मेरे प्रिय आत्मन्! ‘मैं कौन हूं?’--इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल और परसों मैंने आपसे की हैं। परसों मैंने कहा, ज्ञान नहीं वरन न जानने की अवस्था, न जानने का बोध सत्य की ओर मार्ग प्रशस्त करता है। यह जान लेना कि ‘मैं नहीं जानता हूं’ एक अपूर्व शांति में और मौन में चित्त को ले जाता है। यह स्मरण आ जाना कि सारा ज्ञान, सारे शब्द और सिद्धांत जो मेरी स्मृति पर छाए हैं, वे ज्ञान नहीं हैं; वरन जब स्मृति मौन और चुप होती है, और जब स्मृति नहीं बोलती, और जब स्मृति स्पंदित नहीं होती, तब उस अंतराल में, उस रिक्त में जो जाना जाता है, वही, वही सत्य है, वही ज्ञान है। इस संबंध में परसों थोड़ी सी बातें कही थीं। और कल--और कल मैंने आपसे कहा कि वे नहीं जो अपने अहंकार में कठोर हो गए हैं, वे नहीं जो अपने अहंकार के सिंहासन पर विराजमान हैं, वे नहीं जिन्होंने अपनी संवेदना के सब झरोखे बंद कर लिए और जिनके हृदय पत्थर हो गए हैं, वरन वे जो प्रेम में तरल हैं और जिनके हृदय के सब द्वार खुले हैं और जिन्हें अज्ञात स्पर्श करता है और जिन्हें जीवन में चारों तरफ छाए हुए जीवन में रहस्य की प्रतीति होती है ऐसे हृदय, ऐसे काव्य से और प्रेम से और रहस्य से भरे हृदय ही केवल सत्य को जानने में समर्थ हो पाते हैं। और आज सुबह एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा मैं शुरू करूं। एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ थी। सारा गांव ही, सारी राजधानी ही द्वार पर इकट्ठी हो गई थी। सुबह-सुबह भीड़ का आगमन शुरू हुआ था और अब तो संध्या आने को थी, लेकिन जो आकर खड़ा हो गया था वह खड़ा था, कोई भी हटा नहीं था। दिन भर से भूखे-प्यासे लोग तपती धूप में उस द्वार के सामने खड़े थे। कोई अघटनीय वहां घट गया था। कुछ ऐसी बात हो गई थी जो विश्वास योग्य ही नहीं मालूम होती थी। सुबह-सुबह एक भिक्षु ने आकर उस द्वार को खटखटाया था और अपना भिक्षापात्र आगे बढ़ा दिया था। राजा उठा ही था, उसने अपने नौकरों को कहा होगा कि जाओ और भिक्षापात्र भर दो। लेकिन उस भिक्षु ने कहा: ठहरो! इसके पहले कि मैं भिक्षा स्वीकार करूं, मेरी शर्त भी सुन लो। बेशर्त मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करता हूं। यह तो सुना गया था कि देने वाले शर्त के साथ देते हैं, यह बिलकुल पहली बात थी कि लेने वाला भी शर्त रखता हो, भिखारी! राजा ने कहा: शर्त! कैसी शर्त? उस भिखारी ने कहा: शर्त है मेरी एक: भिक्षा स्वीकार करूंगा, लेकिन तभी जब यह वचन दो कि पात्र मेरा पूरा भर दोगे, अधूरा तो नहीं छोड़ोगे? पात्र पूरा भरोगे यह वचन दो, तो भिक्षा स्वीकार करूं, अन्यथा किसी और द्वार चला जाऊं। राजा ने कहा: जानते हो राजा का द्वार है यह, क्या तुम्हारा छोटा सा पात्र न भर सकूंगा? पर उसने कहा: फिर भी शर्त ले लेनी उचित है, वचन ले लेना उचित है। राजा ने दिया वचन। और अपने मंत्रियों को कहा कि जब पात्र भरने की बात ही आ गई है, तो स्वर्णमुद्राओं से पात्र भर दो। बहुत थीं स्वर्णमुद्राएं उसके पास, बहुत थे हीरे-मोती, बहुत थे माणिक, बहुत था, अकूत खजाना था।
Osho's Commentary
‘मैं कौन हूं?’--इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल और परसों मैंने आपसे की हैं।
परसों मैंने कहा, ज्ञान नहीं वरन न जानने की अवस्था, न जानने का बोध सत्य की ओर मार्ग प्रशस्त करता है। यह जान लेना कि ‘मैं नहीं जानता हूं’ एक अपूर्व शांति में और मौन में चित्त को ले जाता है। यह स्मरण आ जाना कि सारा ज्ञान, सारे शब्द और सिद्धांत जो मेरी स्मृति पर छाए हैं, वे ज्ञान नहीं हैं; वरन जब स्मृति मौन और चुप होती है, और जब स्मृति नहीं बोलती, और जब स्मृति स्पंदित नहीं होती, तब उस अंतराल में, उस रिक्त में जो जाना जाता है, वही, वही सत्य है, वही ज्ञान है। इस संबंध में परसों थोड़ी सी बातें कही थीं।
और कल--और कल मैंने आपसे कहा कि वे नहीं जो अपने अहंकार में कठोर हो गए हैं, वे नहीं जो अपने अहंकार के सिंहासन पर विराजमान हैं, वे नहीं जिन्होंने अपनी संवेदना के सब झरोखे बंद कर लिए और जिनके हृदय पत्थर हो गए हैं, वरन वे जो प्रेम में तरल हैं और जिनके हृदय के सब द्वार खुले हैं और जिन्हें अज्ञात स्पर्श करता है और जिन्हें जीवन में चारों तरफ छाए हुए जीवन में रहस्य की प्रतीति होती है ऐसे हृदय, ऐसे काव्य से और प्रेम से और रहस्य से भरे हृदय ही केवल सत्य को जानने में समर्थ हो पाते हैं।
और आज सुबह एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा मैं शुरू करूं।
एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ थी। सारा गांव ही, सारी राजधानी ही द्वार पर इकट्ठी हो गई थी। सुबह-सुबह भीड़ का आगमन शुरू हुआ था और अब तो संध्या आने को थी, लेकिन जो आकर खड़ा हो गया था वह खड़ा था, कोई भी हटा नहीं था। दिन भर से भूखे-प्यासे लोग तपती धूप में उस द्वार के सामने खड़े थे। कोई अघटनीय वहां घट गया था। कुछ ऐसी बात हो गई थी जो विश्वास योग्य ही नहीं मालूम होती थी।
सुबह-सुबह एक भिक्षु ने आकर उस द्वार को खटखटाया था और अपना भिक्षापात्र आगे बढ़ा दिया था। राजा उठा ही था, उसने अपने नौकरों को कहा होगा कि जाओ और भिक्षापात्र भर दो। लेकिन उस भिक्षु ने कहा: ठहरो! इसके पहले कि मैं भिक्षा स्वीकार करूं, मेरी शर्त भी सुन लो। बेशर्त मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करता हूं।
यह तो सुना गया था कि देने वाले शर्त के साथ देते हैं, यह बिलकुल पहली बात थी कि लेने वाला भी शर्त रखता हो, भिखारी!
राजा ने कहा: शर्त! कैसी शर्त?
उस भिखारी ने कहा: शर्त है मेरी एक: भिक्षा स्वीकार करूंगा, लेकिन तभी जब यह वचन दो कि पात्र मेरा पूरा भर दोगे, अधूरा तो नहीं छोड़ोगे? पात्र पूरा भरोगे यह वचन दो, तो भिक्षा स्वीकार करूं, अन्यथा किसी और द्वार चला जाऊं।
राजा ने कहा: जानते हो राजा का द्वार है यह, क्या तुम्हारा छोटा सा पात्र न भर सकूंगा?
पर उसने कहा: फिर भी शर्त ले लेनी उचित है, वचन ले लेना उचित है।
राजा ने दिया वचन। और अपने मंत्रियों को कहा कि जब पात्र भरने की बात ही आ गई है, तो स्वर्णमुद्राओं से पात्र भर दो। बहुत थीं स्वर्णमुद्राएं उसके पास, बहुत थे हीरे-मोती, बहुत थे माणिक, बहुत था, अकूत खजाना था।