महावीर पर ओशो की दृष्टि किसी अनुयायी की नहीं, प्रेमी की दृष्टि है — और वे कहते हैं कि अनुयायी कभी समझ ही नहीं पाता। जैन महावीर को कभी नहीं समझ सकता, क्योंकि उसकी शर्त बंधी है; प्रेम बेशर्त है, और समझ प्रेम से ही आती है। महावीर उनके लिए एक मिट्टी का दीया हैं जिसमें ज्योति प्रकट हुई — पूजा दीये की नहीं करनी, स्मरण ज्योति का करना है, जो हमारे दीये में भी जल सकती है।
'महावीर-वाणी' में ओशो नमोकार मंत्र से लेकर संयम और अभय तक महावीर की देशना को नये अर्थ देते हैं — त्याग और दमन की जगह ऊर्जा की प्रतिष्ठा। नीचे उनके हिंदी प्रवचनों से चुने हुए अंश दिए गए हैं।
महावीर पर ओशो की दृष्टि
'महावीर: मेरी दृष्टि में' और 'महावीर-वाणी' से चुने हुए सूत्र — हर सूत्र के साथ मूल प्रवचन का अंश और पूरे प्रवचन की कड़ी।
अनुयायी नहीं, प्रेमी
'महावीर: मेरी दृष्टि में' का पहला ही वाक्य ओशो की पूरी दृष्टि खोल देता है — बंधन अनुयायी का होता है, प्रेमी मुक्त रहता है, और मुक्त ही समझ सकता है।
मैं महावीर का अनुयायी तो नहीं हूं, प्रेमी हूं। वैसे ही जैसे क्राइस्ट का, कृष्ण का, बुद्ध का या लाओत्से का। और मेरी दृष्टि में अनुयायी कभी भी नहीं समझ पाता है।महावीर: मेरी दृष्टि में, प्रवचन 1 →
मिट्टी का दीया, प्रकट हुई ज्योति
वर्धमान नाम का व्यक्ति, जन्म और मृत्यु की तिथियां — ओशो के लिए यह सब गौण है। प्रेम उस ज्योति से है जो इस दीये में जली, और हजार-हजार दीयों में जलती रही है।
महावीर को थोड़े ही प्रेम करते हैं। वह जो शरीर है वर्धमान का, वह जो जन्मतिथियों में बंधी हुई एक इतिहास रेखा है, एक दिन पैदा होना और एक दिन मर जाना, इसे तो प्रेम नहीं करते हैं। प्रेम करते हैं उस ज्योति को जो इस मिट्टी के दीये में प्रकट हुई। यह दीया कौन था, यह बहुत अर्थ की बात नहीं। बहुत-बहुत दीयों में वह ज्योति प्रकट हुई है।महावीर: मेरी दृष्टि में, प्रवचन 1 →
अरिहंत: जिसके भीतर के शत्रु विनष्ट हुए
नमोकार मंत्र की व्याख्या करते हुए ओशो अरिहंत का अर्थ खोलते हैं — वह जिसके भीतर अब लड़ने को कुछ बचा ही नहीं: न क्रोध, न काम, न लोभ, न अहंकार।
पांच नमस्कार हैं। अरिहंत को नमस्कार। अरिहंत का अर्थ होता है: जिसके सारे शत्रु विनष्ट हो गए; जिसके भीतर अब कुछ ऐसा नहीं रहा, जिससे उसे लड़ना पड़ेगा। लड़ाई समाप्त हो गई। भीतर अब क्रोध नहीं, जिससे लड़ना पड़े; भीतर अब काम नहीं, जिससे लड़ना पड़े; भीतर अब लोभ नहीं, जिससे लड़ना पड़े; अहंकार नहीं, जिससे लड़ना पड़े; अज्ञान नहीं है। वे सब समाप्त हो गए जिनसे लड़ाई थी।महावीर-वाणी, प्रवचन 1 →
महावीर का संयम: दमन नहीं, ऊर्जा की प्रतिष्ठा
महावीर को ओशो दमन के विरुद्ध पढ़ते हैं — महावीर वृत्तियों से लड़कर नहीं जीते; उनकी अपनी ऊर्जा में ऐसी प्रतिष्ठा है कि वृत्तियां सिर ही नहीं उठा पातीं।
महावीर अपनी कामवासना पर वश पाकर ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं होते। ब्रह्मचर्य की इतनी ऊर्जा है कि कामवासना सिर नहीं उठा पाती। यह विधायक अर्थ है। महावीर अपनी हिंसा से लड़ कर अहिंसक नहीं बनते। अहिंसक हैं, इसलिए हिंसा सिर नहीं उठा पाती। महावीर अपने क्रोध से लड़ कर क्षमा नहीं करते। क्षमा की इतनी शक्ति है कि क्रोध को उठने का अवसर कहां! महावीर के लिए अर्थ है: स्वयं की शक्ति से परिचित हो जाना संयम है।महावीर-वाणी, प्रवचन 6 →
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अनुयायी की तरह नहीं, प्रेमी की तरह। ओशो के अनुसार अनुयायी शर्त से बंधा है, इसलिए कभी समझ नहीं पाता — जैन महावीर को नहीं समझ सकता, बौद्ध बुद्ध को नहीं। महावीर उनके लिए मिट्टी का दीया हैं जिसमें ज्योति प्रकट हुई; करने योग्य पूजा नहीं, उस ज्योति का स्मरण है — जो हमारे भीतर भी जल सकती है।
ओशो महावीर की अहिंसा को दमन या अभ्यास नहीं मानते — वह अभय और आत्म-अनुभव से फलित अवस्था है। महावीर हिंसा से लड़कर अहिंसक नहीं बने; अहिंसक हैं, इसलिए हिंसा सिर नहीं उठा पाती। जिसने जान लिया कि भीतर कोई मरता ही नहीं, उससे हिंसा असंभव हो जाती है।
नहीं — ओशो कहते हैं कि कौन बड़ा, कौन छोटा, यह साधारण गणित की दुनिया है, और असाधारण लोग उस गणना के बाहर हैं। महावीर, बुद्ध, कृष्ण, क्राइस्ट — सब में एक ही ज्योति प्रकट हुई; दीये अलग-अलग हैं, ज्योति एक है। तुलना करना ही उस ज्योति से चूक जाना है।