Geeta Darshan #10

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Questions in this Discourse

एक मित्र ने पूछा है, ओशो, भगवान कृष्ण के विकराल स्वरूप में अर्जुन देवताओं को कंपित होते हुए देखता है, अन्यों को मृत्यु की ओर जाते हुए देखता है। लेकिन क्या उसने अपने आपको इस विकराल रूप में नहीं देखा? मृत्यु के मुंह में जाते नहीं देखा? और अगर अपने आपको भी देखा, तो उसका उल्लेख क्यों नहीं किया गया है? और अगर नहीं देखा, तो क्यों?
यह प्रश्न कीमती है और बहुत सोचने योग्य।
कोई भी व्यक्ति अपनी मृत्यु नहीं देख सकता। मृत्यु सदा दूसरे की ही देखी जा सकती है। क्योंकि मृत्यु बाहर घटित होती है, भीतर तो घटित होती ही नहीं। समझें।
आपने जब भी मृत्यु देखी है, तो किसी और की देखी है। आपकी मृत्यु की जो धारणा है, वह दूसरों को मरते देखकर बनी है। ऐसा नहीं है कि आप बहुत बार नहीं मरे हैं। आप बहुत बार मरे हैं। लेकिन जो भी आपकी मृत्यु की धारणा है, वह दूसरे को मरते हुए देखकर आपने बनाई है।
जब दूसरा मरता है, तो आप बाहर होते हैं। शरीर निस्पंद हो जाता है। श्वास बंद हो जाती है। हृदय की धड़कन समाप्त हो जाती है। खून चलता नहीं। आदमी बोल नहीं सकता। निष्प्राण हो जाता है। लेकिन भीतर जो था, वह तो कभी मरता नहीं।
और आदमी अपनी मौत कैसे देख सकता है! इसलिए भीतर जो मर रहा है, वह नहीं देख सकता कि मैं मर रहा हूं। वह तो अब भी पाएगा कि मैं जी रहा हूं। अगर होश में है, तो उसे दिखाई पड़ेगा कि मैं जी रहा हूं। अगर बेहोश है, तो खयाल में नहीं रहेगा।
हम बहुत बार मरे हैं, लेकिन बेहोशी में मरे हैं। इसलिए हमें कोई खयाल नहीं है। हमें कुछ पता नहीं है कि मृत्यु में क्या घटा। अगर एक बार भी हम होश में मर जाएं, तो हम अमृत हो गए। क्योंकि तब हम जान लेंगे कि बाहर ही सब मरता है। जो मेरा समझा था, वह टूट गया, बिखर गया, शरीर नष्ट हो गया। लेकिन मैं! मैं अब भी हूं।
कोई व्यक्ति कभी स्वयं की मृत्यु का अनुभव नहीं किया है। जो लोग बेहोश मरते हैं, उन्हें तो पता ही नहीं चलता कि क्या हुआ। जो लोग होश से मरते हैं, उन्हें पता चलता है कि मैं जीवित हूं। जो मरा, वह शरीर था, मैं नहीं हूं।
इसलिए ऐसा सोचें, और तरह से। अगर आप कल्पना भी करें अपने मरने की, तो कल्पना भी नहीं कर सकते। अनुभव को छोड़ दें। कल्पना तो झूठ की भी हो सकती है। और आपने सुना होगा, कल्पना तो किसी भी चीज की हो सकती है। कल्पना ही है। लेकिन आप अपने मरने की कल्पना करें, तब आपको पता चलेगा, वह नहीं हो सकती। आप कुछ भी उपाय करें, अपने शरीर को मरा हुआ देख लेंगे। लेकिन आप देखने वाले बाहर जिंदा खड़े रहेंगे, कल्पना में भी! कितना ही सोचें कि मैं मर गया, कैसे मरिएगा! कल्पना में भी नहीं मर सकते। क्योंकि वह जो सोच रहा है, वह जो देख रहा है, कल्पना जिसे दिखाई पड़ रही है, वह साक्षी बना हुआ जिंदा रहेगा।
असली में तो मरना मुश्किल है, कल्पना में भी मरना मुश्किल है। लोग कहते हैं, कल्पना असीम है। कल्पना असीम नहीं है। आप मृत्यु की कल्पना करें, आपको पता चल जाएगा, कल्पना की भी सीमा है।
इसलिए अर्जुन सबको तो देखता है मृत्यु के मुंह में जाते, स्वयं को नहीं देखता। स्वयं को कोई भी नहीं देख सकता। अगर अर्जुन स्वयं को भी मृत्यु में जाते देखे, तो देखेगा कौन फिर? जो मृत्यु में जा रहा है वह अलग हो जाएगा, और जो देख रहा है वह अलग हो जाएगा। अगर अर्जुन देख रहा है मृत्यु में जाते, तो अर्जुन का शरीर भला चला जाए मृत्यु में, अर्जुन नहीं जा सकता; वह बाहर खड़ा रहेगा। वह देखने वाला है।
वह जो आत्मा है, उसे हमने इसीलिए द्रष्टा कहा है। वह सब देखता है। वह मृत्यु को भी देख लेता है।
इसलिए अर्जुन को खयाल नहीं आया। आने का कोई उपाय भी नहीं है। वह बाहर है, वह देखने वाला है। और सब मर रहे हैं--मित्र भी, शत्रु भी, बड़े-बड़े योद्धा--लेकिन अर्जुन को खयाल भी नहीं आ रहा कि मैं मर रहा हूं, या मैं मर जाऊंगा।
इसलिए बड़े मजे की बात है, आप रोज लोगों को मरते देखते हैं, आपको भय भी पकड़ता है, लेकिन आप विचार करें, कभी भीतर यह बात मजबूती से नहीं बैठती है कि मैं मर जाऊंगा। ऊपर-ऊपर कितना ही भयभीत हो जाएं कि मरना पड़ेगा, लेकिन भीतर यह बात घुसती नहीं कि मैं मर जाऊंगा। भीतर यह भरोसा बना ही रहता है कि और लोग ही मरेंगे, मैं नहीं मरूंगा।
यह भरोसा प्रतिफलन है उस गहरे आंतरिक केंद्र का, जहां मृत्यु कभी प्रवेश नहीं करती। उसके बाहर-बाहर ही मृत्यु घटित होती है। आपका घर आपसे छीना जाता है बहुत बार। आपके वस्त्र आपसे छीने जाते हैं बहुत बार, जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, व्यर्थ हो जाते हैं, नए वस्त्र मिल जाते हैं। लेकिन आप! आप कभी भी नष्ट नहीं होते।
इसलिए अपनी मृत्यु की कल्पना असंभव है। अपनी मृत्यु का दर्शन भी असंभव है। और जो अपनी मृत्यु का दर्शन करने की कोशिश कर लेता है, वह अमृत का अनुभव कर लेता है।
समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं अपनी मृत्यु का अनुभव करने की कोशिश हैं। सब प्रक्रियाएं, योग की सारी चेष्टा इस बात की है कि आप होशपूर्वक अपने को मरता हुआ देख लें।
क्या होगा? सब मर जाएगा, आप बच जाएंगे।
रमण को ऐसा हुआ कि उन्हें लगा कि उनकी मृत्यु आ रही है। वे बीमार हैं, उनकी मृत्यु आ रही है। और जब मृत्यु आ ही रही है, तो उससे लड़ना क्या, हाथ-पैर ढीले छोड़कर वह लेट गए। उन्होंने कहा, ठीक है। जब मृत्यु आ रही है, तो आ जाए। मैं मृत्यु को भी देख लूं कि मृत्यु क्या है!
सब शरीर ठंडा हो गया। ऐसा लगने लगा कि शरीर अलग हो गया। लेकिन सब शरीर मरा हुआ मालूम पड़ रहा है, फिर भी रमण को लग रहा है, मैं तो जिंदा हूं। वही अनुभव उनके जीवन में क्रांति बन गया। उसके पहले वे रमण थे, उसके बाद वे भगवान हो गए। उसके पहले तक उन्होंने जाना था, मैं यह शरीर हूं, जो मरेगा। इसके बाद उन्होंने जाना कि यह शरीर मैं नहीं हूं। जो नहीं मरेगा, वह मैं हूं। सारा तादात्म्य बदल गया। सारी दृष्टि बदल गई। एक नए जन्म की--अमृत, एक नए जीवन की शुरुआत हो गई।
योग की सारी प्रक्रियाएं आपको स्वेच्छा से मरने की कला सिखाने की हैं। पुराने शास्त्रों में कहा है, आचार्य, गुरु, मृत्यु है। क्योंकि जिस गुरु के पास आपको मृत्यु का अनुभव न हो पाए, वह गुरु ही क्या!
लेकिन मृत्यु का अनुभव बड़ा विरोधाभासी है। एक तरफ जो भी आपने अपने को समझा था--नाम, धाम, पता-ठिकाना, शरीर--सब मर जाता है। और जो आपने कभी नहीं सोचा था आपके भीतर, एक ऐसे केंद्र का आविर्भाव हो जाता है, जिसकी मृत्यु का कोई उपाय नहीं है, जो अमृत है।
अर्जुन को इसलिए अनुभव नहीं हुआ। और आपको भी तभी तक मृत्यु का भय है, जब तक आपने अनुभव नहीं किया है। आपके भीतर क्या मरणधर्मा है और क्या अमृत है, इसका भेद ही ज्ञान है। आपके भीतर क्या-क्या मर जाने वाला है और क्या-क्या नहीं मरने वाला है, इसकी भेद-रेखा को खींच लेना ही ज्ञान है। समाधि में वही भेद-रेखा खिंच जाती है। आप दो हिस्सों में साफ हो जाते हैं।
एक आपकी खोल है, जो मरेगी, क्योंकि वह जन्मी है। जो जन्मा है, वह मरेगा। और एक आपके भीतर की गिरी है, जो नहीं मरेगी, क्योंकि वह जन्मी भी नहीं है। शरीर का जन्म है, आपका कोई जन्म नहीं है। शरीर का जन्म है, शरीर की मृत्यु है। जो आपको मां-बाप से मिला है शरीर, वह मरेगा। लेकिन जो आप हैं, उसके मरने का कोई उपाय नहीं है।
लेकिन ऐसा विश्वास करके मत बैठे रहना। विश्वास करने की हमारी बड़ी जल्दी होती है। और मतलब की बात हो, इच्छा के अनुकूल हो, हम जल्दी विश्वास कर लेते हैं। हम सब चाहते हैं कि न मरें, इसलिए आत्मा अमर है, इसमें विश्वास करने के लिए हमें बहुत तर्क की जरूरत नहीं पड़ती। हमारा भय ही काफी तर्क हो जाता है। कोई भी हमसे कहे, आत्मा अमर है, हमारा दिल बड़ा खुश होता है कि चलो, मरेंगे नहीं। इस पर विश्वास कर लेने में जल्दी कर देते हैं लोग। जल्दी मत करना। विश्वास से कुछ हल न होगा। अनुभव ही एकमात्र हल है।
मैं कहता हूं, इससे मान मत लेना। कृष्ण कहते हैं, इससे मत मान लेना। बुद्ध कहते हैं, इससे मत मान लेना। उनके कहने से सिर्फ प्रयोग करने के लिए तैयार होना है, मान मत लेना। इतना ही समझना कि कहते हैं ये लोग, प्रयोग करके हम भी देख लें। और अगर अनुभव मिल जाए, तो ही मानना, अन्यथा मत मानना।
नहीं तो हमारी हालत ऐसी है कि बिना अनुभव के हम माने चले जाते हैं। बिना अनुभव के जो मान्यता है, वह ऊपर-ऊपर होगी, थोथी होगी, कागजी होगी, जरा-सी वर्षा होगी और बह जाएगी, टिकने वाली नहीं है। ऊपर-ऊपर की जो मान्यता है, वह मृत्यु में आपको सजग न रख पाएगी, आप बेहोश हो जाएंगे।
डाक्टर तो अब एनेस्थेसिया का प्रयोग करते हैं बड़ा आपरेशन करना हो तो। लेकिन मृत्यु सबसे बड़ा आपरेशन है। क्योंकि आपका समस्त शरीर-संस्थान आपसे अलग किया जाता है। इसलिए प्रकृति भी उसे होश में नहीं कर सकती। प्रकृति भी आपको बेहोश कर देती है, मरने के पहले आप बेहोश हो जाते हैं।
वह इतना बड़ा आपरेशन है, उससे बड़ा कोई आपरेशन नहीं है। कोई डाक्टर एक हड्डी अलग करता है, कोई डाक्टर दो हड्डी अलग करता है, कोई हृदय को बदलता है। लेकिन पूरा संस्थान, आपका पूरा शरीर मृत्यु अलग करती है आपसे। वह गहरे से गहरी सर्जरी है। उसमें आपको बेहोश कर देना एकदम जरूरी है। इसलिए मौत के पहले आप बेहोश हो जाते हैं। अगर मौत में होश रख पाएं, तो आपको पता चल जाएगा कि आपकी कोई मृत्यु नहीं है।
ध्यान जो साधता है, वह धीरे-धीरे मौत में भी होश रख पाता है। क्योंकि मरने के पहले बहुत बार वह अपने को शरीर से अलग करके देख लेता है।
कठिन नहीं है। अगर प्रयोग करें, तो सरल है। अगर मानते ही रहें, तो बहुत कठिन है। अगर प्रयोग करें, तो बहुत सरल है। क्योंकि आप अलग हैं ही। सिर्फ थोड़े से होश को बढ़ाने की जरूरत है भीतर। आंख बंद करके भीतर देखने की क्षमता विकसित करने की जरूरत है।
लेकिन मौत तो बहुत दूर है। आप अपनी नींद को भी नहीं देख पाते, तो मौत को कैसे देख पाएंगे? आप रोज सोते हैं शाम। जिंदगी में साठ साल जीएंगे, तो बीस साल सोने में बिताएंगे। छोटा-मोटा काम नहीं है नींद, एक तिहाई जिंदगी उसमें जाती है। बीस साल आप सोते हैं, अगर साठ साल जिंदा रहते हैं। लेकिन आपको पता है कि नींद क्या है? कभी आपने होशपूर्वक नींद को देखा है? कि नींद उतर रही मेरे ऊपर। छा रही। सब तरफ से मुझे घेर रही। शरीर सुस्त हुआ जा रहा। नींद प्रवेश करती जा रही है और मैं देख रहा हूं।
आप नींद को भी नहीं देख पाते, तो मौत को कैसे देखिएगा? मौत तो बहुत गहरी मूर्च्छा है। नींद तो बहुत छोटी मूर्च्छा है। जरा-सा कोई बर्तन गिर जाए, तो खुल जाती है। इससे ज्यादा गहराई नहीं है। एक मच्छड़ काट जाए, तो खुल जाती है। बहुत गहरी नहीं है। लेकिन इतनी उथली चीज में भी आप होश नहीं रख पाते, तो मौत में कैसे रख पाएंगे?
प्रयोग अगर करेंगे, तो जिसको भी मृत्यु के संबंध में जागना है, उसे नींद से प्रयोग शुरू करना चाहिए। रात जब बिस्तर पर पड़ें, तो आंख बंद करके एक ही खयाल रखें कि मैं जागा रहूं। शरीर को ढीला होने दें, होश को सजग रखें। और खयाल रखें कि मैं देख लूं, नींद कब आती है? कब मेरा शरीर जागने से नींद में प्रवेश करता है? कब गियर बदलता है? कब मैं नींद की दुनिया में प्रवेश करता हूं? उसे देख लूं! बस, चुपचाप देखते रहें।
पता नहीं चलेगा कब नींद लग गई, और देखने का खयाल भूल जाएगा! सुबह होश आएगा कि देखने की कोशिश की थी, लेकिन देख नहीं पाए; नींद आ गई और देखना खो गया। लेकिन सतत लगे रहें। अगर तीन महीने निरंतर बिना किसी विघ्न-बाधा के आप नींद के साथ जागने की कोशिश करते रहे, तो किसी भी दिन यह घटना घट जाएगी कि नींद उतरेगी आपके ऊपर, जैसे सांझ उतरती है, अंधेरा छा जाता है, और आप भीतर जागे रहेंगे; आप देख पाएंगे कि नींद यह है।
जिस दिन आपने नींद देख ली, उस दिन आपने एक बहुत बड़ा कदम उठा लिया। बहुत बड़ा कदम उठा लिया। फिर दूसरा प्रयोग है कि नींद रात लगी रहे, लगी रहे, लगी रहे, लेकिन भीतर एक कोने में होश भी बना रहे कि मैं सो रहा हूं, करवट बदल रहा हूं, मच्छड़ काट रहा है, हाथ-पैर ढीले पड़ गए हैं। अब जागने का क्षण करीब आ रहा है, अब मैं जाग रहा हूं।
जिस दिन आप सांझ से लेकर सुबह तक, शरीर सोया रहे और आप जागे रहें, अब कोई कठिनाई नहीं है; अब आप मृत्यु में प्रवेश कर सकते हैं। तब बहुत आसान है, तीसरी बात। इतना अगर सध जाए--इसमें वर्षों लग सकते हैं--लेकिन इतना सध जाए, तो आप दूसरे आदमी हो जाएंगे, एक नए आदमी हो जाएंगे। आपने अपनी नींद पर विजय पा ली।
और जिसने अपनी नींद पर विजय पा ली, उसको मृत्यु पर विजय पाने में कोई कठिनाई नहीं, क्योंकि मृत्यु एक और बड़ी नींद है, और गहन मूर्च्छा है। अगर आप नींद में जग पाते हैं, तो आपको तत्क्षण पता चलने लगेगा कि आप अलग हैं और शरीर अलग है। क्योंकि शरीर सोएगा और आप जगेंगे।
ध्यान रहे, आपको तब तक शरीर के और आत्मा के अलग होने का पता नहीं चलेगा, जब तक आप कोई ऐसा प्रयोग न करें, जिस प्रयोग में दोनों की क्रियाएं अलग हों। अभी आपको भूख लगती है, तो आपके शरीर को भी लगती है, आपको भी लगती है। बहुत मुश्किल है तय करना कि शरीर को भूख लगी कि आपको लगी। अभी आप जो भी कर रहे हैं, उसमें आपकी क्रियाओं में तालमेल है, शरीर और आप में तालमेल है। आपको कोई न कोई ऐसा अभ्यास करना पड़े, जिसमें आपको कुछ और हो रहा है, शरीर को कुछ और हो रहा है; बल्कि शरीर को विपरीत हो रहा है, आपको विपरीत हो रहा है।
लोगों ने भूख के साथ भी प्रयोग किया है। उपवास वही है। वह इस बात का प्रयोग है कि शरीर को भूख लगेगी और मैं स्वयं को भूख न लगने दूंगा। भूखे मरने का नाम उपवास नहीं है। अधिक लोग उपवास करते हैं, वे सिर्फ भूखे मरते हैं। क्योंकि शरीर को भी लगती है भूख, उनको भी लगती है। बल्कि सच तो यह है कि भोजन करने में उनकी आत्मा को जितनी भूख का पता नहीं चला था, उतना उपवास में पता चलता है।
भोजन करते में तो पता चलता नहीं; जरूरत के पहले ही शरीर को भोजन मिल जाता है। भूख भीतर तक प्रवेश नहीं करती। उपवास कर लिया, उस दिन दिनभर भूख लगी रहती है। खाते वक्त तो दो दफे लगती होगी दिन में, तीन दफा लगती होगी। न खाएं, तो दिनभर लगती है! भूख पीछा करती है। शरीर तो भूखा होता ही है, आत्मा भी भीतर भूख से भर जाती है।
उपवास का प्रयोग इसी तरह का प्रयोग है, जैसा नींद का प्रयोग है। शरीर को भूख लगे और आप भीतर बिना भूख के रहें, तो दोनों क्रियाएं अलग हो जाएंगी।
जिस दिन आपको साफ हो जाएगा, शरीर को भूख लगी और मैं तृप्त भीतर खड़ा हूं, कोई भूख नहीं है, उस दिन आपको भेद का पता चल जाएगा। शरीर सो गया, आप जागे हुए हैं, भेद का पता चल जाएगा। और जब भेद का पता चलेगा, तभी जब मृत्यु होगी, शरीर मरेगा, आप नहीं मरेंगे, तब आपको उस भेद का भी पता चल जाएगा।
नींद से शुरू करें, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे भीतर भेद साफ होने लगता है, रोशनी भीतर बढ़ने लगती है। रोशनी हमारे पास है, हम उसे बाहर उपयोग कर रहे हैं, भीतर कभी ले नहीं जाते। तो सारी दुनिया को देखते हैं, अपने भर को छोड़ देते हैं।
इसलिए अर्जुन को दिखाई नहीं पड़ा। क्योंकि मृत्यु तो किसी को भी दिखाई नहीं पड़ती है अपनी, सिर्फ दूसरे की दिखाई पड़ती है।
इसलिए दूसरे के संबंध में जो भी आपको दिखाई पड़ता है, उसको बहुत मानना मत, वह झूठा है, ऊपर-ऊपर है। अपने संबंध में भीतर जो दिखाई पड़े, वही सत्य है, वही गहरा है। और जब आपको अपना सत्य दिखाई पड़ेगा, तभी आपको दूसरे का सत्य भी दिखाई पड़ेगा। जिस दिन आपको पता चल जाएगा, मैं नहीं मरूंगा, उस दिन फिर कोई भी नहीं मरेगा आपके लिए। फिर आप कहेंगे कि वस्त्र बदल लिए।
रामकृष्ण की मृत्यु हुई, तो पता चल गया था कि तीन दिन के भीतर वे मर जाने वाले हैं। जो लोग भी जाग जाते हैं, वे अपनी मौत की घोषणा कर सकते हैं। क्योंकि शरीर संबंध छोड़ने लगता है। कोई एकदम से तो छूटता नहीं, कोई छह महीने लगते हैं शरीर को संबंध छोड़ने में।
इसलिए मरने के छह महीने पहले, जिसका होश साफ है, वह अपनी तारीख कह सकता है कि इस तारीख, इस घड़ी मैं मर जाऊंगा। तीन दिन पहले तो बिलकुल संबंध टूट जाता है। बस आखिरी धागा जुड़ा रह जाता है। वह दिखाई पड़ने लगता है कि बस अब एक धागा रह गया है, यह किसी भी क्षण टूट जाएगा।
तो रामकृष्ण को तीन दिन पहले पता हो गया था कि उनकी मृत्यु आ रही है। तो उनकी पत्नी शारदा रोती थी, चिल्लाती थी। रामकृष्ण उसको कहते थे कि पागल, तू रोती-चिल्लाती क्यों है, क्योंकि मैं नहीं मरूंगा। लेकिन शारदा कहती थी, सब डाक्टर कहते हैं, सब प्रियजन कहते हैं कि अब आपकी मृत्यु करीब है! और वे कहते थे, तू उनकी मानती है या मेरी! मेरी मानती है या उनकी! मैं नहीं मरूंगा। मैं रहूंगा यहीं।
लेकिन शारदा को कैसे भरोसा आए! रामकृष्ण का यह कहना, उनके अपने भीतर के अनुभव की बात है। वे कह रहे हैं कि मैं नहीं मरूंगा।
रामकृष्ण को कैंसर हुआ था। कठिन कैंसर था, गले में था और भोजन-पानी सब बंद हो गया था। बोलना भी मुश्किल हो गया था। पर रामकृष्ण ने कहा है कि देख, तुझसे मैं कहता हूं, जिसको कैंसर हुआ था, वही मरेगा। मुझे कैंसर भी नहीं हुआ था। यह गला रुंध गया है, यह गला बंद हो गया है, यह गला सड़ गया है, यह कैंसर से भर गया है, लेकिन मैं देख रहा हूं कि मैं यह गला नहीं हूं। तो गला मर जाएगा, यह शरीर गल जाएगा, मिट जाएगा, लेकिन मैं नहीं मरूंगा।
पर हमें कैसे भरोसा आए? क्योंकि हमें अनुभव न हो। हम तो मानते हैं कि हम शरीर हैं। तो जब शरीर मरता है, तो हम मानते हैं कि हम भी मर गए। हमारे जीवन की भ्रांति हमारी मृत्यु की भी भ्रांति बन जाती है।
अर्जुन को दिखाई नहीं पड़ा, आपको भी दिखाई नहीं पड़ेगा। जिस दिन मृत्यु के द्वार पर आप खड़े हो जाएंगे और देखेंगे कि मर रहा है सब कुछ, तब भी एक आप बाहर खड़े रहेंगे। आप नहीं मर रहे हैं, आपके मरने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए अर्जुन बात नहीं कर रहा है अपनी मृत्यु की।
एक और मित्र ने भी बहुत गहरा सवाल पूछा है। उन्होंने पूछा है कि हम सब भगवान हैं। सब भगवान के अंश हैं, यह तो समझ में आ जाता है। लेकिन अंश पूर्ण नहीं हो सकता, अंश तो अंश ही होगा। तो हम भगवान के अंश हैं, यह तो समझ में आ जाता है, लेकिन भगवान हैं, यह समझ में नहीं आता। तो इतना ही कहना उचित है कि हम भगवान के अंश हैं, लेकिन भगवान हैं, यह कहना उचित नहीं है।
यह सवाल महत्वपूर्ण है। और जो लोग गणित को समझते हैं, उन्हें बिलकुल ठीक साफ समझ में आ जाएगा कि ऐसा ही होना चाहिए। अंश कभी अंशी नहीं हो सकता। टुकड़ा पूर्ण कैसे हो सकता है? टुकड़ा टुकड़ा है।
हम एक सागर से एक चुल्लू भर पानी ले लें, तो वह सागर नहीं है, सागर का अंश हो सकता है। यह सीधा गणित है। स्वभावतः, एक रुपए का नोट एक रुपए का नोट है, वह सौ का नहीं हो सकता, सौ का एक हिस्सा हो सकता है, सौवां हिस्सा हो सकता है। यह सीधा गणित है। और जहां तक गणित जाता है, वहां तक बिलकुल ठीक है।
लेकिन धर्म गणित से आगे जाता है। और धर्म बड़ा उलटा गणित है। उसे थोड़ा समझने के लिए चेष्टा करनी पड़े। क्योंकि सामान्य गणित तो हम रोज उपयोग करते हैं, हमें पता है। धर्म का गणित हमें बिलकुल पता नहीं है। धर्म के गणित का पहला सूत्र यह है कि वहां अंशी और अंश एक हैं।
आपने ईशावास्य का पहला सूत्र सुना है! उस पूर्ण से पूर्ण निकल आता है और पीछे भी पूर्ण शेष रह जाता है। आप किसी सौ रुपए में से एक रुपए का नोट बाहर निकालें, पीछे निन्यानबे शेष रहेंगे, सौ शेष नहीं रहेंगे। लेकिन यह सूत्र तो बड़ी गजब की बात कहता है। यह कहता है कि सौ में से सौ भी बाहर निकाल लो, तो भी सौ ही पीछे शेष रह जाता है! पूर्ण से पूर्ण भी निकाल लो, तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है।
इसका क्या मतलब हुआ? यह तो हमारे सारे गणित की व्यवस्था गड़बड़ हो जाती है। अगर यह उपनिषद का सूत्र सही है, तो हमारा सारा गणित गलत है। अध्यात्म के जगत में गणित गलत है। उसके कारण हैं। उसे हम दो-तीन तरह से समझें, तो खयाल में आ जाए।
पहली तो बात यह कि जो निराकार है, उसमें से हम अंश को बाहर नहीं निकाल सकते। कोई उपाय नहीं है। आप सागर में से चुल्लू भरकर पानी बाहर निकाल लेते हैं, क्योंकि सागर के बाहर भी जगह है। इसलिए आप पानी भर लेते हैं चुल्लू में।
ऐसा समझें कि सागर ही सागर है और सागर के बाहर कोई जगह नहीं है। फिर आप चुल्लू भी भर लें, तो आपकी चुल्लू में अंश नहीं होगा, पूरा सागर ही होगा। बाहर तो हम इसलिए निकाल लेते हैं कि बाहर सुविधा है। सागर में से चुल्लू भर पानी बाहर निकाल लेते हैं।
परमात्मा से चुल्लू भर निकालना मुश्किल है। क्योंकि परमात्मा के बाहर कोई जगह नहीं है, सिर्फ वही है। उसके बाहर निकालिएगा कैसे? कौन निकालेगा? कहां निकालेगा? उसके बाहर निकालने का कोई उपाय नहीं है।