महावीर पर ओशो की दृष्टि किसी अनुयायी की नहीं, प्रेमी की दृष्टि है — और वे कहते हैं कि अनुयायी कभी समझ ही नहीं पाता। जैन महावीर को कभी नहीं समझ सकता, क्योंकि उसकी शर्त बंधी है; प्रेम बेशर्त है, और समझ प्रेम से ही आती है। महावीर उनके लिए एक मिट्टी का दीया हैं जिसमें ज्योति प्रकट हुई — पूजा दीये की नहीं करनी, स्मरण ज्योति का करना है, जो हमारे दीये में भी जल सकती है।
'महावीर-वाणी' में ओशो नमोकार मंत्र से लेकर संयम और अभय तक महावीर की देशना को नये अर्थ देते हैं — त्याग और दमन की जगह ऊर्जा की प्रतिष्ठा। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं।
प्रवचनों से
ओशो ने जहां-जहां इस विषय पर बात की — हर अंश पूरे प्रवचन से जुड़ा है। हिंदी पुस्तकों के लिंक मूल हिंदी प्रवचन खोलते हैं।
Osho, will your intellectual and fact-based analysis of Mahavira’s life—as certified and settled by tradition—be acceptable to society?
प्रश्न: ओशो, महावीर के जीवन का आपका बौद्धिक और तथ्यपरक विश्लेषण—जैसा कि परंपरा ने प्रमाणित और निश्चित कर रखा है—क्या समाज को स्वीकार्य होगा? पहली बात, समाज को कोई बात स्वीकार्य हो, इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं इस पर नजर भी नहीं रखता कि समाज उसे स्वीकार करता है या नहीं। और ऐसा सोचने का भी कोई कारण नहीं है कि जिसे समाज स्वीकार करता है, वह इसलिए सही ही होगा। समाज केवल उसी को स्वीकार करता है जिससे समाज जैसा है, ठीक वैसा ही बना रहे। निश्चित ही, जब भी यह भाव उठता है कि समाज बदलना चाहिए—दृष्टि बदलनी चाहिए, सोच बदलनी चाहिए—तो अस्वीकार आता है। मूलतः, जो मैं कह रहा हूं, उसके समाज द्वारा अस्वीकार किए जाने की संभावना है—बुद्धिमानों द्वारा नहीं। लेकिन यदि जो मैं कह रहा हूं वह बुद्धिपूर्ण है, वैज्ञानिक है, तथ्यपरक है, सारभूत है, तो वह अस्वीकार टूटेगा। अस्वीकार जीत नहीं सकता; उसे हारना ही होगा। और यदि वह तथ्यपरक नहीं है, अवैज्ञानिक है, सारभूत नहीं है, तो अस्वीकार जीतेगा—और जीतना भी चाहिए।
प्रश्न: ओशो, परंपरा से प्रमाणित एवं निर्णीत महावीर के जीवन का बौद्धिक एवं तथ्य-पूर्ण आपका विश्लेषण क्या समाज को स्वीकृत होगा?
एक तो, कुछ समाज को स्वीकृत हो, ऐसी आवश्यकता भी नहीं है। समाज को स्वीकृत हो, इसका ध्यान भी नहीं है। समाज को स्वीकृत होने से ही वह ठीक है, ऐसा कोई कारण भी नहीं है। समाज को जो स्वीकृत है, वह वही है कि जैसा समाज है, उसको वह वैसा ही बनाए रखे। निश्चित ही समाज को जब भी बदलने का खयाल आता है या सवाल उठता है कि समाज बदले, दृष्टि बदले, विचार बदले, तो अस्वीकृति आती है। प्राथमिक रूप से तो जो मैं कह रहा हूं, उसकी अस्वीकृति की ही संभावना है--समाज से, बुद्धिमान से नहीं। लेकिन अगर जो मैं कह रहा हूं, वह बुद्धिमत्तापूर्ण है, वैज्ञानिक है, तथ्यगत है, तात्विक है, तो अस्वीकृति को टूटना पड़ेगा। अस्वीकृति जीत नहीं सकती, उसको हारना पड़ेगा। और अगर वह तथ्यपूर्ण नहीं है, अवैज्ञानिक है, तात्विक नहीं है, तो अस्वीकृति जीत जाएगी और जीतना चाहिए।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
Osho, Kastur Bhai has asked: Why did Mahavira speak in Prakrit and not in Sanskrit?
प्रश्न: ओशो, कस्तूर भाई ने पूछा है: महावीर ने प्राकृत में क्यों बोला, संस्कृत में क्यों नहीं? यह प्रश्न सचमुच गहरा है। संस्कृत कभी जन-भाषा नहीं रही; वह सदा पंडितों की, दार्शनिकों की, विचारकों की भाषा रही है। प्राकृत लोगों की भाषा थी—साधारण जनों की, अशिक्षितों की, निरक्षरों की, गांव के लोगों की। शब्द ही बहुत कुछ कह देते हैं। प्राकृत का अर्थ है: स्वाभाविक, सहज। संस्कृत का अर्थ है: परिष्कृत, सुसंस्कृत। बाद में प्राकृत को परिष्कृत करके जो बना, उसे संस्कृत कहा गया। प्राकृत मूल है, जड़ भाषा है; संस्कृत उसका परिष्कार है। इसलिए “संस्कृत” शब्द उस भाषा के लिए प्रचलित हुआ जो “संस्कृत” की गई थी—सुसंस्कृत, साधारण बोलचाल के खुरदरेपन से साफ की गई। धीरे-धीरे संस्कृत इतनी परिष्कृत हो गई कि बहुत थोड़े लोगों की भाषा रह गई। लेकिन पंडित-पुरोहित के हित में यही है कि जीवन में जो भी मूल्यवान है, वह ऐसी भाषा में रखा जाए जिसे साधारण आदमी समझ न सके।
प्रश्न: ओशो, कस्तूर भाई ने पूछा है कि महावीर प्राकृत भाषा में क्यों बोले, संस्कृत में क्यों नहीं?
और मैं उसके बुनियादी कारणों में एक कारण मानता हूं कि महावीर उस भाषा में बोल रहे हैं, जो जनता की है। पंडितों से शायद उनका बहुत कम संपर्क बन पाया। हो सकता है हजारों पंडित अपरिचित ही रहे हों कि यह आदमी क्या बोलता है! क्योंकि पंडितों का एक अपना बुर्जुआपन, एक अभिजात भाव है, वे साधारणजन नहीं हैं! न वे साधारणजन की भाषा में बोलते, न सोचते। वे असाधारणजन हैं! वे किसी चूजन-फ्यू, चुने हुए लोग हैं, उन चुने हुए लोगों की दुनिया का सब-कुछ न्यारा है! साधारणजन से उसका कुछ लेना-देना नहीं! साधारणजन तो भवन के बाहर हैं, मंदिर के बाहर हैं! …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
Osho, why could Mahavira not find any master or sect at whose feet he could surrender? What was Mahavira seeking?
प्रश्न: ओशो, महावीर को कोई गुरु या संप्रदाय क्यों नहीं मिला, जिसके चरणों में वे समर्पण कर सकते? महावीर क्या खोज रहे थे? जीवन में बहुत कुछ है, जो दूसरे से प्राप्त नहीं किया जा सकता। और जो भी परम है—सत्य और सुंदर—उसे किसी और से पाने का कोई उपाय नहीं है। जो दूसरे से मिल सकता है, उसका कोई अंतिम मूल्य नहीं है, क्योंकि जो हमें उधार मिलता है, वह हमारे अपने प्राणों से नहीं उगा होता। यह ऐसा ही है जैसे घर सजाने के लिए बाजार से कागज के फूल ले आना। जीवित वृक्षों से आने वाले फूलों की बात और है; वे जीवित हैं। कोई वृक्ष से फूल उधार भी ले ले, तो उसी प्रक्रिया में वे मर जाते हैं। थोड़ी देर के लिए, गुलदस्ते में, वे आंख को धोखा दे सकते हैं, जैसे जीवित हों, लेकिन वे जीवित नहीं होते। और सत्य के फूल कभी उधार उपलब्ध नहीं होते।
प्रश्न: ओशो, महावीर को ऐसा कोई गुरु अथवा पंथ क्यों नहीं मिल सका, जिनके चरणों में महावीर अपना आत्मसमर्पण कर सकें? महावीर ऐसा क्या चाहते थे?
और ध्यान रहे, जो व्यक्ति किसी के प्रति झुकता है, वह किसी के प्रति सदा अकड़ा रहता है। और जो व्यक्ति किसी के चरण छूता है, वह किसी से चरण छुआने की आतुरता में रहता है। मैं एक बड़े संन्यासी के आश्रम में गया था। एक बड़े मंच पर संन्यासी बैठे हुए हैं, उनके मंच के नीचे ही एक छोटा तख्त है, उस पर एक दूसरे संन्यासी बैठे हैं, उस तख्त के नीचे और संन्यासी बैठे हुए हैं। उन बड़े संन्यासी ने मुझसे कहा कि आप देखते हैं मेरे बगल में कौन बैठा हुआ है? मैंने कहा, मुझे जरूरत नहीं है; कोई बैठा है जरूर, कोई जरूरत नहीं है। नहीं, उन्होंने कहा, आपको शायद पता नहीं, वे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। साधारण आदमी नहीं हैं! लेकिन बड़े विनम्र हैं, कभी मेरे साथ तख्त पर नहीं बैठते, हमेशा छोटे तख्त पर नीचे बैठते हैं।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
Osho, we don’t find analyses of Mahavira’s mental state across the varied adverse circumstances of life. Based on the literature available today, how can his inner state be explained?
प्रश्न: ओशो, जीवन की विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों में महावीर की मानसिक अवस्था का विश्लेषण हमें नहीं मिलता। आज जो साहित्य उपलब्ध है, उसके आधार पर उनकी आंतरिक अवस्था को कैसे समझाया जा सकता है? दुनिया में दो तरह के मन हैं: एक वे, जो फोटोग्राफिक प्लेट की तरह काम करते हैं; और दूसरे वे, जो दर्पण की तरह काम करते हैं। जो फोटोग्राफिक प्लेट की तरह काम करते हैं, उन्हें ही महावीर राग-द्वेष से पीड़ित मन कहते हैं—आसक्ति और विकर्षण से भरे हुए मन। असल में, फोटो-प्लेट राग-द्वेष से भरी होती है: वह जल्दी से पकड़ लेती है और फिर छोड़ती नहीं। राग पकड़ता है, द्वेष भी पकड़ता है—एक मित्र की तरह पकड़ता है, दूसरा शत्रु की तरह; लेकिन दोनों पकड़ते हैं, और मन की दर्पण जैसी शुद्धता खो जाती है। हम सब फोटो-प्लेट की तरह काम करते हैं, इसलिए दुखी हैं। मन भरता चला जाता है, भरता चला जाता है, खाली कभी नहीं होता। हर स्थिति को पकड़ लिया जाता है; शायद ही कोई बात हमारे पास से अछूती गुजरती हो। महावीर जैसा व्यक्ति दर्पण की तरह जीता है। सच तो यह है कि जो समाधि में प्रतिष्ठित हो जाता है, वह दर्पण हो जाता है।
प्रश्न: ओशो, जीवन की भिन्न-भिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों में महावीर की मानसिक स्थिति का विश्लेषण उपलब्ध नहीं होता। आज जो साहित्य उपलब्ध है, उसके आधार पर उनकी अंतरंग स्थिति का स्पष्टीकरण क्या हो सकेगा?
यह बहुत बढ़िया सवाल है। बढ़िया इसलिए है कि हम सबके मन में उठ सकता है कि भिन्न-भिन्न अनुकूल, प्रतिकूल परिस्थितियों में महावीर जैसे व्यक्ति की चित्त-दशा क्या होती है? कोई उल्लेख नहीं है। तो कोई सोच सकता है कि उल्लेख इसलिए नहीं है कि महावीर ने कभी कहा न हो। यह कारण नहीं है। उल्लेख न होने का कारण बहुत दूसरा है और बहुत गहरा, बुनियादी है। महावीर जैसी चेतना के व्यक्ति में परिस्थितियों से कोई भेद नहीं पड़ता। इसलिए भिन्न-भिन्न परिस्थिति कहने का कोई अर्थ नहीं है। भिन्न-भिन्न परिस्थिति में, प्रतिकूल-अनुकूल में चित्त सदा समान है। जैसे कि किसी ने गाली दी, तो हम क्रोधित होते हैं; और किसी ने स्वागत किया तो हम आनंदित होते हैं। प्रत्येक स्थिति में हमारा चित्त रूपांतरित होता है। जैसी स्थिति होती है, वैसा चित्त हो जाता है। इसी को महावीर कहते हैं कि यह बंधन की अवस्था है। स्थिति जैसी होती है, वैसा चित्त को होना पड़ता है तो फिर हम बंधे हुए हैं। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
Beloved Osho, I have heard you say that seeking the truth is as ecstatic as finding it. Does that not eliminate the search?
प्रश्न: प्यारे ओशो, मैंने आपको कहते सुना है कि सत्य की खोज उतनी ही आनंदपूर्ण है जितना उसे पा लेना। क्या इससे खोज समाप्त नहीं हो जाती? इससे मुझे यह साफ-साफ समझ में आता है कि वह अकेला यात्रा करता रहा है, लेकिन अभी भी यात्रा में ही है। और क्योंकि वह दूसरे लोगों के प्रति शिकायतों से इतना भरा हुआ है, उसकी यात्रा आनंद की तीर्थयात्रा नहीं रह गई है; वह एक माइग्रेन बन गई है। चालीस वर्षों से वह माइग्रेन से पीड़ित है। मुझे लगता है कि यह माइग्रेन निश्चित ही उसकी अजीब स्थिति से जुड़ा हुआ है। वह संबुद्ध नहीं है; हजारों लोग सोचते हैं कि वह संबुद्ध है। उसने स्वयं कभी ऐसा नहीं कहा, लेकिन लोगों ने मान लिया, क्योंकि उसने विश्व-गुरु होने को अस्वीकार कर दिया। यह संबोधि का कोई प्रमाण नहीं है; लेकिन यह ईमानदारी और असंबोधि का प्रमाण हो सकता है।
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
Osho, yesterday you said that when anger is watched consciously, it dissolves. But why is it that when sexual desire arises, even in awareness its intensity persists? Why is it so?
प्रश्न: दूसरा प्रश्न: ओशो, कल आपने समझाया कि महावीर ने बड़ी कुशलता और बड़ी अहिंसा से ईश्वर, पूजा, प्रार्थना, प्रेम जैसे शब्दों का निषेध किया। पहले आपने यह भी कहा था कि उन्होंने शरण और भक्ति का भी निषेध किया। कृपया समझाएं: ऐसी स्थिति में, उनका स्वयं तीर्थंकर होना, और शिष्यों को दीक्षा और आशीर्वाद देना—क्या यह उनके अपने ही सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है? कहा जाता है कि उसी क्षण गौतम ज्ञान को उपलब्ध हुए। महावीर ने उनसे क्या कहा? क्या संदेश दिया? “तुम पूरी नदी पार कर आए—संसार छोड़ दिया, धन छोड़ दिया, पत्नी छोड़ दी, घर छोड़ दिया—सब छोड़ दिया, सब तरफ से आसक्ति हटा ली—और अब अपनी सारी आसक्ति मुझ पर इकट्ठी कर ली! तुमने किनारा पकड़ लिया। अब तुम कहते हो, ‘गुरु...’ इसे भी जाने दो। नहीं तो नदी तो पार कर ली, लेकिन किनारा पकड़े अटके हो—बाहर कैसे निकलोगे? अगर सब छोड़ दिया है, तो सब छोड़ दो—इस अपवाद को भी मत बचाओ।”
दूसरा प्रश्न: ओशो, आपने कल कहा कि क्रोध को होशपूर्वक देखने पर क्रोध विलीन हो जाता है। लेकिन क्या कारण है कि कामवासना के उठने पर होश में भी उसकी प्रगाढ़ता बनी रहती है। ऐसा क्यों है?
श्वास में कुछ झंझट नहीं है। अब तुम या तो क्रोध पर साधोगे...। क्रोध रोज तो होता नहीं, प्रतिपल होता नहीं, कभी-कभी होता है; जब होता है तब इतनी प्रगाढ़ता से होता है कि तुम गहरे में उतर रहे हो; जब होता है तब इतनी बातें दांव पर लग जाती हैं कि शायद तुम सोचोगे, ‘फिर देख लेंगे होश इत्यादि! यह अभी, अभी तो निपट लें।’ कामवासना तो बहुत गहरी है, क्योंकि प्रकृति ने उसे बहुत गहरा बनाया है, क्योंकि जीवन उस पर निर्भर है। अगर कामवासना इतनी आसान हो कि तुमने चाहा और छूट गए, तो तुम शायद पैदा ही न होते, क्योंकि तुमसे पहले बहुत लोग छूट चुके होते; तुम्हारे होने की संभावना न के बराबर होती। मगर वह तो तुम्हारे माता-पिता उनके माता-पिता नहीं छूट सके, इसलिए तुम हो। तुम भी इतनी आसानी से न छूट जाओगे, क्योंकि तुम्हारे बच्चों को भी होना है; वे भी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि ऐसे भाग मत जाना बीच से। जीवन बहुत कुछ टिका है कामवासना पर। इसलिए उसका छूटना इतना आसान नहीं है। असंभव नहीं है, आसान भी नहीं है। …
यह अंश ओशो के अंग्रेज़ी प्रवचन का मशीनी हिंदी अनुवाद है, ओशो के अपने हिंदी शब्द नहीं।
महावीर पर ओशो की दृष्टि
'महावीर: मेरी दृष्टि में' और 'महावीर-वाणी' से चुने हुए सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
अनुयायी नहीं, प्रेमी
'महावीर: मेरी दृष्टि में' का पहला ही वाक्य ओशो की पूरी दृष्टि खोल देता है — बंधन अनुयायी का होता है, प्रेमी मुक्त रहता है, और मुक्त ही समझ सकता है।
मैं महावीर का अनुयायी तो नहीं हूं, प्रेमी हूं। वैसे ही जैसे क्राइस्ट का, कृष्ण का, बुद्ध का या लाओत्से का। और मेरी दृष्टि में अनुयायी कभी भी नहीं समझ पाता है।महावीर: मेरी दृष्टि में, प्रवचन 1, Para 1 →
मिट्टी का दीया, प्रकट हुई ज्योति
वर्धमान नाम का व्यक्ति, जन्म और मृत्यु की तिथियां — ओशो के लिए यह सब गौण है। प्रेम उस ज्योति से है जो इस दीये में जली, और हजार-हजार दीयों में जलती रही है।
महावीर को थोड़े ही प्रेम करते हैं। वह जो शरीर है वर्धमान का, वह जो जन्मतिथियों में बंधी हुई एक इतिहास रेखा है, एक दिन पैदा होना और एक दिन मर जाना, इसे तो प्रेम नहीं करते हैं। प्रेम करते हैं उस ज्योति को जो इस मिट्टी के दीये में प्रकट हुई। यह दीया कौन था, यह बहुत अर्थ की बात नहीं। बहुत-बहुत दीयों में वह ज्योति प्रकट हुई है।महावीर: मेरी दृष्टि में, प्रवचन 1, Para 1 →
अरिहंत: जिसके भीतर के शत्रु विनष्ट हुए
नमोकार मंत्र की व्याख्या करते हुए ओशो अरिहंत का अर्थ खोलते हैं — वह जिसके भीतर अब लड़ने को कुछ बचा ही नहीं: न क्रोध, न काम, न लोभ, न अहंकार।
पांच नमस्कार हैं। अरिहंत को नमस्कार। अरिहंत का अर्थ होता है: जिसके सारे शत्रु विनष्ट हो गए; जिसके भीतर अब कुछ ऐसा नहीं रहा, जिससे उसे लड़ना पड़ेगा। लड़ाई समाप्त हो गई। भीतर अब क्रोध नहीं, जिससे लड़ना पड़े; भीतर अब काम नहीं, जिससे लड़ना पड़े; भीतर अब लोभ नहीं, जिससे लड़ना पड़े; अहंकार नहीं, जिससे लड़ना पड़े; अज्ञान नहीं है। वे सब समाप्त हो गए जिनसे लड़ाई थी।महावीर-वाणी, प्रवचन 1, Para 1 →
महावीर का संयम: दमन नहीं, ऊर्जा की प्रतिष्ठा
महावीर को ओशो दमन के विरुद्ध पढ़ते हैं — महावीर वृत्तियों से लड़कर नहीं जीते; उनकी अपनी ऊर्जा में ऐसी प्रतिष्ठा है कि वृत्तियां सिर ही नहीं उठा पातीं।
महावीर अपनी कामवासना पर वश पाकर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं होते। ब्रह्मचर्य की इतनी ऊर्जा है कि कामवासना सिर नहीं उठा पाती। यह विधायक अर्थ है। महावीर अपनी हिंसा से लड़ कर अहिंसक नहीं बनते। अहिंसक हैं, इसलिए हिंसा सिर नहीं उठा पाती। महावीर अपने क्रोध से लड़ कर क्षमा नहीं करते। क्षमा की इतनी शक्ति है कि क्रोध को उठने का अवसर कहां! महावीर के लिए अर्थ है: स्वयं की शक्ति से परिचित हो जाना संयम है।महावीर-वाणी, प्रवचन 6, Question 1 →
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अनुयायी की तरह नहीं, प्रेमी की तरह। ओशो के अनुसार अनुयायी शर्त से बंधा है, इसलिए कभी समझ नहीं पाता — जैन महावीर को नहीं समझ सकता, बौद्ध बुद्ध को नहीं। महावीर उनके लिए मिट्टी का दीया हैं जिसमें ज्योति प्रकट हुई; करने योग्य पूजा नहीं, उस ज्योति का स्मरण है — जो हमारे भीतर भी जल सकती है।
ओशो महावीर की अहिंसा को दमन या अभ्यास नहीं मानते — वह अभय और आत्म-अनुभव से फलित अवस्था है। महावीर हिंसा से लड़कर अहिंसक नहीं बने; अहिंसक हैं, इसलिए हिंसा सिर नहीं उठा पाती। जिसने जान लिया कि भीतर कोई मरता ही नहीं, उससे हिंसा असंभव हो जाती है।
नहीं — ओशो कहते हैं कि कौन बड़ा, कौन छोटा, यह साधारण गणित की दुनिया है, और असाधारण लोग उस गणना के बाहर हैं। महावीर, बुद्ध, कृष्ण, क्राइस्ट — सब में एक ही ज्योति प्रकट हुई; दीये अलग-अलग हैं, ज्योति एक है। तुलना करना ही उस ज्योति से चूक जाना है।