Krishna Smriti #17
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Questions in this Discourse
ओशो, आपकी प्रवचन-धारा ज्यों-ज्यों बहने लगी है त्यों-त्यों आपके साथ, आपके वाक-प्रवाह के साथ बहते-बहते हम दिक्कत में पड़ जाते हैं। तकलीफ यह है कि आपके द्वारा कथित उस तिनके की भांति हम लड़ते नहीं, बहने को हम भी हाथ-पांव पसारते हैं, मगर आपका जोश इतना है कि हम बह नहीं सकते। सुबह आज श्री अरविंद के बारे में बातचीत हुई। दि वे ऑफ व्हाइट क्लाउड में एक जगह लिखा है--समटाइम्स आई टेक अवे दि मैन, दि सब्जेक्ट, बट डू नॉट टेक अवे दि सरकमस्टांसेज, दैट इ़ज ऑब्जेक्ट। समटाइम्स आई टेक अवे दि सरकमस्टांसेज, बट डू नॉट टेक अवे दि मैन। समटाइम्स आई टेक अवे बोथ, दि मैन एंड दि सरकमस्टांसेज, एंड समटाइम्स आई टेक अवे नीदर दि मैन नॉर दि सरकमस्टांसेज। श्री अरविंद की बात करते-करते प्रश्र्न यह उठता है मन में, कई बार, कि आप जैसा पांडिचेरी के बारे में कहते हैं वैसा मैं भी मानता हूं, मगर जो इंटरप्रिटेशन मिला आपसे, उससे ऐसा महसूस हुआ कि अरविंद के साक्षात्कार के बारे में अन्य किसी भी से क्यों पूछा जाए? मैं यहां आया था तब मुझे ऐसा लगा था कि मैं निर-अहंकारी आपके पास जा रहा हूं और मेरा अहंकार विगलित हो जाएगा। मेरा अहंकार यहां आकर इतना छोटा हो गया, क्योंकि मैंने देखा कि यहां तो निश्र्चय ही छोटा मालूम पड़ जाएगा। मगर कृष्ण ऐसे नहीं हैं। कृष्ण तो कहते हैं कि अनादिकाल से प्राप्त जो ज्ञान है, वह ज्ञान मैं तुमको देता हूं। वह कृष्ण की बात है। और आपकी शैली में भी कुछ तकलीफें पड़ती हैं कि तर्क को छोड़ कर आप जब तथ्यों में आ जाते हैं तब सब कुछ बहने लगता है, हम भी बहने लगते हैं, ऐसी अनुभूति होती है। और वेद-उपनिषद के बारे में आपने सुबह जो कहा कि यह बेमानी है उद्धृत करना कि ऐसा ही वेद में कहा गया है, ऐसा ही उपनिषद में कहा गया है, क्योंकि यह आत्महीनता का अनुभव ही है। इसी संदर्भ में, प्रथम उपनिषद में और बाद में श्रीमद्भगवद्गीता में निर्वाण शब्द का विन्यास हो चुका था। वही भाव बुद्धोक्त निर्वाण शब्द में भी मिलता है। फिर भी इस परंपरा की देन को बुद्ध ने स्वीकार नहीं किया। कृष्णावतार अनादिकाल से प्राप्त ज्ञान को पृथ्वी पर ले आने का दावा करता है। मगर बुद्ध का निजी प्रतीति पर आधार रखते हुए भी डा. राधाकृष्णन के अनुसार उपनिषदों के सिद्धांत का ही बुद्ध के प्रवचनों में अवतरण है। तो किसकी बौद्धिक प्रामाणिकता विश्र्वस्त कही जाए? कृपया इन शंकाओं का निवारण करें।
सत्य तो अनादि है। अनादि का अर्थ पुराना नहीं। अनादि का अर्थ है, जिसका कोई प्रारंभ नहीं है। अनादि का अर्थ है, बिगिनिंगलेस। अनादि का अर्थ एनशिएंट नहीं है। पुराने का तो प्रारंभ होता है। सत्य का कभी प्रारंभ नहीं होता। और जो पुराना पड़ गया, वह सत्य नहीं हो सकता। क्योंकि सत्य तो अभी भी है, इस क्षण भी है। तो सत्य न तो नया होता है, न पुराना होता है। जो सत्य कहता है कि नया है, वह कल पुराना पड़ जाएगा। सब, जिनको हम पुराना कहते हैं, वे कभी नये थे; और जिनको हम आज नया कहते हैं, कल पुराने हो जाएंगे। नया तो पुराना हो जाता है, पुराना कभी नया था। सत्य न तो नया है, न पुराना है। सत्य तो वही है जो सदा है। अनादि का अर्थ यह है। अनादि का अर्थ पुराना, प्राचीन नहीं है।
तो यदि कृष्ण कहते हैं कि मैं वही सत्य कह रहा हूं जो अनादि है, तो आप यह मत समझ लेना कि कृष्ण कह रहे हैं, मैं वही सत्य कहता हूं जो पुराना है। कृष्ण कह रहे हैं कि मैं वही सत्य कहता हूं, जो है। अनादि का मतलब इतना ही होता है--मैं वही कहता हूं, जो है। जिन्होंने पहले जाना होगा, अगर सत्य जाना है तो यही जाना होगा। जो आज जान रहे हैं, यदि सत्य जानेंगे तो यही जानेंगे। जो कल जानेंगे, यदि सत्य जानेंगे तो यही जानेंगे। सिर्फ असत्य नये और पुराने हो सकते हैं। सत्य पुराना और नया नहीं हो सकता। इसलिए सत्य की घोषणा दो प्रकार से हो सकती है।
बुद्ध उन सारे पुराने लोगों की बात नहीं करते जिन्होंने सत्य जाना है। कोई कारण नहीं है। क्योंकि जब बुद्ध स्वयं ही सत्य जान रहे हैं, तो अब और गवाहियां जुड़ाने से कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। जो वे जान रहे हैं, जान रहे हैं। उसमें कुछ जुड़ेगा नहीं; कि किन-किन ने जाना, इससे सत्य में कुछ जुड़ेगा नहीं। बुद्ध ने जितना सत्य जाना है, जो जाना है, इसमें और हजार लोगों ने भी जाना हो इनका नाम लेने से कुछ एडीशन होने वाला नहीं है। इस सत्य की गरिमा में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। इस सत्य की प्रतिष्ठा में कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। इसलिए बुद्ध सीधे निपट कहते हैं कि ऐसा जो मैंने जाना, तुमसे कहता हूं। और जान कर ही वे पुराने लोगों का नाम नहीं लेते, क्योंकि पुराने लोगों के साथ, पुराने लोगों का नाम लेने के साथ बुद्ध के समय तक बड़ा खतरा हो चुका है। क्योंकि बुद्ध अपने सुनने वालों को यह भी कहते हैं कि तुम इसलिए मत मान लेना कि मैं कहता हूं, तुम इसलिए मत मान लेना कि बुद्ध ने ऐसा जाना है; जब तक तुम न जान लो, तब तक तुम किसने कहा, किसने जाना, इससे कुछ प्रमाण मत जुटा लेना।
तो बुद्ध जिनसे बोल रहे हैं, वे साधक हैं। बुद्ध जिनसे बोल रहे हैं, वे सत्य की खोज पर निकले हुए लोग हैं। बुद्ध के सामने जो सुनने वाला है वह बहुत भिन्न है, कृष्ण के सामने जो सुनने वाला है उससे। बुद्ध के सामने जो लोग हैं, वे वे हैं जो सत्य को खोजने निकले हैं। सत्य को खोजने जो लोग निकले हैं, उनसे यह कहना ही होगा कि तुम मेरी मत मान लेना। क्योंकि फिर तुम खोज पर कैसे जाओगे! और अगर बुद्ध अपने पिछले प्रमाणों को दोहराएं, तो फिर वे रास्ता बना रहे हैं अपने से पीछे आने वालों के लिए कि वे बुद्ध के प्रमाण को दोहराएं। इसलिए बुद्ध निपट रूप से पिछले सारे संबंधों की बात ही नहीं करते। वे कहते हैं, ऐसा मैंने जाना है, यह सत्य मैंने देखा है, यह मैं तुमसे कहता हूं। और तुम भी जान न लो, तब तक बुद्ध ने कहा है इसलिए मत मान लेना।
लेकिन कृष्ण के सामने बहुत दूसरे तरह का आदमी है, वह कोई साधक नहीं है, वह कोई सत्य की खोज पर निकला हुआ व्यक्ति नहीं है। जो व्यक्ति कृष्ण के सामने है, वह बुद्ध के सामने वाला व्यक्ति नहीं है। कृष्ण के सामने जो व्यक्ति खड़ा है उसकी सत्य की कोई खोज नहीं है। वह सिर्फ मोहग्रस्त हुआ है। वह सिर्फ विभ्रमित हुआ है, वह सिर्फ कनफ्यूज्ड हो गया है, स्थिति ने उसे भयभीत कर दिया है। इसलिए कृष्ण उसके सामने सत्य का अनावरण करने को उतने उत्सुक नहीं हैं, जितना सत्य क्या है यह कहने को उत्सुक हैं। वह अनावरण करने के लिए आया भी नहीं है। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि जो मैं तुझसे कह रहा हूं, यह मैं ही तुझसे कह रहा हूं, ऐसा नहीं है; यह और भी पहले औरों ने औरों से कहा है। अगर अर्जुन एक साधक हो, तब तो उसे ही सत्य के साक्षात्कार के लिए कहा जा सकता है। वह कोई साधक नहीं है। वह सिर्फ समझने के लिए आतुर है कि सत्य क्या है, खोजने का कोई सवाल नहीं है अर्जुन के लिए। वह कोई आश्रम में, किसी पहाड़ की कंदरा में, किसी गुरु के पास बैठ कर सत्य सीखने नहीं गया है। वह सत्य की खोज में आया ही नहीं है। आया तो वह युद्ध करने है और युद्ध की स्थिति ने उसे भयभीत और डांवाडोल कर दिया है। तो कृष्ण उससे कहते हैं कि जो मैं कह रहा हूं, यह मैं ही तुझसे कह रहा हूं, ऐसा नहीं है; यह मुझसे पहले औरों ने भी औरों से कहा है। वह जो अनादि है, जो सदा कहा गया है, वही मैं तुझसे कह रहा हूं। अर्जुन के लिए इसमें अर्थ है। अर्जुन खुद खोजने जाता तो बात और हो जाती, अर्जुन खुद खोजने नहीं जा रहा है। इसलिए कृष्ण केवल सत्य की लंबी धारा की बात उससे कर रहे हैं। वे अर्जुन के मन पर एक चीज साफ करना चाहते हैं कि वे ही उससे नहीं कह रहे हैं।
और इसमें और भी कारण हैं। बुद्ध के पास जो व्यक्ति आया है, वह बुद्ध की शरण होकर आया है। अर्जुन तो मित्र है, वह कोई कृष्ण की शरण नहीं है वहां। और कई बार ऐसा होता है कि बुद्ध के भिक्षुओं ने बुद्ध की बात मान ली, लेकिन बुद्ध की पत्नी ने नहीं मानी। और जब बुद्ध गांव वापस लौटे और पत्नी उनसे मिली बारह साल के बाद--जब कि वे जगत, दूर-दूर तक सत्य के उद्घोषा हो गए थे, दूर-दूर से लोग उनके चरणों में सत्य की तलाश के लिए आने लगे थे, सारी दुनिया के लिए वे बुद्ध हो गए थे--तब भी जब वे घर लौटे तो उनकी पत्नी के लिए बुद्ध नहीं थे। उनकी पत्नी ने वही बात शुरू की जो बारह वर्ष पहले जब वे घर से गए थे तब की होती। वह उसी तरह नाराज थी और कहने लगी कि तुमने मुझे धोखा दिया! तुम मुझे छोड़ कर भाग गए!
बुद्ध की पत्नी का अपना कोण है। और अगर बुद्ध की पत्नी को बुद्ध कहें कि मैं बुद्ध हूं, तो वह कहेगी, छोड़ो यह बात! कोई बुद्ध नहीं है और तुम वही के वही हो! बुद्ध की पत्नी के लिए बुद्ध को और तरह बात करनी पड़ेगी। बुद्ध की पत्नी का एक दृष्टिकोण है। एक बहुत मीठी कथा इससे जुड़ी है।
आनंद जब दीक्षित हुआ तो वह बुद्ध का बड़ा चचेरा भाई था। दीक्षा लेते समय उसने कहा कि मैं कुछ वचनबद्धता आपसे करवा लेना चाहता हूं। क्योंकि दीक्षा लेने के बाद तो मैं छोटा हो जाऊंगा, अभी मैं बड़ा भाई हूं और अभी तुम छोटे भाई की हैसियत से मुझे कुछ वचन दे दो, जो बाद में मैं नहीं ले सकूंगा। दीक्षा लेने के बाद तो मैं छोटा हो जाऊंगा। तो अभी मैं बड़ा भाई हूं और तुम छोटे भाई हो, इसलिए अभी मैं तुमसे कुछ वचन ले लूं। वे तीन वचन उसने लिए। उसने कहा, एक वचन तो यह कि मैं सदा तुम्हारे साथ रहूंगा। तुम कभी यह न कह सकोगे कि जाओ विहार करो, उस जगह चले जाओ, इस जगह चले जाओ। मैं सदा तुम्हारे साथ रहूंगा। दूसरा वचन मैं तुमसे यह ले लेता हूं कि कभी भी किसी को मैं मिलाना चाहूंगा, चाहे आधी रात हो, तो तुम्हें मिलना पड़ेगा। और कोई भी प्रश्र्न मैं पूछना चाहूंगा, पुछवाना चाहूंगा, तो आप किसी तरह टाल न सकोगे, उस प्रश्र्न का उत्तर देना ही पड़ेगा। और तीसरी बात, कितनी ही निजी चर्चा किसी से हो रही हो, अगर मैं वहां मौजूद रहना चाहूंगा तो मुझे रोका नहीं जा सकेगा। ऐसे तीन वचन उसने बुद्ध से दीक्षा के पहले ले लिए। और छोटे भाई थे, इसलिए इस खेल को उन्होंने निभा दिया। उन्होंने कहा कि ठीक है। अब वह कोई ज्यादा मांग भी नहीं रहा था, दे दिया।
लेकिन बड़ी कठिनाई आई, बुद्ध को खयाल में न था, जब वे पत्नी से मिलने गए तब आनंद ने कहा कि मैं साथ नहीं छोड़ सकता। बुद्ध ने कहा, तू बड़ा पागल है, तू थोड़ा तो सोच! क्योंकि मैं उसके लिए कोई गौतम बुद्ध नहीं हूं, मैं उसका पति हूं। उसके लिए तो अभी भी पति हूं। और अगर तू मेरे साथ गया तो वह बहुत मानिनी है और बहुत नाराज हो जाएगी कि तुम आए भी बारह साल बाद, तो एक आदमी को साथ लेकर आए हो! यानी मुझे थोड़ा तो मौका दो कि मैं एकांत में बारह साल का सब दुख, पीड़ा, सारा क्रोध निकाल लूं। तो आनंद से कहा कि माना कि मैंने तुझे वचन दिया था, लेकिन तुझसे प्रार्थना करता हूं कि तू इस बार कृपा करके उस वचन का आग्रह मत कर।
अब यह थोड़ा सोचने जैसा है कि बुद्ध का यह कहना अति मानवीय है, अदभुत है। आनंद कहता भी है कि आपके लिए भी क्या कोई पत्नी है? बुद्ध कहते हैं, मेरे लिए नहीं, लेकिन उसके लिए मैं पति हूं, इसको अभी कैसे मिटाऊं? यह मेरे हाथ में नहीं है। ठीक, आनंद दूर खड़ा रह गया और बुद्ध पत्नी के पास गए और उसने चिल्लाना शुरू किया। बारह साल की लंबी बात थी, बहुत पीड़ाएं थीं, अचानक रात में बिना कहे उसको छोड़ कर भाग गए थे, उसका दुख बिलकुल स्वाभाविक है। बुद्ध चुपचाप खड़े हैं। वे उसकी सारी बात सुन लेते हैं। फिर वह आंसू पोंछती है और बुद्ध उससे कहते हैं कि तू ठीक से देख, मैं वही नहीं हूं जो गया था। अब मैं तेरे पति की तरह नहीं आया हूं, तेरा पति मर चुका। मैं कोई और ही हूं। अब तू मुझसे बात कर, अब तू किससे बात कर रही है?
तो कृष्ण और अर्जुन के बीच भेद-स्थिति बहुत और है। अर्जुन मित्र है, गले में हाथ डाल कर घूमे हैं, खेले हैं, गपशप किए हैं। यहां कृष्ण सिर्फ इतना ही कहें कि मैंने जो सत्य जाना है वह मैं तुमसे कहता हूं, तो वह कहेगा कि जानते हैं हम आपको और आपके सत्य को! तो कृष्ण उससे कहते हैं कि और भी पहले इस सत्य को औरों ने भी औरों से कहा है, वही मैं तुझसे कह रहा हूं। मुझे मित्र मान कर तू कहीं इस खयाल में मत पड़ जाना। इसलिए एक पर्टिकुलर सिच्युएशन की बात है, और वह चूक जाए खयाल से तो आप गलती में पड़ेंगे। बुद्ध वैसी स्थिति में नहीं हैं। बुद्ध कह सकते हैं, यह मैं कह रहा हूं। और किसी ने किसी से कहा हो या न कहा हो, इससे मुझे प्रयोजन नहीं है। और तुमसे मैं यह कह देता हूं कि मेरे कहने से तुम मत मान लेना। इसलिए बुद्ध कोई अहंकार की घोषणा कर रहे हों, ऐसा नहीं मालूम होता। क्योंकि अहंकारी यह कहेगा कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। बुद्ध तो निपट निजता की बात कर रहे हैं, वे यह कह रहे हैं कि मैं कहता हूं, इससे तुम मान मत लेना, लेकिन कहता मैं ही हूं।
हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह औरों ने भी कहा है। हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह उपनिषदों ने भी कहा है। हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह वेदों ने भी कहा है। लेकिन बुद्ध क्यों जोर देते हैं इस बात पर? अगर कोई बुद्ध से कहे भी कि यह वेदों में कहा है, उपनिषद में कहा है, तो बुद्ध कहेंगे कि नहीं, यह मैं ही तुमसे कह रहा हूं। इसके भी कारण हैं, सरकमस्टेंशियल। क्योंकि बुद्ध के समय तक वेद और उपनिषद की परंपरा बिलकुल सड़ गई थी। और वेद-उपनिषद के पक्ष में एक बात भी कहनी उस पूरी परंपरा को सहारा देना था जो बुरी तरह सड़ गई थी। यह जानते हुए भलीभांति कि बुद्ध जो कह रहे हैं सारभूत, वही वेद-उपनिषद में कहा गया है। लेकिन फिर भी वेद-उपनिषद का सहारा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस सहारे पर एक बहुत बड़ा पाखंड का जाल खड़ा हो गया था, जो जनता को लूट रहा है, घसीट रहा है, गलत रास्तों पर भटका रहा है, अंधविश्र्वास में डुबा रहा है। इसलिए वेद और उपनिषद के पक्ष में वे बिलकुल चुप रह जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि बुद्ध को यह बोध नहीं होता है, कि खयाल नहीं होता है। लेकिन कई बार इतिहास में ऐसा वक्त आ जाता है कि कल के सत्यों को आज के सत्यवादी को उखाड़ कर फेंकना पड़ता है। क्योंकि कल के सत्य कल के होने की वजह से असत्यों के साथ इस बुरी तरह घुल-मिल जाते हैं कि अब उनको साथ देना उन असत्यों को भी साथ देना है जिनके साथ उनका जोड़ और गठबंधन हो गया होता है।
कृष्ण के सामने वैसा सवाल नहीं था। कृष्ण के सामने वेद और उपनिषद की परंपरा जरा भी अशुद्ध नहीं हुई थी, वह अपनी ऊंचाई पर थी, शिखर पर थी। सच तो यह है, इसीलिए हम गीता को कह सके कि वह समस्त वेदों और समस्त उपनिषदों का सार है। असल में कृष्ण को हम कह सकते हैं कि उपनिषद ने जो संस्कृति पैदा की थी, उसके वे सारभूत हैं। जो एसेंशियल था उस संस्कृति में, वह सब कृष्ण से प्रकट हो गया है। तो कृष्ण तो उस संस्कृति के शिखर पर पैदा हुए और बुद्ध उस संस्कृति के बिलकुल पतन के गर्त में पैदा हुए। वही संस्कृति थी, लेकिन बुद्ध उसके शिखर की अवस्था में पैदा नहीं हुए हैं, बुद्ध उसके बिलकुल पतन की अवस्था में पैदा हुए हैं, जब वह संस्कृति बिलकुल धूल-धूसरित हो गई थी और सब सड़ गया था। और ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी नहीं रह गया था, ब्राह्मण सिर्फ ब्रह्म के नाम पर शोषक हो गया था। और उस संस्कृति के साथ सब कुछ गंदा जुड़ गया था जो कि धर्म का जिससे कोई नाता नहीं है।
इसलिए कृष्ण तो पीक पर पैदा होते हैं। उपनिषद अपनी कीर्ति के शिखर पर हैं। उपनिषद में जो ज्ञान प्रकट हुआ था, उसकी किरणें चारों ओर व्याप्त हैं। हवा और कण-कण में उनकी खबर है। और कृष्ण के लिए उपनिषद कोई मरी हुई बात नहीं है। कण-कण में, हवा-हवा में, फूल-फूल में, आकाश की बदलियों में, सब तरफ उपनिषद की गूंज है। उस वक्त जब वे कह सकते हैं, वे कहते हैं, तो वे किसी पुराने की गवाही नहीं दे रहे हैं। वह जो मौजूद ही है पूरी तरह, उसकी गवाही दे रहे हैं।
लेकिन बुद्ध के वक्त तक वह सब सड़ गया और नष्ट हो गया और लाश पड़ी रह गई थी। उस लाश की गवाही बुद्ध नहीं दे सकते। इस कारण। न कोई बुद्ध का अहंकार है और न कोई कृष्ण का अहंकार है कि वे पुराने का समर्थन खोजते हैं। न बुद्ध का अहंकार है कि वे अपनी घोषणा करते हैं।
तो यदि कृष्ण कहते हैं कि मैं वही सत्य कह रहा हूं जो अनादि है, तो आप यह मत समझ लेना कि कृष्ण कह रहे हैं, मैं वही सत्य कहता हूं जो पुराना है। कृष्ण कह रहे हैं कि मैं वही सत्य कहता हूं, जो है। अनादि का मतलब इतना ही होता है--मैं वही कहता हूं, जो है। जिन्होंने पहले जाना होगा, अगर सत्य जाना है तो यही जाना होगा। जो आज जान रहे हैं, यदि सत्य जानेंगे तो यही जानेंगे। जो कल जानेंगे, यदि सत्य जानेंगे तो यही जानेंगे। सिर्फ असत्य नये और पुराने हो सकते हैं। सत्य पुराना और नया नहीं हो सकता। इसलिए सत्य की घोषणा दो प्रकार से हो सकती है।
बुद्ध उन सारे पुराने लोगों की बात नहीं करते जिन्होंने सत्य जाना है। कोई कारण नहीं है। क्योंकि जब बुद्ध स्वयं ही सत्य जान रहे हैं, तो अब और गवाहियां जुड़ाने से कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। जो वे जान रहे हैं, जान रहे हैं। उसमें कुछ जुड़ेगा नहीं; कि किन-किन ने जाना, इससे सत्य में कुछ जुड़ेगा नहीं। बुद्ध ने जितना सत्य जाना है, जो जाना है, इसमें और हजार लोगों ने भी जाना हो इनका नाम लेने से कुछ एडीशन होने वाला नहीं है। इस सत्य की गरिमा में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। इस सत्य की प्रतिष्ठा में कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। इसलिए बुद्ध सीधे निपट कहते हैं कि ऐसा जो मैंने जाना, तुमसे कहता हूं। और जान कर ही वे पुराने लोगों का नाम नहीं लेते, क्योंकि पुराने लोगों के साथ, पुराने लोगों का नाम लेने के साथ बुद्ध के समय तक बड़ा खतरा हो चुका है। क्योंकि बुद्ध अपने सुनने वालों को यह भी कहते हैं कि तुम इसलिए मत मान लेना कि मैं कहता हूं, तुम इसलिए मत मान लेना कि बुद्ध ने ऐसा जाना है; जब तक तुम न जान लो, तब तक तुम किसने कहा, किसने जाना, इससे कुछ प्रमाण मत जुटा लेना।
तो बुद्ध जिनसे बोल रहे हैं, वे साधक हैं। बुद्ध जिनसे बोल रहे हैं, वे सत्य की खोज पर निकले हुए लोग हैं। बुद्ध के सामने जो सुनने वाला है वह बहुत भिन्न है, कृष्ण के सामने जो सुनने वाला है उससे। बुद्ध के सामने जो लोग हैं, वे वे हैं जो सत्य को खोजने निकले हैं। सत्य को खोजने जो लोग निकले हैं, उनसे यह कहना ही होगा कि तुम मेरी मत मान लेना। क्योंकि फिर तुम खोज पर कैसे जाओगे! और अगर बुद्ध अपने पिछले प्रमाणों को दोहराएं, तो फिर वे रास्ता बना रहे हैं अपने से पीछे आने वालों के लिए कि वे बुद्ध के प्रमाण को दोहराएं। इसलिए बुद्ध निपट रूप से पिछले सारे संबंधों की बात ही नहीं करते। वे कहते हैं, ऐसा मैंने जाना है, यह सत्य मैंने देखा है, यह मैं तुमसे कहता हूं। और तुम भी जान न लो, तब तक बुद्ध ने कहा है इसलिए मत मान लेना।
लेकिन कृष्ण के सामने बहुत दूसरे तरह का आदमी है, वह कोई साधक नहीं है, वह कोई सत्य की खोज पर निकला हुआ व्यक्ति नहीं है। जो व्यक्ति कृष्ण के सामने है, वह बुद्ध के सामने वाला व्यक्ति नहीं है। कृष्ण के सामने जो व्यक्ति खड़ा है उसकी सत्य की कोई खोज नहीं है। वह सिर्फ मोहग्रस्त हुआ है। वह सिर्फ विभ्रमित हुआ है, वह सिर्फ कनफ्यूज्ड हो गया है, स्थिति ने उसे भयभीत कर दिया है। इसलिए कृष्ण उसके सामने सत्य का अनावरण करने को उतने उत्सुक नहीं हैं, जितना सत्य क्या है यह कहने को उत्सुक हैं। वह अनावरण करने के लिए आया भी नहीं है। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि जो मैं तुझसे कह रहा हूं, यह मैं ही तुझसे कह रहा हूं, ऐसा नहीं है; यह और भी पहले औरों ने औरों से कहा है। अगर अर्जुन एक साधक हो, तब तो उसे ही सत्य के साक्षात्कार के लिए कहा जा सकता है। वह कोई साधक नहीं है। वह सिर्फ समझने के लिए आतुर है कि सत्य क्या है, खोजने का कोई सवाल नहीं है अर्जुन के लिए। वह कोई आश्रम में, किसी पहाड़ की कंदरा में, किसी गुरु के पास बैठ कर सत्य सीखने नहीं गया है। वह सत्य की खोज में आया ही नहीं है। आया तो वह युद्ध करने है और युद्ध की स्थिति ने उसे भयभीत और डांवाडोल कर दिया है। तो कृष्ण उससे कहते हैं कि जो मैं कह रहा हूं, यह मैं ही तुझसे कह रहा हूं, ऐसा नहीं है; यह मुझसे पहले औरों ने भी औरों से कहा है। वह जो अनादि है, जो सदा कहा गया है, वही मैं तुझसे कह रहा हूं। अर्जुन के लिए इसमें अर्थ है। अर्जुन खुद खोजने जाता तो बात और हो जाती, अर्जुन खुद खोजने नहीं जा रहा है। इसलिए कृष्ण केवल सत्य की लंबी धारा की बात उससे कर रहे हैं। वे अर्जुन के मन पर एक चीज साफ करना चाहते हैं कि वे ही उससे नहीं कह रहे हैं।
और इसमें और भी कारण हैं। बुद्ध के पास जो व्यक्ति आया है, वह बुद्ध की शरण होकर आया है। अर्जुन तो मित्र है, वह कोई कृष्ण की शरण नहीं है वहां। और कई बार ऐसा होता है कि बुद्ध के भिक्षुओं ने बुद्ध की बात मान ली, लेकिन बुद्ध की पत्नी ने नहीं मानी। और जब बुद्ध गांव वापस लौटे और पत्नी उनसे मिली बारह साल के बाद--जब कि वे जगत, दूर-दूर तक सत्य के उद्घोषा हो गए थे, दूर-दूर से लोग उनके चरणों में सत्य की तलाश के लिए आने लगे थे, सारी दुनिया के लिए वे बुद्ध हो गए थे--तब भी जब वे घर लौटे तो उनकी पत्नी के लिए बुद्ध नहीं थे। उनकी पत्नी ने वही बात शुरू की जो बारह वर्ष पहले जब वे घर से गए थे तब की होती। वह उसी तरह नाराज थी और कहने लगी कि तुमने मुझे धोखा दिया! तुम मुझे छोड़ कर भाग गए!
बुद्ध की पत्नी का अपना कोण है। और अगर बुद्ध की पत्नी को बुद्ध कहें कि मैं बुद्ध हूं, तो वह कहेगी, छोड़ो यह बात! कोई बुद्ध नहीं है और तुम वही के वही हो! बुद्ध की पत्नी के लिए बुद्ध को और तरह बात करनी पड़ेगी। बुद्ध की पत्नी का एक दृष्टिकोण है। एक बहुत मीठी कथा इससे जुड़ी है।
आनंद जब दीक्षित हुआ तो वह बुद्ध का बड़ा चचेरा भाई था। दीक्षा लेते समय उसने कहा कि मैं कुछ वचनबद्धता आपसे करवा लेना चाहता हूं। क्योंकि दीक्षा लेने के बाद तो मैं छोटा हो जाऊंगा, अभी मैं बड़ा भाई हूं और अभी तुम छोटे भाई की हैसियत से मुझे कुछ वचन दे दो, जो बाद में मैं नहीं ले सकूंगा। दीक्षा लेने के बाद तो मैं छोटा हो जाऊंगा। तो अभी मैं बड़ा भाई हूं और तुम छोटे भाई हो, इसलिए अभी मैं तुमसे कुछ वचन ले लूं। वे तीन वचन उसने लिए। उसने कहा, एक वचन तो यह कि मैं सदा तुम्हारे साथ रहूंगा। तुम कभी यह न कह सकोगे कि जाओ विहार करो, उस जगह चले जाओ, इस जगह चले जाओ। मैं सदा तुम्हारे साथ रहूंगा। दूसरा वचन मैं तुमसे यह ले लेता हूं कि कभी भी किसी को मैं मिलाना चाहूंगा, चाहे आधी रात हो, तो तुम्हें मिलना पड़ेगा। और कोई भी प्रश्र्न मैं पूछना चाहूंगा, पुछवाना चाहूंगा, तो आप किसी तरह टाल न सकोगे, उस प्रश्र्न का उत्तर देना ही पड़ेगा। और तीसरी बात, कितनी ही निजी चर्चा किसी से हो रही हो, अगर मैं वहां मौजूद रहना चाहूंगा तो मुझे रोका नहीं जा सकेगा। ऐसे तीन वचन उसने बुद्ध से दीक्षा के पहले ले लिए। और छोटे भाई थे, इसलिए इस खेल को उन्होंने निभा दिया। उन्होंने कहा कि ठीक है। अब वह कोई ज्यादा मांग भी नहीं रहा था, दे दिया।
लेकिन बड़ी कठिनाई आई, बुद्ध को खयाल में न था, जब वे पत्नी से मिलने गए तब आनंद ने कहा कि मैं साथ नहीं छोड़ सकता। बुद्ध ने कहा, तू बड़ा पागल है, तू थोड़ा तो सोच! क्योंकि मैं उसके लिए कोई गौतम बुद्ध नहीं हूं, मैं उसका पति हूं। उसके लिए तो अभी भी पति हूं। और अगर तू मेरे साथ गया तो वह बहुत मानिनी है और बहुत नाराज हो जाएगी कि तुम आए भी बारह साल बाद, तो एक आदमी को साथ लेकर आए हो! यानी मुझे थोड़ा तो मौका दो कि मैं एकांत में बारह साल का सब दुख, पीड़ा, सारा क्रोध निकाल लूं। तो आनंद से कहा कि माना कि मैंने तुझे वचन दिया था, लेकिन तुझसे प्रार्थना करता हूं कि तू इस बार कृपा करके उस वचन का आग्रह मत कर।
अब यह थोड़ा सोचने जैसा है कि बुद्ध का यह कहना अति मानवीय है, अदभुत है। आनंद कहता भी है कि आपके लिए भी क्या कोई पत्नी है? बुद्ध कहते हैं, मेरे लिए नहीं, लेकिन उसके लिए मैं पति हूं, इसको अभी कैसे मिटाऊं? यह मेरे हाथ में नहीं है। ठीक, आनंद दूर खड़ा रह गया और बुद्ध पत्नी के पास गए और उसने चिल्लाना शुरू किया। बारह साल की लंबी बात थी, बहुत पीड़ाएं थीं, अचानक रात में बिना कहे उसको छोड़ कर भाग गए थे, उसका दुख बिलकुल स्वाभाविक है। बुद्ध चुपचाप खड़े हैं। वे उसकी सारी बात सुन लेते हैं। फिर वह आंसू पोंछती है और बुद्ध उससे कहते हैं कि तू ठीक से देख, मैं वही नहीं हूं जो गया था। अब मैं तेरे पति की तरह नहीं आया हूं, तेरा पति मर चुका। मैं कोई और ही हूं। अब तू मुझसे बात कर, अब तू किससे बात कर रही है?
तो कृष्ण और अर्जुन के बीच भेद-स्थिति बहुत और है। अर्जुन मित्र है, गले में हाथ डाल कर घूमे हैं, खेले हैं, गपशप किए हैं। यहां कृष्ण सिर्फ इतना ही कहें कि मैंने जो सत्य जाना है वह मैं तुमसे कहता हूं, तो वह कहेगा कि जानते हैं हम आपको और आपके सत्य को! तो कृष्ण उससे कहते हैं कि और भी पहले इस सत्य को औरों ने भी औरों से कहा है, वही मैं तुझसे कह रहा हूं। मुझे मित्र मान कर तू कहीं इस खयाल में मत पड़ जाना। इसलिए एक पर्टिकुलर सिच्युएशन की बात है, और वह चूक जाए खयाल से तो आप गलती में पड़ेंगे। बुद्ध वैसी स्थिति में नहीं हैं। बुद्ध कह सकते हैं, यह मैं कह रहा हूं। और किसी ने किसी से कहा हो या न कहा हो, इससे मुझे प्रयोजन नहीं है। और तुमसे मैं यह कह देता हूं कि मेरे कहने से तुम मत मान लेना। इसलिए बुद्ध कोई अहंकार की घोषणा कर रहे हों, ऐसा नहीं मालूम होता। क्योंकि अहंकारी यह कहेगा कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। बुद्ध तो निपट निजता की बात कर रहे हैं, वे यह कह रहे हैं कि मैं कहता हूं, इससे तुम मान मत लेना, लेकिन कहता मैं ही हूं।
हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह औरों ने भी कहा है। हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह उपनिषदों ने भी कहा है। हम जानते हैं कि बुद्ध जो कह रहे हैं वह वेदों ने भी कहा है। लेकिन बुद्ध क्यों जोर देते हैं इस बात पर? अगर कोई बुद्ध से कहे भी कि यह वेदों में कहा है, उपनिषद में कहा है, तो बुद्ध कहेंगे कि नहीं, यह मैं ही तुमसे कह रहा हूं। इसके भी कारण हैं, सरकमस्टेंशियल। क्योंकि बुद्ध के समय तक वेद और उपनिषद की परंपरा बिलकुल सड़ गई थी। और वेद-उपनिषद के पक्ष में एक बात भी कहनी उस पूरी परंपरा को सहारा देना था जो बुरी तरह सड़ गई थी। यह जानते हुए भलीभांति कि बुद्ध जो कह रहे हैं सारभूत, वही वेद-उपनिषद में कहा गया है। लेकिन फिर भी वेद-उपनिषद का सहारा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस सहारे पर एक बहुत बड़ा पाखंड का जाल खड़ा हो गया था, जो जनता को लूट रहा है, घसीट रहा है, गलत रास्तों पर भटका रहा है, अंधविश्र्वास में डुबा रहा है। इसलिए वेद और उपनिषद के पक्ष में वे बिलकुल चुप रह जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि बुद्ध को यह बोध नहीं होता है, कि खयाल नहीं होता है। लेकिन कई बार इतिहास में ऐसा वक्त आ जाता है कि कल के सत्यों को आज के सत्यवादी को उखाड़ कर फेंकना पड़ता है। क्योंकि कल के सत्य कल के होने की वजह से असत्यों के साथ इस बुरी तरह घुल-मिल जाते हैं कि अब उनको साथ देना उन असत्यों को भी साथ देना है जिनके साथ उनका जोड़ और गठबंधन हो गया होता है।
कृष्ण के सामने वैसा सवाल नहीं था। कृष्ण के सामने वेद और उपनिषद की परंपरा जरा भी अशुद्ध नहीं हुई थी, वह अपनी ऊंचाई पर थी, शिखर पर थी। सच तो यह है, इसीलिए हम गीता को कह सके कि वह समस्त वेदों और समस्त उपनिषदों का सार है। असल में कृष्ण को हम कह सकते हैं कि उपनिषद ने जो संस्कृति पैदा की थी, उसके वे सारभूत हैं। जो एसेंशियल था उस संस्कृति में, वह सब कृष्ण से प्रकट हो गया है। तो कृष्ण तो उस संस्कृति के शिखर पर पैदा हुए और बुद्ध उस संस्कृति के बिलकुल पतन के गर्त में पैदा हुए। वही संस्कृति थी, लेकिन बुद्ध उसके शिखर की अवस्था में पैदा नहीं हुए हैं, बुद्ध उसके बिलकुल पतन की अवस्था में पैदा हुए हैं, जब वह संस्कृति बिलकुल धूल-धूसरित हो गई थी और सब सड़ गया था। और ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी नहीं रह गया था, ब्राह्मण सिर्फ ब्रह्म के नाम पर शोषक हो गया था। और उस संस्कृति के साथ सब कुछ गंदा जुड़ गया था जो कि धर्म का जिससे कोई नाता नहीं है।
इसलिए कृष्ण तो पीक पर पैदा होते हैं। उपनिषद अपनी कीर्ति के शिखर पर हैं। उपनिषद में जो ज्ञान प्रकट हुआ था, उसकी किरणें चारों ओर व्याप्त हैं। हवा और कण-कण में उनकी खबर है। और कृष्ण के लिए उपनिषद कोई मरी हुई बात नहीं है। कण-कण में, हवा-हवा में, फूल-फूल में, आकाश की बदलियों में, सब तरफ उपनिषद की गूंज है। उस वक्त जब वे कह सकते हैं, वे कहते हैं, तो वे किसी पुराने की गवाही नहीं दे रहे हैं। वह जो मौजूद ही है पूरी तरह, उसकी गवाही दे रहे हैं।
लेकिन बुद्ध के वक्त तक वह सब सड़ गया और नष्ट हो गया और लाश पड़ी रह गई थी। उस लाश की गवाही बुद्ध नहीं दे सकते। इस कारण। न कोई बुद्ध का अहंकार है और न कोई कृष्ण का अहंकार है कि वे पुराने का समर्थन खोजते हैं। न बुद्ध का अहंकार है कि वे अपनी घोषणा करते हैं।
ओशो, कृष्ण ने गीता के अध्याय दस में अपने को घोड़ों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, गौवों में कामधेनु, सर्पों में वासुकि, पशुओं में सिंह, पक्षियों में गरुड़, नदियों में गंगा, ऋतुओं में वसंत आदि बताया है। अर्थात अपने को सर्वश्रेष्ठ बताने का प्रयत्न किया है। तो क्या वे निकृष्ट वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करते? क्या निकृष्ट वर्ग कृष्ण का रूप नहीं था? उन्होंने निकृष्ट और साधारण का जिक्र क्यों नहीं किया?
यह बड़ा मजेदार सूत्र है। इस सूत्र में दो बातें हैं।
पहली बात तो यह है कि कृष्ण इसमें अपने को सभी में श्रेष्ठ घोषित करते हैं--ऋतुओं में वसंत कहते हैं, हाथियों में ऐरावत कहते हैं, गायों में कामधेनु कहते हैं। लेकिन दूसरी मजे की बात यह भी है कि गाय और घोड़े जैसे निम्नतम प्राणियों में भी वे अपनी तुलना खोजते हैं। ये दो बातें एक साथ हैं। ये दो बातें एक साथ हैं! इधर वे हर जाति में अपने को श्रेष्ठ घोषित करते हैं, लेकिन इसकी जरा भी फिकर नहीं करते कि जाति किसकी है। आखिर ऐरावत भी होंगे तो हाथियों में ही होंगे न! और कामधेनु होंगे तो गायों में ही होंगे न! और वसंत होंगे तो ऋतुओं में ही होंगे न! ये दो बातें एक साथ हैं। निम्नतम में भी जो श्रेष्ठतम है, उसकी वे घोषणा करते हैं। कारण हैं। इस श्रेष्ठतम की घोषणा क्यों की जा रही है?
ऊपर से देखने पर लगेगा कि अहंकार की बात है--क्योंकि हमें सिवाय अहंकार के कुछ और लगता ही नहीं। भीतर से देखने पर पता चलेगा कि जब प्रत्येक जाति में, प्रत्येक वर्ग में श्रेष्ठतम की बात कही जा रही है, तो उसका कुल मतलब ही इतना है कि जब वे कहते हैं कि हाथियों में ऐरावत हूं, तो वे यह कहते हैं कि जो हाथी ऐरावत नहीं हो पाए, वे अपने स्वभाव से च्युत रह गए हैं। ऐसे तो हर हाथी ऐरावत होने को पैदा हुआ है। जो ऋतु वसंत नहीं हो पाई, वह ऋतु होने से च्युत हो गई है, उसके स्वभाव से च्युत हो गई है। ऐसे तो हर ऋतु वसंत होने को पैदा हुई है। जो गाय कामधेनु नहीं हो पाई, वह असल में ठीक अर्थों में गाय ही नहीं हो पाई है, वह अपने स्वभाव से च्युत हो गई है। कृष्ण इस घोषणा में सिर्फ इतना ही कहते हैं कि मैं प्रत्येक के स्वभाव की सिद्धि हूं। जो जो हो सकता है चरम शिखर पर, वह मैं हूं। इसका मतलब आप समझे?
इसका मतलब यह हुआ कि जो हाथी ऐरावत नहीं है वह कृष्ण नहीं है, ऐसा नहीं, वह भी कृष्ण है, लेकिन पिछड़ा हुआ कृष्ण है; वह ऐरावत नहीं हो पाया, जो कि हो सकता है, जो कि वह पोटेंशियली है। कृष्ण यह कह रहे हैं कि सबके भीतर जो पोटेंशियलिटी है, वह मैं हूं। इसको अगर पूरे सार में हम रखें, तो इसका मतलब हुआ कि सबके भीतर जो बीजरूप संभावना है, जो अंतिम उत्कर्ष की संभावना है, जो अंतिम विकास का शिखर है, वह मैं हूं। और जो इससे जरा भी पीछे छूट जाता है, वह अपने स्वभाव के शिखर से च्युत हो जाता है। वह अपने को पाने से वंचित रह गया है। इसमें कहीं कोई--कहीं भूल कर भी कोई अहंकार की घोषणा नहीं है। इसका सीधा और साफ मतलब इतना ही है कि तुम जब तक हाथियों में ऐरावत न हो जाओ, तब तक तुम मुझे न पा सकोगे। तुम जब तक ऋतुओं में वसंत न हो जाओ, तब तक तुम मुझे न पा सकोगे। तुम अपने पूरे खिलने में, अपनी पूरी फ्लावरिंग में ही मुझे पाते हो। वे अर्जुन को यही समझा रहे हैं, वे उसको यही कह रहे हैं कि क्षत्रियों में तू पूरा श्रेष्ठ हो जा तो तू कृष्ण हो जाएगा।
अगर कृष्ण कभी हजार, दो हजार साल बाद आते, तो वे जरूर कहते कि क्षत्रियों में मैं अर्जुन हूं। मगर हजार, दो हजार साल बाद। तो वे जरूर कहते कि क्षत्रियों में मैं अर्जुन हूं। जब कृष्ण अपने होने की यह घोषणा कर रहे हैं, तो यह श्रेष्ठता का दावा नहीं है। क्योंकि श्रेष्ठता का दावा करने के लिए घोड़ों और हाथियों में जाना पड़ेगा? गायों-बैलों में जाना पड़ेगा? श्रेष्ठता का दावा तो सीधा ही हो सकता है। पर वे सीधा नहीं कर रहे हैं। असल में वे श्रेष्ठता का दावा ही नहीं कर रहे हैं। वे एक जागतिक विकास की बात कर रहे हैं कि जब तुम अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हो, तब तुम प्रभु हो जाते हो।
शब्द है हमारे पास, ईश्र्वर। ईश्र्वर शब्द बनता है ऐश्र्वर्य से ही। जब तुम अपने पूरे ऐश्र्वर्य में प्रकट होते हो, तो ईश्र्वर हो जाते हो। ईश्र्वर शब्द तो ऐश्र्वर्य का ही रूप है। लेकिन हमने कभी सोचा नहीं। ईश्र्वर का मतलब ही यह है कि गायों में कामधेनु, और हाथियों में ऐरावत, और ऋतुओं में वसंत। जब भी कोई अपने पूरे ऐश्र्वर्य में प्रकट होता है तो वह ईश्र्वर हो जाता है। ईश्र्वर का मतलब ही यह है कि जिसकी पोटेंशियलिटी और एक्चुअलिटी में फर्क नहीं है। जिसकी वास्तविकता में और जिसकी संभावना में कोई फर्क नहीं है। जिसके जीवन में संभावना और वास्तविकता एक ही हो गई है। जो संभावना थी वह पूरी की पूरी वास्तविकता बन गई है, वह ईश्र्वर है। जिसकी संभावना और वास्तविकता में अंतर है, डिस्टेंस है, वह अभी ईश्र्वर की तरफ यात्रा कर रहा है। तो जो मेरे भीतर छिपा है, जिस दिन पूरी तरह प्रकट हो जाएगा, उस दिन मैं अपने ईश्र्वर को उपलब्ध हो जाता हूं। लेकिन अभी, जो मेरे भीतर छिपा है, वह थोड़ा-थोड़ा प्रकट होता है। वह पूरा वसंत नहीं बन पाता है। वह सरकता रहता है, वसंत की तरफ सरकता है, लेकिन वसंत नहीं हो पाता है। फूल पूरा नहीं खिल पाता है। अगर कृष्ण इस बगिया में आएं और वे कहें कि इन फूलों में मैं सबसे ज्यादा खिला हुआ पूरा फूल हूं, तो क्या मतलब होगा? उसका मतलब यह हुआ कि दूसरे फूल भी इतने ही खिल सकते थे, नहीं खिल पाए हैं। और उचित ही है कि कृष्ण अधखिले फूल से अपने को नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो अभी कली में बंद है, उससे नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो अभी शाखाओं में छिपा है, उससे नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो बीज में पड़ा है, उससे नहीं जोड़ते। वे उससे जोड़ते हैं जो पूरा खिला है, क्योंकि जिससे वे बात कर रहे हैं उसको पूरे खिलाने की ही बात कर रहे हैं--कि तू पूरा खिल जा, तू क्षत्रियत्व का पूरा फूल बन जा, तू वसंत हो जा क्षत्रियत्व का। तो तू मुझे पा सकेगा। मुझे पा सकेगा से मतलब, कि तू अपने ईश्र्वर को पा सकता है।
यहां कृष्ण पूरे समय दोहरा काम कर रहे हैं। कृष्ण का पूरा रोल डबल है। इधर वे अर्जुन के साथी हैं, उसके मित्र हैं और इसलिए अर्जुन पर ज्यादा डांट-डपट नहीं कर पाते हैं, उससे मित्रता की भाषा बोलते हैं, लेकिन साथ ही साथ पूरे समय वे पूरे खिले हुए फूल भी हैं। और उनकी इस मित्रता के बीच-बीच में उनकी पूर्णता की घोषणाएं जगह-जगह से फूट पड़ती हैं और अर्जुन तक पहुंच जाती हैं। और ये दोनों जरूरी हैं। अगर वे निपट मित्र रह जाएं तो किसी काम के नहीं रहेंगे, और अगर वे निपट परमात्मा हो जाएं तो अर्जुन कहेगा कि क्षमा करो, अपनी दोस्ती समाप्त! इन दोनों के बीच उनको पूरे वक्त तालमेल बिठालना पड़ रहा है। वे अर्जुन के मित्र भी बने रहते हैं और परमात्मा होने की घोषणा भी बीच-बीच में कर जाते हैं। जब-जब भी उन्हें लगता है कि अर्जुन जरा राजी दिखता है, तब-तब वे परमात्मा होने की घोषणा करते हैं। और जब-जब उन्हें दिखता है कि अर्जुन जरा संदिग्ध है, तब वे फिर कहने लगते हैं--हे महाबाहु! तब वे फिर उससे मित्रता की बातें करने लगते हैं--हे भारत, हे महाबाहु! फिर उससे मित्रता की बातें करने लगते हैं। उनका काम बड़ा डेलिकेट और बड़ा नाजुक है। ऐसा नाजुक मौका बहुत कम आया है।
बुद्ध के पास ऐसा नाजुक मौका नहीं है। क्योंकि जो आया है, वह निश्र्चित है कि कौन है; जो बैठा है, वह निश्र्चित है कि कौन है; बात सीधी-साफ होती है। महावीर को ऐसा मौका नहीं आता, क्योंकि बातें साफ-सुथरी हैं, सीधा डायलॉग है। उसमें कुछ दोहरे रोल का काम नहीं है। कृष्ण के साथ बड़ी कठिनाई है, वहां रोल बड़ा दोहरा है। मित्र के गुरु होना बड़ी कठिन बात है। मित्र को उपदेश देना बड़ी कठिन बात है। मित्र को सलाह देना बड़ी कठिन बात है। क्योंकि वह जो मित्र है, वह कहेगा कि बस बंद करो, ज्यादा ज्ञान मत बघारो! अर्जुन कह सकता है कि ज्यादा ज्ञान मत बघारो! मेरे ही साथ खेले, मेरे साथ बड़े हुए, इतना ज्ञान मत बघारो! अगर ज्यादा ज्ञान दिखाई पड़े तो अर्जुन छूट जाएगा बाहर। तो कृष्ण पूरे वक्त दोनों काम कर रहे हैं, उसे थपथपाते भी जाते हैं कि हे महाबाहो, और फिर उससे कहते भी चले जाते हैं कि तू अज्ञानी है रे! तू पहचान नहीं पा रहा है कि असली बात क्या है! ये दोनों बातें साथ चल रही हैं, इसको खयाल में लेंगे तो सरलता हो सकती है।
पहली बात तो यह है कि कृष्ण इसमें अपने को सभी में श्रेष्ठ घोषित करते हैं--ऋतुओं में वसंत कहते हैं, हाथियों में ऐरावत कहते हैं, गायों में कामधेनु कहते हैं। लेकिन दूसरी मजे की बात यह भी है कि गाय और घोड़े जैसे निम्नतम प्राणियों में भी वे अपनी तुलना खोजते हैं। ये दो बातें एक साथ हैं। ये दो बातें एक साथ हैं! इधर वे हर जाति में अपने को श्रेष्ठ घोषित करते हैं, लेकिन इसकी जरा भी फिकर नहीं करते कि जाति किसकी है। आखिर ऐरावत भी होंगे तो हाथियों में ही होंगे न! और कामधेनु होंगे तो गायों में ही होंगे न! और वसंत होंगे तो ऋतुओं में ही होंगे न! ये दो बातें एक साथ हैं। निम्नतम में भी जो श्रेष्ठतम है, उसकी वे घोषणा करते हैं। कारण हैं। इस श्रेष्ठतम की घोषणा क्यों की जा रही है?
ऊपर से देखने पर लगेगा कि अहंकार की बात है--क्योंकि हमें सिवाय अहंकार के कुछ और लगता ही नहीं। भीतर से देखने पर पता चलेगा कि जब प्रत्येक जाति में, प्रत्येक वर्ग में श्रेष्ठतम की बात कही जा रही है, तो उसका कुल मतलब ही इतना है कि जब वे कहते हैं कि हाथियों में ऐरावत हूं, तो वे यह कहते हैं कि जो हाथी ऐरावत नहीं हो पाए, वे अपने स्वभाव से च्युत रह गए हैं। ऐसे तो हर हाथी ऐरावत होने को पैदा हुआ है। जो ऋतु वसंत नहीं हो पाई, वह ऋतु होने से च्युत हो गई है, उसके स्वभाव से च्युत हो गई है। ऐसे तो हर ऋतु वसंत होने को पैदा हुई है। जो गाय कामधेनु नहीं हो पाई, वह असल में ठीक अर्थों में गाय ही नहीं हो पाई है, वह अपने स्वभाव से च्युत हो गई है। कृष्ण इस घोषणा में सिर्फ इतना ही कहते हैं कि मैं प्रत्येक के स्वभाव की सिद्धि हूं। जो जो हो सकता है चरम शिखर पर, वह मैं हूं। इसका मतलब आप समझे?
इसका मतलब यह हुआ कि जो हाथी ऐरावत नहीं है वह कृष्ण नहीं है, ऐसा नहीं, वह भी कृष्ण है, लेकिन पिछड़ा हुआ कृष्ण है; वह ऐरावत नहीं हो पाया, जो कि हो सकता है, जो कि वह पोटेंशियली है। कृष्ण यह कह रहे हैं कि सबके भीतर जो पोटेंशियलिटी है, वह मैं हूं। इसको अगर पूरे सार में हम रखें, तो इसका मतलब हुआ कि सबके भीतर जो बीजरूप संभावना है, जो अंतिम उत्कर्ष की संभावना है, जो अंतिम विकास का शिखर है, वह मैं हूं। और जो इससे जरा भी पीछे छूट जाता है, वह अपने स्वभाव के शिखर से च्युत हो जाता है। वह अपने को पाने से वंचित रह गया है। इसमें कहीं कोई--कहीं भूल कर भी कोई अहंकार की घोषणा नहीं है। इसका सीधा और साफ मतलब इतना ही है कि तुम जब तक हाथियों में ऐरावत न हो जाओ, तब तक तुम मुझे न पा सकोगे। तुम जब तक ऋतुओं में वसंत न हो जाओ, तब तक तुम मुझे न पा सकोगे। तुम अपने पूरे खिलने में, अपनी पूरी फ्लावरिंग में ही मुझे पाते हो। वे अर्जुन को यही समझा रहे हैं, वे उसको यही कह रहे हैं कि क्षत्रियों में तू पूरा श्रेष्ठ हो जा तो तू कृष्ण हो जाएगा।
अगर कृष्ण कभी हजार, दो हजार साल बाद आते, तो वे जरूर कहते कि क्षत्रियों में मैं अर्जुन हूं। मगर हजार, दो हजार साल बाद। तो वे जरूर कहते कि क्षत्रियों में मैं अर्जुन हूं। जब कृष्ण अपने होने की यह घोषणा कर रहे हैं, तो यह श्रेष्ठता का दावा नहीं है। क्योंकि श्रेष्ठता का दावा करने के लिए घोड़ों और हाथियों में जाना पड़ेगा? गायों-बैलों में जाना पड़ेगा? श्रेष्ठता का दावा तो सीधा ही हो सकता है। पर वे सीधा नहीं कर रहे हैं। असल में वे श्रेष्ठता का दावा ही नहीं कर रहे हैं। वे एक जागतिक विकास की बात कर रहे हैं कि जब तुम अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हो, तब तुम प्रभु हो जाते हो।
शब्द है हमारे पास, ईश्र्वर। ईश्र्वर शब्द बनता है ऐश्र्वर्य से ही। जब तुम अपने पूरे ऐश्र्वर्य में प्रकट होते हो, तो ईश्र्वर हो जाते हो। ईश्र्वर शब्द तो ऐश्र्वर्य का ही रूप है। लेकिन हमने कभी सोचा नहीं। ईश्र्वर का मतलब ही यह है कि गायों में कामधेनु, और हाथियों में ऐरावत, और ऋतुओं में वसंत। जब भी कोई अपने पूरे ऐश्र्वर्य में प्रकट होता है तो वह ईश्र्वर हो जाता है। ईश्र्वर का मतलब ही यह है कि जिसकी पोटेंशियलिटी और एक्चुअलिटी में फर्क नहीं है। जिसकी वास्तविकता में और जिसकी संभावना में कोई फर्क नहीं है। जिसके जीवन में संभावना और वास्तविकता एक ही हो गई है। जो संभावना थी वह पूरी की पूरी वास्तविकता बन गई है, वह ईश्र्वर है। जिसकी संभावना और वास्तविकता में अंतर है, डिस्टेंस है, वह अभी ईश्र्वर की तरफ यात्रा कर रहा है। तो जो मेरे भीतर छिपा है, जिस दिन पूरी तरह प्रकट हो जाएगा, उस दिन मैं अपने ईश्र्वर को उपलब्ध हो जाता हूं। लेकिन अभी, जो मेरे भीतर छिपा है, वह थोड़ा-थोड़ा प्रकट होता है। वह पूरा वसंत नहीं बन पाता है। वह सरकता रहता है, वसंत की तरफ सरकता है, लेकिन वसंत नहीं हो पाता है। फूल पूरा नहीं खिल पाता है। अगर कृष्ण इस बगिया में आएं और वे कहें कि इन फूलों में मैं सबसे ज्यादा खिला हुआ पूरा फूल हूं, तो क्या मतलब होगा? उसका मतलब यह हुआ कि दूसरे फूल भी इतने ही खिल सकते थे, नहीं खिल पाए हैं। और उचित ही है कि कृष्ण अधखिले फूल से अपने को नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो अभी कली में बंद है, उससे नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो अभी शाखाओं में छिपा है, उससे नहीं जोड़ते। उचित ही है कि जो बीज में पड़ा है, उससे नहीं जोड़ते। वे उससे जोड़ते हैं जो पूरा खिला है, क्योंकि जिससे वे बात कर रहे हैं उसको पूरे खिलाने की ही बात कर रहे हैं--कि तू पूरा खिल जा, तू क्षत्रियत्व का पूरा फूल बन जा, तू वसंत हो जा क्षत्रियत्व का। तो तू मुझे पा सकेगा। मुझे पा सकेगा से मतलब, कि तू अपने ईश्र्वर को पा सकता है।
यहां कृष्ण पूरे समय दोहरा काम कर रहे हैं। कृष्ण का पूरा रोल डबल है। इधर वे अर्जुन के साथी हैं, उसके मित्र हैं और इसलिए अर्जुन पर ज्यादा डांट-डपट नहीं कर पाते हैं, उससे मित्रता की भाषा बोलते हैं, लेकिन साथ ही साथ पूरे समय वे पूरे खिले हुए फूल भी हैं। और उनकी इस मित्रता के बीच-बीच में उनकी पूर्णता की घोषणाएं जगह-जगह से फूट पड़ती हैं और अर्जुन तक पहुंच जाती हैं। और ये दोनों जरूरी हैं। अगर वे निपट मित्र रह जाएं तो किसी काम के नहीं रहेंगे, और अगर वे निपट परमात्मा हो जाएं तो अर्जुन कहेगा कि क्षमा करो, अपनी दोस्ती समाप्त! इन दोनों के बीच उनको पूरे वक्त तालमेल बिठालना पड़ रहा है। वे अर्जुन के मित्र भी बने रहते हैं और परमात्मा होने की घोषणा भी बीच-बीच में कर जाते हैं। जब-जब भी उन्हें लगता है कि अर्जुन जरा राजी दिखता है, तब-तब वे परमात्मा होने की घोषणा करते हैं। और जब-जब उन्हें दिखता है कि अर्जुन जरा संदिग्ध है, तब वे फिर कहने लगते हैं--हे महाबाहु! तब वे फिर उससे मित्रता की बातें करने लगते हैं--हे भारत, हे महाबाहु! फिर उससे मित्रता की बातें करने लगते हैं। उनका काम बड़ा डेलिकेट और बड़ा नाजुक है। ऐसा नाजुक मौका बहुत कम आया है।
बुद्ध के पास ऐसा नाजुक मौका नहीं है। क्योंकि जो आया है, वह निश्र्चित है कि कौन है; जो बैठा है, वह निश्र्चित है कि कौन है; बात सीधी-साफ होती है। महावीर को ऐसा मौका नहीं आता, क्योंकि बातें साफ-सुथरी हैं, सीधा डायलॉग है। उसमें कुछ दोहरे रोल का काम नहीं है। कृष्ण के साथ बड़ी कठिनाई है, वहां रोल बड़ा दोहरा है। मित्र के गुरु होना बड़ी कठिन बात है। मित्र को उपदेश देना बड़ी कठिन बात है। मित्र को सलाह देना बड़ी कठिन बात है। क्योंकि वह जो मित्र है, वह कहेगा कि बस बंद करो, ज्यादा ज्ञान मत बघारो! अर्जुन कह सकता है कि ज्यादा ज्ञान मत बघारो! मेरे ही साथ खेले, मेरे साथ बड़े हुए, इतना ज्ञान मत बघारो! अगर ज्यादा ज्ञान दिखाई पड़े तो अर्जुन छूट जाएगा बाहर। तो कृष्ण पूरे वक्त दोनों काम कर रहे हैं, उसे थपथपाते भी जाते हैं कि हे महाबाहो, और फिर उससे कहते भी चले जाते हैं कि तू अज्ञानी है रे! तू पहचान नहीं पा रहा है कि असली बात क्या है! ये दोनों बातें साथ चल रही हैं, इसको खयाल में लेंगे तो सरलता हो सकती है।
ओशो, लगभग सभी महापुरुषों का कुछ तो चरित्र वैयक्तिक होता है, और कुछ होता है समष्टिगत। अभी पिछले दिनों में कृष्ण के जीवन पर चर्चा रही, उसमें बहुत कुछ वैयक्तिक विशेषताएं भी थीं जो कि आज के युग में मुमकिन है कि यदि हम उनका थोड़ा सा भी अनुकरण करने लगें तो पिट जाने की ही संभावना है, और तो कोई दूसरी बात दिखाई नहीं पड़ती। आज हम किसी की दधि और दूध की मटकी को कंकड़ी मार कर फोड़ नहीं सकते हैं। आज हम कहीं स्नान करती हुई किन्हीं बालाओं के वस्त्र उठा कर भाग नहीं सकते हैं। और तो और, किसी राधा के साथ चाहते हुए भी हम प्रेम नहीं कर सकते हैं। कृष्ण में और चीजें भी हैं जो समष्टिगत हैं; कृष्ण ने जो कुछ भी कहा है, उसका अतीत, वर्तमान और भविष्य के लिए महत्व है, ऐसा आपने बताया। इसी संदर्भ में अब हम चाहते हैं कि कृष्ण ने गीता में जो कर्मयोग की बात कही है, भक्तियोग की बात कही है, अनासक्त योग की बात कही है, उनका जो यह जीवन-दर्शन हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है, जो जीवन जीने की कला सिखाता है, जीवन का एक नया मार्ग हमें देता है और हम जीवन के हर क्षण में उसे व्यवहार रूप में उतार भी सकते हैं, उनके इस जीवन-दर्शन पर विशद रूप से कुछ बातें हमारे सम्मुख प्रस्तुत करें, ताकि हम उनका अनुसरण कर सकें।
पहली बात तो यह खयाल लेनी चाहिए कि आज कृष्ण का होना कठिन हो गया है, ऐसा नहीं है। उस दिन भी आसान नहीं था। अन्यथा बहुत कृष्ण हो जाते। और आपको कठिन मालूम होता है कृष्ण होना। उस दिन भी इतना ही कठिन मालूम होता--आपको। कृष्ण आज पैदा हों तो आज भी उतना ही सरल होगा--कृष्ण को। लेकिन यह भ्रांति वहां से शुरू होती है जहां से हम अनुकरण का खयाल लेते हैं, वहां से उपद्रव शुरू होता है। न तो आप उस दिन कृष्ण का अनुकरण कर सकते थे, न आज कर सकते हैं। कर ही नहीं सकते हैं। और करेंगे तो ठीक कहते हैं कि मुसीबत में पड़ेंगे।
जो सारी उनके जीवन पर चर्चा हुई है, वह इसलिए नहीं कि आप अनुकरण करेंगे, बल्कि इसलिए ही कि इस कृष्ण के व्यक्तित्व के अगर पूरे जीवन को हम समझ पाएं, तो शायद अपने-अपने जीवन को समझने के लिए सुविधा हो। अनुकरण के लिए नहीं। अगर इस कृष्ण के व्यक्तित्व का--जो कि बड़ा विराट, बहुआयामी है--पूरा खुलाव हो जाए, तो हम अपने व्यक्तित्व को भी खोलने की कुंजी पा सकते हैं। लेकिन अगर आप अनुकरण की भाषा में सोचेंगे, तो आप कृष्ण को नहीं समझ पाएंगे, समझना मुश्किल हो जाएगा। जिसका भी हम अनुकरण करना चाहते हैं, उसे हम समझना तो चाहते ही नहीं। और अनुकरण हम करना ही इसलिए चाहते हैं कि हम अपने को भी नहीं समझना चाहते। किसी को अपने ऊपर आरोपित करके जी लेंगे तो सुविधा होगी, समझने की झंझट से बच जाएंगे। समझने का काम तो वहीं से शुरू होता है जहां से हम न किसी का अनुकरण करना चाहते हैं, न किसी जैसे होना चाहते हैं, बल्कि इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि मैं क्या हूं, और क्या हो सकता हूं। तो जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में पूरी तरह खुलाव से अपने को प्रकट किया है, उनकी जिंदगी को समझने से अपनी जिंदगी को समझने का रास्ता सुगम हो जाता है। इससे जिंदगियां एक नहीं हो जाएंगी, जिंदगी तो अलग-अलग ही होंगी, अलग-अलग होनी ही चाहिए, कोई होने का उपाय भी नहीं है कि वे एक जैसी हो जाएं।
तो अगर इतनी सारी चर्चाओं में कहीं भूल कर भी आपके मन में अनुकरण का खयाल रहा है, जैसा कि प्रश्र्न से लगता है कि रहा होगा, तो आप कृष्ण को नहीं समझ पाएंगे; और कृष्ण को तो समझ ही नहीं पाएंगे, अपने को भी समझना मुश्किल हो जाता है।
दूसरी बात, कृष्ण के विचार, उनके वे सत्य, जो सदा उपयोग के हो सकते हैं; लेकिन उनमें भी मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि वे भी अनुकरणीय नहीं हैं। क्योंकि जब कृष्ण का जीवंत व्यक्तित्व अनुकरण नहीं किया जा सकता, तो शब्दों में प्रकट सिद्धांत और सत्य कैसे अनुकरण किए जा सकते हैं! नहीं, वह भी नहीं किया जा सकता। वह भी समझा ही जा सकता है। हां, उसके समझने की प्रक्रिया में आपकी समझ बढ़ती है, और वह समझ आपके काम आ सकती है। सिद्धांत काम नहीं आएंगे, समझ ही काम आएगी। लेकिन हम हर हालत में अनुकरण हमारी मांग होती है। या तो हम जीवन का अनुकरण करें, या हम सिद्धांतों का अनुकरण करें, लेकिन अनुकरण हम करेंगे ही।
तो पहली बात आपसे उनके सिद्धांत के संबंध में बात करने के पहले यह कह देनी जरूरी है कि जीवन अनुकरणीय नहीं है। इसलिए नहीं कि आज मटकी नहीं फोड़ी जा सकती, इसलिए भी नहीं कि आज प्रेम नहीं किया जा सकता, इसलिए भी नहीं कि आज बांसुरी नहीं बजाई जा सकती, सब किया जा सकता है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। मटकी फोड़ने से उस दिन भी तकलीफ आती थी, आज भी आएगी। बांसुरी बजाने से उस दिन भी आदमी मुश्किल में पड़ता था, आज भी पड़ेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। थोड़े-बहुत भेद होंगे, कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए नहीं कह रहा हूं कि अनुकरण नहीं किया जा सकता क्योंकि परिस्थिति बदल गई है, अनुकरण ही गलत है--परिस्थिति बिलकुल वही हो तो भी। अनुकरण मात्र आत्मघात है, स्युसाइडल है। अपने को मारना हो, आत्महत्या करनी हो, तो ही अनुकरण ठीक है।
कृष्ण किसका अनुकरण करते हैं? कोई व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़ता कृष्ण ने जिसका अनुकरण किया हो। बुद्ध किसका अनुकरण करते हैं? कोई व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़ता जिसका बुद्ध ने अनुकरण किया हो। क्राइस्ट किसका अनुकरण करते हैं? कोई दिखाई नहीं पड़ता। बड़े मजे की और बड़े रहस्य की बात है कि उन्हीं लोगों का हम अनुकरण करते हैं जिन्होंने कभी किसी का अनुकरण नहीं किया है। यह बड़ी एब्सर्ड बात है। अगर हम उनको समझें तो एक बात तो हमें यह समझ लेनी चाहिए कि ये लोग किसी का अनुकरण नहीं करते हैं। ये सारे के सारे अपनी निजता के फूल हैं। और हम? हम किसी और के फूल के ढंग से खिलना चाहेंगे तो कठिनाई में पड़ जाएंगे। और यह कठिनाई मटकी फोड़ने की कठिनाई, राधा से प्रेम की कठिनाई नहीं है, यह बहुत गहरी कठिनाई है। वे तो बहुत छोटी कठिनाइयां हैं। और उसमें तो आप रोज पड़ते रहते हैं, कोई रुकता नहीं। कोई दूसरों की स्त्रियों से प्रेम करने से रुकता हो, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। कोई अपनी पत्नियों से डर कर दूसरे की पत्नियों का नाम न लेता हो, ऐसा भी दिखाई नहीं पड़ता। पत्नियां डराए चली जाती हैं, पति डरे चले जाते हैं; पति डराए चले जाते हैं, पत्नियां डरी चली जाती हैं; यह कोई आज की बात नहीं, यह सदा की बात है। असल में जब तक पति और पत्नी रहेंगे, तब तक डर रहेगा। पति-पत्नी न हों, इसमें भी बड़ा डर लगता है। आदमी जैसा है, वह चूंकि डरा हुआ है, इसलिए उसकी सारी व्यवस्था में डर व्याप्त हो जाता है।
नहीं, यह सवाल नहीं है कि अनुकरण में यह भय है। अनुकरण में जो बुनियादी भय है वह मैं आपसे कह दूं, फिर कल सुबह से आप प्रश्र्न उठाइए जीवन-सत्यों के संबंध में। क्योंकि जीवन के संबंध में भी मैं चर्चा नहीं कर रहा था, आप प्रश्र्न उठा रहे थे। कल सुबह से आप प्रश्र्न उठाइए उनके दर्शन और सत्यों के संबंध में, उसकी चर्चा कर लूंगा।
जो अनुकरण का बुनियादी भय है, वह यह है कि इस जगत में दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं, न हो सकते हैं। बेजोड़ हैं, अद्वितीय सब हैं। कोई तुलना का उपाय नहीं। बस आप आप ही हैं, और आप जैसा पहले कभी नहीं हुआ और आप जैसा बाद में कभी नहीं होगा। असल में आपका कोई सांचा भगवान के पास नहीं है, जिस सांचे में और लोग ढाले जा सकें। और जब भी आप अपनी इस निजता को अस्वीकार कर देंगे और किसी जैसे होने की कोशिश करेंगे, तो जो भूल भगवान ने नहीं की, वह आप करेंगे। उसने आपको बनाया व्यक्ति और आप कॉपी बनने की कोशिश में लग जाएंगे। उसने आपको दी निजता और आप पराए को ओढ़ने में लग जाएंगे। वह कठिनाई है।
लेकिन अब तक सभी धर्म अनुकरण पर जोर देते रहे हैं। सारी दुनिया में सभी मां-बाप, शिक्षक-गुरु सिखाते रहे हैं--किसी जैसे हो जाओ, बस अपने जैसे भर मत होना! एक भूल भर मत करना, बाकी सब करना! कृष्ण जैसे हो जाना, राम जैसे हो जाना, बुद्ध जैसे हो जाना, बस एक भूल भर मत करना, अपने जैसे मत हो जाना। क्या कारण है? ये सारी दुनिया की शिक्षाएं किसी आदमी को यह नहीं कहतीं कि अपने जैसे हो जाओ। कुछ कारण हैं।
बड़ा कारण तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अगर अपने जैसा हो जाए, तो खतरा है--समाज को, गुरुओं को, मां-बाप को, व्यवस्थापकों को--सबको खतरा है। क्योंकि कौन कैसा हो जाएगा, इसके बाबत पहले से सुनिश्र्चित नहीं हुआ जा सकता। लेकिन राम जैसे हो जाओ, इसमें खतरा नहीं है। राम के बाबत हम सुनिश्र्चित हैं, हमें पता है पक्का कि राम क्या करते हैं, क्या नहीं करते हैं। ऐसा ही तुम भी करो, ताकि तुम खतरनाक न रह जाओ। तुम्हारे बाबत प्रिडिक्शन हो सके, तुम्हारे बाबत घोषणा हो सके कि तुम ऐसा करोगे। और जिस दिन तुम न करो, तो हम तुम्हें अपराधी ठहरा पाएं। अगर प्रत्येक व्यक्ति अपने जैसा हो, तो बहुत मुश्किल हो जाएगा तय करना कि क्या अपराध है और क्या अपराध नहीं है। क्या पाप है, क्या पुण्य है; क्या ठीक है, क्या गलत है; बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए समाज की जड़ व्यवस्था को इसी में सुविधा है कि सब साफ-सुथरी रेखाएं रहें, चाहे जिंदगी कट जाए और लोग मर जाएं, और चाहे उनके व्यक्तित्व समाप्त हो जाएं और उनकी आत्माएं दीन हो जाएं, इसकी कोई चिंता नहीं, लेकिन व्यवस्था!
ऐसा मालूम होता है कि मनुष्य समाज के लिए जी रहा है, समाज मनुष्य के लिए नहीं जी रहा। शिक्षा मनुष्य के लिए नहीं है, मनुष्य इसलिए पैदा हुआ है कि लोग उसको शिक्षा दे सकें। सिद्धांत मनुष्य के काम में आएं इसलिए नहीं हैं, मनुष्य इसलिए पैदा किया गया है कि सिद्धांतों के काम में आ सके। धर्म मनुष्य के लिए नहीं है, मनुष्य धर्म के लिए है। मनुष्य को नीचे रखते हैं, साधन बनाते हैं और मनुष्य के ऊपर सब चीजों को थोप देते हैं। खतरा यह है। अनुकरण का खतरा परिस्थितिगत खतरा नहीं है, आत्मगत खतरा है। अनुकरण का खतरा अपने को धीरे-धीरे मारने और पाय़जनिंग का खतरा है, अपने को धीरे-धीरे जहर देने का खतरा है; और उस जहर पर आपने कृष्ण का लेबल लगा रखा है, कि बुद्ध का, कि महावीर का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दुनिया में कोई टाइप नहीं है जिसमें सबको ढलना है। प्रत्येक को अपने जैसा होना है। इसलिए कृष्ण पर जो मैं बात कर रहा हूं, कोई भूल कर यह न समझ ले कि मैं आपसे कह रहा हूं कि आप कृष्ण जैसे हो जाएं। नहीं, बाहर से जो मुसीबतें आएंगी वे गौण हैं, भीतर से जो मुसीबत आएगी वही असली है। आप बिना मुर्दा हुए कृष्ण जैसे नहीं हो सकते। और मुर्दे अगर पिट जाएं, तो आश्र्चर्य है कुछ! मुर्दे पिटेंगे ही। वह जो डर है पिटाई का, वह मुर्दा होने का डर है। जिंदा आदमी तो जैसा होता है, होता है। और जितना जिंदा आदमी होता है, उतना ही जैसा होता है वैसा ही होता है।
और बड़े मजे की बात है कि जो समाज जिंदा आदमी की निंदा से शुरू करती है यात्रा, वह प्रशंसा पर पूरी करती है। सदा ऐसा हुआ है। जिंदा आदमी को गाली से हम प्रारंभ करते हैं, निंदा से शुरू करते हैं उसकी और आखिर में पूजा पर अंत होता है। यह हमारा ढंग है। यह बात दूसरी है कि वह जिंदा आदमी पूरा जिंदा न हो, बीच से लौट जाए, यह बात दूसरी है। अगर वह जिंदा आदमी पूरा है, तो आपकी गाली पूजा तक पहुंचेगी ही, सदा पहुंचती रही है। उसका अपना लॉजिक है। हां, अगर वह मुर्दा आदमी है तो डर जाएगा, गाली से लौट जाएगा, पूजा तक नहीं पहुंच पाएगा। यह उसका कसूर है। इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। आपने तो ठीक शुरुआत की थी, वह बीच से भाग गया।
कृष्ण को इससे कोई फिकर नहीं पैदा होती। क्या आप सोचते हैं कृष्ण भगवान की तरह स्वीकृत हो गए थे उस दिन? नहीं; कृष्ण पर सब दोषारोपण थे। और आज भी अगर आप अपनी आंख बचा कर ही चलें तो ही दोषारोपण से बच सकते हैं कृष्ण पर, अन्यथा बहुत मुश्किल है मामला! सब दोषारोपण थे। और जीसस को जब सूली दी गई, तो जिन लोगों ने सूली दी थी उन्होंने एक आवारा आदमी को सूली दी थी। और जीसस को जब सूली पर लटकाया था, तो दोनों तरफ दो चोर भी लटकाए थे। अकेले नहीं जीसस को सूली दी थी। तीन क्रॉस खड़े किए थे, बीच में जीसस को लटकाया था, दोनों तरफ दो चोर भी लटकाए थे--इस बात की सूचना के लिए कि जीसस की हैसियत हम चोरों से ज्यादा नहीं समझते हैं। और मजे की बात यह है कि और लोगों ने मजाक किया हो तो किया हो, एक चोर ने भी मरते वक्त आखिरी समय जीसस से मजाक किया था। और उस चोर ने भी कहा था कि अब तो हम साथ ही साथ मर रहे हैं, बड़ा संबंध हो गया, अगर तुम्हारे प्रभु के राज्य में आऊं तो जरा जगह मेरे लिए बना देना! यानी वह भी संदिग्ध है कि कहां का प्रभु का राज्य और कहां का क्या! चोर ज्यादा आश्र्वस्त था। वे लोग जो सूली पर लटका रहे थे, वे ही नहीं निश्र्चित थे कि यह आदमी आवारा और फिजूल है, वे चोर भी यही समझ रहे थे कि तुमसे बेहतर तो हमीं हैं। कुछ करके मर रहे हैं, तुम बिना ही किए मरे जा रहे हो।
कृष्ण या क्राइस्ट को, या महावीर या बुद्ध को उनका समाज एकदम से उन्हें भगवान नहीं कह देता है। गालियों से शुरू करता है। पर वे जिंदा आदमी हैं, वे गालियां पीए चले जाते हैं। फिर कब तक आप गालियां देंगे? और जो आदमी गालियां पीए ही चला जाता है, फिर धीरे-धीरे आप उसका सम्मान करने लगते हैं। फिर वह सम्मान को भी पीता चला जाता है, वह उससे भी प्रभावित नहीं होता, तब फिर आप उसको भगवान बनाने में लग जाते हैं।
कृष्ण की चर्चा मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि आप उनका अनुकरण करने जाएं, इसलिए महत्वपूर्ण है कि ऐसा व्यक्ति, इतना मल्टी-डायमेंशनल व्यक्ति पृथ्वी पर नहीं हुआ। इस बहुआयामी व्यक्तित्व के अगर सारे खजाने आपके सामने खुल जाएं, तो आपको अपने खजाने खोलने का खयाल आ सकता है। बस, इससे ज्यादा नहीं। आपके खजाने आपके होंगे, और कोई नहीं कह सकता कि आपके खजाने कृष्ण से ज्यादा गहरे और ज्यादा समृद्ध नहीं होंगे। यह कोई सवाल नहीं है। लेकिन जो कृष्ण के भीतर घटित हुआ, वह किसी और के भीतर भी घटित हो सकता है, इसका स्मरण ही काफी है। उस स्मरण के लिए ही सारी चर्चा है।
लेकिन आप पूछते हैं कि जीवन-सिद्धांत! हमारा मन होता है कि कोई सिद्धांत मिल जाएं तो उनको आरोपण करना आसान होगा। उनके सिद्धांतों की कल सुबह से हम चर्चा करेंगे, लेकिन वह भी आरोपण के लिए नहीं। वह भी जिंदगी को समझने के लिए। कृष्ण जैसे लोग जब पैदा होते हैं, तो जिंदगी को बड़ी गहराई से देखते हैं, और गलती होगी यह कि हम उनकी आंख में आंख डाल कर थोड़ी देर जिंदगी को न देखें। उनकी आंख में आंख डाल कर जिंदगी को देख लेने से हमारी भी देखने की क्षमता, हमारा पर्सपेक्टिव बदलता है।
यह मनाली आप आए हैं। ये चारों तरफ पहाड़ हैं। लेकिन आपके पास जितनी आंख है और जितना पर्सपेक्टिव है, उतना सौंदर्य ही तो इन पहाड़ों में दिखाई पड़ेगा। यहीं निकोलस रोरिक भी था, उसके चित्र आप देख आएंगे तो ये पहाड़ कुछ और कहते हुए मालूम पड़ने लगेंगे, तत्काल, क्योंकि उसकी आंख में से आपने आंख डाल कर देखना शुरू कर दिया। और वह निकोलस रोरिक ठेठ रूस से यात्रा करके इन पहाड़ों में आ गया था। और आज तो रास्ता है, तब तो रास्ता भी नहीं था। और तब फिर वह जिंदगी भर यहीं रह गया। इस हिमालय ने उसे बिलकुल ही पागल कर दिया था। जहां तक मेरा खयाल है, आपको काफी दिन हो गए हिमालय में आए और अब शायद ही आपको पहाड़ियां दिखाई पड़ती होंगी। पहले दिन दिखाई पड़ी होंगी--थोड़ी बहुत देर--अब नहीं दिखाई पड़ती होंगी। अब बात खत्म हो गई। पहाड़ हैं, ठीक है, बात खतम हो गई। लेकिन निकोलस जिंदगी भर लगा रहा यहां। और एक ही पहाड़ों को पोतता रहा, रंगता रहा, जिंदगी भर। और पहाड़ नहीं चुके, और निकोलस का मन नहीं चुका।
तो निकोलस से अगर आप देख पाएंगे एक दफा, तो ये पहाड़ आपको कुछ और कहते दिखाई पड़ने लगेंगे। एक आदमी ने जिंदगी भर इन्हीं को देखने में लगाया। और हजार रंगों में इन पहाड़ों को देखा, सैकड़ों ढंगों से इन पहाड़ों को देखा--कभी चांद में, कभी अंधेरे में, कभी सूरज में, कभी वर्षा में, कभी बर्फ में, कभी धूप में। और उस आदमी ने अपने भी हजार रंगों में इन पहाड़ों को देखा। और जिंदगी भर बस इन पहाड़ों को ही रंगता रहा। आखिरी वक्त, मरते वक्त भी इन पहाड़ों को ही रंग रहा था। तो इस आदमी से अगर आप थोड़ा परिचित हो लेंगे, तो इन पहाड़ों के बीच में खड़े होकर आपको इन पहाड़ों में कुछ और दिखाई पड़ने की संभावना शुरू होती है। मैं नहीं कहता कि निकोलस ने जैसा देखा वैसा आप देखना--आप देख भी नहीं सकते, उपाय भी नहीं है--लेकिन निकोलस को जानने के बाद ये पहाड़ सिर्फ साधारण पहाड़ नहीं रह जाएंगे, जो एक दफे देख कर चुक जाते हैं।
प्रेम तो बहुत लोगों ने किया है, लेकिन कभी फरिहाद और मजनू को पढ़ लेना उपयोगी है। हमारा प्रेम जल्दी चुक जाता है। पता ही नहीं चलता कब चुक गया। ठीक से याद भी नहीं कर सकते कि कभी था। सब रूखा-सूखा रह जाता है भीतर। नदी आने के पहले ही विदा हो जाती है और मरुस्थल हो जाता है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहे हैं जो कि जिंदगी भर प्रेम किए ही चले गए हैं। और इनके प्रेम का कोई हिसाब लगाना मुश्किल है। अगर इन प्रेम करने वालों से आप थोड़े परिचित हुए तो अपने प्रेम को समझने में बड़ी सुविधा हो जाएगी और हो सकता है कि आपके भीतर भी कोई धारा अंतर्गर्भ में बहती हो और उसका स्मरण आ जाए। ऐसा नहीं कि आप मजनू हो जाएंगे। उसका कोई उपाय नहीं है। होना भी नहीं है। और हुआ हुआ मजनू क्या मजनू हो सकता है? बाल वगैरह लटका लेगा मजनू की तरह, कपड़े-लत्ते पहन लेगा मजनू की तरह, सड़क से गुजरने लगेगा, चिल्लाने लगेगा--लैला! लैला! लेकिन सब बेकार होगा। उसमें कोई मतलब नहीं होगा। उसके भीतर से तो कहीं कुछ आएगा नहीं।
लेकिन आपका भी अपना प्रेम है, जो मजनू और फरिहाद के प्रेम से शायद सजग हो जाए, सुलग जाए। शायद बारूद आग पकड़ जाए और आपको भी पता चले कि मैं भी ऐसे ही चुक जाने वाला नहीं हूं, मेरे भीतर भी कोई धारा है। उसी अर्थ में कह रहा हूं। बहुत लोगों ने गीत लिखे हैं, लेकिन कालिदास या रवींद्रनाथ का गीत पढ़ कर आपको पहली दफा कुछ दिखाई पड़ना शुरू होता है, जो आपको शायद कभी दिखाई नहीं पड़ा था। वह आपकी भी संभावना थी। लेकिन प्रसुप्त थी।
तो कृष्ण के सिद्धांतों की कल सुबह से हम बात करेंगे, इस आशा में नहीं कि आप उनको मान कर और सिद्धांतवादी हो जाएं। कृष्ण जैसा गैर-सिद्धांतवादी आदमी नहीं है; इसलिए इस उपद्रव में पड़ना ही नहीं। कृष्ण को समझने का कुल मतलब इतना है कि जब ऐसा महिमा का पूरा खिला हुआ आदमी जगत को देखता है, तो वह क्या कह जाता है, उसकी वर्डिक्ट क्या है, वह क्या कह जाता है इस जगत के बाबत? इस आदमी के चित्त की गहराइयों के बाबत वह क्या खबर दे जाता है? इस आदमी के खिलने के संबंध में वह क्या सूचनाएं दे जाता है? वे सूचनाएं शायद आपके अंतर्गर्भ में पड़ी हुई किन्हीं धाराओं को छू दें; तो ऐसा नहीं है कि फिर आप कृष्णवादी हो जाएंगे, बस ऐसा ही है कि आप अपने होने की यात्रा पर निकल जाएंगे। तभी आप समझ पाएंगे कि यह आदमी, जो स्वधर्म में मर जाने को कहता है, यह आदमी आपके ऊपर सिद्धांत थोपने वाला आदमी नहीं हो सकता है।
तो कल से आप पूछें। जो आप पूछ लेंगे, उसकी मैं बात कर लूंगा। मुझे इसमें सुविधा पड़ती है कि आप पूछ लेते हैं। क्योंकि इसमें मुझे सोच-विचार की झंझट नहीं रह जाती। नहीं तो मुझे सबसे बड़ी दिक्कत यही हो जाती है कि क्या कहूं? ऐसे जब तक आपसे बोलता हूं, तभी तक शब्द और विचार मेरे साथ होते हैं। जब नहीं बोल रहा हूं तब मैं खाली हो जाता हूं। तो मुझे बड़ी कठिनाई होती है, कि कहूं क्या? आप कुछ पूछ लेते हैं, खूंटी बन जाते हैं, मुझे टांगने की सुविधा हो जाती है।
तो मुझे बहुत ही कठिन मामला है वह कुछ बोलना। उसके लिए बड़ी मुश्किल से मुझे श्रम उठाना पड़ता है--क्या बोलना है! तो अपनी तरफ से मेरा बोलना तो बहुत मुश्किल होता जा रहा है। इधर मित्रों ने, बहुत मित्रों ने कहा है कि आप कुछ स्वतंत्र रूप से बोल दें। वह मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है। और ज्यादा दिन अब मैं स्वतंत्र रूप से नहीं बोल सकूंगा, उसमें बहुत कठिनाई पड़ती है। क्योंकि मुझे समझ ही नहीं पड़ता है, समझ ही खो गई है। आप पूछ लेते हैं, तो कोई उपाय नहीं रह जाता, मुझे रिस्पांड करना पड़ता है। आप नहीं पूछते हैं, तो मेरे पास कोई उपाय नहीं कि क्या बोलना है! बोलने को क्या है! अपनी तरफ से मैं अब चुप हूं, आपकी तरफ से ही बोल रहा हूं। इसलिए कल सवाल उठा लेंगे। जो सवाल आप उठा लेंगे, उनकी हम बात कर लेंगे।
अब हम ध्यान के लिए बैठेंगे।
जो सारी उनके जीवन पर चर्चा हुई है, वह इसलिए नहीं कि आप अनुकरण करेंगे, बल्कि इसलिए ही कि इस कृष्ण के व्यक्तित्व के अगर पूरे जीवन को हम समझ पाएं, तो शायद अपने-अपने जीवन को समझने के लिए सुविधा हो। अनुकरण के लिए नहीं। अगर इस कृष्ण के व्यक्तित्व का--जो कि बड़ा विराट, बहुआयामी है--पूरा खुलाव हो जाए, तो हम अपने व्यक्तित्व को भी खोलने की कुंजी पा सकते हैं। लेकिन अगर आप अनुकरण की भाषा में सोचेंगे, तो आप कृष्ण को नहीं समझ पाएंगे, समझना मुश्किल हो जाएगा। जिसका भी हम अनुकरण करना चाहते हैं, उसे हम समझना तो चाहते ही नहीं। और अनुकरण हम करना ही इसलिए चाहते हैं कि हम अपने को भी नहीं समझना चाहते। किसी को अपने ऊपर आरोपित करके जी लेंगे तो सुविधा होगी, समझने की झंझट से बच जाएंगे। समझने का काम तो वहीं से शुरू होता है जहां से हम न किसी का अनुकरण करना चाहते हैं, न किसी जैसे होना चाहते हैं, बल्कि इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि मैं क्या हूं, और क्या हो सकता हूं। तो जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में पूरी तरह खुलाव से अपने को प्रकट किया है, उनकी जिंदगी को समझने से अपनी जिंदगी को समझने का रास्ता सुगम हो जाता है। इससे जिंदगियां एक नहीं हो जाएंगी, जिंदगी तो अलग-अलग ही होंगी, अलग-अलग होनी ही चाहिए, कोई होने का उपाय भी नहीं है कि वे एक जैसी हो जाएं।
तो अगर इतनी सारी चर्चाओं में कहीं भूल कर भी आपके मन में अनुकरण का खयाल रहा है, जैसा कि प्रश्र्न से लगता है कि रहा होगा, तो आप कृष्ण को नहीं समझ पाएंगे; और कृष्ण को तो समझ ही नहीं पाएंगे, अपने को भी समझना मुश्किल हो जाता है।
दूसरी बात, कृष्ण के विचार, उनके वे सत्य, जो सदा उपयोग के हो सकते हैं; लेकिन उनमें भी मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि वे भी अनुकरणीय नहीं हैं। क्योंकि जब कृष्ण का जीवंत व्यक्तित्व अनुकरण नहीं किया जा सकता, तो शब्दों में प्रकट सिद्धांत और सत्य कैसे अनुकरण किए जा सकते हैं! नहीं, वह भी नहीं किया जा सकता। वह भी समझा ही जा सकता है। हां, उसके समझने की प्रक्रिया में आपकी समझ बढ़ती है, और वह समझ आपके काम आ सकती है। सिद्धांत काम नहीं आएंगे, समझ ही काम आएगी। लेकिन हम हर हालत में अनुकरण हमारी मांग होती है। या तो हम जीवन का अनुकरण करें, या हम सिद्धांतों का अनुकरण करें, लेकिन अनुकरण हम करेंगे ही।
तो पहली बात आपसे उनके सिद्धांत के संबंध में बात करने के पहले यह कह देनी जरूरी है कि जीवन अनुकरणीय नहीं है। इसलिए नहीं कि आज मटकी नहीं फोड़ी जा सकती, इसलिए भी नहीं कि आज प्रेम नहीं किया जा सकता, इसलिए भी नहीं कि आज बांसुरी नहीं बजाई जा सकती, सब किया जा सकता है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। मटकी फोड़ने से उस दिन भी तकलीफ आती थी, आज भी आएगी। बांसुरी बजाने से उस दिन भी आदमी मुश्किल में पड़ता था, आज भी पड़ेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। थोड़े-बहुत भेद होंगे, कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए नहीं कह रहा हूं कि अनुकरण नहीं किया जा सकता क्योंकि परिस्थिति बदल गई है, अनुकरण ही गलत है--परिस्थिति बिलकुल वही हो तो भी। अनुकरण मात्र आत्मघात है, स्युसाइडल है। अपने को मारना हो, आत्महत्या करनी हो, तो ही अनुकरण ठीक है।
कृष्ण किसका अनुकरण करते हैं? कोई व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़ता कृष्ण ने जिसका अनुकरण किया हो। बुद्ध किसका अनुकरण करते हैं? कोई व्यक्तित्व दिखाई नहीं पड़ता जिसका बुद्ध ने अनुकरण किया हो। क्राइस्ट किसका अनुकरण करते हैं? कोई दिखाई नहीं पड़ता। बड़े मजे की और बड़े रहस्य की बात है कि उन्हीं लोगों का हम अनुकरण करते हैं जिन्होंने कभी किसी का अनुकरण नहीं किया है। यह बड़ी एब्सर्ड बात है। अगर हम उनको समझें तो एक बात तो हमें यह समझ लेनी चाहिए कि ये लोग किसी का अनुकरण नहीं करते हैं। ये सारे के सारे अपनी निजता के फूल हैं। और हम? हम किसी और के फूल के ढंग से खिलना चाहेंगे तो कठिनाई में पड़ जाएंगे। और यह कठिनाई मटकी फोड़ने की कठिनाई, राधा से प्रेम की कठिनाई नहीं है, यह बहुत गहरी कठिनाई है। वे तो बहुत छोटी कठिनाइयां हैं। और उसमें तो आप रोज पड़ते रहते हैं, कोई रुकता नहीं। कोई दूसरों की स्त्रियों से प्रेम करने से रुकता हो, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। कोई अपनी पत्नियों से डर कर दूसरे की पत्नियों का नाम न लेता हो, ऐसा भी दिखाई नहीं पड़ता। पत्नियां डराए चली जाती हैं, पति डरे चले जाते हैं; पति डराए चले जाते हैं, पत्नियां डरी चली जाती हैं; यह कोई आज की बात नहीं, यह सदा की बात है। असल में जब तक पति और पत्नी रहेंगे, तब तक डर रहेगा। पति-पत्नी न हों, इसमें भी बड़ा डर लगता है। आदमी जैसा है, वह चूंकि डरा हुआ है, इसलिए उसकी सारी व्यवस्था में डर व्याप्त हो जाता है।
नहीं, यह सवाल नहीं है कि अनुकरण में यह भय है। अनुकरण में जो बुनियादी भय है वह मैं आपसे कह दूं, फिर कल सुबह से आप प्रश्र्न उठाइए जीवन-सत्यों के संबंध में। क्योंकि जीवन के संबंध में भी मैं चर्चा नहीं कर रहा था, आप प्रश्र्न उठा रहे थे। कल सुबह से आप प्रश्र्न उठाइए उनके दर्शन और सत्यों के संबंध में, उसकी चर्चा कर लूंगा।
जो अनुकरण का बुनियादी भय है, वह यह है कि इस जगत में दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं, न हो सकते हैं। बेजोड़ हैं, अद्वितीय सब हैं। कोई तुलना का उपाय नहीं। बस आप आप ही हैं, और आप जैसा पहले कभी नहीं हुआ और आप जैसा बाद में कभी नहीं होगा। असल में आपका कोई सांचा भगवान के पास नहीं है, जिस सांचे में और लोग ढाले जा सकें। और जब भी आप अपनी इस निजता को अस्वीकार कर देंगे और किसी जैसे होने की कोशिश करेंगे, तो जो भूल भगवान ने नहीं की, वह आप करेंगे। उसने आपको बनाया व्यक्ति और आप कॉपी बनने की कोशिश में लग जाएंगे। उसने आपको दी निजता और आप पराए को ओढ़ने में लग जाएंगे। वह कठिनाई है।
लेकिन अब तक सभी धर्म अनुकरण पर जोर देते रहे हैं। सारी दुनिया में सभी मां-बाप, शिक्षक-गुरु सिखाते रहे हैं--किसी जैसे हो जाओ, बस अपने जैसे भर मत होना! एक भूल भर मत करना, बाकी सब करना! कृष्ण जैसे हो जाना, राम जैसे हो जाना, बुद्ध जैसे हो जाना, बस एक भूल भर मत करना, अपने जैसे मत हो जाना। क्या कारण है? ये सारी दुनिया की शिक्षाएं किसी आदमी को यह नहीं कहतीं कि अपने जैसे हो जाओ। कुछ कारण हैं।
बड़ा कारण तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अगर अपने जैसा हो जाए, तो खतरा है--समाज को, गुरुओं को, मां-बाप को, व्यवस्थापकों को--सबको खतरा है। क्योंकि कौन कैसा हो जाएगा, इसके बाबत पहले से सुनिश्र्चित नहीं हुआ जा सकता। लेकिन राम जैसे हो जाओ, इसमें खतरा नहीं है। राम के बाबत हम सुनिश्र्चित हैं, हमें पता है पक्का कि राम क्या करते हैं, क्या नहीं करते हैं। ऐसा ही तुम भी करो, ताकि तुम खतरनाक न रह जाओ। तुम्हारे बाबत प्रिडिक्शन हो सके, तुम्हारे बाबत घोषणा हो सके कि तुम ऐसा करोगे। और जिस दिन तुम न करो, तो हम तुम्हें अपराधी ठहरा पाएं। अगर प्रत्येक व्यक्ति अपने जैसा हो, तो बहुत मुश्किल हो जाएगा तय करना कि क्या अपराध है और क्या अपराध नहीं है। क्या पाप है, क्या पुण्य है; क्या ठीक है, क्या गलत है; बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए समाज की जड़ व्यवस्था को इसी में सुविधा है कि सब साफ-सुथरी रेखाएं रहें, चाहे जिंदगी कट जाए और लोग मर जाएं, और चाहे उनके व्यक्तित्व समाप्त हो जाएं और उनकी आत्माएं दीन हो जाएं, इसकी कोई चिंता नहीं, लेकिन व्यवस्था!
ऐसा मालूम होता है कि मनुष्य समाज के लिए जी रहा है, समाज मनुष्य के लिए नहीं जी रहा। शिक्षा मनुष्य के लिए नहीं है, मनुष्य इसलिए पैदा हुआ है कि लोग उसको शिक्षा दे सकें। सिद्धांत मनुष्य के काम में आएं इसलिए नहीं हैं, मनुष्य इसलिए पैदा किया गया है कि सिद्धांतों के काम में आ सके। धर्म मनुष्य के लिए नहीं है, मनुष्य धर्म के लिए है। मनुष्य को नीचे रखते हैं, साधन बनाते हैं और मनुष्य के ऊपर सब चीजों को थोप देते हैं। खतरा यह है। अनुकरण का खतरा परिस्थितिगत खतरा नहीं है, आत्मगत खतरा है। अनुकरण का खतरा अपने को धीरे-धीरे मारने और पाय़जनिंग का खतरा है, अपने को धीरे-धीरे जहर देने का खतरा है; और उस जहर पर आपने कृष्ण का लेबल लगा रखा है, कि बुद्ध का, कि महावीर का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दुनिया में कोई टाइप नहीं है जिसमें सबको ढलना है। प्रत्येक को अपने जैसा होना है। इसलिए कृष्ण पर जो मैं बात कर रहा हूं, कोई भूल कर यह न समझ ले कि मैं आपसे कह रहा हूं कि आप कृष्ण जैसे हो जाएं। नहीं, बाहर से जो मुसीबतें आएंगी वे गौण हैं, भीतर से जो मुसीबत आएगी वही असली है। आप बिना मुर्दा हुए कृष्ण जैसे नहीं हो सकते। और मुर्दे अगर पिट जाएं, तो आश्र्चर्य है कुछ! मुर्दे पिटेंगे ही। वह जो डर है पिटाई का, वह मुर्दा होने का डर है। जिंदा आदमी तो जैसा होता है, होता है। और जितना जिंदा आदमी होता है, उतना ही जैसा होता है वैसा ही होता है।
और बड़े मजे की बात है कि जो समाज जिंदा आदमी की निंदा से शुरू करती है यात्रा, वह प्रशंसा पर पूरी करती है। सदा ऐसा हुआ है। जिंदा आदमी को गाली से हम प्रारंभ करते हैं, निंदा से शुरू करते हैं उसकी और आखिर में पूजा पर अंत होता है। यह हमारा ढंग है। यह बात दूसरी है कि वह जिंदा आदमी पूरा जिंदा न हो, बीच से लौट जाए, यह बात दूसरी है। अगर वह जिंदा आदमी पूरा है, तो आपकी गाली पूजा तक पहुंचेगी ही, सदा पहुंचती रही है। उसका अपना लॉजिक है। हां, अगर वह मुर्दा आदमी है तो डर जाएगा, गाली से लौट जाएगा, पूजा तक नहीं पहुंच पाएगा। यह उसका कसूर है। इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। आपने तो ठीक शुरुआत की थी, वह बीच से भाग गया।
कृष्ण को इससे कोई फिकर नहीं पैदा होती। क्या आप सोचते हैं कृष्ण भगवान की तरह स्वीकृत हो गए थे उस दिन? नहीं; कृष्ण पर सब दोषारोपण थे। और आज भी अगर आप अपनी आंख बचा कर ही चलें तो ही दोषारोपण से बच सकते हैं कृष्ण पर, अन्यथा बहुत मुश्किल है मामला! सब दोषारोपण थे। और जीसस को जब सूली दी गई, तो जिन लोगों ने सूली दी थी उन्होंने एक आवारा आदमी को सूली दी थी। और जीसस को जब सूली पर लटकाया था, तो दोनों तरफ दो चोर भी लटकाए थे। अकेले नहीं जीसस को सूली दी थी। तीन क्रॉस खड़े किए थे, बीच में जीसस को लटकाया था, दोनों तरफ दो चोर भी लटकाए थे--इस बात की सूचना के लिए कि जीसस की हैसियत हम चोरों से ज्यादा नहीं समझते हैं। और मजे की बात यह है कि और लोगों ने मजाक किया हो तो किया हो, एक चोर ने भी मरते वक्त आखिरी समय जीसस से मजाक किया था। और उस चोर ने भी कहा था कि अब तो हम साथ ही साथ मर रहे हैं, बड़ा संबंध हो गया, अगर तुम्हारे प्रभु के राज्य में आऊं तो जरा जगह मेरे लिए बना देना! यानी वह भी संदिग्ध है कि कहां का प्रभु का राज्य और कहां का क्या! चोर ज्यादा आश्र्वस्त था। वे लोग जो सूली पर लटका रहे थे, वे ही नहीं निश्र्चित थे कि यह आदमी आवारा और फिजूल है, वे चोर भी यही समझ रहे थे कि तुमसे बेहतर तो हमीं हैं। कुछ करके मर रहे हैं, तुम बिना ही किए मरे जा रहे हो।
कृष्ण या क्राइस्ट को, या महावीर या बुद्ध को उनका समाज एकदम से उन्हें भगवान नहीं कह देता है। गालियों से शुरू करता है। पर वे जिंदा आदमी हैं, वे गालियां पीए चले जाते हैं। फिर कब तक आप गालियां देंगे? और जो आदमी गालियां पीए ही चला जाता है, फिर धीरे-धीरे आप उसका सम्मान करने लगते हैं। फिर वह सम्मान को भी पीता चला जाता है, वह उससे भी प्रभावित नहीं होता, तब फिर आप उसको भगवान बनाने में लग जाते हैं।
कृष्ण की चर्चा मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि आप उनका अनुकरण करने जाएं, इसलिए महत्वपूर्ण है कि ऐसा व्यक्ति, इतना मल्टी-डायमेंशनल व्यक्ति पृथ्वी पर नहीं हुआ। इस बहुआयामी व्यक्तित्व के अगर सारे खजाने आपके सामने खुल जाएं, तो आपको अपने खजाने खोलने का खयाल आ सकता है। बस, इससे ज्यादा नहीं। आपके खजाने आपके होंगे, और कोई नहीं कह सकता कि आपके खजाने कृष्ण से ज्यादा गहरे और ज्यादा समृद्ध नहीं होंगे। यह कोई सवाल नहीं है। लेकिन जो कृष्ण के भीतर घटित हुआ, वह किसी और के भीतर भी घटित हो सकता है, इसका स्मरण ही काफी है। उस स्मरण के लिए ही सारी चर्चा है।
लेकिन आप पूछते हैं कि जीवन-सिद्धांत! हमारा मन होता है कि कोई सिद्धांत मिल जाएं तो उनको आरोपण करना आसान होगा। उनके सिद्धांतों की कल सुबह से हम चर्चा करेंगे, लेकिन वह भी आरोपण के लिए नहीं। वह भी जिंदगी को समझने के लिए। कृष्ण जैसे लोग जब पैदा होते हैं, तो जिंदगी को बड़ी गहराई से देखते हैं, और गलती होगी यह कि हम उनकी आंख में आंख डाल कर थोड़ी देर जिंदगी को न देखें। उनकी आंख में आंख डाल कर जिंदगी को देख लेने से हमारी भी देखने की क्षमता, हमारा पर्सपेक्टिव बदलता है।
यह मनाली आप आए हैं। ये चारों तरफ पहाड़ हैं। लेकिन आपके पास जितनी आंख है और जितना पर्सपेक्टिव है, उतना सौंदर्य ही तो इन पहाड़ों में दिखाई पड़ेगा। यहीं निकोलस रोरिक भी था, उसके चित्र आप देख आएंगे तो ये पहाड़ कुछ और कहते हुए मालूम पड़ने लगेंगे, तत्काल, क्योंकि उसकी आंख में से आपने आंख डाल कर देखना शुरू कर दिया। और वह निकोलस रोरिक ठेठ रूस से यात्रा करके इन पहाड़ों में आ गया था। और आज तो रास्ता है, तब तो रास्ता भी नहीं था। और तब फिर वह जिंदगी भर यहीं रह गया। इस हिमालय ने उसे बिलकुल ही पागल कर दिया था। जहां तक मेरा खयाल है, आपको काफी दिन हो गए हिमालय में आए और अब शायद ही आपको पहाड़ियां दिखाई पड़ती होंगी। पहले दिन दिखाई पड़ी होंगी--थोड़ी बहुत देर--अब नहीं दिखाई पड़ती होंगी। अब बात खत्म हो गई। पहाड़ हैं, ठीक है, बात खतम हो गई। लेकिन निकोलस जिंदगी भर लगा रहा यहां। और एक ही पहाड़ों को पोतता रहा, रंगता रहा, जिंदगी भर। और पहाड़ नहीं चुके, और निकोलस का मन नहीं चुका।
तो निकोलस से अगर आप देख पाएंगे एक दफा, तो ये पहाड़ आपको कुछ और कहते दिखाई पड़ने लगेंगे। एक आदमी ने जिंदगी भर इन्हीं को देखने में लगाया। और हजार रंगों में इन पहाड़ों को देखा, सैकड़ों ढंगों से इन पहाड़ों को देखा--कभी चांद में, कभी अंधेरे में, कभी सूरज में, कभी वर्षा में, कभी बर्फ में, कभी धूप में। और उस आदमी ने अपने भी हजार रंगों में इन पहाड़ों को देखा। और जिंदगी भर बस इन पहाड़ों को ही रंगता रहा। आखिरी वक्त, मरते वक्त भी इन पहाड़ों को ही रंग रहा था। तो इस आदमी से अगर आप थोड़ा परिचित हो लेंगे, तो इन पहाड़ों के बीच में खड़े होकर आपको इन पहाड़ों में कुछ और दिखाई पड़ने की संभावना शुरू होती है। मैं नहीं कहता कि निकोलस ने जैसा देखा वैसा आप देखना--आप देख भी नहीं सकते, उपाय भी नहीं है--लेकिन निकोलस को जानने के बाद ये पहाड़ सिर्फ साधारण पहाड़ नहीं रह जाएंगे, जो एक दफे देख कर चुक जाते हैं।
प्रेम तो बहुत लोगों ने किया है, लेकिन कभी फरिहाद और मजनू को पढ़ लेना उपयोगी है। हमारा प्रेम जल्दी चुक जाता है। पता ही नहीं चलता कब चुक गया। ठीक से याद भी नहीं कर सकते कि कभी था। सब रूखा-सूखा रह जाता है भीतर। नदी आने के पहले ही विदा हो जाती है और मरुस्थल हो जाता है। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहे हैं जो कि जिंदगी भर प्रेम किए ही चले गए हैं। और इनके प्रेम का कोई हिसाब लगाना मुश्किल है। अगर इन प्रेम करने वालों से आप थोड़े परिचित हुए तो अपने प्रेम को समझने में बड़ी सुविधा हो जाएगी और हो सकता है कि आपके भीतर भी कोई धारा अंतर्गर्भ में बहती हो और उसका स्मरण आ जाए। ऐसा नहीं कि आप मजनू हो जाएंगे। उसका कोई उपाय नहीं है। होना भी नहीं है। और हुआ हुआ मजनू क्या मजनू हो सकता है? बाल वगैरह लटका लेगा मजनू की तरह, कपड़े-लत्ते पहन लेगा मजनू की तरह, सड़क से गुजरने लगेगा, चिल्लाने लगेगा--लैला! लैला! लेकिन सब बेकार होगा। उसमें कोई मतलब नहीं होगा। उसके भीतर से तो कहीं कुछ आएगा नहीं।
लेकिन आपका भी अपना प्रेम है, जो मजनू और फरिहाद के प्रेम से शायद सजग हो जाए, सुलग जाए। शायद बारूद आग पकड़ जाए और आपको भी पता चले कि मैं भी ऐसे ही चुक जाने वाला नहीं हूं, मेरे भीतर भी कोई धारा है। उसी अर्थ में कह रहा हूं। बहुत लोगों ने गीत लिखे हैं, लेकिन कालिदास या रवींद्रनाथ का गीत पढ़ कर आपको पहली दफा कुछ दिखाई पड़ना शुरू होता है, जो आपको शायद कभी दिखाई नहीं पड़ा था। वह आपकी भी संभावना थी। लेकिन प्रसुप्त थी।
तो कृष्ण के सिद्धांतों की कल सुबह से हम बात करेंगे, इस आशा में नहीं कि आप उनको मान कर और सिद्धांतवादी हो जाएं। कृष्ण जैसा गैर-सिद्धांतवादी आदमी नहीं है; इसलिए इस उपद्रव में पड़ना ही नहीं। कृष्ण को समझने का कुल मतलब इतना है कि जब ऐसा महिमा का पूरा खिला हुआ आदमी जगत को देखता है, तो वह क्या कह जाता है, उसकी वर्डिक्ट क्या है, वह क्या कह जाता है इस जगत के बाबत? इस आदमी के चित्त की गहराइयों के बाबत वह क्या खबर दे जाता है? इस आदमी के खिलने के संबंध में वह क्या सूचनाएं दे जाता है? वे सूचनाएं शायद आपके अंतर्गर्भ में पड़ी हुई किन्हीं धाराओं को छू दें; तो ऐसा नहीं है कि फिर आप कृष्णवादी हो जाएंगे, बस ऐसा ही है कि आप अपने होने की यात्रा पर निकल जाएंगे। तभी आप समझ पाएंगे कि यह आदमी, जो स्वधर्म में मर जाने को कहता है, यह आदमी आपके ऊपर सिद्धांत थोपने वाला आदमी नहीं हो सकता है।
तो कल से आप पूछें। जो आप पूछ लेंगे, उसकी मैं बात कर लूंगा। मुझे इसमें सुविधा पड़ती है कि आप पूछ लेते हैं। क्योंकि इसमें मुझे सोच-विचार की झंझट नहीं रह जाती। नहीं तो मुझे सबसे बड़ी दिक्कत यही हो जाती है कि क्या कहूं? ऐसे जब तक आपसे बोलता हूं, तभी तक शब्द और विचार मेरे साथ होते हैं। जब नहीं बोल रहा हूं तब मैं खाली हो जाता हूं। तो मुझे बड़ी कठिनाई होती है, कि कहूं क्या? आप कुछ पूछ लेते हैं, खूंटी बन जाते हैं, मुझे टांगने की सुविधा हो जाती है।
तो मुझे बहुत ही कठिन मामला है वह कुछ बोलना। उसके लिए बड़ी मुश्किल से मुझे श्रम उठाना पड़ता है--क्या बोलना है! तो अपनी तरफ से मेरा बोलना तो बहुत मुश्किल होता जा रहा है। इधर मित्रों ने, बहुत मित्रों ने कहा है कि आप कुछ स्वतंत्र रूप से बोल दें। वह मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है। और ज्यादा दिन अब मैं स्वतंत्र रूप से नहीं बोल सकूंगा, उसमें बहुत कठिनाई पड़ती है। क्योंकि मुझे समझ ही नहीं पड़ता है, समझ ही खो गई है। आप पूछ लेते हैं, तो कोई उपाय नहीं रह जाता, मुझे रिस्पांड करना पड़ता है। आप नहीं पूछते हैं, तो मेरे पास कोई उपाय नहीं कि क्या बोलना है! बोलने को क्या है! अपनी तरफ से मैं अब चुप हूं, आपकी तरफ से ही बोल रहा हूं। इसलिए कल सवाल उठा लेंगे। जो सवाल आप उठा लेंगे, उनकी हम बात कर लेंगे।
अब हम ध्यान के लिए बैठेंगे।