Ask Osho!

Geeta Darshan #4

Source Verified: Direct from the Osho Library Archives
Read this discourse in:
More languages:
Checking…

Questions in this Discourse

एक मित्र ने पूछा है कि ओशो, आपने कहा कि गीता चार व्यक्तियों के संयोग के कारण हमें उपलब्ध हो सकी है--कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र। लेकिन गीता श्रीमद्भागवत का एक अंश है और श्रीमद्भागवत को महर्षि व्यास ने लिखा है। इसलिए महर्षि व्यास या संजय, कौन उसका मूल स्रोत है?
इस संबंध में कुछ बातें विचारणीय हैं।
एक तो जो लोग श्रीमद्भागवत को या गीता को केवल साहित्य मानते हैं, लिटरेचर मानते हैं, ऐतिहासिक घटनाएं नहीं; जो ऐसा नहीं मानते कि कृष्ण और अर्जुन के बीच जो घटना घटी है, वह वस्तुतः घटी है; जो ऐसा भी नहीं मानते कि संजय ने किसी वास्तविक घटना की खबर दी है या कि धृतराष्ट्र कोई वास्तविक व्यक्ति हैं; बल्कि जो मानते हैं कि वे चारों, व्यास ने जो महासाहित्य लिखा है, उसके चार पात्र हैं।
जो ऐसा मानते हैं, उनके लिए तो व्यास की प्रतिभा मौलिक हो जाती है, मूल आधार हो जाती है और शेष सब पात्र हो जाते हैं। तब तो सारा व्यास की ही प्रतिभा का खेल है। जैसे सार्त्र के उपन्यास में उसके पात्र हों या दोस्तोवस्की की कथाओं में उसके पात्र हों, ठीक वैसे ही इस महाकाव्य में भी सब पात्र हैं और व्यास की प्रतिभा से जन्मे हैं।
ऐसा भारतीय परंपरा का मानना नहीं है। और न ही जो धर्म को समझते हैं, वे ऐसा मानने को तैयार हो सकते हैं। तब स्थिति बिलकुल उलटी हो जाती है। तब व्यास केवल लिपिबद्ध करने वाले रह जाते हैं। तब घटना तो कृष्ण और अर्जुन के बीच घटती है। उस घटना को पकड़ने वाला संजय है। वह पकड़ने की घटना संजय और धृतराष्ट्र के बीच घटती है। लेकिन उसे लिपिबद्ध करने का काम हमारे और व्यास के बीच घटित होता है। वह तीसरा तल है। जो हुआ है, उसे संजय ने कहा है। जो संजय ने कहा है धृतराष्ट्र को, उसे व्यास ने संगृहीत किया है, उसे लिपिबद्ध किया है।
अगर साहित्य है केवल, तब तो व्यास निर्माता हैं; और कृष्ण, अर्जुन, संजय, धृतराष्ट्र, सब उनके हाथ के खिलौने हैं। अगर यह वास्तविक घटना है, अगर यह इतिहास है, न केवल बाहर की आंखों से देखे जाने वाला, बल्कि भीतर घटित होने वाला भी, तब व्यास केवल लिपिबद्ध करने वाले रह जाते हैं। वे केवल लेखक हैं। और पुराने अर्थों में लेखक का इतना ही अर्थ था; वह लिपिबद्ध कर रहा है।
हमारे और व्यास के बीच गहरा संबंध है। क्योंकि संजय ने जो कहा है, वह धृतराष्ट्र से कहा है। अगर बात कही हुई ही होती, तो खो गई होती। हमारे लिए संगृहीत व्यास ने किया। हमारे तो निकटतम व्यास हैं। लेकिन मूल घटना कृष्ण और अर्जुन के बीच घटी; और मूल घटना को शब्दों में पकड़ने का काम संजय और धृतराष्ट्र के बीच हुआ है। हमारे और व्यास के बीच भी कुछ घट रहा है--उन शब्दों को संगृहीत करने का।
और इसीलिए व्यास के नाम से बहुत-से ग्रंथ हैं। और जो लोग पाश्चात्य शोध के नियमों को मानकर चलते हैं, उन्हें बड़ी कठिनाई होती है कि एक ही व्यक्ति ने, एक ही व्यास ने इतने ग्रंथ कैसे लिखे होंगे!