Upasana Ke Kshan #9
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Questions in this Discourse
प्रश्न:
जिसको राम समझा हुआ था।
हां, जिसको राम समझा हुआ था। ...वह हाथ, वह पैर, वह आंख, वह श्र्वास, वह सौंदर्य, वह सब जा रहा है। वह धन, पैसा, वह व्यक्तित्व, वह इज्जत, आदर, वह सब जा रहा है। फिर वह मरते वक्त कह सकता है कि राम मर रहे हैं और हम देख रहे, जैसा तुम देख रही हो। क्योंकि तुम इधर बाहर से देख रही हो राम को, वह उधर भीतर से देख रहा है राम को--और राम बीच में बना हुआ एक आइ, एक एनटाइटी है। वह एक बीच में बनी एनटाइटी है। वह है। और उसे पूरे साक्षीभाव से देखने पर--वह जितना फासले पर तुमसे है, उतने ही फासले पर मुझसे है।
जिसको राम समझा हुआ था।
हां, जिसको राम समझा हुआ था। ...वह हाथ, वह पैर, वह आंख, वह श्र्वास, वह सौंदर्य, वह सब जा रहा है। वह धन, पैसा, वह व्यक्तित्व, वह इज्जत, आदर, वह सब जा रहा है। फिर वह मरते वक्त कह सकता है कि राम मर रहे हैं और हम देख रहे, जैसा तुम देख रही हो। क्योंकि तुम इधर बाहर से देख रही हो राम को, वह उधर भीतर से देख रहा है राम को--और राम बीच में बना हुआ एक आइ, एक एनटाइटी है। वह एक बीच में बनी एनटाइटी है। वह है। और उसे पूरे साक्षीभाव से देखने पर--वह जितना फासले पर तुमसे है, उतने ही फासले पर मुझसे है।
हम दोनों के बीच में एक व्यक्तित्व भी खड़ा हुआ है। तेरा भी खड़ा हुआ है। तो जब दो व्यक्ति मिलते हैं, तो चार मिलते हैं, दो नहीं।
प्रश्न:
दो सब्जेक्टिव हैं और दो ऑब्जेक्टिव हैं।
दो सब्जेक्टिव हैं और दो ऑब्जेक्टिव हैं।
हां, वे दो तो हैं, और दो दोनों के रूप हैं, जो खड़े हैं बीच में। और अक्सर मुलाकात उन दोनों में ही होती रहती है। इन दोनों को तो पता भी नहीं चलता, ये अलग ही रह जाते हैं। और इसलिए अक्सर मुलाकात हो नहीं पाती। क्योंकि जब ये दो हटें बीच से, तभी वे जो रियल ऑथेंटिक परसंस हैं उनका मिलना हो। वह नहीं हो पाता।
तू मुझसे मिलने आई, तो एक ‘पुष्पा’ की तेरी भी एक धारणा है कि पुष्पा को कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे बात करना है। वह उसी धारणा से तू चलेगी। तो एक धारणा की पुष्पा बीच में खड़ी रहेगी निरंतर और मेरे व्यक्तित्व की जो इमेज है, उन दोनों में बातचीत होगी। और हम दोनों कभी बात नहीं कर पाएंगे। वह तो हम तभी कर सकते हैं जब दोनों की इमेज हट जाएं, दोनों साक्षी हों, दोनों इमेज को एक तरफ हटा सकें, तब व्यक्तियों का मिलना हो।
और प्रेम में इसीलिए इतना सुख आता है क्योंकि प्रेम के किसी क्षण में इमेज हट जाती है और सीधे व्यक्ति आमने-सामने एनकाउंटर में पड़ जाते हैं। और कोई मतलब नहीं है उसका। क्योंकि जिससे हम प्रेम करते हैं उसके लिए हम सब आवरण हटा देते हैं। ये वस्त्र जो हम पहने हुए हैं, ये ही आवरण नहीं हैं। व्यक्तित्व के भी वस्त्र पहने हुए हैं। इसलिए प्रेम में हम नग्न हो जाते हैं, हम कोई आवरण नहीं रखते, हम जैसे हैं वैसे हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि हमें प्रेम करता है वह वैसा ही स्वीकार कर लेगा जैसे हम हैं। जो हमें प्रेम नहीं करता, उससे हमें डर है कि हमें वैसा ही स्वीकार करेगा जैसे हम हैं? न, वह हमें जैसा स्वीकार करे, वैसे बन कर हम जाते हैं।
तू मुझसे मिलने आई, तो एक ‘पुष्पा’ की तेरी भी एक धारणा है कि पुष्पा को कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे बात करना है। वह उसी धारणा से तू चलेगी। तो एक धारणा की पुष्पा बीच में खड़ी रहेगी निरंतर और मेरे व्यक्तित्व की जो इमेज है, उन दोनों में बातचीत होगी। और हम दोनों कभी बात नहीं कर पाएंगे। वह तो हम तभी कर सकते हैं जब दोनों की इमेज हट जाएं, दोनों साक्षी हों, दोनों इमेज को एक तरफ हटा सकें, तब व्यक्तियों का मिलना हो।
और प्रेम में इसीलिए इतना सुख आता है क्योंकि प्रेम के किसी क्षण में इमेज हट जाती है और सीधे व्यक्ति आमने-सामने एनकाउंटर में पड़ जाते हैं। और कोई मतलब नहीं है उसका। क्योंकि जिससे हम प्रेम करते हैं उसके लिए हम सब आवरण हटा देते हैं। ये वस्त्र जो हम पहने हुए हैं, ये ही आवरण नहीं हैं। व्यक्तित्व के भी वस्त्र पहने हुए हैं। इसलिए प्रेम में हम नग्न हो जाते हैं, हम कोई आवरण नहीं रखते, हम जैसे हैं वैसे हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि हमें प्रेम करता है वह वैसा ही स्वीकार कर लेगा जैसे हम हैं। जो हमें प्रेम नहीं करता, उससे हमें डर है कि हमें वैसा ही स्वीकार करेगा जैसे हम हैं? न, वह हमें जैसा स्वीकार करे, वैसे बन कर हम जाते हैं।
प्रश्न:
पोज बना कर जाते हैं।
पोज बना कर जाते हैं। और वह पोज धीरे-धीरे स्थिर होते चले जाते हैं, स्थिर होते चले जाते हैं। आखिर में तुम खुद ही भूल जाती हो कि वह तुम्हारा पोज था, तुम न थी। जो मिल कर चला गया, वह पुष्पा न थी, पुष्पा का सिर्फ पोज था। जो आया और मिला और गया। पुष्पा आई ही नहीं।
पोज बना कर जाते हैं।
पोज बना कर जाते हैं। और वह पोज धीरे-धीरे स्थिर होते चले जाते हैं, स्थिर होते चले जाते हैं। आखिर में तुम खुद ही भूल जाती हो कि वह तुम्हारा पोज था, तुम न थी। जो मिल कर चला गया, वह पुष्पा न थी, पुष्पा का सिर्फ पोज था। जो आया और मिला और गया। पुष्पा आई ही नहीं।
साक्षीभाव हो तो ये पोज हमें दिखाई पड़ने लगते हैं कि ये पोज हैं। तो कभी यह भी हो सकता है--कि साक्षी कह सकता है कि छोड़ो-छोड़ो इसको, चलो मुझसे मिलो, इसको जाने दो--वह जो बीच में निरंतर खड़ा है। प्रेम की किसी गहरी झलक में कभी हटता है।...
और ऐसा लगता है कि अब धीरे-धीरे प्रेम में भी नहीं हटता है। संस्कृतियां जितनी मजबूत होती चली जाती हैं, आदमी जितना आगे बढ़ता जाता है, पोज मजबूत होता चला जाता है। क्योंकि पूरा कल्चर, पूरी सोसाइटी, पूरी सभ्यता पोज पर खड़ी है। पोज पर खड़ी है! भीतर के आदमी से कोई संबंध नहीं है। और हम सब एक-दूसरे को दबा कर ऐसा आग्रह भी करते हैं कि तुम--जैसा हम चाहते हैं वैसे; ऐसे नहीं जैसे तुम हो।
और ऐसा लगता है कि अब धीरे-धीरे प्रेम में भी नहीं हटता है। संस्कृतियां जितनी मजबूत होती चली जाती हैं, आदमी जितना आगे बढ़ता जाता है, पोज मजबूत होता चला जाता है। क्योंकि पूरा कल्चर, पूरी सोसाइटी, पूरी सभ्यता पोज पर खड़ी है। पोज पर खड़ी है! भीतर के आदमी से कोई संबंध नहीं है। और हम सब एक-दूसरे को दबा कर ऐसा आग्रह भी करते हैं कि तुम--जैसा हम चाहते हैं वैसे; ऐसे नहीं जैसे तुम हो।
प्रश्न:
डर लगता है।
डर लगता है।
हां। लेकिन जैसे तुम हो उसी से संबंध हो सकता है। जैसे तुम नहीं हो उससे कोई संबंध ही नहीं हो सकता; क्योंकि वह तुम हो ही नहीं। वह तो सिर्फ एक्ंिटग है। उससे क्या संबंध होने वाला है? लेकिन सब, इधर हम सब ऐसा कर रहे हैं। सब ऐसा कर रहे हैं!
प्रश्न:
भयभीत होने की जो बात है न--जैसे, जो अंदर भयभीत हो रहा है, उसे देख रहा हूं। भयभीत, तो वहां जाने का मन नहीं होता है न?
भयभीत होने की जो बात है न--जैसे, जो अंदर भयभीत हो रहा है, उसे देख रहा हूं। भयभीत, तो वहां जाने का मन नहीं होता है न?
न, न, न। यह व्यक्तित्व ही है। यह व्यक्तित्व ही है। यह चला गया। यह व्यक्तित्व ही है।
प्रश्न:
छोड़ा गया?
न। भयभीत--या प्रेम, या घृणा, या क्रोध, सब, सब हमारे एक तल की घटनाएं हैं। जैसे समझ लो कि एक आदमी आया और तुम्हें तलवार से मार रहा है। तो इसमें दो स्थितियां हैं। अगर तुम यह मानती हो कि तुम अपने इस व्यक्तित्व के साथ एक हो, तो तुम्हें लगेगा कि मुझे मार डाला, मुझे मारे डाल रहा है। तब तुम्हारे भय का जो--भय तो होने ही वाला है--तब तुम्हारे भय का संवेदन तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व को, तुम्हें, सबको घेर लेगा। तुम्हारे पीछे कुछ भी न बचेगा जो भयभीत नहीं रह गया। सब भयभीत हो जाएगा। फिर एक साक्षी बचती है। वह उस पर तलवार उठाता है। तो साक्षी में भी कुछ तो मरेगा ही। तलवार कुछ तो काटेगी ही। और जो कटेगा, वह भयभीत ही होने वाला है। गर्दन हटना चाहेगी कि कट जाएगी। लेकिन साक्षी यह देखेगा कि गर्दन हटती है, राम हटते हैं, वह यह देख रहा है। वह इसे तो पक्का ही पता है...
छोड़ा गया?
न। भयभीत--या प्रेम, या घृणा, या क्रोध, सब, सब हमारे एक तल की घटनाएं हैं। जैसे समझ लो कि एक आदमी आया और तुम्हें तलवार से मार रहा है। तो इसमें दो स्थितियां हैं। अगर तुम यह मानती हो कि तुम अपने इस व्यक्तित्व के साथ एक हो, तो तुम्हें लगेगा कि मुझे मार डाला, मुझे मारे डाल रहा है। तब तुम्हारे भय का जो--भय तो होने ही वाला है--तब तुम्हारे भय का संवेदन तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व को, तुम्हें, सबको घेर लेगा। तुम्हारे पीछे कुछ भी न बचेगा जो भयभीत नहीं रह गया। सब भयभीत हो जाएगा। फिर एक साक्षी बचती है। वह उस पर तलवार उठाता है। तो साक्षी में भी कुछ तो मरेगा ही। तलवार कुछ तो काटेगी ही। और जो कटेगा, वह भयभीत ही होने वाला है। गर्दन हटना चाहेगी कि कट जाएगी। लेकिन साक्षी यह देखेगा कि गर्दन हटती है, राम हटते हैं, वह यह देख रहा है। वह इसे तो पक्का ही पता है...
जैसे समझ लो कि एक आदमी यहां आकर घर में आग लगा दे, यद्यपि हम घर नहीं हैं, फिर भी घर में आग लगा दे, तो घर में तो आग लगेगी ही, और एक भय व्याप्त हो ही जाएगा। लेकिन इस मकान में दो तरह के आदमी हो सकते हैं। एक आदमी चिल्लाने लगे कि मुझे आग लगा दी गई है और भागने लगे, वह यह न कहे कि मकान को आग लगा दी गई है। अगर उसने इस मकान के साथ अपनी आइडेंटिटी इतनी ज्यादा कर ली हो कि यह मकान वही हो गया हो, तो वह ऐसा चिल्लाएगा कि मुझे आग लगा दी गई है। साक्षी यह कहेगा, मकान में आग लग गई है। मेरा मतलब समझी न तुम?
हमारा एक मकान भी है जहां हम रह रहे हैं, वही हमारी पर्सनैलिटी है। और एक ‘हम भी हैं’ जो रह रहा है। लेकिन जो ‘हम हैं’ उसका हमें कोई पता नहीं है। उसका हमें कोई पता नहीं है! उसका हमें पता ही नहीं है कि वह कौन है जो रह रहा है? और उसका हम पता भी नहीं लगाते हैं। हम अपने मकान को साज-संवार लेते हैं, उसको रंग-रोगन कर देते हैं। क्योंकि मकान दिखाई पड़ता है। सड़क पर निकलने वाले को मकान दिखाई पड़ता है, आप दिखाई नहीं पड़ते हैं!
और हमारे व्यक्तित्व का मकान ऐसा है कि उसे हम--वह ऐसा मकान नहीं है जिसको कि हम कहीं छोड़ कर चले जाते हैं, वह सदा हमारे साथ है। इसलिए हम व्यक्तित्व को ही पहले संवार लेते हैं; क्योंकि वही दिखाई पड़ता है; दूसरे की आंख में वही पकड़ में आता है। और तो कुछ पकड़ में आता नहीं। इसलिए भीतर का जो आदमी है अक्सर बिलकुल कच्चा रह जाता है, उससे कुछ हो ही नहीं पाता। क्योंकि बाहर के रंग-रोगन से काम चल जाता है। कोई जरूरत नहीं रहती उसके कुछ करने की। लेकिन जिस दिन यह पता चलेगा कि हमने दूसरे को दिखाने के लिए तैयारी की थी: लेकिन हम कुछ चूक गए भीतर, हम कुछ खो गए; उसी दिन से धर्म की शुरुआत होती है।
धर्म की शुरुआत मेरी दृष्टि में व्यक्तित्व के प्रति जाग जाने से होती है। वह जो हमने पर्सनैलिटी बना ली है, उसकी समझ से होती है।
और एक दिन ऐसा लगने लगता है कि कब तक मकान पोतते रहेंगे! और भी एक मजे की बात है कि जिस दिन यह खयाल आता है कि कब तक मकान पोतते रहेंगे--क्योंकि मकान को कितना ही पोतो और लोग तुम्हारे मकान की कितनी ही प्रशंसा करें, तब भी तुम जानते हो कि तुम्हारा उनसे कोई संबंध नहीं हुआ। वे मकान की ही प्रशंसा कर रहे हैं। इसलिए अक्सर यह होता है। अक्सर यह होता है।
मुझे कितने लोगों ने नहीं कहा होगा। कोई स्त्री मेरे पास आएगी और मुझे कहेगी कि जो भी मेरे पास आता है, ऐसा मुझे लगता है कि वह मेरे शरीर को ही प्रेम कर रहा है, मुझे नहीं। और तब एकदम मन वितृष्णा से भर जाता है। क्योंकि बहुत गहरे में हमको पता ही है कि भीतर हमारे कोई और भी है। हां, यह हो सकता है कि शरीर के द्वारा हम उसे प्रेम करें, तब स्थिति बहुत अन्यथा हो जाएगी। तब शरीर उसका ही एक्सटेंशन है फैला हुआ, बाहर तक आया हुआ। लेकिन हम पोर्च में नहीं बैठ गए हैं, हम आकर मकान को ही देखते नहीं रह गए हैं, मकान के मालिक से भी हमने कोई संबंध जोड़ा है। और अगर हमने मकान को देखा भी है, तो सिर्फ इसलिए कि वह इस मालिक का मकान है। इससे ज्यादा उससे कोई मतलब न रहा। समझ में आया न तुम्हें?
लेकिन हमारा, हमारा प्रवेशन शरीर से ज्यादा नहीं होता, व्यक्तित्व से ज्यादा नहीं होता। और दूसरा इतना भयभीत है कि वह कभी अपने को पूरा खुला नहीं छोड़ता। क्योंकि हमने इतने नियम, इतने अनुशासन, इतनी व्यवस्था आदमी के लिए मानने के लिए कही है कि जिसका कोई हिसाब नहीं है।
हमको सब समझाया गया है कि अगर मेरा ‘नारायण’ से प्रेम है, तो मुझे उन पर कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। अब यह कैसे हो सकता है? सच बात तो यह है कि जिससे मेरा प्रेम है उस पर ही मैं क्रोध कर सकता हूं--और किस पर क्रोध करूंगा? लेकिन सिखावन यह है कि जिससे प्रेम है, उस पर क्रोध मत करना। तो क्रोध को मैं पी जाऊंगा और दबा जाऊंगा और प्रेम को दिखाता रहूंगा! तब थोड़े दिन में प्रेम झूठा हो जाएगा। वह ऑथेंटिक और प्रामाणिक नहीं रह जाने वाला है, क्योंकि प्रामाणिक प्रेम में वह भी आता है।
वह एक मित्र पूछते थे न कि कई बार ऐसा लगता है कि यह आदमी प्रेयसी को या प्रेमी को प्रेम करता है या उसको सता रहा है। अब यह तुम्हें खयाल नहीं हो सकता, तुम्हें खयाल नहीं हो सकता। लेकिन अगर प्रेम हो तो ही खयाल में आ सकता है। और हो सकता है कि एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के मांस में और लहू में अपनी अंगुलियां निपोड़ दे, या अंगुलियां डाल दे। देखने वाले को तो यही लगेगा कि यह कैसा दुष्ट टार्चर कर रहा है, सैडिस्ट है, क्या है, यह क्यों सता रहा है, यह भी कोई प्रेम है! लेकिन अगर उन दोनों के बीच प्रेम है, वह घटना घटी है, तो वह प्रेयसी समझ पाएगी।
तो उसे पकड़ने की भीतर तक कोशिश है उसकी और शरीर तक रहने का उसका मन नहीं है। तुम मेरा मतलब समझी न? हालांकि बड़ी असहाय कोशिश है, बड़ी हेल्पलेस। यह हो नहीं सकता। हम भीतर जाकर उसको पकड़ नहीं सकते। कितना ही गहरा शरीर में हाथ चला जाए, तो भी हड्डी-मांस ही हाथ में आने वाला है। लेकिन प्रेम के किसी क्षण में यह हो सकता है। यह हो सकता है।
वह यह कह रहा है कि मकान नहीं, मुझे तुम तक आना है, और यह मकान बार-बार बीच में आ जाता है। यह जो मकान है, यह बार-बार बीच में आ जाता और मुझे यहीं से लौट जाना पड़ता है। नहीं; इससे मैं राजी नहीं हूं।
तुम हैरान होओगे कि ऐसी भी घटनाएं हैं कि कभी किसी प्रेमी ने अपनी प्रेयसी को पहली ही रात में गर्दन दबा कर मार ही डाला। और बाहर से देखने पर यह घटना बिलकुल ऐसी लगेगी कि यह तो हत्यारे के हाथ पड़ गई। यह क्या हुआ!
लेकिन जरूरी नहीं है ऐसा। यह हो सकता है। इसने इतना प्रेम किया हो कि वह शरीर के एक्सप्लोरेशन तक उसकी बात नहीं होती है कि वह शरीर के अंग पढ़ पाने की जांच-पड़ताल कर ले, वह शारीरिक ज्योग्राफी की जांच-पड़ताल कर ले, वह इतना प्रेमी रहा हो कि वह बिलकुल भीतर चला जाना चाहा हो और उसने कहा कि आओ इस मकान पर, मैं तुम तक आना चाहता हूं।
यह बड़ी असहाय चेष्टा है। संभव भी नहीं होती। यह कोई उपाय भी नहीं है। लेकिन यह हो सकता है।
और अगर उस प्रेयसी को प्रेम रहा होगा, तो मरते वक्त उसने वह शांति अनुभव की होगी, जो कि तुम अपनी प्रेयसी को पचास साल सेवा करके भी शांति नहीं दे सकते। क्योंकि किसी व्यक्ति ने उसके भीतर तक पहुंचने की कोशिश की है।
तो मेरी दृष्टि में तो सेक्स भी असल में दूसरे व्यक्ति के भीतर प्रवेश की चेष्टा है और कुछ भी नहीं है। वह उतने दूर तक, जहां तक दूर तक हम उसके भीतर अंतस्तल में भी खोज कर आ सकते हैं। इसलिए प्रेम से भी सेक्स आ सकता है। लेकिन बड़ा बहुत और होगा, बहुत भिन्न होगा, बहुत ही भिन्न होगा। तब वह भी एक आंतरिक स्पर्श से ज्यादा नहीं है। उस व्यक्ति के अंतर्तम तक स्पर्श की चेष्टा है। यानी इस व्यक्ति के शरीर से हम सहमत नहीं होना चाहते, हम और भीतर, और भीतर, और भीतर जाना चाहते हैं। मेरा मतलब समझ रहे न?
यह जो पीड़ा है, यह जो सफरिंग है प्रेम की वह बड़ी... उसकी कठिनाई बहुत है। लेकिन चूंकि हम न प्रेम करते कभी, न हमने कभी प्रेम को जाना है। हम सब प्रेम का पोज कर रहे हैं। इसलिए न तो प्रेम इस तरह जग जाता--और फिर हमने सब नियम तय किए हुए हैं। यानी प्रेम में भी हमने नियम तय किए हुए हैं कि कैसे प्रेम करना। इसके लिए हमने सब इंतजाम किया हुआ है। तो हमने सब फॉल्स कर दिया, सब झूठा हो गया है। और उस झूठ से बड़ी पीड़ा है, और बड़ी तकलीफ है।
और मेरा अपना अनुभव यह है कि जिसे हम प्रेम करते हैं अगर हम उस पर क्रोध न कर पाएं, तो हम प्रेम कर ही नहीं पाए। बल्कि कई बार तो ऐसा होगा कि तुम्हारे क्रोध की झलक में ही वह एक दफा अनुभव करेगा कि प्रेम था। क्योंकि इतने जोर से क्रोध करना पराए के लिए संभव ही नहीं है।
हमारा एक मकान भी है जहां हम रह रहे हैं, वही हमारी पर्सनैलिटी है। और एक ‘हम भी हैं’ जो रह रहा है। लेकिन जो ‘हम हैं’ उसका हमें कोई पता नहीं है। उसका हमें कोई पता नहीं है! उसका हमें पता ही नहीं है कि वह कौन है जो रह रहा है? और उसका हम पता भी नहीं लगाते हैं। हम अपने मकान को साज-संवार लेते हैं, उसको रंग-रोगन कर देते हैं। क्योंकि मकान दिखाई पड़ता है। सड़क पर निकलने वाले को मकान दिखाई पड़ता है, आप दिखाई नहीं पड़ते हैं!
और हमारे व्यक्तित्व का मकान ऐसा है कि उसे हम--वह ऐसा मकान नहीं है जिसको कि हम कहीं छोड़ कर चले जाते हैं, वह सदा हमारे साथ है। इसलिए हम व्यक्तित्व को ही पहले संवार लेते हैं; क्योंकि वही दिखाई पड़ता है; दूसरे की आंख में वही पकड़ में आता है। और तो कुछ पकड़ में आता नहीं। इसलिए भीतर का जो आदमी है अक्सर बिलकुल कच्चा रह जाता है, उससे कुछ हो ही नहीं पाता। क्योंकि बाहर के रंग-रोगन से काम चल जाता है। कोई जरूरत नहीं रहती उसके कुछ करने की। लेकिन जिस दिन यह पता चलेगा कि हमने दूसरे को दिखाने के लिए तैयारी की थी: लेकिन हम कुछ चूक गए भीतर, हम कुछ खो गए; उसी दिन से धर्म की शुरुआत होती है।
धर्म की शुरुआत मेरी दृष्टि में व्यक्तित्व के प्रति जाग जाने से होती है। वह जो हमने पर्सनैलिटी बना ली है, उसकी समझ से होती है।
और एक दिन ऐसा लगने लगता है कि कब तक मकान पोतते रहेंगे! और भी एक मजे की बात है कि जिस दिन यह खयाल आता है कि कब तक मकान पोतते रहेंगे--क्योंकि मकान को कितना ही पोतो और लोग तुम्हारे मकान की कितनी ही प्रशंसा करें, तब भी तुम जानते हो कि तुम्हारा उनसे कोई संबंध नहीं हुआ। वे मकान की ही प्रशंसा कर रहे हैं। इसलिए अक्सर यह होता है। अक्सर यह होता है।
मुझे कितने लोगों ने नहीं कहा होगा। कोई स्त्री मेरे पास आएगी और मुझे कहेगी कि जो भी मेरे पास आता है, ऐसा मुझे लगता है कि वह मेरे शरीर को ही प्रेम कर रहा है, मुझे नहीं। और तब एकदम मन वितृष्णा से भर जाता है। क्योंकि बहुत गहरे में हमको पता ही है कि भीतर हमारे कोई और भी है। हां, यह हो सकता है कि शरीर के द्वारा हम उसे प्रेम करें, तब स्थिति बहुत अन्यथा हो जाएगी। तब शरीर उसका ही एक्सटेंशन है फैला हुआ, बाहर तक आया हुआ। लेकिन हम पोर्च में नहीं बैठ गए हैं, हम आकर मकान को ही देखते नहीं रह गए हैं, मकान के मालिक से भी हमने कोई संबंध जोड़ा है। और अगर हमने मकान को देखा भी है, तो सिर्फ इसलिए कि वह इस मालिक का मकान है। इससे ज्यादा उससे कोई मतलब न रहा। समझ में आया न तुम्हें?
लेकिन हमारा, हमारा प्रवेशन शरीर से ज्यादा नहीं होता, व्यक्तित्व से ज्यादा नहीं होता। और दूसरा इतना भयभीत है कि वह कभी अपने को पूरा खुला नहीं छोड़ता। क्योंकि हमने इतने नियम, इतने अनुशासन, इतनी व्यवस्था आदमी के लिए मानने के लिए कही है कि जिसका कोई हिसाब नहीं है।
हमको सब समझाया गया है कि अगर मेरा ‘नारायण’ से प्रेम है, तो मुझे उन पर कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। अब यह कैसे हो सकता है? सच बात तो यह है कि जिससे मेरा प्रेम है उस पर ही मैं क्रोध कर सकता हूं--और किस पर क्रोध करूंगा? लेकिन सिखावन यह है कि जिससे प्रेम है, उस पर क्रोध मत करना। तो क्रोध को मैं पी जाऊंगा और दबा जाऊंगा और प्रेम को दिखाता रहूंगा! तब थोड़े दिन में प्रेम झूठा हो जाएगा। वह ऑथेंटिक और प्रामाणिक नहीं रह जाने वाला है, क्योंकि प्रामाणिक प्रेम में वह भी आता है।
वह एक मित्र पूछते थे न कि कई बार ऐसा लगता है कि यह आदमी प्रेयसी को या प्रेमी को प्रेम करता है या उसको सता रहा है। अब यह तुम्हें खयाल नहीं हो सकता, तुम्हें खयाल नहीं हो सकता। लेकिन अगर प्रेम हो तो ही खयाल में आ सकता है। और हो सकता है कि एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के मांस में और लहू में अपनी अंगुलियां निपोड़ दे, या अंगुलियां डाल दे। देखने वाले को तो यही लगेगा कि यह कैसा दुष्ट टार्चर कर रहा है, सैडिस्ट है, क्या है, यह क्यों सता रहा है, यह भी कोई प्रेम है! लेकिन अगर उन दोनों के बीच प्रेम है, वह घटना घटी है, तो वह प्रेयसी समझ पाएगी।
तो उसे पकड़ने की भीतर तक कोशिश है उसकी और शरीर तक रहने का उसका मन नहीं है। तुम मेरा मतलब समझी न? हालांकि बड़ी असहाय कोशिश है, बड़ी हेल्पलेस। यह हो नहीं सकता। हम भीतर जाकर उसको पकड़ नहीं सकते। कितना ही गहरा शरीर में हाथ चला जाए, तो भी हड्डी-मांस ही हाथ में आने वाला है। लेकिन प्रेम के किसी क्षण में यह हो सकता है। यह हो सकता है।
वह यह कह रहा है कि मकान नहीं, मुझे तुम तक आना है, और यह मकान बार-बार बीच में आ जाता है। यह जो मकान है, यह बार-बार बीच में आ जाता और मुझे यहीं से लौट जाना पड़ता है। नहीं; इससे मैं राजी नहीं हूं।
तुम हैरान होओगे कि ऐसी भी घटनाएं हैं कि कभी किसी प्रेमी ने अपनी प्रेयसी को पहली ही रात में गर्दन दबा कर मार ही डाला। और बाहर से देखने पर यह घटना बिलकुल ऐसी लगेगी कि यह तो हत्यारे के हाथ पड़ गई। यह क्या हुआ!
लेकिन जरूरी नहीं है ऐसा। यह हो सकता है। इसने इतना प्रेम किया हो कि वह शरीर के एक्सप्लोरेशन तक उसकी बात नहीं होती है कि वह शरीर के अंग पढ़ पाने की जांच-पड़ताल कर ले, वह शारीरिक ज्योग्राफी की जांच-पड़ताल कर ले, वह इतना प्रेमी रहा हो कि वह बिलकुल भीतर चला जाना चाहा हो और उसने कहा कि आओ इस मकान पर, मैं तुम तक आना चाहता हूं।
यह बड़ी असहाय चेष्टा है। संभव भी नहीं होती। यह कोई उपाय भी नहीं है। लेकिन यह हो सकता है।
और अगर उस प्रेयसी को प्रेम रहा होगा, तो मरते वक्त उसने वह शांति अनुभव की होगी, जो कि तुम अपनी प्रेयसी को पचास साल सेवा करके भी शांति नहीं दे सकते। क्योंकि किसी व्यक्ति ने उसके भीतर तक पहुंचने की कोशिश की है।
तो मेरी दृष्टि में तो सेक्स भी असल में दूसरे व्यक्ति के भीतर प्रवेश की चेष्टा है और कुछ भी नहीं है। वह उतने दूर तक, जहां तक दूर तक हम उसके भीतर अंतस्तल में भी खोज कर आ सकते हैं। इसलिए प्रेम से भी सेक्स आ सकता है। लेकिन बड़ा बहुत और होगा, बहुत भिन्न होगा, बहुत ही भिन्न होगा। तब वह भी एक आंतरिक स्पर्श से ज्यादा नहीं है। उस व्यक्ति के अंतर्तम तक स्पर्श की चेष्टा है। यानी इस व्यक्ति के शरीर से हम सहमत नहीं होना चाहते, हम और भीतर, और भीतर, और भीतर जाना चाहते हैं। मेरा मतलब समझ रहे न?
यह जो पीड़ा है, यह जो सफरिंग है प्रेम की वह बड़ी... उसकी कठिनाई बहुत है। लेकिन चूंकि हम न प्रेम करते कभी, न हमने कभी प्रेम को जाना है। हम सब प्रेम का पोज कर रहे हैं। इसलिए न तो प्रेम इस तरह जग जाता--और फिर हमने सब नियम तय किए हुए हैं। यानी प्रेम में भी हमने नियम तय किए हुए हैं कि कैसे प्रेम करना। इसके लिए हमने सब इंतजाम किया हुआ है। तो हमने सब फॉल्स कर दिया, सब झूठा हो गया है। और उस झूठ से बड़ी पीड़ा है, और बड़ी तकलीफ है।
और मेरा अपना अनुभव यह है कि जिसे हम प्रेम करते हैं अगर हम उस पर क्रोध न कर पाएं, तो हम प्रेम कर ही नहीं पाए। बल्कि कई बार तो ऐसा होगा कि तुम्हारे क्रोध की झलक में ही वह एक दफा अनुभव करेगा कि प्रेम था। क्योंकि इतने जोर से क्रोध करना पराए के लिए संभव ही नहीं है।
प्रश्न:
...बार-बार ये दोनों बातें आ जाती हैं न!
...बार-बार ये दोनों बातें आ जाती हैं न!
वे इसलिए आ जाती हैं कि तुम दो शब्दों में एक फर्क नहीं कर पाते। एक शब्द तो ‘अनुभव’ है, एक शब्द ‘अनुभूति’ है। अनुभूति से तुम कभी अपने को अलग नहीं कर सकते हो, क्योंकि तुम अलग होते ही नहीं हो। अनुभव से तुम अलग हो ही, तुम कभी एक होते ही नहीं हो। यह फर्क समझ लेना चाहिए।
मैं एक फूल को देख रहा हूं और फूल के सौंदर्य में डूब गया हूं; जब मैं डूबा हुआ हूं तब मुझे जो हो रहा है वह अनुभव नहीं है, वह अनुभूति है। वहां फूल और मैं दो चीजें ही नहीं हैं।
मैं एक फूल को देख रहा हूं और फूल के सौंदर्य में डूब गया हूं; जब मैं डूबा हुआ हूं तब मुझे जो हो रहा है वह अनुभव नहीं है, वह अनुभूति है। वहां फूल और मैं दो चीजें ही नहीं हैं।
प्रश्न:
वहां मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं फूल का अनुभव कर रहा हूं?
वहां मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं फूल का अनुभव कर रहा हूं?
न। यह तुम बाद में कहोगे जब अनुभूति अनुभव बन गई होगी। अनुभूति जब मर जाती है तो अनुभव बन जाती है। अनुभव का मतलब है: अतीत। अनुभूति का मतलब है: अभी, यहीं, इसी क्षण।
प्रश्न:
अनुभूति की याद अनुभव है?
अनुभूति की याद अनुभव है?
हां, अनुभूति की याद अनुभव है। वह अब पास्ट मेमोरी हो गई। और जब मेमोरी हो गई, तब तुम अलग हो गए फौरन। तो अनुभव से तुम सदा अलग हो। जैसे, आज तुम कहते हो कि मैं कभी बच्चा था; इस बचपन के अनुभव से तुम अब बिलकुल अलग हो। इससे तुम कैसे एक हो सकते हो। वह तो स्मृति हो गया। अब तुम बिलकुल अलग हो। लेकिन जब तुम बच्चे थे, थे ही, और जब तुम बचपन की एक अनुभूति थी, तब तू अलग नहीं थी।
प्रश्न:
नहीं, तब वहां कोई साक्षी भी नहीं था, आप साक्षी की बातें भी कह रहे हैं?
नहीं, तब वहां कोई साक्षी भी नहीं था, आप साक्षी की बातें भी कह रहे हैं?
साक्षी बनना है मन का। अनुभूति में मन होता ही नहीं। जो कठिनाई है, अनुभूति में मन होता ही नहीं। अनुभव ही मन है। असल में हमारे सब अनुभवों के जोड़ का नाम मन है। मन के साक्षी होना है। मन का मतलब है: दि डेड पास्ट। वह जो अब नहीं है, था। या मन का मतलब है: जो अभी नहीं है और होगा।
अनुभूति में तो तुम साक्षी का कोई सवाल ही नहीं है। अगर अनुभूति में तुम साक्षी हुए, तो अनुभूति उसी वक्त खंडित हो जाएगी, नष्ट हो जाएगी, समाप्त हो जाएगी--अनुभव बन जाएगा फौरन। यानी मैं यह कह रहा कि साक्षी तुम अनुभव के ही हो सकते हो। अगर अनुभूति में भी तुमने साक्षी होने की कोशिश की... जैसे मैं किसी को प्रेम कर रहा हूं और मुझसे गले आकर लग गया है, अगर मैंने इस वक्त साक्षी होने की कोशिश की, तो गले लगने की घटना पास्ट हो जाएगी इसी वक्त। इस वक्त यह फिर अनुभूति नहीं रह जाएगी--यह अनुभव हो गया। यानी वह आदमी लग ही चुका गले, वह बात खत्म हो चुकी है। अब भला हम गला एक-दूसरे का पकड़े हों। अगर तुम्हें यह पता चल गया कि हां मैं प्रेम कर रहा हूं, तो यह अनुभव हो गया। फिर बात खत्म हो गई।
अनुभूति में तो तुम साक्षी का कोई सवाल ही नहीं है। अगर अनुभूति में तुम साक्षी हुए, तो अनुभूति उसी वक्त खंडित हो जाएगी, नष्ट हो जाएगी, समाप्त हो जाएगी--अनुभव बन जाएगा फौरन। यानी मैं यह कह रहा कि साक्षी तुम अनुभव के ही हो सकते हो। अगर अनुभूति में भी तुमने साक्षी होने की कोशिश की... जैसे मैं किसी को प्रेम कर रहा हूं और मुझसे गले आकर लग गया है, अगर मैंने इस वक्त साक्षी होने की कोशिश की, तो गले लगने की घटना पास्ट हो जाएगी इसी वक्त। इस वक्त यह फिर अनुभूति नहीं रह जाएगी--यह अनुभव हो गया। यानी वह आदमी लग ही चुका गले, वह बात खत्म हो चुकी है। अब भला हम गला एक-दूसरे का पकड़े हों। अगर तुम्हें यह पता चल गया कि हां मैं प्रेम कर रहा हूं, तो यह अनुभव हो गया। फिर बात खत्म हो गई।
प्रश्न:
मुझे अभी ऐसा लगा कि आप साक्षी होने को कह रहे हैं। इतने समय से आपने ऐसी ही बात की।
मुझे अभी ऐसा लगा कि आप साक्षी होने को कह रहे हैं। इतने समय से आपने ऐसी ही बात की।
नहीं, बिलकुल भी नहीं। जो मैं कह रहा हूं वह मैं यह कह रहा हूं कि मन के साक्षी तुम्हें होना है। और मजा यह है कि तुम करीब-करीब मन ही रह गए हो। अनुभूति तो होती नहीं, अनुभव ही हो रहे हैं। जब तुम अनुभूति में होते हो तब भी तुम वहां नहीं होते, कहीं और होते हो। जैसे एक फूल के पास तुम खड़े हो, तब तुम फूल के पास खड़े नहीं होते, हो सकता है तुम उन फूलों के पास खड़े हो गए हो जिनके पास तुम कभी खड़े हुए थे।
एक आदमी कहता है, यह गुलाब का फूल बड़ा सुंदर है। उससे कोई पूछे कि यह गुलाब का फूल बड़ा सुंदर है, ऐसा कह रहे हो। तो गुलाब के फूल सुंदर होते हैं यह धारणा और यह अनुभव बीच में आ रहा है। तो हो सकता है वह इस गुलाब के फूल के बाबत बात ही नहीं कर रहा। वह गुलाब के फूलों के बाबत जो इसके मन में एक अनुभव है उसकी बात कर रहा है। और हो सकता है उसे रोक कर कहो कि जरा देखो भी तो, है भी सुंदर कि नहीं है!
एक्सपीरिएंसिंग अनुभूति को कह रहा हूं, और एक्सपीरिएंस अनुभव को कह रहा हूं।
तो जब अनुभूति मरती चली जाती है, वह इकट्ठी होती चली जाती है। जैसे सांप चल रहा है, चलते वक्त सांप और चलना एक ही चीज है, दो चीजें नहीं हैं। यानी ऐसा नहीं है कि सांप कोई है जो चल रहा है; ऐसा है कि जो चलने की क्रिया हो रही है वही सांप है--अभी इतना ही एक है। लेकिन पीछे एक रेखा छूट गई है सांप के, वह जो चला है जिस रास्ते पर। वह लौट कर देखता है: वह रेखा के साथ एक नहीं है। वह बिलकुल अलग है।
सांप के ऊपर केंचुली चढ़ी है, जुड़ी है उसके चमड़े से, तो सांप और केंचुली दो चीजें नहीं हैं, एक ही चीज हैं। फिर केंचुली छूट गई है और सांप बाहर हो गया। अब वह पीछे लौट कर देख रहा है केंचुली को, अब केंचुली बिलकुल अलग चीज हो गई है।--केंचुली की तरह है अनुभव हमारा।
और मजा यह है कि अनुभव के साथ क्योंकि सुविधापूर्ण व्यवहार किया जा सकता है, क्योंकि वह डेड होता है, मरा हुआ होता है। तुम उसको जैसा चाहो उठा कर बैठा सकते हो। अनुभूति के साथ तुम ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते। क्योंकि अनुभूति इतनी जीवंत है कि वह तुम्हें ही बहा ले जाती है, तुम होते ही नहीं वहां खड़े। तो इसलिए हमने धीरे-धीरे अनुभूति की फिकर ही छोड़ दी, हम अनुभव में ही जीने लगे। सुविधापूर्ण है। मेरा मतलब समझे न? सुविधापूर्ण है।
आज में ‘विजय’ को प्रेम करूं, तो पता नहीं कि वह क्या उत्तर आएगा, वह कोई पता नहीं है। उसका कोई पता नहीं कि क्या उत्तर आएगा। उत्तर बिलकुल ही अनिश्र्चित है। तो मैं अनुभव में जीता हूं, मैं कहता हूं, कल प्रेम किया था, कल जो उत्तर आया था बड़ा अच्छा था, बड़ा प्रीतिकर था। मैं उस अनुभव में जी रहा हूं जो कल आया था। और वही अपेक्षा कर रहा हूं कि वही आज भी आए।
तो तुम, ध्यान रहे, अनुभूति के लिए पुनरुक्ति की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो; सिर्फ अनुभव की पुनरुक्ति की कल्पना हो सकती है। और जो आदमी अनुभव को रिपीट करना चाहता है उसकी अनुभूति मरती चली जाती है, क्योंकि अनुभूति का रिपीटीशन ही नहीं हो सकता।
सच बात यह है कि मैंने अगर किसी को आज प्रेम किया है, तो फिर ठीक ऐसा ही प्रेम इस पृथ्वी पर अब दुबारा मैं उसे नहीं कर सकूंगा। कर ही न सकूंगा। क्योंकि मैं भी बदल जाऊंगा, वह भी बदल जाएगा, सब बदल जाएगा। लेकिन मैं भी अपेक्षा करूंगा कि बड़ा आनंद आया कि यही प्रेम फिर से करूं। वह भी अपेक्षा करेगा कि बड़ा आनंद आया कि यही प्रेम फिर से हो। तब हम अनुभव, स्मृति को दोहराते रहेंगे। और तब झूठ हो जाएगा, तब एक झूठ हो जाएगा हमारे चारों तरफ खड़ा हुआ, जो सच नहीं है। और फिर उस झूठ में हम इस बुरी तरह घिर जाएंगे, तो उसे करो तो रस नहीं आता, न करो तो झंझट होती है। क्योंकि लगता है कि शायद करने से रस आ जाता। फिर एक जाल बुनता चला जाता है।
अनुभूति में जो जीता है, उसे तो साक्षी होने का भी सवाल नहीं है।
यानी मैं तुमसे यह कह रहा हूं: जो अनुभव में जीता है, उसे साक्षी होने का सवाल है। और इसीलिए सवाल है कि साक्षी के द्वारा वह अनुभव से मुक्त हो जाएगा। और जिस दिन साक्षी के द्वारा अनुभव से मुक्त हो जाएगा, उस दिन साक्षी की भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। उस दिन वह रोज जीएगा। ऐसा भी नहीं कि देख रहा हूं, जान रहा हूं--यह कोई जीने का ढंग नहीं होता। यह जीने का ढंग नहीं हो सकता। क्योंकि तुम देखोगे, जानोगे, तो तुम जीओगे कैसे! तब वह सिर्फ जीएगा। तब वह ऐसा भी नहीं कहेगा कि राम को भूख लगी है, ऐसा भी नहीं कहेगा। तब वह भूख ही हो जाएगा। वह कहेगा कि मैं भूख हूं। वह ऐसे ही कहेगा। अनुभूति में तो वैसा ही आएगा।
इसलिए साक्षी के भी ऊपर यात्रा है। साक्षी जो है सिर्फ मेथडोलॉजी है, वह हमारा जो मृग का जाल बुना हुआ उसको तोड़ने के लिए। एक दफा टूट गया वह जाल, तो साक्षी को विदा कर देना पड़ेगा।
इधर मैं निरंतर सोचता हूं कि बियांड साक्षी की बात की जाए। लेकिन साक्षी तक तो ले जाया जाए पहले। नहीं तो बड़ा कठिन है।
एक आदमी कहता है, यह गुलाब का फूल बड़ा सुंदर है। उससे कोई पूछे कि यह गुलाब का फूल बड़ा सुंदर है, ऐसा कह रहे हो। तो गुलाब के फूल सुंदर होते हैं यह धारणा और यह अनुभव बीच में आ रहा है। तो हो सकता है वह इस गुलाब के फूल के बाबत बात ही नहीं कर रहा। वह गुलाब के फूलों के बाबत जो इसके मन में एक अनुभव है उसकी बात कर रहा है। और हो सकता है उसे रोक कर कहो कि जरा देखो भी तो, है भी सुंदर कि नहीं है!
एक्सपीरिएंसिंग अनुभूति को कह रहा हूं, और एक्सपीरिएंस अनुभव को कह रहा हूं।
तो जब अनुभूति मरती चली जाती है, वह इकट्ठी होती चली जाती है। जैसे सांप चल रहा है, चलते वक्त सांप और चलना एक ही चीज है, दो चीजें नहीं हैं। यानी ऐसा नहीं है कि सांप कोई है जो चल रहा है; ऐसा है कि जो चलने की क्रिया हो रही है वही सांप है--अभी इतना ही एक है। लेकिन पीछे एक रेखा छूट गई है सांप के, वह जो चला है जिस रास्ते पर। वह लौट कर देखता है: वह रेखा के साथ एक नहीं है। वह बिलकुल अलग है।
सांप के ऊपर केंचुली चढ़ी है, जुड़ी है उसके चमड़े से, तो सांप और केंचुली दो चीजें नहीं हैं, एक ही चीज हैं। फिर केंचुली छूट गई है और सांप बाहर हो गया। अब वह पीछे लौट कर देख रहा है केंचुली को, अब केंचुली बिलकुल अलग चीज हो गई है।--केंचुली की तरह है अनुभव हमारा।
और मजा यह है कि अनुभव के साथ क्योंकि सुविधापूर्ण व्यवहार किया जा सकता है, क्योंकि वह डेड होता है, मरा हुआ होता है। तुम उसको जैसा चाहो उठा कर बैठा सकते हो। अनुभूति के साथ तुम ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते। क्योंकि अनुभूति इतनी जीवंत है कि वह तुम्हें ही बहा ले जाती है, तुम होते ही नहीं वहां खड़े। तो इसलिए हमने धीरे-धीरे अनुभूति की फिकर ही छोड़ दी, हम अनुभव में ही जीने लगे। सुविधापूर्ण है। मेरा मतलब समझे न? सुविधापूर्ण है।
आज में ‘विजय’ को प्रेम करूं, तो पता नहीं कि वह क्या उत्तर आएगा, वह कोई पता नहीं है। उसका कोई पता नहीं कि क्या उत्तर आएगा। उत्तर बिलकुल ही अनिश्र्चित है। तो मैं अनुभव में जीता हूं, मैं कहता हूं, कल प्रेम किया था, कल जो उत्तर आया था बड़ा अच्छा था, बड़ा प्रीतिकर था। मैं उस अनुभव में जी रहा हूं जो कल आया था। और वही अपेक्षा कर रहा हूं कि वही आज भी आए।
तो तुम, ध्यान रहे, अनुभूति के लिए पुनरुक्ति की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो; सिर्फ अनुभव की पुनरुक्ति की कल्पना हो सकती है। और जो आदमी अनुभव को रिपीट करना चाहता है उसकी अनुभूति मरती चली जाती है, क्योंकि अनुभूति का रिपीटीशन ही नहीं हो सकता।
सच बात यह है कि मैंने अगर किसी को आज प्रेम किया है, तो फिर ठीक ऐसा ही प्रेम इस पृथ्वी पर अब दुबारा मैं उसे नहीं कर सकूंगा। कर ही न सकूंगा। क्योंकि मैं भी बदल जाऊंगा, वह भी बदल जाएगा, सब बदल जाएगा। लेकिन मैं भी अपेक्षा करूंगा कि बड़ा आनंद आया कि यही प्रेम फिर से करूं। वह भी अपेक्षा करेगा कि बड़ा आनंद आया कि यही प्रेम फिर से हो। तब हम अनुभव, स्मृति को दोहराते रहेंगे। और तब झूठ हो जाएगा, तब एक झूठ हो जाएगा हमारे चारों तरफ खड़ा हुआ, जो सच नहीं है। और फिर उस झूठ में हम इस बुरी तरह घिर जाएंगे, तो उसे करो तो रस नहीं आता, न करो तो झंझट होती है। क्योंकि लगता है कि शायद करने से रस आ जाता। फिर एक जाल बुनता चला जाता है।
अनुभूति में जो जीता है, उसे तो साक्षी होने का भी सवाल नहीं है।
यानी मैं तुमसे यह कह रहा हूं: जो अनुभव में जीता है, उसे साक्षी होने का सवाल है। और इसीलिए सवाल है कि साक्षी के द्वारा वह अनुभव से मुक्त हो जाएगा। और जिस दिन साक्षी के द्वारा अनुभव से मुक्त हो जाएगा, उस दिन साक्षी की भी कोई जरूरत नहीं रह जाती। उस दिन वह रोज जीएगा। ऐसा भी नहीं कि देख रहा हूं, जान रहा हूं--यह कोई जीने का ढंग नहीं होता। यह जीने का ढंग नहीं हो सकता। क्योंकि तुम देखोगे, जानोगे, तो तुम जीओगे कैसे! तब वह सिर्फ जीएगा। तब वह ऐसा भी नहीं कहेगा कि राम को भूख लगी है, ऐसा भी नहीं कहेगा। तब वह भूख ही हो जाएगा। वह कहेगा कि मैं भूख हूं। वह ऐसे ही कहेगा। अनुभूति में तो वैसा ही आएगा।
इसलिए साक्षी के भी ऊपर यात्रा है। साक्षी जो है सिर्फ मेथडोलॉजी है, वह हमारा जो मृग का जाल बुना हुआ उसको तोड़ने के लिए। एक दफा टूट गया वह जाल, तो साक्षी को विदा कर देना पड़ेगा।
इधर मैं निरंतर सोचता हूं कि बियांड साक्षी की बात की जाए। लेकिन साक्षी तक तो ले जाया जाए पहले। नहीं तो बड़ा कठिन है।
प्रश्न:
यानी टेक्नीक के स्तर से आप बात कर रहे हैं, जैसे गुरजिएफ का वह स्टॉप प्रयोग वही है?
यानी टेक्नीक के स्तर से आप बात कर रहे हैं, जैसे गुरजिएफ का वह स्टॉप प्रयोग वही है?
हां-हां, कोई भी।
प्रश्न:
और उसमें बहुत ही टेंशन रहता था वह स्टॉप की जगह दो मिनट तक।
और उसमें बहुत ही टेंशन रहता था वह स्टॉप की जगह दो मिनट तक।
रहेगा, रहेगा, रहेगा। साक्षी, तुम अनुभव में जीते हो इसलिए। अगर कोई कहे कि मैं अनुभूति में जीता हूं, तो साक्षी का कोई सवाल ही नहीं; क्योंकि अनुभूति में दो नहीं होते। हो ही नहीं सकते। अगर मैं इस चांद की रोशनी में खड़ा हूं और अनुभूति कर रहा हूं, तो चांद भी दूसरा नहीं रह जाता, दर्द और पैर का तो सवाल ही नहीं है, चांद भी दूसरा नहीं है। सब चीजें ओवरलेपिंग हो जाती है। ऐसा नहीं रह जाता कि चांद की रोशनी चांद से आ रही है--और मुझ तक आ रही है; ऐसा हो जाता है कि चांद की रोशनी भी आती है और मैं भी चांद तक जाता हूं। और ये दोनों बातें इतनी घुलमिल जाती हैं कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, इसका कोई फर्क नहीं रह जाता। वहां चांद और यहां मैं, ऐसा नहीं रह जाता; चांद और मैं--और एक लंबा विस्तार दोनों का। और एक ही घेरे में दोनों हैं, जहां दो का कोई सवाल नहीं रहा।
असल में तो, परम जो योग है, वह तो साक्षी के आगे है।
पर सीढ़ियां जो यात्रा करनी हो वह तो साक्षी की है। क्योंकि अगर हम अनुभव वाले व्यक्ति को कहें कि तुम साक्षी भी मत होओ, तो वह अनुभव के साथ ही अपने को एक समझ लेगा। और वह अनुभव के साथ एक समझ लेने से तो हम दुख उठा रहे हैं, बहुत दुख उठा रहे हैं। उसे तोड़ देना है।
असल में सब डिवाइसेस आगे-पीछे झूठी हैं। कठिनाई यह है कि एक झूठी बीमारी पकड़ रखी हो तो सच्ची दवाई का उस पर क्या किया जाए। झूठी बीमारी पकड़ी हो तो झूठी दवा उपयोग करनी पड़ेगी। और झूठी बीमारी में अगर सच्ची दवाई दी तो दोहरी बीमारी हो जाने वाली है, क्योंकि दवा भी बीमारी लाएगी।
झूठी बीमारी पर झूठी दवा से ही ठीक करने का उपाय है।
साक्षी जो है वह संसार नाम की जो हमारी एक झूठी बीमारी है, उसको दूर करने का उपाय है। वह दोनों दूर हो जाते हैं, तो न कोई साक्षी है, न कोई साक्ष्य है; न कोई दिखाई पड़ रहा है, न कोई देखने वाला है। तब होना है। वह एक्झिस्टेंशियल है। वहां सिर्फ अस्तित्व मात्र है। पर वह साक्षी से बहुत आगे की बात है।
असल में, साक्षी तो संसार की ही बात है। वह उसी तल पर है, उससे कुछ भी भिन्न नहीं है। सब दवाइयां बीमारी के तल पर होती हैं। स्वास्थ्य नहीं होता बीमारी के तल पर, न दवाई के तल पर, वह दोनों के बहुत बियांड होता है। दवाई और बीमारी एक ही तल पर होती हैं। दो तल पर होंगी तो उनका तालमेल ही नहीं हो पाएगा। सब दवाइयां बीमारी के ही स्तर की होती हैं। और इसीलिए बीमारी को काट पाएंगे। लेकिन कटते से दोनों के बियांड हो जाएगी बात, और वह जो अतीत रह जाता है--वह स्वास्थ्य होगा। जो एकदम से नहीं दिखाई पड़ता।
सब धर्म संसार के तल पर होते हैं। जो संसार की स्थिति होती है: धर्म उसी तल पर होता है, उससे भिन्न नहीं होता। क्योंकि वह उसी स्थिति को काटने के लिए तो वह आया है।
अगर इस कमरे में आग लग गई हो और मैं दूसरी मंजिल पर जाकर पानी छिड़कूं, तो मैं पागल हूं। यानी अगर इस कमरे में आग लगी तो पानी मुझे इसी कमरे में छिड़कना पड़ेगा। समझ रही न तुम?
जिस तल पर आदमी खड़ा है--अनुभव के तल पर--वहां साक्षी का प्रयोग करना पड़ेगा। अनुभव से छुटकारा हुआ कि साक्षी से भी छुटकारा हो गया। सभी दवाइयों से छुटकारा हो जाता है बीमारी से छुटकारा होने पर।
लेकिन कुछ ऐसे बीमार होते हैं--बीमारी तो चली जाती है, दवा लिए चले जाते हैं। और तब दवाई बीमारी बन जाती है। क्योंकि उनको दवा से बीमारी गई न! तो दवा भी बीमारी बन जाती है, वे उसको पकड़ लेते हैं।
तो अब ऐसे लोग हैं कि जो साक्षी का प्रयोग कर रहे हैं, और उनके अनुभव तो विदा हो गए, लेकिन वे साक्षी को सम्हाले चले जाएंगे। क्योंकि उनको यह डर लगता है कि इसी से तो हुआ है। अब यह दूसरी बीमारी हो गई, साक्षी भी बीमारी हो गई।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
रूप-रेखा में जरा भी फर्क नहीं होता। जरा भी फर्क नहीं होता। सूक्ष्म शरीर की रूप-रेखा बिलकुल यही होती है जो इस शरीर की है। सिर्फ एक रेखा सी, मद्धिम, धुआं-धुआं--ठोस नहीं, ट्रांसपैरेंट।
सच्चाई तो यह है कि उस शरीर का जो रूप है, उसकी वजह से इस शरीर को यह रूप मिल रहा है।
असल में तो, परम जो योग है, वह तो साक्षी के आगे है।
पर सीढ़ियां जो यात्रा करनी हो वह तो साक्षी की है। क्योंकि अगर हम अनुभव वाले व्यक्ति को कहें कि तुम साक्षी भी मत होओ, तो वह अनुभव के साथ ही अपने को एक समझ लेगा। और वह अनुभव के साथ एक समझ लेने से तो हम दुख उठा रहे हैं, बहुत दुख उठा रहे हैं। उसे तोड़ देना है।
असल में सब डिवाइसेस आगे-पीछे झूठी हैं। कठिनाई यह है कि एक झूठी बीमारी पकड़ रखी हो तो सच्ची दवाई का उस पर क्या किया जाए। झूठी बीमारी पकड़ी हो तो झूठी दवा उपयोग करनी पड़ेगी। और झूठी बीमारी में अगर सच्ची दवाई दी तो दोहरी बीमारी हो जाने वाली है, क्योंकि दवा भी बीमारी लाएगी।
झूठी बीमारी पर झूठी दवा से ही ठीक करने का उपाय है।
साक्षी जो है वह संसार नाम की जो हमारी एक झूठी बीमारी है, उसको दूर करने का उपाय है। वह दोनों दूर हो जाते हैं, तो न कोई साक्षी है, न कोई साक्ष्य है; न कोई दिखाई पड़ रहा है, न कोई देखने वाला है। तब होना है। वह एक्झिस्टेंशियल है। वहां सिर्फ अस्तित्व मात्र है। पर वह साक्षी से बहुत आगे की बात है।
असल में, साक्षी तो संसार की ही बात है। वह उसी तल पर है, उससे कुछ भी भिन्न नहीं है। सब दवाइयां बीमारी के तल पर होती हैं। स्वास्थ्य नहीं होता बीमारी के तल पर, न दवाई के तल पर, वह दोनों के बहुत बियांड होता है। दवाई और बीमारी एक ही तल पर होती हैं। दो तल पर होंगी तो उनका तालमेल ही नहीं हो पाएगा। सब दवाइयां बीमारी के ही स्तर की होती हैं। और इसीलिए बीमारी को काट पाएंगे। लेकिन कटते से दोनों के बियांड हो जाएगी बात, और वह जो अतीत रह जाता है--वह स्वास्थ्य होगा। जो एकदम से नहीं दिखाई पड़ता।
सब धर्म संसार के तल पर होते हैं। जो संसार की स्थिति होती है: धर्म उसी तल पर होता है, उससे भिन्न नहीं होता। क्योंकि वह उसी स्थिति को काटने के लिए तो वह आया है।
अगर इस कमरे में आग लग गई हो और मैं दूसरी मंजिल पर जाकर पानी छिड़कूं, तो मैं पागल हूं। यानी अगर इस कमरे में आग लगी तो पानी मुझे इसी कमरे में छिड़कना पड़ेगा। समझ रही न तुम?
जिस तल पर आदमी खड़ा है--अनुभव के तल पर--वहां साक्षी का प्रयोग करना पड़ेगा। अनुभव से छुटकारा हुआ कि साक्षी से भी छुटकारा हो गया। सभी दवाइयों से छुटकारा हो जाता है बीमारी से छुटकारा होने पर।
लेकिन कुछ ऐसे बीमार होते हैं--बीमारी तो चली जाती है, दवा लिए चले जाते हैं। और तब दवाई बीमारी बन जाती है। क्योंकि उनको दवा से बीमारी गई न! तो दवा भी बीमारी बन जाती है, वे उसको पकड़ लेते हैं।
तो अब ऐसे लोग हैं कि जो साक्षी का प्रयोग कर रहे हैं, और उनके अनुभव तो विदा हो गए, लेकिन वे साक्षी को सम्हाले चले जाएंगे। क्योंकि उनको यह डर लगता है कि इसी से तो हुआ है। अब यह दूसरी बीमारी हो गई, साक्षी भी बीमारी हो गई।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
रूप-रेखा में जरा भी फर्क नहीं होता। जरा भी फर्क नहीं होता। सूक्ष्म शरीर की रूप-रेखा बिलकुल यही होती है जो इस शरीर की है। सिर्फ एक रेखा सी, मद्धिम, धुआं-धुआं--ठोस नहीं, ट्रांसपैरेंट।
सच्चाई तो यह है कि उस शरीर का जो रूप है, उसकी वजह से इस शरीर को यह रूप मिल रहा है।
प्रश्न:
वह पहले आता है उससे यह स्थूल बनता है?
वह पहले आता है उससे यह स्थूल बनता है?
हां, सूक्ष्म पहले आता है, उससे यह स्थूल बनता है। वही मॉडल है, वही ढांचा है। उसके ऊपर बाकी सारा यह फैलाव है।
प्रश्न:
वह अपने अंदर कुछ रेखा--और प्रकाश की रेखा सी है?
वह अपने अंदर कुछ रेखा--और प्रकाश की रेखा सी है?
हां, बिलकुल ही एक जोड़ दोनों के बीच है। दोनों के बीच एक जोड़ है। वह जोड़ टूट जाए, तो फिर इस शरीर में वापस लौटना असंभव है। दोनों के बीच एक--दोनों को जोड़ने वाला एक संबंध है। और वह नाभि से ही है। और इसलिए नाभि से ही मां से पेट में बच्चा जुड़ा होता है। और नाभि जो है वह ओरिजिनल सोर्स है, जहां से जीवन हममें प्रवेश करता है। इधर शरीर वाला जीवन भी नाभि से प्रवेश करता है। उधर आत्मा वाला जीवन भी नाभि से ही प्रवेश करता है।
प्रश्न:
इसलिए नाभि पर ध्यान लगाना चाहिए?
इसलिए नाभि पर ध्यान लगाना चाहिए?
हां, नाभि पर ध्यान लगाने का बड़ा ही मूल्य है। उससे ज्यादा अच्छा सेंटर नहीं है बॉडी में ध्यान के लिए। क्योंकि वहां से निकटतम शरीर और आत्मा, वह कहना चाहिए सेतु, जहां ब्रिज है, जहां से तत्काल फासले शुरू होते हैं।
प्रश्न:
यह नाभि?
उपयोगी तो वहीं तक है जहां तक तुम नाभि के आगे नहीं निकल जाती हो। सब सीढ़ियां वहीं तक उपयोगी हैं जब तक तुम उनके आगे नहीं निकल जाती हो। शरीर के आगे निकली कि फिर नाभि-वाभि का कोई उपयोग नहीं रह जाता, क्योंकि वह शरीर का आखिरी पड़ाव है। आखिरी पड़ाव है। पहला पड़ाव भी है, आखिरी पड़ाव भी वही है। तो जैसे ही उस पड़ाव के पीछे हट गई हो फिर कोई उपयोग नहीं रह जाता, फिर कुछ मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है।
यह नाभि?
उपयोगी तो वहीं तक है जहां तक तुम नाभि के आगे नहीं निकल जाती हो। सब सीढ़ियां वहीं तक उपयोगी हैं जब तक तुम उनके आगे नहीं निकल जाती हो। शरीर के आगे निकली कि फिर नाभि-वाभि का कोई उपयोग नहीं रह जाता, क्योंकि वह शरीर का आखिरी पड़ाव है। आखिरी पड़ाव है। पहला पड़ाव भी है, आखिरी पड़ाव भी वही है। तो जैसे ही उस पड़ाव के पीछे हट गई हो फिर कोई उपयोग नहीं रह जाता, फिर कुछ मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
असल में, जो ये सारी बातें हैं न... होता क्या है कि जो अनुभव होता है, उस अनुभव को प्रकट करने की बड़ी कठिनाई है। क्योंकि उस अनुभव को प्रकट करने के लिए बहुत प्रतीक और सिंबल खोजने पड़ते हैं। बहुत प्रतीक और सिंबल खोजने पड़ते हैं। असल में जब वह, जिनको हम चक्र कहते हैं, जब वे पूरी गति में होते हैं, चक्र पूरी गति में होता है, तो करीब-करीब उसकी स्थिति फ्लावर जैसी मालूम पड़ती है। फ्लावर-व्लावर नहीं है कहीं वहां, लेकिन जब भीतर अनुभव होता है, तो ऐसा ही लगता है कि जैसे कोई चीज भीतर खुल गई है। अब खुल जाना जो है: वह फ्लावर की खास खूबी है। फ्लावर का मतलब ही है: खुल जाना, फ्लावरिंग। समझी न?
असल में, जो ये सारी बातें हैं न... होता क्या है कि जो अनुभव होता है, उस अनुभव को प्रकट करने की बड़ी कठिनाई है। क्योंकि उस अनुभव को प्रकट करने के लिए बहुत प्रतीक और सिंबल खोजने पड़ते हैं। बहुत प्रतीक और सिंबल खोजने पड़ते हैं। असल में जब वह, जिनको हम चक्र कहते हैं, जब वे पूरी गति में होते हैं, चक्र पूरी गति में होता है, तो करीब-करीब उसकी स्थिति फ्लावर जैसी मालूम पड़ती है। फ्लावर-व्लावर नहीं है कहीं वहां, लेकिन जब भीतर अनुभव होता है, तो ऐसा ही लगता है कि जैसे कोई चीज भीतर खुल गई है। अब खुल जाना जो है: वह फ्लावर की खास खूबी है। फ्लावर का मतलब ही है: खुल जाना, फ्लावरिंग। समझी न?
प्रश्न:
खिलना।
खिलना।
हां, खिलना। तो भीतर एक अनुभव होता है, जब कोई सेंटर पूरी तरह से खिलता है तो ऐसा ही लगता है जैसे कोई बोड़ी थी और वह खिल कर फूल बन गई। अब इसको कैसे कहो बाहर? तो बाहर उन्होंने प्रतीक बना लिया है कि कमल खिल गया। फिर अब जैसे कि यह कमल ऐसा उलटा लटका हो, तो जो पहला अनुभव चक्रों का आता है वह ऐसा ही आता है जैसे फूल उलटा लटका हो।
प्रश्न:
कली की तरह?
कली की तरह?
हां। उलटा लटका हो। बंद। और जब वह खिलता है, तो न केवल खिलता है, बल्कि वह उठ भी जाता है। वह खिल रहा है। तो वह दूसरा अनुभव जो होता है: तो जैसे ही चक्र सक्रिय होता है तो वह धीरे-धीरे-धीरे ऊपर उठ कर खिल जाता है।
प्रश्न:
जैसे कोई सिंबल बताता है कि वह खिला हुआ कमल है, फूल है, वह खिला है?
जैसे कोई सिंबल बताता है कि वह खिला हुआ कमल है, फूल है, वह खिला है?
वे सारे के सारे सिंबल्स जो हैं... हमारी कठिनाई यह है कि अनुभव जैसे होते हैं उन अनुभवों को बताने के लिए कोई भी उपाय नहीं है, इसलिए हम कुछ उपाय खोजते हैं। समझी न?
जैसे समझ लो, कि कोई कहे कि वहां सुर्ख कमल खिला हुआ है, लाल कमल खिला हुआ है। लाल-वाल कमल वहां नहीं खिलता। लेकिन एक कमरे में अगर सब चीजें लाल पोत दी गई हों--सब चीजें लाल पोत दी गई हों--तो उस कमरे में आपको थोड़ा भिन्न मालूम पड़ेगा बजाय कमरे में सब चीजें हरी पोती गई हों।
इस कमरे में तुम आई हो, तो सब लाल पुता हुआ है, खून के रंग में सब पोत दिया है, तो इस कमरे के भीतर आकर कुछ भिन्न लगेगा। इस कमरे को बिलकुल हरा पोता गया है, तो भिन्न लगेगा। तो वह जो फीलिंग होगी इस कमरे के भीतर आने की--वह लाल नहीं है--लेकिन चारों तरफ लाल अगर पुता हुआ है, तो एक पर्टिकुलर फीलिंग होगी जो हरे रंग में नहीं होने वाली है। हरे रंग में दूसरी फीलिंग होगी। समझी न तू?
तो जो कमल खिलता है उस वक्त अगर ऐसी फीलिंग होती है जैसी फीलिंग कि लाल चीजों से घिर कर हो जाए, तो वह जिसको अनुभव हुआ वह कहेगा कि लाल कमल खिला। अब यह लाल कमल में गलती हो जाएगी। क्योंकि लाल कमल नहीं खिला है कहीं कोई, लेकिन फीलिंग ऐसी होगी जैसे कि लाल रंग से घिर गए हों। अब सब रंगों की अलग स्थिति है।
तुम जंगल में जाती हो और हरा विस्तार देख कर तुम जो आनंदित होती हो, हरे का उसमें कुछ संबंध है। थोड़ी कल्पना करो कि ये सब वृक्ष लाल हैं और सब पत्तियां लाल हैं और सब फूल लाल हैं और सारा का सारा टेसू का जंगल है, तो तुम्हारे मस्तिष्क पर बड़ा खिंचाव का असर पड़ेगा। रिलैक्सेशन नहीं होगा, टेंस हो जाएगा। मेरा मतलब समझ रही तू?
लाल रंग का परिणाम टेंस होगा। हरे रंग का परिणाम रिलैक्ंिसग होगा। इसलिए सभी क्रांति वाले लोग लाल झंडा चुन लेते हैं, वह अकारण नहीं है। वह जो रंग है वह अकारण नहीं है। इस्लाम ने हरा झंडा चुना, क्योंकि ‘इस्लाम’ शब्द का मतलब शांति होता है। शांति नहीं आई उससे यह दूसरी बात है, लेकिन झंडा हरा चुना। हरा चुनने का कुल कारण इतना था कि सबसे ज्यादा शांतिदायी रंग वही है, सबसे पीसफुल। इस्लाम शब्द का मतलब भी होता है: पीस। शब्द का भी। उसका मतलब भी शांति होता है। इसलिए वह हरा रंग चुन लिया। उसके चुनने का कारण थे।
तो भीतर तुम जब जाओ, तो भीतर बहुत सी घटनाएं घटनी शुरू होती हैं, जिनको कि कैसे प्रकट करो। उनको प्रकट करना मुश्किल है।
जापान में उन्होंने हाइकू विकसित किए हैं--कविता का एक रूप है। हाइकू, नारायण पढ़ते हो कभी? हाइकू पढ़नी चाहिए। मेरे हिसाब से कभी भी दुनिया में जब काव्य विकसित होगा तो हाइकू जैसा हो जाएगा। कोई अगर तुम महाकाव्य पढ़ते हो, तो महाकाव्य में मुश्किल से दस-पांच पंक्तियां काव्य की होंगी, बाकी तो सब कचरा होगा। हो ही नहीं सकता। क्योंकि काव्य इतनी गहरी अनुभूति है कि कोई रामायण में थोड़े ही हो सकता है कि रामायण में काव्य होगा। इतने बड़े ग्रंथ में वह हो नहीं सकता। उसमें तो पुनरुक्ति और शब्दों का खेल और जाल और तुकबंदी होगी।
हाइकू का मतलब है कि हमने सब छोड़ दिया सिर्फ काव्य बचा लिया। दो-तीन-चार पंक्तियों में पूरा हो जाएगा। सब नॉन-एसेंशियल हटा दिया, सिर्फ काव्य ही बचा लिया बस, वह एसेंशियल जिसको छोड़ ही नहीं सकते।
अब हाइकू बड़े अजीब होते हैं, और बड़े... लेकिन उनकी फीलिंग का तुम्हें खयाल देना है इसलिए कह रहा हूं। अब एक हाइकू है, अब क्या करे एक कवि, अब जिसको यह अनुभव हुआ वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया, वह क्या करे? वह कहता है:
एक छोटा सा तालाब
एक मेढक का आना
छप-छपाक कूद जाना
सब शांति है...
अब इसको समझे न? इसका मतलब क्या हुआ? ‘एक तालाब, एक मेढक का आना, छप-छपाक कूद जाना, सब शांति है, टोटल साइलेंस है।’
अब किसी ने अगर कभी किसी तालाब के किनारे मेढक को कूदते देखा है, और फिर सब ओर सब शांत हो जाना...। तो जिस फकीर ने यह हाइकू लिखा है, वह कहता है, ऐसा ही हुआ। जब हम उस किनारे पर पहुंचे, परमात्मा के किनारे पर पहुंचे, ऐसा ही हुआ:
एक आदमी का आना
छप-छपाक
सब शांति है...
अब वह क्या करे? वह करे क्या? तो उसने एक चित्र भी बनाया: वह एक मेढक का बैठना और एक तालाब...। मगर अब वह बड़ी कठिनाई है। वह ठीक कह रहा है, वह कह रहा है कि सब शांत हो जाना... न मेढक का फिर कोई पता है, न कोई आवाज है, न कुछ है... सिर्फ सरोवर रह गया और सब शांति है।
अब मैं मानता हूं कि जब भी काव्य विकसित होगा, तो वह हाइकू के करीब आता चला जाएगा।
अगर बड़ी-बड़ी कविताएं होती हों मुल्क में, तो समझना की काव्य नहीं है। वह तो छोटी-छोटी... बड़ी कविता लिखनी मुश्किल है। फिर तो तुकबंदी उसमें होने ही वाली है, उसमें तुम फैलाव का...। वह तो इतना ही काव्य, उतना बहुमूल्य, तो उतने ही छोटे हैं।
जापान में एक फूल होता है, जो बिलकुल सामान्य फूल है। जो ऐसे ही सड़क के किनारे या कहीं भी हो जाता है। ऐसे ही नदी के किनारे ऐसे ही वह उग आता है। कुछ नाम है उसका। एक फकीर का एक हाइकू है कि एक फकीर निकल रहा है, चौंक कर खड़ा हो गया है। नजिना, या कुछ ऐसा नाम है उस फूल का। तो उसकी चार-पांच पंक्तियां हैं। वह कहता है: ‘चौंक कर खड़ा हो जाना, नजिने का दिखाई पड़ना जिंदगी में पहली बार, अरे, तुम भी थे!’ वह उससे पूछता है। लेकिन तुम इतने ज्यादा थे कि देख नहीं पाया। तो नजिना इतना सामान्य फूल है कि उसे कभी किसी ने देखा ही नहीं, क्योंकि जंगल में वह खिलता भी नहीं, वह तो उगता ही रहता है, उगता ही रहता है। तो वह यह कहता है कि मुझे पता ही नहीं था कि नजिना का फूल भी होता है! क्योंकि वह इतना ज्यादा था कि पता ही न चला।
फिर वह हाइकू का दूसरा हिस्सा, जिसमें वह कहता है: ऐसा ही हुआ परमात्मा के साथ। तुम इतने ज्यादा थे, तुम इतने सब तरफ थे कि पता ही नहीं चला। एक दिन जब जाना तो पूछा, अरे, तुम भी थे नजिने के फूल! यह इतना सामान्य फूल जो... तुम भी थे?
लेकिन नजिने का फूल तो कितना ही हो, फिर भी थोड़ा ही है, परमात्मा तो इतना, इतना है कि वह ठस-ठस कर वही है। उसको कहीं से कोई उपाय नहीं है कि वह न हो। वह कहने लगा कि नजिने के फूल को जब पहली दफा पहचाना, तब मुझे खयाल आया कि अरे, बड़ी भूल हो गई। जो सामान्य है वह भूल जाता है, जो निकट है वह भूल जाता है। अब वह उसमें दूसरी बात जो कहना चाहता है कि अरे, परमात्मा तुम भी थे! तुमको कभी जाना न, नजिने के फूल। वह परमात्मा को नजिने का फूल कह रहा है। अब यह आदमी क्या करे? पर इसने समझा दिया, इसने बात समझा दी कि इतना कॉमन फ्लावर है कि उसे कोई देखता ही नहीं। वह कौन काहे के लिए देखेगा?
अनकॉमन को ही कोई देखता है।
कई दफे मैं सोचता हूं कि जिसको हम कुरूपता कहते हैं, वह सिर्फ कॉमननेस है। और जिसको हम सौंदर्य कहते हैं, वह सिर्फ अनकॉमन है। और कोई मतलब नहीं है। और कोई भी मतलब नहीं है। वह जो कॉमन है, इतना ज्यादा है, वह दिखाई नहीं पड़ता। जो अनकॉमन है, वह दिखाई पड़ता है।
अब परमात्मा से ज्यादा कॉमन क्या होगा? तो वह बिलकुल दिखाई पड़ता ही नहीं, पड़ता ही नहीं, पड़ता ही नहीं।
अब वह कहता है कि मैं तीस साल से इसी रास्ते से निकलता था, कितनी बार नहीं गुजरा इस फूल के पास से, और तुम हमेशा-हमेशा खिले थे। वह बारह ही महीने खिलता है फूल। वह कभी ऐसा नहीं कि कभी-कभी खिलता हो। तुम हमेशा-हमेशा खिले थे। क्या हुआ कि मैं तुमको देख नहीं पाया? और आज ठिठक कर रुक जाना और तुम्हारा दिख जाना!
ये जो कठिनाइयां भीतर की हैं, वे कठिनाइयां ऐसी हैं कि उनको जब कोई जाने तो उनको कैसे कहे? और जब वह कहने चले, तो वह प्रतीक लाए। और प्रतीक लाए, तो मुश्किल शुरू हो गई, कठिनाई शुरू हो गई। प्रतीक आए तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी न!
जैसे समझ लो, कि कोई कहे कि वहां सुर्ख कमल खिला हुआ है, लाल कमल खिला हुआ है। लाल-वाल कमल वहां नहीं खिलता। लेकिन एक कमरे में अगर सब चीजें लाल पोत दी गई हों--सब चीजें लाल पोत दी गई हों--तो उस कमरे में आपको थोड़ा भिन्न मालूम पड़ेगा बजाय कमरे में सब चीजें हरी पोती गई हों।
इस कमरे में तुम आई हो, तो सब लाल पुता हुआ है, खून के रंग में सब पोत दिया है, तो इस कमरे के भीतर आकर कुछ भिन्न लगेगा। इस कमरे को बिलकुल हरा पोता गया है, तो भिन्न लगेगा। तो वह जो फीलिंग होगी इस कमरे के भीतर आने की--वह लाल नहीं है--लेकिन चारों तरफ लाल अगर पुता हुआ है, तो एक पर्टिकुलर फीलिंग होगी जो हरे रंग में नहीं होने वाली है। हरे रंग में दूसरी फीलिंग होगी। समझी न तू?
तो जो कमल खिलता है उस वक्त अगर ऐसी फीलिंग होती है जैसी फीलिंग कि लाल चीजों से घिर कर हो जाए, तो वह जिसको अनुभव हुआ वह कहेगा कि लाल कमल खिला। अब यह लाल कमल में गलती हो जाएगी। क्योंकि लाल कमल नहीं खिला है कहीं कोई, लेकिन फीलिंग ऐसी होगी जैसे कि लाल रंग से घिर गए हों। अब सब रंगों की अलग स्थिति है।
तुम जंगल में जाती हो और हरा विस्तार देख कर तुम जो आनंदित होती हो, हरे का उसमें कुछ संबंध है। थोड़ी कल्पना करो कि ये सब वृक्ष लाल हैं और सब पत्तियां लाल हैं और सब फूल लाल हैं और सारा का सारा टेसू का जंगल है, तो तुम्हारे मस्तिष्क पर बड़ा खिंचाव का असर पड़ेगा। रिलैक्सेशन नहीं होगा, टेंस हो जाएगा। मेरा मतलब समझ रही तू?
लाल रंग का परिणाम टेंस होगा। हरे रंग का परिणाम रिलैक्ंिसग होगा। इसलिए सभी क्रांति वाले लोग लाल झंडा चुन लेते हैं, वह अकारण नहीं है। वह जो रंग है वह अकारण नहीं है। इस्लाम ने हरा झंडा चुना, क्योंकि ‘इस्लाम’ शब्द का मतलब शांति होता है। शांति नहीं आई उससे यह दूसरी बात है, लेकिन झंडा हरा चुना। हरा चुनने का कुल कारण इतना था कि सबसे ज्यादा शांतिदायी रंग वही है, सबसे पीसफुल। इस्लाम शब्द का मतलब भी होता है: पीस। शब्द का भी। उसका मतलब भी शांति होता है। इसलिए वह हरा रंग चुन लिया। उसके चुनने का कारण थे।
तो भीतर तुम जब जाओ, तो भीतर बहुत सी घटनाएं घटनी शुरू होती हैं, जिनको कि कैसे प्रकट करो। उनको प्रकट करना मुश्किल है।
जापान में उन्होंने हाइकू विकसित किए हैं--कविता का एक रूप है। हाइकू, नारायण पढ़ते हो कभी? हाइकू पढ़नी चाहिए। मेरे हिसाब से कभी भी दुनिया में जब काव्य विकसित होगा तो हाइकू जैसा हो जाएगा। कोई अगर तुम महाकाव्य पढ़ते हो, तो महाकाव्य में मुश्किल से दस-पांच पंक्तियां काव्य की होंगी, बाकी तो सब कचरा होगा। हो ही नहीं सकता। क्योंकि काव्य इतनी गहरी अनुभूति है कि कोई रामायण में थोड़े ही हो सकता है कि रामायण में काव्य होगा। इतने बड़े ग्रंथ में वह हो नहीं सकता। उसमें तो पुनरुक्ति और शब्दों का खेल और जाल और तुकबंदी होगी।
हाइकू का मतलब है कि हमने सब छोड़ दिया सिर्फ काव्य बचा लिया। दो-तीन-चार पंक्तियों में पूरा हो जाएगा। सब नॉन-एसेंशियल हटा दिया, सिर्फ काव्य ही बचा लिया बस, वह एसेंशियल जिसको छोड़ ही नहीं सकते।
अब हाइकू बड़े अजीब होते हैं, और बड़े... लेकिन उनकी फीलिंग का तुम्हें खयाल देना है इसलिए कह रहा हूं। अब एक हाइकू है, अब क्या करे एक कवि, अब जिसको यह अनुभव हुआ वह बड़ी मुश्किल में पड़ गया, वह क्या करे? वह कहता है:
एक छोटा सा तालाब
एक मेढक का आना
छप-छपाक कूद जाना
सब शांति है...
अब इसको समझे न? इसका मतलब क्या हुआ? ‘एक तालाब, एक मेढक का आना, छप-छपाक कूद जाना, सब शांति है, टोटल साइलेंस है।’
अब किसी ने अगर कभी किसी तालाब के किनारे मेढक को कूदते देखा है, और फिर सब ओर सब शांत हो जाना...। तो जिस फकीर ने यह हाइकू लिखा है, वह कहता है, ऐसा ही हुआ। जब हम उस किनारे पर पहुंचे, परमात्मा के किनारे पर पहुंचे, ऐसा ही हुआ:
एक आदमी का आना
छप-छपाक
सब शांति है...
अब वह क्या करे? वह करे क्या? तो उसने एक चित्र भी बनाया: वह एक मेढक का बैठना और एक तालाब...। मगर अब वह बड़ी कठिनाई है। वह ठीक कह रहा है, वह कह रहा है कि सब शांत हो जाना... न मेढक का फिर कोई पता है, न कोई आवाज है, न कुछ है... सिर्फ सरोवर रह गया और सब शांति है।
अब मैं मानता हूं कि जब भी काव्य विकसित होगा, तो वह हाइकू के करीब आता चला जाएगा।
अगर बड़ी-बड़ी कविताएं होती हों मुल्क में, तो समझना की काव्य नहीं है। वह तो छोटी-छोटी... बड़ी कविता लिखनी मुश्किल है। फिर तो तुकबंदी उसमें होने ही वाली है, उसमें तुम फैलाव का...। वह तो इतना ही काव्य, उतना बहुमूल्य, तो उतने ही छोटे हैं।
जापान में एक फूल होता है, जो बिलकुल सामान्य फूल है। जो ऐसे ही सड़क के किनारे या कहीं भी हो जाता है। ऐसे ही नदी के किनारे ऐसे ही वह उग आता है। कुछ नाम है उसका। एक फकीर का एक हाइकू है कि एक फकीर निकल रहा है, चौंक कर खड़ा हो गया है। नजिना, या कुछ ऐसा नाम है उस फूल का। तो उसकी चार-पांच पंक्तियां हैं। वह कहता है: ‘चौंक कर खड़ा हो जाना, नजिने का दिखाई पड़ना जिंदगी में पहली बार, अरे, तुम भी थे!’ वह उससे पूछता है। लेकिन तुम इतने ज्यादा थे कि देख नहीं पाया। तो नजिना इतना सामान्य फूल है कि उसे कभी किसी ने देखा ही नहीं, क्योंकि जंगल में वह खिलता भी नहीं, वह तो उगता ही रहता है, उगता ही रहता है। तो वह यह कहता है कि मुझे पता ही नहीं था कि नजिना का फूल भी होता है! क्योंकि वह इतना ज्यादा था कि पता ही न चला।
फिर वह हाइकू का दूसरा हिस्सा, जिसमें वह कहता है: ऐसा ही हुआ परमात्मा के साथ। तुम इतने ज्यादा थे, तुम इतने सब तरफ थे कि पता ही नहीं चला। एक दिन जब जाना तो पूछा, अरे, तुम भी थे नजिने के फूल! यह इतना सामान्य फूल जो... तुम भी थे?
लेकिन नजिने का फूल तो कितना ही हो, फिर भी थोड़ा ही है, परमात्मा तो इतना, इतना है कि वह ठस-ठस कर वही है। उसको कहीं से कोई उपाय नहीं है कि वह न हो। वह कहने लगा कि नजिने के फूल को जब पहली दफा पहचाना, तब मुझे खयाल आया कि अरे, बड़ी भूल हो गई। जो सामान्य है वह भूल जाता है, जो निकट है वह भूल जाता है। अब वह उसमें दूसरी बात जो कहना चाहता है कि अरे, परमात्मा तुम भी थे! तुमको कभी जाना न, नजिने के फूल। वह परमात्मा को नजिने का फूल कह रहा है। अब यह आदमी क्या करे? पर इसने समझा दिया, इसने बात समझा दी कि इतना कॉमन फ्लावर है कि उसे कोई देखता ही नहीं। वह कौन काहे के लिए देखेगा?
अनकॉमन को ही कोई देखता है।
कई दफे मैं सोचता हूं कि जिसको हम कुरूपता कहते हैं, वह सिर्फ कॉमननेस है। और जिसको हम सौंदर्य कहते हैं, वह सिर्फ अनकॉमन है। और कोई मतलब नहीं है। और कोई भी मतलब नहीं है। वह जो कॉमन है, इतना ज्यादा है, वह दिखाई नहीं पड़ता। जो अनकॉमन है, वह दिखाई पड़ता है।
अब परमात्मा से ज्यादा कॉमन क्या होगा? तो वह बिलकुल दिखाई पड़ता ही नहीं, पड़ता ही नहीं, पड़ता ही नहीं।
अब वह कहता है कि मैं तीस साल से इसी रास्ते से निकलता था, कितनी बार नहीं गुजरा इस फूल के पास से, और तुम हमेशा-हमेशा खिले थे। वह बारह ही महीने खिलता है फूल। वह कभी ऐसा नहीं कि कभी-कभी खिलता हो। तुम हमेशा-हमेशा खिले थे। क्या हुआ कि मैं तुमको देख नहीं पाया? और आज ठिठक कर रुक जाना और तुम्हारा दिख जाना!
ये जो कठिनाइयां भीतर की हैं, वे कठिनाइयां ऐसी हैं कि उनको जब कोई जाने तो उनको कैसे कहे? और जब वह कहने चले, तो वह प्रतीक लाए। और प्रतीक लाए, तो मुश्किल शुरू हो गई, कठिनाई शुरू हो गई। प्रतीक आए तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी न!
प्रश्न:
हर सेंटर के लिए डिफरेंट कलर्स हैं?
हर सेंटर के लिए डिफरेंट कलर्स हैं?
वह हैं न। कलर्स हैं। क्योंकि हर सेंटर के पास तुम्हें भिन्न अनुभव होगा। बहुत भिन्न अनुभव होगा।
प्रश्न:
माइंड में ऑब्जर्वेशन है या रियलिटी है?
माइंड में ऑब्जर्वेशन है या रियलिटी है?
रियलिटी है, बिलकुल रियलिटी है, बिलकुल रियलिटी है। असल में हमें कोई भी प्रतीति हो तो हम उसको इंद्रिय की भाषा में कैसे लाएं? प्रतीति होती है इंद्रिय की भाषा के बाहर। और सब भाषा इंद्रिय की हैं। सब शब्द इंद्रिय के हैं, उसी ने बनाए हैं। हम कैसे, हम कैसे उसको लाएं? उसको लाना बहुत कठिन है। तो हम राक्षस को काले रंग में पेंट कर लेते हैं, और क्या करें!
प्रश्न:
रास्ता ही नहीं दूसरा।
रास्ता ही नहीं दूसरा।
हां, कोई रास्ता नहीं है। वह ऐसा जरूरी नहीं कि राक्षस काले ही हों, गोरे भी बहुत राक्षस हो सकते हैं। लेकिन वह हम उसको पेंट जब करेंगे, तो हम उसे काला ही पेंट करेंगे। क्योंकि काले रंग के साथ हमारा एक भय का अनुभव है, और कुछ मतलब नहीं ज्यादा। अंधेरे के साथ, काले के साथ भय का एक अनुभव है। अंधेर में गए हैं, काले में गए हैं, भयभीत हो गए हैं। तो किसी आदमी के पास अगर हमें भय मालूम होने लगे, तो वह कितना ही गोरा हो, उसको हम काला ही पेंट करेंगे। मेरा मतलब समझ रही न तुम? यानी तुम... वह उस आदमी की रियलिटी से संबंध नहीं है, हमारी जो फीलिंग हो रही है, हमको ऐसा लग रहा है कि जैसे अंधेरे से घिर गए। अब रावण कोई काला आदमी था ऐसा नहीं है--मैं सोचता हूं, उस जमाने के सुंदरतम लोगों में से एक था। लेकिन वह जिनसे झगड़ा चल गया था, उनके लिए वह बिलकुल अंधेरा जैसा हो गया था।
प्रश्न:
नहीं, यह चाहती हूं कि यह यूनिवर्सल है कि वही कलर वह सबके लिए दुश्मन।
नहीं, यह चाहती हूं कि यह यूनिवर्सल है कि वही कलर वह सबके लिए दुश्मन।
असल बात यह है, वहां कोई कलर है ही नहीं। मैं तुमसे जो कह रहा हूं तुम नहीं समझ पा रही हो। वहां कोई कलर नहीं है।
प्रश्न:
प्रोजेक्शन है।
न, प्रोजेक्शन भी नहीं है, वहां एक अनुभव है। और अनुभव को प्रकट करने के लिए कलर लाना पड़ता है। समझी न? तो फर्क पड़ेगा।
प्रोजेक्शन है।
न, प्रोजेक्शन भी नहीं है, वहां एक अनुभव है। और अनुभव को प्रकट करने के लिए कलर लाना पड़ता है। समझी न? तो फर्क पड़ेगा।
जैसे समझ लो, एक रेगिस्तान में रहने वाला आदमी जिसने हरियाली देखी ही नहीं। रेगिस्तान में रहने वाला आदमी जिसने हरियाली देखी ही नहीं। जिसने जलता हुआ रेगिस्तान ही देखा। अगर इसको वह अनुभव हो, तो इसको हरे रंग का अनुभव नहीं हो सकता वहां। इसको तो रेगिस्तान से संबंधित कोई अनुभव होगा। इसको रात का अनुभव होगा, तारों का अनुभव होगा, यह हो सकता है। ठंडी रेत का अनुभव होगा, यह हो सकता है। यानी यह कहे कि ठंडी रेत है, तारे हैं।
अब इस्लाम में तारों का जो इतना उपयोग है उसका और कोई मतलब नहीं, क्योंकि दिन तो बड़ा बेहूदा है, रात ही भर अच्छी है। इस मुल्क में हम रात की बहुत फिकर नहीं करते, दिन इतना सुंदर है कि हमारा बहुत-कुछ सूरज के उगने के साथ जुड़ा हुआ है। हम सूरज को भगवान बनाए हुए हैं। रेगिस्तान का आदमी सूरज को भगवान नहीं बना सकता। वह कैसे बनाएगा? मेरा मतलब समझी न तुम? वह तो एक-एक के अनुभव की बात है।
अब जिस आदमी ने कभी आकाश को छूते दरख्त नहीं देखे, ऐसी जमीन पर आए जहां छोटी झाड़ी होती है, उसके लिए कोई अनुभव होगा तो वह आकाश के छूते दरख्तों में प्रकट होना बहुत मुश्किल है। लेकिन किसी दूसरे को हो सकता है--कि जो आकाश के छूते दरख्तों के पास जो रहा है, वह उसकी कोई अनुभूति वह इसमें प्रकट कर सकता है। क्योंकि प्रतीक तो हम बाहर की दुनिया से लाते हैं। और इसलिए दुनिया भर के सब धर्मों में रंगों, प्रतीकों, सबका फर्क पड़ गया है।
अब ऐसे मुल्क हैं जहां कमल का फूल ही नहीं होता, करोगे क्या! वहां के आदमी को कमल के फूल का पता ही नहीं है, तो वह कैसे अनुभव कर ले कि चक्र जो है वह कमल का फूल है। यानी, कमल का फूल तो होना चाहिए कम से कम। बाहर वह कोई और कुछ चुनेगा, वह अपना उसका चुनाव होगा, वह हम नहीं जानते कि वह क्या चुनेगा। वह उसकी दुनिया में, जो कमल के फूल के निकट पड़ता होगा, वह उसको चुन लेगा। लेकिन मूढ़ तो लड़ जाएंगे, वे तो झगड़े पर खड़े हो जाएंगे।
तो इतना सख्त नहीं होना चाहिए, काव्य के साथ सख्त नहीं होना चाहिए। क्योंकि काव्य कोई गणित नहीं है। और इतने भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं।
अब जैसे कि, यह कभी सोचा है जैसा मामला है, कि जो धर्म रेगिस्तान में पैदा हुए, उनका परमात्मा बहुत क्रुद्ध है और बहुत बदला लेने वाला है। जो भी धर्म। जैसे कि यहूदी या मुसलमान, इनका परमात्मा बिलकुल आग की लपट है। जरा गड़बड़ की तो भून कर रख दूंगा, वह ऐसी घोषणा करता है। वह ऐसी घोषणा करता है कि भून कर रख दूंगा, उधेड़ दूंगा, गांव बर्बाद कर दूंगा, आग फैला दूंगा, वह ऐसी बातें करता है। यह कोई भगवान से लेना-देना नहीं है।
लेकिन वह जो आदमी रेगिस्तान में रहता है, उसका सबसे बड़ा भय यही है, वह इसी भाषा में सोच सकता है। वह इसी भाषा में सोच सकता है! वह कभी इस भाषा में नहीं सोचता जैसा कि समझो कि हिंदुस्तान का वेद का ऋषि है: अगर भगवान उसका नाराज होता है, तो वह जैसे बिजली कौंधती है, उस तरह प्रकट होता है। वहां रेगिस्तान में कहां कि बिजली कौंधेगी! तो उसका जो भगवान है, वह बिजली उत्तप्त है, वह डरवा देगा बिजली कौंधा कर। इतना पानी गिराएगा, इतना पुर लाएगा कि डूब जाओगे, बर्बाद हो जाओगे।
लेकिन अगर रेगिस्तान का भगवान कहे कि इतना पानी लाऊंगा, तो लोग बड़े प्रसन्न हो जाएंगे कि क्या बात कर रहे हैं आप! यह तो बहुत ही अच्छा। आप नाराज हो जाएं और पानी ले आएं।
तो भगवान तो कुछ कह नहीं रहा है, लेकिन रेगिस्तान में रहने वाले के अपने अनुभव ही प्रकट होंगे। अपने अनुभव ही प्रकट होंगे!
अब वह रेगिस्तान में जो भी लोग होंगे, उनकी अपनी दृष्टियां बन जाएंगी, अपनी धारणाएं बन जाएंगी। और उन दृष्टियों और धारणाओं के हिसाब से वह सारा का सारा सिंबल होगा, प्रतीक होगा, किताब होगी। एक जंगल में रहने वाली कौम की और किताब होगी, और प्रतीक होगा। नदी पर रहने वाली कौम का और प्रतीक होगा। समुद्र के किनारे रहने वाली का और प्रतीक होगा। और हम कभी इनमें तालमेल न बिठा पाएंगे। और मैं कहता हूं, तालमेल बिठाना भी क्यों। अगर इतनी समझ थोड़ी सी हो तो खयाल में आ जाएगा कि तालमेल बिठाने की कोई जरूरत नहीं है, कोई जरूरत नहीं है।
अभी मैं लुधियाना था। तो किसी व्यक्ति ने एक प्रश्न लिख कर भेजा। कुछ और प्रश्न पूछे थे, तो उसने एक प्रश्न पूछा था। उसने पूछा था कि ‘मैंने सुना है कि जो ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं, वे सागर की भांति शांत हो जाते हैं।’ तो मैंने उसको कहा कि मालूम होता है तुमने सागर नहीं देखा। तुमने सागर नहीं देखा। तो उसने कहा: मैंने नहीं देखा। तो मैंने कहा कि तुम सागर की भांति शांत! तुमको खयाल नहीं है सागर का। सागर और कहां शांति! वहां तो तुमुलनाद चलता है पूरे समय! वहां तो शोरगुल चल रहा है पूरे समय, वहां कहां शांति! तुम कहां से सीखे हो? उसने कहा: मैंने सागर देखा ही नहीं। मैंने कहा: तुम यह सागर की भांति शांति... तुमको थोड़ा सोच कर लिखना चाहिए। ऐसा नहीं हो जाता।
होता क्या है कि वे हमारे सारे प्रतीक तो हम जहां हैं, जो हमने जाना है, जो हमने देखा है, वहां से आते हैं। वहीं से आते हैं। और हमको खयाल में भी नहीं रहता, दूसरे प्रतीक का हमें खयाल में भी नहीं रहता। और वह उनकी वजह से बहुत भेद पड़ता है।
अनुभव वही है। अनुभव में कोई भेद नहीं है। अनुभव वही है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
इतने जोर से चल रहा है कि कोई नहीं चलता, लेकिन...
अब इस्लाम में तारों का जो इतना उपयोग है उसका और कोई मतलब नहीं, क्योंकि दिन तो बड़ा बेहूदा है, रात ही भर अच्छी है। इस मुल्क में हम रात की बहुत फिकर नहीं करते, दिन इतना सुंदर है कि हमारा बहुत-कुछ सूरज के उगने के साथ जुड़ा हुआ है। हम सूरज को भगवान बनाए हुए हैं। रेगिस्तान का आदमी सूरज को भगवान नहीं बना सकता। वह कैसे बनाएगा? मेरा मतलब समझी न तुम? वह तो एक-एक के अनुभव की बात है।
अब जिस आदमी ने कभी आकाश को छूते दरख्त नहीं देखे, ऐसी जमीन पर आए जहां छोटी झाड़ी होती है, उसके लिए कोई अनुभव होगा तो वह आकाश के छूते दरख्तों में प्रकट होना बहुत मुश्किल है। लेकिन किसी दूसरे को हो सकता है--कि जो आकाश के छूते दरख्तों के पास जो रहा है, वह उसकी कोई अनुभूति वह इसमें प्रकट कर सकता है। क्योंकि प्रतीक तो हम बाहर की दुनिया से लाते हैं। और इसलिए दुनिया भर के सब धर्मों में रंगों, प्रतीकों, सबका फर्क पड़ गया है।
अब ऐसे मुल्क हैं जहां कमल का फूल ही नहीं होता, करोगे क्या! वहां के आदमी को कमल के फूल का पता ही नहीं है, तो वह कैसे अनुभव कर ले कि चक्र जो है वह कमल का फूल है। यानी, कमल का फूल तो होना चाहिए कम से कम। बाहर वह कोई और कुछ चुनेगा, वह अपना उसका चुनाव होगा, वह हम नहीं जानते कि वह क्या चुनेगा। वह उसकी दुनिया में, जो कमल के फूल के निकट पड़ता होगा, वह उसको चुन लेगा। लेकिन मूढ़ तो लड़ जाएंगे, वे तो झगड़े पर खड़े हो जाएंगे।
तो इतना सख्त नहीं होना चाहिए, काव्य के साथ सख्त नहीं होना चाहिए। क्योंकि काव्य कोई गणित नहीं है। और इतने भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं।
अब जैसे कि, यह कभी सोचा है जैसा मामला है, कि जो धर्म रेगिस्तान में पैदा हुए, उनका परमात्मा बहुत क्रुद्ध है और बहुत बदला लेने वाला है। जो भी धर्म। जैसे कि यहूदी या मुसलमान, इनका परमात्मा बिलकुल आग की लपट है। जरा गड़बड़ की तो भून कर रख दूंगा, वह ऐसी घोषणा करता है। वह ऐसी घोषणा करता है कि भून कर रख दूंगा, उधेड़ दूंगा, गांव बर्बाद कर दूंगा, आग फैला दूंगा, वह ऐसी बातें करता है। यह कोई भगवान से लेना-देना नहीं है।
लेकिन वह जो आदमी रेगिस्तान में रहता है, उसका सबसे बड़ा भय यही है, वह इसी भाषा में सोच सकता है। वह इसी भाषा में सोच सकता है! वह कभी इस भाषा में नहीं सोचता जैसा कि समझो कि हिंदुस्तान का वेद का ऋषि है: अगर भगवान उसका नाराज होता है, तो वह जैसे बिजली कौंधती है, उस तरह प्रकट होता है। वहां रेगिस्तान में कहां कि बिजली कौंधेगी! तो उसका जो भगवान है, वह बिजली उत्तप्त है, वह डरवा देगा बिजली कौंधा कर। इतना पानी गिराएगा, इतना पुर लाएगा कि डूब जाओगे, बर्बाद हो जाओगे।
लेकिन अगर रेगिस्तान का भगवान कहे कि इतना पानी लाऊंगा, तो लोग बड़े प्रसन्न हो जाएंगे कि क्या बात कर रहे हैं आप! यह तो बहुत ही अच्छा। आप नाराज हो जाएं और पानी ले आएं।
तो भगवान तो कुछ कह नहीं रहा है, लेकिन रेगिस्तान में रहने वाले के अपने अनुभव ही प्रकट होंगे। अपने अनुभव ही प्रकट होंगे!
अब वह रेगिस्तान में जो भी लोग होंगे, उनकी अपनी दृष्टियां बन जाएंगी, अपनी धारणाएं बन जाएंगी। और उन दृष्टियों और धारणाओं के हिसाब से वह सारा का सारा सिंबल होगा, प्रतीक होगा, किताब होगी। एक जंगल में रहने वाली कौम की और किताब होगी, और प्रतीक होगा। नदी पर रहने वाली कौम का और प्रतीक होगा। समुद्र के किनारे रहने वाली का और प्रतीक होगा। और हम कभी इनमें तालमेल न बिठा पाएंगे। और मैं कहता हूं, तालमेल बिठाना भी क्यों। अगर इतनी समझ थोड़ी सी हो तो खयाल में आ जाएगा कि तालमेल बिठाने की कोई जरूरत नहीं है, कोई जरूरत नहीं है।
अभी मैं लुधियाना था। तो किसी व्यक्ति ने एक प्रश्न लिख कर भेजा। कुछ और प्रश्न पूछे थे, तो उसने एक प्रश्न पूछा था। उसने पूछा था कि ‘मैंने सुना है कि जो ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं, वे सागर की भांति शांत हो जाते हैं।’ तो मैंने उसको कहा कि मालूम होता है तुमने सागर नहीं देखा। तुमने सागर नहीं देखा। तो उसने कहा: मैंने नहीं देखा। तो मैंने कहा कि तुम सागर की भांति शांत! तुमको खयाल नहीं है सागर का। सागर और कहां शांति! वहां तो तुमुलनाद चलता है पूरे समय! वहां तो शोरगुल चल रहा है पूरे समय, वहां कहां शांति! तुम कहां से सीखे हो? उसने कहा: मैंने सागर देखा ही नहीं। मैंने कहा: तुम यह सागर की भांति शांति... तुमको थोड़ा सोच कर लिखना चाहिए। ऐसा नहीं हो जाता।
होता क्या है कि वे हमारे सारे प्रतीक तो हम जहां हैं, जो हमने जाना है, जो हमने देखा है, वहां से आते हैं। वहीं से आते हैं। और हमको खयाल में भी नहीं रहता, दूसरे प्रतीक का हमें खयाल में भी नहीं रहता। और वह उनकी वजह से बहुत भेद पड़ता है।
अनुभव वही है। अनुभव में कोई भेद नहीं है। अनुभव वही है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
इतने जोर से चल रहा है कि कोई नहीं चलता, लेकिन...
प्रश्न:
बहुत चल रहा है तो अच्छा लगता है न?
बहुत चल रहा है तो अच्छा लगता है न?
बहुत चल रहा है, लेकिन उसके चलने का विस्तार इतना बड़ा है कि कहीं खयाल में नहीं आता है। बहुत चल रहा है।
जिंदगी को गणित की भांति से... हम ऐसा सोचते हैं कि जिंदगी कोई गणित की भांति है, कोई सीधी रेखा है। यानी हम ऐसा सोचते हैं कि कभी एक रास्ते पर चले हैं, वह रास्ता कभी बाएं मुड़ता है, कभी दाएं मुड़ता है, तो हम कहते हैं, यह रास्ता कैसा है। पहले तो बाएं मुड़ा था, फिर दाएं मुड़ गया, अब फिर बाएं मुड़ने लगा, यह रास्ता कैसा है। एक रास्ता तो ऐसा होता है कि सीधा ही सीधा चला जाता है, कहीं मुड़ता ही नहीं। एक रास्ता ऐसा होता है कि हजार मोड़ लेता है, फिर भी कहीं जाता है। वह भी जाता है कहीं, सीधा रास्ता भी जाता है; यह भी जाता है। जिंदगी में कोई रास्ता सीधा नहीं है। हो भी नहीं सकता। और जिस दिन हो जाएगा, उस दिन जिंदगी झेलना मुश्किल हो जाएगी, बहुत घबड़ाने वाला हो जाएगा।
तुम एक कल्पना करो एक सीधे रास्ते की जो मुल्क के इस कोने से उस कोने तक आर-पार जाता हो। बिलकुल सीधा हो, जिस पर कोई मोड़ न हो। जिस पर सब दरख्त एक ही रंग के हों, एक ही ऊंचाई के हों, एक ही ढंग के हों। जिसमें सब तरफ एक से पेट्रोल पंप आते हों, और जिस पर दिन-रात गाड़ियां दौड़ती रहती हों... यह मैं इनसे कह रहा हूं... यह रास्ता मोनोटोनस और घबड़ाने वाला हो जाएगा। जिंदगी ने बड़ी तरकीबें की हैं कि तुम्हें कभी भी वह मोनोटोनस और घबड़ाने वाली न हो जाए। जिंदगी ने सब विरोधों का उपयोग किया है।
और मैं जो बात कर रहा हूं, मेरी दृष्टि में अब तक जिनको हम धार्मिक शिक्षक कहते रहे हैं, उन्होंने भी गणित के साथ तालमेल बिठालने की कोशिश की है, जिंदगी के साथ तालमेल बिठालने की कोशिश नहीं की है। तो अगर वे एक बात पकड़ लेते हैं, तो फिर उस संदर्भ की ही बात पकड़ते चले जाते हैं। उससे विपरीत और भिन्न का वे निषेध करते चले जाते हैं।
लेकिन मेरा मानना ऐसा है कि जिंदगी इतनी अदभुत है कि जिसका हम विरोध कर रहे हैं, वह भी किसी अर्थों में इससे जुड़ा ही होता है जिसका हम समर्थन कर रहे हैं। यानी जब हम यह कहते हैं कि कोई टेक्नीक नहीं है, हम कहते हैं कि कोई मेथड नहीं है, जब हम यह कहते हैं कि कोई विधि नहीं है पहुंचने की परमात्मा तक। अगर हम बहुत गौर से देखें, तो यह भी एक विधि है। यह भी एक विधि है। यह भी पहुंचने की एक विधि है। इसका नाम नो-मेथड होगा, इसका निगेटिव मेथड होगा।
इसलिए झेन फकीरों ने बहुत अच्छा किया। वे कहते हैं: एफर्टलेस एफर्ट। वे बिलकुल उलटे शब्दों का एक साथ उपयोग करते हैं। वे कहते है: एफर्टलेस एफर्ट, प्रयत्नरहित प्रयत्न। अब तुम कहोगे कि दोनों बातें कैसे कह रहे हो? तो वे कहते हैं कि दोनों कहना पड़ेंगी। क्योंकि बहुत लोग हैं जो कोई भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं और नहीं पहुंच गए हैं; और बहुत लोग हैं जो प्रयत्न कर रहे हैं और नहीं पहुंचे हैं, अब हम क्या करें?
अगर हम यह कहें कि कोई प्रयत्न की जरूरत नहीं है, तो लोग कहते हैं, फिर ठीक है, तो हम कर ही कहां रहे हैं प्रयत्न। तो हम पहुंच जाएंगे? तो वह झेन फकीर कहता है कि नहीं, तुम न पहुंचोगे। फिर एक आदमी कहता है कि हम तो बड़ा प्रयत्न कर रहे हैं। और वह झेन फकीर कहता है: तुम भी न पहुंचोगे।
तब सवाल उठता है कि फिर पहुंचेंगे कैसे? तो वह यह कहता है कि तुम ऐसा भी कर सकते हो, तुम एफर्ट ऐसे करो जैसे कि नहीं कर रहे हो। इसको समझना जरा मुश्किल हो जाएगा। वह यह कहता है कि तुम इस तरह चलो जैसे नहीं चल रहे हो। इस तरह चलो कि चलना भी हो रहा है और कोई नहीं भी चल रहा है। इस तरह बोलो कि जैसे नहीं बोल रहे हो। इधर बोलना भी हो रहा है और भीतर एक अबोला भी बैठा हुआ है। तुम इस तरह खाना खाओ जैसे कि उपवास कर रहे हो, या खाना भी खा रहे हो, लेकिन फिर खाने का कोई पागलपन भी नहीं है। मेरा मतलब समझे न तुम? तो जब विरोधी... और जिंदगी ऐसी ही है--कि यहां अगर तुम दोनों विरोधियों के बीच में कोई सेतु नहीं खोज पाए, तो तुम कहीं से भी भटक जाओगे।
गुरजिएफ का शिष्य भी भटकता है, क्योंकि वह यह मेथड को पकड़ लेता है। वह यह कहता है कि यह मेथड करेंगे तो सब हो जाएगा। जिंदगी इतनी बड़ी है कि किसी मेथड से नहीं हो सकता। कृष्णमूर्ति का भक्त भी भटकता है, वह कहता है कि मेथड पकड़ेंगे नहीं और सब हो जाएगा। जिंदगी इतनी बड़ी है कि मेथड को न पकड़ो तो भी कुछ नहीं होता।
और जो मैं कह रहा हूं, वह बुनियादी रूप से इन दोनों से भिन्न है। मैं यह कह रहा हूं कि मेथड को कुछ ऐसे पकड़ो जैसे कि मेथड न हो।
हेरिगेल गया जापान, तो वहां वह धनुर्विद्या सीखता था। तीन साल सीख कर परेशान हो गया। फिर उसके गुरु ने कहा कि तुम जाओ, तुमसे यह नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम थक गए, परेशान हो गए तुम्हारे साथ। हम तुमसे कहते हैं कि तीर इस तरह चलाओ जैसे कि नहीं चला रहे हो। और तुम जब भी तीर चलाते तो तुम चलाते हो। वह हेरिगेल कहता है, मेरा निशाना पूरा लगने लगा, निशाना एक नहीं चूकता, सौ प्रतिशत निशाने मारता हूं, अब और क्या चाहिए?
वह उसका फकीर गुरु कहता है कि निशाने से हमें मतलब नहीं, तुम एक न मारो; हमारा गोल निशाने पर नहीं, तुम पर है! वह यह कहता है कि हमारा निशाना तुम पर है। वह कहता है, जब मेरा निशाना ठीक लग जाता है, तो फिर मेरे पीछे क्यों पड़े हो? और गुरु कहता है कि मैं तुझे सर्टिफिकेट भी न दूंगा, तू बिलकुल असफल हो गया। तेरा निशाना लग जाता है यह सच है, लेकिन तेरी नजर निशाने पर है, हमारी नजर तुझ पर है। निशाना तो लग रहा है, तू चूका जा रहा है। हमें निशाने से क्या मतलब है। हम तो तुझे यह सिखाना चाहते हैं कि धनुष ऐसे भी चलाया जा सकता है कि जिसमें कि तू चलाने वाला नहीं है। धनुष चलता है। इट हैपंस। हैपनिंग होनी चाहिए। हां, धनुष उठ गया है, धनुष चढ़ गया है, धनुष चल गया है, तू बीच में क्यों आ जाता है बार-बार?
वह आदमी कहता है कि मैं नहीं आऊंगा तो धनुष उठेगा कैसे? धनुष चढ़ेगा कैसे? आप कैसी पागलपन की एब्सर्ड बातें करते हैं आप? मुझे तो आना ही पड़ेगा। और गुरु कहता है: जब तक तू आता रहेगा, तब तक यह डूइंग होगी, हैपनिंग न होगी। तब तक यह कृत्य होगा, एक घटना न होगी। और हमें तीर से कोई मतलब नहीं है। यह तो तू पश्र्चिम में ही सीख सकता था। तीर चलाना, निशाना लगाना कहीं भी सीख सकता था। हम तो कुछ और सिखाना चाहते थे। हम तो ऐसा सिखाना चाहते थे कि तीर चले, तुझसे चले--और फिर भी तू न हो, तेरी गैर-मौजूदगी हो, तेरी प्रेजेंस न हो। तू नहीं होना चाहिए, बीच-बीच में तू क्यों आ जाता है बार-बार? यह तीर काफी है।
आखिर वह घबड़ा गया। उसने कहा कि कम से कम इतना सर्टिफिकेट तो मुझे दे दें कि मैं जर्मनी में दिखा सकूं कि हां मैंने किसी से आर्चरी सीखी है। उसने कहा: मैं नहीं दे सकता। इतना ही लिख सकता हूं कि यह आदमी तीन साल मेरे पास था, लेकिन सफल नहीं हो सका। निशाना इसका लगने लगा, निशाने में बड़ा कुशल हो गया, लेकिन वह कुशलता नहीं आ पाई जिस कुशलता के लिए हम यहां बैठे हैं जानने के लिए।
आखिरी दिन आ गया। और उसने कहा कि कल मैं जाऊंगा, मुझे, जाते वक्त आऊंगा, आशीर्वाद दे दें और मैं चला जाऊंगा।
वह दूसरे दिन सुबह गया है। वह दूसरे विद्यार्थियों को वह गुरु सिखा रहा है तीर चलाना। वह जाकर बेंच पर बैठ गया। आज सीखने का कोई सवाल ही नहीं, आज आखिरी दिन है, आज विदा। क्षमा मांगने आया है कि भूल हुई, तीन साल आपको तकलीफ दी, कुछ हो नहीं सका। आज वह बेंच पर बैठा हुआ है चुपचाप। आज उसे चलाने का कोई सवाल नहीं है। आज वह है ही नहीं। आज वह एफर्ट जो चलाने का तीन साल से था और वह अहंकार कि मुझे चला कर जीत कर जाना ही है, सफल होकर जाना है, वह कोई भी नहीं है, आज सब टूट गया, सब खत्म हो गया। वह बेंच पर बैठा है चुपचाप। दूसरे शिष्य चला रहे हैं।
फिर वह एक शिष्य को उसका गुरु उठा कर तीर चलाना सिखाता है। वह कहता है, ऐसे चला। वह तीर उठाता है, वह तीर खींचता है, वह तीर चलता है, और अचानक उस हेरिगेल को दिखता है कि अरे, यह बात मुझे अब तक दिखाई क्यों न पड़ी? यह आदमी बिलकुल मौजूद नहीं है!
वह जाता है, वह गुरु के हाथ से धनुषबाण ले लेता है, खींचता है, चला देता है, उसका गुरु उसकी पीठ ठोकता है। सर्टिफिकेट लिख कर रखा था वह फाड़ देता है। वह कहता है, तुझसे हो गया! तीर चला, चलाया नहीं गया। तू आया ऐसे जैसे न हो, तू था ही नहीं। बस इतनी तो मेहनत थी। और मैं सोचता था शायद आखिरी-आखिरी दिन हो जाए। क्योंकि जब तक तू कोशिश में लगा है, तो कैसे होगा।
तो जब हम यह कहते हैं, जब मैं यह कहता हूं, मैं निरंतर दोनों की बात कर रहा हूं। मैं निरंतर दोनों की बात कर रहा हूं और इस खयाल से कर रहा हूं कि मैं यह कहता हूं कि मेथड जरूरी है और मेथड से कोई कभी पहुंचता नहीं। यह मैं इनसे कह रहा हूं कि मेथड जरूरी है और मेथड से कोई कभी पहुंचता नहीं। साधना जरूरी है और साधना से कोई कभी सिद्ध नहीं हुआ। अभ्यास जरूरी है और अभ्यास से तुम कुछ न पा सकोगे।
और जब मैं यह कहता हूं तो मेरा मतलब यह है कि अभ्यास करना, लेकिन अभ्यासी को छोड़ देना। जब मैं यह कहता हूं तो मैं यह कहता हूं, तुम प्रयास करना, लेकिन वह जो प्रयास की वजह से अहंकार भीतर घनीभूत हो जाता है वह न हो, तो प्रयासरहित प्रयास हो जाएगा, एफर्टलेस एफर्ट हो जाएगा। और इसलिए मुझे दोनों ही बातें करनी पड़ेंगी। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि दोनों बातें हमेशा हो चुकी हैं, लेकिन वह एक-एक तरफ से हुई हैं। वह कृष्णमूर्ति जो कह रहे हैं वह नया नहीं है।
जिंदगी को गणित की भांति से... हम ऐसा सोचते हैं कि जिंदगी कोई गणित की भांति है, कोई सीधी रेखा है। यानी हम ऐसा सोचते हैं कि कभी एक रास्ते पर चले हैं, वह रास्ता कभी बाएं मुड़ता है, कभी दाएं मुड़ता है, तो हम कहते हैं, यह रास्ता कैसा है। पहले तो बाएं मुड़ा था, फिर दाएं मुड़ गया, अब फिर बाएं मुड़ने लगा, यह रास्ता कैसा है। एक रास्ता तो ऐसा होता है कि सीधा ही सीधा चला जाता है, कहीं मुड़ता ही नहीं। एक रास्ता ऐसा होता है कि हजार मोड़ लेता है, फिर भी कहीं जाता है। वह भी जाता है कहीं, सीधा रास्ता भी जाता है; यह भी जाता है। जिंदगी में कोई रास्ता सीधा नहीं है। हो भी नहीं सकता। और जिस दिन हो जाएगा, उस दिन जिंदगी झेलना मुश्किल हो जाएगी, बहुत घबड़ाने वाला हो जाएगा।
तुम एक कल्पना करो एक सीधे रास्ते की जो मुल्क के इस कोने से उस कोने तक आर-पार जाता हो। बिलकुल सीधा हो, जिस पर कोई मोड़ न हो। जिस पर सब दरख्त एक ही रंग के हों, एक ही ऊंचाई के हों, एक ही ढंग के हों। जिसमें सब तरफ एक से पेट्रोल पंप आते हों, और जिस पर दिन-रात गाड़ियां दौड़ती रहती हों... यह मैं इनसे कह रहा हूं... यह रास्ता मोनोटोनस और घबड़ाने वाला हो जाएगा। जिंदगी ने बड़ी तरकीबें की हैं कि तुम्हें कभी भी वह मोनोटोनस और घबड़ाने वाली न हो जाए। जिंदगी ने सब विरोधों का उपयोग किया है।
और मैं जो बात कर रहा हूं, मेरी दृष्टि में अब तक जिनको हम धार्मिक शिक्षक कहते रहे हैं, उन्होंने भी गणित के साथ तालमेल बिठालने की कोशिश की है, जिंदगी के साथ तालमेल बिठालने की कोशिश नहीं की है। तो अगर वे एक बात पकड़ लेते हैं, तो फिर उस संदर्भ की ही बात पकड़ते चले जाते हैं। उससे विपरीत और भिन्न का वे निषेध करते चले जाते हैं।
लेकिन मेरा मानना ऐसा है कि जिंदगी इतनी अदभुत है कि जिसका हम विरोध कर रहे हैं, वह भी किसी अर्थों में इससे जुड़ा ही होता है जिसका हम समर्थन कर रहे हैं। यानी जब हम यह कहते हैं कि कोई टेक्नीक नहीं है, हम कहते हैं कि कोई मेथड नहीं है, जब हम यह कहते हैं कि कोई विधि नहीं है पहुंचने की परमात्मा तक। अगर हम बहुत गौर से देखें, तो यह भी एक विधि है। यह भी एक विधि है। यह भी पहुंचने की एक विधि है। इसका नाम नो-मेथड होगा, इसका निगेटिव मेथड होगा।
इसलिए झेन फकीरों ने बहुत अच्छा किया। वे कहते हैं: एफर्टलेस एफर्ट। वे बिलकुल उलटे शब्दों का एक साथ उपयोग करते हैं। वे कहते है: एफर्टलेस एफर्ट, प्रयत्नरहित प्रयत्न। अब तुम कहोगे कि दोनों बातें कैसे कह रहे हो? तो वे कहते हैं कि दोनों कहना पड़ेंगी। क्योंकि बहुत लोग हैं जो कोई भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं और नहीं पहुंच गए हैं; और बहुत लोग हैं जो प्रयत्न कर रहे हैं और नहीं पहुंचे हैं, अब हम क्या करें?
अगर हम यह कहें कि कोई प्रयत्न की जरूरत नहीं है, तो लोग कहते हैं, फिर ठीक है, तो हम कर ही कहां रहे हैं प्रयत्न। तो हम पहुंच जाएंगे? तो वह झेन फकीर कहता है कि नहीं, तुम न पहुंचोगे। फिर एक आदमी कहता है कि हम तो बड़ा प्रयत्न कर रहे हैं। और वह झेन फकीर कहता है: तुम भी न पहुंचोगे।
तब सवाल उठता है कि फिर पहुंचेंगे कैसे? तो वह यह कहता है कि तुम ऐसा भी कर सकते हो, तुम एफर्ट ऐसे करो जैसे कि नहीं कर रहे हो। इसको समझना जरा मुश्किल हो जाएगा। वह यह कहता है कि तुम इस तरह चलो जैसे नहीं चल रहे हो। इस तरह चलो कि चलना भी हो रहा है और कोई नहीं भी चल रहा है। इस तरह बोलो कि जैसे नहीं बोल रहे हो। इधर बोलना भी हो रहा है और भीतर एक अबोला भी बैठा हुआ है। तुम इस तरह खाना खाओ जैसे कि उपवास कर रहे हो, या खाना भी खा रहे हो, लेकिन फिर खाने का कोई पागलपन भी नहीं है। मेरा मतलब समझे न तुम? तो जब विरोधी... और जिंदगी ऐसी ही है--कि यहां अगर तुम दोनों विरोधियों के बीच में कोई सेतु नहीं खोज पाए, तो तुम कहीं से भी भटक जाओगे।
गुरजिएफ का शिष्य भी भटकता है, क्योंकि वह यह मेथड को पकड़ लेता है। वह यह कहता है कि यह मेथड करेंगे तो सब हो जाएगा। जिंदगी इतनी बड़ी है कि किसी मेथड से नहीं हो सकता। कृष्णमूर्ति का भक्त भी भटकता है, वह कहता है कि मेथड पकड़ेंगे नहीं और सब हो जाएगा। जिंदगी इतनी बड़ी है कि मेथड को न पकड़ो तो भी कुछ नहीं होता।
और जो मैं कह रहा हूं, वह बुनियादी रूप से इन दोनों से भिन्न है। मैं यह कह रहा हूं कि मेथड को कुछ ऐसे पकड़ो जैसे कि मेथड न हो।
हेरिगेल गया जापान, तो वहां वह धनुर्विद्या सीखता था। तीन साल सीख कर परेशान हो गया। फिर उसके गुरु ने कहा कि तुम जाओ, तुमसे यह नहीं हो सकेगा। क्योंकि हम थक गए, परेशान हो गए तुम्हारे साथ। हम तुमसे कहते हैं कि तीर इस तरह चलाओ जैसे कि नहीं चला रहे हो। और तुम जब भी तीर चलाते तो तुम चलाते हो। वह हेरिगेल कहता है, मेरा निशाना पूरा लगने लगा, निशाना एक नहीं चूकता, सौ प्रतिशत निशाने मारता हूं, अब और क्या चाहिए?
वह उसका फकीर गुरु कहता है कि निशाने से हमें मतलब नहीं, तुम एक न मारो; हमारा गोल निशाने पर नहीं, तुम पर है! वह यह कहता है कि हमारा निशाना तुम पर है। वह कहता है, जब मेरा निशाना ठीक लग जाता है, तो फिर मेरे पीछे क्यों पड़े हो? और गुरु कहता है कि मैं तुझे सर्टिफिकेट भी न दूंगा, तू बिलकुल असफल हो गया। तेरा निशाना लग जाता है यह सच है, लेकिन तेरी नजर निशाने पर है, हमारी नजर तुझ पर है। निशाना तो लग रहा है, तू चूका जा रहा है। हमें निशाने से क्या मतलब है। हम तो तुझे यह सिखाना चाहते हैं कि धनुष ऐसे भी चलाया जा सकता है कि जिसमें कि तू चलाने वाला नहीं है। धनुष चलता है। इट हैपंस। हैपनिंग होनी चाहिए। हां, धनुष उठ गया है, धनुष चढ़ गया है, धनुष चल गया है, तू बीच में क्यों आ जाता है बार-बार?
वह आदमी कहता है कि मैं नहीं आऊंगा तो धनुष उठेगा कैसे? धनुष चढ़ेगा कैसे? आप कैसी पागलपन की एब्सर्ड बातें करते हैं आप? मुझे तो आना ही पड़ेगा। और गुरु कहता है: जब तक तू आता रहेगा, तब तक यह डूइंग होगी, हैपनिंग न होगी। तब तक यह कृत्य होगा, एक घटना न होगी। और हमें तीर से कोई मतलब नहीं है। यह तो तू पश्र्चिम में ही सीख सकता था। तीर चलाना, निशाना लगाना कहीं भी सीख सकता था। हम तो कुछ और सिखाना चाहते थे। हम तो ऐसा सिखाना चाहते थे कि तीर चले, तुझसे चले--और फिर भी तू न हो, तेरी गैर-मौजूदगी हो, तेरी प्रेजेंस न हो। तू नहीं होना चाहिए, बीच-बीच में तू क्यों आ जाता है बार-बार? यह तीर काफी है।
आखिर वह घबड़ा गया। उसने कहा कि कम से कम इतना सर्टिफिकेट तो मुझे दे दें कि मैं जर्मनी में दिखा सकूं कि हां मैंने किसी से आर्चरी सीखी है। उसने कहा: मैं नहीं दे सकता। इतना ही लिख सकता हूं कि यह आदमी तीन साल मेरे पास था, लेकिन सफल नहीं हो सका। निशाना इसका लगने लगा, निशाने में बड़ा कुशल हो गया, लेकिन वह कुशलता नहीं आ पाई जिस कुशलता के लिए हम यहां बैठे हैं जानने के लिए।
आखिरी दिन आ गया। और उसने कहा कि कल मैं जाऊंगा, मुझे, जाते वक्त आऊंगा, आशीर्वाद दे दें और मैं चला जाऊंगा।
वह दूसरे दिन सुबह गया है। वह दूसरे विद्यार्थियों को वह गुरु सिखा रहा है तीर चलाना। वह जाकर बेंच पर बैठ गया। आज सीखने का कोई सवाल ही नहीं, आज आखिरी दिन है, आज विदा। क्षमा मांगने आया है कि भूल हुई, तीन साल आपको तकलीफ दी, कुछ हो नहीं सका। आज वह बेंच पर बैठा हुआ है चुपचाप। आज उसे चलाने का कोई सवाल नहीं है। आज वह है ही नहीं। आज वह एफर्ट जो चलाने का तीन साल से था और वह अहंकार कि मुझे चला कर जीत कर जाना ही है, सफल होकर जाना है, वह कोई भी नहीं है, आज सब टूट गया, सब खत्म हो गया। वह बेंच पर बैठा है चुपचाप। दूसरे शिष्य चला रहे हैं।
फिर वह एक शिष्य को उसका गुरु उठा कर तीर चलाना सिखाता है। वह कहता है, ऐसे चला। वह तीर उठाता है, वह तीर खींचता है, वह तीर चलता है, और अचानक उस हेरिगेल को दिखता है कि अरे, यह बात मुझे अब तक दिखाई क्यों न पड़ी? यह आदमी बिलकुल मौजूद नहीं है!
वह जाता है, वह गुरु के हाथ से धनुषबाण ले लेता है, खींचता है, चला देता है, उसका गुरु उसकी पीठ ठोकता है। सर्टिफिकेट लिख कर रखा था वह फाड़ देता है। वह कहता है, तुझसे हो गया! तीर चला, चलाया नहीं गया। तू आया ऐसे जैसे न हो, तू था ही नहीं। बस इतनी तो मेहनत थी। और मैं सोचता था शायद आखिरी-आखिरी दिन हो जाए। क्योंकि जब तक तू कोशिश में लगा है, तो कैसे होगा।
तो जब हम यह कहते हैं, जब मैं यह कहता हूं, मैं निरंतर दोनों की बात कर रहा हूं। मैं निरंतर दोनों की बात कर रहा हूं और इस खयाल से कर रहा हूं कि मैं यह कहता हूं कि मेथड जरूरी है और मेथड से कोई कभी पहुंचता नहीं। यह मैं इनसे कह रहा हूं कि मेथड जरूरी है और मेथड से कोई कभी पहुंचता नहीं। साधना जरूरी है और साधना से कोई कभी सिद्ध नहीं हुआ। अभ्यास जरूरी है और अभ्यास से तुम कुछ न पा सकोगे।
और जब मैं यह कहता हूं तो मेरा मतलब यह है कि अभ्यास करना, लेकिन अभ्यासी को छोड़ देना। जब मैं यह कहता हूं तो मैं यह कहता हूं, तुम प्रयास करना, लेकिन वह जो प्रयास की वजह से अहंकार भीतर घनीभूत हो जाता है वह न हो, तो प्रयासरहित प्रयास हो जाएगा, एफर्टलेस एफर्ट हो जाएगा। और इसलिए मुझे दोनों ही बातें करनी पड़ेंगी। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि दोनों बातें हमेशा हो चुकी हैं, लेकिन वह एक-एक तरफ से हुई हैं। वह कृष्णमूर्ति जो कह रहे हैं वह नया नहीं है।
प्रश्न:
और बुद्ध का विचार वही है।
हां, बुद्ध का भी वही है। चुकता वेदांत वही है। वह यही कहता है कुछ करने को है ही नहीं। सिर्फ जानने को है। इसलिए वेदांत योग को नहीं मानता। कहता है, यह क्या नासमझियां कर रहा है, उलटा-सीधा यह कर रहा है, इससे कोई मतलब नहीं है। सिर्फ ज्ञान काफी है। जानना काफी है। करना कुछ भी नहीं है।
और बुद्ध का विचार वही है।
हां, बुद्ध का भी वही है। चुकता वेदांत वही है। वह यही कहता है कुछ करने को है ही नहीं। सिर्फ जानने को है। इसलिए वेदांत योग को नहीं मानता। कहता है, यह क्या नासमझियां कर रहा है, उलटा-सीधा यह कर रहा है, इससे कोई मतलब नहीं है। सिर्फ ज्ञान काफी है। जानना काफी है। करना कुछ भी नहीं है।
यह भी प्रयास हो चुका है। यह लंबा प्रयास है। उपनिषद से लेकर अब तक निरंतर चल रहा है।
प्रश्न:
बुद्ध ने यह सब करके छोड़ दिया...
बुद्ध ने यह सब करके छोड़ दिया...
हां-हां। बुद्ध दोनों प्रक्रियाओं में गए। वे पहले... और दूसरी तरफ भी प्रयास चल रहा है। जैसे झेन है, योग है, पतंजलि हैं, ये सबके सब प्रयास में लगे हैं कि मेथड से होगा, यह करेंगे तो होगा। बुद्ध ने दोनों किया। पर वह उनकी तरफ से। मेथड से पहले यही समझ में आती है बात कि कुछ करेंगे तो ही होगा। यही समझ में आती है पहले बात। नहीं करेंगे तो कैसे होगा। यह उन्होंने कोशिश करके देखा, नहीं हुआ। और जो हेरिगेल के साथ हुआ वही बुद्ध के साथ हुआ। वे सब कोशिश करके थक गए और हार गए, और एक दिन उन्होंने तय किया कि अब नहीं होता है तो छोड़ो, जाने दो, समझो कि नहीं होगा। और उसी रात हुआ। वह टेंशन भी चला गया न--करने वाला भी। छह-सात साल में पहली दफा सोए वे। छह-सात साल में सोए ही नहीं, क्योंकि वह बेचैनी कि हो हो हो हो हो हो, वह पकड़े रही। उस रात वे सोए, उन्होंने कहा कि नहीं होता, जाने दो।
और न होने की घटना भी उनको इस तरह खयाल आई कि वह निरंजना में... मैं भी था उस नदी के किनारे पर जहां वे नहाने उतरे--बोधगया के पास जो नदी बहती है, निरंजना। वे उसमें स्नान करने उतरे। लेकिन इतने कृशकाय हो गए हैं तपश्र्चर्या कर-कर के--कि नदी की धार तेज है और वे एक जड़ को पकड़ कर वृक्ष की रुके हैं, लेकिन चढ़ते नहीं बनता।
छह साल अपने को जो भी कष्ट दिए जा सकते हैं मेथड के नाम पर, वे उन्होंने दिए। उपवास किया जा सकता है, शीर्षासन किया जा सकता है, आसन, जो भी शरीर को किया जा सकता था वह सब कर लिया। और शरीर ऐसा कृश हो गया है कि वह चढ़ते नहीं बनता।
अचानक उन्हें खयाल होता है कि एक साधारण सी नदी निरंजना, इसको मैं पार नहीं कर पाता; साधारण सा घाट निरंजना का इसको मैं चढ़ नहीं पाता, तो इतने बड़े जीवन की नदी और इतने बड़े जीवन के घाट! अपने बस के बाहर है। इतनी कम शक्ति लेकर यह न होगा। यह नहीं होगा। यह नहीं हो सकता है।
आकर वृक्ष के नीचे टिक कर बैठ गए हैं वे, और आज उन्होंने सोच लिया है कि अब यह करना भी छोड़ देते हैं, यह पाना भी छोड़ देते हैं। अब यह नहीं होगा। यह बात खत्म हो गई। शायद यह हो ही नहीं सकता है। उस रात वे शांति से सो गए। क्योंकि अब करने को कुछ न बचा था।
उस क्षण की आप कल्पना करिए जब करने को ही कुछ न बचे। तब भी आप तो होंगे ही! एक आदमी धन कमा रहा है, वह कुछ कर रहा है। फिर दिन धन छोड़ देता है, वह संन्यासी हो जाता है, वह कहता है, हम भगवान को कमाएंगे, वह भी कुछ कर रहा है। अब वह चिंता जारी है, उससे भी ज्यादा है। क्योंकि धन तो कमाया जा सकता है, ऐसा कोई कठिन नहीं है मामला। लेकिन यह धर्म के कमाने का कुछ दिखाई नहीं पड़ता कहां कमाया जाए।
अब वे भी हार गए हैं। जिसको कहना चाहिए बुद्ध टोटल फ्रस्ट्रेशन में हैं उस जगह। पहला फ्रस्ट्रेशन टोटल नहीं था, आधा था। यह था कि धन-वन सब बेकार हो गया। लेकिन अभी परमात्मा पाया जा सकता है, अभी आत्मा पाई जा सकती है, मोक्ष पाया जा सकता है। वह फ्रस्ट्रेशन आधा था। अभी आधा पाने की आशा थी। अभी अहंकार आधा मरा था, आधा जिंदा था। वह अभी कह रहा था कि यह पा लेंगे, इसमें कुछ नहीं है, इसमें जान भी नहीं है, हम दूसरा पा लेंगे। आज वह भी मर गया है। यानी एक अर्थ में गौतम सिद्धार्थ नाम का आदमी जो था वह निरंजना के घाट को पार करते वक्त मर गया। क्योंकि अब उसको कुछ भी न बचा पाने को। और आदमी बचता है पाने की आशा में। वह जो होप की अचीव है, वही हमारा अस्तित्व है कि पा लेंगे, पा लेंगे, पा लेंगे, पा लेंगे। क्योंकि उसको पाने में ही लगता है कि हम हैं, हम हैं, हम हैं। जितना पा लेते हैं उतने ज्यादा हैं, जितना नहीं पाते हैं उतने कम हैं। लेकिन उस दिन बात ही खत्म हो गई। इस आदमी का मामला टोटल ही हो गया।
वे वृक्ष के नीचे टिक कर बैठ गए हैं। एक गांव की लड़की आई है, वह खीर चढ़ाने आई है उस वृक्ष को। वह वृक्ष पीपल का है और वह देवता का वृक्ष माना जाता है। तो वह लड़की आई है सांझ को, सूरज ढल गया है और पूर्णिमा का चांद निकला है। और उसमें यह कृशकाय, परम थका हुआ, अल्टीमेटली फ्रस्टे्रटेड आदमी बैठा है। यह मूर्तिवत बैठा है। क्योंकि हाथ-पैर भी हिलाने का मन नहीं रहा। जब कुछ करने से नहीं हो सकता है, सब बात ही खत्म हो गई। अहंकार ही खत्म हो गया। यह मूर्तिवत टिका बैठा है, कृशकाय, पीला। रात चांद की रोशनी में उसे ऐसा लगा है कि जैसे पीपल का देवता प्रकट हुआ! वह तो खीर चढ़ाने आई है पीपल के देवता को।
कोई दूसरा दिन होता तो वे कह देते कि नहीं लूंगा; क्योंकि उनका तो नियम था इतना लेना है, इतने वक्त लेना है। अब कोई नियम न रहा आज। अब यह रात भी है, दिन भी है। कोई दूसरा दिन होता तो पूछते की तू कौन है? आज वे यह भी नहीं पूछते हैं कि वह शूद्र लड़की है, कौन है, क्या है? वह क्या लाई है? वह खाने योग्य है कि नहीं है? अब कोई साधना-संयम नहीं है।
और लड़की थाली रख देती है खीर की और कहती है कि इसे स्वीकार करें! वह अस्वीकार करने का भी मन नहीं रह गया है। तो वे चुपचाप उस खीर को ले लेते हैं। अस्वीकार करने का भी नहीं है, स्वीकार... वे कुछ बोलते ही नहीं हैं, वे चुपचाप उस खीर को ले लेते हैं। भूख है; थके हैं; खीर ले लेते हैं और सो जाते हैं। पहली दफा सोए हैं वे कई वर्षों के बाद। कोई पांच बजे सुबह उनकी नींद खुलती है, आंख खुलती है, आखिरी तारा डूब रहा है... और उन्हें मिल गया जो मिलना था!
वह इस क्षण में आकर मिला है कि वे टोटल रिलैक्स थे, कुछ कर नहीं रहे थे।
लेकिन यह स्थिति भी आ सकी है--वह करने की वजह से।
और न होने की घटना भी उनको इस तरह खयाल आई कि वह निरंजना में... मैं भी था उस नदी के किनारे पर जहां वे नहाने उतरे--बोधगया के पास जो नदी बहती है, निरंजना। वे उसमें स्नान करने उतरे। लेकिन इतने कृशकाय हो गए हैं तपश्र्चर्या कर-कर के--कि नदी की धार तेज है और वे एक जड़ को पकड़ कर वृक्ष की रुके हैं, लेकिन चढ़ते नहीं बनता।
छह साल अपने को जो भी कष्ट दिए जा सकते हैं मेथड के नाम पर, वे उन्होंने दिए। उपवास किया जा सकता है, शीर्षासन किया जा सकता है, आसन, जो भी शरीर को किया जा सकता था वह सब कर लिया। और शरीर ऐसा कृश हो गया है कि वह चढ़ते नहीं बनता।
अचानक उन्हें खयाल होता है कि एक साधारण सी नदी निरंजना, इसको मैं पार नहीं कर पाता; साधारण सा घाट निरंजना का इसको मैं चढ़ नहीं पाता, तो इतने बड़े जीवन की नदी और इतने बड़े जीवन के घाट! अपने बस के बाहर है। इतनी कम शक्ति लेकर यह न होगा। यह नहीं होगा। यह नहीं हो सकता है।
आकर वृक्ष के नीचे टिक कर बैठ गए हैं वे, और आज उन्होंने सोच लिया है कि अब यह करना भी छोड़ देते हैं, यह पाना भी छोड़ देते हैं। अब यह नहीं होगा। यह बात खत्म हो गई। शायद यह हो ही नहीं सकता है। उस रात वे शांति से सो गए। क्योंकि अब करने को कुछ न बचा था।
उस क्षण की आप कल्पना करिए जब करने को ही कुछ न बचे। तब भी आप तो होंगे ही! एक आदमी धन कमा रहा है, वह कुछ कर रहा है। फिर दिन धन छोड़ देता है, वह संन्यासी हो जाता है, वह कहता है, हम भगवान को कमाएंगे, वह भी कुछ कर रहा है। अब वह चिंता जारी है, उससे भी ज्यादा है। क्योंकि धन तो कमाया जा सकता है, ऐसा कोई कठिन नहीं है मामला। लेकिन यह धर्म के कमाने का कुछ दिखाई नहीं पड़ता कहां कमाया जाए।
अब वे भी हार गए हैं। जिसको कहना चाहिए बुद्ध टोटल फ्रस्ट्रेशन में हैं उस जगह। पहला फ्रस्ट्रेशन टोटल नहीं था, आधा था। यह था कि धन-वन सब बेकार हो गया। लेकिन अभी परमात्मा पाया जा सकता है, अभी आत्मा पाई जा सकती है, मोक्ष पाया जा सकता है। वह फ्रस्ट्रेशन आधा था। अभी आधा पाने की आशा थी। अभी अहंकार आधा मरा था, आधा जिंदा था। वह अभी कह रहा था कि यह पा लेंगे, इसमें कुछ नहीं है, इसमें जान भी नहीं है, हम दूसरा पा लेंगे। आज वह भी मर गया है। यानी एक अर्थ में गौतम सिद्धार्थ नाम का आदमी जो था वह निरंजना के घाट को पार करते वक्त मर गया। क्योंकि अब उसको कुछ भी न बचा पाने को। और आदमी बचता है पाने की आशा में। वह जो होप की अचीव है, वही हमारा अस्तित्व है कि पा लेंगे, पा लेंगे, पा लेंगे, पा लेंगे। क्योंकि उसको पाने में ही लगता है कि हम हैं, हम हैं, हम हैं। जितना पा लेते हैं उतने ज्यादा हैं, जितना नहीं पाते हैं उतने कम हैं। लेकिन उस दिन बात ही खत्म हो गई। इस आदमी का मामला टोटल ही हो गया।
वे वृक्ष के नीचे टिक कर बैठ गए हैं। एक गांव की लड़की आई है, वह खीर चढ़ाने आई है उस वृक्ष को। वह वृक्ष पीपल का है और वह देवता का वृक्ष माना जाता है। तो वह लड़की आई है सांझ को, सूरज ढल गया है और पूर्णिमा का चांद निकला है। और उसमें यह कृशकाय, परम थका हुआ, अल्टीमेटली फ्रस्टे्रटेड आदमी बैठा है। यह मूर्तिवत बैठा है। क्योंकि हाथ-पैर भी हिलाने का मन नहीं रहा। जब कुछ करने से नहीं हो सकता है, सब बात ही खत्म हो गई। अहंकार ही खत्म हो गया। यह मूर्तिवत टिका बैठा है, कृशकाय, पीला। रात चांद की रोशनी में उसे ऐसा लगा है कि जैसे पीपल का देवता प्रकट हुआ! वह तो खीर चढ़ाने आई है पीपल के देवता को।
कोई दूसरा दिन होता तो वे कह देते कि नहीं लूंगा; क्योंकि उनका तो नियम था इतना लेना है, इतने वक्त लेना है। अब कोई नियम न रहा आज। अब यह रात भी है, दिन भी है। कोई दूसरा दिन होता तो पूछते की तू कौन है? आज वे यह भी नहीं पूछते हैं कि वह शूद्र लड़की है, कौन है, क्या है? वह क्या लाई है? वह खाने योग्य है कि नहीं है? अब कोई साधना-संयम नहीं है।
और लड़की थाली रख देती है खीर की और कहती है कि इसे स्वीकार करें! वह अस्वीकार करने का भी मन नहीं रह गया है। तो वे चुपचाप उस खीर को ले लेते हैं। अस्वीकार करने का भी नहीं है, स्वीकार... वे कुछ बोलते ही नहीं हैं, वे चुपचाप उस खीर को ले लेते हैं। भूख है; थके हैं; खीर ले लेते हैं और सो जाते हैं। पहली दफा सोए हैं वे कई वर्षों के बाद। कोई पांच बजे सुबह उनकी नींद खुलती है, आंख खुलती है, आखिरी तारा डूब रहा है... और उन्हें मिल गया जो मिलना था!
वह इस क्षण में आकर मिला है कि वे टोटल रिलैक्स थे, कुछ कर नहीं रहे थे।
लेकिन यह स्थिति भी आ सकी है--वह करने की वजह से।
प्रश्न:
तो सारी मेहनत थकाने के लिए है?
तो सारी मेहनत थकाने के लिए है?
हां। अगर मेरा मतलब समझोगे--तो यह स्थिति तुम्हारी नहीं आ जाएगी कि तुम आज जाकर एक पीपल के वृक्ष के नीचे लेट जाओ और किसी से खीर बुलवा लो और खीर लेकर आराम करो, सुबह पांच बजे आंख खोलो और कहो कि हो जाए, तो नहीं होगा। क्योंकि वह जो पीछे जो हुआ है, वह जो मेथड हार गया है, तो नो-मेथड जीता है।
तो मैं जो सारी बातें करता हूं, मैं मेथड की पूरी बात करता हूं और इसको जान कर कि तुम मेथड से जिस दिन हारोगे उस दिन तुम्हारा अहंकार भी टूटेगा, उस दिन घटना घट सकती है। घटेगी तो तभी जब मेथड न रह जाएगा, उसके पहले तो नहीं घट सकती है।
तो मैं जो सारी बातें करता हूं, मैं मेथड की पूरी बात करता हूं और इसको जान कर कि तुम मेथड से जिस दिन हारोगे उस दिन तुम्हारा अहंकार भी टूटेगा, उस दिन घटना घट सकती है। घटेगी तो तभी जब मेथड न रह जाएगा, उसके पहले तो नहीं घट सकती है।
प्रश्न:
लेकिन ये थकाने की विधियां...
बिलकुल ही। हो टोटल। लेकिन होता क्या है कि तुम मुझसे थकोगे तो इनके पास जाओगे; इनसे थकोगे तो इनके पास जाओगे; इनसे थकोगे तो उनके पास जाओगे। यह मेथड से थकोगे दूसरा मेथड पकड़ोगे; उससे थकोगे तीसरा पकड़ोगे। लेकिन उपाय नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा कि मेथड ए़ज सच से तुम थक जाओगे। गुरु ए़ज सच से थक जाओगे। अचानक तुम पाओगे कोई नहीं दे सकता, कुछ नहीं मिल सकता, कुछ है ही नहीं पाने को, मैं ही नहीं हूं, क्या पाना, किसको पाना, यह जो परम विफलता। समझ रहे हो न? परम विफलता, अल्टीमेट फेल्योर जिस दिन तुम्हें आएगा, उसके बाद ही अल्टीमेट सक्सेस है। उसके पहले नहीं है। उसके पहले नहीं है।
लेकिन ये थकाने की विधियां...
बिलकुल ही। हो टोटल। लेकिन होता क्या है कि तुम मुझसे थकोगे तो इनके पास जाओगे; इनसे थकोगे तो इनके पास जाओगे; इनसे थकोगे तो उनके पास जाओगे। यह मेथड से थकोगे दूसरा मेथड पकड़ोगे; उससे थकोगे तीसरा पकड़ोगे। लेकिन उपाय नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा कि मेथड ए़ज सच से तुम थक जाओगे। गुरु ए़ज सच से थक जाओगे। अचानक तुम पाओगे कोई नहीं दे सकता, कुछ नहीं मिल सकता, कुछ है ही नहीं पाने को, मैं ही नहीं हूं, क्या पाना, किसको पाना, यह जो परम विफलता। समझ रहे हो न? परम विफलता, अल्टीमेट फेल्योर जिस दिन तुम्हें आएगा, उसके बाद ही अल्टीमेट सक्सेस है। उसके पहले नहीं है। उसके पहले नहीं है।
लेकिन क्या करो, यह दोनों विरोध को एक साथ ले जाना पड़ेगा। इधर मैं मेथड की बात करता रहूंगा और पूरे वक्त मेथड को इनकार करता रहूंगा। ऐसा ही जारी रहेगा। पूरे वक्त तुमसे कहूंगा, यह करो, यह करो, यह करो और पूरे वक्त यह कहूंगा कि करने से कभी कुछ हुआ नहीं, कभी कुछ होगा नहीं। तब मुझे समझने में कठिनाई हो जाती है।
गुरजिएफ को समझना आसान है, क्योंकि गुरजिएफ कहता है, मेथड से होगा। कृष्णमूर्ति को भी समझना आसान, क्योंकि वह कहता है, मेथड से नहीं होगा। मुझे समझने में थोड़ी कठिनाई है, क्योंकि मैं कहता हूं: मेथड करना पड़ेगा और मेथड से होगा नहीं।
गुरजिएफ को समझना आसान है, क्योंकि गुरजिएफ कहता है, मेथड से होगा। कृष्णमूर्ति को भी समझना आसान, क्योंकि वह कहता है, मेथड से नहीं होगा। मुझे समझने में थोड़ी कठिनाई है, क्योंकि मैं कहता हूं: मेथड करना पड़ेगा और मेथड से होगा नहीं।
प्रश्न:
एक्चुअली आपकी भाषा...
एक्चुअली आपकी भाषा...
हां, इसलिए थोड़ी सी दिक्कत आने वाली है, थोड़ी सी दिक्कत आने वाली है। लेकिन ऐसा ही है करोगे क्या। ऐसा ही है करोगे क्या।
प्रश्न:
आइ डोंट अंडरस्टैंड वॉट इ़ज दि डिफरेंस?
आइ डोंट अंडरस्टैंड वॉट इ़ज दि डिफरेंस?
हां, दोनों में फर्क है। विचाररहित हो सकता है; विचारशून्य नहीं। विचाररहित हो सकता है कभी-कभी। वह विचाररहित होने का कुल कारण इतना है कि अगर... एक तरह की नंबनेस भी है माइंड की। यह फर्क समझो।
तुम बैठे हुए हो, चल नहीं रहे हो--तुम भी नहीं चल रहे हो; और एक दूसरा व्यक्ति बैठा है, वह भी नहीं चल रहा है; लेकिन वह पैरालाइज्ड है--वह भी नहीं चल रहा है। और दोनों तुम बैठे हुए हो। लेकिन मैं कहूंगा, वह बैठा हुआ नहीं है, उसको बैठना पड़ रहा है। तुम बैठे हुए हो। वह पैरालाइज्ड है सिर्फ। हालांकि दोनों के पैर एक से मालूम पड़ रहे हैं, वह भी बैठा है, तुम भी बैठे हो। कोई नहीं देख कर कह सकता कि कौन बैठा है। तुम बैठे हो, क्योंकि तुम चल सकते हो। वह चल ही नहीं सकता, इसलिए बैठने का भी क्या मतलब है कहने का। मेरा मतलब समझ रहे हो न? उसको मैं बैठा हुआ भी नहीं कहूंगा। वह सिर्फ नहीं चल सक रहा है।
तो मस्तिष्क में एक ही स्थितियां जो हैं, जब कि सिर्फ तुम्हारा ब्रेन जो है--ब्रेन, माइंड नहीं। जब तुम्हारा ब्रेन थक जाता है और एक तरह की नंबनेस पकड़ लेती है। जैसे किसी की मृत्यु हो गई है और तुम इतने थक गए कि तुम पड़े रह गए, तुम्हारा ब्रेन काम ही नहीं कर पा रहा, इसलिए तुम काम नहीं कर रहे हो। इसलिए नहीं कि एक न-काम करने की स्थिति में पहुंच गए हो तुम। इसका मतलब यह है कि ब्रेन सिर्फ पैरालाइज्ड हो गया है। कई दफे हो जाता है--किसी दुख में, किसी बड़ी खुशी में, किसी भी ऐसे एक्सीडेंट में जो अनपेक्षित है, जिसका तुम्हें कभी पता नहीं था और हो गया।
अभी यहां एक कुत्ता आ जाए और तुमसे कहे कि कहो प्रवीण, क्या हाल है? एकदम तुम्हारा ब्रेन रुक जाएगा, नंब हो जाएगा। क्योंकि यह तुम्हें आशा ही नहीं थी कि एक कुत्ता आकर कहेगा कि कहो प्रवीण, क्या हाल है? यह सुनते से एकदम से तुम नंब हो जाओगे। यह होगा विदाउट थॉट। यह होगा विदाउट थॉट। विचाररहित हो जाएगा एक क्षण में। इतनी चोट लगी कि विचार ठहर गया।
जिसको हम विचारशून्य कह रहे हैं, थॉटलेसनेस कह रहे हैं, वह बड़ी और बात है। उसका मतलब यह नहीं है कि मस्तिष्क थक गया। मस्तिष्क पूरा सजग है, पूरा सक्रिय है, कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ, कोई चोट नहीं लगी, लेकिन भीतर से वह जो चिंतन की धारा थी, उसको तुमने विदा कर दिया।
तुम बैठे हुए हो, चल नहीं रहे हो--तुम भी नहीं चल रहे हो; और एक दूसरा व्यक्ति बैठा है, वह भी नहीं चल रहा है; लेकिन वह पैरालाइज्ड है--वह भी नहीं चल रहा है। और दोनों तुम बैठे हुए हो। लेकिन मैं कहूंगा, वह बैठा हुआ नहीं है, उसको बैठना पड़ रहा है। तुम बैठे हुए हो। वह पैरालाइज्ड है सिर्फ। हालांकि दोनों के पैर एक से मालूम पड़ रहे हैं, वह भी बैठा है, तुम भी बैठे हो। कोई नहीं देख कर कह सकता कि कौन बैठा है। तुम बैठे हो, क्योंकि तुम चल सकते हो। वह चल ही नहीं सकता, इसलिए बैठने का भी क्या मतलब है कहने का। मेरा मतलब समझ रहे हो न? उसको मैं बैठा हुआ भी नहीं कहूंगा। वह सिर्फ नहीं चल सक रहा है।
तो मस्तिष्क में एक ही स्थितियां जो हैं, जब कि सिर्फ तुम्हारा ब्रेन जो है--ब्रेन, माइंड नहीं। जब तुम्हारा ब्रेन थक जाता है और एक तरह की नंबनेस पकड़ लेती है। जैसे किसी की मृत्यु हो गई है और तुम इतने थक गए कि तुम पड़े रह गए, तुम्हारा ब्रेन काम ही नहीं कर पा रहा, इसलिए तुम काम नहीं कर रहे हो। इसलिए नहीं कि एक न-काम करने की स्थिति में पहुंच गए हो तुम। इसका मतलब यह है कि ब्रेन सिर्फ पैरालाइज्ड हो गया है। कई दफे हो जाता है--किसी दुख में, किसी बड़ी खुशी में, किसी भी ऐसे एक्सीडेंट में जो अनपेक्षित है, जिसका तुम्हें कभी पता नहीं था और हो गया।
अभी यहां एक कुत्ता आ जाए और तुमसे कहे कि कहो प्रवीण, क्या हाल है? एकदम तुम्हारा ब्रेन रुक जाएगा, नंब हो जाएगा। क्योंकि यह तुम्हें आशा ही नहीं थी कि एक कुत्ता आकर कहेगा कि कहो प्रवीण, क्या हाल है? यह सुनते से एकदम से तुम नंब हो जाओगे। यह होगा विदाउट थॉट। यह होगा विदाउट थॉट। विचाररहित हो जाएगा एक क्षण में। इतनी चोट लगी कि विचार ठहर गया।
जिसको हम विचारशून्य कह रहे हैं, थॉटलेसनेस कह रहे हैं, वह बड़ी और बात है। उसका मतलब यह नहीं है कि मस्तिष्क थक गया। मस्तिष्क पूरा सजग है, पूरा सक्रिय है, कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ, कोई चोट नहीं लगी, लेकिन भीतर से वह जो चिंतन की धारा थी, उसको तुमने विदा कर दिया।
प्रश्न:
विलिंगली?
विलिंगली तुम चले गए हो। वह बड़ी और बात है। वह बड़ी पाजिटिव स्थिति है। यह बड़ी निगेटिव स्थिति है। एक आदमी बैठा है, आराम कर रहा है, यह बड़ी पाजिटिव स्थिति है। ऐसा नहीं कि वह नहीं चल सकता है; नहीं, वह चल चुका है और चलेगा। आराम कर रहा है।
विलिंगली?
विलिंगली तुम चले गए हो। वह बड़ी और बात है। वह बड़ी पाजिटिव स्थिति है। यह बड़ी निगेटिव स्थिति है। एक आदमी बैठा है, आराम कर रहा है, यह बड़ी पाजिटिव स्थिति है। ऐसा नहीं कि वह नहीं चल सकता है; नहीं, वह चल चुका है और चलेगा। आराम कर रहा है।
एक आदमी पैरालाइज्ड पड़ा है; वह आराम नहीं कर रहा है, इस भूल में मत रहना कि आराम कर रहा है। वह सिर्फ नहीं चल पा रहा है, नहीं उठ पा रहा है, आराम क्या खाक करेगा! आराम तो वह करता है जो चल सकता है।
तो जो थॉट करने की हालत है--हम विचार कर सकते हैं; नहीं कर रहे हैं।
तो जो थॉट करने की हालत है--हम विचार कर सकते हैं; नहीं कर रहे हैं।
प्रश्न:
कर सकते हैं, लेकिन नहीं कर रहे हैं?
कर सकते हैं, लेकिन नहीं कर रहे हैं?
नहीं कर रहे हैं। वह तो बात और है। लेकिन कर ही नहीं सकते, इसलिए नहीं कर रहे हैं, तो बात और है। इन दोनों में बुनियादी फर्क है।
प्रश्न:
व्हेन यू आर थॉटलेस, जिनको आप कहते हैं थॉटलेसनेस, विलिंगली विचारशून्य हो जाना, उसमें भी माइंड या ब्रेन, जो कुछ, वह बिलकुल ब्लैंक हो जाता है। और यह जो आप कहते हैं...
व्हेन यू आर थॉटलेस, जिनको आप कहते हैं थॉटलेसनेस, विलिंगली विचारशून्य हो जाना, उसमें भी माइंड या ब्रेन, जो कुछ, वह बिलकुल ब्लैंक हो जाता है। और यह जो आप कहते हैं...
***
उन्होंने बड़ा अच्छा सवाल उठाया सुबह, उन्होंने कहा कि स्वीडन जैसे मुल्क में जहां सब तरह का सुख है और सब तरह की व्यक्ति को स्वतंत्रता है, अधिकतम स्वतंत्रता है जीवन में।
उन्होंने बड़ा अच्छा सवाल उठाया सुबह, उन्होंने कहा कि स्वीडन जैसे मुल्क में जहां सब तरह का सुख है और सब तरह की व्यक्ति को स्वतंत्रता है, अधिकतम स्वतंत्रता है जीवन में।
प्रश्न:
खासकर सेक्सुअल।
खासकर सेक्सुअल। और एक तरह से सुखी समाज है। दुख-दीनता नहीं है। फिर वहां सुसाइड रेट बहुत ज्यादा है। लोग ज्यादा से ज्यादा मर रहे हैं, आत्मघात कर रहे हैं। अपनी तरफ से मर रहे हैं; कोई मार नहीं रहा है। तो उन्होंने यह सवाल उठाया कि यह क्या मामला है? और यह हिंदुस्तान के और संन्यासी भी उठाते हैं, वे भी यह कहते हैं कि हम ज्यादा शांत और आनंदित हैं। क्योंकि देखो, हमारे यहां सुसाइड कम है। वे ज्यादा दुखी और पीड़ित हैं, उनके यहां सुसाइड ज्यादा है। यह बात बिलकुल ही गलत है।
खासकर सेक्सुअल।
खासकर सेक्सुअल। और एक तरह से सुखी समाज है। दुख-दीनता नहीं है। फिर वहां सुसाइड रेट बहुत ज्यादा है। लोग ज्यादा से ज्यादा मर रहे हैं, आत्मघात कर रहे हैं। अपनी तरफ से मर रहे हैं; कोई मार नहीं रहा है। तो उन्होंने यह सवाल उठाया कि यह क्या मामला है? और यह हिंदुस्तान के और संन्यासी भी उठाते हैं, वे भी यह कहते हैं कि हम ज्यादा शांत और आनंदित हैं। क्योंकि देखो, हमारे यहां सुसाइड कम है। वे ज्यादा दुखी और पीड़ित हैं, उनके यहां सुसाइड ज्यादा है। यह बात बिलकुल ही गलत है।
असल में, आत्मघात का सवाल भी सिर्फ सुखी आदमी को ही उठ सकता है; दुखी आदमी को कभी भी नहीं।
इसे थोड़ा समझ लेना।
आत्मघात का जो सवाल है, दुखी आदमी मरने की सोच ही नहीं पाता; जीने की ही सोचता है निरंतर। दुखी आदमी निरंतर यह सोचता है कि मैं कैसे जीऊं, कैसे जीऊं, कैसे जीऊं? न मकान है, तो मकान कैसे बनाऊं? कपड़ा नहीं, कपड़ा कैसे लाऊं? पत्नी नहीं, पत्नी कैसे उपलब्ध करूं? दुखी आदमी को अनुभव होता है कि इतने दुख में हूं और अगर ये सब चीजें मुझे मिल जाएं--पत्नी मिले, मकान मिले, कार मिले, धन मिले, तो मैं जी पाऊं। दुखी आदमी का पूरा का पूरा माइंड अपने दुख को मिटाने में लगता है। मेरा मतलब समझे न? और दुख को मिटाना है, तो जीना पड़ेगा; नहीं तो मिटाओगे कैसे? दुख आज तो मिट नहीं सकता है, उपाय करने पड़ेंगे, प्रयास करने पड़ेंगे--धन कमाना पड़ेगा, प्रेम करना पड़ेगा, मकान बनाना पड़ेगा, तब दुख मिटेगा।
तो गरीब कौमें और दुखी कौमें आत्मघाती नहीं होती हैं।
जानवर इसीलिए आत्मघाती नहीं हैं; क्योंकि उसे चौबीस घंटे जीने के इंतजाम में ही गुजर जाते हैं। मरने की सुविधा कहां! फुर्सत कहां! सुबह से निकलता है एक जानवर, वह दिन भर बेचारा किसी तरह रोटी-रोजी जुटा ले अपनी, इसमें गुजर जाता है। मरने की फुर्सत कहां! जब जीने की फुर्सत नहीं मिल पाती, तो मरने की फुर्सत कहां!
एक मजदूर सुबह निकलता है, दिन भर थका-मांदा रात लौटता है, सो जाता है, सुबह फिर निकल जाता है। मरने के लिए फुर्सत चाहिए! मरना जो है वह लास्ट लक़्जरी है सुखी आदमी की। यानी मरने के लिए सुविधा तो चाहिए न! तो असुविधा है!
और गरीब आदमी नहीं मर सकता, आत्महत्या नहीं कर सकता। अगर आत्महत्या कम रखनी हो, तो दुनिया को गरीब रखना चाहिए। और आदमी को परेशान रखना चाहिए। वह परेशानी में उलझा रहे, उलझा रहे, उलझा रहे। उसको फुर्सत न मिले जीने की, मरना तो बहुत बाद की बात है। वह तो मरने का खयाल उसको आता है, जो जी चुका है।
अब जो आदमी सब तरह से सुखी हो गया और जी रहा है और जी लिया, अब वह क्या करे? उसके सामने पहले सवाल उठता है: अब मैं क्या करूं? वह सब जो मिलना था, वह मिल गया। और सुख इतना बोरिंग है, जितना दुख कभी भी नहीं है। सुख इतना उबाने वाला है, जितना दुख कभी भी नहीं है। सुख बहुत उबाने वाला है, बहुत ही घबड़ाने वाला है। तुम करो क्या, करो क्या, करो क्या, सब सुख है--अच्छा खाना है, अच्छी पत्नी है, अच्छा मकान है, अब क्या करो, अब क्या करो? अब बड़ी मुश्किल हो गई, अब कहां जाओ? क्योंकि अब इससे अच्छा मकान नहीं हो सकता, इससे अच्छी पत्नी कहां से लाओ, अब क्या करो? यह बोर्डम पैदा करता है। सिर्फ सुख बोर्डम पैदा करता है।
कोई जानवर बोरिंग हालत में नहीं पाओगे, ऊबा हुआ, कि कोई कुत्ता बोर्डम में बैठा है। हमेशा रसमग्न है वह। बोर्डम का कोई सवाल नहीं है। गांव का आदमी भी बोर्डम में नहीं पाओगे। जितनी बुद्धि विकसित होगी, सुख विकसित होगा, बोर्डम आएगी। बोर्डम जो है बड़ी ह्यूमन क्वालिटी है। नॉन-ह्यूमन बीइंग्स में नहीं हो सकती है।
तो वह उतना ही जितना बुद्धिमान, सुखी, विचारशील आदमी पाओगे, उतना बोर पाओगे। हर चीज उबाने लगेगी, हर चीज घबड़ाने लगेगी। सब मिल गया, अब क्या करे वह? ऐसी हालत में पहली दफा उसे खयाल--पूछेगा वह, वह पूछेगा कि जिंदगी का अर्थ क्या है?
दुखी आदमी कभी नहीं पूछता। वह पूछता नहीं मीनिंग क्या है। वह मीनिंग साफ है उसे कि रोटी नहीं मिली, मकान नहीं मिला, स्त्री नहीं मिली। मीनिंग साफ है बिलकुल। सुखी आदमी को सब मिल गया, वह पूछता है, जिंदगी का मीनिंग क्या है? वह उसको खाना मिल गया है, पत्नी मिल गई है, मकान मिल गया है, धन मिल गया है। अब आराम से, आराम से कुर्सी पर बैठा हुआ है, वह पूछता है: वॉट इ़ज दि मीनिंग? जीऊं किसलिए? कल फिर सुबह उठने पर मिलेगा--चाय मिलेगी, पत्नी मिलेगी, कल फिर इसी कुर्सी पर बैठेंगे, ऐसा पच्चीस साल से बैठे हैं। फिर जीने का मतलब क्या है? किसलिए हम जीएं, यह तो बताओ? क्योंकि यह तो रोज-रोज रिपीट हो रहा है। अब वह इससे घबड़ा गया है।
तो जीने का प्रश्न जब उठने लगता है, तब दूसरा प्रश्न सुसाइड का उठता है: तो फिर मर ही क्यों न जाऊं?
और एक मजे की बात है कि जिसे सब-कुछ मिल गए हैं, सब सेंसेशंस मिल गए हैं; वह एक सेंसेशन और उपयोग करना चाहता है: मर कर भी देखना चाहता है। वह लास्ट सेंसेशन है। जो सिर्फ लक्जूरियस अफर्ड कर सकते हैं। वह आखिरी सेंसेशन है। वह कहता है कि ठीक है, पैदा हम अपनी तरफ से नहीं हुए; पता नहीं कैसे पैदा हुए। जवान अपनी तरफ से नहीं हुए; पता नहीं कैसे हुए। हम मर तो अपनी तरफ से... एक डेफिनिटिव एक्ट, कम से कम मर ‘मैं’ सकता हूं! इसमें कोई न भगवान बाधा डाल सकता है, न कोई दुनिया की ताकत बाधा सकती है। पैदा होने में मेरा कोई हाथ नहीं है, जवान होने में कोई हाथ नहीं है, बूढ़े होने में कोई हाथ नहीं है, लेकिन ‘मैं’ मर सकता हूं। तो इसको भी जरा देखें। यह थ्रिल आखिरी है।
आमतौर से हम दूसरे को मरते देखने में थ्रिल अनुभव करते हैं। लेकिन सुखी आदमी अपने को मरते भी देखना चाहता है। आखिरी सुख आदमी को सुसाइडल बना देता है। और अगर आखिरी सुख में हम नये तरह के दुख न खोज पाए, तो दो सौ वर्षों में आदमी अपने को खत्म कर लेगा।
इसलिए बहुत बुद्धिमानी पुराने सुख खोजने पर नये दुख खोजने की है। जैसे समझ लो कि रोटी मिल गई है, तो कविता तो नहीं मिली है; तो कविता का नया दुख फौरन पैदा होना चाहिए, नहीं तो मुश्किल हो जाएगी।
वह पुराने राजा-महाराजा इसलिए वे नये दुख पैदा कर लेते थे। संगीत चाहिए, काव्य चाहिए, नृत्य चाहिए, वे सब पैदा कर लेते थे। वे नये दुख थे कि फलानी नर्तकी नहीं उपलब्ध हो रही है, वह दूसरे राजा के पास है। अब क्या हो गया है कि हमने सब चीजों को कमर्सलाइज्ड कर दिया और क्लेक्टिव कर दिया। अब विजय आनंद एक नर्तकी को नचा देते हैं, वह सारा मुल्क देख लेता है। अब कोई हेमामालिनी पर किसी का कब्जा थोड़े ही है, सब देख लेते हैं। तो फिर प्रॉब्लम खत्म हो गया। फिर मतलब यह है कि... लेकिन एक जमाना वह था कि हेमामालिनी को मैं नचा सकता हूं, आप नहीं नचा सकते। अब दुखी और मरे जा रहे हैं। एक राजा मरा जा रहा है कि फलाने के दरबार में हेमामालिनी नाच रही है। अब हर गरीब आदमी के दरबार में नाच रही है, कोई सवाल नहीं है उसका। तो हमने सब... समझे न?
तो वह नये दुख पैदा करने का बड़ा प्रॉब्लम हो गया कि अब हम कैसे पैदा करें? वे हो जाएंगे। जैसे कोई चांद पर जाने लगेगा, कोई मंगल पर जाने लगेगा, एक करोड़ रुपये की टिकट होगी, वह एक आदमी खरीद सकेगा, और जिसके पास एक करोड़ नहीं है वह दुखी हो जाएगा कि चांद पर कैसे जाऊं? सुसाइड कम हो जाएगा एकदम। मेरा मतलब समझे न? पुराने सब दुख हम खत्म किए ले रहे हैं और नये दुख पैदा नहीं कर पा रहे हैं, तो प्रॉब्लम खड़ा हो जाएगा एकदम।
नये दुख पैदा करने पड़ेंगे। यह मैं कह रहा हूं कि जिंदगी के चलने में सुख और दुख दोनों पैरों की जरूरत है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है, तुम कहोगे, कभी-कभी ऐसा होता है कि बहुत दुखी आदमी भी अपने को समाप्त कर लेता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि बहुत दुखी आदमी भी अपने को समाप्त कर लेता है। वह भी इसलिए समाप्त नहीं करता कि बहुत दुखी है, वह भी इसलिए समाप्त करता है--ध्यान रहे, इन दोनों में फर्क नहीं है, इससे जरा बारीक है। एक बहुत सुखी आदमी अपने को समाप्त करता है, क्योंकि आगे सुख की कोई संभावना न रही, कल किसलिए जीए? एक बहुत दुखी आदमी इसलिए अपने को समाप्त करता है कि उसे भी कल सुख पाने की कोई आशा नहीं रही, कोई संभावना नहीं रही।
इसे थोड़ा समझ लेना।
आत्मघात का जो सवाल है, दुखी आदमी मरने की सोच ही नहीं पाता; जीने की ही सोचता है निरंतर। दुखी आदमी निरंतर यह सोचता है कि मैं कैसे जीऊं, कैसे जीऊं, कैसे जीऊं? न मकान है, तो मकान कैसे बनाऊं? कपड़ा नहीं, कपड़ा कैसे लाऊं? पत्नी नहीं, पत्नी कैसे उपलब्ध करूं? दुखी आदमी को अनुभव होता है कि इतने दुख में हूं और अगर ये सब चीजें मुझे मिल जाएं--पत्नी मिले, मकान मिले, कार मिले, धन मिले, तो मैं जी पाऊं। दुखी आदमी का पूरा का पूरा माइंड अपने दुख को मिटाने में लगता है। मेरा मतलब समझे न? और दुख को मिटाना है, तो जीना पड़ेगा; नहीं तो मिटाओगे कैसे? दुख आज तो मिट नहीं सकता है, उपाय करने पड़ेंगे, प्रयास करने पड़ेंगे--धन कमाना पड़ेगा, प्रेम करना पड़ेगा, मकान बनाना पड़ेगा, तब दुख मिटेगा।
तो गरीब कौमें और दुखी कौमें आत्मघाती नहीं होती हैं।
जानवर इसीलिए आत्मघाती नहीं हैं; क्योंकि उसे चौबीस घंटे जीने के इंतजाम में ही गुजर जाते हैं। मरने की सुविधा कहां! फुर्सत कहां! सुबह से निकलता है एक जानवर, वह दिन भर बेचारा किसी तरह रोटी-रोजी जुटा ले अपनी, इसमें गुजर जाता है। मरने की फुर्सत कहां! जब जीने की फुर्सत नहीं मिल पाती, तो मरने की फुर्सत कहां!
एक मजदूर सुबह निकलता है, दिन भर थका-मांदा रात लौटता है, सो जाता है, सुबह फिर निकल जाता है। मरने के लिए फुर्सत चाहिए! मरना जो है वह लास्ट लक़्जरी है सुखी आदमी की। यानी मरने के लिए सुविधा तो चाहिए न! तो असुविधा है!
और गरीब आदमी नहीं मर सकता, आत्महत्या नहीं कर सकता। अगर आत्महत्या कम रखनी हो, तो दुनिया को गरीब रखना चाहिए। और आदमी को परेशान रखना चाहिए। वह परेशानी में उलझा रहे, उलझा रहे, उलझा रहे। उसको फुर्सत न मिले जीने की, मरना तो बहुत बाद की बात है। वह तो मरने का खयाल उसको आता है, जो जी चुका है।
अब जो आदमी सब तरह से सुखी हो गया और जी रहा है और जी लिया, अब वह क्या करे? उसके सामने पहले सवाल उठता है: अब मैं क्या करूं? वह सब जो मिलना था, वह मिल गया। और सुख इतना बोरिंग है, जितना दुख कभी भी नहीं है। सुख इतना उबाने वाला है, जितना दुख कभी भी नहीं है। सुख बहुत उबाने वाला है, बहुत ही घबड़ाने वाला है। तुम करो क्या, करो क्या, करो क्या, सब सुख है--अच्छा खाना है, अच्छी पत्नी है, अच्छा मकान है, अब क्या करो, अब क्या करो? अब बड़ी मुश्किल हो गई, अब कहां जाओ? क्योंकि अब इससे अच्छा मकान नहीं हो सकता, इससे अच्छी पत्नी कहां से लाओ, अब क्या करो? यह बोर्डम पैदा करता है। सिर्फ सुख बोर्डम पैदा करता है।
कोई जानवर बोरिंग हालत में नहीं पाओगे, ऊबा हुआ, कि कोई कुत्ता बोर्डम में बैठा है। हमेशा रसमग्न है वह। बोर्डम का कोई सवाल नहीं है। गांव का आदमी भी बोर्डम में नहीं पाओगे। जितनी बुद्धि विकसित होगी, सुख विकसित होगा, बोर्डम आएगी। बोर्डम जो है बड़ी ह्यूमन क्वालिटी है। नॉन-ह्यूमन बीइंग्स में नहीं हो सकती है।
तो वह उतना ही जितना बुद्धिमान, सुखी, विचारशील आदमी पाओगे, उतना बोर पाओगे। हर चीज उबाने लगेगी, हर चीज घबड़ाने लगेगी। सब मिल गया, अब क्या करे वह? ऐसी हालत में पहली दफा उसे खयाल--पूछेगा वह, वह पूछेगा कि जिंदगी का अर्थ क्या है?
दुखी आदमी कभी नहीं पूछता। वह पूछता नहीं मीनिंग क्या है। वह मीनिंग साफ है उसे कि रोटी नहीं मिली, मकान नहीं मिला, स्त्री नहीं मिली। मीनिंग साफ है बिलकुल। सुखी आदमी को सब मिल गया, वह पूछता है, जिंदगी का मीनिंग क्या है? वह उसको खाना मिल गया है, पत्नी मिल गई है, मकान मिल गया है, धन मिल गया है। अब आराम से, आराम से कुर्सी पर बैठा हुआ है, वह पूछता है: वॉट इ़ज दि मीनिंग? जीऊं किसलिए? कल फिर सुबह उठने पर मिलेगा--चाय मिलेगी, पत्नी मिलेगी, कल फिर इसी कुर्सी पर बैठेंगे, ऐसा पच्चीस साल से बैठे हैं। फिर जीने का मतलब क्या है? किसलिए हम जीएं, यह तो बताओ? क्योंकि यह तो रोज-रोज रिपीट हो रहा है। अब वह इससे घबड़ा गया है।
तो जीने का प्रश्न जब उठने लगता है, तब दूसरा प्रश्न सुसाइड का उठता है: तो फिर मर ही क्यों न जाऊं?
और एक मजे की बात है कि जिसे सब-कुछ मिल गए हैं, सब सेंसेशंस मिल गए हैं; वह एक सेंसेशन और उपयोग करना चाहता है: मर कर भी देखना चाहता है। वह लास्ट सेंसेशन है। जो सिर्फ लक्जूरियस अफर्ड कर सकते हैं। वह आखिरी सेंसेशन है। वह कहता है कि ठीक है, पैदा हम अपनी तरफ से नहीं हुए; पता नहीं कैसे पैदा हुए। जवान अपनी तरफ से नहीं हुए; पता नहीं कैसे हुए। हम मर तो अपनी तरफ से... एक डेफिनिटिव एक्ट, कम से कम मर ‘मैं’ सकता हूं! इसमें कोई न भगवान बाधा डाल सकता है, न कोई दुनिया की ताकत बाधा सकती है। पैदा होने में मेरा कोई हाथ नहीं है, जवान होने में कोई हाथ नहीं है, बूढ़े होने में कोई हाथ नहीं है, लेकिन ‘मैं’ मर सकता हूं। तो इसको भी जरा देखें। यह थ्रिल आखिरी है।
आमतौर से हम दूसरे को मरते देखने में थ्रिल अनुभव करते हैं। लेकिन सुखी आदमी अपने को मरते भी देखना चाहता है। आखिरी सुख आदमी को सुसाइडल बना देता है। और अगर आखिरी सुख में हम नये तरह के दुख न खोज पाए, तो दो सौ वर्षों में आदमी अपने को खत्म कर लेगा।
इसलिए बहुत बुद्धिमानी पुराने सुख खोजने पर नये दुख खोजने की है। जैसे समझ लो कि रोटी मिल गई है, तो कविता तो नहीं मिली है; तो कविता का नया दुख फौरन पैदा होना चाहिए, नहीं तो मुश्किल हो जाएगी।
वह पुराने राजा-महाराजा इसलिए वे नये दुख पैदा कर लेते थे। संगीत चाहिए, काव्य चाहिए, नृत्य चाहिए, वे सब पैदा कर लेते थे। वे नये दुख थे कि फलानी नर्तकी नहीं उपलब्ध हो रही है, वह दूसरे राजा के पास है। अब क्या हो गया है कि हमने सब चीजों को कमर्सलाइज्ड कर दिया और क्लेक्टिव कर दिया। अब विजय आनंद एक नर्तकी को नचा देते हैं, वह सारा मुल्क देख लेता है। अब कोई हेमामालिनी पर किसी का कब्जा थोड़े ही है, सब देख लेते हैं। तो फिर प्रॉब्लम खत्म हो गया। फिर मतलब यह है कि... लेकिन एक जमाना वह था कि हेमामालिनी को मैं नचा सकता हूं, आप नहीं नचा सकते। अब दुखी और मरे जा रहे हैं। एक राजा मरा जा रहा है कि फलाने के दरबार में हेमामालिनी नाच रही है। अब हर गरीब आदमी के दरबार में नाच रही है, कोई सवाल नहीं है उसका। तो हमने सब... समझे न?
तो वह नये दुख पैदा करने का बड़ा प्रॉब्लम हो गया कि अब हम कैसे पैदा करें? वे हो जाएंगे। जैसे कोई चांद पर जाने लगेगा, कोई मंगल पर जाने लगेगा, एक करोड़ रुपये की टिकट होगी, वह एक आदमी खरीद सकेगा, और जिसके पास एक करोड़ नहीं है वह दुखी हो जाएगा कि चांद पर कैसे जाऊं? सुसाइड कम हो जाएगा एकदम। मेरा मतलब समझे न? पुराने सब दुख हम खत्म किए ले रहे हैं और नये दुख पैदा नहीं कर पा रहे हैं, तो प्रॉब्लम खड़ा हो जाएगा एकदम।
नये दुख पैदा करने पड़ेंगे। यह मैं कह रहा हूं कि जिंदगी के चलने में सुख और दुख दोनों पैरों की जरूरत है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है, तुम कहोगे, कभी-कभी ऐसा होता है कि बहुत दुखी आदमी भी अपने को समाप्त कर लेता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि बहुत दुखी आदमी भी अपने को समाप्त कर लेता है। वह भी इसलिए समाप्त नहीं करता कि बहुत दुखी है, वह भी इसलिए समाप्त करता है--ध्यान रहे, इन दोनों में फर्क नहीं है, इससे जरा बारीक है। एक बहुत सुखी आदमी अपने को समाप्त करता है, क्योंकि आगे सुख की कोई संभावना न रही, कल किसलिए जीए? एक बहुत दुखी आदमी इसलिए अपने को समाप्त करता है कि उसे भी कल सुख पाने की कोई आशा नहीं रही, कोई संभावना नहीं रही।
प्रश्न:
इसका मतलब एक्सट्रीम की जरूरत है?
इसका मतलब एक्सट्रीम की जरूरत है?
हां। ये बेसिक एक ही पॉइंट हैं, एक ही जगह खड़े हो गए हैं दोनों। वह अति दुख के कारण उस जगह आ गया है कि उसकी सब आशा क्षीण हो गई, वह कहता है, अब कोई सुख तो मिलना नहीं, तो अब जीना किसलिए? सुखी आदमी कहता है, अब सब सुख तो मिल गए, अब तो कुछ सुख मिलना नहीं है, अब जीना किसलिए? मेरे हिसाब में इनमें फर्क नहीं है दोनों में। दुख की अति पर भी आदमी ऊब जाता है, क्योंकि फिर दुख ही दुख रह जाता है। फिर सुख के पाने की आशा भी अगर न रही... आशा भी अगर रही, तो नहीं मरेगा अभी। अगर आशा भी न रही, तो वह कहेगा कि ठीक है, बात खत्म हो गई, वह मर जाएगा।
लेकिन दुख के अति पर पहुंचना बहुत मुश्किल है, क्योंकि आदमी की क्षमता दुख सहने की अनंत है। इसलिए बहुत कम दुखी लोग एक्सट्रीम पर पहुंच पाते हैं। आशा बनी ही रहती है, आशा मिटती ही नहीं। दुख के एक्सट्रीम पर बहुत कम लोगों को पहुंचाया जा सकता है। समझे न तुम?
और यह भी तुम्हें ध्यान रहे कि जिन दुखों को आमतौर से लोग दुख समझते हैं, वह गरीबों के दुखों के कारण कभी कोई नहीं मरता। तुमने कभी नहीं देखा हो कोई भूख की वजह से सुसाइड करे। बहुत मुश्किल है। कोई बीमारी की वजह से सुसाइड करे। बहुत मुश्किल है। हां, प्रेम की वजह से कोई सुसाइड कर सकता है। असल में, प्रेम जो है, वह भी संपत्ति और सुख की ही लक़्जरी है, वह भी। इन चीजों की वजह से कोई सुसाइड नहीं करता। कभी भी अगर तुम्हें आगे कल नये के होने की संभावना मिट जाए, तो मृत्यु तुम्हें पकड़ लेगी। तब तुम मृत्यु में ही नये की संभावना खोजने लगोगे।
यह मेरा मानना है कि हमें रोज नये सुख बनाने चाहिए; लेकिन नये दुख और नई दिशाएं खोजनी चाहिए--एडवेंचर की, आशा की। और इन दोनों सत्यों को जो समझ लेता है, इन दोनों सत्यों को जो समझ लेता है, वह एक तीसरी तरह का आदमी हो जाता है। उस आदमी के लिए कोई प्रॉब्लम नहीं है। मेरा मतलब समझ रहे न? इन दोनों सत्यों को जो आदमी समझ लेता है, वह बिलकुल तीसरी तरह का आदमी है। उसके लिए तो प्रॉब्लम ही नहीं है।
लेकिन दुख के अति पर पहुंचना बहुत मुश्किल है, क्योंकि आदमी की क्षमता दुख सहने की अनंत है। इसलिए बहुत कम दुखी लोग एक्सट्रीम पर पहुंच पाते हैं। आशा बनी ही रहती है, आशा मिटती ही नहीं। दुख के एक्सट्रीम पर बहुत कम लोगों को पहुंचाया जा सकता है। समझे न तुम?
और यह भी तुम्हें ध्यान रहे कि जिन दुखों को आमतौर से लोग दुख समझते हैं, वह गरीबों के दुखों के कारण कभी कोई नहीं मरता। तुमने कभी नहीं देखा हो कोई भूख की वजह से सुसाइड करे। बहुत मुश्किल है। कोई बीमारी की वजह से सुसाइड करे। बहुत मुश्किल है। हां, प्रेम की वजह से कोई सुसाइड कर सकता है। असल में, प्रेम जो है, वह भी संपत्ति और सुख की ही लक़्जरी है, वह भी। इन चीजों की वजह से कोई सुसाइड नहीं करता। कभी भी अगर तुम्हें आगे कल नये के होने की संभावना मिट जाए, तो मृत्यु तुम्हें पकड़ लेगी। तब तुम मृत्यु में ही नये की संभावना खोजने लगोगे।
यह मेरा मानना है कि हमें रोज नये सुख बनाने चाहिए; लेकिन नये दुख और नई दिशाएं खोजनी चाहिए--एडवेंचर की, आशा की। और इन दोनों सत्यों को जो समझ लेता है, इन दोनों सत्यों को जो समझ लेता है, वह एक तीसरी तरह का आदमी हो जाता है। उस आदमी के लिए कोई प्रॉब्लम नहीं है। मेरा मतलब समझ रहे न? इन दोनों सत्यों को जो आदमी समझ लेता है, वह बिलकुल तीसरी तरह का आदमी है। उसके लिए तो प्रॉब्लम ही नहीं है।
प्रश्न:
इतने अनुभव के बाद वेस्ट में कोई विचारक पैदा नहीं हुए, जो ऐसा नहीं लिखते।
इतने अनुभव के बाद वेस्ट में कोई विचारक पैदा नहीं हुए, जो ऐसा नहीं लिखते।
हां, अभी नहीं हैं।
प्रश्न:
लिखने का कोई संभव नहीं है। यहां आप लोग सब लिखते हैं, वहां कोई नहीं लिखता।
लिखने का कोई संभव नहीं है। यहां आप लोग सब लिखते हैं, वहां कोई नहीं लिखता।
हां।
प्रश्न:
अभी आपने कहा न कि जीना मेरे हाथ में नहीं, जवान होना मेरे हाथ में नहीं, लेकिन मरना, जैसे संभव, आइ कैन डू--अभी आपने बात की--यह भी मैं कर लूं। और भगवान बाधा नहीं डाल सकते। इसके रेफरेंस में मैं पूछना चाहता हूं: समझो कि एक आदमी पेट्रोल डाल कर जलने की कोशिश करता है, या कोई पांचवीं मंजिल से उड़ी मार कर मरने की कोशिश करता है, फिर भी नहीं मरता है?
अभी आपने कहा न कि जीना मेरे हाथ में नहीं, जवान होना मेरे हाथ में नहीं, लेकिन मरना, जैसे संभव, आइ कैन डू--अभी आपने बात की--यह भी मैं कर लूं। और भगवान बाधा नहीं डाल सकते। इसके रेफरेंस में मैं पूछना चाहता हूं: समझो कि एक आदमी पेट्रोल डाल कर जलने की कोशिश करता है, या कोई पांचवीं मंजिल से उड़ी मार कर मरने की कोशिश करता है, फिर भी नहीं मरता है?
हां, तो उसका कुल मतलब इतना है कि वह ढंग से कोशिश नहीं की। इसमें कोई बाधा नहीं डाल रहा है।
प्रश्न:
ऊपर से जंप मारने से ज्यादा कोशिश क्या हो सकती है?
ऊपर से जंप मारने से ज्यादा कोशिश क्या हो सकती है?
नहीं, यानी एक-दो मंजिल और ऊपर जाना चाहिए दुबारा। उसका मतलब यह नहीं कि कोई बाधा डाल रहा, उसका मतलब यह है कि जो तुमने किया वह मेथडोलॉजिकली चूक हो गई कहीं उसमें। उसमें कहीं मेथडोलॉजिकली चूक हो गई। यानी, यह मेथड की चूक है, कोई बाधा नहीं डाल रहा है। कोई बाधा नहीं डाल रहा है! तुमने मेथड में कोई गलती कर ली, तुम इस ढंग से कूदे कि बच गए। इतना ही मसला है।
Osho's Commentary
जैसे कि कल तुझे चोट लगी थी हाथ में और घाव बन गया, इसमें दर्द हो रहा है--और तू साक्षी है। इसका यह मतलब नहीं है कि दर्द मिट जाएगा साक्षी होने से। साक्षी होने से दर्द और तेरे बीच में एक फासला हो जाएगा। यानी तू यह जानेगी कि दर्द हो रहा है--लेकिन कहीं, समव्हेयर। मैं दर्द से घिरा हूं, ऐसा नहीं; मैं दर्द हूं, ऐसा नहीं; दर्द कहीं हो रहा है, किसी बाउंडरी लाइन पर दर्द हो रहा है।
जैसे अब हम यहां बैठे हैं, रोड से एक ट्रक जा रहा है, उसकी आवाज आ रही है, तो हम ऐसा नहीं कहते कि मैं आवाज हूं, हम कहते हैं कि वह आवाज आ रही है। वह आवाज वहां है। ट्रक और हमारे बीच आवाज का संबंध है, लेकिन हम आवाज नहीं हैं।
इधर हाथ में दर्द हो रहा है; तो इस दर्द और हमारे बीच एक संबंध है, लेकिन दर्द हम नहीं हैं। तो यह जो प्रतीति होगी, वह जीवन की प्रत्येक संवेदना, किसी परिधि पर हो, और हम कहीं अलग कोने पर खड़े हुए हैं, बीच में कहीं खड़े हुए हैं, यह अगर हमें दिखाई पड़ता रहे, तो दर्द मिट जाएगा ऐसा नहीं, सिर्फ उतना दर्द मिट जाएगा जो आइडेंटिफिकेशन से पैदा होता है। वह इससे पैदा होता है कि मैं दुखी हूं, मैं दुखी हूं; इससे जो दर्द पैदा होता है, वह मिट जाएगा। दर्द निपट जितना है उतना रह जाएगा, फैक्चुअल जितना है उतना रह जाएगा। फिक्शन जितना है वह विदा हो जाएगा।
और हमारे दर्द में दस प्रतिशत सत्य है और नब्बे प्रतिशत सपना है बिलकुल, जिसको हम पैदा किए हुए हैं; पैदा किए हुए हैं, बनाए हुए हैं, वह विदा हो जाएगा। और तब कोई व्यक्ति ऐसा कह सकता है कि मैं देख रहा हूं कि ‘राम’ के हाथ में बड़ी तकलीफ हो रही है। राम से मतलब, वह एक पूरी पर्सनैलिटी के लिए उपयोग कर रहा है राम का, जिसको तुम जानती हो। यह फर्क समझ लेना। जैसे मैं कहूं कि--जैसे राम को भूख लगी है--राम से मेरा मतलब वह सारा व्यक्ति जिसको तुम जानती हो। लेकिन इस व्यक्ति में कुछ और भी है, जो न ही जिसको तुम जानती ही नहीं हो। जिसको सिर्फ मैं ही जानता हूं। जिसको कोई और जान ही नहीं सकता। और जब भी तुम मेरे संबंध में जानोगी, तो मेरे संबंध में ही जानोगी; मुझे नहीं जान सकती हो।
अब जैसे कि अबाउट मी; तो ‘अबाउट मी’ जो कुछ है जाना हुआ, उस सबके इकट्ठे जोड़ को राम कह रहे हैं। वह हमारा व्यक्तित्व है। लेकिन खतरा यह है कि जो आदमी साक्षी नहीं है, वह यह जो ‘अबाउट मी’ है, इसको ही स्वयं समझ लेता है कि यह मैं हूं। और तब उसकी पीड़ाओं का अंत नहीं रह जाता।
साक्षी के सामने कोई मन की धारा नहीं रह जाती। लेकिन व्यक्तित्व तो है अपनी जगह पर। पैर में कांटा गड़ेगा तो पता चलेगा। बल्कि मेरा कहना है कि साक्षी को तुमसे ज्यादा स्पष्ट पता चलेगा। क्योंकि उसके अनुभव की जो तीव्रता है वह बहुत तीव्र हो जाएगी, वह कुछ भी तीव्र अनुभव करेगा। इसलिए साक्षी दुख का अनुभव भी तुमसे हजार गुना ज्यादा करेगा। सुख का अनुभव भी तुमसे हजार गुना ज्यादा करेगा। स्वाद का अनुभव भी तुमसे हजार गुना ज्यादा लेगा। भूख भी लगेगी तो तुमसे हजार गुना ज्यादा भूखा होगा। क्योंकि तुम्हारा जो उलझाव है वह उलझाव नहीं होना चाहिए। जो बिलकुल साफ है, जैसे कि एक साफ दर्पण है, उसमें चीजें और साफ दिखाई पड़ेंगी। एक दर्पण है, जिस पर कि सब लिपा-पुता है, न मालूम क्या-क्या लिपा-पुता है, उसमें चीजें उतनी साफ नहीं दिखाई पड़ेंगी।
तो उसकी संवेदनशीलता बढ़ जाएगी साक्षी से। बहुत बढ़ जाएगी। लेकिन संवेदनशीलता के बढ़ जाने पर भी वह यह जान रहा है कि चीजों के पीछे एक आईना है, वह जान रहा है कि चीजें वहां कहीं हैं, इधर सिर्फ प्रतिफलन हो रहा है, रिफ्लेक्शंस भर हो रहे हैं। ऐसा साक्षी जानता है कि घटना घट रही है, हम जान रहे हैं। और तब अंतिम घटना में मृत्यु में भी वह इसी तरह खड़ा रहेगा कि राम मर रहे हैं और हम जान रहे हैं। राम, मतलब वह व्यक्ति जो कि सब लोगों ने...