Nahin Sanjh Nahin Bhor #1

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Osho's Commentary

राख ही राख है, इस ढेर में क्या रक्खा है
खोखली आंखें--जहां बहता रहा आबे-हयात
कब से एक गार की मानिंद पड़ी है वीरां
कब्र में सांप का बिल झांक रहा हो जैसे
राख ही राख है।
अंगुलियां--सदियों को लम्हों में बदलने वाली
अंगुलियां--शेर थीं नगमा थीं तरन्नुम थीं कभी
अंगुलियां जिनमें तेरे लम्स का जादू था कभी
अब तो बस सूखी हुई नागफनी हों जैसे
राख ही राख है।
दिल--कि था नाचती, गाती हुई परियों का जहां
अनगिनत यादों का, अरमानों का इक शीशमहल
तेरी तस्वीर दरीचों पर खड़ी हंसती थी
अब तो पिघले हुए लावे के सिवा कुछ भी नहीं
राख के जलते हुए ढेर में क्या पाओगे
शहर से दूर श्मशान कहां जाओगे
राख ही राख है।
यह जिंदगी तो राख है; जितने जल्दी पता चल जाए, उतने भाग्यशाली हो। लेकिन यह जिंदगी राख है, इस बात का अनुभव हम होने नहीं देते। हम तो राख को ही भाग्य बना कर बैठे हैं। हम तो राख की ही पूजा कर रहे हैं। हमने तो राख को ही परमात्मा समझा है। यह सब तो छिन जाएगा। जो छिन जाए, वह परमात्मा नहीं--ऐसी परमात्मा की परिभाषा समझना।
जो छिन जाए, वह परमात्मा नहीं। और जो छिन जाए, वह संपदा भी नहीं। जो न छिने, जिसे कोई छीन न सके; मौत भी जिसे छीन न सके; न तो जिसे कोई दे सके और न जिसे कोई छीन सके, उसे पा लो तो ही कुछ पाया। उस शाश्वत के साथ संबंध जुड़ जाए, तो ही राख के उपर उठे; तो मृत्यु मिटी और जीवन शुरू हुआ।
जिसे तुम जीवन कहते हो, यह जीवन नहीं। यह तो जीवन का धोखा मात्र है; यह तो जीवन का आवरण मात्र है। वस्त्रों को तुमने आत्मा समझ लिया है और इस भरोसे के कारण--इस झूठे भरोसे के कारण आत्मा पास है और अनजानी पड़ी है। परमात्मा पास है और तुम हाथ भी नहीं फैलाते। परमात्मा आने को उत्सुक है, लेकिन तुम्हारे हृदय के द्वार बंद हैं।
राख ही राख है, इस ढेर में क्या रक्खा है
इस देह में, इस संसार में क्या पाओगे?
राख के ढेर पर बैठे लोग देखे, जो खोजते हैं कि शायद मिल जाए कोई दाना सोने का, चांदी का! शायद उन्हें मिल भी जाए। क्योंकि सोना और चांदी भी राख ही हैं; राख के ढेर में मिल भी सकते हैं। लेकिन जिसने देह में परमात्मा को खोजा--नहीं मिलेगा। और जिसने बाहर अंतरात्मा को खोजा, उसकी हार सुनिश्चित है।
राख ही राख है, इस ढेर में क्या रक्खा है
खोखली आंखें--जहां बहता रहा आबे-हयात
जहां कभी जीवन का जल बहता था, सुंदर आंसू बहते थे, वे आंखें एक दिन खोखली पड़ी रह जाएंगी; उनमें जल की एक बूंद भी न बचेगी। वे आंखें सूख जाएंगी और मरुस्थल हो जाएंगी; उनमें फिर फूल न खिलेंगे और हंसी न लगेगी और उनमें फिर गीतों का जन्म न होगा।
खोखली आंखें--जहां बहता रहा आबे-हयात
कब से एक गार की मानिंद पड़ी हैं वीरां
कब्र में सांप का बिल झांक रहा हो जैसे
ऐसी खोखली रह जाएंगी आंखें--अंधेरे, काले, छिद्रों की भांति। भीतर से पक्षी उड़ा कि यह देह लाश है; दुर्गंध के सिवाय और कुछ भी बचता नहीं। भीतर की सुगंध उड़ी कि जिसे तुमने अपना घर समझा था, जिसे तुमने अपना समझा था, उसमें सिवाय कुरूपता के और कीड़े-मकोड़ों के और कुछ भी न जन्मेगा।
राख ही राख है, इस ढेर में क्या रक्खा है
खोखली आंखें--जहां बहता रहा आबे-हयात
कब से एक गार की मानिंद पड़ी हैं वीरां
कब्र में सांप का बिल झांक रहा हो जैसे
राख ही राख है।
अंगुलियां--सदियों को लम्हों में बदलने वाली
वे अंगुलियां जो बड़ी जीवंत थीं, जो सदियों को क्षणों में बदल देती थीं। वे अंगुलियां जो बड़ी बोलती थीं, वाचाल थीं; वे अंगुलियां जो कहती थीं; बड़ी बलशाली थीं...।
अंगुलियां--सदियों को लम्हों में बदलने वाली
अंगुलियां--शेर थीं, नगमा थीं, तरन्नुम थीं कभी
बड़ी उनमें लय थी, बड़े गीत थे, बड़े रहस्य थे।
अंगुलियां--शेर थीं, नग्मा थीं, तरन्नुम थीं कभी
अंगुलियां जिनमें तेरे लम्स का जादू था कभी
और जिनमें जादू था स्पर्श का; जिनके छूते ही प्राणों के नये संचार हो जाते थे।
अब तो बस सूखी हुई नागफनी हों जैसे
राख ही राख है।
एक दिन सूखी हुई टहनियां नागफनी की--ऐसी तुम्हारी अंगुलियां हो जाएंगी; ऐसी सब अंगुलियां हो जाती हैं। ऐसे ही सब कंठ शब्दों से शून्य हो जाते हैं, गीतों से रिक्त हो जाते हैं। ऐसे ही जहां तुमने जीवन समझा था, वहां जीवन के पद-चिह्न भी खोजे न मिलेंगे। ‘राख ही राख है।’
दिल--कि था नाचती हुई, गाती हुई परियों का जहां
कितने अरमान, कितनी आशाएं और कितने सपने दिल में संजोए थे!
दिल--कि था नाचती, गाती हुई परियों का जहां
अनगिनत यादों का अरमानों का एक शीशमहल
तेरी तस्वीर दरीचों पर खड़ी हंसती थी
और तुमने जिन्हें चाहा था, जिन स्वप्नों को पूरा करना चाहा था, जिन स्वप्नों के लिए तुमने ये महल बनाए थे, ये कालीनें बिछाई थीं, तुम उड़े, तुम जगे कि पाओगे कि सब सपने थे। शीशमहल, अनगिनत यादों और अरमानों के, गाती हुई परियों का जहां, सब तुम्हारे खयाल थे। कहीं कुछ भी न हुआ था। न कोई परी थी न कोई शीशमहल थे। कहीं कुछ भी न मिला था। सब सपने थे--कोरे सपने थे।
तेरी तस्वीर दरीचों पर खड़ी हंसती थी
अब तो पिघले हुए लावे के सिवा कुछ भी नहीं
राख के जलते हुए ढेर में क्या पाओगे
शहर से दूर श्मशान कहां जाओगे
राख ही राख है।
जिसे ऐसा दिखा, उसके जीवन में परमात्मा की खोज शुरू होती है।
यह व्यर्थ है, तो फिर सार्थकता कहां है? प्रश्न निर्मित होता है; जिज्ञासा जगती है। और फिर जिज्ञासा सिर्फ जिज्ञासा नहीं रह जाती। जीवन मरण का सवाल है। पल-पल हाथ से खोया जाता अवसर। तो यह कोई दाशर्निक जिज्ञासा नहीं है कि परमात्मा क्या है। तब तो सारा दांव इसी पर है। जानना ही होगा। जानने में सब गंवाना हो, तो सब गवांना ही होगा। लेकिन जानने से नहीं रुका जा सकता।
उसे जानना ही होगा, जो सदा है, ताकि हम भी सदा के साथ हो जाएं। उसे पहचानना ही होगा, जो शाश्वत है, ताकि हमारी यह क्षणभंगुर लहर सी जिंदगी और न तड़पे; और न परेशान हो।
चरणदास उन्नीस वर्ष के थे, तब यह तड़प उठी। बड़ी नई उम्र में तड़प उठी।
मेरे पास लोग आते हैं, वे पूछते हैं: क्या आप युवकों को भी संन्यास दे देते हैं? संन्यास तो वृद्धों के लिए है। शास्त्र तो कहते हैं--‘पचहत्तर साल के बाद।’ तो शास्त्र बेईमानों ने लिखे होंगे, तो शास्त्र उन्होंने लिखे होंगे जो संन्यास के खिलाफ हैं। तो शास्त्र उन्होंने लिखे होंगे, जो संसार के पक्ष में हैं। क्योंकि सौ में निन्यानबे मौके पर तो पचहत्तर साल के बाद तुम बचोगे ही नहीं। संन्यास कभी होगा ही नहीं; मौत ही होगी। और इस दुनिया में जहां जवान को भी मौत आ जाती हो, वहां संन्यास को पचहत्तर साल तक कैसे टाला जा सकता है?
इस दुनिया में जहां बच्चे भी मर जाते हों, इस दुनिया में जहां जन्म के बाद बस, एक ही बात निश्चित है--मृत्यु, वहां संन्यास को एक क्षण भी कैसे टाला जा सकता है? इस दुनिया में--जो मौत से घिरी है--जिस दिन तुम्हें मौत दिख जाएगी, जिस दिन इससे पहचान हो जाएगी, जिस दिन तुम देख लोगे: सब राख ही राख है, उसी दिन संन्यास घटेगा। फिर क्षण भर भी रुकना संभव नहीं। फिर स्थगित नहीं किया जा सकता।
उन्नीस वर्ष की उम्र में चरणदास चले गए जंगलों में--रोते, चीखते, पुकारते। सब-कुछ दांव पर लगा दिया। और एक अपूर्व घटना घटती है। जब तुम परमात्मा को खोजने निकलते हो, तब गुरु मिलता है। निकलते तुम परमात्मा को खोजने, मिलता गुरु है। क्योंकि परमात्मा से सीधा साक्षात नहीं हो सकता। तुम्हारे बीच और परमात्मा के बीच भूमिका का बड़ा अंतर है।
कहां तुम, कहां परमात्मा! कहां तुम बाहर-बाहर, कहां परमात्मा भीतर-भीतर, इन दोनों के बीच कोई सेतु नहीं, कोई संबंध नहीं।
जो भी परमात्मा को खोजने गया है, उसे गुरु मिला है। वह परमात्मा तुम्हारे प्रति सदय हुआ, तुम्हारे भाग्य खुले--इसकी खबर है, इसकी सूचना है।
मांगो परमात्मा को, मिलता गुरु है। और गुरु मिल जाए, तो समझो कि तुम्हारी प्रार्थना सुनी गई; पहुंची। अब तुम अकेले नहीं हो। सेतु फैला; दोनों किनारे जुड़े।
तुम इस किनारे हो, परमात्मा उस किनारे है; गुरु सेतु है--जो दोनों किनारों को जोड़ देता है। गुरु कुछ तुम जैसा, कुछ परमात्मा जैसा। एक हाथ तुम्हारे हाथ में, एक हाथ परमात्मा के हाथ में। अब इस सहारे तुम जा सकोगे। अब यह जो झूलता सा पुल है, यह जो लक्ष्मण झूला है--इससे तुम जा सकोगे।
दूसरा किनारा तो शायद अभी दिखाई भी नहीं पड़ता, दूसरा किनारा बहुत दूर है और दूसरे किनारे को देखने वाली आंखें भी अभी तुम्हारी जन्मी नहीं। तुम्हारी आंखें बहुत धुंधली हैं--इस संसार की धूल से।
यह जो राख ही राख है, यह राख सब तरफ उड़ रही है; इसने तुम्हारी आंखों को भी धूमिल किया है, तुम्हारा दर्पण भी राख से दब गया है। और जन्मों-जन्मों से राख पड़ रही है। तुम भूल ही गए कि तुम्हारे भीतर कहीं दर्पण भी है। ऐसी अवस्था में तुम पुकारोगे परमात्मा को, मिलेगा गुरु। यह थोड़ा समझना।
वास्तविक खोजी परमात्मा को खोजने जाता है और गुरु के चरण मिलते हैं। अगर गुरु के चरण मिल जाएं, तो समझ लेना: तुम्हारी अर्जी स्वीकार हो गई; तुम्हारी खबर पहुंच गई। उस किनारे से जुड़ा हुआ कोई मिल गया।
चरणदास के गुरु थे एक अपूर्व संन्यासी, सुकदेवदास। बड़ी मीठी कथा है। चरणदास को जब सुकदेवदास मिले... तो चरणदास ने कहीं भी नहीं कहा है अपने वचनों में कि यह कोई और थे। उन्होंने तो यही कहा है कि व्यास के बेटे सुकदेवमुनि थे।
इस पर बड़ी अड़चन है, क्योंकि चरणदास और व्यास के बीच हजारों साल का फासला है। पंडित इससे राजी नहीं; शास्त्रज्ञ इससे राजी नहीं; खोज-बीन करने वाले, राख के ढेर में ही तलाश करने वाले इससे राजी नहीं।
वियोगी हरि ने लिखा है: ‘खोज के आधार पर यह पाया जाता है कि अपने गुरु को व्यास-पुत्र सुकदेवमुनि कहना तो केवल श्रद्धा-भावना की बात है। असल में इनके गुरु सुकदेवदास नाम के एक महात्मा थे, जो मुजफ्फरनगर के पास सूकरताल गांव में रहते थे।’
वियोगी हरि का यह कहना कि अपने गुरु को व्यास-पुत्र सुकदेवमुनि कहना तो ‘केवल श्रद्धा-भावना की बात है...।’ ‘केवल श्रद्धा-भावना की!’ जैसे श्रद्धा-भावना का कोई मूल्य नहीं। जैसे तुम्हारे मुर्दा तथ्य श्रद्धा-भावना से ज्यादा मूल्यवान हैं। जैसे सूकरताल गांव और मुजफ्फरनगर बड़ी मूल्यवान बातें हैं।
‘खोज के आधार पर...।’ पंडित इसी तरह की खोज में लगे रहते हैं। पंडित सार को तो पकड़ ही नहीं पाता, असार की खोज करता रहता है।
श्रद्धा-भावना को ‘केवल’ कहना! ‘केवल श्रद्धा-भावना की बात है’--अच्छे शब्दों में कहना है कि यह सब तो बातचीत है; यह सचाई नहीं है। संतों को समझने का यह रास्ता नहीं, यह ढंग नहीं।
संत इतिहास के हिस्से कम, इतिहास के किनारे-किनारे जो शाश्वत की धारा है, उसके हिस्से ज्यादा हैं।
अगर चरणदास ने कहा है कि मेरे गुरु व्यास-पुत्र सुकदेव थे, तो इसे केवल श्रद्धा-भावना की बात कह कर मत टाल देना। सच तो यह है कि जब भी तुम्हें गुरु मिलेगा, तभी परम गुरु मिलेगा। गुरु मिला कि परम गुरु ही मिलता है। न मिले, तो बात अलग। गुरु जब मिलता है, तो वह परम गुरु की प्रतिमा है। व्यास-पुत्र सुकदेव तो सिर्फ प्रतिमा हैं परम गुरु की।
जब भी किसी ने गुरु को पा लिया, तो उसने अपने गुरु में सारे गुरुओं को पा लिया। एक गुरु में जैसे सारे गुरुओं का सिलसिला, श्रृंखला उपलब्ध हो गई।
यह केवल श्रद्धा-भावना की बात नहीं है। यह जीवन को देखने का एक और ही ढंग है। श्रद्धा तो इसमें है, लेकिन श्रद्धा, कल्पना की पर्यायवाची नहीं है। भावना तो इसमें है, लेकिन भावना का मतलब बे-पर की बातें नहीं होता। यह जीवन को देखने का और ढंग है।
जैसे कोई गुलाब के फूल को देखे और गुलाब के फूल के सौंदर्य से अभिभूत हो जाए और नाच उठे। और तुम वैज्ञानिक बुद्धि के व्यक्ति उसके पास जाकर कहो कि यह क्या कर रहे हो? कहां है सौंदर्य? हां, फूल है सच, और फूल में पदार्थ भी है--सच; और ले चलते हैं इसे विज्ञान की प्रयोगशाला में और जांच-परख कर लेंगे; खंड-खंड फूल को तोड़ कर देख लेंगे। और तुम भी पाओगे: और सब पाया जाता है, सौंदर्य नहीं पाया जाता। सौंदर्य तो केवल श्रद्धा-भावना की बात है।
बात सच है। तथ्य के जगत में यही सच है: सौंदर्य तो श्रद्धा-भावना की बात है। लेकिन सौंदर्य के बिना फूल का अर्थ ही खो जाता है। तब उसमें कुछ रासायनिक द्रव्य मिलेंगे: जल मिलेगा, मिट्टी मिलेगी, रंग मिलेंगे--सब मिल जाएगा, लेकिन जो मिलने योग्य था, वह तो खो ही गया।
यह ऐसे ही है, जैसे एक जीवित बच्चे को कोई काट ले खंड-खंड और खोजने चले कि क्या था इसके भीतर, जो इसे चलाता था, जो इसे जिलाए था? कौन था जो श्वास लेता था? हड्डी-मांस-मज्जा मिलेगी; सब-कुछ मिलेगा, लेकिन जो चलाता था, वह नहीं मिलेगा। उसे पाने का यह ढंग नहीं। वह अदृश्य तुम्हारी दृश्य की अतिशय पकड़ में खो जाएगा।
चरणदास जब कहते हैं कि मेरे गुरु व्यास-पुत्र सुकदेव थे, तो स्वभावतः पंडित हैरान होता है, क्योंकि इन दोनों के बीच समय का बड़ा फासला है, हजारों साल का फासला है। सुकदेव मिल कहां जाएंगे चरणदास को? मुजफ्फरपुर के पास सूकरताल गांव के निकट के जंगल में मिल कहां जाएंगे सुकदेवदास?
तो पंडित तथ्य को खोजता है। लेकिन जब चरणदास को गुरु मिले होंगे, तो चरणदास के लिए गुरु का जो औपचारिक रूप है, वह व्यर्थ हो गया। देह अलग होगी; रूप-रंग अलग होगा; समय काल अलग होगा; लेकिन वह जो अंतर्निहित तत्व है, वह एक है।
सभी गुरुओं में एक ही परम गुरु बोला है। इसलिए भारत की यह बात कई लोगों को समझ में नहीं आती। यहां कई किताबें हैं, जो सभी व्यासदेव ने रचीं! दो किताबों के बीच हजारों साल का फासला हो सकता है; दोनों व्यासदेव ने रचीं। एक ही आदमी रचता रहा इतनी किताबें?
तो वैज्ञानिक बुद्धि कहती है कि नहीं; या तो बहुत व्यासदेव नाम के आदमी हुए और या फिर लोगों ने व्यासदेव के नाम से किताबें रच दीं। यह वस्तुतः व्यासदेव की रची नहीं हो सकतीं। लेकिन उन्हें पता नहीं है।
जो भी सत्य को उपलब्ध होता है, उसी को हम व्यासदेव कहते हैं। इसलिए तो जो भी कोई सत्य की प्रतिष्ठा से बोलता है, उसकी पीठ को व्यास-पीठ कहते हैं। वहां बैठते ही, उस पीठ पर बैठते ही, उस प्रतिष्ठा पर बैठते ही उसका जो नाम-धाम था--खो गया; उसका जो औपचारिक पता-ठिकाना था--खो गया। समय की धारा में उसके जो चिह्न थे, वे खो गए। वह शाश्वत से जुड़ गया। उस शाश्वत गुरु का नाम है व्यासदेव।
चरणदास को उन अपने गुरु की आंखों में शाश्वत गुरु के दर्शन हुए--इतनी ही बात कही है।
यह श्रद्धा-भावना की बात नहीं है; यह सत्य ही है; लेकिन यह सत्य किसी दूसरे तल का है। यह सत्य वस्तुओं के तल का नहीं; यह सत्य अनुभूतियों के तल का है।
चरणदास को गुरु मिले, उसके पहले चरणदास का नाम रणजीत सिंह था। गुरु ने नाम बदल दिया। दीक्षा दे दी। संन्यास में प्रवेश दिलवा दिया।
नाम की बदलाहट बड़ी महत्वपूर्ण है। रणजीत सिंह: आक्रमक, हिंसात्मक, महत्वाकांक्षा से भरा हुआ नाम था। नाम दिया: चरणदास। एकदम उलटा कर दिया! कहां रणजीत सिंह और कहां चरणदास! सारी जीवन-दिशा बदल दी!
रणजीत सिंह में है: आक्रमण, विजय की आकांक्षा, हिंसक महत्वाकांक्षा! इसी हिंसक महत्वाकांक्षा के कारण तो ‘सिंह’; ‘रणजीत’--युद्ध को जीतने चला हुआ व्यक्ति; विजय की यात्रा। एकदम बदल दिया। प्रत्याहार किया। महावीर जिसको कहते हैं: प्रतिक्रमण किया। जो बाहर जाती थी ऊर्जा, भीतर लौटा दी! कहा, कहां जाएगा बाहर? जीत बाहर नहीं है। जीत भीतर है।
और भीतर की जीत का अपूर्व नियम है कि जो हारने को राजी हो, वही जीतता है। जो जीतने चला, वह हार जाता है। यहां जो संकल्प करेगा, वह मिटेगा। और यहां जो समर्पण करता है, सभी कुछ उसे उपलब्ध हो जाता है।
चरणदास यानी समर्पण। रणजीत सिंह यानी संकल्प। रणजीत सिंह यानी दूसरों पर विजय की घोषणा करनी है। और चरणदास यानी अब किसी पर विजय की घोषणा नहीं करनी। झुक गए, प्रभु के चरणों में झुक गए। और जो झुका है, उसने पाया है कि सभी चरण उसके हैं, तो सभी चरणों में झुक गए।
संन्यास के क्षण में नाम का रूपांतरण सिर्फ नाम का रूपांतरण नहीं। गुरु इंगित देता है, इशारा देता है, आगे की यात्रा की सारी कथा कह देता है। इस छोटे से फर्क से सारा फर्क हो गया। इसमें सारा शास्त्र आ गया, सारी साधना, सारा जीवन अनुशासन, सारी जीवन की शैली बदल दी।
चरणदास के पहले मैं उनकी दो शिष्याओं पर बोला--सहजो और दया। तुम थोड़े चौंकोगे। शिष्यों पर पहले बोला, फिर गुरु पर बोलता हूं। लेकिन चौंकने की बात नहीं है। कारण पीछे है।
कहते हैं: वृक्ष फल से जाना जाता है। सहजो और दया दो फल लगे चरणदास पर। उनका रस तुमने पीआ, चखा। उनके रस के बाद ही अब तुम इस वृक्ष-मूल में उतर सकोगे। उस पहचान के बाद ही चरणदास में जाना आसान होगा।
सहजो ने अपने गुरु के संबंध में यह गीत गाया है:
सखी री आज धन धरती धन देसा।
धन देहरा मेवात मंझारे हरि आए जन भेसा।।
कि आज का दिन धन्य है, कि आज धरती धन्य है, कि आज देश धन्य है।
सखी री आज धन धरती धन देसा।
धन देहरा मेवात मंझारे हरि आए जन भेसा।।
मेवात के देहरा नाम के छोटे से गांव में ‘हरि आए जन भेसा’--चरणदास में हरि का अवतरण हुआ है।
धन भादों धन तीज सुधी है, धन दिन मंगलकारी।
धन धूसर कुल बालक जनम्यौ, फुल्लित भए नर नारी।।
धन-धन माई कुंजी रानी, धन मुरलीधर ताता।
अगले दत्तव अब फल पाए, जिनके सुत भयो ज्ञाता।।
कहा कि जिनके घर में एक जानने वाला पैदा हो गया है, उस घर में पहले भी जितने पैदा हुए थे, वे भी सब धन्य हो गए।
एक फल भी अमृत का लग गया, तो उस फल के पीछे का पूरा सिलसिला धन्य हो गया। पूर्णाहुति आ गई; परम शिखर आ गया।
अगले दत्तव अब फल पाए,...
सदियों-सदियों से यह कुल चेष्टा में रत रहा होगा। कितनों ने आकाक्षाएं बांधी होंगी। कितनों ने पाना चाहा होगा। कितने असफल बिना पाए विदा हो गए होंगे। लेकिन उन सब ने जो बीज बोए थे, प्रभु को पाने की आकांक्षा के, वे इस चरणदास में पूरे हुए।
...जिनके सुत भयो ज्ञाता।
जिनके घर एक जानने वाला बेटा जन्म गया।
सखी री आज धन धरती धन देसा।
धन देहरा मेवात मंझारे हरि आए जन भेसा।।
सहजो और दया का रस तुमने खूब लिया। वह रस चरणदास की प्रसादी थी। वह रस चरणदास के संपर्क में ही उन्हें लगा। वह रंग, वह ढंग, चरणदास की सोहबत का फल था। सत्संग उन्हें छू गया। और ऐसा दो के साथ ही नहीं हुआ। चरणदास के पास सैकड़ों लोग परम अवस्था को उपलब्ध हुए। चरणदास के चरणों में हजारों लोगों ने प्रभु का स्पर्श पाया, प्रभु का स्वाद पाया।
जंगल में भटकते थे। गुरु का तो कोई खयाल भी न था। आस तो प्रभु की थी; प्यास तो प्रभु की थी; गुरु का तो कोई खयाल भी न था; गुरु की तो कोई खोज भी न चल रही थी।
अक्सर ऐसा ही होता है। गुरु को खोजने कौन निकलता है? लोग तो प्रभु को ही खोजने निकलते हैं; गुरु मिलता है--यह दूसरी बात है।
खोज गुरु की कोई नहीं करता। गुरु की खोज तुम करोगे भी कैसे? खोज तो आत्यंतिक की है, अंतिम की है। खोज तो परमात्मा की है। लेकिन उसी खोज में धक्के खाते-खाते, रोते-रोते, चीखते-चिल्लाते, प्रार्थना-पूजा करते, ध्यान-प्रेम में रमते एक दिन गुरु से मिलना हो जाता है।
जाना तो उस पार है। अनेक-अनेक तरह से तुम उस पार जाने की चेष्टा करते हो, तब धीरे-धीरे तुम्हें समझ में आता है कि उस पार ऐसे न जा सकोगे; माझी की जरूरत पड़ेगी, नाव की जरूरत पड़ेगी। मगर जिसने बहुत खोज की उस पार जाने की, उसे माझी मिल जाता है।
यह जगत तुम्हारी हर खोज में सहयोगी है। इस सत्य को तुम खूब हृदय में सम्हाल कर रख लेना।
तुम गलत खोजते हो, तो भी यह जगत सहयोगी है। तुम पाप करने जाते हो, तो भी यह अस्तित्व तुम्हारा साथ देता है। इस अस्तित्व की अनुकंपा तुम पर अपार है और बेशर्त है।
तुम बुरा भी करने जाते हो, तो अस्तित्व रोक नहीं लेता। तुम बुरा भी करने जाते हो, तो ऐसा नहीं होता कि श्वास चलनी बंद हो जाए; कि परमात्मा तुम्हारे जीवन को छीन ले; कि पैर न उठें; कि लकवा लग जाए; कि तुम गिर पड़ो।
नहीं, तुम बुरा करने जाते हो, तो भी परमात्मा तुम्हारे भीतर श्वास लेता ही रहता है। तुमसे कहे जाता है भीतर-भीतर; बड़े मंदिम स्वर हैं उसके; फुसफुसाए जाता है कि रुको, मत करो। लेकिन तुम्हारे जीवन को नहीं छीन लेता; तुम्हारी स्वतंत्रता को नहीं छीन लेता। तुम्हें साथ देता है; बुरे में भी साथ देता है।
तो फिर उसकी तो बात ही क्या कहनी, जब तुम परमात्मा को ही खोजने निकलते हो। तब सब तरफ से तुम्हारे लिए सहयोग मिलता है।
ऐसी दशा रही होगी चरणदास की।
तुम परीशान न हो, बाबे-करम वा न करो।
और कुछ देर पुकारूंगा, चला जाऊंगा।।
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते हैं।
शबे-तारीक गुजारूंगा, चला जाऊंगा।।
रास्ता भूल गया या वही मंजिल है मेरी।
कोई लाया है कि खुद आया हूं, मालूम नहीं।।
कहते हैं: हुस्न की नजरें भी हसीं होती हैं।
मैं भी कुछ लाया हूं, क्या लाया हूं, मालूम नहीं।।
यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब बेच आया।
कहीं इनआम मिला और कहीं कीमत भी नहीं।।
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है।
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं।।
‘तुम परीशान न हो, बाबे-करम वा न करो।’ प्रार्थी कहता है कि अगर तुम्हें कष्ट होता हो दरवाजा खोलने में, तो मत खोलो। मैं थोड़ी देर पुकारूंगा और चला जाऊंगा। तुम मेरी बहुत फिकर न करो। मैं पुकारता हूं, मेरे कारण।
तुम परीशान न हो, बाबे-करम वा न करो।
तुम्हारी कृपा के द्वार के खोलने में अगर तुम्हें झंझट होती हो, तुम्हें मेरी तरफ बरसने में अगर कोई अड़चन आती हो, तो तुम परीशान न हो, बाबे-करम वा न करो; और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा।
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते हैं।
शबे-तारीक गुजारूंगा चला जाऊंगा।।
माना कि तेरे कूचे में चांद उगा करते हैं। मैं अंधेरी रात में ही रह लूंगा और चला जाऊंगा। लेकिन तू तकलीफ न करना। यह सहज हो सके, तो ठीक। तेरा दर्शन सहज हो सके, तो ठीक।
तुम परीशान न हो, बाबे-करम वा न करो।
और कुछ देर पुकारूंगा, चला जाऊंगा।।
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते हैं।
शबे-तारीक गुजारूंगा, चला जाऊंगा।।
माना कि तेरी गली में चांद उगते हैं, रोशनी झरती है, पर मेरा भाग्य मैं अंधेरी रात में ही गुजार लूंगा, मगर मैं पुकारता हूं, इस कारण तू कष्ट में मत पड़ना।
रास्ता भूल गया या वही मंजिल है मेरी।
मुझे यह भी पक्का पता नहीं है कि मैं रास्ता भूल कर तुझे पुकारने लगा हूं।
लोगों ने सदा ऐसा ही समझा है कि संन्यास की तरफ जाते हुए लोग, परमात्मा को खोजते हुए लोग रास्ता भूल गए हैं। क्योंकि लोगों को भरोसा है कि वे ठीक रास्ते पर हैं। क्योंकि भीड़ उनके साथ है।
संन्यासी अकेला पड़ जाता है; सत्य का खोजी अकेला पड़ जाता है। सारी दुनिया तो धन खोज रही है, पद खोज रही है; सत्य को कौन खोजना चाहता है?
लोग तो सत्य बेचने को तैयार हैं। चांदी के ठीकरे मिलें, तो सत्य बेचने को तैयार हैं; जिंदगी लुटाने को तैयार हैं। पद मिले, प्रतिष्ठा मिले।
रास्ता भूल गया या वही मंजिल है मेरी।
कोई लाया है कि खुद आया हूं, मालूम नहीं।।
यह भी कुछ पक्का नहीं कि कैसे इस जंगल में चला आया; कैसे तुझे खोजता हूं? क्यों तुझे पुकारता हूं? और तू मेरी मंजिल है या कि मैं रास्ता भटक गया हूं!
रास्ता भूल गया या वही मंजिल है मेरी।
कोई लाया है कि खुद आया हूं, मालूम नहीं।।
कहते हैं: हुस्न की नजरें भी हसीं होती हैं।
मैं भी कुछ लाया हूं, क्या लाया हूं, मालूम नहीं।।
कुछ भेंट करनी है तुझे और तेरे परम सौंदर्य की आंखों में मेरी भेंट का क्या मूल्य!
कहते हैं: हुस्न की नजरें भी हसीं होती हैं।
तेरी आंखें भी परम सुंदर होंगी; तू परम सौंदर्य है; मेरी भेंट तेरी नजरों में किसी काम की उतरेगी, न उतरेगी! फिर इसकी भी क्या फिकर।
कहते हैं: हुस्न की नजरें भी हसीं होती हैं।
मैं भी कुछ लाया हूं, क्या लाया हूं, मालूम नहीं।।
कुछ चढ़ाना चाहता हूं, कुछ अर्पित करना चाहता हूं, लेकिन क्या--यह मुझे भी पता नहीं है।
भक्त अज्ञान में रोता है। भक्त का अज्ञान उसकी निर्दोषता है।
यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब बेच आया।
वह जिंदगी में सब लुट गया। वह जो राख ही राख में काफी दिन बिताए...। सब राख हो गया।
यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब बेच आया।
जिंदगी में जो था, सब लुटा दिया; व्यर्थ कूड़ा-करकट में लुटा दिया।
कहीं इनआम मिला और कहीं कीमत भी नहीं।।
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है।
भक्त कहता है: और तो कुछ नहीं बचा है, सिर्फ आंखों में तुम्हें देख लेने की एक आशा बची है। और तो सब, जो मेरे पास था, सब बेच आया।
कहीं इनआम मिला और कहीं कीमत भी नहीं।।
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है।
दर्शन की आशा--प्रिय-दर्शन की आशा बस, उतना ही है मेरे पास। उसको सम्पदा भी क्या कहो! उसको भेंट भी क्या कहो?
एक अपूर्व पिपासा है, एक गहन प्यास है...।
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है।
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं।।
भक्त कहता है: देख लो, तो तुम्हारी अनुकंपा। और न देखो, तो शिकायत भी क्या। ऐसा कुछ विशेष ले भी कहां आया हूं कि शिकायत करूं। सब गंवा कर आया हूं।
भक्त जब भगवान की तरफ खुलना शुरू होता है, तो बड़ी दीनता--असीम दीनता की प्रतीति होती है।
जीसस ने कहा है: धन्यभागी हैं वे, जो दरिद्र हैं, क्योंकि प्रभु का राज्य उन्हीं का होगा। परमात्मा की तरफ जाने वाला आदमी अगर यह खयाल करे कि मैं कुछ लेकर आया हूं--कुछ मूल्यवान--तो परमात्मा की तरफ जा ही न सकेगा। वहां तो हार कर जाना होता है; मिट कर जाना होता है; खोकर जाना होता है। वहां तो भिखारी की झोली लेकर जाना होता है। वहां तो यही कहते जाना होता है: मेरे पास कुछ है भी नहीं कि तुझे चढ़ा दूं। मगर फिर भी तेरे दर्शन की आशा है। ‘अखियां हरि दर्शन की प्यासी।’
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं।
बस, इसी घड़ी में मिलन होता है। और मिलन गुरु से होता है। मिलन परमात्मा से सीधा नहीं हो सकता। परमात्मा प्रत्यक्ष नहीं आता; परोक्ष आता है। परमात्मा सीधे-सीधे नहीं आता; छिपे-छिपे आता है। परमात्मा शोरगुल और बैंड-बाजे बजाते नहीं आता। परमात्मा ऐसा गुप-चुप आता है, ऐसा सन्नाटे की तरह आता है, कि अगर तुम शांत और चुप न हुए, तो चूक जाओगे।
और परमात्मा किसी के वेश में आता है। अगर प्यास सच्ची न हुई, तो तुम पहचान न पाओगे।
इस प्रार्थना से भरे हुए क्षण में गुरु से मिलन हुआ। लेकिन चरणदास पहचान गए। इसलिए अपने गुरु को सुकदेवमुनि कहा है।
सुकदेवमुनि--निर्दोष, निर्विकार, निर्विचार भाव-दशा की साकार प्रतिमा हैं। और जब भी कोई अपने गुरु की आंखों में आंख डाल कर देखेगा, तो उसी एक को पाएगा। गुरु एक ही है; बहुत गुरुओं में प्रकट होता है, यह बात दूसरी है।
सूत्र:
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।।
राव-रंक सूं सम गिनै, कछु आसा नाहीं।
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
एक-एक शब्द मूल्यवान है।
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
बड़े भाग्य से मिलती है यह अजब फकीरी। अजब क्यों? क्योंकि इधर आदमी फकीर होने लगता है, उधर साहब होने लगता है। अजब फकीरी! इधर दरिद्र होने लगता है; उधर समृद्धि बरसने लगती है। अजब फकीरी! सब खोने लगता है और सब पाने लगता है। हारता है और विजय आती है; अजब फकीरी!
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
फकीर ही सम्राट हो पाता है। कुछ बचता नहीं हाथ; हृदय खाली हो जाता है; लेकिन उसी शून्य में तो परमात्मा उतरता है। संसार हटा; जगह खाली हुई; स्थान बना; उसी स्थान में परमात्मा अवतरित होता है। अहंकार सिंहासन से उतरा, उसी सिंहासन पर तो परमात्मा विराजमान होता है।
रणजीत सिंह भरे रहे होंगे; चरणदास खाली हुए। रणजीत सिंह संसार की आकांक्षाओं, वासनाओं की भीड़ से घिरे रहे होंगे, चरणदास झुके। अब कोई यात्रा न रही अहंकार की।
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
धन्यभागी हैं वे, जो इस अपूर्व दशा को पा लेते हैं। बाहर से दिखते हैं फकीर और भीतर से शहनशाह हो जाते हैं। बाहर कुछ भी नहीं और भीतर सब-कुछ। इससे उलटी दशा भी दुनिया में है। बाहर सब-कुछ और भीतर कुछ भी नहीं। तो सम्राट हो सकता है कोई, और भीतर भिखारी हो। और भीतर सम्राट हो सकता है कोई, और बाहर भिखारी हो। इसलिए बाहर से मत तौलना; बाहर से मत जांचना।
और ऐसा भी नहीं है कि भीतर से सम्राट होने के लिए बाहर से भिखारी होना जरूरी ही हो। और ऐसा भी नहीं है कि भीतर से भिखारी रहने के लिए बाहर भी भिखारी होना जरूरी हो।
जिंदगी का गणित बड़ा अतर्क्य है, क्योंकि हमने ऐसे लोग भी देखे हैं--जनक और कृष्ण--जो बाहर से भी सम्राट और भीतर से भी सम्राट। और तुम्हें रास्तों पर चलते हुए भिखारी भी मिल जाएंगे, जो बाहर से भी भिखारी और भीतर से भी भिखारी। लेकिन ये दो अति छोर हैं, अतियां हैं।
अधिकतर तो ऐसा होता है कि बाहर से सब-कुछ, भीतर से कुछ नहीं।
इस रूपांतरण का नाम संन्यास है। बाहर की फिकर न रही, चिंता न रही। बाहर पर पकड़ गई। बाहर से मुट्ठी खुली, तो भीतर की संपदा की वर्षा शुरू हो जाती है। वर्षा तो होती ही थी, तुम बाहर आंखें लगाए थे, सो भीतर देखने से चूके चले जाते थे। अब बाहर से आंखें बंद हो गईं, तो भीतर का अपूर्व बरसता हुआ अमृत तुम्हें दिखाई पड़ने लगा।
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
चरणदास कहते हैं: अजब की बात हो गई, गजब की बात हो गई: सब खो कर सब पा लिया। सब गंवा कर सब पा लिया। जीसस ने कहा है: जो गंवाएगा, वही पाएगा। और जो बचाएगा, वह गंवा देगा।
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
लेकिन तुम तो जब धन मिलता है तो कहते--भाग्यशाली। पद मिलता है तो कहते--भाग्यशाली।
मेरे पास लोग आ जाते हैं; वे कहते हैं कि ‘आपकी कृपा से सब है। मकान है, पत्नी है, बच्चा है, धन-दौलत है; सब सुख से चल रहा है। आपकी कृपा से सब ठीक चल रहा है।’
यह भी कोई कृपा हुई! यह जो सब ठीक चल रहा है, यहां राख और राख के सिवाय कुछ भी नहीं। यह राख का ढेर है। और तुम मेरे पास आकर कह रहे हो कि आपकी कृपा से राख का ढेर बड़ा होता जा रहा है!
यह भाग्य नहीं है। तुम अभागे हो। अभागे हो, क्योंकि इस व्यर्थ की मिट्ठी के ढेर को तुम समझ रहे हो संपदा। भाग्य तो उस दिन होगा, जिस दिन तुम समझोगे: ‘अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।’ जिस दिन तुम आकर कहोगे कि भाग्यशाली हूं कि बाहर से नजर मुड़ी; कि बाहर पर पकड़ न रही; कि बाहर व्यर्थ हुआ, कि अब भीतर चलता हूं। न अब पत्नी पत्नी है, न अब बेटा बेटा है; न धन धन है, न दुनिया दुनिया है। अब तो बस, एक की तलाश करता हूं। अनेक की तलाश में बहुत भटक लिया। जिस दिन तुम आकर कहोगे कि अनेक की तलाश में बहुत-बहुत भटक लिया; अब एक की तलाश में चलता हूं, उस दिन भाग्य है।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।
चरणदास कहते हैं: अब कुछ भी नहीं चाहिए। लग गया अब प्रेम परमात्मा का, रंग गए उसके रंग में। सब मिल गया। उस मिलन में सब मिलन है।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।
राव रंक सूं सम गिनै, कछु आसा नाहीं।।
अब जब कोई वासना न रही, पाने की कोई इच्छा न रही, तो स्वभावतः गरीब और अमीर बराबर हो गए।
राव रंक सूं सम गिनै,...
यह बात समझना।
तुम्हारे जीवन में जो मूल्य-भेद हैं, वे तुम्हारी वासना की सूचनाएं हैं। एक गरीब आदमी रास्ते पर मिलता है, तो तुम उसे बिना देखे गुजर जाते हो। आदमी जैसा आदमी है, लेकिन गरीब है। तुम ऐसे गुजर जाते हो, जैसे कोई रास्ते पर मिला ही नहीं। वह जयरामजी भी करे, तो तुम्हारे भीतर से उत्तर नहीं आता। तुम देखा अनदेखा कर देते हो। फिर एक धनी आदमी मिलता है, तब तुम्हें दूर से दिखाई पड़ने लगता है। तब तुम झुक-झुक कर नमस्कार करने लगते हो। तब अगर तुम्हें उत्तर मिल जाता है धनी आदमी से, तो तुम अपने को धन्यभागी समझते हो।
दोनों आदमी जैसे आदमी हैं, लेकिन गरीब की तुमने उपेक्षा की--क्यों? अमीर को नमस्कार किया--क्यों? कल यह अमीर अगर गरीब हो जाएगा, फिर तुम नमस्कार करोगे? फिर नहीं करोगे। कल यह गरीब अगर अमीर हो जाएगा, तो तुम झुक-झुक कर नमस्कार करोगे--क्यों? क्या खबर आती है इससे? इससे खबर आती है कि तुम अमीर होना चाहते हो और गरीब नहीं होना चाहते।
यह जो तुम्हारा मूल्य-भेद है, यह तुम्हारी चित्त-दशा, तुम्हारी वासना की खबर देता है। तुम उसी का आदर करते हो, जो तुम होना चाहते हो।
राजनेता गांव में आ गए; चले तुम भीड़ में; सब काम-धाम छोड़ा। वही राजनेता जब पद पर नहीं होता और गांव में आता है, तो कोई जाता नहीं। अपना सामान खुद राजनेता को उतार कर रखना पड़ता है। खुद टैक्सी तलाश करनी पड़ती है। गए वे दिन, जब लोगों की भीड़ होती थी और लोगों की भीड़ से बचाने के लिए पुलिस का इंतजाम करना होता था। अब कोई नहीं आता। क्या हो गया?
लोग किसी के लिए नहीं आते। लोग अपनी आकांक्षा, महत्वाकांक्षा के लिए आते हैं। लोग पद की प्रतिष्ठा करते हैं, क्योंकि पद पर होना चाहते हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हारे मन में तब तक गरीब-अमीर का भेद बना ही रहेगा, पदवान और पदहीन का भेद बना ही रहेगा, जब तक तुम्हारे भीतर जरा सी भी वासना शेष है; तब तक तुम समभावी न हो सकोगे। सम्यकत्व तभी आएगा, जब तुम्हारी भीतर की वासना चली जाएगी। फिर क्या फर्क है? फिर कोई फर्क नहीं रह जाता।
एक सम्राट का वजीर संन्यस्त हो गया; राज्य छोड़ कर जंगल में चला गया। उसके ज्ञान की खबरें गांव तक आने लगीं, राजधानी तक आने लगीं, सम्राट के महल तक आने लगीं। आखिर सम्राट भी उत्सुक हुआ और उसने कहा कि चलो एक दिन उसके दर्शन करें।
जब सम्राट पहुंचा जंगल में, तो वह फकीर एक ढपली बजा रहा था। पैर फैलाए हुए एक वृक्ष के नीचे बैठा था। सम्राट आकर भी खड़ा हो गया, तो फकीर ने खड़े होकर नमस्कार भी न किया। वह उसका वजीर था। वह अपनी ढपली ही बजाता रहा, जैसे कोई आया ही नहीं। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और वैसे ही पैर पसारे रहा, जो कि बड़े अशोभन थे। सम्राट की तरफ पैर पसारे बैठा रहा; पैर भी न मोड़े !
सम्राट ने कहा कि सुनो, क्या सब शिष्टाचार भी भूल गए? और मैंने तो तुम्हें सदा बड़ा शिष्टाचारवान पाया था; यह क्या हो गया? तुम घुटने तक नहीं मोड़ रहे? ये ढपली भर ठोके जा रहे हो और मैं सामने आकर खड़ा हूं! तुमने नमस्कार भी नहीं किया?
वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा: अब किसलिए घुटने मोड़ें? घुटने मोड़ते थे, क्योंकि जो आप हो, वही होना चाहते थे। अब किसलिए घुटने मोड़ें? अब कौन मेरे घुटने मुड़वा सकता है? और ढपली बजाना क्यों रोकूं? आप भ्रांति में हैं। आप सोचते हैं: वह शिष्टाचार था। वह मेरी महत्वाकांक्षा थी; वह महत्वाकांक्षा को छिपाने की व्यवस्था थी। नहीं तो महत्वाकांक्षा खतरनाक मालूम हो सकती है, तो उस शिष्टाचार में छिपाना होता है।
शिष्टाचार के वस्त्रों में छिप जाती है महत्वाकांक्षा, तो उतनी कुरूप नहीं मालूम होती।
धनी आदमी आता है, राजा आता है, तुम उठ कर खड़े हो जाते हो। गरीब गुजर जाता है, कोई पता नहीं चलता। तुम्हारा नौकर तुम्हारे कमरे में आता है; तुम स्वीकार ही नहीं करते कि कोई आदमी आया! नौकर, जैसे आदमी नहीं... तुम्हारा मालिक आता है, तब तत्क्षण तुम उठ कर खड़े हो जाते हो।
तुम इन भेदों को समझना। इनका कोई संबंध शिष्टाचार से नहीं है। इनका संबंध भीतर गहरी वासना से है।
इसे सूत्र समझो: तुम जो होना चाहते हो, उसका तुम आदर करोगे।
लोग राजनेता का इतना आदर करते हैं, क्योंकि लोग राजनेता होना चाहते हैं। इस देश में कभी वे भाग्यशाली दिन भी थे, जब राजनेता का कोई मूल्य नहीं था। जब मूल्य फकीरों का था, जब मूल्य संन्यासियों का था। वे धन्यभाग के दिन थे, क्योंकि वे इस बात की खबर थे कि लोग फकीर होना चाहते थे।
तुम जो होना चाहते हो, उसी को आदर देते हो। तुम्हारा आदर बड़ा सूचक है।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।
अब क्या चाहिए?
राव रंक सूं सम गिनै, कछु आसा नाहीं।
अब कोई वासना न रही, पाने की कोई इच्छा न रही। इसलिए सम्यकत्व।
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
प्यारा वचन है:
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
संन्यासी का अर्थ यही होता है कि जो कछुआ बन गया, कच्छप हो गया; जिसने अपनी सारी इंद्रियों को भीतर सिकोड़ लिया। अब जो अपने में मस्त है। जिसकी सारी मस्ती अपने में है। जो अब मस्ती के लिए भिखारी नहीं है, किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। जो अपनी मस्ती के लिए किसी पर निर्भर नहीं है। जो मस्ती के लिए किसी के द्वार नहीं जाता। जिसकी मस्ती भीतर है। जिसकी मधुशाला अपने भीतर है। आंख बंद की और डुबकी मार ली। आंख बंद की और रसपान किया।
संसारी का अर्थ होता है: जिसकी मस्ती दूसरे में है। पत्नी को छोड़ कर भागने का कुछ अर्थ नहीं है। लेकिन अगर तुम्हारा सुख पत्नी में है, तो तुम संसारी हो। पत्नी पास हो कि दूर, इससे फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारा सुख अगर बेटे, पुत्र-पुत्रियों में है, तो तुम छोड़ कर जंगल चले आओ, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारी भाव-दशा तुम्हारे पीछे चलेगी, तुम्हारी छाया की तरह रहेगी। तुम कुछ और नया संसार बना लोगे।
जिसका सुख दूसरे में है, वह दूसरे को इकट्ठा कर लेगा।
इसलिए असली सवाल संसार से भाग जाने का उतना नहीं है, जितना जाग जाने का है। और जागने का क्या अर्थ? जागने का अर्थ सीधा-साफ है--मेरा सुख मेरे भीतर। मैं अपने सुख के लिए किसी पर निर्भर नहीं हूं। जिस दिन यह दशा गहरी होने लगेगी कि मेरा सुख मेरे भीतर है; मेरे सुख का मैं मालिक, उसी दिन तुम पाओगे: अब किसी पर निर्भरता न रही। अब किसी की गुलामी न रही।
और जहां निर्भरता है, वहां क्रोध है। इसलिए पति-पत्नी लड़ते हैं, संबंधी लड़ते हैं, भाई-भाई लड़ते हैं, मित्र-मित्र लड़ते हैं। कलह है। संघर्ष है। क्यों? क्या कारण होगा?
आखिर पति-पत्नी इतना क्यों लड़ते हैं? यह दुश्मनी बड़ी शाश्वत मालूम पड़ती है! इस लड़ने के पीछे बहुत बुनियादी बात है। बुनियादी बात यह है कि पति अनुभव करता है कि वह निर्भर है पत्नी पर। पत्नी अनुभव करती है कि वह निर्भर है पति पर। जिस पर हम निर्भर हैं, उसके साथ दोस्ती नहीं हो सकती; उस पर क्रोध आता है। जिस पर हम निर्भर हैं, वह हमारी गुलामी है। उसने हमें गुलाम बना लिया। उसके बिना हम नहीं हो सकेंगे, इससे भीतर क्रोध उठता है।
स्वतंत्रता मनुष्य का आत्यंतिक मूल्य है, सबसे बड़ा मूल्य है। जहां भी स्वतंत्रता पर बाधा पड़ती है, वहीं क्रोध आता है, वहीं संघर्ष शुरू हो जाता है।
पति-पत्नी लड़ते रहेंगे, भविष्य में भी, क्योंकि उनका सुख एक-दूसरे पर निर्भर हो जाता है।
तुमने बच्चों की कहानियां पढ़ी होंगी, जिन कहानियों में यह बात आती है कि कोई राजा है और उसने अपने को बचाने को अपने प्राण तोते में रख दिए हैं। अब अगर कोई तोते को मरोड़ दे, तो राजा मर जाता है। अब राजा अपना मालिक नहीं है। अब राजा को अपने से भी ज्यादा फिकर तोते की है--कि कोई तोते को न मरोड़ दे।
तुमने अगर अपने प्राण तिजोरी में रख दिए, तो तुम्हें अपनी फिकर नहीं है। अब फिकर इतनी है कि कोई तिजोरी को न मरोड़ दे। अब तुम बैठे हो--सांप बन कर, तिजोरी पर--फन फैलाए। तुम्हें क्रोध भी आएगा, क्योंकि यह चौबीस घंटे क्या धंधा हो गया! तुम्हें नाराजगी भी होगी। कभी-कभी नाराजगी में तुम साधु-संत के वचन भी सुन आओगे--कि धंधे में कुछ नहीं है; धन में कुछ नहीं है। क्षण भर को राहत भी मिलेगी और फिर आकर फन मार कर अपनी तिजोरी पर बैठ जाओगे। बात भी जंचेगी कि ठीक कहता है संत, कि धन में कुछ नहीं है। लेकिन अब तुम्हारी बड़ी मुश्किल है; तुमने अपने प्राण धन में रख दिए हैं। अब वहां से प्राणों को निकालना बड़ा कठिन मालूम होता है।
तुमने अपने प्राण पत्नी में रख दिए हैं; अब पत्नी भाग जाए, किसी और के प्रेम में पड़ जाए, तो तुम परेशान हो, तुम बेचैन हो। तुम पहरा लगाए बैठे हो। इससे ईर्ष्या पैदा होती है, जलन पैदा होती है, संदेह पैदा होता है, शक-शुबहा पैदा होता है। हजार तरह के विचार मन में उठते हैं। और ये सारे विचार तुम्हारे बीच कलह पैदा करते हैं। और पत्नी भी इसी झंझट में है; उसने अपने प्राण तुम्हारे भीतर रख दिए हैं।
वे कहानियां अधूरी हैं। जिनमें कहा गया है कि राजा ने अपने प्राण तोते में रख दिए। तोते के संबंध में कोई कुछ नहीं कहता। तोते ने भी अपने प्राण राजा में रख दिए हैं। और तोता भी परेशान है कि कोई राजा को न मरोड़ दे अन्यथा हम मारे गए!
हम एक-दूसरे में अपने प्राण रख देते हैं, इसको हम प्रेम कहते हैं। यही संसार है। फिर तुमने जितने ज्यादा लोगों में अपने प्राण रख दिए, उतनी ही मुसीबत होगी। मुसीबत बढ़ती जाएगी। क्योंकि जितना ज्यादा फैलाव हो जाएगा प्राण का, उतनी जगह रक्षा करनी होगी।
इसलिए जितना धन होगा, उतनी चिंता होगी। जितने संबंध होंगे, उतनी बेचैनी होगी। जितना पद होगा, उतनी परेशानी होगी।
संन्यासी का अर्थ है:
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
अपने प्राण अपने भीतर, तो अपनी मालकियत अपने हाथ में। इसलिए संन्यासी को स्वामी कहते हैं। स्वामी यानी मालिक--अपना मालिक। अपनी मालकियत किसी को नहीं देता।
इसका यह मतलब नहीं है कि तुम घर से भाग जाओ। घर से भागने से कुछ न होगा। घर में प्राण मत रखो। पत्नी को छोड़ कर चले जाओ, यह मतलब नहीं है। लेकिन पत्नी में प्राण रखने की जरूरत नहीं है। पत्नी को अपने भीतर सिमटने दो, तुम अपने भीतर सिमटो। रहो साथ-साथ, फिर भी स्वतंत्र, मुक्त।
खलील जिब्रान ने कहा है: जहां वास्तविक प्रेम होता है, वहां लोग साथ-साथ होते हैं, लेकिन मुक्त। वे ऐसे होते हैं, जैसे मंदिर के खंभे; एक ही छप्पर को सम्हाले, लेकिन दूर-दूर खड़े होते हैं। पास नहीं आ जाते सब। एक-दूसरे में गलबांही नहीं कर देते। नहीं तो मंदिर गिर जाए। मंदिर के खंभे दूर-दूर खड़े होते हैं--एक ही छप्पर को सम्हाले।
लेकिन दूरी रहे, फासला रहे, स्वतंत्रता रहे; तुम अपने मालिक रहो। तुम अगर किसी को प्रेम करते हो, तो उसका एक ही अर्थ हो सकता है कि तुम उसको भी अपना मालिक बनाओ। तुम अपने मालिक बनो, उसको अपना मालिक बनाओ, कोई यहां मालकियत न खोए।
और जब तुम सुख चाहो, तो भीतर जाओ। यह संसारी के विपरीत यात्रा है। संसारी जब भी सुख चाहता है, बाहर जाता है।
तुमने देखा: संसारी को दुख मालूम होता है, वह कहता है: क्या करें? सिगरेट पीएं। रेडियो चलाएं। क्लब चले जाएं? होटल हो आएं? सिनेमा में जा बैठें? वेश्या घर चले जाएं? शराब पी लें? क्या करें? बेचैनी मालूम हो रही है।
जब संसारी को बेचैनी मालूम होती है, तो बाहर भागता है। फिर वह बाहर कहां भागता है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वह चाहे दिल्ली जाए और चाहे जगन्नाथपुरी जाए, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।
बाहर भागता है संसारी। वह कहता है: कहीं जाएं, जहां चैन मिले। उसका शरण-स्थल बाहर है।
संन्यासी कौन? वह जब अनुभव करता है बेचैनी, थकान, अपने भीतर चला जाता है।
झेन कथा है:
एक संन्यासी को निमंत्रित किया है। जापान के एक सात मंजिले भवन में वे बैठे हैं। शिष्य और संन्यासी भोजन कर रहे हैं। अचानक भूकंप आ गया है। सारा भवन कंपने लगा। लकड़ी का भवन है। भाग-दौड़ मच गई। सारे मेहमान भागे। गृहपति भी भागा-भागा था, तब उसे खयाल आया कि उस संन्यासी को बुलाया था, उसका क्या हुआ! लौट कर देखा, तो वह संन्यासी आंख बंद किए बैठा है। कुछ ऐसी अपूर्व शांति थी उस संन्यासी के पास, उस भूकंप में, कुछ ऐसी अपूर्व ऊर्जा थी। उस कंपन से भरे हुए क्षण में, जहां सब तरफ मौत का तांडव हो रहा था: मकान गिर रहे थे; लोग भाग रहे थे; चीख-पुकार मची थी, वहां वह एक अकेला आदमी ऐसा निर्वात, ऐसा शांत, ऐसा अकंप बैठा था कि गृहपति को लगा कि इस क्षण में भाग जाना, मेहमान को छोड़ कर, बड़ा अशोभनीय होगा। तो वह भी हिम्मत कर के उसके पास बैठ गया।
कंप रहा है, घबड़ा रहा है, क्योंकि सात मंजिल ऊपर मकान पर बैठे हैं। अगर मकान गया, तो गए। लेकिन हिम्मत कर ली, जोखिम उठा ली। उठाने जैसी थी जोखिम, कुछ अपूर्व घट रहा था; कुछ अनहोना घट रहा था। इस आदमी को क्या हुआ है! जब सब भाग गए हैं, तो यह चुप यहां क्यों बैठा है?
फिर भूकंप चला गया। संन्यासी ने आंख खोली। जहां बात टूट गई थी। भूकंप के आने से, वहीं से बात शुरू कर दी।
उस मेजबान ने कहा: क्षमा करें; मैं तो भूल ही चुका कि क्या बात पहले होती थी। अब वह प्रसंग भी याद नहीं है। अब मेरी उत्सुकता भी उस बात में नहीं है। अब तो कुछ और बात पूछनी है। वह यह कि इस भूकंप का क्या हुआ? आप भागे नहीं?
संन्यासी हंसने लगा। उसने कहा: भागे तो हम भी। हम भीतर की तरफ भागे; लोग बाहर की तरफ भागे; बस, इतना ही फर्क है, भागे तो हम भी।
लेकिन लोगों के भीतर तो कुछ है ही नहीं, जहां वे भाग जाएं। वहां उन्होंने शरण-स्थल बनाया ही नहीं।
फिर लोगों का भागना गलत है, वह संन्यासी कहने लगा। क्योंकि भूकंप यहां है, भाग कर कहां जाओगे? वहां भी भूकंप है। सात मंजिल से छठवीं मंजिल पर जाओगे; पांचवी मंजिल पर जाओगे; भूकंप वहां भी है। बाहर तो भूकंप है ही, भाग कर कहां जाओगे? मौत सब जगह खड़ी है। आज नहीं कल; कल नहीं परसों, मौत दबोच ही लेगी। मैं ठीक जगह भागा। मैं ऐसी जगह भागा, जहां मौत नहीं, जहां अमृत का वास है। मैं अपने भीतर सरक गया।
वह संन्यासी कहने लगा: अगर भागना ही हो, तो भीतर भागना। वहां परम सुरक्षा है, क्योंकि वहां परमात्मा है।
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
बैर-प्रीत उनके नहीं, नहिं वाद-विवादा।।
न तो वैर है, न प्रीत है। वे तो साथ ही साथ चलते हैं। और जब वैर और प्रीत दोनों चले जाते हैं, तो जिसका जन्म होता है, उसको ही प्रेम कहो। उसे बुद्ध ने करुणा कहा। महावीर ने अहिंसा कहा। जीसस ने प्रेम कहा। नाम कुछ भी दो। लेकिन जब वैर और प्रीत दोनों चले जाते हैं, तभी जो तुम्हारे भीतर शेष रहता है, वही प्रेम है।
पर वह प्रेम बड़ा अनूठा है। वह संबंध नहीं है। वह निर्भरता नहीं है। वह किसी तरह की आसक्ति नहीं है, लगाव नहीं है, परिग्रह नहीं है। वह प्रेम तो सिर्फ तुम्हारे भीतर जो अहर्निश नाद बज रहा है, उस नाद को बांटना है। वह प्रेम तो तुम्हारे भीतर जो अमृत बरस रहा है, उस अमृत में दूसरों को साझीदार बनाना है। वह प्रेम तो तुम्हारे भीतर जो प्रकाश जला है, उनके लिए जो अभी अंधेरे में भटक रहे हैं, राह बताना है। वह प्रेम अनुकंपा है।
बैर-प्रीत उनके नहीं, नहिं वाद-विवादा।
और जो भीतर पहुंच कर अपने को जान लिया, उसके जीवन में वाद-विवाद समाप्त हो गया। जान ही लिया, तो अब क्या वाद, क्या विवाद?
सब वाद-विवाद न जानी अवस्था का है। अंधा आदमी पूछता है: प्रकाश है या नहीं? और वाद-विवाद करता है। बहरा आदमी पूछता है कि ध्वनि होती है या नहीं; और वाद-विवाद करता है। लेकिन जिसने ध्वनि जान ली, जान ही ली, अनुभव में उतर आई...। और जिसने आंख खोली, और जगमगाती रोशनी देख ली, जो उस दैदीप्यमान प्रकाश से स्वयं भी दैदीप्यवान हो गया, अब क्या वाद-विवाद है!
संत ने जान ही लिया; अब कोई प्रमाण की जरूरत नहीं है। संत स्वयं प्रमाण है। संत कुछ तर्क नहीं देता ईश्वर के पक्ष में। कोई तर्क हो भी नहीं सकते।
तर्क के साथ एक खूबी है। तर्क बिलकुल अंधा होता है। तर्क अज्ञानी में होता है। और तर्क के साथ एक मजा भी है कि जितना तर्क पक्ष में दिया जा सकता है, उतना ही तर्क विपक्ष में दिया जा सकता है। ठीक उतना ही--समतुल; इसलिए तर्क से कभी कोई बात सिद्ध नहीं होती। तर्क पक्ष में भी उतना ही बोलता है, जितना विपक्ष में बोलता है।
इसलिए तर्क से कुछ सिद्ध नहीं होता कि ईश्वर है या नहीं। सदियां हो गईं, कितने दार्शनिक चिंतन और विचार और मनन और तर्क और विवाद करते रहे और शास्त्रार्थ करते रहे, कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ।
तर्क समान रूप से बलशाली है--पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ। इसलिए तर्क से कभी कोई निष्पत्ति हाथ नहीं लगती। जैसे दो बराबर शक्ति के लोग मल्ल-युद्ध करें, तो कोई कभी जीते नहीं, जीत न सके, ऐसी स्थिति तर्क की है।
एक शिकारी ने खूब ऊंचे उड़ते हुए बगुले को गोली से मार गिराया। पास ही खड़े एक बुजुर्ग दार्शनिक यह सब देख रहे थे। बड़े तर्कशास्त्री थे। उन्होंने यह देख कर शिकारी से कहा: तुमने यह गोली यूं ही बेकार कर दी।
शिकारी ने गोली मार कर बगुले को गिरा दिया है और तर्कशास्त्री कह रहा है: तुमने यह गोली यूं ही बेकार कर दी!
कैसे? शिकारी ने चौंक कर पूछा।
बुजुर्ग तार्किक ने कहा: इतनी उंचाई से गिर कर यह बगुला तो वैसे ही मर गया होता। यह एक पहलू!
एक दूसरा शिकारी है। बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई है। क्योंकि उस शिकारी ने बड़ी खबर कर रखी है कि वह बड़ा अदभुत शिकारी है; कभी चूकता ही नहीं। तो पूरा गांव इकट्ठा हो गया है। उसने अपनी बंदूक तानी। गोली छूटी। आवाज हुई। आकाश में कम से कम बीस बगुले उड़ रहे थे, एक भी न गिरा। लोग चौंक कर रह गए। और मालूम है शिकारी ने क्या कहा! शिकारी ने कहा: अरे, देखो-देखो चमत्कार; मरा हुआ बगुला उड़ रहा है!
यह दूसरा पहलू है। लेकिन तर्क दोनों तरफ काम आ सकता है।
देखो, चमत्कार, मरा हुआ बगुला उड़ रहा है! शिकारी यह मान नहीं सकता है कि उसकी गोली लगी नहीं। तर्कशास्त्री यह मान नहीं सकता; तर्कशास्त्री कहता है कि यह तो इतने ऊपर से गिरता तो वैसे ही मर जाता। इसमें गोली की क्या जरूरत थी?
एक आदमी दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर होगा, अपने बेटे को स्कूल में भर्ती कराने गया। और बेटे को शिक्षा देता था कि सीख मुझसे। तर्क सीख; विचार सीख, विवाद सीख। पहले से ही बेटे को तैयार कर रहा था। जब स्कूल में भर्ती कराने गया, तो मास्टर जी ने उससे पूछा: क्या यह बच्चा आपका है?
जी, आपका ही है, उसने कहा।
मास्टर जी ने फिर लड़के से पूछा कि ये पिताजी आपके हैं? लड़के ने कहा: जी, आपके ही हैं। लड़के ने तपाक से उत्तर दिया।
तर्क अंधा है और तर्क अनिर्णायक है। तर्क के जाल में जो पड़ा, वह संसार से मुक्त नहीं हो पाता। क्योंकि तर्क में निष्पत्ति नहीं है। अनुभव से मुक्ति है।
इसलिए ज्ञानी कहते हैं: विचार नहीं--ध्यान। इसलिए ज्ञानी कहते हैं: तर्क नहीं--अनुभव। इसलिए ज्ञानी कहते हैं: शास्त्रार्थ नहीं--प्रयोग, योग, समाधि।
आठ पहर सिमिटे रहैं, अपने ही माहीं।
बैर-प्रीत उनके नहीं, नहिं वाद-विवादा।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।।
यह वचन बड़ा प्यारा है:
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
‘रूठे-से’--इस पर खयाल करना ‘उदासीन’ नहीं कहा है। ‘उदासीन-से’ इसमें सारी क्रांति भरी है।
उदासीन तो वह है, जो भाग गया, जिसने संसार छोड़ दिया। जो यहां टिकता नहीं। जो कहता है: यहां खतरा है; मैं चला। लेकिन खतरे का मतलब ही यह होता है कि अभी आशा है, वासना है, आकांक्षा है।
खतरा क्या है? धन पास रखा है, अगर तुम्हारे भीतर धन की आकांक्षा नहीं, तो खतरा क्या है? धन पास रखा रहे। तुम धन पर पालथी मार कर बैठे रहो। क्या खतरा है? लेकिन तुम घबड़ा रहे हो। ये सोने-चांदी के ठीकरों से तुम ऐसे घबड़ा रहे हो, जैसे सांप-बिच्छू चल रहे हों। ये सांप-बिच्छू सोने-चांदी में नहीं हैं। ये सांप-बिच्छू तुम्हारे भीतर हैं। ये तुम्हारी वासनाएं तुम्हें डरा रही हैं कि अगर यहां रहे और मौका मिला, तो कहीं ऐसा न हो कि तुम गठरी बांध लो। अगर लोग देखते न हुए, अगर ऐसा क्षण आया कि पकड़ाने का कोई डर नहीं है, तो तुम्हें पता है कि तुम डोल जाओगे। डर वहां है, भय वहां है। भय तुम्हारे भीतर से आ रहा है।
तुम्हारी वासना कंप रही है। तुम्हारी वासना कह रही है: छोड़ो भी यह बकवास। ये बातें त्याग इत्यादि की; यह फकीरी; और यह अजब की फकीरी; यह मौका न चूको। फिर कर लेना फकीरी। इतना हाथ लगता है, इस पर तो हाथ मार ही लो, इसको तो भोग ही लो। फिर देखेंगे; फकीरी कहां जाती है? कल कर लेना, परसों कर लेना; जल्दी भी क्या है? और कोई देखने वाला नहीं; पकड़े जाने वाले नहीं; कोई पुलिस नहीं दिखाई पड़ती; कोई कानून का डर नहीं है; रही भगवान की बात! माफी मांग लेना। वह तो करुणासागर है। उसने तो बड़े-बड़े पापियों को तरा दिया, तो तुम को भी तरा देगा। और फिर एक छोटी सी भूल! कोई ऐसी बड़ी भूल नहीं कर रहे। और फिर इस धन से तुम किसी का नुकसान थोड़े ही करोगे। मंदिर बनाओगे, धर्मशाला बना दोगे। ऐसी वासनाएं उठेंगी। घबड़ाहट आती है। तुम भागते हो।
पत्नी या स्त्री में थोड़े ही डर है; पुरुष में थोड़े ही... पति में थोड़े ही डर है। तुम्हारे भीतर छिपी वासना है। वासना कहती है: अगर अवसर मिला तो तुम चूक न सकोगे; तुम डोल जाओगे; तुम उत्तेजित हो जाओगे। इसलिए मौका न दो। दूर रहो। इतने दूर रहो कि मौका भी हो; भीतर वासना भी जगी हो, तो भी स्त्री मौजूद न होगी, तो क्या करोगे। आएगी वासना, चली जाएगी। मगर यह कोई बात न हुई। यह दमन हुआ। यह पलायन हुआ; इससे कोई सौंदर्य का जन्म न होगा। इससे तुम और रुग्ण और विक्षिप्त हो जाओगे।
इसलिए वचन चरणदास का बड़ा प्यारा है: ‘रूठे-से जग में रहैं।’ रहो तो जग में ही, मगर ‘रूठे-से।’ रूठ ही नहीं गए बिलकुल। एकदम भाग ही नहीं खड़े हुए आंख बंद करके कि पीछे लौट कर नहीं देखा। रहो यहीं--रूठे-से। कोई रस न रखो। दूर-दूर, जागे-जागे। स्थितियां तो जैसी हैं--रहने दो। तुम अपने को बदलो। परिस्थिति मत बदलो, मनःस्थिति बदलो।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
और जब तुम बाहर के प्रति थोड़े रूठे-रूठे रहोगे, अलग-थलग--तब तुम अनहद का नाद सुन सकोगे। क्योंकि दृष्टि भीतर जाएगी; कान भीतर जाएंगे। इंद्रियां जो बाहर उलझी हैं, जब बाहर नहीं उलझी होतीं, तो भीतर जाती हैं।
इंद्रियों के भीतर दो संभावनाएं हैं: बाहर जाना और भीतर जाना चूंकि हमने बाहर जाने का ही उपयोग किया है, हमें उनके भीतर जाने का उपयोग पता नहीं है। इंद्रियां जैसे बाहर को सुन सकती हैं, ऐसे ही बाहर से बंद हो जाएं, भीतर सिकुड़ जाएं, तो भीतर को सुनती हैं। और जब भीतर को सुनती हैं, तभी जीवन का आनंद, तभी जीवन का उत्सव...।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
और वहां एक संगीत बह रहा है अनहद; जिसकी कोई हद नहीं, जिसकी कोई सीमा नहीं। वहां एक संगीत बह रहा है सदा से, जिसमें एक डुबकी लग जाए, तो सब मिल गया। जन्मों-जन्मों की तड़फन और जन्मों-जन्मों की प्यास बुझ गई। जिसमें एक डुबकी लग जाए, तो फिर कभी प्यास नहीं लगती। तृप्ति आ गई, संतृप्ति आ गई।
और ऐसा मनुष्य जब कुछ बोलता है: ‘जो बोलैं तो हरिकथा।’ ऐसा मनुष्य कुछ भी बोले, तो हरिकथा हो जाती है। उसके भीतर का नाद... इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या बोलता है। ऐसा मनुष्य कुछ भी बोले, तो हरिकथा हो जाती है। जिसके भीतर अनहद नाद बज रहा है और जो अपने नाद को सुन रहा है, जिसकी दृष्टि बाहर पर अटकी नहीं रह गई, जिसकी दृष्टि बाहर से मुक्त हो गई है, जो अपने घर लौट आया है...।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
जो बोलैं सौ हरिकथा, नहिं मौनै राखैं।।
अगर बोलें, तो हरिकथा हो जाती है। अगर न बोलें, तो सत्संग हो जाता है। बोलें तो प्रभु की तरफ इशारा, न बोलें तो प्रभु की तरफ इशारा।
जो बोलैं सौ हरिकथा, नहिं मौनै राखैं।
मिथ्या कडुवा दुरबचन, कबहूं नहिं भाखैं।।
जीव-दया अरुसीलता, नख सिख सूं धारैं।
समग्रता में उनके जीवन में प्रेम और शील का आगमन हो जाता है।
...नख सिख सूं धारैं।
ऐसा नहीं कि कहीं खोपड़ी में थोड़ा सा हिस्सा है, उसमें सोच रहे हैं--जीव-दया। ऐसा नहीं कि कोई थोड़ा सा विचार है। आपूर बाढ़ आ गई; पूरे डूब गए।
जीव-दया अरु सीलता, नख सिख सूं धारैं।
पांचौं दूतन बसि करैं, मन सूं नहिं हारैं।।
और ये जो पांच दूतनें हैं...। शब्द समझना। प्यारा शब्द उपयोग किया है। शत्रु नहीं कहा है इंद्रियों को, ‘दूत’ कहा है। ये संसार का भी काम कर देती हैं। और तुम अगर भीतर मुड़ो, तो परमात्मा का भी काम कर देती हैं। ये सिर्फ दूत हैं--चिट्ठीरसा। कोई दुश्मनी का पत्र लिखता है, तो वह भी आकर डाल जाता है। कोई प्रेम का पत्र लिखता है, वह भी आकर डाल जाता है।
ये तो सिर्फ दूत हैं; इन पर नाराज मत हो जाना। इंद्रियों से लड़ने मत लगना। इंद्रियों को काटने मत लगना। इनसे नाराज होने की जरूरत नहीं। ये तो मात्र दूत हैं--संदेशवाहक। तुम संसार में रस रखते हो, तो संसार की खबरें ले आते हैं। तुम संसार में रस नहीं रखते, तुम्हारा रस प्रभु में लगने लगा, तो प्रभु की खबर आने लगती है। यही आंखें प्रभु को देख लेती हैं। यही कान प्रभु को सुन लेते हैं। यही हाथ प्रभु के चरण छू लेते हैं। इसलिए दूत--शत्रु नहीं, शत्रुभाव नहीं।
पांचौं दूतन बसि करैं, मन सूं नहिं हारैं।
बस, एक ही खयाल रखना। अगर चाहते हो कि परमात्मा तुम में जीत जाए, तो मन को मत जीतने देना।
मन का अर्थ है: बाहर ले जाने वाली आकांक्षा। मन यानी बहिर्गमन। और कुछ अर्थ नहीं होता। मन वही, जो तुम्हें बाहर ले जाता है। बाहर जाने की सारी आकांक्षाओं की इकट्ठे जोड़ का नाम: मन। जब तुम बाहर नहीं जा रहे हो, बाहर नहीं जाना चाहते हो, बाहर जाने की आकांक्षा तिरोहित हो गई...
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
जब तुम भीतर का नाद सुनने लगे, और बाहर से रूठ-से गए...। खयाल रखना, ‘रूठे-से।’ रूठ ही मत जाना। इतना काफी है कि रूठ गए। भागने की कोई जरूरत नहीं है। भागने में भय है। उदासीन होने की जरूरत नहीं है। उदासीनता का अभिनय ही कर देना, तो काफी है। उतने में ही भीतर का नाद सुनाई पड़ने लगेगा।
इसलिए मैं अपने संन्यासी को भगोड़ा नहीं बनाना चाहता। कहता हूं: जम कर रहना। बाजार में ही रहना और बाजार से अछूते रहना--रूठे-से रहना। घर में ही रहना। धन-दौलत, काम-धाम--कुछ भी छोड़ना मत। लेकिन उस सब के बीच भी ऐसे रहना कि अछूते। चलना जल में और जल को पैरों को मत छूने देना--कमलवत।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
जैसे ही यह अनहद नाद सुनाई पड़ने लगता है, फिर मन की कोई गति नहीं रह जाती। मन तभी तक शक्तिशाली है, जब तक तुमने सच्चे को नहीं चखा। तो मन झूठे की आशा दिलाए जाता है। जब सच्चे को चख लिया, तो फिर मन का क्या चलेगा?
मन कहता है: चलो, और धन इकट्ठा कर लें, क्योंकि बड़े निर्धन हैं। जब तुमने भीतर का धन पा लिया, फिर तुम मन की क्या सुनोगे? तुम मन से कहोगे कि पागल हुआ है। निर्धन और मैं?
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
किससे बातें कर रहा है? मन कहता है कि चलो, जरा किसी बड़े पद को पा लें। तुम कहोगे: क्या बातें कर रहा है? होश; ठिकाने आ। मैं तो परम पद पर बिराजा हूं। परमात्मा मिल गया, अब और कौन पद! इसके आगे और कौन पद?
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।।
दुख-सुख दोनों के परे, आनंद दरसावैं।
जहां जांहि अस्थल करैं, माया-पवन न जावै।।
‘दुख-सुख दोनों के परे, आनंद दरसावैं।’ ‘आनंद’ शब्द बड़ा बहुमूल्य है। उसका अर्थ सुख नहीं होता। उसका अर्थ महासुख भी नहीं होता। क्योंकि सुख में तो दुख सम्मिलित है। सुख में तो दुख पीछे ही लगा है। दुख तो सुख की छाया की तरह पीछे लगा है।
जैसे बड़े पहाड़ों के पास बड़ी खाइयां होती हैं, ऐसे बड़े सुख के पास बड़ा दुख होता है। छोटे सुख के पास छोटा दुख होता है। मात्रा बराबर होती है। मात्रा में कभी भेद नहीं पड़ता। जैसे बड़े वृक्ष को लंबी जड़ें भेजनी पड़ती हैं जमीन में, ऐसे ही बड़े सुख को बड़े दुख की तैयारी करनी पड़ती है। इसलिए तो तुम गरीब आदमी को ज्यादा दुखी नहीं देखते। और तुम हैरान भी होते हो कि बात क्या है। गरीब आदमी ज्यादा दुखी क्यों नहीं है? अमीर ज्यादा दुखी दिखाई पड़ता है, क्योंकि अमीर ज्यादा सुखी है इसलिए। गरीब कम सुखी है, इसलिए कम दुखी है। मात्रा बराबर रहती है। दोनों में संतुलन रहता है।
तुम्हारे पास दस रुपये हैं और खो जाएं, तो तुम्हें कोई करोड़ रुपये खोने का थोड़े ही दुख होगा। दस ही रुपये खोने का दुख होगा। अब जिसके पास करोड़ हों, करोड़ खो जाएं, तो उसे करोड़ खोने का दुख होगा। जितना होगा, उतना खोने का दुख होगा।
तुम्हारे पास एक कुरूप सी स्त्री है और खो जाए, तो उतना ही दुख होगा, जितना थी।
मुल्ला नसरुद्दीन ने शादी की, तो गांव की सबसे कुरूप स्त्री से शादी कर ली। कोई उससे तैयार ही न था शादी करने को। लोग बड़े चकित थे। और मुल्ला के पीछे सुंदर स्त्रियां पड़ी थीं और लोगों ने पूछा: तू पागल है मुल्ला! इतनी सुंदर स्त्रियां तेरे पीछे पड़ी हैं। धन है, दौलत है--सब है तेरे पास। एक नहीं चार विवाह करता; यह कुरूप औरत तूने कैसे खोज ली? इसको तो कोई मिलता ही न था।
मुल्ला ने कहा: इसके पीछे राज है। अगर यह औरत खो जाए, तो कभी दुख न होगा। खुशी ही होगी; चित्त में बड़ी प्रसन्नता आएगी कि चलो, बचे।
मुसलमानों में रिवाज है कि जब पत्नी पहली दफा घर आती है, तो पति से पूछती है कि यह जो बुरका मैं डाले हूं, यह किन-किन के सामने खोल सकती हूं? तो मुल्ला की पत्नी ने पूछा कि मुल्ला, यह बुरका मैं किस-किस के सामने खोल सकती हूं? मुल्ला ने कहा: देवी, मुझे छोड़ कर तू सबके सामने...।
लोगों ने कहा: मुल्ला, यह तो तुम झंझट पाले ले रहे हो। मुल्ला ने कहा: इसमें झंझट क्या है। दिन भर तो हम दफ्तर में ही रहते हैं। और पत्नी जब आ जाती है घर में, तो लोग सांझ भी क्लब में बिताने लगते हैं, होटल में बिताने लगते हैं। रात जाएंगे, सो जाएंगे। देखना-दाखना किसको है! कोई उजाला रख कर थोड़े ही सोते हैं। अंधेरा करके सो जाते हैं। मगर यह पत्नी खो जाए तो दुख न होगा।
तुम्हारे सुख-दुख बराबर होते हैं। जितना सुख चाहोगे, उतने दुख की संभावना, उतना दुख का भय।
आनंद क्या है? आनंद सुख या महासुख नहीं है। आनंद सुख-दुख दोनों से मुक्ति है। आनंद शांति की दशा है, जहां न दुख रहा, न सुख रहा; जहां केवल साक्षी रहा।
सुख में भी भ्रांति है कि मैं सुखी। दुख में भी भ्रांति है कि मैं दुखी। आनंद में भ्रांति नहीं है, सिर्फ साक्षीभाव है। यह सुख आया, तो साक्षी देखता है कि सुख आया--मैं देखने वाला। यह दुख आया; साक्षी देखता है कि मैं देखने वाला। साक्षी दोनों ही स्थिति में दूर खड़ा देखता रहा।
रूठे-से जग में रहैं, सुनैं अनहद नादा।
तब आनंद का जन्म होता है। आनंद है--शांत भाव--तादात्म्य मुक्त। न सुख, न दुख; न रोशनी, न अंधेरा; न जीवन, न मृत्यु; न अपना, न पराया; न वैर, न प्रीति। आनंद है द्वंद्व से मुक्ति। आनंद है द्वंद्व का अतिक्रमण।
जहां जांहि अस्थल करैं, माया-पवन न जावै।
कहते हैं चरणदास: ऐसा व्यक्ति, जो आनंद में विराजा है, जहां जाए, वहीं स्वर्ग है, वहीं तीर्थ। जहां बैठ जाए, वहीं आसन। जहां हो, वहीं मंदिर।
जहां जांहि अस्थल करैं,...
जैसा हो, वैसी ही दशा में आसन में, सिद्धासन में विराजमान है। सिद्धासन भीतर लग गया। देह से इसका कोई संबंध नहीं है। वह जो चित्त भीतर शांत होकर साक्षी बन गया है, वहीं असली आसन है। वहां ठहर गए तुम, तो सब ठहर गया।
जहां जांहि अस्थल करैं,...
तो फिर कोई पालथी मार कर, झाड़ों के नीचे बैठ कर कुछ करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम कितनी ही पालथी मारो, और कितने ही पैर दुखाओ, और कितनी ही कमर सीधी रखो, और रीढ़ सीधी रखो भीतर अगर मन दौड़ रहा है, तो संसार मौजूद है। शरीर बैठा रहेगा मूर्तिवत, और मन भागा रहेगा सारे संसार में; दूर-दूर यात्रा करता रहेगा। शरीर को रोकने की बात नहीं है।
जहां जांहि अस्थल करैं, माया-पवन न जावै।
और जिनके भीतर ऐसा साक्षीभाव आ गया, अब वहां हवाएं नहीं पहुंचतीं माया की, वासना की, कल्पना की, आकांक्षाओं की। वहां ज्योति अब निर्धूम जलती है, निष्कंप जलती है।
हरिजन हरि के लाड़िले, कोई लहै न भेवा।
सुकदेव कही चरनदास सूं, कर तिनकी सेवा।।
और चरणदास कहते हैं: मेरे गुरु ने कहा है: ‘हरिजन हरि के लाड़िले।’ जहां कोई मिल जाए हरि का प्यारा, फिर कोई फिकर न करना, कुछ भेद न करना कि हिंदू है, कि मुसलमान है, कि ईसाई है, कि जैन है, कि ब्राह्मण है, कि शूद्र है।
हरिजन हरि के लाड़िले, कोई लहै न भेवा।
फिर कोई भेद करना ही मत। एक ही बात देख लेना कि हरि विराजमान है? भीतर प्रभु का पदार्पण हुआ है? ज्योति जली है?
सुकदेव कही चरणदास सूं, कर तिनकी सेवा।
और मेरे गुरु ने, चरणदास कहते हैं, इतना ही कहा, बस संतों की सेवा कर। सदगुरुओं के चरण गह ले। उन्हीं के सहारे तिर जाएगा।
हिरदै माहीं प्रेम जो, नैनों झलके आय।
सोइ छका हरिरस-पगा, वा पग परसौ धाय।।
गुरु ने कहा है: ‘हिरदै माहीं प्रेम जो, नैनों झलके आय।’ और जब हृदय में प्रेम भरेगा, तो आंसुओं में बहेगा।
भक्ति का मार्ग गीला है--सूखा नहीं। वहां खूब हरियाली है। वहां आंसुओं की वर्षा है। इसलिए खूब हरियाली है। खूब फूल खिलते हैं।
हिरदै माहीं प्रेम जो, नैनों झलके आय।
सोइ छका हरिरस-पगा, वा पग परसौ धाय।।
और जहां तुझे कोई मिल जाए, ऐसा प्रभु के प्रेम में दीवाना और मस्त, और प्रभु के प्रेम में आंसू बहाता, और प्रभु के प्रेम में रोता, और गाता और नाचता--‘सोइ छका...।’ उस मस्त को छोड़ना मत। वह ऐसा छक गया है, ऐसा भर गया है, ऐसा आकंठ है कि उसके बाहर भी बहा जा रहा है प्रभु का प्रेम।
सोइ छका हरिरस-पगा,...
ऐसे हरिरस में पगे, छक गए मस्त को छोड़ना मत।
...वा पग परसौ धाय।
उसके पैरों में पड़ जाना; उसके पैर कभी छोड़ना मत।
पीव बिना तो जीवना, जग में भारी जान।
उस प्यारे के बिना तो जीना बहुत भारी है। याद रख।
पीव बिना तो जीवना, जग में भारी जान।
पिया मिलै तो जीवना, नहीं तो छूटै प्रान।।
एक कस्त कर ले...। खोज तभी पूरी होती है, जब आखिरी दांव पर कोई अपने प्राण भी लगा देता है; जब कोई कहता है कि अब या तो मिलो या मैं मिटूं। अब मौत भली तुम्हारे बिना। लेकिन तुम्हारे बिना जीवन की अब कोई आकांक्षा नहीं है।
इस तरह गुजरे तेरे प्यार में जो क्षण गुजरे।
तपती दोपहर में जैसे कोई सावन गुजरे।।
वहां-वहां न कोई फूल मुस्कुरा पाया।
जहां-जहां से कि उस शोक से चरण गुजरे।।
गिरे जो उनकी नजर से वह फिर जीए ऐसे।
सरे बाजार में कोई लाश बे-कफन गुजरे।।
आज के दौर में जिंदा हैं इस तरह हम लोग।
जंग के शोर से जैसे कोई भजन गुजरे।।
उस समय याद हमारी भी जरा कर लेना।
फाग गाता हुआ जब द्वार से फागुन गुजरे।।
गम के हर दौर से गुजरे हैं इस तरह नीरज।
अंधेरी राह से जैसे कोई किरण गुजरे।।
इस तरह गुजरे तेरे प्यार में जो क्षण गुजरे।
तपती दोपहर में जैसे कोई सावन गुजरे।।
परमात्मा के बिना आदमी मुर्दा-मुर्दा है।
गिरे जो उनकी नजर से वह फिर जीए ऐसे।
सरे बाजार में कोई लाश बे-कफन गुजरे।।
परमात्मा के बिना आदमी मुर्दा है, लाश है।
गुरु ने कहा है चरणदास को:
पीव बिना तो जीवना, जग में भारी जान।
पिया मिलै तो जीवना, नहीं तो छूटै प्रान।।
ऐसा कस्त, ऐसी कसम, ऐसा दांव, ऐसा जुआ कि या तो मिलो या मिटा दो; जिस घड़ी भी ऐसा कस्त पूरा हो जाता है--सौ डिग्री--जरा भी हिचकिचाहट नहीं रह जाती, उसी क्षण क्रांति घट जाती है। सौ डिग्री पर ही जैसे जल भाप बन कर उड़ जाता है, ऐसे ही सौ डिग्री जब दांव कोई लगाता है, तो आदमी खो जाता है और परमात्मा प्रकट हो जाता है।
वह विरहिन बौरी भई, जानत न कोउ भेद।
और जब ऐसी सौ डिग्री की क्रांति घटती है...।
वह विरहिन बौरी भई, जानत न कोउ भेद।
फिर संसार नहीं समझ पाता कि क्या हो गया। संसार की भाषा के बाहर कुछ हो रहा है, संसार समझे भी तो कैसे समझे? संसार तो समझता है कि यह आदमी पागल हुआ। परमहंसों को लोगों ने पागल ही समझा है।
वह विरहिन बौरी भई, जानत न कोउ भेद।
अगिन बरै हियरा जरै, भये कलेजे छेद।।
उस प्यारे की तलाश में ‘अगिन बरै हियरा जरै, भये कलेजे छेद।’ लेकिन जब कोई इतना दांव पर लगा देता है, तो वर्षा होती है; निश्चित होती है। इतना जो तपता है, इतना जो पुकारता है, तो वर्षा होती है। ‘वह विरहिन बौरी भई, जानत न कोउ भेद।’ घटना निश्चित घटती है।
हिरदै माहीं प्रेम जो, नैनों झलके आय।
सोइ छका हरिरस-पगा, वा पग परसौ धाय।
क्रांति तो निश्चित है, सिर्फ तुम तैयार होओ। इधर तुम राजी हुए कि परमात्मा सदा से राजी है; द्वार पर ही खड़ा है, तुम द्वार खोलो।
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।।
इस अजब फकीरी की खोज में निकलो। सुख-दुख के पार आनंद की तलाश करो।
तारों की रोशनी में
चमकते हुए हैं जर्रे
और चल रही हैं ठंडी
फिरदौस की हवाएं
आओ अब मिल कर गाएं
लज्जत भरे तराने
सहरा की वुसअतों में
आवाज बन कर फैलें
और आस्मां को छू लें
हम खूब-खूब बहकें
और खूब-खूब गाएं
और खूब-खूब नाचें
तारों की रोशनी में
सहरा की वुसअतों में
दरिया की तेज लहरें
पेड़ों की नम्र छाओं
और हम हैं और तुम हो
और रेत के जर्रे
चमके हुए सितारे
और रोशनी की वुसअत
और आस्मां की रिकअत
और हम हैं और तुम हो
तारों की रोशनी में
चश्मे उबल रहे हैं
कलियां चटक रही हैं, मौसम बदल रहे हैं
और हम हैं और तुम हो।
जो दांव पर लगाने को राजी है, उसके लिए संसार में बस, परमात्मा और स्वयं का होना ही बचता है। यह सारा जगत उस प्यारे के रूप में रूपांतरित हो जाता है। तब तुम नाचते हो प्रभु के साथ।
भक्ति का पहला अनुभव: विरह; दूसरा अनुभव: मिलन; तीसरा अनुभव: विसर्जन। पहले रोओ, क्योंकि भटके हो। अभी आंसू उदास होंगे; अभी आंसू दुख, पीड़ा, विरह के होंगे।
अगिन बरै हियरा जरै, भये कलेजे छेद।
लेकिन अगर रोए, हृदयपूर्वक रोए, तो वही है भजन, वही है कीर्तन, वही पूजा, वही अर्चन। अगर रो लिए पूरे, तो जल्दी ही तुम पाओगे: क्रांति घटती है; मिलन शुरू होता है।
वह विरहिन बौरी भई, जानत न कोउ भेद।
कोई दूसरा न समझ पाएगा, तुम्हीं जानोगे कि क्या घटा। तुम्हीं जानोगे, तुम्हीं पहचानोगे कि क्या घटा। कोई दूसरा न समझ पाएगा। या वे समझ पाएंगे, जो स्वयं भी वहां हैं।
सोइ छका हरिरस-पगा, वा पग परसौ धाय।
इसलिए उनकी तलाश कर लेना। नहीं तो कई बार ऐसा होता है कि मिलन भी एक क्षण को होता है और तुम फिर वापस भटक जाते हो। क्योंकि सारी दुनिया तुम्हें पागल समझती है।
तो पागलों की जमात चाहिए। इसलिए संघ का मूल्य है। इधर जो मैं ये इतने संन्यासी निर्मित कर रहा हूं, उनका अर्थ है। पागलों की जमात चाहिए, ताकि तुम जब पागल होने लगो, तो कोई तुम्हारा स्वागत कर सके, कोई तुमसे कह सके:
अजब फकीरी साहबी, भागन सूं पैये।
प्रेम लगा जगदीश का, कछु और न चैये।।
--कि पहुंच गए तुम, कि पहुंचने लगे तुम! धन्यभागी हो तुम।
जमात चाहिए; संगत चाहिए जो कह सके, अन्यथा तुम घबड़ा जाओगे। सारा जगत तो पागल कहेगा। कोई सहारा देने वाला चाहिए।
जब तुम्हारी आंखों से धाराएं बहने लगेंगी प्रेम की और मिलन की...। जब तक विरह के आंसू हैं, तब तक तो कोई चिंता नहीं। संसार भी समझता है कि रो रहे हो। दुख के आंसू संसार भी समझता है। लेकिन जब आनंद के आंसू आने शुरू होते हैं, तब संसार की पकड़ के बाहर हुए।
हिरदै माहीं प्रेम जो, नैनों झलके आय।
सोइ छका हरिरस-पगा, वा पग परसौ धाय।।
तब तुम उन मित्रों को खोज लेना, संगी-साथियों को खोज लेना, जिनके बीच बैठ कर तुम आनंद के आंसू रोओ और वे तुम्हारे धन्यभाग के गीत गाएं, वे तुम्हारा अभिनंदन करें। वे कह सकें: बधाइयां।
तो मिलन दूसरा कदम; और तीसरा कदम: विसर्जन। पहले प्रभु से दूर-दूर हम; अंधेरी रात, अकेले। फिर प्रभु के साथ चांदनी रात और नृत्य और रास। और फिर एक घड़ी आती है, जब तुम तुम नहीं, प्रभु प्रभु नहीं; बूंद सागर में गिर गई या सागर बूंद में।
ये तीन कदम हैं भक्ति के। चरणदास के साथ इन तीन कदमों को समझने की कोशिश करना।
आज इतना ही।