कृष्ण पर ओशो ने जितने प्रेम से बोला है, उतना शायद ही किसी और पर। 'कृष्ण स्मृति' में वे कहते हैं कि कृष्ण हुए तो अतीत में हैं, लेकिन हैं भविष्य के — मनुष्य अभी इस योग्य ही नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। कृष्ण अकेले हैं जो जीवन को समग्रता से स्वीकार करते हैं — राग भी, योग भी; बांसुरी भी, युद्ध भी। इसीलिए इस देश ने उन्हें पूर्ण अवतार कहा।
और 'गीता दर्शन' में ओशो गीता के हृदय तक ले चलते हैं — अर्जुन के विषाद से समर्पण तक की यात्रा। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए सूत्र दिए गए हैं, हर सूत्र के साथ मूल अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
कृष्ण पर ओशो की दृष्टि
कृष्ण स्मृति और गीता दर्शन से चुने हुए सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
कृष्ण: भविष्य का व्यक्तित्व
'कृष्ण स्मृति' का आरंभ ही इस उदघोषणा से होता है — कृष्ण को समझने की योग्यता मनुष्य में अभी आई ही नहीं; वह भविष्य में ही संभव होगी।
कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में हैं, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ के बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं।कृष्ण स्मृति, प्रवचन 1 →
आनंद के संन्यासी
अतीत के व्याख्याकार दुख से भरे संन्यासी थे, इसलिए कृष्ण के साथ अन्याय होता रहा — ओशो कृष्ण को चुनते ही इसलिए हैं कि वे आनंद के संन्यास की संभावना हैं।
कृष्ण मेरे लिए आनंद के संन्यासी हैं। आनंद के संन्यास की संभावना के कारण जान कर ही मैंने चुना कि उन पर बात करूं। ऐसा नहीं है कि कृष्ण पर बातें नहीं की गईं। लेकिन कृष्ण पर जिन्होंने बातें की हैं वे भी दुख से भरे हुए संन्यासी थे। इसलिए कृष्ण की आज तक की व्याख्या कृष्ण के साथ अन्याय करती रही है।कृष्ण स्मृति, प्रवचन 2 →
बांसुरी: ध्यान से उठा हुआ स्वर
कृष्ण की बांसुरी को ओशो प्रार्थना नहीं मानते — प्रार्थना द्वैत है, कोई मांगने वाला और कोई देने वाला। कृष्ण के स्वर अद्वैत से, ध्यान से उठे हुए हैं।
तो कृष्ण की बांसुरी प्रार्थना का उठा हुआ गीत नहीं, ध्यान से उठा हुआ स्वर है। यह किसी परमात्मा से की गई प्रार्थना नहीं, यह स्वयं को दिया गया धन्यवाद है।कृष्ण स्मृति, प्रवचन 8 →
गीता का सूत्र: अपने को अज्ञात के हाथों छोड़ देना
गीता दर्शन में ओशो पूरी गीता का सार एक सूत्र में समेट देते हैं — कृष्ण अर्जुन से कर्म छोड़ने को नहीं, कर्ता छोड़ने को कह रहे हैं: साक्षीवत लड़ तो कोई जिम्मेवारी नहीं।
कृष्ण पूरी गीता में आगे अर्जुन को यही समझाते हैं कि वह अपने को छोड़ दे अज्ञात के हाथों में; समर्पित कर दे। क्योंकि वह जिन्हें सोच रहा है कि ये मर जाएंगे, वे अज्ञात के द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। कि वह जिन्हें सोचता है कि इनकी मृत्यु के लिए मैं जिम्मेवार हो जाऊंगा, उनके लिए वह बिलकुल भी जिम्मेवार नहीं होगा। अगर वह अपने को बचाता है, तो जिम्मेवार हो जाएगा। अगर अपने को छोड़कर साधनवत, साक्षीवत लड़ सकता है, तो उसकी कोई जिम्मेवारी नहीं रह जाती है।गीता दर्शन (खंड 1-2), प्रवचन 1 →
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्योंकि कृष्ण अकेले हैं जो समग्र जीवन को पूरा स्वीकार करते हैं — राग और योग, प्रेम और युद्ध, बांसुरी और सुदर्शन, सब एक साथ। राम और अन्य अवतार ओशो की दृष्टि में आंशिक हैं, एक ही दिशा के; कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है, इसलिए वे पूर्ण अवतार कहलाए।
समर्पण — अपने को अज्ञात के हाथों में छोड़ देना। कृष्ण अर्जुन से युद्ध छोड़ने या पकड़ने को नहीं, कर्ता-भाव छोड़ने को कहते हैं। जो साधनवत, साक्षीवत कर्म करता है, उस पर कर्म का बंधन नहीं। ओशो के अनुसार यही निष्काम कर्म का अर्थ है — कर्म पूरा, कर्ता शून्य।
ओशो कहते हैं — न शांतिवादी, न युद्धवादी; कृष्ण अ-वादी हैं। उनकी कसौटी कोई वाद नहीं, जीवन का मंगल है: शांति से शुभ फलित हो तो शांति का स्वागत, युद्ध से शुभ फलित हो तो युद्ध का। शुभ को भी खड़े होने की, तलवार उठाने की हिम्मत चाहिए — ताकि अशुभ जीत न जाए।