समाधि को ओशो समझाने से पहले ही चेता देते हैं — यह उन थोड़ी सी बातों में से है जिन्हें समझ लेना काफी नहीं; उनसे होकर गुजरना पड़ता है। समाधि है अहंकार की बूंद का सागर में खो जाना — जीते जी मरने की कला। इसीलिए वे कहते हैं कि जो भीतर से मरने को राजी है, उसी के जीवन में समाधि का क्षण आता है।
और कबीर के 'साधो सहज समाधि भली' पर बोलते हुए ओशो साधना की अंतिम छलांग भी दिखा देते हैं — एक घड़ी आती है जब साधना भी छूट जाती है, बस होना भर रह जाता है; उसी घड़ी निर्विकल्प समाधि उतरती है। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए सूत्र दिए गए हैं।
समाधि पर ओशो की दृष्टि
उनके हिंदी प्रवचनों में बार-बार लौटने वाले सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
समाधि ही धर्म का मूल आधार
प्रार्थना, जप-तप, मंत्र-तंत्र — ओशो की चोट तीखी है: ये सब समाधि से बचने की ईजादें हैं, जबकि धर्म का असली आधार समाधि ही है।
हमारी व्यवस्था मौत से बचने की हमें ध्यान के करीब नहीं पहुंचने देती, समाधि के करीब नहीं पहुंचने देती। इसलिए हमने ध्यान और समाधि से बचने के लिए दूसरी धार्मिक क्रियाएं ईजाद की हैं। जब कि समाधि ही धर्म का मूल आधार है, बाकी सब क्रियाएं धोखा हैं।समाधि के द्वार पर, प्रवचन 1 →
बूंद का सागर में खो जाना
समाधि की परिभाषा ओशो शब्दों से नहीं, प्रतीक से देते हैं — भीतर से गिर जाना, बिखर जाना, जैसे बूंद सागर में खोती है और बीज मिट्टी में टूटता है।
नहीं; हमारी ही आंख बंद हो और हम ही गिर जाएं किसी क्षण में, न केवल बाहर से बल्कि भीतर से भी गिर जाएं और बिखर जाएं, जैसे कोई बूंद किसी सागर में खो जाए, या जैसे कोई बीज किसी मिट्टी में टूट जाए, ऐसा हमारे भीतर ही घटित हो तो ही हम पहचान पाएं कि समाधि क्या है।समाधि के द्वार पर, प्रवचन 1 →
समाधि में बिलकुल अकेले जाना होता है
जो अकेलेपन से भागता है — रेडियो, अखबार, भीड़ में — वह समाधि से भी भागता है। ओशो के अनुसार समाधि के द्वार पर कोई संगी-साथी प्रवेश नहीं पा सकता।
लेकिन जो अकेले होने को राजी नहीं, टोटली अलोन, वह समाधि में नहीं जा सकता। क्योंकि समाधि में कौन साथ देगा? पत्नी कैसे समाधि में साथ देगी? बेटा कैसे साथ जाएगा? पति कैसे साथ जाएगा? गुरु कैसे साथ जाएगा? दोस्त कैसे साथ जाएगा? समाधि में तो कोई भी नहीं जाएगा। समाधि में तो बिलकुल अकेले जाना होगा।समाधि के द्वार पर, प्रवचन 2 →
साधो सहज समाधि भली
कबीर की वाणी पर बोलते हुए ओशो समाधि का अंतिम विरोधाभास खोलते हैं: साधने से केवल छाया बनती है — जिस घड़ी साधना भी छूट जाती है, उसी घड़ी असली घटना घटती है।
इसलिए साध-साध कर तुम जो ले आओगे, वह सिर्फ छाया है। जिस दिन तुम साधना भी छोड़ दोगे, उसी दिन सिद्ध होने की घटना घटती है। जिस दिन तुम ध्यान भी छोड़ देते हो... करते हो, करते हो, करते हो--कर-कर के छाया निर्मित होती है, कुछ और निर्मित नहीं होता--तुम छोड़ देते हो। साधते हो, साधते हो, साधते-साधते थक जाते हो, उसे भी छोड़ देते हो। एक ऐसी घड़ी आती है, जब तुम कुछ भी नहीं करते हो। बस, होते हो। उसी घड़ी निर्विकल्प समाधि उतरती है।सहज समाधि भली, प्रवचन 12 →
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समाधि चेतना की वह अवस्था है जहां अहंकार की बूंद अस्तित्व के सागर में खो जाती है — जीते जी मृत्यु का अनुभव, जिसके बाद व्यक्ति वही नहीं लौटता जो गया था। ओशो के अनुसार समाधि कोई अनुभव नहीं जो 'मुझे' हो; वहां 'मैं' ही नहीं बचता, इसीलिए उसे समझा नहीं, केवल जीया जा सकता है।
ओशो के लिए ध्यान मार्ग है और समाधि मंजिल। ध्यान चित्त को निर्विचार करने की प्रक्रिया है; जब निर्विचारता इतनी सघन हो जाती है कि साधने वाला भी विसर्जित हो जाता है, तो जो शेष रहता है वही समाधि है। इसीलिए वे कहते हैं — ध्यान और समाधि स्वेच्छा से मृत्यु के अनुभव में प्रवेश है।
कबीर के सूत्र 'साधो सहज समाधि भली' की व्याख्या में ओशो कहते हैं — सहज समाधि वह है जो अभ्यास से नहीं, बोध की परिपक्वता से फलित होती है, जैसे पका फल अपने से गिरता है। उठना-बैठना, खाना-पीना ही पूजा बन जाए, चलना-फिरना ही परिक्रमा — जीवन ही साधना हो जाए, यही सहज समाधि है।