मैं ही वेदों की रचना करता हूं। मैं ही वेदों का उपदेश करता हूं। मैंने ही उपनिषदें रची हैं और सारे वेद मेरी ही चर्चा करते हैं। यह सूत्र थोड़ा अजीब सा मालूम पड़ेगा। क्योंकि मैं ही वेदों का उपदेश करूं और वेद मेरी ही चर्चा करें! मैं ही उपनिषद रचूं और उपनिषदों में मेरी ही चर्चा हो! अपनी ही बात, अपनी ही अभिव्यक्ति! ऊपर से देखने पर सूत्र अजीब मालूम पड़ेगा, लेकिन थोड़े गहरे में देखेंगे तो बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ सूत्र के मौलिक आधार समझ लेने चाहिए। पहला तो यह कि जो भी है, परमात्मा है। तो चाहे चर्चा की जाए और चाहे चर्चा करने वाला हो; चाहे दृश्य बने और चाहे द्रष्टा हो; चाहे मूर्ति हो और चाहे मूर्तिकार हो; अगर एक ही है अस्तित्व, तो फिर मूर्तिकार अपनी ही मूर्ति बना रहा है। और गीतकार अपना ही गीत गा रहा है। और वेद का जो निर्माता है, वही वेद का विषय भी होगा। क्योंकि दो का कोई उपाय नहीं है। अगर अस्तित्व एक ही है तो फिर सभी कुछ उस एक से ही संबंधित है। इसलिए इस अजीब से दिखने वाले सूत्र में महत्वपूर्ण सूचना दी गई है, और वह सूचना यह है कि जो कुछ भी हो रहा है यहां, वह सभी मैं हूं। उसमें कुछ भी वर्जित नहीं है। हमारा मन कठिनाई में पड़ेगा। क्योंकि यहां बहुत कुछ हो रहा है जिसे हम वर्जित करना चाहेंगे और हम कहना चाहेंगे कि यह न हो तो बेहतर है। बहुत कुछ है, जो भी सोचेगा वह पाएगा कि जीवन में न होता तो जीवन बेहतर होता। लेकिन हमें जीवन की गहराइयों का पता नहीं है, इसलिए ऐसा विचार उठता है। कौन नहीं होगा जो चाहे कि अगर जगत में असाधु न हों तो बेहतर है, पाप न हों तो बेहतर है। यह बहुत साफ दिखाई पड़ने वाली बात भी, बहुत गलत है, क्योंकि साधु हो ही सकता है तब जब असाधु भी हो। और पाप हो तो ही पुण्य हो सकता है। और अगर बीमारी न हो तो स्वास्थ्य के होने का कोई भी उपाय नहीं है। और अगर मृत्यु न हो तो जन्म असंभव हो जाएगा। जीवन के गणित को अगर हम समझें तो जीवन सदा ही, द्वंद्व के बीच एक संतुलन है। उस दो में से हम एक को काटने की इच्छा रखते हैं। तो हमें पता नहीं है कि जीवन का संतुलन बिखर जाएगा तत्काल। इधर मैं मनुष्य के बुद्धि-अंक के संबंध में कुछ अध्ययन करता था। आई-क्यू के संबंध में, इंटेलीजेंस कोशियंट के संबंध में। हर आदमी की बुद्धि की एक गणना है। हर आदमी की बुद्धि मापी जा सकती है। तो बुद्धि-अंक उपलब्ध हो जाता है। पर बड़ी हैरानी का अनुभव मुझे हुआ कि अगर सौ आदमियों की बुद्धि मापी जाए तो एक आदमी उसमें प्रतिभाशाली होता है, जिसको जीनियस कहें। और एक आदमी मूढ़ होता है, जो जीनियस के बिलकुल विपरीत है। एक। एक होता है प्रतिभाशाली, एक होता है महामूढ़। दो महामूढ़ नहीं होते हैं, दो प्रतिभाशाली नहीं होते हैं। अगर दो प्रतिभाशाली हों तो दो महामूढ़ होते हैं। अगर जगत की पूरी बुद्धि की गणना की जाए तो अनुपात है उसमें, बड़ी हैरानी की बात है, कि एक प्रतिभाशाली के लिए एक महामूढ़ अनिवार्य है। अगर दस विलक्षण प्रतिभा के लोग होते हैं, प्रतिभा से नीचे, तो दस मूढ़ के ऊपर मूर्ख होते हैं। और ये अनुपात ऐसा ही चलता है। पचास व्यक्ति उस तरफ बंटे होते हैं, पचास व्यक्ति इस तरफ बंटे होते हैं। और इस अनुपात में कभी भी फर्क नहीं पड़ता। तो इसका मतलब यह हुआ कि बुद्धि भी अबुद्धि के साथ ही इस जगत में खिल सकती है। और समान अनुपात में। नहीं तो नहीं खिलती। इसका मतलब हुआ कि एक बुद्धिमान जब इस जगत में आता है तो अपने साथ एक महामूढ़ को ले आता है। इसका यह भी मतलब हुआ कि जब भी एक महामूढ़ पैदा होता है तो एक बुद्धिमान को पैदा होने का अवसर बनाता है। इसलिए बुद्धिमान को अलग करने की, और मूढ़ को अलग करने की जरूरत नहीं है, वे एक ही तराजू के दो पलड़े हैं। और उनमें से एक को काटा तो दूसरा फौरन गिर जाता है। इसलिए बुद्धिमान को मूढ़ के प्रति अनुगृहीत होना चाहिए, उसके बिना वह हो नहीं सकता। और आज नहीं कल हमें पता चलेगा कि जीवन में सभी चीजें इसी तरह संतुलित हैं। यहां एक राम पैदा होता है तो रावण के बिना नहीं पैदा होता। रावण को तत्काल तराजू पर आ जाना पड़ता है। हमारा मन करता है, रावण न हो। लेकिन रावण के बिना राम नहीं हो सकते। जीवन एक संतुलन है। यहां भलाई और बुराई दो पलड़े हैं तराजू के, एक ही तराजू के। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि बुराई मिट जाए, असली सवाल यह नहीं है कि भलाई बढ़ जाए। असली सवाल यह है कि बुराई और भलाई जिस सूत्र से जुड़े हैं, वह सूत्र हमें दिखाई पड़ जाए, तो फिर न बुराई बुराई रह जाती है, न भलाई भलाई रह जाती है। तब हम जानते हैं कि यह तो जीवन की अनिवार्यता है। जैसे कि अगर हम एक मकान में एक आर्च बनाते हैं, एक दरवाजा बनाते हैं गोल, तो दोनों तरफ उलटी ईंटें लगाते हैं। और उन्हीं उलटी ईंटों के सहारे पूरा भवन खड़ा हो जाता है उसके ऊपर। कोई सोच सकता है कि हम एक सी ईंटें लगा दें, उलटी ईंटें न लगाएं तो फिर भवन खड़ा नहीं होता। तत्क्षण गिर जाएगा। वे उलटी ईंटें एक-दूसरे को साध लेती हैं। और उन्हीं उलटी ईंटों का वजन जब संतुलित हो जाता है, तो महाशक्ति पैदा हो जाती है। इस जगत की सारी ऊर्जा द्वंद्व से निर्मित है। और द्वंद्व से ही संचालित है। इसलिए ऐसा दिन कभी भी नहीं आएगा जिस दिन राम हो सके रावण के बिना। इसमें निराश होने का कोई भी कारण नहीं है। और अगर यह खयाल में आ जाए तो फिर रावण भी बुरा नहीं मालूम पड़ेगा। फिर राम और रावण एक ही खेल के दो हिस्से मालूम पड़ेंगे। उनमें से एक भी हट जाए तो खेल बंद हो जाता है। जरा रामलीला रावण के बिना करके देखें तब पता चलेगा! तो वह रामलीला ही नहीं है, राम-रावण लीला है। अगर उसको ठीक से समझें तो वे दोनों एक ही आर्च की विरोधी ईंटें हैं जिन पर सब सम्हला हुआ है। हमारा राम से मोह है इसलिए हमने रामलीला नाम रख लिया है। लेकिन अगर यह मोह को हम छोड़ें और चीजों को सीधा देखें, तो हम राम-रावण लीला कहेंगे। इस जगत में अगर एक ही है, तो उस एक ने ही अपने को दो में विभाजित करके यह द्वंद्व, यह ऊर्जा पैदा की है। ईंटें सब एक जैसी हैं। लेकिन उलटी रख दिए जाने पर आर्च बन जाता है, फिर भवन उसके ऊपर जा सकता है। ईंटें एक ही हैं। राम और रावण दो तरह की ईंटों से नहीं बने हुए हैं, बुराई और भलाई दो तरह की ईंटों से नहीं बनी हुई हैं, एक ही तरह की ईंटों से बनी हुई हैं। सिर्फ एक दूसरे के विपरीत एक ही तरह की ईंटें रख दी जाती हैं। साधु कोशिश में रहते हैं कि असाधु दुनिया से मिट जाए। उन्हें पता नहीं है कि असाधु के कारण ही वे हैं। इसलिए उनकी कोशिश चलती रहती है लेकिन असाधु मिटता नहीं। असाधु मिट नहीं सकता। असाधु उसी दिन मिट सकता है जिस दिन साधु भी न रह जाएं, उसके पहले नहीं मिट सकता। और वह दुनिया बड़ी नीरस, अर्थहीन होगी जिस में साधु-असाधु दोनों न हों। दुनिया में तो वे दोनों रहेंगे, क्योंकि दुनिया एक लीला है और इस लीला में द्वंद्व चलेगा। लेकिन आप अगर समझ जाएं और अगर आपको यह दिखाई पड़ जाए कि यह द्वंद्व लीला है और द्वंद्व के पीछे जो एक ही छिपा है वह अनुभव में आ जाए, तो आपके लिए यह लीला समाप्त हो जाएगी। और जिसके लिए लीला समाप्त हो गई वह संसार के पार हो जाता है। जिसके लिए यह लीला समाप्त हो गई, वह संसार के पार हो जाता है। और जब तक लीला में आपका चुनाव है तब तक आप संसार के भीतर रहेंगे। जिसने रावण के खिलाफ राम को चुना है, या राम के खिलाफ रावण को चुना है, वह संसार में रहेगा। अभी उसे जीवन का आत्यंतिक संतुलन समझ में नहीं आया है। इसमें कोई चुनाव नहीं है राम और रावण में। यह लीला है, यह समझ में आना चाहिए। यह द्वंद्व ही जगत का खेल है। इस द्वंद्व के भीतर वह जो एक है, उसका दिखाई पड़ जाना है। इस सूत्र में बहुत तरह से उस एक की खबर दी गई है-- ‘मैं ही वेदों का उपदेश करता हूं, मैंने ही उपनिषदें रचीं और सारे वेद मेरी ही चर्चा करते हैं।’ मैं अपनी ही चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि कोई दूसरा तो है नहीं। कभी आपने किसी आदमी को अकेले में अकेले ही ताश खेलते देखा है? खेलते हैं लोग। दोनों बाजियां फैला लेते हैं। इस तरफ से भी चलते हैं और उस तरफ से जवाब भी देते हैं? ठीक यह जगत परमात्मा का ऐसा ही खेल है। दोनों बाजियां उसकी हैं। वही इस तरफ से चलता है, वही उस तरफ से उत्तर देता है। इसमें दूसरा नहीं है। लेकिन यही भारतीय मनीषा की दृष्टि है। ऐसी दृष्टि भारत के बाहर और कहीं उपलब्ध नहीं हो सकी। सभी जगह इस द्वंद्व को, इस दिखाई पड़ने वाले द्वंद्व को आत्यंतिक मान लिया गया है। इसके भीतर एकता नहीं है। ईसाइयत, यहूदी या इस्लाम ईश्वर और शैतान को आत्यंतिक इकाइयां मान लिए हैं। उनके भीतर कहीं कोई जोड़ नहीं है, कहीं कोई तालमेल नहीं है। भारत में भी जैनों ने शैतान और ईश्वर में तो विभाजन नहीं किया, लेकिन जगत और मोक्ष में विभाजन कर लिया है। वे भी मानते हैं कि जगत और मोक्ष में कोई तालमेल नहीं है, ये अलग इकाइयां हैं। इसलिए जैन द्वैतवादी हैं। वे कहते हैं: दो का अस्तित्व तो है ही--एक जगत है और एक ईश्वर। एक जगत और एक मोक्ष। इस लिहाज से जैन और मुसलमान और ईसाई और यहूदी सहमत हैं कि जगत दो में बांटा गया है--एक नहीं है। हिंदू-चिंतना जगत को कहती है कि दो में बंटा हुआ है, लेकिन जो बंटा हुआ है वह एक है। क्योंकि हिंदू-चिंतना का यह खयाल है कि अगर जगत दो में बंटा है, तो इस जगत में शांति का फिर कोई उपाय नहीं है। कभी भी कोई उपाय नहीं है। क्योंकि ये दो अगर आत्यंतिक इकाइयां हैं तो संघर्ष फिर तो अनिवार्य होगा। फिर सदा होगा। कभी ईश्वर जीतेगा, कभी शैतान जीतेगा; कभी बुराई जीतेगी, कभी भलाई जीतेगी; लेकिन इसका अंत कैसे होगा? क्योंकि बुराई अपनी ही हैसियत से अलग शक्ति है, उसको नष्ट नहीं किया जा सकता है, सिर्फ हार-जीत हो सकती है। और भलाई भी अपनी ही हैसियत की एक शक्ति है, वह भी अंतिम रूप से विजेता नहीं हो सकती, क्योंकि बुराई की शक्ति नष्ट नहीं की जा सकती। वह भी शक्ति है। दोनों शक्तियां हैं। दोनों शाश्वत हैं। शैतान और ईश्वर, दोनों शाश्वत हैं। संसार और मोक्ष, दोनों शाश्वत हैं। तो इसमें अंत कैसे होगा? और अगर एक व्यक्ति आज संसार में पड़ गया है, किसी तरह झगड़ कर, जीत कर बाहर निकल जाए, कल नहीं पड़ेगा इसका क्या उपाय है? क्योंकि किसी दिन पड़ ही गया था, कल फिर पड़ सकता है। और संसार मौजूद रहेगा। संसार तिरोहित नहीं होता। संसार फिर खींच सकता है। अगर इस बार खींचा है तो फिर क्यों नहीं खींच सकता है? तो संघर्ष शाश्वत हो जाएगा। दो विरोधी शाश्वत शक्तियों के साथ संघर्ष भी शाश्वत हो जाएगा। और इसका कोई अंत नहीं है। इसलिए हिंदू-चिंतना ने एक बहुत ही अदभुत बात कही है और वह यह कि यह संघर्ष खेल है, शाश्वत नहीं है। यह संघर्ष सिर्फ दिखावा है, भीतरी नहीं है। यह संघर्ष केवल मन-बहलाव है। इसलिए भारत ने कहा, विशेषकर हिंदू-चिंतन ने, कि संसार एक लीला है, एक खेल है। उसे वास्तविकता देने का कोई कारण नहीं है। अगर खेल है तो खेल बंद किया जा सकता है। और अगर खेल है और दोनों विपरीत के भीतर एक ही छिपा है, तो उसका अनुभव होते ही खेल विलीन हो जाएगा। और न भी विलीन हो, खेल ही खेल है ऐसा पता चल जाए, तो भी मुक्ति हो गई। इसलिए हिंदू-चिंतन ने दो तरह के मुक्त माने हैं। एक, जिसको कहा है जीवनमुक्त। जीवनमुक्त उसे कहा है, जो खेल में खड़ा है और जानता है कि खेल है। और एक को कहा है--मुक्त। जो खेल को खेल जान कर खेल के बाहर हो गया है। दोनों तरफ मैं ही हूं। दोनों बाजुएं मेरी हैं। इसकी गहरी निष्पत्तियां हुईं। इसका मतलब सब हार मेरी है, सब जीत मेरी है। इसका यह मतलब हुआ कि न मैं कभी हारता हूं, न मैं कभी जीतता हूं, क्योंकि खिलाड़ी मैं अकेला हूं। इसका यह मतलब हुआ कि संसार और मोक्ष के बीच का फासला टूट गया। इसका यह मतलब हुआ कि संसार में भी रह कर कोई मुक्त हो सकता है। कोई विरोध न रहा। जगत को एक अनिवार्य शत्रुता की तरह देखने का कोई कारण नहीं है। तब जगत एक गहनता में एक का ही खेल है। तो फिर द्वंद्व में तोड़ने का और तोड़ कर तनाव से भरने की कोई जरूरत नहीं है। ध्यान रहे, जब हम जगत को दो में तोड़ते हैं, तो हम मनुष्य को भी दो में तोड़ देते हैं। तो उसका शरीर और उसकी आत्मा दुश्मन हो जाती हैं। तब उसकी इंद्रियां और उसकी चेतना दुश्मन हो जाती हैं। यह दुश्मनी फिर भीतर भी तनाव पैदा करती है और इस तनाव के बीच सेतु बनाने का कोई भी उपाय नहीं है। इस तनाव से भरा हुआ व्यक्ति या तो इंद्रियों को नष्ट करने में लग जाता है और या फिर आत्मा को नष्ट करने में लग जाता है। और दोनों ही स्थिति में दुख पाता है। भारतीय मनीषा की दृष्टि है कि जब इन दो को हम दो में बांट ही लेते हैं, तभी तनाव पैदा हो जाता है और अशांति पैदा हो जाती है। इन दो को दो में बांटो ही मत। इनके पीछे एक ही छिपा है। इस एक का बोध हर दिशा से हो सके, इसलिए सूत्र में कहा है: ‘मैं ही वेद का उपदेश करता, मैं ही उपनिषद रचता, और सारे वेद और उपनिषद मेरी ही चर्चा करते हैं।’ क्योंकि मेरे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। ‘मैं जन्म और नाश से परे हूं। पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’ ‘पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’ ऐसा वक्तव्य और कहीं उपलब्ध किसी भी धर्मशास्त्र में होना असंभव है। क्योंकि सभी धर्मशास्त्रों ने परमात्मा को पुण्य के साथ एक कर लिया है और पाप को वर्जित कर लिया है। पाप को वर्जित करने की वजह से शैतान को निर्मित करना पड़ा है, क्योंकि पाप फिर किसके पल्ले जाए और कहां जाए। बुराई जगत में है। भलाई हम परमात्मा को दे देते हैं, फिर बुराई कहां जाए। ईसाइयत सदा से कठिनाई में रही है कि जगत में बुराई है, इसका क्या करें? कौन इसके लिए उत्तरदायी हो? परमात्मा को उत्तरदायी बनाने की हिम्मत नहीं पड़ती, क्योंकि अगर परमात्मा भी बुराई कर रहा है तो फिर बुराई से छूटने का उपाय नहीं सूझता। और अगर परमात्मा भी बुराई कर रहा है तो वह कैसा परमात्मा है। अंग्रेजी में गॉड और गुड एक ही जगह से निष्पन्न होते हैं। वह शुभ है, वही ईश्वर है। इसलिए वस्तुतः ईश्वर का अंग्रेजी में अनुवाद गॉड करना ठीक नहीं है। क्योंकि यह जो ईश्वर है यह कहता है: पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते हैं। मैं दोनों में हूं और दोनों के पार भी हूं। इसमें एक बात और समझ लेनी जरूरी है कि छू नहीं सकते, इसका यह मतलब नहीं है कि मैं दोनों से दूर हूं। क्योंकि अगर दूर हो तो छूने का कोई सवाल ही नहीं है। इसका साफ मतलब है कि मैं दोनों के बीच हूं और छू नहीं सकते हैं। नदी से मैं गुजरता हूं और पानी मुझे छूता नहीं। काली कोठरी से मैं गुजरता हूं और काला दाग मुझे नहीं लगता है। अगर मैं काली कोठरी से गुजरता ही नहीं हूं तो छूने नहीं छूने का सवाल नहीं है। यह सूत्र कि पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते, यह कहता है कि पाप और पुण्य में मैं ही हूं, फिर भी वे मुझे छू नहीं सकते। मैं उन दोनों में होकर भी दोनों के पार हूं। तो परमात्मा का यह अतिक्रमण करने वाला रूप, यह ट्रांसेंडेंस का रूप, शुभ और अशुभ दोनों के पार एक अनूठी दृष्टि है। यहां हम परमात्मा को शुभ के साथ एक नहीं करते, इसलिए हमें शैतान बनाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन तब हमारा परमात्मा जटिल हो जाता है। क्योंकि शुभ और अशुभ दोनों ही उसी से निष्पन्न होते हैं। स्वास्थ्य भी वही देता है, बीमारी भी वही देता है। और जन्म भी वही और मृत्यु भी वही। और राम भी उससे आते हैं और रावण भी उससे आते हैं। और जहर भी उससे ही बनता है और अमृत भी। तब हमारे परमात्मा की धारणा जटिल हो जाती है। एक मुसलमान मित्र मेरे पास आए थे, विचारशील हैं। वे कह रहे थे कि और तो सब ठीक है, यह हमारी समझ में नहीं पड़ता कि अगर बुराई भी परमात्मा कर रहा है, तो वह क्यों कर रहा है? एक छोटा बच्चा पैदा होता है और पैदा होते से ही मर जाता है। तो अगर यह परमात्मा ही कर रहा है तो यह क्यों कर रहा है? बीमारी क्यों है? गरीबी क्यों है? दुख क्यों है? पीड़ा क्यों है? उनका सवाल संगत दिखाई पड़ता है। और हिंदू-विचार से निरंतर ईसायइत और इस्लाम ने यही पूछा है कि यह क्यों है? उनको आसानी है, क्योंकि वे कह सकते हैं कि यह शैतान के कारण है। मैंने उस मुसलमान मित्र से पूछा कि पहले तुम मुझे यह बताओ कि यह शैतान तुम्हारे परमात्मा की बिना आज्ञा के जगत में है? शैतान क्यों है? इससे हल कहां होता है? तुम सिर्फ सवाल को एक कदम पीछे हटाते हो। हल कहां होता है। शैतान क्यों है? छोड़ो, बुराई क्यों है यह हिंदू जवाब नहीं दे पाते हैं, तुम मुझे कहो कि शैतान क्यों है? दो ही उपाय हैं। या तो तुम मानो कि यह परमात्मा की आज्ञा से है, परमात्मा ने इसे बनाया। और अगर परमात्मा शैतान को बना रहा है तो इसमें चक्कर क्यों लेना, बीमारी को सीधा क्यों नही बना सकता? शैतान को एजेंट बनाए, फिर शैतान बीमारी बनाए, इसका क्या प्रयोजन है? और या तुम यह कहो कि यह शैतान परमात्मा से स्वतंत्र शक्ति है, परमात्मा ने उसे बनाया ही नहीं है। यह भी उसी हैसियत से है जैसा परमात्मा है। तब तुम शैतान को एक दूसरा परमात्मा मान रहे हो। तब मैं तुमसे पूछता हूं कि तुम्हें पक्का है कि इन दोनों परमात्मा में कौन जीतेगा? जहां तक जगत का अनुभव कहता है, वहां तक तो यही कहता है कि शैतान रोज जीतता है और परमात्मा रोज हारता है? तो अंततः परमात्मा जीतेगा, यह तुम्हें किसने कहा? और क्या वजह है सोचने की कि परमात्मा अंततः जीतेगा? शैतान रोज जीतता दिखाई पड़ता है, परमात्मा जीतता दिखाई नही पड़ता! जिसे तुम अवतार कहते हो, उसे एक गुंडा छुरा मार दे तो अवतार मर जाता है। जिसे तुम ईश्वर-पुत्र कहते हो, जीसस को, सूली पर लटका दिया जाता है। कहां जीतता दिखाई पड़ता है तुम्हारा परमात्मा! लगता तो ऐसा है कि शैतान ज्यादा बड़ा ईश्वर है फिर। और जीत उसके हाथ में मालूम होती है। हल तो कुछ भी नहीं हुआ है शैतान को मानने से। लेकिन हिंदू-चिंतना कुछ और जवाब देती है। हिंदू-चिंतना का कहना यह है कि जिसे तुम बुराई कहते हो, वह तुम्हारी दृष्टि में बुराई है। अगर तुम पूरे अस्तित्व को सोचो तो वह बुराई नहीं है। बुराई तुम्हारा दृष्टिकोण है। मैंने उनसे पूछा: एक छोटा बच्चा पैदा हुआ और मर गया, तुम कहते हो कि बुरा है। क्या तुम्हें पक्का पता है कि मरता नहीं तो ज्यादा अच्छा होता? मर गया तो ज्यादा बुरा हुआ? क्या तुम मानते हो कि यह मरता नहीं, तो जगत में शुभ फलित होता। एक हिटलर मर सकता था पैदा होकर। अगर हिटलर पैदा होकर मर जाता, तो हम कहते: बहुत बुरा है यह जगत! लेकिन हमें पता नहीं था कि यह जीकर क्या कर सकता है और क्या हो सकता है! हमें पूरे का कोई पता नहीं है। हम अंश से अनुमान कर रहे हैं। हमारी हालत ऐसी है कि हम किसी उपन्यास से एक पन्ना फाड़ लें और उसको पढ़ें और पूरे उपन्यास के संबंध में वक्तव्य दें। या कविता की एक पंक्ति काट लें, उसे पढ़ें और पूरी कविता के संबंध में वक्तव्य दें। यह जगत एक विराट महाकाव्य है, जिसका न हमें ओर का पता है न छोर का। इसमें हम बीच की कोई एक घटना पकड़ लेते हैं और उससे हम हिसाब लगाते हैं। वहीं भूल हो जाती है। एक घटना को पकड़ कर हिसाब नहीं लगाया जा सकता। घटना अकेली नहीं है, एक महान जाल का हिस्सा है। एक विराट श्रृंखला का हिस्सा है। तो एक बच्चा पैदा हुआ, वह क्या हो सकता है, इसका हमें कोई पता नहीं है। अगर एक हिटलर मर जाए और हमें पता हो कि यह हिटलर हो सकता है, तो कोई भी नहीं कहेगा कि यह बुरा हुआ। जर्मन एक विचारक ने लिखा है कि ऐसे ही क्षणों में आदमी की नीति और आदमी की समझ उथली पड़ जाती है। अगर हिटलर की मां अपने बच्चे की गर्दन दबा दे तो यह महापुण्य का कार्य होगा। लेकिन इसे कोई महापुण्य मानेगा नहीं, उसकी मां तो अदालत में सजा काटेगी। और सारी दुनिया उसकी निंदा करेगी कि यह कैसी मां है! और ठीक ही है, क्योंकि हमें कुछ भी तो पता नहीं है कि यह बच्चा क्या हो सकता है? क्या इसकी संभावना है? फिर यह भी हम छोड़ दें कि यह बच्चा क्या हो सकता है, यह भी कहां पक्का पता है कि जीना शुभ है और मर जाना अशुभ है। यह किसने कहा? यह कैसे जाना? क्योंकि मरा हुआ आदमी कुछ लौट कर आपसे कहता नहीं है कि मैं बड़े दुख में पड़ गया हूं। और संभावना तो यह है कि अगर मुर्दे दुख में पड़ते हों तो जरूर लौट कर कहेंगे, क्योंकि दुख की बातें कहने की इतनी इच्छा होती है! मालूम ऐसा पड़ता है कि मुर्दे ऐसे सुख में पड़ जाते हैं कि लौट कर कहने तक का उपद्रव लेने की जरूरत नहीं रह जाती। पर कौन तय करेगा कि मृत्यु दुख है? एक तो बात साफ है कि जीवन में तनाव हैं, दुख हैं, संताप हैं, लेकिन मृत्यु में तो विश्राम है, यह तो साफ है। दिन भर आप दौड़ते हैं, भागते हैं, परेशान होते हैं, रात सोकर विश्राम पाते हैं। मृत्यु एक महानिद्रा है। किसने कहा कि यह दुख में पड़ गया? यह अशुभ क्यों है? यह अशुभ इसलिए मालूम पड़ता है कि मेरा बेटा मर गया। यह अशुभ इसलिए नहीं मालूम पड़ता कि कोई मर गया, यह अशुभ मालूम पड़ता है कि मेरा कोई मर गया। यह मेरे का कुछ हिस्सा मर गया, इसलिए अशुभ मालूम पड़ता है। यह अशुभ इसलिए मालूम पड़ता है कि इस बेटे के साथ मेरी बहुत सी महत्वाकांक्षाएं पैदा हुई थीं, वे सब मर गईं। इस बेटे के साथ मैंने जगत में अपने अहंकार को पूरा करने के लिए न मालूम कितनी कल्पनाएं बांधी थीं, वे सब मर गईं। लेकिन कौन कहता है कि महत्वाकांक्षाओं का मर जाना बुरा है? और कौन कहता है कि मेरे अहंकार की पूर्ति न हो पाई, यह बुरा है? और कौन कहता है कि मेरा हिस्सा कुछ टूट गया, यह बुरा है? क्योंकि जो जानते हैं वे तो कहते हैं कि जिस दिन सब-कुछ मेरा टूट जाए, मेरा जैसा मेरे भीतर कुछ रहे ही नहीं, तो ही मैं परमानंद को उपलब्ध होऊंगा। यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि हम किस चीज को बुरा कहते हैं, किस चीज को भला कहते हैं। यह मनुष्य की चिंतना है कि क्या बुरा है और भला है। परमात्मा की तरफ से जहां विराट का पूरा बोध है, जहां पूरा दिखाई पड़ रहा है, वहां बुरा और भला का सवाल नहीं है; वहां बुरा और भला है ही नहीं। इसे हम यूं समझें। मैंने सुना है, कैनेथ वॉकर लंदन का एक बड़ा सर्जन था। उसने एक बार किसी मरीज की किसी बीमारी का ऑपरेशन किया और कोई ग्रंथि भीतर बन गई थी उसको काट कर बाहर निकाला। वह बीमारी असाधारण बीमारी है, कभी करोड़ों में एक आदमी को होती है। मरीज के रिश्तेदार बाहर बैठ कर रो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं। और कैनेथ वॉकर ऐसी संलग्नता से लगा है ऑपरेशन में जैसे कोई चित्रकार चित्र बना रहा हो। और उसकी प्रफुल्लता, उसकी ताजगी! उस मरीज से उसका कोई संबंध ही नहीं है। वह तो एक बहुत अनूठी बीमारी उसके हाथ में लग गई है, जो कभी करोड़ों में एक को होती है और कभी एकाध सर्जन को सौभाग्य मिलता है उस बीमारी को ऑपरेट करने का! वह उसमें ही संलग्न है। वह इतना प्रफुल्लित, इतना आनंदित है, उसकी जिंदगी का बड़े से बड़ा क्षण आ गया! और जब उसने ग्रंथि काट कर बाहर निकाली और टेबल पर रखी तो उसके मुंह से जो शब्द निकले, वह थे--हाउ ब्यूटिफुल! वह जो ग्रंथि थी, वह जो बीमारी की गांठ थी, उसने जब उसे टेबल पर रखा और देखा तो उसके मुंह से जो शब्द निकले वे यह थे कि हाउ ब्यूटिफुल। दृष्टि पर निर्भर करता है। किसी भयंकर बीमारी की गांठ किसी कलाविद चिकित्सक को सुंदर मालूम पड़ सकती है। सुंदर है या नहीं, कहना मुश्किल है। जिसे हम बीमारी कहते हैं... सूफी फकीर हुआ, सरमद। उसको नासूर हो गया था हृदय में और उसमें कीड़े पड़ गए थे। और जब वह मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए झुका तो कीड़े नीचे गिर गए। तो कथा है कि सरमद ने कीड़े उठा कर वापस नासूर में रख लिए। लोगों ने कहा: सरमद, यह क्या पागलपन करते हो? सरमद ने कहा कि जो मेरी मौत है, वह इनकी जिंदगी है। लेकिन कौन निर्णय करे कि कौन सी जिंदगी बेहतर है। तो मैं नमाज पढ़ना बंद कर दूंगा, क्योंकि यही बेहतर है कि मैं अपनी ही जिंदगी को बदतर समझूं बजाय इनके, क्योंकि इनकी जिंदगी के बाबत मैं कैसे निर्णय लूं? तो सरमद ने नमाज बंद कर दी, क्योंकि झुकेगा, कीड़े गिर जाएंगे। अब यह अजीब आदमी है। दृष्टि की बात है। क्योंकि उसने कहा कि यह मेरी जिंदगी जो है, वह इनकी मौत है। अगर मैं बचना चाहूं तो ये कीड़े मरेंगे। इनको मारना पड़ेगा। लेकिन किसकी जिंदगी इस अंतिम हिसाब में उपयोगी है, कौन जाने! एक बात पक्की है कि अगर भूल ही करनी हो तो अपनी तरफ करनी उचित है। इन कीड़ों की तरफ! पता नहीं ये किस प्रयोजन से हैं? इनका भी जीवन है। आपकी जो बीमारी है, वह न मालूम कितने जीवाणुओं का जीवन है। और आपकी जो जिंदगी है, पता नहीं कितनों के लिए बीमारी हो। आपने उस तरह कभी नहीं सोचा होगा कि मेरी जो जिंदगी है, वह न मालूम कितनों के लिए बीमारी हो। मेरा होना न मालूम कितनों के लिए उपद्रव हो। नहीं, हम जहां से सोच रहे हैं वहां से शुभ और अशुभ दिखाई पड़ रहा है। अगर परमात्मा की आंख हमारे पास हो जो सारे विस्तार को युगपत देख ले, छोर दोनों दिखाई पड़ जाएं, सारा विस्तार इकट्ठा दिखाई पड़ जाए, पूरा अस्तित्व झलक में आ जाए, तो वहां शुभ और अशुभ कुछ भी न होगा। शायद शुभ और अशुभ वहां ताना-बाना होगा। जैसा कोई जुलाहा कपड़ा बुनता है तो एक आड़ा धागा डालता है और एक सीधा धागा डालता है। और दोनों से मिल कर कपड़ा बनता है। वह जो ताना-बाना है, हमारी इच्छा है कि हम सीधा ही सीधा बुन दें। तो फिर कपड़ा निर्मित नहीं होता। या हमारी इच्छा है हम तिरछा ही तिरछा बुन दें, तो भी कपड़ा निर्मित नहीं होता। धागे एक दूसरे के विपरीत पड़ कर, धागे एक दूसरे से गुंथ कर, एक दूसरे से पार होकर कपड़े को निर्मित करते हैं। यह सारा जगत एक चादर की तरह है, जिसमें शुभ और अशुभ ताने-बाने की तरह बुने हुए हैं। इसमें बुरे आदमी की भूल यही है कि वह सोचता है कि सारे जगत को मैं बुराई में डुबा दूं। और भले आदमी की भूल भी यही है कि वह सोचता है सारे जगत को मैं भलाई में डुबा दूं। ये दोनों ही आदमी हैं, और इन दोनों को परमात्म-बोध नहीं है। परमात्म-बोध जिसे है, वह जगत जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेता है। न उसे बुराई में डुबाने की आकांक्षा है, न उसे भलाई में डुबाने की आकांक्षा है। इसलिए संत का एक नया ही रूप भारतीय मन में है, वह साधु का नहीं है। साधु वह है जो असाधु के विपरीत है। संत वह है जो किसी के विपरीत नहीं है। समग्र स्वीकार में है। जो भी है, ठीक है। संत वह है जो सर्व स्वीकार में है। जो भी है, ठीक है। बुराई भी ठीक है, भलाई भी ठीक है। पाप भी ठीक है, पुण्य भी ठीक है। यह अति कठिन है। और इसलिए भारतीय धर्म ने जैसी गहराई और ऊंचाई पाई वैसा कोई भी धर्म छू नहीं सका। बाकी सब धर्म बचकाने हैं। बचकाने इस लिहाज से हैं कि आदमी के दृष्टिकोण से जगत को सोचा गया है उनमें। भारतीय धर्म विशिष्ट है, उसमें ईश्वर के दृष्टिकोण से जगत को सोचा गया है। आप फर्क समझ रहे हैं। आदमी के दृष्टिकोण से तो आदमी अपने हिसाब से सोचता है। जो उसे अच्छा लगता है वह अच्छा, और जो बुरा लगता है वह बुरा। विराट के हिसाब को उसमें जगह नहीं है। सभी धर्म, भारतीय धर्म को छोड़ कर, एंथ्रोपोसेंट्रिक हैं। आदमी केंद्र है। सब चीजों में आदमी केंद्र है। तो जो भी आदमी के हित में है, वह शुभ है। और जो आदमी के अहित में है, वह अशुभ है। और आदमी के हित में सारे जगत का अहित होता रहे, तो भी शुभ है। ईश्वर की दृष्टि से जगत का हिसाब--और जिस दिन कोई व्यक्ति उस दृष्टि के अनुकूल जीने लगता है उस दिन वह ईश्वरीय हो जाता है। मनुष्य मनुष्य रहते ईश्वर नहीं हो सकता। और मनुष्य-केंद्रित धर्म कोई भी वास्तविक धर्म नहीं है। ईश्वर-केंद्रित धर्म, अनंत को ध्यान में रख कर, फिर हमारा शुभ और अशुभ कहीं टिकता नहीं। और हमारा साधु असाधु कहीं टिकता नहीं। और हमारा बुद्धिमान और बुद्धिहीन कहीं टिकता नहीं। हमारे हिसाब और हमारी गणनाएं सब खो जाती हैं। कहा है: ‘पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’ होता मैं उनमें हूं, स्पर्श वे मुझे नहीं कर पाते। ‘मैं शरीर, इंद्रिय और बुद्धि से रहित हूं।’ मैं शरीर, इंद्रिय और बुद्धि से रहित हूं--इसे थोड़ा समझना पड़ेगा, क्योंकि इसमें तो बहुत भय मालूम पड़ेगा कि परमात्मा बुद्धि से रहित है। हम तो सोचते हैं मन में कि सारी बुद्धि उसकी है, सारी बुद्धिमत्ता उसकी है, सबसे ज्यादा बुद्धिमान, ज्ञान का सागर, अनंत ज्ञान, ऐसा हम सोचते हैं। यह सूत्र बहुत उलटी बात कहता है। यह कहता है: ‘बुद्धि से रहित!’ बुद्धि से रहित का अर्थ क्या है? बुद्धि का अर्थ होता है: विचार की व्यवस्था। बुद्धि का अर्थ होता है: विचार का उपकरण। बुद्धि का अर्थ होता है: विचार का संस्थान। लेकिन विचार अज्ञानी के लिए जरूरी है। जिसे पता नहीं है वह विचार करता है। जिसे पता है वह विचार कैसे करेगा? तो बुद्धि अज्ञानी का उपकरण है, ज्ञानी का उपकरण नहीं है। ज्ञानी बुद्धिरहित हो जाता है। बुद्धिरहित का मतलब यह है, कि बुद्धि का मतलब ही यह है कि कुछ मुझे पता नहीं है वह मुझे सोचना पड़ता है, तो सोचने की मेरे भीतर जो प्रक्रिया है, उसका नाम बुद्धि है। सोच-सोच कर मैं पता लगाता हूं। ऐसा समझें-- एक अंधा आदमी लकड़ी से टटोल-टटोल कर चलता है, क्योंकि उसके पास आंख नहीं है। इसलिए लकड़ी हाथ में रखता है, उससे टटोलता है। टटोल कर दरवाजा खोज लेता है। बुद्धि लकड़ी की तरह है अज्ञानी के हाथ में। उससे हम टटोलते हैं--कहां है दरवाजा? दरवाजा पता तो नहीं है, तो टटोलते हैं, टकराते हैं, भूल-चूक करते हैं, इसलिए बुद्धि का ढंग ही भूल-चूक करके सीखना है--ट्रायल एंड एरर। करो कोशिश, भूल करो, सीखो। अंधा यही कर रहा है। टटोलता है, यह दीवाल पाई, नहीं है; सिर टकरा गया, और जगह टटोला, और जगह टटोला। पच्चीस जगह टटोलता है, कहीं-कहीं खोज कर दरवाजा मिल जाता है, फिर उससे निकल जाता है। अंधे का भी टटोलना बंद होता जाएगा अगर उसी मकान में से रोज-रोज निकलेगा। दरवाजे का उसे अंदाज होने लगेगा, तो फिर वह ऐसे ही निकल जाएगा, टटोलेगा भी नहीं। लेकिन नये मकान में फिर टटोलना पड़ेगा। कभी आपने खयाल किया कि बुद्धि से आप विचार तभी करते हैं जब कोई चीज आपको पता नहीं होती। जब पता हो जाती है तो धीरे-धीरे बुद्धि का उपयोग आप बंद कर देते हैं। रोज वही काम जो करते हैं तो उसमें बुद्धि का उपयोग नहीं होता। जैसे एक आदमी कार ड्राइविंग सीखता है, तो पहले बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। फिर जैसे-जैसे, जैसे-जैसे अनुभव हो जाता है, बुद्धि बिलकुल छोड़ देता है। फिर वह सिगरेट पीता रहे, गाना गाता रहे, रेडियो सुनता रहे, बातचीत करता रहे, कार ड्राइव होती रहती है। अब इस अंधे को दरवाजा पता चल गया है। अब यह निकल जाता है। लेकिन अगर कहीं अचानक कोई दुर्घटना का क्षण आ जाए तो बुद्धि का फिर उपयोग करना पड़ता है। क्योंकि इसका कोई अभ्यास नहीं था। दुर्घटना का अभ्यास करिएगा भी कैसे? उसका अभ्यास हो नहीं सकता। वह तो घटती है। इसीलिए दुर्घटना कहते हैं। जिसका अभ्यास हो सके, उसका नाम दुर्घटना नहीं है। जिसका अभ्यास हो ही न सके और घटे, उसका नाम दुर्घटना है। इसलिए दुर्घटना में थोड़ी सी बुद्धि की जरूरत पड़ती है। तब एकदम से चौंककर आदमी सोचना शुरू करता है--क्या? बुद्धि अज्ञानी का उपकरण है। जैसे लकड़ी अंधे का उपकरण है। बुद्धि टटोलने की व्यवस्था है। ग्रोपिंग इन दि डार्क। अंधेरे में टटोलना। परमात्मा बुद्धिरहित है। उसका अर्थ है कि उसके लिए अंधेरा नहीं है, उसका अर्थ है कि उसे कुछ अज्ञात नहीं है। उसका अर्थ है कि जो भी है वह उसके सामने है। सोचने का कोई कारण नहीं है। इसलिए जिस उपकरण से सोचा जाता है, वह उपकरण होने की कोई जरूरत ही नहीं है। बुद्धि सीमित, अज्ञानी का उपकरण है। और जब तक आप सीमित और अज्ञानी हैं तब तक बुद्धि की जरूरत पड़ेगी। या जब तक आप बुद्धि की जरूरत बनाए रखेंगे तब तक आप सीमित और अज्ञानी बने रहेंगे। या तो हिम्मत करें बुद्धि को छोड़ देने की, तो शायद उस परमात्मा में छलांग लग जाए जो बुद्धिरहित है। आप भी बुद्धिरहित होकर ही उसमें उतर पाएंगे। अगर बुद्धि लेकर वहां गए तो परमात्मा का दरवाजा आपको न मिलेगा। इसलिए बुद्धिमान अक्सर उससे चूक जाते हैं। कभी-कभी कोई कबीर, कभी कोई नानक, कभी कोई मोहम्मद--न पढ़े, न लिखे, कभी किसी ने जाना ही नहीं था कि इनमें भी बुद्धि है--अचानक उसमें छलांग लगा जाते हैं। मोहम्मद को जब पहली दफे छलांग लग गई तो मोहम्मद को खुद ही भरोसा न आया कि मैं किसी को कहूंगा तो कोई मेरी मानेगा कि यह हो गया। तो मोहम्मद ने डरते-डरते अपनी पत्नी को यह बात बताई। डरता हूं किसी को बताने में ऐसा हो गया है। तो मोहम्मद की जो पहली अनुयायी थी वह उसकी पत्नी थी, मोहम्मद की पत्नी थी। और एक लिहाज से यह महान सफलता है। इस दुनिया में सबको परिवर्तित कर लेना आसान है, पत्नी को परिवर्तित करना बहुत मुश्किल है। इसमें बुद्ध को भी मुश्किल पड़ गई थी। मोहम्मद की यह अदभुत सफलता है। मनुष्य के इतिहास में... पुरुषों में जो कई सफलताएं गिनी जाएं उसमें इसको जरूर गिनना चाहिए। मोहम्मद की पहली अनुयायी उनकी पत्नी थी। फिर आहिस्ता-आहिस्ता मोहम्मद के निकटतम लोगों में मोहम्मद ने बात कही। और तब भी मोहम्मद को जो तकलीफ झेलनी पड़ी वह मोहम्मद के मुल्क के बुद्धिमान लोगों के द्वारा दी गई थी। क्योंकि बुद्धिमान यह मान न सके कि यह आदमी न पढ़ा, न लिखा, न बुद्धि का कोई सबूत देता है और इसको हो जाए, और हमें न हुआ हो। कबीर को जो तकलीफ हमारे मुल्क में झेलनी पड़ी, वह पंडितों के कारण झेलनी पड़ी। क्योंकि पंडित यह मान न सके कि यह जुलाहा, कपड़ा बुनता रहा अब तक, कपड़ा बेचता रहा सड़कों पर बैठ कर, अचानक यह परमज्ञानी हो गया। यह भरोसे की बात नहीं है। क्योंकि हमारा खयाल ही यह है कि ज्ञान जो है, वह बुद्धि के अभ्यास से होता है? निश्चित ही इस जगत के सारे ज्ञान बुद्धि के अभ्यास से होते हैं। लेकिन उस जगत का कोई भी ज्ञान बुद्धि के अभ्यास से नहीं होता। यहां बुद्धि सहयोगी है, वहां बुद्धि बाधा है। यहां बुद्धि मार्ग है, वहां बुद्धि दीवाल है। संसार में जाना हो तो बुद्धि को बढ़ाते चले जाना। वहां अंधे की लकड़ी की बहुत जरूरत पड़ेगी, क्योंकि अंधों का लोक है वह। वहां जितनी सजग लकड़ी होगी, जितनी संवेदनशील लकड़ी होगी, उतनी सफलता मिल पाएगी। लेकिन अगर परमात्मा की तरफ जाना हो तो इस लकड़ी को छोड़ देना। क्योंकि वहां अधों का कोई प्रवेश नहीं है। वहां लकड़ी से टटोल कर नहीं पहुंचा जाता। वहां इस लकड़ी को छोड़ कर ही पहुंचा जाता है। क्योंकि बाहर जाना हो तो टटोलना प ड़ता है, भीतर जाने के लिए टटोलना क्या है, वहां तो हम हैं ही। सब लकड़ी वगैरह छोड़ देनी है, सब यात्रा बंद कर देनी है और आदमी वहां पहुंच जाता है। यह सूत्र कीमती है कि मैं बुद्धि से रहित हूं। मैं शरीर से, इंद्रिय से, बुद्धि से रहित हूं। इंद्रियों की भी जरूरत दूसरे को जानने के लिए है। परमात्मा के लिए कोई भी दूसरा नहीं है। जैसा मैंने रात आपको कहा कि आप अपने को कैसे जानते हैं? बिना किसी इंद्रिय के। हां, दूसरे को जानते हैं तो इंद्रिय से जानते हैं। अगर परमात्मा एक है तो उसको इंद्रिय की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह दूसरा कोई है नहीं जिसे जाने, स्वयं को ही जानता है। शरीर भी नहीं है। शरीर का मतलब ही यह होता है। शरीर का आपने कभी खयाल न किया होगा कि क्या मतलब होता है। शरीर का मतलब होता है, आपके और विराट के बीच का संबंध। आपके चारों तरफ विराट फैला हुआ है, और आप यहां भीतर हैं, और आप दोनों के बीच जो संबंध का स्रोत है, वह शरीर है। ऐसा समझें कि आपके घर की दीवाल है, उससे आपके घर का कमरा बना हुआ है। लेकिन पृथ्वी की कोई दीवाल है? पृथ्वी में सब दीवालें हैं और सब मकान हैं, लेकिन पृथ्वी की कोई दीवाल नहीं है, क्योंकि किससे विभाजन करिएगा। आपके शरीर की जरूरत है, क्योंकि आपको सबसे विभाजित होने की जरूरत है। परमात्मा पूर्णता का नाम है, समस्त अस्तित्व का नाम है। उसकी कोई दीवाल नहीं हो सकती। ध्यान रहे दीवाल सदा दूसरे से पृथक करती है। अगर कोई दूसरा नहीं है तो इस अस्तित्व का कोई शरीर नहीं हो सकता। शरीर दीवाल है। पड़ोसी से भेद पैदा करवाती है। परमात्मा के लिए किसी शरीर की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है जिसका शरीर हो, जिससे भेद करना हो। समस्त अस्तित्व शरीरहीन है। क्षुद्र के शरीर होते हैं, विराट का शरीर नहीं होता। क्षुद्र का शरीर जरूरी है, अन्यथा आपको पता ही नहीं चलेगा आप क्या हैं, कौन हैं, कहां हैं? और इसी सूत्र से यह भी खयाल में ले लेना जरूरी है कि जब तक आपको लगता है आप शरीर हैं, तब तक आप क्षुद्र ही बने रहेंगे। जिस दिन आपको यह बोध होना शुरू होगा कि शरीर जरूर है मेरे पास, लेकिन मैं शरीर नहीं हूं, उस दिन ही आप शरीर के बाहर फैलना शुरू हो गए। जिस दिन आपको भी अनुभव होगा कि मैं अशरीरी हूं, उस दिन आप परमात्मा के साथ एक हो गए। जब तक आप इंद्रियों पर भरोसा रखेंगे तब तक आप संसार को जानेंगे। जिस दिन आप इंद्रियों का भरोसा छोड़ कर खोज करेंगे, उस दिन आप परमात्मा को जानेंगे। जब तक आप बुद्धि से चलेंगे, तब तक आप अज्ञान में ही रहेंगे। जिस दिन बुद्धि को छोड़ कर चलेंगे, उस दिन ही ज्ञान की शुरुआत है।
Osho's Commentary
यह सूत्र थोड़ा अजीब सा मालूम पड़ेगा। क्योंकि मैं ही वेदों का उपदेश करूं और वेद मेरी ही चर्चा करें! मैं ही उपनिषद रचूं और उपनिषदों में मेरी ही चर्चा हो! अपनी ही बात, अपनी ही अभिव्यक्ति! ऊपर से देखने पर सूत्र अजीब मालूम पड़ेगा, लेकिन थोड़े गहरे में देखेंगे तो बहुत महत्वपूर्ण है।
कुछ सूत्र के मौलिक आधार समझ लेने चाहिए।
पहला तो यह कि जो भी है, परमात्मा है। तो चाहे चर्चा की जाए और चाहे चर्चा करने वाला हो; चाहे दृश्य बने और चाहे द्रष्टा हो; चाहे मूर्ति हो और चाहे मूर्तिकार हो; अगर एक ही है अस्तित्व, तो फिर मूर्तिकार अपनी ही मूर्ति बना रहा है। और गीतकार अपना ही गीत गा रहा है। और वेद का जो निर्माता है, वही वेद का विषय भी होगा। क्योंकि दो का कोई उपाय नहीं है। अगर अस्तित्व एक ही है तो फिर सभी कुछ उस एक से ही संबंधित है।
इसलिए इस अजीब से दिखने वाले सूत्र में महत्वपूर्ण सूचना दी गई है, और वह सूचना यह है कि जो कुछ भी हो रहा है यहां, वह सभी मैं हूं। उसमें कुछ भी वर्जित नहीं है। हमारा मन कठिनाई में पड़ेगा। क्योंकि यहां बहुत कुछ हो रहा है जिसे हम वर्जित करना चाहेंगे और हम कहना चाहेंगे कि यह न हो तो बेहतर है। बहुत कुछ है, जो भी सोचेगा वह पाएगा कि जीवन में न होता तो जीवन बेहतर होता। लेकिन हमें जीवन की गहराइयों का पता नहीं है, इसलिए ऐसा विचार उठता है। कौन नहीं होगा जो चाहे कि अगर जगत में असाधु न हों तो बेहतर है, पाप न हों तो बेहतर है। यह बहुत साफ दिखाई पड़ने वाली बात भी, बहुत गलत है, क्योंकि साधु हो ही सकता है तब जब असाधु भी हो। और पाप हो तो ही पुण्य हो सकता है। और अगर बीमारी न हो तो स्वास्थ्य के होने का कोई भी उपाय नहीं है। और अगर मृत्यु न हो तो जन्म असंभव हो जाएगा।
जीवन के गणित को अगर हम समझें तो जीवन सदा ही, द्वंद्व के बीच एक संतुलन है। उस दो में से हम एक को काटने की इच्छा रखते हैं। तो हमें पता नहीं है कि जीवन का संतुलन बिखर जाएगा तत्काल।
इधर मैं मनुष्य के बुद्धि-अंक के संबंध में कुछ अध्ययन करता था। आई-क्यू के संबंध में, इंटेलीजेंस कोशियंट के संबंध में। हर आदमी की बुद्धि की एक गणना है। हर आदमी की बुद्धि मापी जा सकती है। तो बुद्धि-अंक उपलब्ध हो जाता है। पर बड़ी हैरानी का अनुभव मुझे हुआ कि अगर सौ आदमियों की बुद्धि मापी जाए तो एक आदमी उसमें प्रतिभाशाली होता है, जिसको जीनियस कहें। और एक आदमी मूढ़ होता है, जो जीनियस के बिलकुल विपरीत है। एक। एक होता है प्रतिभाशाली, एक होता है महामूढ़। दो महामूढ़ नहीं होते हैं, दो प्रतिभाशाली नहीं होते हैं। अगर दो प्रतिभाशाली हों तो दो महामूढ़ होते हैं। अगर जगत की पूरी बुद्धि की गणना की जाए तो अनुपात है उसमें, बड़ी हैरानी की बात है, कि एक प्रतिभाशाली के लिए एक महामूढ़ अनिवार्य है। अगर दस विलक्षण प्रतिभा के लोग होते हैं, प्रतिभा से नीचे, तो दस मूढ़ के ऊपर मूर्ख होते हैं। और ये अनुपात ऐसा ही चलता है। पचास व्यक्ति उस तरफ बंटे होते हैं, पचास व्यक्ति इस तरफ बंटे होते हैं। और इस अनुपात में कभी भी फर्क नहीं पड़ता।
तो इसका मतलब यह हुआ कि बुद्धि भी अबुद्धि के साथ ही इस जगत में खिल सकती है। और समान अनुपात में। नहीं तो नहीं खिलती। इसका मतलब हुआ कि एक बुद्धिमान जब इस जगत में आता है तो अपने साथ एक महामूढ़ को ले आता है। इसका यह भी मतलब हुआ कि जब भी एक महामूढ़ पैदा होता है तो एक बुद्धिमान को पैदा होने का अवसर बनाता है। इसलिए बुद्धिमान को अलग करने की, और मूढ़ को अलग करने की जरूरत नहीं है, वे एक ही तराजू के दो पलड़े हैं। और उनमें से एक को काटा तो दूसरा फौरन गिर जाता है। इसलिए बुद्धिमान को मूढ़ के प्रति अनुगृहीत होना चाहिए, उसके बिना वह हो नहीं सकता। और आज नहीं कल हमें पता चलेगा कि जीवन में सभी चीजें इसी तरह संतुलित हैं। यहां एक राम पैदा होता है तो रावण के बिना नहीं पैदा होता। रावण को तत्काल तराजू पर आ जाना पड़ता है। हमारा मन करता है, रावण न हो। लेकिन रावण के बिना राम नहीं हो सकते।
जीवन एक संतुलन है। यहां भलाई और बुराई दो पलड़े हैं तराजू के, एक ही तराजू के। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि बुराई मिट जाए, असली सवाल यह नहीं है कि भलाई बढ़ जाए। असली सवाल यह है कि बुराई और भलाई जिस सूत्र से जुड़े हैं, वह सूत्र हमें दिखाई पड़ जाए, तो फिर न बुराई बुराई रह जाती है, न भलाई भलाई रह जाती है। तब हम जानते हैं कि यह तो जीवन की अनिवार्यता है। जैसे कि अगर हम एक मकान में एक आर्च बनाते हैं, एक दरवाजा बनाते हैं गोल, तो दोनों तरफ उलटी ईंटें लगाते हैं। और उन्हीं उलटी ईंटों के सहारे पूरा भवन खड़ा हो जाता है उसके ऊपर। कोई सोच सकता है कि हम एक सी ईंटें लगा दें, उलटी ईंटें न लगाएं तो फिर भवन खड़ा नहीं होता। तत्क्षण गिर जाएगा। वे उलटी ईंटें एक-दूसरे को साध लेती हैं। और उन्हीं उलटी ईंटों का वजन जब संतुलित हो जाता है, तो महाशक्ति पैदा हो जाती है।
इस जगत की सारी ऊर्जा द्वंद्व से निर्मित है। और द्वंद्व से ही संचालित है। इसलिए ऐसा दिन कभी भी नहीं आएगा जिस दिन राम हो सके रावण के बिना। इसमें निराश होने का कोई भी कारण नहीं है। और अगर यह खयाल में आ जाए तो फिर रावण भी बुरा नहीं मालूम पड़ेगा। फिर राम और रावण एक ही खेल के दो हिस्से मालूम पड़ेंगे। उनमें से एक भी हट जाए तो खेल बंद हो जाता है। जरा रामलीला रावण के बिना करके देखें तब पता चलेगा! तो वह रामलीला ही नहीं है, राम-रावण लीला है। अगर उसको ठीक से समझें तो वे दोनों एक ही आर्च की विरोधी ईंटें हैं जिन पर सब सम्हला हुआ है। हमारा राम से मोह है इसलिए हमने रामलीला नाम रख लिया है। लेकिन अगर यह मोह को हम छोड़ें और चीजों को सीधा देखें, तो हम राम-रावण लीला कहेंगे।
इस जगत में अगर एक ही है, तो उस एक ने ही अपने को दो में विभाजित करके यह द्वंद्व, यह ऊर्जा पैदा की है। ईंटें सब एक जैसी हैं। लेकिन उलटी रख दिए जाने पर आर्च बन जाता है, फिर भवन उसके ऊपर जा सकता है। ईंटें एक ही हैं। राम और रावण दो तरह की ईंटों से नहीं बने हुए हैं, बुराई और भलाई दो तरह की ईंटों से नहीं बनी हुई हैं, एक ही तरह की ईंटों से बनी हुई हैं। सिर्फ एक दूसरे के विपरीत एक ही तरह की ईंटें रख दी जाती हैं। साधु कोशिश में रहते हैं कि असाधु दुनिया से मिट जाए। उन्हें पता नहीं है कि असाधु के कारण ही वे हैं। इसलिए उनकी कोशिश चलती रहती है लेकिन असाधु मिटता नहीं। असाधु मिट नहीं सकता। असाधु उसी दिन मिट सकता है जिस दिन साधु भी न रह जाएं, उसके पहले नहीं मिट सकता। और वह दुनिया बड़ी नीरस, अर्थहीन होगी जिस में साधु-असाधु दोनों न हों।
दुनिया में तो वे दोनों रहेंगे, क्योंकि दुनिया एक लीला है और इस लीला में द्वंद्व चलेगा। लेकिन आप अगर समझ जाएं और अगर आपको यह दिखाई पड़ जाए कि यह द्वंद्व लीला है और द्वंद्व के पीछे जो एक ही छिपा है वह अनुभव में आ जाए, तो आपके लिए यह लीला समाप्त हो जाएगी। और जिसके लिए लीला समाप्त हो गई वह संसार के पार हो जाता है। जिसके लिए यह लीला समाप्त हो गई, वह संसार के पार हो जाता है। और जब तक लीला में आपका चुनाव है तब तक आप संसार के भीतर रहेंगे। जिसने रावण के खिलाफ राम को चुना है, या राम के खिलाफ रावण को चुना है, वह संसार में रहेगा। अभी उसे जीवन का आत्यंतिक संतुलन समझ में नहीं आया है। इसमें कोई चुनाव नहीं है राम और रावण में। यह लीला है, यह समझ में आना चाहिए। यह द्वंद्व ही जगत का खेल है। इस द्वंद्व के भीतर वह जो एक है, उसका दिखाई पड़ जाना है।
इस सूत्र में बहुत तरह से उस एक की खबर दी गई है--
‘मैं ही वेदों का उपदेश करता हूं, मैंने ही उपनिषदें रचीं और सारे वेद मेरी ही चर्चा करते हैं।’
मैं अपनी ही चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि कोई दूसरा तो है नहीं। कभी आपने किसी आदमी को अकेले में अकेले ही ताश खेलते देखा है? खेलते हैं लोग। दोनों बाजियां फैला लेते हैं। इस तरफ से भी चलते हैं और उस तरफ से जवाब भी देते हैं? ठीक यह जगत परमात्मा का ऐसा ही खेल है। दोनों बाजियां उसकी हैं। वही इस तरफ से चलता है, वही उस तरफ से उत्तर देता है। इसमें दूसरा नहीं है। लेकिन यही भारतीय मनीषा की दृष्टि है। ऐसी दृष्टि भारत के बाहर और कहीं उपलब्ध नहीं हो सकी। सभी जगह इस द्वंद्व को, इस दिखाई पड़ने वाले द्वंद्व को आत्यंतिक मान लिया गया है। इसके भीतर एकता नहीं है।
ईसाइयत, यहूदी या इस्लाम ईश्वर और शैतान को आत्यंतिक इकाइयां मान लिए हैं। उनके भीतर कहीं कोई जोड़ नहीं है, कहीं कोई तालमेल नहीं है। भारत में भी जैनों ने शैतान और ईश्वर में तो विभाजन नहीं किया, लेकिन जगत और मोक्ष में विभाजन कर लिया है। वे भी मानते हैं कि जगत और मोक्ष में कोई तालमेल नहीं है, ये अलग इकाइयां हैं। इसलिए जैन द्वैतवादी हैं। वे कहते हैं: दो का अस्तित्व तो है ही--एक जगत है और एक ईश्वर। एक जगत और एक मोक्ष।
इस लिहाज से जैन और मुसलमान और ईसाई और यहूदी सहमत हैं कि जगत दो में बांटा गया है--एक नहीं है।
हिंदू-चिंतना जगत को कहती है कि दो में बंटा हुआ है, लेकिन जो बंटा हुआ है वह एक है। क्योंकि हिंदू-चिंतना का यह खयाल है कि अगर जगत दो में बंटा है, तो इस जगत में शांति का फिर कोई उपाय नहीं है। कभी भी कोई उपाय नहीं है। क्योंकि ये दो अगर आत्यंतिक इकाइयां हैं तो संघर्ष फिर तो अनिवार्य होगा। फिर सदा होगा। कभी ईश्वर जीतेगा, कभी शैतान जीतेगा; कभी बुराई जीतेगी, कभी भलाई जीतेगी; लेकिन इसका अंत कैसे होगा? क्योंकि बुराई अपनी ही हैसियत से अलग शक्ति है, उसको नष्ट नहीं किया जा सकता है, सिर्फ हार-जीत हो सकती है।
और भलाई भी अपनी ही हैसियत की एक शक्ति है, वह भी अंतिम रूप से विजेता नहीं हो सकती, क्योंकि बुराई की शक्ति नष्ट नहीं की जा सकती। वह भी शक्ति है। दोनों शक्तियां हैं। दोनों शाश्वत हैं। शैतान और ईश्वर, दोनों शाश्वत हैं। संसार और मोक्ष, दोनों शाश्वत हैं। तो इसमें अंत कैसे होगा? और अगर एक व्यक्ति आज संसार में पड़ गया है, किसी तरह झगड़ कर, जीत कर बाहर निकल जाए, कल नहीं पड़ेगा इसका क्या उपाय है? क्योंकि किसी दिन पड़ ही गया था, कल फिर पड़ सकता है। और संसार मौजूद रहेगा। संसार तिरोहित नहीं होता। संसार फिर खींच सकता है। अगर इस बार खींचा है तो फिर क्यों नहीं खींच सकता है? तो संघर्ष शाश्वत हो जाएगा। दो विरोधी शाश्वत शक्तियों के साथ संघर्ष भी शाश्वत हो जाएगा। और इसका कोई अंत नहीं है।
इसलिए हिंदू-चिंतना ने एक बहुत ही अदभुत बात कही है और वह यह कि यह संघर्ष खेल है, शाश्वत नहीं है। यह संघर्ष सिर्फ दिखावा है, भीतरी नहीं है। यह संघर्ष केवल मन-बहलाव है। इसलिए भारत ने कहा, विशेषकर हिंदू-चिंतन ने, कि संसार एक लीला है, एक खेल है। उसे वास्तविकता देने का कोई कारण नहीं है। अगर खेल है तो खेल बंद किया जा सकता है। और अगर खेल है और दोनों विपरीत के भीतर एक ही छिपा है, तो उसका अनुभव होते ही खेल विलीन हो जाएगा। और न भी विलीन हो, खेल ही खेल है ऐसा पता चल जाए, तो भी मुक्ति हो गई।
इसलिए हिंदू-चिंतन ने दो तरह के मुक्त माने हैं। एक, जिसको कहा है जीवनमुक्त। जीवनमुक्त उसे कहा है, जो खेल में खड़ा है और जानता है कि खेल है। और एक को कहा है--मुक्त। जो खेल को खेल जान कर खेल के बाहर हो गया है।
दोनों तरफ मैं ही हूं। दोनों बाजुएं मेरी हैं। इसकी गहरी निष्पत्तियां हुईं। इसका मतलब सब हार मेरी है, सब जीत मेरी है। इसका यह मतलब हुआ कि न मैं कभी हारता हूं, न मैं कभी जीतता हूं, क्योंकि खिलाड़ी मैं अकेला हूं। इसका यह मतलब हुआ कि संसार और मोक्ष के बीच का फासला टूट गया। इसका यह मतलब हुआ कि संसार में भी रह कर कोई मुक्त हो सकता है। कोई विरोध न रहा।
जगत को एक अनिवार्य शत्रुता की तरह देखने का कोई कारण नहीं है। तब जगत एक गहनता में एक का ही खेल है। तो फिर द्वंद्व में तोड़ने का और तोड़ कर तनाव से भरने की कोई जरूरत नहीं है। ध्यान रहे, जब हम जगत को दो में तोड़ते हैं, तो हम मनुष्य को भी दो में तोड़ देते हैं। तो उसका शरीर और उसकी आत्मा दुश्मन हो जाती हैं। तब उसकी इंद्रियां और उसकी चेतना दुश्मन हो जाती हैं। यह दुश्मनी फिर भीतर भी तनाव पैदा करती है और इस तनाव के बीच सेतु बनाने का कोई भी उपाय नहीं है। इस तनाव से भरा हुआ व्यक्ति या तो इंद्रियों को नष्ट करने में लग जाता है और या फिर आत्मा को नष्ट करने में लग जाता है। और दोनों ही स्थिति में दुख पाता है।
भारतीय मनीषा की दृष्टि है कि जब इन दो को हम दो में बांट ही लेते हैं, तभी तनाव पैदा हो जाता है और अशांति पैदा हो जाती है। इन दो को दो में बांटो ही मत। इनके पीछे एक ही छिपा है।
इस एक का बोध हर दिशा से हो सके, इसलिए सूत्र में कहा है: ‘मैं ही वेद का उपदेश करता, मैं ही उपनिषद रचता, और सारे वेद और उपनिषद मेरी ही चर्चा करते हैं।’ क्योंकि मेरे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। ‘मैं जन्म और नाश से परे हूं। पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’
‘पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’
ऐसा वक्तव्य और कहीं उपलब्ध किसी भी धर्मशास्त्र में होना असंभव है। क्योंकि सभी धर्मशास्त्रों ने परमात्मा को पुण्य के साथ एक कर लिया है और पाप को वर्जित कर लिया है। पाप को वर्जित करने की वजह से शैतान को निर्मित करना पड़ा है, क्योंकि पाप फिर किसके पल्ले जाए और कहां जाए। बुराई जगत में है। भलाई हम परमात्मा को दे देते हैं, फिर बुराई कहां जाए।
ईसाइयत सदा से कठिनाई में रही है कि जगत में बुराई है, इसका क्या करें? कौन इसके लिए उत्तरदायी हो? परमात्मा को उत्तरदायी बनाने की हिम्मत नहीं पड़ती, क्योंकि अगर परमात्मा भी बुराई कर रहा है तो फिर बुराई से छूटने का उपाय नहीं सूझता। और अगर परमात्मा भी बुराई कर रहा है तो वह कैसा परमात्मा है। अंग्रेजी में गॉड और गुड एक ही जगह से निष्पन्न होते हैं। वह शुभ है, वही ईश्वर है। इसलिए वस्तुतः ईश्वर का अंग्रेजी में अनुवाद गॉड करना ठीक नहीं है। क्योंकि यह जो ईश्वर है यह कहता है: पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते हैं। मैं दोनों में हूं और दोनों के पार भी हूं।
इसमें एक बात और समझ लेनी जरूरी है कि छू नहीं सकते, इसका यह मतलब नहीं है कि मैं दोनों से दूर हूं। क्योंकि अगर दूर हो तो छूने का कोई सवाल ही नहीं है। इसका साफ मतलब है कि मैं दोनों के बीच हूं और छू नहीं सकते हैं। नदी से मैं गुजरता हूं और पानी मुझे छूता नहीं। काली कोठरी से मैं गुजरता हूं और काला दाग मुझे नहीं लगता है। अगर मैं काली कोठरी से गुजरता ही नहीं हूं तो छूने नहीं छूने का सवाल नहीं है। यह सूत्र कि पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते, यह कहता है कि पाप और पुण्य में मैं ही हूं, फिर भी वे मुझे छू नहीं सकते। मैं उन दोनों में होकर भी दोनों के पार हूं।
तो परमात्मा का यह अतिक्रमण करने वाला रूप, यह ट्रांसेंडेंस का रूप, शुभ और अशुभ दोनों के पार एक अनूठी दृष्टि है। यहां हम परमात्मा को शुभ के साथ एक नहीं करते, इसलिए हमें शैतान बनाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन तब हमारा परमात्मा जटिल हो जाता है। क्योंकि शुभ और अशुभ दोनों ही उसी से निष्पन्न होते हैं। स्वास्थ्य भी वही देता है, बीमारी भी वही देता है। और जन्म भी वही और मृत्यु भी वही। और राम भी उससे आते हैं और रावण भी उससे आते हैं। और जहर भी उससे ही बनता है और अमृत भी। तब हमारे परमात्मा की धारणा जटिल हो जाती है।
एक मुसलमान मित्र मेरे पास आए थे, विचारशील हैं। वे कह रहे थे कि और तो सब ठीक है, यह हमारी समझ में नहीं पड़ता कि अगर बुराई भी परमात्मा कर रहा है, तो वह क्यों कर रहा है? एक छोटा बच्चा पैदा होता है और पैदा होते से ही मर जाता है। तो अगर यह परमात्मा ही कर रहा है तो यह क्यों कर रहा है? बीमारी क्यों है? गरीबी क्यों है? दुख क्यों है? पीड़ा क्यों है? उनका सवाल संगत दिखाई पड़ता है। और हिंदू-विचार से निरंतर ईसायइत और इस्लाम ने यही पूछा है कि यह क्यों है? उनको आसानी है, क्योंकि वे कह सकते हैं कि यह शैतान के कारण है।
मैंने उस मुसलमान मित्र से पूछा कि पहले तुम मुझे यह बताओ कि यह शैतान तुम्हारे परमात्मा की बिना आज्ञा के जगत में है? शैतान क्यों है? इससे हल कहां होता है? तुम सिर्फ सवाल को एक कदम पीछे हटाते हो। हल कहां होता है। शैतान क्यों है? छोड़ो, बुराई क्यों है यह हिंदू जवाब नहीं दे पाते हैं, तुम मुझे कहो कि शैतान क्यों है?
दो ही उपाय हैं। या तो तुम मानो कि यह परमात्मा की आज्ञा से है, परमात्मा ने इसे बनाया। और अगर परमात्मा शैतान को बना रहा है तो इसमें चक्कर क्यों लेना, बीमारी को सीधा क्यों नही बना सकता? शैतान को एजेंट बनाए, फिर शैतान बीमारी बनाए, इसका क्या प्रयोजन है? और या तुम यह कहो कि यह शैतान परमात्मा से स्वतंत्र शक्ति है, परमात्मा ने उसे बनाया ही नहीं है। यह भी उसी हैसियत से है जैसा परमात्मा है। तब तुम शैतान को एक दूसरा परमात्मा मान रहे हो। तब मैं तुमसे पूछता हूं कि तुम्हें पक्का है कि इन दोनों परमात्मा में कौन जीतेगा? जहां तक जगत का अनुभव कहता है, वहां तक तो यही कहता है कि शैतान रोज जीतता है और परमात्मा रोज हारता है? तो अंततः परमात्मा जीतेगा, यह तुम्हें किसने कहा? और क्या वजह है सोचने की कि परमात्मा अंततः जीतेगा? शैतान रोज जीतता दिखाई पड़ता है, परमात्मा जीतता दिखाई नही पड़ता!
जिसे तुम अवतार कहते हो, उसे एक गुंडा छुरा मार दे तो अवतार मर जाता है। जिसे तुम ईश्वर-पुत्र कहते हो, जीसस को, सूली पर लटका दिया जाता है। कहां जीतता दिखाई पड़ता है तुम्हारा परमात्मा! लगता तो ऐसा है कि शैतान ज्यादा बड़ा ईश्वर है फिर। और जीत उसके हाथ में मालूम होती है। हल तो कुछ भी नहीं हुआ है शैतान को मानने से।
लेकिन हिंदू-चिंतना कुछ और जवाब देती है। हिंदू-चिंतना का कहना यह है कि जिसे तुम बुराई कहते हो, वह तुम्हारी दृष्टि में बुराई है। अगर तुम पूरे अस्तित्व को सोचो तो वह बुराई नहीं है। बुराई तुम्हारा दृष्टिकोण है।
मैंने उनसे पूछा: एक छोटा बच्चा पैदा हुआ और मर गया, तुम कहते हो कि बुरा है। क्या तुम्हें पक्का पता है कि मरता नहीं तो ज्यादा अच्छा होता? मर गया तो ज्यादा बुरा हुआ? क्या तुम मानते हो कि यह मरता नहीं, तो जगत में शुभ फलित होता। एक हिटलर मर सकता था पैदा होकर। अगर हिटलर पैदा होकर मर जाता, तो हम कहते: बहुत बुरा है यह जगत! लेकिन हमें पता नहीं था कि यह जीकर क्या कर सकता है और क्या हो सकता है!
हमें पूरे का कोई पता नहीं है। हम अंश से अनुमान कर रहे हैं। हमारी हालत ऐसी है कि हम किसी उपन्यास से एक पन्ना फाड़ लें और उसको पढ़ें और पूरे उपन्यास के संबंध में वक्तव्य दें। या कविता की एक पंक्ति काट लें, उसे पढ़ें और पूरी कविता के संबंध में वक्तव्य दें। यह जगत एक विराट महाकाव्य है, जिसका न हमें ओर का पता है न छोर का। इसमें हम बीच की कोई एक घटना पकड़ लेते हैं और उससे हम हिसाब लगाते हैं। वहीं भूल हो जाती है। एक घटना को पकड़ कर हिसाब नहीं लगाया जा सकता। घटना अकेली नहीं है, एक महान जाल का हिस्सा है। एक विराट श्रृंखला का हिस्सा है।
तो एक बच्चा पैदा हुआ, वह क्या हो सकता है, इसका हमें कोई पता नहीं है। अगर एक हिटलर मर जाए और हमें पता हो कि यह हिटलर हो सकता है, तो कोई भी नहीं कहेगा कि यह बुरा हुआ। जर्मन एक विचारक ने लिखा है कि ऐसे ही क्षणों में आदमी की नीति और आदमी की समझ उथली पड़ जाती है। अगर हिटलर की मां अपने बच्चे की गर्दन दबा दे तो यह महापुण्य का कार्य होगा। लेकिन इसे कोई महापुण्य मानेगा नहीं, उसकी मां तो अदालत में सजा काटेगी। और सारी दुनिया उसकी निंदा करेगी कि यह कैसी मां है! और ठीक ही है, क्योंकि हमें कुछ भी तो पता नहीं है कि यह बच्चा क्या हो सकता है? क्या इसकी संभावना है?
फिर यह भी हम छोड़ दें कि यह बच्चा क्या हो सकता है, यह भी कहां पक्का पता है कि जीना शुभ है और मर जाना अशुभ है। यह किसने कहा? यह कैसे जाना? क्योंकि मरा हुआ आदमी कुछ लौट कर आपसे कहता नहीं है कि मैं बड़े दुख में पड़ गया हूं। और संभावना तो यह है कि अगर मुर्दे दुख में पड़ते हों तो जरूर लौट कर कहेंगे, क्योंकि दुख की बातें कहने की इतनी इच्छा होती है! मालूम ऐसा पड़ता है कि मुर्दे ऐसे सुख में पड़ जाते हैं कि लौट कर कहने तक का उपद्रव लेने की जरूरत नहीं रह जाती। पर कौन तय करेगा कि मृत्यु दुख है?
एक तो बात साफ है कि जीवन में तनाव हैं, दुख हैं, संताप हैं, लेकिन मृत्यु में तो विश्राम है, यह तो साफ है। दिन भर आप दौड़ते हैं, भागते हैं, परेशान होते हैं, रात सोकर विश्राम पाते हैं। मृत्यु एक महानिद्रा है। किसने कहा कि यह दुख में पड़ गया? यह अशुभ क्यों है?
यह अशुभ इसलिए मालूम पड़ता है कि मेरा बेटा मर गया। यह अशुभ इसलिए नहीं मालूम पड़ता कि कोई मर गया, यह अशुभ मालूम पड़ता है कि मेरा कोई मर गया। यह मेरे का कुछ हिस्सा मर गया, इसलिए अशुभ मालूम पड़ता है। यह अशुभ इसलिए मालूम पड़ता है कि इस बेटे के साथ मेरी बहुत सी महत्वाकांक्षाएं पैदा हुई थीं, वे सब मर गईं। इस बेटे के साथ मैंने जगत में अपने अहंकार को पूरा करने के लिए न मालूम कितनी कल्पनाएं बांधी थीं, वे सब मर गईं।
लेकिन कौन कहता है कि महत्वाकांक्षाओं का मर जाना बुरा है? और कौन कहता है कि मेरे अहंकार की पूर्ति न हो पाई, यह बुरा है? और कौन कहता है कि मेरा हिस्सा कुछ टूट गया, यह बुरा है? क्योंकि जो जानते हैं वे तो कहते हैं कि जिस दिन सब-कुछ मेरा टूट जाए, मेरा जैसा मेरे भीतर कुछ रहे ही नहीं, तो ही मैं परमानंद को उपलब्ध होऊंगा। यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि हम किस चीज को बुरा कहते हैं, किस चीज को भला कहते हैं।
यह मनुष्य की चिंतना है कि क्या बुरा है और भला है। परमात्मा की तरफ से जहां विराट का पूरा बोध है, जहां पूरा दिखाई पड़ रहा है, वहां बुरा और भला का सवाल नहीं है; वहां बुरा और भला है ही नहीं।
इसे हम यूं समझें।
मैंने सुना है, कैनेथ वॉकर लंदन का एक बड़ा सर्जन था। उसने एक बार किसी मरीज की किसी बीमारी का ऑपरेशन किया और कोई ग्रंथि भीतर बन गई थी उसको काट कर बाहर निकाला। वह बीमारी असाधारण बीमारी है, कभी करोड़ों में एक आदमी को होती है। मरीज के रिश्तेदार बाहर बैठ कर रो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं। और कैनेथ वॉकर ऐसी संलग्नता से लगा है ऑपरेशन में जैसे कोई चित्रकार चित्र बना रहा हो। और उसकी प्रफुल्लता, उसकी ताजगी! उस मरीज से उसका कोई संबंध ही नहीं है। वह तो एक बहुत अनूठी बीमारी उसके हाथ में लग गई है, जो कभी करोड़ों में एक को होती है और कभी एकाध सर्जन को सौभाग्य मिलता है उस बीमारी को ऑपरेट करने का! वह उसमें ही संलग्न है। वह इतना प्रफुल्लित, इतना आनंदित है, उसकी जिंदगी का बड़े से बड़ा क्षण आ गया! और जब उसने ग्रंथि काट कर बाहर निकाली और टेबल पर रखी तो उसके मुंह से जो शब्द निकले, वह थे--हाउ ब्यूटिफुल! वह जो ग्रंथि थी,
वह जो बीमारी की गांठ थी, उसने जब उसे टेबल पर रखा और देखा तो उसके मुंह से जो शब्द निकले वे यह थे कि हाउ ब्यूटिफुल।
दृष्टि पर निर्भर करता है। किसी भयंकर बीमारी की गांठ किसी कलाविद चिकित्सक को सुंदर मालूम पड़ सकती है। सुंदर है या नहीं, कहना मुश्किल है। जिसे हम बीमारी कहते हैं... सूफी फकीर हुआ, सरमद। उसको नासूर हो गया था हृदय में और उसमें कीड़े पड़ गए थे। और जब वह मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए झुका तो कीड़े नीचे गिर गए। तो कथा है कि सरमद ने कीड़े उठा कर वापस नासूर में रख लिए। लोगों ने कहा: सरमद, यह क्या पागलपन करते हो? सरमद ने कहा कि जो मेरी मौत है, वह इनकी जिंदगी है। लेकिन कौन निर्णय करे कि कौन सी जिंदगी बेहतर है। तो मैं नमाज पढ़ना बंद कर दूंगा, क्योंकि यही बेहतर है कि मैं अपनी ही जिंदगी को बदतर समझूं बजाय इनके, क्योंकि इनकी जिंदगी के बाबत मैं कैसे निर्णय लूं? तो सरमद ने नमाज बंद कर दी, क्योंकि झुकेगा, कीड़े गिर जाएंगे।
अब यह अजीब आदमी है। दृष्टि की बात है। क्योंकि उसने कहा कि यह मेरी जिंदगी जो है, वह इनकी मौत है। अगर मैं बचना चाहूं तो ये कीड़े मरेंगे। इनको मारना पड़ेगा। लेकिन किसकी जिंदगी इस अंतिम हिसाब में उपयोगी है, कौन जाने! एक बात पक्की है कि अगर भूल ही करनी हो तो अपनी तरफ करनी उचित है। इन कीड़ों की तरफ! पता नहीं ये किस प्रयोजन से हैं? इनका भी जीवन है।
आपकी जो बीमारी है, वह न मालूम कितने जीवाणुओं का जीवन है। और आपकी जो जिंदगी है, पता नहीं कितनों के लिए बीमारी हो। आपने उस तरह कभी नहीं सोचा होगा कि मेरी जो जिंदगी है, वह न मालूम कितनों के लिए बीमारी हो। मेरा होना न मालूम कितनों के लिए उपद्रव हो।
नहीं, हम जहां से सोच रहे हैं वहां से शुभ और अशुभ दिखाई पड़ रहा है। अगर परमात्मा की आंख हमारे पास हो जो सारे विस्तार को युगपत देख ले, छोर दोनों दिखाई पड़ जाएं, सारा विस्तार इकट्ठा दिखाई पड़ जाए, पूरा अस्तित्व झलक में आ जाए, तो वहां शुभ और अशुभ कुछ भी न होगा। शायद शुभ और अशुभ वहां ताना-बाना होगा। जैसा कोई जुलाहा कपड़ा बुनता है तो एक आड़ा धागा डालता है और एक सीधा धागा डालता है। और दोनों से मिल कर कपड़ा बनता है। वह जो ताना-बाना है, हमारी इच्छा है कि हम सीधा ही सीधा बुन दें। तो फिर कपड़ा निर्मित नहीं होता। या हमारी इच्छा है हम तिरछा ही तिरछा बुन दें, तो भी कपड़ा निर्मित नहीं होता। धागे एक दूसरे के विपरीत पड़ कर, धागे एक दूसरे से गुंथ कर, एक दूसरे से पार होकर कपड़े को निर्मित करते हैं।
यह सारा जगत एक चादर की तरह है, जिसमें शुभ और अशुभ ताने-बाने की तरह बुने हुए हैं। इसमें बुरे आदमी की भूल यही है कि वह सोचता है कि सारे जगत को मैं बुराई में डुबा दूं। और भले आदमी की भूल भी यही है कि वह सोचता है सारे जगत को मैं भलाई में डुबा दूं। ये दोनों ही आदमी हैं, और इन दोनों को परमात्म-बोध नहीं है। परमात्म-बोध जिसे है, वह जगत जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेता है। न उसे बुराई में डुबाने की आकांक्षा है, न उसे भलाई में डुबाने की आकांक्षा है।
इसलिए संत का एक नया ही रूप भारतीय मन में है, वह साधु का नहीं है। साधु वह है जो असाधु के विपरीत है। संत वह है जो किसी के विपरीत नहीं है। समग्र स्वीकार में है। जो भी है, ठीक है। संत वह है जो सर्व स्वीकार में है। जो भी है, ठीक है। बुराई भी ठीक है, भलाई भी ठीक है। पाप भी ठीक है, पुण्य भी ठीक है। यह अति कठिन है।
और इसलिए भारतीय धर्म ने जैसी गहराई और ऊंचाई पाई वैसा कोई भी धर्म छू नहीं सका। बाकी सब धर्म बचकाने हैं। बचकाने इस लिहाज से हैं कि आदमी के दृष्टिकोण से जगत को सोचा गया है उनमें। भारतीय धर्म विशिष्ट है, उसमें ईश्वर के दृष्टिकोण से जगत को सोचा गया है। आप फर्क समझ रहे हैं। आदमी के दृष्टिकोण से तो आदमी अपने हिसाब से सोचता है। जो उसे अच्छा लगता है वह अच्छा, और जो बुरा लगता है वह बुरा। विराट के हिसाब को उसमें जगह नहीं है।
सभी धर्म, भारतीय धर्म को छोड़ कर, एंथ्रोपोसेंट्रिक हैं। आदमी केंद्र है। सब चीजों में आदमी केंद्र है। तो जो भी आदमी के हित में है, वह शुभ है। और जो आदमी के अहित में है, वह अशुभ है। और आदमी के हित में सारे जगत का अहित होता रहे, तो भी शुभ है।
ईश्वर की दृष्टि से जगत का हिसाब--और जिस दिन कोई व्यक्ति उस दृष्टि के अनुकूल जीने लगता है उस दिन वह ईश्वरीय हो जाता है। मनुष्य मनुष्य रहते ईश्वर नहीं हो सकता। और मनुष्य-केंद्रित धर्म कोई भी वास्तविक धर्म नहीं है। ईश्वर-केंद्रित धर्म, अनंत को ध्यान में रख कर, फिर हमारा शुभ और अशुभ कहीं टिकता नहीं। और हमारा साधु असाधु कहीं टिकता नहीं। और हमारा बुद्धिमान और बुद्धिहीन कहीं टिकता नहीं। हमारे हिसाब और हमारी गणनाएं सब खो जाती हैं।
कहा है: ‘पाप और पुण्य मुझे छू नहीं सकते।’
होता मैं उनमें हूं, स्पर्श वे मुझे नहीं कर पाते।
‘मैं शरीर, इंद्रिय और बुद्धि से रहित हूं।’
मैं शरीर, इंद्रिय और बुद्धि से रहित हूं--इसे थोड़ा समझना पड़ेगा, क्योंकि इसमें तो बहुत भय मालूम पड़ेगा कि परमात्मा बुद्धि से रहित है। हम तो सोचते हैं मन में कि सारी बुद्धि उसकी है, सारी बुद्धिमत्ता उसकी है, सबसे ज्यादा बुद्धिमान, ज्ञान का सागर, अनंत ज्ञान, ऐसा हम सोचते हैं। यह सूत्र बहुत उलटी बात कहता है। यह कहता है: ‘बुद्धि से रहित!’ बुद्धि से रहित का अर्थ क्या है?
बुद्धि का अर्थ होता है: विचार की व्यवस्था। बुद्धि का अर्थ होता है: विचार का उपकरण। बुद्धि का अर्थ होता है: विचार का संस्थान। लेकिन विचार अज्ञानी के लिए जरूरी है। जिसे पता नहीं है वह विचार करता है। जिसे पता है वह विचार कैसे करेगा? तो बुद्धि अज्ञानी का उपकरण है, ज्ञानी का उपकरण नहीं है। ज्ञानी बुद्धिरहित हो जाता है।
बुद्धिरहित का मतलब यह है, कि बुद्धि का मतलब ही यह है कि कुछ मुझे पता नहीं है वह मुझे सोचना पड़ता है, तो सोचने की मेरे भीतर जो प्रक्रिया है, उसका नाम बुद्धि है। सोच-सोच कर मैं पता लगाता हूं।
ऐसा समझें--
एक अंधा आदमी लकड़ी से टटोल-टटोल कर चलता है, क्योंकि उसके पास आंख नहीं है। इसलिए लकड़ी हाथ में रखता है, उससे टटोलता है। टटोल कर दरवाजा खोज लेता है। बुद्धि लकड़ी की तरह है अज्ञानी के हाथ में। उससे हम टटोलते हैं--कहां है दरवाजा? दरवाजा पता तो नहीं है, तो टटोलते हैं, टकराते हैं, भूल-चूक करते हैं, इसलिए बुद्धि का ढंग ही भूल-चूक करके सीखना है--ट्रायल एंड एरर। करो कोशिश, भूल करो, सीखो। अंधा यही कर रहा है। टटोलता है, यह दीवाल पाई, नहीं है; सिर टकरा गया, और जगह टटोला, और जगह टटोला। पच्चीस जगह टटोलता है, कहीं-कहीं खोज कर दरवाजा मिल जाता है, फिर उससे निकल जाता है। अंधे का भी टटोलना बंद होता जाएगा अगर उसी मकान में से रोज-रोज निकलेगा। दरवाजे का उसे अंदाज होने लगेगा, तो फिर वह ऐसे ही निकल जाएगा, टटोलेगा भी नहीं। लेकिन नये मकान में फिर टटोलना पड़ेगा। कभी आपने खयाल किया कि बुद्धि से आप विचार तभी करते हैं जब कोई चीज आपको पता नहीं होती। जब पता हो जाती है तो धीरे-धीरे बुद्धि का उपयोग आप बंद कर देते हैं। रोज वही काम जो करते हैं तो उसमें बुद्धि का उपयोग नहीं होता। जैसे एक आदमी कार ड्राइविंग सीखता है, तो पहले बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। फिर जैसे-जैसे, जैसे-जैसे अनुभव हो जाता है, बुद्धि बिलकुल छोड़ देता है। फिर वह सिगरेट पीता रहे, गाना गाता रहे, रेडियो सुनता रहे, बातचीत करता रहे, कार ड्राइव होती रहती है। अब इस अंधे को दरवाजा पता चल गया है। अब यह निकल जाता है।
लेकिन अगर कहीं अचानक कोई दुर्घटना का क्षण आ जाए तो बुद्धि का फिर उपयोग करना पड़ता है। क्योंकि इसका कोई अभ्यास नहीं था। दुर्घटना का अभ्यास करिएगा भी कैसे? उसका अभ्यास हो नहीं सकता। वह तो घटती है। इसीलिए दुर्घटना कहते हैं। जिसका अभ्यास हो सके, उसका नाम दुर्घटना नहीं है। जिसका अभ्यास हो ही न सके और घटे, उसका नाम दुर्घटना है। इसलिए दुर्घटना में थोड़ी सी बुद्धि की जरूरत पड़ती है। तब एकदम से चौंककर आदमी सोचना शुरू करता है--क्या?
बुद्धि अज्ञानी का उपकरण है। जैसे लकड़ी अंधे का उपकरण है। बुद्धि टटोलने की व्यवस्था है। ग्रोपिंग इन दि डार्क। अंधेरे में टटोलना। परमात्मा बुद्धिरहित है। उसका अर्थ है कि उसके लिए अंधेरा नहीं है, उसका अर्थ है कि उसे कुछ अज्ञात नहीं है। उसका अर्थ है कि जो भी है वह उसके सामने है। सोचने का कोई कारण नहीं है। इसलिए जिस उपकरण से सोचा जाता है, वह उपकरण होने की कोई जरूरत ही नहीं है।
बुद्धि सीमित, अज्ञानी का उपकरण है। और जब तक आप सीमित और अज्ञानी हैं तब तक बुद्धि की जरूरत पड़ेगी। या जब तक आप बुद्धि की जरूरत बनाए रखेंगे तब तक आप सीमित और अज्ञानी बने रहेंगे। या तो हिम्मत करें बुद्धि को छोड़ देने की, तो शायद उस परमात्मा में छलांग लग जाए जो बुद्धिरहित है। आप भी बुद्धिरहित होकर ही उसमें उतर पाएंगे। अगर बुद्धि लेकर वहां गए तो परमात्मा का दरवाजा आपको न मिलेगा। इसलिए बुद्धिमान अक्सर उससे चूक जाते हैं। कभी-कभी कोई कबीर, कभी कोई नानक, कभी कोई मोहम्मद--न पढ़े, न लिखे, कभी किसी ने जाना ही नहीं था कि इनमें भी बुद्धि है--अचानक उसमें छलांग लगा जाते हैं।
मोहम्मद को जब पहली दफे छलांग लग गई तो मोहम्मद को खुद ही भरोसा न आया कि मैं किसी को कहूंगा तो कोई मेरी मानेगा कि यह हो गया। तो मोहम्मद ने डरते-डरते अपनी पत्नी को यह बात बताई। डरता हूं किसी को बताने में ऐसा हो गया है। तो मोहम्मद की जो पहली अनुयायी थी वह उसकी पत्नी थी, मोहम्मद की पत्नी थी। और एक लिहाज से यह महान सफलता है। इस दुनिया में सबको परिवर्तित कर लेना आसान है, पत्नी को परिवर्तित करना बहुत मुश्किल है। इसमें बुद्ध को भी मुश्किल पड़ गई थी। मोहम्मद की यह अदभुत सफलता है। मनुष्य के इतिहास में... पुरुषों में जो कई सफलताएं गिनी जाएं उसमें इसको जरूर गिनना चाहिए। मोहम्मद की पहली अनुयायी उनकी पत्नी थी। फिर आहिस्ता-आहिस्ता मोहम्मद के निकटतम लोगों में मोहम्मद ने बात कही। और तब भी मोहम्मद को जो तकलीफ झेलनी पड़ी वह मोहम्मद के मुल्क के बुद्धिमान लोगों के द्वारा दी गई थी। क्योंकि बुद्धिमान यह मान न सके कि यह आदमी न पढ़ा, न लिखा, न बुद्धि का कोई सबूत देता है और इसको हो जाए, और हमें न हुआ हो।
कबीर को जो तकलीफ हमारे मुल्क में झेलनी पड़ी, वह पंडितों के कारण झेलनी पड़ी। क्योंकि पंडित यह मान न सके कि यह जुलाहा, कपड़ा बुनता रहा अब तक, कपड़ा बेचता रहा सड़कों पर बैठ कर, अचानक यह परमज्ञानी हो गया। यह भरोसे की बात नहीं है।
क्योंकि हमारा खयाल ही यह है कि ज्ञान जो है, वह बुद्धि के अभ्यास से होता है?
निश्चित ही इस जगत के सारे ज्ञान बुद्धि के अभ्यास से होते हैं। लेकिन उस जगत का कोई भी ज्ञान बुद्धि के अभ्यास से नहीं होता। यहां बुद्धि सहयोगी है, वहां बुद्धि बाधा है। यहां बुद्धि मार्ग है, वहां बुद्धि दीवाल है। संसार में जाना हो तो बुद्धि को बढ़ाते चले जाना। वहां अंधे की लकड़ी की बहुत जरूरत पड़ेगी, क्योंकि अंधों का लोक है वह। वहां जितनी सजग लकड़ी होगी, जितनी संवेदनशील लकड़ी होगी, उतनी सफलता मिल पाएगी। लेकिन अगर परमात्मा की तरफ जाना हो तो इस लकड़ी को छोड़ देना। क्योंकि वहां अधों का कोई प्रवेश नहीं है। वहां लकड़ी से टटोल कर नहीं पहुंचा जाता। वहां इस लकड़ी को छोड़ कर ही पहुंचा जाता है। क्योंकि बाहर जाना हो तो टटोलना प
ड़ता है, भीतर जाने के लिए टटोलना क्या है, वहां तो हम हैं ही। सब लकड़ी वगैरह छोड़ देनी है, सब यात्रा बंद कर देनी है और आदमी वहां पहुंच जाता है।
यह सूत्र कीमती है कि मैं बुद्धि से रहित हूं। मैं शरीर से, इंद्रिय से, बुद्धि से रहित हूं। इंद्रियों की भी जरूरत दूसरे को जानने के लिए है। परमात्मा के लिए कोई भी दूसरा नहीं है। जैसा मैंने रात आपको कहा कि आप अपने को कैसे जानते हैं? बिना किसी इंद्रिय के। हां, दूसरे को जानते हैं तो इंद्रिय से जानते हैं। अगर परमात्मा एक है तो उसको इंद्रिय की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह दूसरा कोई है नहीं जिसे जाने, स्वयं को ही जानता है। शरीर भी नहीं है। शरीर का मतलब ही यह होता है।
शरीर का आपने कभी खयाल न किया होगा कि क्या मतलब होता है।
शरीर का मतलब होता है, आपके और विराट के बीच का संबंध। आपके चारों तरफ विराट फैला हुआ है, और आप यहां भीतर हैं, और आप दोनों के बीच जो संबंध का स्रोत है, वह शरीर है। ऐसा समझें कि आपके घर की दीवाल है, उससे आपके घर का कमरा बना हुआ है। लेकिन पृथ्वी की कोई दीवाल है? पृथ्वी में सब दीवालें हैं और सब मकान हैं, लेकिन पृथ्वी की कोई दीवाल नहीं है, क्योंकि किससे विभाजन करिएगा।
आपके शरीर की जरूरत है, क्योंकि आपको सबसे विभाजित होने की जरूरत है। परमात्मा पूर्णता का नाम है, समस्त अस्तित्व का नाम है। उसकी कोई दीवाल नहीं हो सकती। ध्यान रहे दीवाल सदा दूसरे से पृथक करती है। अगर कोई दूसरा नहीं है तो इस अस्तित्व का कोई शरीर नहीं हो सकता। शरीर दीवाल है। पड़ोसी से भेद पैदा करवाती है। परमात्मा के लिए किसी शरीर की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है जिसका शरीर हो, जिससे भेद करना हो। समस्त अस्तित्व शरीरहीन है।
क्षुद्र के शरीर होते हैं, विराट का शरीर नहीं होता। क्षुद्र का शरीर जरूरी है, अन्यथा आपको पता ही नहीं चलेगा आप क्या हैं, कौन हैं, कहां हैं?
और इसी सूत्र से यह भी खयाल में ले लेना जरूरी है कि जब तक आपको लगता है आप शरीर हैं, तब तक आप क्षुद्र ही बने रहेंगे। जिस दिन आपको यह बोध होना शुरू होगा कि शरीर जरूर है मेरे पास, लेकिन मैं शरीर नहीं हूं, उस दिन ही आप शरीर के बाहर फैलना शुरू हो गए। जिस दिन आपको भी अनुभव होगा कि मैं अशरीरी हूं, उस दिन आप परमात्मा के साथ एक हो गए। जब तक आप इंद्रियों पर भरोसा रखेंगे तब तक आप संसार को जानेंगे। जिस दिन आप इंद्रियों का भरोसा छोड़ कर खोज करेंगे, उस दिन आप परमात्मा को जानेंगे। जब तक आप बुद्धि से चलेंगे, तब तक आप अज्ञान में ही रहेंगे। जिस दिन बुद्धि को छोड़ कर चलेंगे, उस दिन ही ज्ञान की शुरुआत है।