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ओशो: गांधी पर ओशो की दृष्टि

ओशो: गांधी पर ओशो की दृष्टि

मेरा गांधी से बहुत प्रेम है — और प्रेम है इसीलिए खुली, सीधी बात। गांधी की आलोचना और सम्मान, ओशो के अपने शब्दों में।

गांधी पर ओशो का स्वर अनूठा है — न अंधभक्ति, न शत्रुता। वे साफ कहते हैं: मेरा गांधी से बहुत प्रेम है, और प्रेम है इसीलिए खुली-सीधी बात कर लेता हूं। उनकी आलोचना गांधी की नहीं, उस खूंटी की है जिससे लोग बंध जाते हैं — गांधी हां, गांधीवाद नहीं; क्योंकि हर वाद ओशो के लिए गुलामी का लक्षण है।

और गांधी की अहिंसा को वे महावीर की अहिंसा के आमने-सामने रखकर एक गहरा भेद खोलते हैं — गांधी के कृत्य में अहिंसा है, महावीर के होने में; और होना भीतर है, कृत्य बाहर। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं।

शिक्षा का सार

गांधी पर ओशो की दृष्टि

उनके हिंदी प्रवचनों में गांधी पर कहे गए सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।

प्रेम है, इसलिए खुली बात

गांधी की तीखी आलोचना के कारण लोग ओशो को गांधी का शत्रु समझ बैठे। ओशो का उत्तर सीधा है — शत्रुता का सवाल ही नहीं; अपनों के बाबत ही तो खुली और सीधी बात की जा सकती है।

मेरा गांधी से बहुत प्रेम है, शत्रुता का तो कोई सवाल ही नहीं है। तो मित्र पूछते हैं कि आप उनके शत्रु हैं? शत्रु तो मैं किसी का भी नहीं हूं, शत्रु तो होने में असमर्थ हूं। और शत्रु नहीं हो सकता हूं इसलिए खुली-सीधी बात कर लेता हूं जो मुझे ठीक लगती है। कम से कम अपनों के बाबत तो खुली और सीधी बात की जा सकती है।
तृषा गई एक बूंद से, प्रवचन 4 →

विरोध गांधी का नहीं, खूंटी का

ओशो की आलोचना का प्रयोजन प्रतिमा गिराना नहीं — बंधे हुए को छुड़ाना है। जिस खूंटी से आदमी बंधा है, वे उसी को हिलाते हैं, चाहे वह खूंटी गांधी की हो, मार्क्स की हो या उनकी अपनी।

महापुरुषों का मैं विरोधी नहीं हूं। मैं तो गोडसे तक का विरोधी नहीं हूं, तो गांधी का विरोधी कैसे हो सकता हूं? लेकिन जब मैं विरोध करता हूं किसी महापुरुष का, तो महापुरुष का विरोध नहीं कर रहा हूं, वह जो आपकी खूंटी है, जिससे आप बंधे हैं, उसको हिलाने की कोशिश कर रहा हूं, आप छूट जाएं इसलिए।
तृषा गई एक बूंद से, प्रवचन 4 →

गांधी की अहिंसा, महावीर की अहिंसा

ओशो का सबसे गहरा गांधी-विश्लेषण यह भेद है — अहिंसा आचरण में साधी गई है या भीतर घटी है? गांधी साधते हैं, महावीर में घटा है।

इसको थोड़ा समझ लें। महावीर के जीवन को अगर हम गौर से देखें तो इतना ही कह सकते हैं कि उन्होंने हिंसा नहीं की। गांधी ने अहिंसा की। गांधी के कृत्य में अहिंसा है। महावीर के होने में अहिंसा है। और होना भीतर है, कृत्य बाहर है।
सबै सयाने एक मत, प्रवचन 10 →

राजनैतिक व्यक्ति, धार्मिक होने की चेष्टा

गांधी की अपनी ईमानदार स्वीकारोक्ति को ओशो बार-बार उद्धृत करते हैं — लुई फिशर की बात को उलटकर गांधी ने स्वयं अपनी सबसे सच्ची परिभाषा दे दी थी।

नैतिक, निष्ठावान, ईमानदार आदमी हैं। लुई फिशर ने गांधी के संबंध में एक लेख लिखा। और उसमें लिखा कि गांधी एक धार्मिक पुरुष हैं, जिन्होंने पूरे जीवन राजनैतिक होने की चेष्टा की है। गांधी ने तत्क्षण जवाब दिया कि यह बात उलटी है। मैं एक राजनैतिक व्यक्ति हूं, जिसने जीवन भर धार्मिक होने की चेष्टा की है।
सबै सयाने एक मत, प्रवचन 10 →
संक्षिप्त उत्तर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या ओशो गांधी के विरोधी थे?

नहीं — ओशो स्वयं कहते हैं कि मेरा गांधी से बहुत प्रेम है, शत्रुता का सवाल ही नहीं। उनकी आलोचना का लक्ष्य गांधी नहीं, गांधी की खूंटी से बंधे अनुयायी थे — वे हर वाद को, गांधीवाद समेत, चित्त की गुलामी मानते थे। उनके शब्दों में, समझदार जानते हैं कि मैंने गांधी के काम को ही आगे बढ़ाया है।

ओशो गांधी की अहिंसा को कैसे देखते हैं?

ओशो गांधी की अहिंसा को नीति और राजनीति की कुशलता मानते हैं, धर्म की घटना नहीं — गांधी के कृत्य में अहिंसा है, महावीर के होने में। आचरण में साधी गई अहिंसा डगमगा जाती है, जबकि भीतर घटी अहिंसा से हिंसा असंभव हो जाती है। यही उनके गांधी-विश्लेषण की धुरी है।

ओशो गांधीवाद का विरोध क्यों करते हैं?

क्योंकि ओशो के लिए हर वाद गुलामी का लक्षण है — आदमी वाद में बंधा कि उसके चित्त की स्वतंत्रता समाप्त हुई। या तो आप सत्य के हो सकते हैं या मत के। इसलिए वे कहते हैं कि जैन होने से बचकर गांधीवादी हो जाना सिर्फ जंजीर का नाम बदलना है; मुक्त चित्त ही उनकी एकमात्र कसौटी है।