना प्रेम का निचोड़ है। जैसे फूलों को निचोड़ने से इत्र मिलता है, वैसे ही यदि तुम प्रेम के सारे रूपों को निचोड़ दो, तो प्रार्थना जन्म लेती है। जैसे सुगंध फूलों में बसी होती है, वैसे ही प्रार्थना प्रेम की सुगंध है। प्रार्थना न हिंदू है, न मुसलमान है, न ईसाई है। और यदि वह है, तो जान लेना कि वह प्रार्थना नहीं है; वह कुछ और है—धोखा, आत्म-छल। और छल कभी परमात्मा तक नहीं पहुंचता। यदि उस मंदिर के द्वार तक पहुंचना है, तो तुम्हें सच्चे कदम चाहिए। प्रार्थना को सीखने की कोई जरूरत नहीं है, जैसे प्रेम को सीखने की कोई जरूरत नहीं है। तुम प्रेम की क्षमता लेकर पैदा हुए हो; ठीक वैसे ही, तुम प्रार्थना की क्षमता लेकर पैदा हुए हो। बस अपने प्रेम को बढ़ने दो। प्रेम को फैलने दो—प्रेम की कोई सीमा न रहे!
प्रार्थना वैसे ही सीखने की जरूरत नहीं है जैसे प्रेम सीखने की जरूरत नहीं है। प्रेम की क्षमता लेकर तुम पैदा हुए हो, वैसे ही प्रार्थना की क्षमता लेकर भी पैदा हुए हो। बस अपने प्रेम को विकसित करो। फैलने दो प्रेम को, कोई सीमा प्रेम के लिए न हो! पत्नी पर न रुके, बेटे पर न रुके, मां पर न रुके, भाई पर न रुके--फैलता जाए! और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि पत्नी को प्रेम मत करना।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, आपने इन प्रवचनों की श्रृंखला का शीर्षक “सहज योग” रखा है। क्या “सहज” और “योग” एक-दूसरे के विपरीत नहीं लगते?
आनंद मैत्रेय! वे केवल विरोधी प्रतीत ही नहीं होते, वे विरोधी हैं। लेकिन जीवन का कोई भी परम सत्य विरोधाभास के बिना प्रकट नहीं हो सकता। जीवन विपरीतों से बना है—अंधकार और प्रकाश, दिन और रात, स्त्री और पुरुष, ऋण विद्युत और धन विद्युत, जन्म और मृत्यु। जीवन की पूरी संरचना ही विपरीतों से बुनी हुई है। इसलिए विपरीत केवल विरोधी ही नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि तुमने दिन भर कठोर श्रम किया है, तो तुम गहरी नींद सो सकोगे। श्रम और विश्राम विपरीत हैं, फिर भी केवल वही व्यक्ति गहरा विश्राम कर सकता है जिसने श्रम किया है—और जिसने श्रम नहीं किया है, वह नहीं कर सकता। इसलिए विपरीत केवल विरोधी ही नहीं हैं, वे एक-दूसरे को पूरा करते हैं। और केवल वही व्यक्ति जिसने रात में गहरा विश्राम किया है, सुबह उठकर फिर काम में लग सकता है। जिसने रात भर विश्राम नहीं किया, वह सुबह काम नहीं कर पाएगा। जरा गौर से देखो…
पहला प्रश्न: ओशो, आपने इस प्रवचनमाला का शीर्षक दिया है--सहज-योग। क्या सहज और योग परस्पर-विरोधी नहीं लगते?
आनंद मैत्रेय! विरोधी लगते ही नहीं, विरोधी हैं। लेकिन जीवन का कोई भी परम सत्य बिना विरोधाभास के प्रगट हो ही नहीं सकता। जीवन बना है विरोधों से--अंधेरा और प्रकाश, दिन और रात, स्त्री और पुरुष, ऋण विद्युत-धन विद्युत, जन्म-मृत्यु। जीवन की संरचना विरोधों से है। इसलिए विरोधी विरोधी ही नहीं हैं, एक-दूसरे के परिपूरक भी हैं। दिन भर श्रम किया खूब तो गहरी नींद सो सकोगे। श्रम और विश्राम विरोधी हैं, पर जिसने श्रम किया है वही गहरा विश्राम कर सकेगा। और जिसने श्रम नहीं किया वह गहरा विश्राम भी न कर सकेगा। तो विरोधी विरोधी ही नहीं हैं, एक-दूसरे के परिपूरक भी हैं। और जिसने रात्रि गहरा विश्राम किया है वही सुबह जागकर फिर श्रम में संलग्न हो सकेगा। जो रात-भर विश्राम नहीं कर सका वह सुबह श्रम में भी न लग सकेगा।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, आपका असहाय बच्चा रो रहा है। आज मैं अपने अंतरतम से पुकार रहा हूँ; पूजा का कोई विधि-विधान नहीं—बस यह मेरा तन-मन है, आपके दर्शन के उपहार की भीख माँगता हुआ।
तारू! इतना काफी है। अगर कोई रो सके, तो प्रार्थना पूरी हो गई। वह आंसुओं से शुरू होती है और आंसुओं पर ही समाप्त होती है। बाकी सब उधार के फूल हैं; केवल आंसुओं के फूल हमारे अपने हैं। मनुष्य जो भी इंतजाम करता है, वे स्थूल हैं। स्थूल इंतजामों की कोई जरूरत नहीं। भाव सूक्ष्म में उठे, सूक्ष्म में एक लहर जागे—चाहे वह आंसू बनकर बहे या गीत बन जाए, चाहे नृत्य में बदल जाए या संगीत में—सार की बात यही है कि भाव अंतरतम में उठे। जब भाव उठता है, भक्ति घट गई। शायद कोई सुने भी नहीं; यह जरूरी नहीं कि आंखों में सचमुच आंसू आ ही जाएं—अगर आंखें बस नम हो जाएं, इतना काफी है। आंसुओं का आंखों तक पहुंचना भी जरूरी नहीं; अगर हृदय नम हो जाए, इतना काफी है। हृदय की नमी ही प्रार्थना है। जिन्हें फुरसत हो, वे मस्जिद और मंदिर के शिलालेख पढ़ें। यहां तो जहां तक आंख जा सके…
पहला प्रश्न: ओशो, आपका असहाय बालक रोता है। आज अंतरीये करूं हूं आह्वान, नथी पूजा आयोजन केवल आ मम तन-मन, तव दर्शन दान।
तरु! उतना काफी है। रो सके कोई, बस प्रार्थना पूरी हो जाती है। आंसुओं पर प्रारंभ है, आंसुओं पर ही अंत। शेष सब फूल पराये हैं, आंसुओं के फूल ही अपने हैं। शेष सब, जो भी आयोजन मनुष्य करता है, स्थूल हैं। स्थूल आयोजन की कोई आवश्यकता नहीं है। सूक्ष्म में भाव उठे, सूक्ष्म में तरंग जगे--आंसुओं में बहे कि गीतों में, नृत्य बने कि संगीत--पर मौलिक बात है अंतर्तम में उठे भाव। भाव उठा कि भक्ति हो गई। शायद किसी को सुनाई भी न पड़े, जरूरी भी नहीं है कि आंख से आंसू प्रगट ही हों; आंख गीली हो जाये, उतना काफी है। आंख तक आंसू आयें, यह भी जरूरी नहीं है; हृदय गीला हो जाये, उतना काफी है। हृदय की आद्रता प्रार्थना है। हरम-ओ-दैर के कत्बे वोह देखे, जिसको फुर्सत है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
ओशो, मैं बिलकुल पत्थर जैसा हूँ, फिर भी प्रार्थना में डूब जाना चाहता हूँ—लेकिन मुझे पता नहीं कि प्रार्थना क्या है। मैं प्रार्थना कैसे करूँ? मुझ अंधे को भी आँखें दे दो!
हृदय लक्ष्य का संकेत देता है। हृदय मंज़िल की ओर इशारा करता है, क्योंकि हृदय प्रेम है। जैसे कम्पास: तुम उसे कैसे भी घुमाओ, वह सच्ची दिशा में ठहर जाता है; वह उत्तर की ओर इशारा करता है। ठीक ऐसे ही हृदय सदा ईश्वर की ओर सधा हुआ है। और ईश्वर की ओर यह सध जाना ही प्रार्थना कहलाता है। जिस स्रोत से वह प्रार्थना उठती है, उसे प्रेम कहते हैं। आंखें मत मांगो—आंख मांगो! तर्क और ज्ञान मत मांगो—प्रेम मांगो। आंखें न भी हों, तो आंसू काफी हैं। तुम पूछते हो: “मैं तो बिल्कुल पत्थर जैसा हूं!” हर कोई पत्थर है—जब तक ईश्वर घटित नहीं होता। इसलिए अपने मन में कोई हीनता मत लेना। जिस क्षण ईश्वर उतरता है, सारे पत्थर मूर्तियां बन जाते हैं, और एक अतुलनीय सौंदर्य प्रकट होता है। कभी-कभी तो पत्थर भी टूट जाता है। पानी की बूंद ने कब अपना रहस्य प्रकट किया है? सागर ने कब अपने भीतर भयानक अग्नि नहीं छिपाई है? वह सहता है, वह…
तीसरा प्रश्न: ओशो, मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी प्रार्थना में डूबना चाहता हूं, पर जानता नहीं कि प्रार्थना क्या है। कैसे करूं प्रार्थना? मुझ अंधे को भी आंखें दें!
हृदय मंजिल की सूचना देता है। हृदय गन्तव्य की तरफ संकेत करता है, क्योंकि हृदय प्रेम है। इसलिये हृदय का जो इशारा है वह परमात्मा की तरफ लगा रहता है। दिशा-सूचक यंत्र होता है न, तो तुम कैसा ही उसे घुमा-फिराकर रखो वह ठीक दिशा बताने लगता है। उत्तर कहां है, वह बता देता है। ऐसे ही हृदय सदा ही परमात्मा की तरफ लगा हुआ है। और वह जो परमात्मा की तरफ लगाव है, उसका नाम प्रार्थना है। उस प्रार्थना का जो मूलस्रोत है, उसका नाम प्रेम है। तुम आंखें मत मांगो--आंख मांगो! तुम तर्क मत मांगो, ज्ञान मत मांगो--प्रेम मांगो। आंख नहीं आंसुओं से काम हो जायेगा। पूछते हो तुम: ‘मैं बिलकुल पत्थर हूं!’ सब ही पत्थर हैं। जब तक परमात्मा नहीं घटा है तब तक सभी पत्थर हैं। इसलिये मन में कोई हीनता न लेना। परमात्मा के घटते ही सब पत्थर प्रतिमाएं बन जाते हैं, अपूर्व सौंदर्य प्रगट होता है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।