Cheti Sake To Cheti #5
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Questions in this Discourse
एक मित्र ने पूछा है कि हमारे देश की क्या यह सबसे बड़ी बीमारी नहीं रही कि हमने बहुत ऊंचे विचार किए, लेकिन व्यवहार बहुत नीचा किया। सिद्धांत ऊंचे और कर्म बहुत नीचा। इसीलिए बहुत बड़े-बड़े व्यक्ति तो पैदा हो सके, लेकिन भारत में एक बड़ा समाज नहीं बन सका।
इस संबंध में दो-तीन बातें समझनी उपयोग की होंगी। पहली बात तो यह, यदि विचार श्रेष्ठ हों तो कर्म अनिवार्यरूपेण श्रेष्ठ हो जाता है। इस भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं है कि विचार हमारे श्रेष्ठ थे और फिर भी कर्म हमारा निकृष्ट रहा। श्रेष्ठ विचार अनिवार्यरूपेण श्रेष्ठ कर्म के जन्मदाता बनते हैं। अगर श्रेष्ठ कर्म न जन्मा हो, तो जानना कि विचार ही भ्रांत रहे होंगे, श्रेष्ठ न रहे होंगे। यह असंभव है कि विचार सत्यतर हो और आचरण असत्य की ओर चला जाए। यह असंभव है कि ज्ञान तो स्पष्ट हो और जीवन भटक जाए। यह तो ऐसे ही हुआ कि हम कहें कि आंख तो बिलकुल ठीक थी, लेकिन फिर भी हम दीवाल से टकरा गए, दरवाजे से न निकल पाए। अगर दीवाल से टकरा गए हैं, तो आंख ठीक न रही होगी। आंख ठीक रही होती, तो दरवाजे से निकल गए होते, दीवाल से टकराने की कोई जरूरत न थी।
ज्ञान के ठीक होने का सबूत क्या है?
ज्ञान के ठीक होने का सबूत यही है कि उसके अनुकूल जीवन बदल जाए। अगर जीवन न बदलता हो, तो ज्ञान बुनियादी रूप से गलत रहा होगा, कहीं न कहीं भ्रांत रहा होगा।
यह तो पहली बात कि इस मुल्क को यह भ्रम है कि हमारा ज्ञान तो बड़ा श्रेष्ठ है, लेकिन आचरण हमारा बड़ा नीचा है। तो हम शायद ऐसा सोचते हैं कि ज्ञान को आचरण में नहीं ला पाए, इसलिए ऐसी भूल हो गई। ज्ञान आचरण में आ ही जाता है, जैसे मनुष्य के पीछे छाया चलती है। ज्ञान को आचरण में लाने से बचना असंभव है। ज्ञान ही भ्रांत रहा हो, तो बात हो सकती है।
मेरी दृष्टि में, हमें ज्ञान के ही आमूल आधार बदलने होंगे। ज्ञान में ही कुछ बुनियादी भूलें थीं। जैसे मैं कुछ भूलें गिनाऊं, जिनकी वजह से वह हमारे समाज का आचरण नहीं बन सका। जैसे, इस देश का पूरा ज्ञान जीवन-विरोधी है, लाइफ निगेटिव है। जिस देश का ज्ञान जीवन-विरोधी हो, उस देश का ज्ञान कभी भी जीवन-रूपांतरित करने वाला सिद्ध नहीं हो सकता। जिस देश का ज्ञान मोक्ष जाने के आस-पास मंडराता हो, जिस देश का ज्ञान मृत्यु के बाद के लिए विचार करता हो, जिस देश का ज्ञान जीवन से मुक्त होने की, जीवन से, आवागमन से छुटकारा पाने की चेष्टा करता हो, उस देश का ज्ञान कभी भी जीवन का आधार नहीं बन सकता। ज्ञान लाइफ अफरमेटिव हो, जीवन को विधायकता देता हो, जीवन को स्वीकृति देता हो, जीवन के आनंद को उपलब्ध करने का मार्ग और दिशा देता हो, तो ज्ञान आचरण में और जीवन में उतर सकता है।
इस मुल्क का जो ज्ञान है, वह सुसाइडल है, वह आत्मघाती है। आत्मघाती ज्ञान को अगर जीवन में उतारना हो, तो कुछ थोड़े से लोग ही उतार सकते हैं, जिनके भीतर सुसाइड की मौलिक इंस्ंिटक्ट हो, बाकी लोग नहीं उतार सकते। जिन लोगों के लिए जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण जीवन के बाद का लोक हो, और जिनके लिए जिंदा रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण मर जाने की कला हो, और जिनके लिए जीने से ज्यादा भाग जाना कीमती लगता हो, ऐसे थोड़े से रुग्ण-चित्त लोग, बीमार-चित्त लोग ही इस ज्ञान को जीवन में उतार सकते हैं। शेष पूरा का पूरा समाज अप्रभावित रह जाएगा।
इस देश की पूरी की पूरी चिंतना पारलौकिक है, अदरवर्ल्डली है, और इसलिए बेमानी हो गई है। ज्ञान तो इस जीवन को बदलने, इस जीवन को सुंदर बनाने, इस जीवन को श्रेष्ठता देने, इस जीवन को एक कलात्मक रूप देने के लिए हो, तो जीवन को बदलने वाला हो सकता है। तो पहली तो बात यह है।
दूसरी बात यह कि हम जीवन में जो भी रसपूर्ण है, जीवन में जो भी भोगने योग्य है, जीवन में जो भी सुंदर है, सबकी गहरी निंदा से भरे हुए लोग हैं। ठीक से कहा जाए तो हम एक ऐसे ज्ञान को जन्म दिए हैं जो मैसोचिस्ट भी है और सैडिस्ट भी है। जो दूसरों को दुख देने में भी रस लेता है और खुद को दुख देने में भी रस लेता है। सुख की कोई हमारी धारणा नहीं है। अगर कोई आदमी अपने को दुख दे तो वह महात्मा हो जाता है और जो आदमी अपने को जितना दुख देने में कारीगिरी दिखलाए उतना श्रेष्ठ और पूज्य हो जाता है।
तो अगर पूरा समाज मैसोचिस्ट हो जाए, सारे का सारा समाज स्व-दुखवादी हो जाए, तो ही हमारा ज्ञान आचरण में आ सकता है, अन्यथा नहीं आ सकता। हमारा ज्ञान, जिसके मन में थोड़ी भी सुख की कामना हो, उसके आचरण में आने वाला नहीं है। हम सुख को स्वीकार ही नहीं करते। हमने किसी सुख की वृत्ति को सम्मान से नहीं देखा है। अगर एक आदमी ठीक से खाना खाए, तो सम्मानित नहीं हो सकता; भूखा मरे, उपवास करे, तो सम्मानित हो सकता है। ठीक से कपड़े पहने, तो सम्मानित नहीं हो सकता; नंगा खड़ा हो जाए, तो सम्मानित हो सकता है। कोई आदमी जितना अपने को दुख दे, जितना सताए, उतना त्याग, और त्याग की बड़ी महिमा!
अब यह दुर्भाग्य की बात है कि अगर कोई भी समाज इस तरह के दृष्टिकोण पकड़ेगा, तो कितने लोग अपने को दुख देने के लिए तैयार हो सकते हैं? और अच्छा है कि तैयार नहीं होते, नहीं तो पूरा समाज पागलखाना हो जाए। थोड़े से लोग ही हो पाते हैं। और वे भी इसीलिए हो पाते हैं कि मौलिक रूप से वे रुग्ण हैं और विक्षिप्त हैं। उनके मस्तिष्क में कहीं न कहीं कोई रोग है। वे एबनार्मल हैं। नार्मल नहीं हैं।
तो जिस देश की ज्ञान-धारा एबनार्मल आदमी को उपयोगी सिद्ध होती हो और नार्मल आदमी को अनुपयोगी सिद्ध होती हो, वह आचरण में नहीं आ सकती। फिर यही हो सकता है कि दस-पांच बड़े-बड़े नाम लेने को लोग पैदा हो जाएं, शेष सारा का सारा समाज बिलकुल उलटा मालूम पड़े। इसका जो गहरे से गहरा दुष्परिणाम होगा वह यह होगा कि हम जो विकास करते हैं धारणाओं का, वह थोड़े से अतिवादी लोगों के काम पड़ती हैं, और सामान्य आदमी के जीवन को विकास करने की कोई धारणा ही हम विकसित नहीं करते। तो उसका परिणाम समझ लें।
अगर कोई समाज ऐसा नियम बना ले कि जो आदमी शीर्षासन करता है वही अच्छा आदमी है, और जितनी देर शीर्षासन करता है उतना ही अच्छा आदमी है, तो दस-पांच लोग मिल जाएंगे अहमदाबाद में जो दिन भर शीर्षासन करते रहें। बाकी लोग नहीं कर पाएंगे। जो नहीं कर पाएंगे, वे निंदित हो जाएंगे। नहीं कर पाएंगे तो उनकी पूजा करेंगे जो कर रहे हैं, उनका हाथ जोड़ कर नमस्कार करेंगे कि ये बहुत महापुरुष हैं।
लेकिन ये शीर्षासन करने वाले लोग भी किसी काम के सिद्ध नहीं होने वाले। और शीर्षासन को आपने कोई केंद्रीय आदर्श बना लिया, तो बाकी सब लोगों के जीवन आदर्शहीन हो जाएंगे। क्योंकि एक ही आदर्श है कि शीर्षासन जो कर ले तो काम हो गया। जो नहीं कर पाए वह आत्मग्लानि अनुभव करेगा।
तो भारत में हर आदमी आत्मग्लानि से भरा हुआ है। और जो करने योग्य बताया जाता है वह कर नहीं पाता है। इसलिए भारत का आचरण ऊपर नहीं उठ पाया।
अगर हम आचरण को ऊपर उठाना चाहते हों, तो हमें ज्ञान की पूरी फाउंडेशंस बदल देनी पड़ेंगी। एक तो परलोक से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा, इस लोक से जोड़ना पड़ेगा। दुख से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा और सुख से जोड़ना पड़ेगा। परमात्मा से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा, पदार्थ से जोड़ना पड़ेगा। जीवन की एक आनंदपूर्ण, रसपूर्ण दृष्टि विकसित करनी पड़ेगी। और सामान्य और सरल और नैसर्गिक जो संभव है एक सामान्य, सरल, नैसर्गिक व्यक्ति के लिए, उसको ध्यान में रख कर पुनर्विचार करना पड़ेगा, तो इस देश का आचरण बदलेगा। नहीं तो इस देश का आचरण रोज ही नीचे गिरता चला जाएगा।
तो मैं यह नहीं कहता हूं कि ज्ञान आपके पास ठीक-ठीक है, सिर्फ आचरण नहीं है। ज्ञान ही बुनियादी रूप से गलत है, इसलिए आचरण नहीं है। और अगर सिर्फ आचरण ठीक करने की आपने कोशिश की, तो वह तो कोशिश हम पांच हजार साल से कर रहे हैं। और ज्ञान को हम माने बैठे हैं कि वह ठीक है ही, सिर्फ आचरण को ठीक करना है। वह पांच हजार साल से आप असफल हुए हैं। आगे आप पचास हजार साल भी कोशिश करते रहें, आप असफल होते चले जाएंगे। आगे असफलता और बढ़ेगी, क्योंकि आदमी और भी ज्यादा बुद्धिमान होता चला जाएगा।
यह जो ज्ञान था, जितना निर्बुद्धि समाज हो, उसमें थोड़ा-बहुत सफल भी हो सकता था, इस बुद्धिमान समाज में इसकी असफलता और भी निश्र्चित है। पूरे ज्ञान की पुनर्विचारणा की जरूरत है।
ज्ञान के ठीक होने का सबूत क्या है?
ज्ञान के ठीक होने का सबूत यही है कि उसके अनुकूल जीवन बदल जाए। अगर जीवन न बदलता हो, तो ज्ञान बुनियादी रूप से गलत रहा होगा, कहीं न कहीं भ्रांत रहा होगा।
यह तो पहली बात कि इस मुल्क को यह भ्रम है कि हमारा ज्ञान तो बड़ा श्रेष्ठ है, लेकिन आचरण हमारा बड़ा नीचा है। तो हम शायद ऐसा सोचते हैं कि ज्ञान को आचरण में नहीं ला पाए, इसलिए ऐसी भूल हो गई। ज्ञान आचरण में आ ही जाता है, जैसे मनुष्य के पीछे छाया चलती है। ज्ञान को आचरण में लाने से बचना असंभव है। ज्ञान ही भ्रांत रहा हो, तो बात हो सकती है।
मेरी दृष्टि में, हमें ज्ञान के ही आमूल आधार बदलने होंगे। ज्ञान में ही कुछ बुनियादी भूलें थीं। जैसे मैं कुछ भूलें गिनाऊं, जिनकी वजह से वह हमारे समाज का आचरण नहीं बन सका। जैसे, इस देश का पूरा ज्ञान जीवन-विरोधी है, लाइफ निगेटिव है। जिस देश का ज्ञान जीवन-विरोधी हो, उस देश का ज्ञान कभी भी जीवन-रूपांतरित करने वाला सिद्ध नहीं हो सकता। जिस देश का ज्ञान मोक्ष जाने के आस-पास मंडराता हो, जिस देश का ज्ञान मृत्यु के बाद के लिए विचार करता हो, जिस देश का ज्ञान जीवन से मुक्त होने की, जीवन से, आवागमन से छुटकारा पाने की चेष्टा करता हो, उस देश का ज्ञान कभी भी जीवन का आधार नहीं बन सकता। ज्ञान लाइफ अफरमेटिव हो, जीवन को विधायकता देता हो, जीवन को स्वीकृति देता हो, जीवन के आनंद को उपलब्ध करने का मार्ग और दिशा देता हो, तो ज्ञान आचरण में और जीवन में उतर सकता है।
इस मुल्क का जो ज्ञान है, वह सुसाइडल है, वह आत्मघाती है। आत्मघाती ज्ञान को अगर जीवन में उतारना हो, तो कुछ थोड़े से लोग ही उतार सकते हैं, जिनके भीतर सुसाइड की मौलिक इंस्ंिटक्ट हो, बाकी लोग नहीं उतार सकते। जिन लोगों के लिए जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण जीवन के बाद का लोक हो, और जिनके लिए जिंदा रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण मर जाने की कला हो, और जिनके लिए जीने से ज्यादा भाग जाना कीमती लगता हो, ऐसे थोड़े से रुग्ण-चित्त लोग, बीमार-चित्त लोग ही इस ज्ञान को जीवन में उतार सकते हैं। शेष पूरा का पूरा समाज अप्रभावित रह जाएगा।
इस देश की पूरी की पूरी चिंतना पारलौकिक है, अदरवर्ल्डली है, और इसलिए बेमानी हो गई है। ज्ञान तो इस जीवन को बदलने, इस जीवन को सुंदर बनाने, इस जीवन को श्रेष्ठता देने, इस जीवन को एक कलात्मक रूप देने के लिए हो, तो जीवन को बदलने वाला हो सकता है। तो पहली तो बात यह है।
दूसरी बात यह कि हम जीवन में जो भी रसपूर्ण है, जीवन में जो भी भोगने योग्य है, जीवन में जो भी सुंदर है, सबकी गहरी निंदा से भरे हुए लोग हैं। ठीक से कहा जाए तो हम एक ऐसे ज्ञान को जन्म दिए हैं जो मैसोचिस्ट भी है और सैडिस्ट भी है। जो दूसरों को दुख देने में भी रस लेता है और खुद को दुख देने में भी रस लेता है। सुख की कोई हमारी धारणा नहीं है। अगर कोई आदमी अपने को दुख दे तो वह महात्मा हो जाता है और जो आदमी अपने को जितना दुख देने में कारीगिरी दिखलाए उतना श्रेष्ठ और पूज्य हो जाता है।
तो अगर पूरा समाज मैसोचिस्ट हो जाए, सारे का सारा समाज स्व-दुखवादी हो जाए, तो ही हमारा ज्ञान आचरण में आ सकता है, अन्यथा नहीं आ सकता। हमारा ज्ञान, जिसके मन में थोड़ी भी सुख की कामना हो, उसके आचरण में आने वाला नहीं है। हम सुख को स्वीकार ही नहीं करते। हमने किसी सुख की वृत्ति को सम्मान से नहीं देखा है। अगर एक आदमी ठीक से खाना खाए, तो सम्मानित नहीं हो सकता; भूखा मरे, उपवास करे, तो सम्मानित हो सकता है। ठीक से कपड़े पहने, तो सम्मानित नहीं हो सकता; नंगा खड़ा हो जाए, तो सम्मानित हो सकता है। कोई आदमी जितना अपने को दुख दे, जितना सताए, उतना त्याग, और त्याग की बड़ी महिमा!
अब यह दुर्भाग्य की बात है कि अगर कोई भी समाज इस तरह के दृष्टिकोण पकड़ेगा, तो कितने लोग अपने को दुख देने के लिए तैयार हो सकते हैं? और अच्छा है कि तैयार नहीं होते, नहीं तो पूरा समाज पागलखाना हो जाए। थोड़े से लोग ही हो पाते हैं। और वे भी इसीलिए हो पाते हैं कि मौलिक रूप से वे रुग्ण हैं और विक्षिप्त हैं। उनके मस्तिष्क में कहीं न कहीं कोई रोग है। वे एबनार्मल हैं। नार्मल नहीं हैं।
तो जिस देश की ज्ञान-धारा एबनार्मल आदमी को उपयोगी सिद्ध होती हो और नार्मल आदमी को अनुपयोगी सिद्ध होती हो, वह आचरण में नहीं आ सकती। फिर यही हो सकता है कि दस-पांच बड़े-बड़े नाम लेने को लोग पैदा हो जाएं, शेष सारा का सारा समाज बिलकुल उलटा मालूम पड़े। इसका जो गहरे से गहरा दुष्परिणाम होगा वह यह होगा कि हम जो विकास करते हैं धारणाओं का, वह थोड़े से अतिवादी लोगों के काम पड़ती हैं, और सामान्य आदमी के जीवन को विकास करने की कोई धारणा ही हम विकसित नहीं करते। तो उसका परिणाम समझ लें।
अगर कोई समाज ऐसा नियम बना ले कि जो आदमी शीर्षासन करता है वही अच्छा आदमी है, और जितनी देर शीर्षासन करता है उतना ही अच्छा आदमी है, तो दस-पांच लोग मिल जाएंगे अहमदाबाद में जो दिन भर शीर्षासन करते रहें। बाकी लोग नहीं कर पाएंगे। जो नहीं कर पाएंगे, वे निंदित हो जाएंगे। नहीं कर पाएंगे तो उनकी पूजा करेंगे जो कर रहे हैं, उनका हाथ जोड़ कर नमस्कार करेंगे कि ये बहुत महापुरुष हैं।
लेकिन ये शीर्षासन करने वाले लोग भी किसी काम के सिद्ध नहीं होने वाले। और शीर्षासन को आपने कोई केंद्रीय आदर्श बना लिया, तो बाकी सब लोगों के जीवन आदर्शहीन हो जाएंगे। क्योंकि एक ही आदर्श है कि शीर्षासन जो कर ले तो काम हो गया। जो नहीं कर पाए वह आत्मग्लानि अनुभव करेगा।
तो भारत में हर आदमी आत्मग्लानि से भरा हुआ है। और जो करने योग्य बताया जाता है वह कर नहीं पाता है। इसलिए भारत का आचरण ऊपर नहीं उठ पाया।
अगर हम आचरण को ऊपर उठाना चाहते हों, तो हमें ज्ञान की पूरी फाउंडेशंस बदल देनी पड़ेंगी। एक तो परलोक से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा, इस लोक से जोड़ना पड़ेगा। दुख से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा और सुख से जोड़ना पड़ेगा। परमात्मा से ज्ञान को मुक्त करना पड़ेगा, पदार्थ से जोड़ना पड़ेगा। जीवन की एक आनंदपूर्ण, रसपूर्ण दृष्टि विकसित करनी पड़ेगी। और सामान्य और सरल और नैसर्गिक जो संभव है एक सामान्य, सरल, नैसर्गिक व्यक्ति के लिए, उसको ध्यान में रख कर पुनर्विचार करना पड़ेगा, तो इस देश का आचरण बदलेगा। नहीं तो इस देश का आचरण रोज ही नीचे गिरता चला जाएगा।
तो मैं यह नहीं कहता हूं कि ज्ञान आपके पास ठीक-ठीक है, सिर्फ आचरण नहीं है। ज्ञान ही बुनियादी रूप से गलत है, इसलिए आचरण नहीं है। और अगर सिर्फ आचरण ठीक करने की आपने कोशिश की, तो वह तो कोशिश हम पांच हजार साल से कर रहे हैं। और ज्ञान को हम माने बैठे हैं कि वह ठीक है ही, सिर्फ आचरण को ठीक करना है। वह पांच हजार साल से आप असफल हुए हैं। आगे आप पचास हजार साल भी कोशिश करते रहें, आप असफल होते चले जाएंगे। आगे असफलता और बढ़ेगी, क्योंकि आदमी और भी ज्यादा बुद्धिमान होता चला जाएगा।
यह जो ज्ञान था, जितना निर्बुद्धि समाज हो, उसमें थोड़ा-बहुत सफल भी हो सकता था, इस बुद्धिमान समाज में इसकी असफलता और भी निश्र्चित है। पूरे ज्ञान की पुनर्विचारणा की जरूरत है।
इसी संबंध में एक प्रश्र्न और पूछा है कि क्या आत्म-साक्षात्कार, सेल्फ-रियलाइजेशन सेवा के द्वारा नहीं होना चाहिए? क्या वही उचित नहीं है कि सेवा के द्वारा आत्म-साक्षात्कार हो?
इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी होगा। पहली तो बात यह है, आत्म-साक्षात्कार न हुआ हो, तो कोई आदमी कभी सेवा कर ही नहीं सकता। आत्म-साक्षात्कार के पहले तो सेवा असंभव है। आत्म-साक्षात्कार के पहले तो स्वार्थ ही संभव है, सेवा असंभव है। असल में आत्म-साक्षात्कार से ही यह पता चलता है कि मैं और दूसरा दो नहीं हैं। आत्म-साक्षात्कार से ही यह पता चलता है कि वह जो दूसरा है वह भी मैं ही हूं, तो उसकी सेवा भी मेरा स्वार्थ बन जाती है। जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं है--मैं अलग हूं, आप अलग हैं। और अगर मैं सेवा भी करूंगा, तो सेवा भी ऊपर का धोखा और पाखंड होगी, भीतर कोई स्वार्थ ही होगा। हम चारों तरफ सेवकों को भलीभांति जानते हैं और देखते हैं। सेवक बुनियादी रूप से अगर आत्म-साक्षात्कार की दिशा में गया हुआ व्यक्ति नहीं है, तो सेवा भी उसकी अहंकार की तृप्ति का, यश की तृप्ति का, महत्वाकांक्षा, एंबीशन की तृप्ति का माध्यम बनेगी। और सेवक भी मौके की तलाश में रहेगा कब मालिक हो जाए।
हिंदुस्तान में तो हम देख रहे हैं कि बीस साल में सेवक किस बुरी तरह मालिक हो गए हैं। जिन-जिन ने सेवा की है, वे इस बुरी तरह बदला ले रहे हैं कि अब आगे लोग सेवा न करें तो बड़ा अच्छा। सेवक सेवा करके फिर ऐसा बदला लेता है कि जिसका कोई हिसाब नहीं। और सब सेवक इसी तलाश में रहते हैं, कब मौका मिले कि वह आपकी गर्दन पकड़ ले।
सेवा हो ही नहीं सकती आत्म-साक्षात्कार के पूर्व।
इसलिए कोई यह तो भूल कर न सोचे कि सेवा के द्वारा आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। आत्म-साक्षात्कार से सेवा निष्पन्न हो सकती है, आत्म-साक्षात्कार से सेवा जीवन बन सकती है, लेकिन सेवा से कोई आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता।
हम जानते हैं कि दुनिया में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं और वे सेवा कर रहे हैं। ईसाई मिशनरी़ज हैं, वे सारी दुनिया में सेवा कर रहे हैं। उनकी नकल पर बने हुए रामकृष्ण-मिशन जैसे लोग हैं, जो सेवा कर रहे हैं। और सारी दुनिया में धीरे-धीरे बहुत सेवा करने वाले लोग हैं। सर्वोदय वाले हैं, और सब तरह के लोग हैं। अगर इनकी सेवा के पीछे इनकी मोटिविटी, इनका मोटिव, सबकी खोज-बीन की जाए, तो बहुत हैरानी होगी।
मैं एक छोटी सी कहानी कहूं आपसे।
चीन में एक जगह बहुत बड़ा मेला लगा हुआ है। और एक कुआं है, जिस पर पाट नहीं है। और एक आदमी उस कुएं में गिर गया। और वह चिल्ला रहा है कि मुझे बचाओ! तो वहां से एक बौद्ध भिक्षु निकलता है और वह नीचे झांक कर देखता है। वह आदमी चिल्लाता है कि भिक्षु जी मुझे बाहर निकालिए, मैं मर रहा हूं, मैं तैरना भी नहीं जानता हूं, ज्यादा देर बच भी नहीं सकता, ईंट को कितनी देर पकड़े रहूंगा? वह भिक्षु कहता है, निकल कर भी क्या करोगे? बाहर भी दुख है, सब जगह दुख है। जो कुएं के बाहर हैं वे भी एक बड़े कुएं में पड़े हैं। और भगवान ने कहा है, बुद्ध ने कहा है, दुख तो जीवन है। तो जीवन से मुक्त हुए बिना दुख से कोई बाहर हो नहीं सकता। तो कुएं से निकल कर भी क्या करोगे? जीवन से निकलने की कोशिश करो। वह चिल्लाता है कि मैं आपका उपदेश सुनूंगा, पहले मुझे बाहर निकाल लें। लेकिन वह भिक्षु कहता है कि यह भी भगवान ने कहा है कि दूसरे के कर्मों के बीच में बाधा नहीं आना चाहिए। मैं तुम्हें बचा लूं और तुम चोरी करो और हत्या कर दो, तो जिम्मेवार मैं भी हो जाऊंगा। मैं अपने रास्ते जाता हूं, तुम अपने रास्ते जाते हो, हमारा कहीं रास्ता कटता ही नहीं। मेरे अपने कर्मों की धारा है, तुम्हारी अपने कर्मों की धारा है। वह भिक्षु आगे चला जाता है।
उसके पीछे एक कनफ्यूशियस को मानने वाला एक दूसरा भिक्षु आता है। वह नीचे झांक कर देखता है। वह फिर चिल्लाता है नीचे से, वह मरता हुआ आदमी कहता है, मुझे बचाओ! वह कनफ्यूशियन मांक कहता है कि मैं तुम्हें बचाऊंगा जरूर, तुम घबड़ाओ मत, कनफ्यूशियस ने लिखा है अपनी किताब में कि हर कुएं के ऊपर पाट जरूर होना चाहिए। जिस कुएं पर पाट न हो, जिस राज्य में बिना पाट के कुएं हों, वह राजा अधर्मी है। तुम घबड़ाओ मत। हम आंदोलन चलाएंगे। हम हर कुएं पर पाट बनवा देंगे। तुम बिलकुल बेफिकर रहो।
वह आदमी कहता है, मैं बेफिकर कैसे रहूं? पाट जब बनेंगे बनेंगे, मैं तो मर ही जाऊंगा। और वह आदमी कहता है, सवाल तुम्हारा नहीं, सवाल समाज का है। सवाल सबका है। मैं तो सबकी सेवा में संलग्न हूं। एक-एक आदमी की सेवा कहां से करूंगा? और एक-एक आदमी की सेवा करूंगा तो समाज का क्या होगा? तुम बेफिकर रहो, मैं जाता हूं और अभी मेले में आंदोलन चलाता हूं।
वह आदमी मेले में चला जाता है। मंच पर खड़े होकर लोगों को समझाने लगता है कि हर कुएं पर पाट होना चाहिए। जो कुएं पर पाट बनवाता है, बड़ी सेवा करता है। जिस राज्य में कुएं पर पाट नहीं, वह राज्य बड़ा अधर्मी है।
उसके पीछे एक ईसाई मिशनरी उस कुएं के घाट पर आता है। वह नीचे झांक कर देखता है। वह आदमी चिल्लाता है। ईसाई मिशनरी झोले में से रस्सी निकालता है, रस्सी बांध कर कुएं में डालता है, उतरता है, उस आदमी को निकाल कर बाहर लाता है। वह आदमी उसके पैर पर गिर जाता है और कहता है कि तुम्हीं एक सच्चे धार्मिक आदमी मालूम पड़ते हो। तुमने बड़ी कृपा की मुझे जो बचाया! लेकिन मैं तुमसे यह पूछना चाहता हूं, झोले में तुम रस्सी रखे कैसे थे?
वह आदमी कहने लगा: हम घर से तैयारी करके निकलते हैं। हमारा सेवा ही धंधा है। हम पहले से ही तैयार होकर निकलते हैं कि कोई कुएं में गिरे, कहीं आग लगे, कहीं कुछ हो। तो हम तैयारी रखते हैं। हम सब तैयारी रखते हैं। हम तो सेवा को ही धर्म मानते हैं। क्योंकि भगवान ने कहा है, जीसस ने कहा है कि जो सेवा करेगा वही मोक्ष पा सकेगा। तुम कुएं में गिरे, तुमने बड़ी कृपा की, हमारे मोक्ष का मार्ग साफ हुआ। अपने बच्चों को भी समझा जाना कि कुओं में गिरें, ताकि हमारे बच्चे उन्हें कुओं से निकालते रहें। क्योंकि मोक्ष बिना सेवा के नहीं मिलता है।
मोक्ष पाना जरूरी है, तो सेवा करनी जरूरी है। या तो सेवा करने वाला मोक्ष जाने की कोशिश कर रहा है, तब, तब भी स्वार्थ है। या सेवा करने वाला चारों तरफ अखबारों में खबर छपवाने की कोशिश कर रहा है, तब भी यश है। या सेवा करने वाला कुछ भीतरी बीमारियों, परेशानियों, चिंताओं से इतना घबड़ाया और परेशान है कि कुछ भी करना चाहता है और कहीं भी अपने को आकुपाइड और व्यस्त कर लेना चाहता है, तो वह इस काम में लगा हुआ है। या वह किन्हीं पदों की यात्रा करना चाहता है और सेवा के द्वारा उन पदों पर पहुंच जाना चाहता है।
लेकिन सेवा तभी सेवा बन सकती है जब किसी व्यक्ति को यह अनुभव हुआ हो कि ‘मैं’ और ‘तू’ के बीच जो फासला है, वह झूठ है। मैं ही हूं। लेकिन यह आत्म-साक्षात्कार से ही हो सकता है। दूसरे का आनंद भी मेरा ही आनंद है। जिस दिन दूसरे के आनंद और मेरे आनंद में कोई बाधा नहीं, कोई दीवाल नहीं, कोई भेद नहीं, दूसरे के आनंदित होने में ही मैं आनंदित हो जाता हूं, जिस दिन ऐसी संभावना बने, उस दिन तो सेवा हो सकती है। उसके पहले सेवा का नाम हो सकता है, पीछे स्वार्थ ही होगा। और तब सेवा खतरनाक भी हो सकती है।
अगर दुनिया में सेवकों के द्वारा की गई मिस्चीफ का हम हिसाब लगाएं, तो बहुत घबड़ाहट होगी। जितने लोग दुनिया का सुधार करने और दुनिया की सेवा करने के लिए उत्सुक हुए हैं, अगर उन सबने जो परिणाम लाया है दुनिया में, उसको हम देखें, तो ऐसा लगेगा कि आदमी को उसके भाग्य पर छोड़ दो, और सेवको, तुम जरा दूर हट जाओ, तो शायद दुनिया ठीक हो जाए।
सब सेवा कर रहे हैं--इस्लाम सेवा कर रहा है, हिंदू सेवा कर रहे हैं, ईसाई सेवा कर रहे हैं...सारी दुनिया सेवा कर रही है। और सेवा का परिणाम क्या हो रहा है? ये सब सेवा करने वाले आदमी को कहां ले जा रहे हैं? किस गड्ढे में डाल रहे हैं?
इस सेवा के पीछे प्रयोजन दूसरे ही हैं। इस सेवा के पीछे कारण दूसरे ही हैं, हेतु दूसरे हैं। और होंगे ही, क्योंकि जब तक कोई आत्म-साक्षात्कार को उपलब्ध न हुआ हो, तब तक हेतु से, मोटिव से, स्वार्थ से मुक्त नहीं होता है। और अगर यह खयाल पकड़ जाए कि सेवा करनी ही है, तब और कठिनाई हो जाती है।
मैंने एक घटना सुनी है। एक स्कूल में एक ईसाई पादरी बच्चों को समझाता है कि सेवा जरूर करनी चाहिए। कम से कम एक दिन में एक सेवा का कार्य करना चाहिए। जब मैं दुबारा आऊं तो तुमसे पूछूंगा, तुमने कोई सेवा का कार्य किया? सात दिन बाद वह आता है और बच्चों से पूछता है। एक बच्चा हाथ हिलाता है कि हां, मैंने सेवा की। दूसरा बच्चा, तीसरा बच्चा, तीन बच्चे तीस बच्चों में हाथ हिलाते हैं कि हमने सेवा की। वह पादरी कहता है, बहुत बड़ा काम किया। फिर भी तीस में से तीन ने की सेवा, तब भी ठीक है। पहले से पूछता है, क्या तुमने सेवा की? वह बच्चा कहता है, मैंने एक बूढ़ी स्त्री को सड़क के पार करवाया। कहता है, बहुत अच्छा किया। बूढ़ी स्त्रियों को सदा सड़क के पार करवाना चाहिए। दूसरे से पूछता है, तुमने क्या किया? वह कहता है, मैंने भी एक बूढ़ी स्त्री को सड़क के पार करवाया।
तब उसे थोड़ा शक होता है कि दो बुढ़ियां मिल गईं? फिर वह सोचता है, इतनी बुढ़ियां हैं। कोई दिक्कत नहीं, दो भी मिल सकती हैं। वह तीसरे से पूछता है, तुमने क्या किया? वह कहता है, मैंने भी एक बूढ़ी औरत को सड़क के पार करवाया।
तब वह थोड़ा हैरान होता है। वह कहता है, तुम्हें तीन बुढ़ियां मिल गईं! उन्होंने कहा: नहीं, तीन बुढ़ियां नहीं थीं, एक ही बूढ़ी थी। हम तीनों ने मिल कर पार करवाया। वह कहता है, तो क्या बूढ़ी इतनी अशक्त हालत में थी कि अकेला कोई पार नहीं करवा सकता था? वे बोले: अशक्त नहीं थी, काफी मजबूत थी, और बिलकुल पार होना ही नहीं चाहती थी, बामुश्किल हम पार करवा पाए। और आपने कहा था, सेवा का कोई कार्य करना चाहिए। आपने कहा था, किसी बूढ़े को रास्ता पार करवा दो, किसी डूबते को बचाओ, किसी आग लगे वाले को निकालो। तो हमें सबसे सरल यही मालूम पड़ा कि किसी बूढ़े को हम रास्ता पार करा दें।
अगर एक बार यह दिमाग में खयाल पकड़ाया जाए कि सेवा करो--और सेवा करना दिमाग के लिए मोक्ष या स्वर्ग या अच्छे आदमी होने का आधार बन जाए, तो सेवा मिस्चीफ हो जाने वाली है। और वह मिस्चीफ हो गई है।
नहीं, मैं नहीं मानता हूं कि सेवा कोई आत्म-साक्षात्कार या सेल्फ-रियलाइजेशन का रास्ता है। सेल्फ-रियलाइजेशन का रास्ता तो बिलकुल दूसरा है। वह तो ध्यान है या समाधि है। हां, ध्यान और समाधि के मार्ग से चला हुआ व्यक्ति जब स्वयं के साक्षात की थोड़ी सी भी झलक पाता है, तो उस झलक की परिणति सेवा में होनी शुरू हो जाती है। वह सेवा बात ही और है। उस आदमी को पता भी नहीं चलता है कि मैंने किसी की सेवा की है। उसे यह भी पता नहीं चलता कि सेवा करके मैंने कोई उपकार किया है। उसे यह भी पता नहीं चलता कि सेवा की है तो कुछ विशेष किया है। यह सेवा उसके लिए सहज स्वभाव बन जाती है। और जिस दिन सेवा स्वभाव बने, उसी दिन अर्थपूर्ण है। उसके पहले अर्थपूर्ण नहीं है।
हिंदुस्तान में तो हम देख रहे हैं कि बीस साल में सेवक किस बुरी तरह मालिक हो गए हैं। जिन-जिन ने सेवा की है, वे इस बुरी तरह बदला ले रहे हैं कि अब आगे लोग सेवा न करें तो बड़ा अच्छा। सेवक सेवा करके फिर ऐसा बदला लेता है कि जिसका कोई हिसाब नहीं। और सब सेवक इसी तलाश में रहते हैं, कब मौका मिले कि वह आपकी गर्दन पकड़ ले।
सेवा हो ही नहीं सकती आत्म-साक्षात्कार के पूर्व।
इसलिए कोई यह तो भूल कर न सोचे कि सेवा के द्वारा आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। आत्म-साक्षात्कार से सेवा निष्पन्न हो सकती है, आत्म-साक्षात्कार से सेवा जीवन बन सकती है, लेकिन सेवा से कोई आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता।
हम जानते हैं कि दुनिया में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं और वे सेवा कर रहे हैं। ईसाई मिशनरी़ज हैं, वे सारी दुनिया में सेवा कर रहे हैं। उनकी नकल पर बने हुए रामकृष्ण-मिशन जैसे लोग हैं, जो सेवा कर रहे हैं। और सारी दुनिया में धीरे-धीरे बहुत सेवा करने वाले लोग हैं। सर्वोदय वाले हैं, और सब तरह के लोग हैं। अगर इनकी सेवा के पीछे इनकी मोटिविटी, इनका मोटिव, सबकी खोज-बीन की जाए, तो बहुत हैरानी होगी।
मैं एक छोटी सी कहानी कहूं आपसे।
चीन में एक जगह बहुत बड़ा मेला लगा हुआ है। और एक कुआं है, जिस पर पाट नहीं है। और एक आदमी उस कुएं में गिर गया। और वह चिल्ला रहा है कि मुझे बचाओ! तो वहां से एक बौद्ध भिक्षु निकलता है और वह नीचे झांक कर देखता है। वह आदमी चिल्लाता है कि भिक्षु जी मुझे बाहर निकालिए, मैं मर रहा हूं, मैं तैरना भी नहीं जानता हूं, ज्यादा देर बच भी नहीं सकता, ईंट को कितनी देर पकड़े रहूंगा? वह भिक्षु कहता है, निकल कर भी क्या करोगे? बाहर भी दुख है, सब जगह दुख है। जो कुएं के बाहर हैं वे भी एक बड़े कुएं में पड़े हैं। और भगवान ने कहा है, बुद्ध ने कहा है, दुख तो जीवन है। तो जीवन से मुक्त हुए बिना दुख से कोई बाहर हो नहीं सकता। तो कुएं से निकल कर भी क्या करोगे? जीवन से निकलने की कोशिश करो। वह चिल्लाता है कि मैं आपका उपदेश सुनूंगा, पहले मुझे बाहर निकाल लें। लेकिन वह भिक्षु कहता है कि यह भी भगवान ने कहा है कि दूसरे के कर्मों के बीच में बाधा नहीं आना चाहिए। मैं तुम्हें बचा लूं और तुम चोरी करो और हत्या कर दो, तो जिम्मेवार मैं भी हो जाऊंगा। मैं अपने रास्ते जाता हूं, तुम अपने रास्ते जाते हो, हमारा कहीं रास्ता कटता ही नहीं। मेरे अपने कर्मों की धारा है, तुम्हारी अपने कर्मों की धारा है। वह भिक्षु आगे चला जाता है।
उसके पीछे एक कनफ्यूशियस को मानने वाला एक दूसरा भिक्षु आता है। वह नीचे झांक कर देखता है। वह फिर चिल्लाता है नीचे से, वह मरता हुआ आदमी कहता है, मुझे बचाओ! वह कनफ्यूशियन मांक कहता है कि मैं तुम्हें बचाऊंगा जरूर, तुम घबड़ाओ मत, कनफ्यूशियस ने लिखा है अपनी किताब में कि हर कुएं के ऊपर पाट जरूर होना चाहिए। जिस कुएं पर पाट न हो, जिस राज्य में बिना पाट के कुएं हों, वह राजा अधर्मी है। तुम घबड़ाओ मत। हम आंदोलन चलाएंगे। हम हर कुएं पर पाट बनवा देंगे। तुम बिलकुल बेफिकर रहो।
वह आदमी कहता है, मैं बेफिकर कैसे रहूं? पाट जब बनेंगे बनेंगे, मैं तो मर ही जाऊंगा। और वह आदमी कहता है, सवाल तुम्हारा नहीं, सवाल समाज का है। सवाल सबका है। मैं तो सबकी सेवा में संलग्न हूं। एक-एक आदमी की सेवा कहां से करूंगा? और एक-एक आदमी की सेवा करूंगा तो समाज का क्या होगा? तुम बेफिकर रहो, मैं जाता हूं और अभी मेले में आंदोलन चलाता हूं।
वह आदमी मेले में चला जाता है। मंच पर खड़े होकर लोगों को समझाने लगता है कि हर कुएं पर पाट होना चाहिए। जो कुएं पर पाट बनवाता है, बड़ी सेवा करता है। जिस राज्य में कुएं पर पाट नहीं, वह राज्य बड़ा अधर्मी है।
उसके पीछे एक ईसाई मिशनरी उस कुएं के घाट पर आता है। वह नीचे झांक कर देखता है। वह आदमी चिल्लाता है। ईसाई मिशनरी झोले में से रस्सी निकालता है, रस्सी बांध कर कुएं में डालता है, उतरता है, उस आदमी को निकाल कर बाहर लाता है। वह आदमी उसके पैर पर गिर जाता है और कहता है कि तुम्हीं एक सच्चे धार्मिक आदमी मालूम पड़ते हो। तुमने बड़ी कृपा की मुझे जो बचाया! लेकिन मैं तुमसे यह पूछना चाहता हूं, झोले में तुम रस्सी रखे कैसे थे?
वह आदमी कहने लगा: हम घर से तैयारी करके निकलते हैं। हमारा सेवा ही धंधा है। हम पहले से ही तैयार होकर निकलते हैं कि कोई कुएं में गिरे, कहीं आग लगे, कहीं कुछ हो। तो हम तैयारी रखते हैं। हम सब तैयारी रखते हैं। हम तो सेवा को ही धर्म मानते हैं। क्योंकि भगवान ने कहा है, जीसस ने कहा है कि जो सेवा करेगा वही मोक्ष पा सकेगा। तुम कुएं में गिरे, तुमने बड़ी कृपा की, हमारे मोक्ष का मार्ग साफ हुआ। अपने बच्चों को भी समझा जाना कि कुओं में गिरें, ताकि हमारे बच्चे उन्हें कुओं से निकालते रहें। क्योंकि मोक्ष बिना सेवा के नहीं मिलता है।
मोक्ष पाना जरूरी है, तो सेवा करनी जरूरी है। या तो सेवा करने वाला मोक्ष जाने की कोशिश कर रहा है, तब, तब भी स्वार्थ है। या सेवा करने वाला चारों तरफ अखबारों में खबर छपवाने की कोशिश कर रहा है, तब भी यश है। या सेवा करने वाला कुछ भीतरी बीमारियों, परेशानियों, चिंताओं से इतना घबड़ाया और परेशान है कि कुछ भी करना चाहता है और कहीं भी अपने को आकुपाइड और व्यस्त कर लेना चाहता है, तो वह इस काम में लगा हुआ है। या वह किन्हीं पदों की यात्रा करना चाहता है और सेवा के द्वारा उन पदों पर पहुंच जाना चाहता है।
लेकिन सेवा तभी सेवा बन सकती है जब किसी व्यक्ति को यह अनुभव हुआ हो कि ‘मैं’ और ‘तू’ के बीच जो फासला है, वह झूठ है। मैं ही हूं। लेकिन यह आत्म-साक्षात्कार से ही हो सकता है। दूसरे का आनंद भी मेरा ही आनंद है। जिस दिन दूसरे के आनंद और मेरे आनंद में कोई बाधा नहीं, कोई दीवाल नहीं, कोई भेद नहीं, दूसरे के आनंदित होने में ही मैं आनंदित हो जाता हूं, जिस दिन ऐसी संभावना बने, उस दिन तो सेवा हो सकती है। उसके पहले सेवा का नाम हो सकता है, पीछे स्वार्थ ही होगा। और तब सेवा खतरनाक भी हो सकती है।
अगर दुनिया में सेवकों के द्वारा की गई मिस्चीफ का हम हिसाब लगाएं, तो बहुत घबड़ाहट होगी। जितने लोग दुनिया का सुधार करने और दुनिया की सेवा करने के लिए उत्सुक हुए हैं, अगर उन सबने जो परिणाम लाया है दुनिया में, उसको हम देखें, तो ऐसा लगेगा कि आदमी को उसके भाग्य पर छोड़ दो, और सेवको, तुम जरा दूर हट जाओ, तो शायद दुनिया ठीक हो जाए।
सब सेवा कर रहे हैं--इस्लाम सेवा कर रहा है, हिंदू सेवा कर रहे हैं, ईसाई सेवा कर रहे हैं...सारी दुनिया सेवा कर रही है। और सेवा का परिणाम क्या हो रहा है? ये सब सेवा करने वाले आदमी को कहां ले जा रहे हैं? किस गड्ढे में डाल रहे हैं?
इस सेवा के पीछे प्रयोजन दूसरे ही हैं। इस सेवा के पीछे कारण दूसरे ही हैं, हेतु दूसरे हैं। और होंगे ही, क्योंकि जब तक कोई आत्म-साक्षात्कार को उपलब्ध न हुआ हो, तब तक हेतु से, मोटिव से, स्वार्थ से मुक्त नहीं होता है। और अगर यह खयाल पकड़ जाए कि सेवा करनी ही है, तब और कठिनाई हो जाती है।
मैंने एक घटना सुनी है। एक स्कूल में एक ईसाई पादरी बच्चों को समझाता है कि सेवा जरूर करनी चाहिए। कम से कम एक दिन में एक सेवा का कार्य करना चाहिए। जब मैं दुबारा आऊं तो तुमसे पूछूंगा, तुमने कोई सेवा का कार्य किया? सात दिन बाद वह आता है और बच्चों से पूछता है। एक बच्चा हाथ हिलाता है कि हां, मैंने सेवा की। दूसरा बच्चा, तीसरा बच्चा, तीन बच्चे तीस बच्चों में हाथ हिलाते हैं कि हमने सेवा की। वह पादरी कहता है, बहुत बड़ा काम किया। फिर भी तीस में से तीन ने की सेवा, तब भी ठीक है। पहले से पूछता है, क्या तुमने सेवा की? वह बच्चा कहता है, मैंने एक बूढ़ी स्त्री को सड़क के पार करवाया। कहता है, बहुत अच्छा किया। बूढ़ी स्त्रियों को सदा सड़क के पार करवाना चाहिए। दूसरे से पूछता है, तुमने क्या किया? वह कहता है, मैंने भी एक बूढ़ी स्त्री को सड़क के पार करवाया।
तब उसे थोड़ा शक होता है कि दो बुढ़ियां मिल गईं? फिर वह सोचता है, इतनी बुढ़ियां हैं। कोई दिक्कत नहीं, दो भी मिल सकती हैं। वह तीसरे से पूछता है, तुमने क्या किया? वह कहता है, मैंने भी एक बूढ़ी औरत को सड़क के पार करवाया।
तब वह थोड़ा हैरान होता है। वह कहता है, तुम्हें तीन बुढ़ियां मिल गईं! उन्होंने कहा: नहीं, तीन बुढ़ियां नहीं थीं, एक ही बूढ़ी थी। हम तीनों ने मिल कर पार करवाया। वह कहता है, तो क्या बूढ़ी इतनी अशक्त हालत में थी कि अकेला कोई पार नहीं करवा सकता था? वे बोले: अशक्त नहीं थी, काफी मजबूत थी, और बिलकुल पार होना ही नहीं चाहती थी, बामुश्किल हम पार करवा पाए। और आपने कहा था, सेवा का कोई कार्य करना चाहिए। आपने कहा था, किसी बूढ़े को रास्ता पार करवा दो, किसी डूबते को बचाओ, किसी आग लगे वाले को निकालो। तो हमें सबसे सरल यही मालूम पड़ा कि किसी बूढ़े को हम रास्ता पार करा दें।
अगर एक बार यह दिमाग में खयाल पकड़ाया जाए कि सेवा करो--और सेवा करना दिमाग के लिए मोक्ष या स्वर्ग या अच्छे आदमी होने का आधार बन जाए, तो सेवा मिस्चीफ हो जाने वाली है। और वह मिस्चीफ हो गई है।
नहीं, मैं नहीं मानता हूं कि सेवा कोई आत्म-साक्षात्कार या सेल्फ-रियलाइजेशन का रास्ता है। सेल्फ-रियलाइजेशन का रास्ता तो बिलकुल दूसरा है। वह तो ध्यान है या समाधि है। हां, ध्यान और समाधि के मार्ग से चला हुआ व्यक्ति जब स्वयं के साक्षात की थोड़ी सी भी झलक पाता है, तो उस झलक की परिणति सेवा में होनी शुरू हो जाती है। वह सेवा बात ही और है। उस आदमी को पता भी नहीं चलता है कि मैंने किसी की सेवा की है। उसे यह भी पता नहीं चलता कि सेवा करके मैंने कोई उपकार किया है। उसे यह भी पता नहीं चलता कि सेवा की है तो कुछ विशेष किया है। यह सेवा उसके लिए सहज स्वभाव बन जाती है। और जिस दिन सेवा स्वभाव बने, उसी दिन अर्थपूर्ण है। उसके पहले अर्थपूर्ण नहीं है।
एक मित्र ने पूछा है कि आप मानवता की बात करते हैं, तो क्या मानवता को आप इस्लाम में पूर्ण हुआ नहीं पाते हैं?
किसी वाद में, किसी सिद्धांत में मानवता कभी पूर्ण नहीं हो सकती है। जहां वाद है, जहां इज्म है, जहां शास्त्र है, जहां सिद्धांत है, जहां आइडियालॉजी है, वहां आदमी को आदमी से तोड़ने का उपाय है। कोई आइडियालॉजी आदमी आदमी को जोड़ नहीं सकती। मुझे और आपको जो तोड़ता है, वह विचार है। मेरा एक विचार है, आपका दूसरा विचार है। टूट शुरू हो गई। इस्लाम बात करता है मनुष्यता की, लेकिन इस्लाम ने मनुष्यता की जितनी हत्या की है उतनी किसी और ने की है? इस्लाम शब्द का मतलब होता है: शांति। जितनी अशांति इस्लाम ने फैलाई है किसी और ने फैलाई है? सारी दुनिया के धर्म यह बात करते हैं कि हम सबको जोड़ना चाहते हैं, लेकिन कोई धर्म सबको नहीं जोड़ पाया। बल्कि हर धर्म छोटे से टुकड़े को तोड़ कर और अलग खड़ा हो गया है। हर नया धर्म तोड़ने का एक नया उपाय बनता है, जोड़ने का तो नहीं बनता। तो फिर कुछ सोचना पड़ेगा कि जोड़ने और तोड़ने की प्रक्रिया क्या है?
जब भी मैं किसी विचार को संगठित करूंगा, तब किसी के खिलाफ संगठन होना शुरू हो जाएगा। जब भी विचार संगठित होगा। संगठन हमेशा घृणा पर खड़ा होता है और विरोध में खड़ा होता है। इस्लाम संगठित होगा, तो किसके खिलाफ? और हिंदू संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? और मुसलमान संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? और कम्युनिस्ट संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? संगठन सदा किसी के खिलाफ ही इकट्ठा होता है। संगठन प्रेम से नहीं बनते। अब तक प्रेमियों ने कोई संगठन नहीं बनाए। सब घृणा करने वाले लोगों के संगठन हैं। चाहे उनके नाम कुछ हों, नारे कुछ हों, तरकीब कुछ हो, लेकिन संगठन दूसरे की दुश्मनी में बनता है। और सब आइडियालॉजी संगठित होना चाहती हैं। चाहे वह इस्लाम हो, चाहे कोई और हो। चाहे ईसाइयत हो, चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो। मात्रा के भेद हो सकते हैं। लेकिन सिद्धांत जब संगठित होता है तो वह एक गढ़ बनता है। और उस गढ़ के अपने स्वार्थ बनने शुरू हो जाते हैं। उसका वेस्टेड इंट्रेस्ट शुरू हो जाता है। और उस गढ़ के बाहर जो हैं वे दुश्मन हो जाते हैं। और उन दुश्मनों से लड़ना, उनको कनवर्ट करना, उनको बदलना, उनको अपने घेरे में लाना, सारा काम शुरू हो जाता है। फिर मनुष्यता के हित में मनुष्यता की हत्या शुरू हो जाती है।
मेरी दृष्टि में, मनुष्यता उस दिन एक होगी जिस दिन एक करने वाला कोई इज्म जमीन पर नहीं होगा और एक-एक आदमी अकेला-अकेला होगा, उस दिन मनुष्यता एक हो जाएगी। जब तक संगठन हैं, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। जब तक राष्ट्र हैं, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। जब तक इज्म हैं--चाहे इस्लाम, चाहे कोई और, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। मनुष्यता एक होगी, एक-एक व्यक्ति की अपनी मौलिक इकाई रह जाए, और कुछ लोग संगठित होने की कोशिश बंद कर दें, तो मनुष्यता एक हो जाएगी।
अब यह बड़े मजे की बात है कि जो एक करते हैं वे ही तोड़ने वाले हैं। जो भी नारा देते हैं कि इकट्ठे हो जाओ, वे ही खतरनाक लोग हैं। जब भी कोई नारा दे कि इकट्ठे हो जाओ, तब सावधान हो जाना चाहिए कि यह आदमी झगड़ा पैदा करवाएगा। चाहे वह इकट्ठा होना किसी नाम से हो--वह कहे कि इस्लाम जो मानने वाले हैं, वे इकट्ठे हों; वह कहे, भारतीय इकट्ठे हों; वह कहे, कम्युनिस्ट इकट्ठे हों। जब भी वह कहेगा कि लोग इकट्ठे हों, तब दुश्मन को खड़ा करेगा।
एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्म-कथा में एक बढ़िया बात लिखी है। उसने लिखा है कि अगर किसी को भी इकट्ठा होना हो, तो खतरा पैदा करना जरूरी है और दुश्मन बनाना जरूरी है। बिना दुश्मन बनाए और खतरा पैदा किए कोई इकट्ठा नहीं हो सकता। चाहे सच्चा दुश्मन हो, चाहे झूठा खड़ा करो। चाहे खतरा असली हो, चाहे ऐसे ही हवा पैदा करो कि खतरा है--इस्लाम खतरे में है, हिंदू धर्म खतरे में है। कौन खतरे में है? और मर जाने दो इस्लाम को, हिंदू धर्म को। किसका क्या बिगड़ता है? इस्लाम के खतरे में होने से खतरा किसको है? किसी को कोई खतरा नहीं है। लेकिन खतरे में है, यह हवा पैदा करो, डर पैदा करो। डरा हुआ आदमी--चार डरे हुए आदमी इकट्ठे हो जाते हैं, क्योंकि वे कहते हैं, अकेले में डर ज्यादा रहेगा, चार इकट्ठे हो जाओ। जब वे चार इकट्ठे होते हैं, उनके पड़ोसी चार देखते हैं कि चार इकट्ठे हो रहे हैं, कोई न कोई गड़बड़ है, खतरा है, हम भी चार इकट्ठे हो जाएं। बस, उपद्रव शुरू हो गया। फिर राष्ट्र बनेंगे, जातियां बनेंगी, धर्म बनेंगे। और सब तरह की बेवकूफियां पैदा होगीं।
दुनिया से संगठन का नारा बंद होना चाहिए। किसी संगठन की कोई जरूरत नहीं है। आदमी अकेला काफी है। संगठन की जरूरत क्या है? संगठन किसलिए? लड़ना है, तो संगठन की जरूरत है। नहीं लड़ना, तो संगठन की क्या जरूरत? तो जो भी संगठन हैं, वे सब मनुष्यता के दुश्मन हैं। चाहे उनके नाम कुछ भी हों। और जो भी संगठन करवाने वाले हैं, वे सब मनुष्यता के हत्यारे हैं। चाहे उनके नाम कुछ भी हों। अब तो ऐसे लोग चाहिए जो सब संगठनों को तोड़ देने के, सब संगठनों को विकेंद्रित कर देने के, सब संगठनों को डिसआर्गनाइज कर देने के और एक-एक व्यक्ति को मूल्य देने के पक्ष में हों। संगठन को मूल्य नहीं देना है, एक-एक व्यक्ति को मूल्य देना है। आप आप हैं, मैं मैं हूं। मुझे और आपको संगठित होने की क्या जरूरत है? इस दुनिया में संगठन बिलकुल ही अनावश्यक है। संगठन की क्या आवश्यकता है?
हां, इस तरह के संगठन हो सकते हैं--रेलवे है, पोस्ट आफिस है, इस तरह के संगठन हो सकते हैं--फंक्शनल--जिनसे कोई जिहाद खड़ा नहीं होता, कोई झगड़ा नहीं खड़ा होता। पोस्ट आफिस वाले संगठन करके यह नहीं कहते कि हम रेलवे वालों से ऊंचे हैं, हम झगड़ा खड़ा करेंगे, सब रेलवे वालों को पोस्ट आफिस वाला बनाएंगे। इसकी कोई जरूरत नहीं है। रेलवे वाले रेलवे का काम करते हैं, पोस्ट आफिस वाले पोस्ट आफिस का काम करते हैं। इस तरह के आर्गनाइजेशन, फंक्शनल आर्गनाइजेशन तो दुनिया में हों, लेकिन आइडियालॉजी पर खड़े हुए संगठन दुनिया में नहीं चाहिए। चाहे उनका नाम कुछ भी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए किसी संगठन ने मनुष्यता को आगे नहीं बढ़ाया। और कोई संगठन मनुष्यता को आगे बढ़ा नहीं सकता है।
जब भी मैं किसी विचार को संगठित करूंगा, तब किसी के खिलाफ संगठन होना शुरू हो जाएगा। जब भी विचार संगठित होगा। संगठन हमेशा घृणा पर खड़ा होता है और विरोध में खड़ा होता है। इस्लाम संगठित होगा, तो किसके खिलाफ? और हिंदू संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? और मुसलमान संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? और कम्युनिस्ट संगठित होंगे, तो किसके खिलाफ? संगठन सदा किसी के खिलाफ ही इकट्ठा होता है। संगठन प्रेम से नहीं बनते। अब तक प्रेमियों ने कोई संगठन नहीं बनाए। सब घृणा करने वाले लोगों के संगठन हैं। चाहे उनके नाम कुछ हों, नारे कुछ हों, तरकीब कुछ हो, लेकिन संगठन दूसरे की दुश्मनी में बनता है। और सब आइडियालॉजी संगठित होना चाहती हैं। चाहे वह इस्लाम हो, चाहे कोई और हो। चाहे ईसाइयत हो, चाहे जैन हो, चाहे बौद्ध हो। मात्रा के भेद हो सकते हैं। लेकिन सिद्धांत जब संगठित होता है तो वह एक गढ़ बनता है। और उस गढ़ के अपने स्वार्थ बनने शुरू हो जाते हैं। उसका वेस्टेड इंट्रेस्ट शुरू हो जाता है। और उस गढ़ के बाहर जो हैं वे दुश्मन हो जाते हैं। और उन दुश्मनों से लड़ना, उनको कनवर्ट करना, उनको बदलना, उनको अपने घेरे में लाना, सारा काम शुरू हो जाता है। फिर मनुष्यता के हित में मनुष्यता की हत्या शुरू हो जाती है।
मेरी दृष्टि में, मनुष्यता उस दिन एक होगी जिस दिन एक करने वाला कोई इज्म जमीन पर नहीं होगा और एक-एक आदमी अकेला-अकेला होगा, उस दिन मनुष्यता एक हो जाएगी। जब तक संगठन हैं, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। जब तक राष्ट्र हैं, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। जब तक इज्म हैं--चाहे इस्लाम, चाहे कोई और, तब तक मनुष्यता एक नहीं हो सकती है। मनुष्यता एक होगी, एक-एक व्यक्ति की अपनी मौलिक इकाई रह जाए, और कुछ लोग संगठित होने की कोशिश बंद कर दें, तो मनुष्यता एक हो जाएगी।
अब यह बड़े मजे की बात है कि जो एक करते हैं वे ही तोड़ने वाले हैं। जो भी नारा देते हैं कि इकट्ठे हो जाओ, वे ही खतरनाक लोग हैं। जब भी कोई नारा दे कि इकट्ठे हो जाओ, तब सावधान हो जाना चाहिए कि यह आदमी झगड़ा पैदा करवाएगा। चाहे वह इकट्ठा होना किसी नाम से हो--वह कहे कि इस्लाम जो मानने वाले हैं, वे इकट्ठे हों; वह कहे, भारतीय इकट्ठे हों; वह कहे, कम्युनिस्ट इकट्ठे हों। जब भी वह कहेगा कि लोग इकट्ठे हों, तब दुश्मन को खड़ा करेगा।
एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्म-कथा में एक बढ़िया बात लिखी है। उसने लिखा है कि अगर किसी को भी इकट्ठा होना हो, तो खतरा पैदा करना जरूरी है और दुश्मन बनाना जरूरी है। बिना दुश्मन बनाए और खतरा पैदा किए कोई इकट्ठा नहीं हो सकता। चाहे सच्चा दुश्मन हो, चाहे झूठा खड़ा करो। चाहे खतरा असली हो, चाहे ऐसे ही हवा पैदा करो कि खतरा है--इस्लाम खतरे में है, हिंदू धर्म खतरे में है। कौन खतरे में है? और मर जाने दो इस्लाम को, हिंदू धर्म को। किसका क्या बिगड़ता है? इस्लाम के खतरे में होने से खतरा किसको है? किसी को कोई खतरा नहीं है। लेकिन खतरे में है, यह हवा पैदा करो, डर पैदा करो। डरा हुआ आदमी--चार डरे हुए आदमी इकट्ठे हो जाते हैं, क्योंकि वे कहते हैं, अकेले में डर ज्यादा रहेगा, चार इकट्ठे हो जाओ। जब वे चार इकट्ठे होते हैं, उनके पड़ोसी चार देखते हैं कि चार इकट्ठे हो रहे हैं, कोई न कोई गड़बड़ है, खतरा है, हम भी चार इकट्ठे हो जाएं। बस, उपद्रव शुरू हो गया। फिर राष्ट्र बनेंगे, जातियां बनेंगी, धर्म बनेंगे। और सब तरह की बेवकूफियां पैदा होगीं।
दुनिया से संगठन का नारा बंद होना चाहिए। किसी संगठन की कोई जरूरत नहीं है। आदमी अकेला काफी है। संगठन की जरूरत क्या है? संगठन किसलिए? लड़ना है, तो संगठन की जरूरत है। नहीं लड़ना, तो संगठन की क्या जरूरत? तो जो भी संगठन हैं, वे सब मनुष्यता के दुश्मन हैं। चाहे उनके नाम कुछ भी हों। और जो भी संगठन करवाने वाले हैं, वे सब मनुष्यता के हत्यारे हैं। चाहे उनके नाम कुछ भी हों। अब तो ऐसे लोग चाहिए जो सब संगठनों को तोड़ देने के, सब संगठनों को विकेंद्रित कर देने के, सब संगठनों को डिसआर्गनाइज कर देने के और एक-एक व्यक्ति को मूल्य देने के पक्ष में हों। संगठन को मूल्य नहीं देना है, एक-एक व्यक्ति को मूल्य देना है। आप आप हैं, मैं मैं हूं। मुझे और आपको संगठित होने की क्या जरूरत है? इस दुनिया में संगठन बिलकुल ही अनावश्यक है। संगठन की क्या आवश्यकता है?
हां, इस तरह के संगठन हो सकते हैं--रेलवे है, पोस्ट आफिस है, इस तरह के संगठन हो सकते हैं--फंक्शनल--जिनसे कोई जिहाद खड़ा नहीं होता, कोई झगड़ा नहीं खड़ा होता। पोस्ट आफिस वाले संगठन करके यह नहीं कहते कि हम रेलवे वालों से ऊंचे हैं, हम झगड़ा खड़ा करेंगे, सब रेलवे वालों को पोस्ट आफिस वाला बनाएंगे। इसकी कोई जरूरत नहीं है। रेलवे वाले रेलवे का काम करते हैं, पोस्ट आफिस वाले पोस्ट आफिस का काम करते हैं। इस तरह के आर्गनाइजेशन, फंक्शनल आर्गनाइजेशन तो दुनिया में हों, लेकिन आइडियालॉजी पर खड़े हुए संगठन दुनिया में नहीं चाहिए। चाहे उनका नाम कुछ भी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए किसी संगठन ने मनुष्यता को आगे नहीं बढ़ाया। और कोई संगठन मनुष्यता को आगे बढ़ा नहीं सकता है।
एक मित्र ने पूछा है कि आप कहते हैं कि अध्यात्मवाद कुछ थोड़े से धनिक लोगों के लिए है। आप ऐसा क्यों नहीं सोचते कि वह गरीब जनता के लिए भी धर्म-मुक्ति का साधन बन सके?
पहली बात तो यह है कि धर्म गरीब जनता के लिए मुक्ति का साधन न तो कभी बना है, न बन सकता है। हां, अफीम जरूर गरीब जनता के लिए बन सकता है कि वह अपनी गरीबी में बेहोश रहने के लिए एक तरकीब पा जाए। और अपनी गरीबी को झेलने के लिए एक तरह की सांत्वना और संतोष उसे मिल सके। गरीब जनता धर्म के नाम पर बेहोश रखी जा सकती है। और वही आज तक किया गया है। गरीब आदमी की बात नहीं कह रहा हूं, गरीब जनता की। कोई एकाध गरीब आदमी हो सकता है जो धर्म को अपनी मुक्ति का मार्ग भी बना ले। व्यक्ति हो सकता है। गरीब व्यक्ति भी धार्मिक हो सकता है। लेकिन यह बड़ी अपवाद घटना होगी। और अत्यधिक बुद्धिमान होना चाहिए ऐसे व्यक्ति को जो गरीब होकर धार्मिक हो सके। उसका कारण मैं आपको समझाना चाहूंगा।
मेरी दृष्टि में, अमीर आदमी की ही धार्मिक होने की संभावना का द्वार खुलता है। जरूरी नहीं है कि अमीर आदमी धार्मिक हो जाए। आवश्यक नहीं है, लेकिन संभावना का द्वार खुलता है। और क्यों? क्योंकि मेरी मान्यता है कि शरीर की जरूरतें जब तक पूरी न हो जाएं, आत्मा की जरूरतें मांग ही नहीं करती हैं। नीची जरूरतें जब पूरी हों, तो ऊंची जरूरतों का चैलेंज शुरू होता है।
यह असंभव है कि एक भूखे आदमी को सितार सीखने का खयाल आ जाए। आ भी सकता है एकाध आदमी को। और वह इसलिए भी आ सकता है कि शायद सितार बजाने में भूख को भूल जाए। सितार बजाने में भूख थोड़ी-बहुत देर भूली भी जा सकती है। लेकिन सितार बजाने का खयाल भूख में करीब-करीब असंभव है--पेट भरने का खयाल ही सहज है। जब शरीर की जरूरतें पूरी न हो रही हों, तो मन की, आत्मा की और ऊपर की हायर जरूरतें पैदा ही नहीं होती हैं। गरीब समाज इसीलिए धार्मिक कभी नहीं हो सकता। गरीब समाज धर्म की बातें कर सकता है, भजन-कीर्तन कर सकता है, मंदिर में पूजा-प्रार्थना कर सकता है, यज्ञ, जप, हवन कर सकता है। करता है, खूब करता है, लेकिन उसका कारण धार्मिक नहीं होता।
गरीब आदमी मंदिर भी जाएगा, तो रोटी मांगने जाएगा। गरीब आदमी पूजा भी करेगा, तो नौकरी मिल जाए इसके लिए करेगा। गरीब आदमी यज्ञ, हवन, सत्यनारायण की कथा में भी बैठता है, लेकिन उसके प्रयोजन हमेशा पेट से बंधे हुए होंगे। उसके प्रयोजन पेट से मुक्त नहीं हो सकते। उसका धर्म भी किसी न किसी रूप में पेट की मांग पूरी करने की ही चेष्टा होगी। और धर्म से पेट की कोई मांग कभी पूरी नहीं होती है। धर्म से पेट की मांग पूरी होती ही नहीं, क्योंकि धर्म से पेट की मांग का कोई संबंध ही नहीं है।
धर्म से चित्त की गहरी मांगें पूरी होती हैं। लेकिन चित्त की मांग करने का तल तो आना चाहिए। उसका तल तब आता है जब सामान्य जीवन की सारी सुविधाएं पूरी हो जाती हैं और एक व्यक्ति की शरीर के तल पर कोई चिंता नहीं रह जाती। और पहली बार सुविधा मिलती है, जिसको हम कहें, ली़जर मिलता है, विश्राम मिलता है। उस विश्राम में ही पहली दफे ऊपर की मांगें शुरू होती हैं। और वह आदमी पूछता है, खाना-पीना-कपड़ा, सब पूरा हुआ, अब क्या? धर्म जो है वह धनी आदमी की आखिरी लक़्जरी है। गलत है, यह नहीं कह रहा हूं, लेकिन धन से मिली सुविधा की अंतिम इच्छा और कामना है। गलत है, यह भी नहीं कह रहा हूं, लेकिन लक़्जरी वह सुविधा की है। अंतिम सुविधा में वे खयाल उठने शुरू होते हैं। और धनी आदमी को मौका है कि वह उस दिशा में खोज भी कर सके। गरीब आदमी को मौका भी नहीं है कि वह खोज कर सके।
लेकिन धनी आदमी चाहता है कि गरीब आदमी धार्मिक बना रहे। और धनी आदमी गरीब को इसलिए धार्मिक बनाए रखना चाहता है कि अगर गरीब आदमी धार्मिक न रहा, तो धनी का धनी रहना बहुत मुश्किल में पड़ जाने वाला है। क्योंकि गरीब आदमी जब तक संतुष्ट है, किसी भी आधारों पर, और जब तक वह अपनी गरीबी को मिटाने की चेष्टा में पूरी तरह संलग्न नहीं है, तब तक धनी आदमी धन इकट्ठा किए जा सकता है।
सारी दुनिया में पूंजीवाद की व्यवस्था को सबसे बड़ा सहारा तथाकथित धर्म देता है। और धनी आदमी चाहता है कि गरीब को समझाओ। इसलिए धनी आदमी मंदिर भी बनवाता है। बिड़ला कोई ऐसे ही मंदिर नहीं बनवा देता है। सारी दुनिया में बिड़लाओं ने मंदिर बनाए हैं, चर्च खड़े किए हैं। वह अकारण नहीं है। हो सकता है बिड़लाओं को पता भी न हो कि वे किसलिए मंदिर बना रहे हैं। लेकिन बहुत गहरे में वह जो चेतना है पूंजीवाद की, वह चेतना मंदिर बनाती है, धर्मशालाएं बनाती है, औषधालय खोलती है। वह गरीब को गरीब रहते हुए तृप्त होने की व्यवस्था के सारे उपाय खोजती है। और गरीब आदमी को...वह सारे के सारे संन्यासियों, उपदेशकों, साधुओं, संन्यासियों को पालती है कि वे गरीब को समझाएं कि संतोष बड़ा धर्म है, सहिष्णुता बड़ी बात है। और तुम गरीब हो अपने पिछले जन्म के पापों के कारण। अगर अच्छे कर्म रखोगे तो आगे तुम भी अमीर हो जाओगे। और वह जो अमीर है वह पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण अमीर है। और गरीब की आंख पर सब तरह की पट्टियां बांधी जाती हैं।
अमीर के हित में है कि गरीब धार्मिक हो। गरीब के हित में बिलकुल नहीं है कि गरीब धार्मिक हो। और गरीब धार्मिक हो ही नहीं सकता, झूठा धार्मिक हो सकता है।
इसलिए मेरा कहना यह है, मैं यह नहीं कहता हूं कि कुछ थोड़े से अमीर लोगों के लिए मैं धर्म को छोड़ता हूं। मेरा मतलब यह है कि अमीरी बांटनी चाहिए, ताकि सबके लिए धर्म हो सके। अमीरी बांटनी पड़ेगी तो समाज धार्मिक होगा। अमीरी बंधी रहेगी कुछ लोगों तक, समाज धार्मिक नहीं होगा। मेरी दृष्टि में समाजवादी व्यवस्था ही एक धार्मिक समाज को ठीक अर्थों में जन्म दे सकेगी।
वह एक मित्र ने पूछा पहले कि इतने ऊंचे सिद्धांत हैं, समाज ऊंचा क्यों नहीं होता?
समाज ऊंचा नहीं हो सकता, क्योंकि समाज का पूरा का पूरा ढांचा गलत है। समाज ऊंचा हो सकेगा, समाज का पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा। गरीब समाज ईमानदार कैसे हो सकता है? गरीब समाज चोरी से कैसे बच सकता है? गरीब समाज लड़ाई-झगड़ों से कैसे बच सकता है? गरीब समाज का चित्त क्षुद्रताओं से बच ही नहीं सकता। असंभव है बचना। ये सारी क्षुद्रताएं, अनैतिकताएं, यह सारी आचरणहीनता अनिवार्य है। और इसको समझाओ कि तुम आचरण ठीक रखो, चित्त शुद्ध रखो। ये सब, सब नासमझी की बातें हैं। इनसे कुछ होने वाला नहीं है। यह सब पूंजीवाद के लिए शॉक एब्जॉर्वर्स की व्यवस्था करना है कि धक्का न लग पाए पूंजीवाद को। यह ध्यान रखो कि सब तरफ के धक्के आएं और पूंजीवाद बच जाए। धर्म, धर्मगुरु, पुरोहित पूंजीवाद को बचाने की हजारों वर्ष से चेष्टा कर रहा है। इसीलिए पुरोहित को पूंजीपति सम्मान देता है। पूंजी सम्मान देती है। गरीब और अमीर के बीच पुरोहित सबसे बड़ी क्रांति के बीच रुकावट है, दीवाल है। साधु और संन्यासी क्रांति के लिए सबसे बड़ी दीवाल हैं।
तो मैं जोकहता हूं, मेरा कहना यह है कि सारा समाज संपन्न होना चाहिए। संपत्ति सामान्यतया जगह-जगह केंद्रित न होकर विकेंद्रित और फैली हुई होनी चाहिए। और एक-एक आदमी को, एक-एक प्रत्येक आदमी को इतनी सुविधा होनी चाहिए कि शरीर की छोटी-छोटी व्यर्थ की अटकाने वाली जरूरतें पूरी हो जाएं। सेक्स, भोजन और मकान, ये किसी आदमी को अकारण पीड़ित न करें। इतनी व्यवस्था समाज को जुटा देनी चाहिए। उसके बाद आदमी के धार्मिक होने की यात्रा शुरू हो सकती है।
लेकिन इन पर कोई हम व्यवस्था जुटाने को राजी नहीं हैं। और अब तो बड़े आश्र्चर्य की बात है, क्योंकि पहले तो यह असंभव था कि सारे लोग संपन्न हो सकें। अब यह बिलकुल संभव है। आज से दो सौ साल पहले तो यह असंभव था कि सारे लोग संपन्न हो सकें। इसलिए दो सौ साल पहले के समाज को जिम्मेवार ठहराना गलत है। मजबूरी थी। इतनी संपत्ति पैदा ही नहीं हो सकती थी कि हर आदमी संपन्न हो सके। लेकिन इन दो सौ वर्षों में टेक्नालॉजी ने हमें वहां ला दिया कि अब अगर संपत्ति पैदा नहीं होती तो कुछ गलत आदमी और कुछ गलत स्वार्थ संपत्ति को पैदा होने से रोक रहे हैं। अन्यथा संपत्ति अब इतनी पैदा हो सकती है कि अब किसी आदमी के गरीब होने की कोई जरूरत नहीं रह गई। टेक्नालॉजी का ठीक उपयोग हो तो संपत्ति बरस पड़ेगी। और ऋषियों-मुनियों ने स्वर्ग में जिस सुविधा की कल्पना की थी वह सब पचास वर्ष के भीतर पूरी पृथ्वी पर एक-एक आदमी के लिए हो सकती है। अब स्वर्ग वगैरह जाने की और अप्सराओं को स्वर्ग में खोजने की और कल्पवृक्षों के नीचे बैठने की कोई जरूरत नहीं है। वे अप्सराएं और वे कल्पवृक्ष सब इसी पृथ्वी पर अब खड़े हो सकते हैं। टेक्नालॉजी ने उतनी सुविधा जुटा दी है।
लेकिन समाज का जो ढांचा है बिलकुल ही गलत है। राष्ट्रों का जो ढांचा है वह बिलकुल ही गलत है। राष्ट्र बंटे रहेंगे, तो गरीब राष्ट्र रहेंगे, अमीर राष्ट्र रहेंगे। और अभी तक तो एक दिक्कत थी कि गरीब आदमी था, अमीर आदमी था। अब एक नई दिक्कत खड़ी हुई है: गरीब राष्ट्र हैं और अमीर राष्ट्र हैं। अब एक बिलकुल नये तल पर झंझट शुरू हुई है। यह झंझट कभी न थी। आज अमरीका तो एक अमीर राष्ट्र हो गया और हम एक क्षुद्र गरीब राष्ट्र। जिसका भीख मांगने के सिवाय कोई और हैसियत नहीं है। अगर अब राष्ट्र नहीं मिटते, तो अमरीका में जो संभावना हो गई है वह हमको कभी उपलब्ध नहीं हो सकती है। अगर राष्ट्र मिट जाएं, तो वह सारी संभावना हमको उपलब्ध हो सकती है जो उनको उपलब्ध हो गई है। राष्ट्र मिटने चाहिए।
लेकिन राष्ट्र कैसे मिटेंगे?
अगर वर्ग ही नहीं मिटते, तो राष्ट्र कैसे मिटेंगे? वर्ग मिटने चाहिए, जाति मिटनी चाहिए, सीमाएं मिटनी चाहिए। और हमें अब कुछ इस भाषा में सोचना चाहिए कि हम सब मिल कर ज्यादा से ज्यादा आनंदित कैसे हो सकते हैं? कल तक हमने ऐसा ही सोचा था कि मैं कैसे सुखी हो सकता हूं। सुविधा भी न थी सबके सुखी होने की। एक सुखी हो सकता था दस के दुख पर। दस दुखी होते तो ही एक सुखी हो सकता था। अब वह बात खत्म हो गई। अब ग्यारह ही सुखी हो सकते हैं। अब किसी एक को दस के दुख पर सुखी होने की जरूरत न रही।
और सच तो यह है कि अगर दस दुखी हों और एक सुखी हो, तो वह एक सिर्फ भ्रम में होता है, सुखी हो नहीं पाता। क्योंकि दस को दुखी करने में जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है उस प्रक्रिया में वह इतना चिंतित और पीड़ित और परेशान हो जाता है जिसका हिसाब नहीं।
यह जो निरंतर कहा जाता है कि धन से कोई सुख नहीं मिलता, उसका और कोई कारण नहीं है। धन से बहुत सुख मिल सकता है। धन से सुख नहीं मिलता, क्योंकि धन चारों तरफ गरीबी पैदा कर देता है। आज तक धन से सुख नहीं मिला। लेकिन रूस में धन से सुख मिल रहा है। और रूस में यह बात कहनी गलत होगी कि धन से कोई सुख नहीं मिलता। यह बात ही बेवकूफी की है कि धन से सुख नहीं मिलता। धन तो साधन है। बहुत सुख ला सकता है। लेकिन आज तक लाया नहीं।
तो महावीर और बुद्ध ने जो कहा कि धन से कोई सुख नहीं मिलता, वह बात अब बिलकुल गलत है। वह महावीर के वक्त में ठीक थी। क्योंकि महावीर ने जो धन इकट्ठा किया, उनके बापदादों ने, वह सारा का सारा धन चारों तरफ इतनी गरीबी पैदा कर गया कि महावीर जैसे बुद्धिमान आदमी को लगा कि इस धन से सुख मिल सकता है? यह तो खून है, इससे सुख नहीं मिल सकता, इसको छोड़ो! लेकिन महावीर को भी समझ में नहीं आया कि तुम्हारे छोड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम्हारा चचेरा भाई उसका मालिक हो जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बुद्ध धन को छोड़ देते हैं, तो बुद्ध का कोई रिश्तेदार धन का मालिक हो जाता है। यह खयाल में नहीं आ सका बुद्ध और महावीर को कि धन से सुख न मिलने का कारण यह है कि धन को इकट्ठा करने की प्रक्रिया में कितने लोग गरीब हो जाते हैं, समाज इतना विपन्न हो जाता है, इतनी दुख की लहर फैल जाती हैं कि एक आदमी कैसे सुखी हो सकता है?
समझ लीजिए, अहमदाबाद में अगर मेरे स्वस्थ होने की यह कंडीशन हो कि पूरा अहमदाबाद बीमार हो जाएगा, तब मैं स्वस्थ हो सकता हूं। अगर यह शर्त हो और मेरे स्वस्थ होने में सारे अहमदाबाद को बीमार हो जाना पड़े, तो क्या मैं उस बीमार अहमदाबाद में स्वस्थ रह सकूंगा? यह तो असंभव हो जाएगा। और अगर मैंने इंतजाम भी कर लिया, बड़ी दीवालें उठा लीं, बड़े पहरे लगा लिए, बड़ी बंदूकें लगवा दीं, बड़े डाक्टरों की कतार लगा दी और उनके भीतर छिप कर मैं स्वस्थ रहने लगा, तो उस स्वस्थ की सुरक्षा में जो इंतजाम करना पड़ेगा वह बीमारी भोगने से ज्यादा कष्टपूर्ण हो जाने वाला है। और वह हो गया है।
धन से कोई दुख नहीं मिला किसी को। धन की अब तक इकट्ठी होने की प्रक्रिया गलत थी। वह बिना किसी को गरीब बनाए धन इकट्ठा नहीं होता था। आने वाली दुनिया में हमें यह फिकर करनी चाहिए: धन पैदा हो, लेकिन इकट्ठा न हो। धन बंटे और धन सब तक फैले। और हम इस भाषा में सोचें कि कोई अमीर-गरीब न हो पाए, सब संपन्न हो पाएं। तो मेरा मानना है कि दुनिया पहली दफा धार्मिक होने की स्थिति को उपलब्ध होगी। उसके पहले दुनिया धार्मिक नहीं हो सकती।
अब तक का धर्म अधिकतम लोगों के लिए निपट पाखंड था और झूठ था। अब यह नहीं चलेगा। अब या तो धर्म जाएगा अगर यही व्यवस्था रही तो और या पूरी व्यवस्था बदलनी पड़ेगी। तब बिलकुल नये अर्थों में धर्म आएगा।
अभी तो मैं आज जो ये बातें कहता हूं, तो धार्मिक लोगों को लगता है कि मैं धर्म की बड़ी दुश्मनी की बातें कह रहा हूं। लेकिन मैं आपसे कहता हूं कि पचास साल में जो मैं कह रहा हूं वही धर्म को बचाने वाला सिद्ध होगा। और वे धार्मिक लोग जिस धर्म को बचाने की बात कर रहे हैं वे धर्म को डुबाने की नाव भर लिए बैठे हैं, वह डूबने वाली है नाव। उस नाव से धर्म को तत्काल उतर जाना चाहिए। उसे नई नाव खोज लेनी चाहिए। अब वह नई नाव किसी न किसी अर्थों में सबकी संपन्नता की और सबके भीतर पूंजी के वितरण की, सबके सुख की और सबके एक साथ संपत्तिवान होने की प्रक्रिया ही हो सकती है।
इसलिए मैंने जो यह कहा, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं चाहता हूं कि कुछ थोड़े से धनी लोग ही धर्म का फायदा उठा सकें। इसलिए नहीं, इसलिए कहा ताकि अगर धर्म का फायदा सबको देना है, तो धन को वितरण किया जा सके और सभी धनी हो सकें, तो ही कोई रास्ता खुलता है, अन्यथा कोई रास्ता नहीं खुलता।
मेरी दृष्टि में, अमीर आदमी की ही धार्मिक होने की संभावना का द्वार खुलता है। जरूरी नहीं है कि अमीर आदमी धार्मिक हो जाए। आवश्यक नहीं है, लेकिन संभावना का द्वार खुलता है। और क्यों? क्योंकि मेरी मान्यता है कि शरीर की जरूरतें जब तक पूरी न हो जाएं, आत्मा की जरूरतें मांग ही नहीं करती हैं। नीची जरूरतें जब पूरी हों, तो ऊंची जरूरतों का चैलेंज शुरू होता है।
यह असंभव है कि एक भूखे आदमी को सितार सीखने का खयाल आ जाए। आ भी सकता है एकाध आदमी को। और वह इसलिए भी आ सकता है कि शायद सितार बजाने में भूख को भूल जाए। सितार बजाने में भूख थोड़ी-बहुत देर भूली भी जा सकती है। लेकिन सितार बजाने का खयाल भूख में करीब-करीब असंभव है--पेट भरने का खयाल ही सहज है। जब शरीर की जरूरतें पूरी न हो रही हों, तो मन की, आत्मा की और ऊपर की हायर जरूरतें पैदा ही नहीं होती हैं। गरीब समाज इसीलिए धार्मिक कभी नहीं हो सकता। गरीब समाज धर्म की बातें कर सकता है, भजन-कीर्तन कर सकता है, मंदिर में पूजा-प्रार्थना कर सकता है, यज्ञ, जप, हवन कर सकता है। करता है, खूब करता है, लेकिन उसका कारण धार्मिक नहीं होता।
गरीब आदमी मंदिर भी जाएगा, तो रोटी मांगने जाएगा। गरीब आदमी पूजा भी करेगा, तो नौकरी मिल जाए इसके लिए करेगा। गरीब आदमी यज्ञ, हवन, सत्यनारायण की कथा में भी बैठता है, लेकिन उसके प्रयोजन हमेशा पेट से बंधे हुए होंगे। उसके प्रयोजन पेट से मुक्त नहीं हो सकते। उसका धर्म भी किसी न किसी रूप में पेट की मांग पूरी करने की ही चेष्टा होगी। और धर्म से पेट की कोई मांग कभी पूरी नहीं होती है। धर्म से पेट की मांग पूरी होती ही नहीं, क्योंकि धर्म से पेट की मांग का कोई संबंध ही नहीं है।
धर्म से चित्त की गहरी मांगें पूरी होती हैं। लेकिन चित्त की मांग करने का तल तो आना चाहिए। उसका तल तब आता है जब सामान्य जीवन की सारी सुविधाएं पूरी हो जाती हैं और एक व्यक्ति की शरीर के तल पर कोई चिंता नहीं रह जाती। और पहली बार सुविधा मिलती है, जिसको हम कहें, ली़जर मिलता है, विश्राम मिलता है। उस विश्राम में ही पहली दफे ऊपर की मांगें शुरू होती हैं। और वह आदमी पूछता है, खाना-पीना-कपड़ा, सब पूरा हुआ, अब क्या? धर्म जो है वह धनी आदमी की आखिरी लक़्जरी है। गलत है, यह नहीं कह रहा हूं, लेकिन धन से मिली सुविधा की अंतिम इच्छा और कामना है। गलत है, यह भी नहीं कह रहा हूं, लेकिन लक़्जरी वह सुविधा की है। अंतिम सुविधा में वे खयाल उठने शुरू होते हैं। और धनी आदमी को मौका है कि वह उस दिशा में खोज भी कर सके। गरीब आदमी को मौका भी नहीं है कि वह खोज कर सके।
लेकिन धनी आदमी चाहता है कि गरीब आदमी धार्मिक बना रहे। और धनी आदमी गरीब को इसलिए धार्मिक बनाए रखना चाहता है कि अगर गरीब आदमी धार्मिक न रहा, तो धनी का धनी रहना बहुत मुश्किल में पड़ जाने वाला है। क्योंकि गरीब आदमी जब तक संतुष्ट है, किसी भी आधारों पर, और जब तक वह अपनी गरीबी को मिटाने की चेष्टा में पूरी तरह संलग्न नहीं है, तब तक धनी आदमी धन इकट्ठा किए जा सकता है।
सारी दुनिया में पूंजीवाद की व्यवस्था को सबसे बड़ा सहारा तथाकथित धर्म देता है। और धनी आदमी चाहता है कि गरीब को समझाओ। इसलिए धनी आदमी मंदिर भी बनवाता है। बिड़ला कोई ऐसे ही मंदिर नहीं बनवा देता है। सारी दुनिया में बिड़लाओं ने मंदिर बनाए हैं, चर्च खड़े किए हैं। वह अकारण नहीं है। हो सकता है बिड़लाओं को पता भी न हो कि वे किसलिए मंदिर बना रहे हैं। लेकिन बहुत गहरे में वह जो चेतना है पूंजीवाद की, वह चेतना मंदिर बनाती है, धर्मशालाएं बनाती है, औषधालय खोलती है। वह गरीब को गरीब रहते हुए तृप्त होने की व्यवस्था के सारे उपाय खोजती है। और गरीब आदमी को...वह सारे के सारे संन्यासियों, उपदेशकों, साधुओं, संन्यासियों को पालती है कि वे गरीब को समझाएं कि संतोष बड़ा धर्म है, सहिष्णुता बड़ी बात है। और तुम गरीब हो अपने पिछले जन्म के पापों के कारण। अगर अच्छे कर्म रखोगे तो आगे तुम भी अमीर हो जाओगे। और वह जो अमीर है वह पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण अमीर है। और गरीब की आंख पर सब तरह की पट्टियां बांधी जाती हैं।
अमीर के हित में है कि गरीब धार्मिक हो। गरीब के हित में बिलकुल नहीं है कि गरीब धार्मिक हो। और गरीब धार्मिक हो ही नहीं सकता, झूठा धार्मिक हो सकता है।
इसलिए मेरा कहना यह है, मैं यह नहीं कहता हूं कि कुछ थोड़े से अमीर लोगों के लिए मैं धर्म को छोड़ता हूं। मेरा मतलब यह है कि अमीरी बांटनी चाहिए, ताकि सबके लिए धर्म हो सके। अमीरी बांटनी पड़ेगी तो समाज धार्मिक होगा। अमीरी बंधी रहेगी कुछ लोगों तक, समाज धार्मिक नहीं होगा। मेरी दृष्टि में समाजवादी व्यवस्था ही एक धार्मिक समाज को ठीक अर्थों में जन्म दे सकेगी।
वह एक मित्र ने पूछा पहले कि इतने ऊंचे सिद्धांत हैं, समाज ऊंचा क्यों नहीं होता?
समाज ऊंचा नहीं हो सकता, क्योंकि समाज का पूरा का पूरा ढांचा गलत है। समाज ऊंचा हो सकेगा, समाज का पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा। गरीब समाज ईमानदार कैसे हो सकता है? गरीब समाज चोरी से कैसे बच सकता है? गरीब समाज लड़ाई-झगड़ों से कैसे बच सकता है? गरीब समाज का चित्त क्षुद्रताओं से बच ही नहीं सकता। असंभव है बचना। ये सारी क्षुद्रताएं, अनैतिकताएं, यह सारी आचरणहीनता अनिवार्य है। और इसको समझाओ कि तुम आचरण ठीक रखो, चित्त शुद्ध रखो। ये सब, सब नासमझी की बातें हैं। इनसे कुछ होने वाला नहीं है। यह सब पूंजीवाद के लिए शॉक एब्जॉर्वर्स की व्यवस्था करना है कि धक्का न लग पाए पूंजीवाद को। यह ध्यान रखो कि सब तरफ के धक्के आएं और पूंजीवाद बच जाए। धर्म, धर्मगुरु, पुरोहित पूंजीवाद को बचाने की हजारों वर्ष से चेष्टा कर रहा है। इसीलिए पुरोहित को पूंजीपति सम्मान देता है। पूंजी सम्मान देती है। गरीब और अमीर के बीच पुरोहित सबसे बड़ी क्रांति के बीच रुकावट है, दीवाल है। साधु और संन्यासी क्रांति के लिए सबसे बड़ी दीवाल हैं।
तो मैं जोकहता हूं, मेरा कहना यह है कि सारा समाज संपन्न होना चाहिए। संपत्ति सामान्यतया जगह-जगह केंद्रित न होकर विकेंद्रित और फैली हुई होनी चाहिए। और एक-एक आदमी को, एक-एक प्रत्येक आदमी को इतनी सुविधा होनी चाहिए कि शरीर की छोटी-छोटी व्यर्थ की अटकाने वाली जरूरतें पूरी हो जाएं। सेक्स, भोजन और मकान, ये किसी आदमी को अकारण पीड़ित न करें। इतनी व्यवस्था समाज को जुटा देनी चाहिए। उसके बाद आदमी के धार्मिक होने की यात्रा शुरू हो सकती है।
लेकिन इन पर कोई हम व्यवस्था जुटाने को राजी नहीं हैं। और अब तो बड़े आश्र्चर्य की बात है, क्योंकि पहले तो यह असंभव था कि सारे लोग संपन्न हो सकें। अब यह बिलकुल संभव है। आज से दो सौ साल पहले तो यह असंभव था कि सारे लोग संपन्न हो सकें। इसलिए दो सौ साल पहले के समाज को जिम्मेवार ठहराना गलत है। मजबूरी थी। इतनी संपत्ति पैदा ही नहीं हो सकती थी कि हर आदमी संपन्न हो सके। लेकिन इन दो सौ वर्षों में टेक्नालॉजी ने हमें वहां ला दिया कि अब अगर संपत्ति पैदा नहीं होती तो कुछ गलत आदमी और कुछ गलत स्वार्थ संपत्ति को पैदा होने से रोक रहे हैं। अन्यथा संपत्ति अब इतनी पैदा हो सकती है कि अब किसी आदमी के गरीब होने की कोई जरूरत नहीं रह गई। टेक्नालॉजी का ठीक उपयोग हो तो संपत्ति बरस पड़ेगी। और ऋषियों-मुनियों ने स्वर्ग में जिस सुविधा की कल्पना की थी वह सब पचास वर्ष के भीतर पूरी पृथ्वी पर एक-एक आदमी के लिए हो सकती है। अब स्वर्ग वगैरह जाने की और अप्सराओं को स्वर्ग में खोजने की और कल्पवृक्षों के नीचे बैठने की कोई जरूरत नहीं है। वे अप्सराएं और वे कल्पवृक्ष सब इसी पृथ्वी पर अब खड़े हो सकते हैं। टेक्नालॉजी ने उतनी सुविधा जुटा दी है।
लेकिन समाज का जो ढांचा है बिलकुल ही गलत है। राष्ट्रों का जो ढांचा है वह बिलकुल ही गलत है। राष्ट्र बंटे रहेंगे, तो गरीब राष्ट्र रहेंगे, अमीर राष्ट्र रहेंगे। और अभी तक तो एक दिक्कत थी कि गरीब आदमी था, अमीर आदमी था। अब एक नई दिक्कत खड़ी हुई है: गरीब राष्ट्र हैं और अमीर राष्ट्र हैं। अब एक बिलकुल नये तल पर झंझट शुरू हुई है। यह झंझट कभी न थी। आज अमरीका तो एक अमीर राष्ट्र हो गया और हम एक क्षुद्र गरीब राष्ट्र। जिसका भीख मांगने के सिवाय कोई और हैसियत नहीं है। अगर अब राष्ट्र नहीं मिटते, तो अमरीका में जो संभावना हो गई है वह हमको कभी उपलब्ध नहीं हो सकती है। अगर राष्ट्र मिट जाएं, तो वह सारी संभावना हमको उपलब्ध हो सकती है जो उनको उपलब्ध हो गई है। राष्ट्र मिटने चाहिए।
लेकिन राष्ट्र कैसे मिटेंगे?
अगर वर्ग ही नहीं मिटते, तो राष्ट्र कैसे मिटेंगे? वर्ग मिटने चाहिए, जाति मिटनी चाहिए, सीमाएं मिटनी चाहिए। और हमें अब कुछ इस भाषा में सोचना चाहिए कि हम सब मिल कर ज्यादा से ज्यादा आनंदित कैसे हो सकते हैं? कल तक हमने ऐसा ही सोचा था कि मैं कैसे सुखी हो सकता हूं। सुविधा भी न थी सबके सुखी होने की। एक सुखी हो सकता था दस के दुख पर। दस दुखी होते तो ही एक सुखी हो सकता था। अब वह बात खत्म हो गई। अब ग्यारह ही सुखी हो सकते हैं। अब किसी एक को दस के दुख पर सुखी होने की जरूरत न रही।
और सच तो यह है कि अगर दस दुखी हों और एक सुखी हो, तो वह एक सिर्फ भ्रम में होता है, सुखी हो नहीं पाता। क्योंकि दस को दुखी करने में जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है उस प्रक्रिया में वह इतना चिंतित और पीड़ित और परेशान हो जाता है जिसका हिसाब नहीं।
यह जो निरंतर कहा जाता है कि धन से कोई सुख नहीं मिलता, उसका और कोई कारण नहीं है। धन से बहुत सुख मिल सकता है। धन से सुख नहीं मिलता, क्योंकि धन चारों तरफ गरीबी पैदा कर देता है। आज तक धन से सुख नहीं मिला। लेकिन रूस में धन से सुख मिल रहा है। और रूस में यह बात कहनी गलत होगी कि धन से कोई सुख नहीं मिलता। यह बात ही बेवकूफी की है कि धन से सुख नहीं मिलता। धन तो साधन है। बहुत सुख ला सकता है। लेकिन आज तक लाया नहीं।
तो महावीर और बुद्ध ने जो कहा कि धन से कोई सुख नहीं मिलता, वह बात अब बिलकुल गलत है। वह महावीर के वक्त में ठीक थी। क्योंकि महावीर ने जो धन इकट्ठा किया, उनके बापदादों ने, वह सारा का सारा धन चारों तरफ इतनी गरीबी पैदा कर गया कि महावीर जैसे बुद्धिमान आदमी को लगा कि इस धन से सुख मिल सकता है? यह तो खून है, इससे सुख नहीं मिल सकता, इसको छोड़ो! लेकिन महावीर को भी समझ में नहीं आया कि तुम्हारे छोड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम्हारा चचेरा भाई उसका मालिक हो जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बुद्ध धन को छोड़ देते हैं, तो बुद्ध का कोई रिश्तेदार धन का मालिक हो जाता है। यह खयाल में नहीं आ सका बुद्ध और महावीर को कि धन से सुख न मिलने का कारण यह है कि धन को इकट्ठा करने की प्रक्रिया में कितने लोग गरीब हो जाते हैं, समाज इतना विपन्न हो जाता है, इतनी दुख की लहर फैल जाती हैं कि एक आदमी कैसे सुखी हो सकता है?
समझ लीजिए, अहमदाबाद में अगर मेरे स्वस्थ होने की यह कंडीशन हो कि पूरा अहमदाबाद बीमार हो जाएगा, तब मैं स्वस्थ हो सकता हूं। अगर यह शर्त हो और मेरे स्वस्थ होने में सारे अहमदाबाद को बीमार हो जाना पड़े, तो क्या मैं उस बीमार अहमदाबाद में स्वस्थ रह सकूंगा? यह तो असंभव हो जाएगा। और अगर मैंने इंतजाम भी कर लिया, बड़ी दीवालें उठा लीं, बड़े पहरे लगा लिए, बड़ी बंदूकें लगवा दीं, बड़े डाक्टरों की कतार लगा दी और उनके भीतर छिप कर मैं स्वस्थ रहने लगा, तो उस स्वस्थ की सुरक्षा में जो इंतजाम करना पड़ेगा वह बीमारी भोगने से ज्यादा कष्टपूर्ण हो जाने वाला है। और वह हो गया है।
धन से कोई दुख नहीं मिला किसी को। धन की अब तक इकट्ठी होने की प्रक्रिया गलत थी। वह बिना किसी को गरीब बनाए धन इकट्ठा नहीं होता था। आने वाली दुनिया में हमें यह फिकर करनी चाहिए: धन पैदा हो, लेकिन इकट्ठा न हो। धन बंटे और धन सब तक फैले। और हम इस भाषा में सोचें कि कोई अमीर-गरीब न हो पाए, सब संपन्न हो पाएं। तो मेरा मानना है कि दुनिया पहली दफा धार्मिक होने की स्थिति को उपलब्ध होगी। उसके पहले दुनिया धार्मिक नहीं हो सकती।
अब तक का धर्म अधिकतम लोगों के लिए निपट पाखंड था और झूठ था। अब यह नहीं चलेगा। अब या तो धर्म जाएगा अगर यही व्यवस्था रही तो और या पूरी व्यवस्था बदलनी पड़ेगी। तब बिलकुल नये अर्थों में धर्म आएगा।
अभी तो मैं आज जो ये बातें कहता हूं, तो धार्मिक लोगों को लगता है कि मैं धर्म की बड़ी दुश्मनी की बातें कह रहा हूं। लेकिन मैं आपसे कहता हूं कि पचास साल में जो मैं कह रहा हूं वही धर्म को बचाने वाला सिद्ध होगा। और वे धार्मिक लोग जिस धर्म को बचाने की बात कर रहे हैं वे धर्म को डुबाने की नाव भर लिए बैठे हैं, वह डूबने वाली है नाव। उस नाव से धर्म को तत्काल उतर जाना चाहिए। उसे नई नाव खोज लेनी चाहिए। अब वह नई नाव किसी न किसी अर्थों में सबकी संपन्नता की और सबके भीतर पूंजी के वितरण की, सबके सुख की और सबके एक साथ संपत्तिवान होने की प्रक्रिया ही हो सकती है।
इसलिए मैंने जो यह कहा, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं चाहता हूं कि कुछ थोड़े से धनी लोग ही धर्म का फायदा उठा सकें। इसलिए नहीं, इसलिए कहा ताकि अगर धर्म का फायदा सबको देना है, तो धन को वितरण किया जा सके और सभी धनी हो सकें, तो ही कोई रास्ता खुलता है, अन्यथा कोई रास्ता नहीं खुलता।
एक मित्र ने पूछा है कि आप डिस्ट्रक्टिव, आप विध्वंसक क्यों हैं? आप कंस्ट्रक्टिव क्यों नहीं हैं?
शायद उन मित्र को पता ही नहीं कि डिस्ट्रक्शन और कंस्ट्रक्शन दो चीजें नहीं हैं। एक सिक्के के दो पहलू हैं। हम इसी भाषा में सोचते हैं कि निर्माण अलग चीज है, विध्वंस अलग चीज है। और हम सोचते हैं, जो विध्वंस करता है, वह निर्माण करने वाले का दुश्मन है। और सच यह है कि कोई भी सृजन बिना विध्वंस के होता ही नहीं। विध्वंस होता है तो सृजन होता है। कुछ मरता है तो कुछ जन्मता है। कुछ मिटता है तो कुछ बनता है। और अगर मिटाने से डर गए, मारने से डर गए, तोड़ने से डर गए, तो समझ लेना कि बनाने की क्षमता खत्म हो गई, अब बना कभी सकोगे नहीं।
क्यों मैं विध्वंस की बात करता हूं?
क्योंकि विध्वंस पहले है और सृजन पीछे है। सृजन पहले हो नहीं सकता। विध्वंस पहले होगा। जो है, उसे तोड़ना पड़ेगा। वह टूट जाए तो सृजन की बात करूं। आप मेरे विध्वंस में सहयोगी हों और जल्दी चीजें टूट जाएं, तो मैं सृजन की बात भी करूं। सृजन की बात मेरे खयाल में है। उसी को खयाल में रख कर विध्वंस की बात कर रहा हूं। नहीं तो विध्वंस बेमानी है, उसका कोई मतलब नहीं है। तोड़ कर क्या करेंगे? लेकिन टूटे तो, तोड़ने की तैयारी तो पैदा हो, तोड़ने की हवा तो बने।
हिंदुस्तान ने पांच हजार साल से कुछ तोड़ा ही नहीं। इसलिए बिना तोड़ी चीजें, एक कबाड़खाना बन गया पूरा मुल्क, सब बिना तोड़ी चीजें रखी हैं।
मैं एक घर में कुछ दिन तक ठहरा। उस घर में मैं देख कर दंग रह गया। उसमें आदमियों को रहने लायक जगह भी नहीं बची थी, क्योंकि जितने पुराने ट्रंक, संदूक, डब्बा, डिब्बी, वे सब उसमें इकट्ठे थे। मैंने उस मकान मालिक को कहा कि तुम क्या किए हुए हो? अगर यही काम जारी रहा तो कुछ दिन में हमें बाहर होना पड़ेगा। उसमें वे बुहारियां भी रखी थीं जिनके सिर्फ ठूंठ बचे थे। सब खत्म हो चुका था। यह किसलिए रखे हुए हो? उन्होंने कहा कि चीजें हैं, कभी कोई काम पड़ जाए, इसलिए रखते चले जाते हैं। मैंने कहा: तुम मर जाओगे और ये चीजें रखी रहेंगी। और मकान एक स्पेस है जिसमें रहने की जगह चाहिए। उसमें रहने की जगह ही नहीं बची। कुछ दिन में यह होगा कि तुम बाहर रहोगे, मकान में चीजें रहेंगी। और चीजें ऐसी हैं जो किसी मतलब की नहीं हैं, किसी प्रयोजन की नहीं हैं।
हिंदुस्तान की पूरी की पूरी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि पांच हजार साल में जो भी हमने बनाया, वह सब हम इकट्ठा करते चले गए हैं। उसमें से कुछ हमने कभी नहीं फेंका है। बापदादों की चीजों को फेंक कैसे दें? ऋषि-मुनियों ने इतनी मेहनत से बनाया, हम नष्ट कैसे कर दें? सब इकट्ठा करते चले गए हैं। तो उसके ऊपर-ऊपर इकट्ठा होता चला गया है।
इतना कबाड़ इकट्ठा हो गया है भारत के चित्त में कि अगर कोई तेजी से आग न लगी, अगर तेजी से कोई विध्वंस न हुआ, तो हम मर जाएंगे, वह सामान बच जाएगा। हम मर रहे हैं और वह सामान बच सकता है।
लेकिन सामान को बचा कर क्या करिएगा?
असल में, जीवित कौम हमेशा चीजों को तोड़ कर फेंक देती है, नई बना लेती है। मरी हुई कौम डरती है। हम मरी हुई कौम हैं, इसलिए एकदम घबड़ाहट होती है--विध्वंस की बात मत करो। निर्माण की बात करो। कुछ रचनात्मक कार्यक्रम रखो। रचनात्मक कार्यक्रम से हम बड़े खुश होते हैं। और रचनात्मक कार्यक्रम क्या है कि चार आदमी चर्खा चला रहे हैं तो रचनात्मक कार्यक्रम हो रहा है। दिमाग खराब हो गया है? कि कोई गांव में जाकर बुहारी लगा आएं चार आदमी तो रचनात्मक कार्यक्रम हो रहा है।
मुल्क को धोखा देने की हद होती है, सीमा होती है। ये कंस्ट्रक्टिव वर्क हो रहे हैं सारे मुल्क में। और ऐसे रचनात्मक कार्यक्रमों के आधार पर संत-महात्मा हो जाए आदमी, कठिनाई नहीं है।
और हमारा चित्त इतना कमजोर है कि कोई रचना की बात करे, हमें समझ में आती है। क्योंकि उससे लगता है कि चलो थोड़ा और जोड़ लें। इतनी ग्रीड है हममें, इतने लोभी हैं हम कि रचना की बात ही समझ में आती है सिर्फ, विध्वंस की बात समझ में नहीं आती। लोभ की वजह से, ग्रीड की वजह से, मुल्क पूरा का पूरा लोभी हो गया है। कुछ भी है, ले आओ, रख लो। कुछ न कुछ हो जो भी, रचना होनी चाहिए, इकट्ठे करते चले जाओ।
नहीं, यह लोभ छोड़ना पड़ेगा और तोड़ने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी। मैं मानता हूं कि जिस दिन तोड़ने की हिम्मत जुटा लेंगे हम--चित्त की धारणाओं को पहले तोड़ना है, फिर समाज के ढांचे को तोड़ना है--उसी दिन हममें जवानी लौट आएगी, ताजगी लौट आएगी। और जो तोड़ने की हिम्मत जुटा लेता है, उसी हिम्मत से सृजन होता है।
यह ध्यान रहे, हिम्मत एक ही चीज है, चाहे उससे तोड़ो और चाहे बनाओ। साहस एक ही चीज है। अगर तोड़ने का साहस आ गया तो बनाने का साहस तो बहुत आसान है। तोड़ने के साहस के लिए इसलिए मैं जोर देता हूं निरंतर। और अगर वह जोर फैल जाए, तो हम कल बना भी सकते हैं। फिर कुछ कंस्ट्रक्शन हो सकता है।
अभी तो कंस्ट्रक्शन की बात ही करनी खतरनाक है। वह तो बात ही नहीं करनी है। वह तो पूरे मुल्क के ढांचे को एकदम अपील करती है कि हां, ठीक है; चलो, बिलकुल राजी हैं। रचनात्मक कार्यक्रम है, बिलकुल ठीक है। इसको करेंगे।
यह समाज का जो पांच हजार वर्ष का लोभी चित्त है, वह और इकट्ठा कर लेता है। नहीं, उसके मैं पक्ष में नहीं हूं। लेकिन यह ध्यान रहे कि मैं कोई डिस्ट्रक्टिव आदमी नहीं हूं, मैं कोई विध्वंसक चित्त नहीं है मेरा। चित्त तो सृजनात्मक ही है। लेकिन विध्वंस अनिवार्यता है। और उसकी बात किए बिना हम सृजन की दिशा में जा नहीं सकते हैं।
क्यों मैं विध्वंस की बात करता हूं?
क्योंकि विध्वंस पहले है और सृजन पीछे है। सृजन पहले हो नहीं सकता। विध्वंस पहले होगा। जो है, उसे तोड़ना पड़ेगा। वह टूट जाए तो सृजन की बात करूं। आप मेरे विध्वंस में सहयोगी हों और जल्दी चीजें टूट जाएं, तो मैं सृजन की बात भी करूं। सृजन की बात मेरे खयाल में है। उसी को खयाल में रख कर विध्वंस की बात कर रहा हूं। नहीं तो विध्वंस बेमानी है, उसका कोई मतलब नहीं है। तोड़ कर क्या करेंगे? लेकिन टूटे तो, तोड़ने की तैयारी तो पैदा हो, तोड़ने की हवा तो बने।
हिंदुस्तान ने पांच हजार साल से कुछ तोड़ा ही नहीं। इसलिए बिना तोड़ी चीजें, एक कबाड़खाना बन गया पूरा मुल्क, सब बिना तोड़ी चीजें रखी हैं।
मैं एक घर में कुछ दिन तक ठहरा। उस घर में मैं देख कर दंग रह गया। उसमें आदमियों को रहने लायक जगह भी नहीं बची थी, क्योंकि जितने पुराने ट्रंक, संदूक, डब्बा, डिब्बी, वे सब उसमें इकट्ठे थे। मैंने उस मकान मालिक को कहा कि तुम क्या किए हुए हो? अगर यही काम जारी रहा तो कुछ दिन में हमें बाहर होना पड़ेगा। उसमें वे बुहारियां भी रखी थीं जिनके सिर्फ ठूंठ बचे थे। सब खत्म हो चुका था। यह किसलिए रखे हुए हो? उन्होंने कहा कि चीजें हैं, कभी कोई काम पड़ जाए, इसलिए रखते चले जाते हैं। मैंने कहा: तुम मर जाओगे और ये चीजें रखी रहेंगी। और मकान एक स्पेस है जिसमें रहने की जगह चाहिए। उसमें रहने की जगह ही नहीं बची। कुछ दिन में यह होगा कि तुम बाहर रहोगे, मकान में चीजें रहेंगी। और चीजें ऐसी हैं जो किसी मतलब की नहीं हैं, किसी प्रयोजन की नहीं हैं।
हिंदुस्तान की पूरी की पूरी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि पांच हजार साल में जो भी हमने बनाया, वह सब हम इकट्ठा करते चले गए हैं। उसमें से कुछ हमने कभी नहीं फेंका है। बापदादों की चीजों को फेंक कैसे दें? ऋषि-मुनियों ने इतनी मेहनत से बनाया, हम नष्ट कैसे कर दें? सब इकट्ठा करते चले गए हैं। तो उसके ऊपर-ऊपर इकट्ठा होता चला गया है।
इतना कबाड़ इकट्ठा हो गया है भारत के चित्त में कि अगर कोई तेजी से आग न लगी, अगर तेजी से कोई विध्वंस न हुआ, तो हम मर जाएंगे, वह सामान बच जाएगा। हम मर रहे हैं और वह सामान बच सकता है।
लेकिन सामान को बचा कर क्या करिएगा?
असल में, जीवित कौम हमेशा चीजों को तोड़ कर फेंक देती है, नई बना लेती है। मरी हुई कौम डरती है। हम मरी हुई कौम हैं, इसलिए एकदम घबड़ाहट होती है--विध्वंस की बात मत करो। निर्माण की बात करो। कुछ रचनात्मक कार्यक्रम रखो। रचनात्मक कार्यक्रम से हम बड़े खुश होते हैं। और रचनात्मक कार्यक्रम क्या है कि चार आदमी चर्खा चला रहे हैं तो रचनात्मक कार्यक्रम हो रहा है। दिमाग खराब हो गया है? कि कोई गांव में जाकर बुहारी लगा आएं चार आदमी तो रचनात्मक कार्यक्रम हो रहा है।
मुल्क को धोखा देने की हद होती है, सीमा होती है। ये कंस्ट्रक्टिव वर्क हो रहे हैं सारे मुल्क में। और ऐसे रचनात्मक कार्यक्रमों के आधार पर संत-महात्मा हो जाए आदमी, कठिनाई नहीं है।
और हमारा चित्त इतना कमजोर है कि कोई रचना की बात करे, हमें समझ में आती है। क्योंकि उससे लगता है कि चलो थोड़ा और जोड़ लें। इतनी ग्रीड है हममें, इतने लोभी हैं हम कि रचना की बात ही समझ में आती है सिर्फ, विध्वंस की बात समझ में नहीं आती। लोभ की वजह से, ग्रीड की वजह से, मुल्क पूरा का पूरा लोभी हो गया है। कुछ भी है, ले आओ, रख लो। कुछ न कुछ हो जो भी, रचना होनी चाहिए, इकट्ठे करते चले जाओ।
नहीं, यह लोभ छोड़ना पड़ेगा और तोड़ने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी। मैं मानता हूं कि जिस दिन तोड़ने की हिम्मत जुटा लेंगे हम--चित्त की धारणाओं को पहले तोड़ना है, फिर समाज के ढांचे को तोड़ना है--उसी दिन हममें जवानी लौट आएगी, ताजगी लौट आएगी। और जो तोड़ने की हिम्मत जुटा लेता है, उसी हिम्मत से सृजन होता है।
यह ध्यान रहे, हिम्मत एक ही चीज है, चाहे उससे तोड़ो और चाहे बनाओ। साहस एक ही चीज है। अगर तोड़ने का साहस आ गया तो बनाने का साहस तो बहुत आसान है। तोड़ने के साहस के लिए इसलिए मैं जोर देता हूं निरंतर। और अगर वह जोर फैल जाए, तो हम कल बना भी सकते हैं। फिर कुछ कंस्ट्रक्शन हो सकता है।
अभी तो कंस्ट्रक्शन की बात ही करनी खतरनाक है। वह तो बात ही नहीं करनी है। वह तो पूरे मुल्क के ढांचे को एकदम अपील करती है कि हां, ठीक है; चलो, बिलकुल राजी हैं। रचनात्मक कार्यक्रम है, बिलकुल ठीक है। इसको करेंगे।
यह समाज का जो पांच हजार वर्ष का लोभी चित्त है, वह और इकट्ठा कर लेता है। नहीं, उसके मैं पक्ष में नहीं हूं। लेकिन यह ध्यान रहे कि मैं कोई डिस्ट्रक्टिव आदमी नहीं हूं, मैं कोई विध्वंसक चित्त नहीं है मेरा। चित्त तो सृजनात्मक ही है। लेकिन विध्वंस अनिवार्यता है। और उसकी बात किए बिना हम सृजन की दिशा में जा नहीं सकते हैं।