Bhakti Sutra #4

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Questions in this Discourse

पहला प्रश्न:
ओशो, जीवन की व्यर्थता का बोध ही क्या जीवन में अर्थवत्ता का प्रारंभ-बिंदु बन जाता है?
बन सकता है, न भी बने। संभावना खुलती है, अनिवार्यता नहीं है। जीवन की व्यर्थता दिखाई पड़े तो परमात्मा की खोज शुरू हो सकती है--शुरू होगी ही, ऐसा जरूरी नहीं है।
जीवन की व्यर्थता पता चले तो आदमी निराश भी हो सकता है, आशा ही छोड़ दे, व्यर्थता में ही जीने लगे, व्यर्थता को स्वीकार कर ले, खोज के लिए कदम न उठाए--तो जीवन तो दूभर हो जाएगा, बोझ हो जाएगा, परमात्मा की यात्रा न होगी।
इतना तो सच है कि जिसने जीवन की व्यर्थता नहीं जानी, वह परमात्मा की खोज पर नहीं जाएगा; जाने की कोई जरूरत नहीं है। अभी जीवन में ही रस आता हो तो किसी और रस की तरफ आंख उठाने का कारण नहीं है।
फिर जीवन की व्यर्थता समझ में आए तो दो संभावनाएं हैं: या तो तुम उसी व्यर्थता में रुक कर बैठ जाओ और या उस व्यर्थता के पार सार्थकता की खोज करो--तुम पर निर्भर है।
नास्तिक और आस्तिक का यही फर्क है, यही फर्क की रेखा है।
नास्तिक वह है जिसे जीवन की व्यर्थता तो दिखाई पड़ी, लेकिन आगे जाने की, ऊपर उठने की, खोज करने की सामर्थ्य नहीं है, रुक गया; ‘नहीं’ में रुक गया; ‘हां’ की तरफ न उठ सका, निषेध को ही धर्म मान लिया, विधेय की बात ही भूल गया।
आस्तिक नास्तिक से आगे जाता है।
आस्तिक नास्तिक का विरोध नहीं है, अतिक्रमण है। आस्तिक के जीवन में भी नास्तिकता का पड़ाव आता है, लेकिन उस पर वह रुक नहीं जाता। वह उसे पड़ाव ही मानता है और उससे मुक्त होने की चेष्टा में संलग्न हो जाता है। क्योंकि जहां ‘नहीं’ है, वहां ‘हां’ भी होगा। और जिस जीवन में हमने व्यर्थता पहचान ली है, उस जीवन के किसी तल की गहराई पर सार्थकता भी छिपी होगी; अन्यथा व्यर्थता का भी क्या अर्थ होता है?
जिसने दुख जाना वह सुख को जानने में समर्थ है, अन्यथा दुख को भी न जान सकता। जिसने अंधकार को पहचाना उसके पास आंखें हैं जो प्रकाश को भी पहचानने में समर्थ हैं।
अंधों को अंधेरा नहीं दिखाई पड़ता। साधारणतः हम सोचते हैं कि अंधे अंधेरे में जीते होंगे। गलत है खयाल। अंधेरे को देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरा भी आंख की ही प्रतीति है। तुम्हें अंधेरा दिखाई पड़ता है आंख बंद कर लेने पर, क्योंकि अंधेरे को तुमने देखा है। जन्म से जन्मांध व्यक्ति को अंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता। देखा ही नहीं है कुछ, अंधेरा कैसे दिखाई पड़ेगा?
तो जिसको अंधेरा दिखाई पड़ता है, उसके पास आंख है; अंधेरे में ही रुक जाने का कोई कारण नहीं है। और जब अंधेरा अंधेरे की तरह मालूम पड़ता है तो साफ है कि तुम्हारे भीतर छिपा हुआ प्रकाश का भी कोई स्रोत है, अन्यथा अंधेरे को अंधेरा कैसे कहते? कोई कसौटी है तुम्हारे भीतर, कहीं गहरे में छिपा मापदंड है।
अंधेरे पर कोई रुक जाए तो नास्तिक; अंधेरे को पहचान कर प्रकाश की खोज में निकल जाए तो आस्तिक। अंधेरे को देख कर कहने लगे कि अंधेरा ही सब-कुछ है तो नास्तिक; अंधेरे को जान कर अभियान पर निकल जाए, खोजने निकल जाए, कि प्रकाश भी कहीं होगा, जब अंधेरा है तो प्रकाश भी होगा। क्योंकि विपरीत सदा साथ मौजूद होते हैं।
जहां जन्म है वहां मृत्यु होगी। जहां अंधेरा है वहां प्रकाश होगा। जहां दुख है वहां सुख होगा। जहां नरक अनुभव किया है तो खोजने की ही बात है, स्वर्ग भी ज्यादा दूर नहीं हो सकता।
स्वर्ग और नरक पड़ोस-पड़ोस में हैं, एक-दूसरे से जुड़े हैं।
अगर तुमने जीवन में क्रोध का अनुभव कर लिया तो समझ लेना कि करुणा भी कहीं छिपी है--खोजने की बात है। तुमने पहली परत छू ली करुणा की! क्रोध पहली परत है करुणा की। अगर तुमने घृणा को पहचान लिया तो प्रेम को पहचानने में देर भला लगे, लेकिन असंभावना नहीं है।
प्रश्न महत्वपूर्ण है।
जीवन की व्यर्थता तो अनिवार्य है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। उतने को ही परमात्मा की शुरुआत मत समझ लेना। उतने से ही ‘अथातो’ का बिंदु न आ जाएगा। उतना जरूरी है। उतना तो चाहिए ही। पर उस पर तुम रुक भी सकते हो।
पश्चिम में बड़ा विचारक है, ज्यां पाल सार्त्र। वह कहता है, अंधेरा ही सब-कुछ है। दुख ही सब-कुछ है। दुख के पार कुछ भी नहीं है। दुख के पार तो सिर्फ मनुष्यों की कल्पनाओं का जाल है। विषाद सब-कुछ है। संताप सब-कुछ है। संत्रास सब-कुछ है। बस नरक ही है, स्वर्ग नहीं है।
बुद्ध ने भी एक दिन जाना था: दुख है। सार्त्र ने भी जाना कि दुख है। यहां तक दोनों साथ-साथ हैं। फिर राहें अलग हो जाती हैं। फिर बुद्ध ने खोजा कि दुख क्यों है? और दुख है, तो दुख के विपरीत दुख का निरोध भी होगा? तो वे खोज पर गए। दुख का कारण खोजा। दुख मिटाने की विधियां खोजीं। और एक दिन उस स्थिति को उपलब्ध हो गए जो दुख-निरोध की है; आनंद की है।
सार्त्र पहले कदम पर रुक गया। बुद्ध के साथ थोड़ी दूर चलता है, फिर ठहर जाता है। वह कहता है, आगे कोई मार्ग नहीं है, बस यहीं सब समाप्त हो जाता है।
तो सार्त्र अंधकार को ही स्वीकार करके जीने लगा, ऐसे ही तुम भी जी सकते हो। तब तुम्हारा जीवन एक बड़ी उदासी हो जाएगी। तब तुम्हारे जीवन से सारा रस सूख जाएगा। तब तुम्हारे जीवन में कोई फूल न खिलेंगे, कांटे ही कांटे रह जाएंगे। अगर कोई फूल खिलेगा भी तो तुम कहोगे कि कल्पना है, तुम उसे स्वीकार न करोगे। अगर किसी और के जीवन में फूल खिलेगा तो तुम इनकार करोगे कि झूठ होगा, आत्मवंचना होगी, धोखा होगा, बेईमानी होगी, फूल होते ही नहीं। तो तुमने अपने ही हाथ अपने को कारागृह में बंद कर लिया। फिर तुम तड़फोगे। कोई दूसरा तुम्हें इस कारागृह के बाहर नहीं ले जा सकता। अगर तुम्हारी ही तड़प तुम्हें बाहर उठने की सामर्थ्य नहीं देती और तुम्हारी ही पीड़ा तुम्हें नई खोज का संबल नहीं बनती, तो कौन तुम्हें उठाएगा? लेकिन एक न एक दिन उठोगे, क्योंकि पीड़ा को कोई शाश्वत रूप से स्वीकार नहीं कर सकता। एक जन्म में कोई सार्त्र हो सकता है, सदा-सदा के लिए सार्त्र नहीं हो सकता; आज सार्त्र हो सकता है, सदा-सदा के लिए सार्त्र नहीं हो सकता; क्योंकि दुख का स्वभाव ऐसा है कि उसे स्वीकार करना असंभव है।
दुख का अर्थ ही यह होता है कि जिसे हम स्वीकार न कर सकेंगे। घड़ी भर को समझा लें, बुझा लें कि ठीक है, यही सब-कुछ है, इससे आगे कुछ भी नहीं है; लेकिन फिर-फिर मन आगे जाने लगेगा। क्योंकि मन जानता है गहरे में, सुख है। उसी आधार पर तो हम पहचानते हैं दुख को। हमने जाना है, शायद गहरी नींद में हमें सुख का थोड़ा सा स्वाद मिला है।
पतंजलि ने योग-सूत्रों में समाधि की व्याख्या सुषुप्ति से की है कि वह प्रगाढ़ निद्रा है। जैसा सुषुप्ति में सुख मिलता है सुबह उठ कर, रात गहरी नींद सोए, कुछ याद नहीं पड़ता; लेकिन एक भीनी सी सुगंध सुबह तक भी तुम्हें घेरे रहती है। कुछ याद नहीं पड़ता कहां गए, क्या हुआ; लेकिन गए कहीं और आनंद से सराबोर होकर लौटे!
कहीं डुबकी लगाई!
अपने में ही कोई गहरा तल छुआ!
कहीं विश्राम मिला!
कोई छाया के तले ठहरे!
वहां धूप न थी!
वहां गहरी शांति थी!
वहां कोई विचारों की तरंगें भी न पहुंचती थीं!
कोई स्वप्न के जाल भी न थे!
अपने में ही कोई ऐसी गहरी शरण, कोई ऐसा गहरा शरण-स्थल पा लिया।
सुबह उसकी सिर्फ हलकी खबर रह जाती है। दूर सुने गीत की गुन-गुन रह जाती है!
रात गहरी निद्रा सोए तो सुबह तुम कहते हो, बड़ी गहरी नींद आई, बड़े आनंदित उठे!
शायद गहरी निद्रा में तुम वहीं जाते हो जहां योगी समाधि में जाता है। गहरी निद्रा में तुम वहीं जाते हो जहां भक्ति भाव की अवस्था में पहुंचाती है। गहरी निद्रा में तुम उसी तल्लीनता को छूते हो जिसको भक्त भगवान में डूब कर पाता है। थोड़ा फर्क है। तुम बेहोशी में पाते हो, वह होश में पाता है। वही फर्क बड़ा फर्क है।
इसलिए सुबह तुम इतना ही कह सकते हो, सुखद है! अच्छी रही रात। लेकिन भक्त नाचता है, क्योंकि यह कोई बेहोशी में नहीं पाया अनुभव, होश में पाया।
तो कभी नींद के किन्हीं क्षणों में तुमने भी जाना है, तभी तो तुम दुख को पहचानते हो, नहीं तो पहचानोगे कैसे? शायद बचपन के क्षणों में जब मन भोला-भाला था और संसार ने मन को विकृत न किया था, वासनाएं अभी जगी न थीं, कामनाओं ने अभी खेल शुरू न किया था, अभी तुम ताजे-ताजे परमात्मा के घर से आए थे--तब शायद सुबह की धूप में बैठे हुए, फूलों को बगीचे में चुनते हुए, या तितलियों के पीछे दौड़ते हुए, तुमने कुछ सुख जाना है जो विचार के अतीत है; तुमने कोई तल्लीनता जानी है जहां तुम खो गए थे, कोई विराट सागर रह गया था, बूंद ने अपनी सीमा छोड़ दी थी! फिर अब भूली सी बात हो गई, भूली-बिसरी बात हो गई। अब याद भी नहीं आता।
बस इतना ही लोग कहे चले जाते हैं कि बचपन बड़ा स्वर्ग जैसा था। कोई जोर डाले तुम पर तो तुम सिद्ध न कर पाओगे कि क्या स्वर्ग था! अगर कोई तर्कयुक्त व्यक्ति मिल जाए, कहे कि सिद्ध करो, क्या था बचपन में स्वर्ग? तो तुम सिद्ध न कर पाओगे। वह भी गहरी नींद का अनुभव हो गया अब। अब याद रह गई है। खुद भी तुम्हें पक्का भरोसा नहीं है कि ऐसा हुआ था, भूल ही गया है। क्योंकि जिसकी तुम्हारे जीवन से संगति नहीं बैठती, वह धीरे-धीरे विस्मरण हो जाता है। धीरे-धीरे तुम उसी को याद रख पाते हो, जिसका तुम्हारे मन के ढांचे से मेल बैठता है, बेमेल बातों को हम छोड़ देते हैं। बेमेल बातों को याद रखना मुश्किल हो जाता है।
तो कहीं न कहीं कोई अनुभव तुम्हारे भीतर है। कभी प्रेम के गहरे क्षण में, किसी से प्रेम हुआ हो, मन ठिठक गया हो, सौंदर्य के साक्षात्कार में, या कभी चांदनी रात में आकाश को देखते हुए, मन मौन हो गया हो, तो तुमने सुख की झलक जानी। एक किरण तुम्हारे जीवन में कभी न कभी उतरी है। उसी से तो तुम पहचानते हो कि यह अंधेरा है। किरण न जानी हो तो अंधेरे को अंधेरा कैसे कहोगे? अंधेरे की प्रत्यभिज्ञा कैसे होगी, पहचान कैसे होगी? पहचान तो विपरीत से होती है।
तो जो रुक जाए जीवन की व्यर्थता पर, वह नास्तिक। इसलिए नास्तिक को मैं आस्तिक जितना साहसी नहीं कहता। जल्दी रुक गया। पड़ाव को मुकाम समझ लिया! आगे जाना है। और आगे जाना है!
एक बड़ी पुरानी सूफी कथा है कि एक फकीर जंगल में बैठा था। वह रोज एक लकड़हारे को लकड़ियां काटते हुए, ले जाते लाते देखता था। उसकी दीनता, उसके फटे कपड़े, उसकी हड्डियों से भरी देह! उसे दया आ गई! वह लकड़हारा जब भी निकलता था तो उसके चरण छू जाता था। एक दिन उसने कहा कि कल जब तू लकड़ी काटने जाए, आगे जा, और आगे जा! लकड़हारा कुछ समझा नहीं; लेकिन फकीर ने कहा है तो कुछ मतलब होगा। ऐसे कभी यह फकीर बोलता न था, पहली दफा बोला है: आगे जा, और आगे जा!
तो जहां वह लकड़ियां काटता था, जंगल में थोड़ा आगे गया, चकित हुआ: सुगंध से उसके नासापुट भर गए! चंदन के वृक्ष थे। वहां तक वह कभी गया ही न था। उसने चंदन की लकड़ियां काटीं। चंदन को बेचा तो उस रात खुशी में रोया, दुख में भी, खुशी में भी, कि अगर यही लकड़ियां अब तक काट कर बेची होतीं तो करोड़पति हो गया होता। पर अब गरीबी मिट गई।
दूसरे दिन जब चंदन की लकड़ी फिर काट रहा था तो उसे खयाल आया कि फकीर ने यह नहीं कहा था कि चंदन की लकड़ी तक जा, उसने कहा था, ‘और आगे, और आगे!’ तो उसने चंदन की लकड़ियां न काटीं, और आगे गया, तो देखा कि चांदी की एक खदान है। फिर तो उसके हाथ में एक सूत्र लग गया। फिर और आगे गया, तो सोने की खदान! फिर और आगे गया, तो हीरों की खदान पर पहुंच गया।
और आगे, जब तक कि हीरों की खदान न आ जाए! उसको ही हम परमात्मा कहते हैं।
तुम लकड़हारों की तरह लकड़ियां ही बेच रहे हो, थोड़ी ही दूर आगे चंदन के वन हैं। तुम विचारों में ही उलझे हो जहां लकड़ियां ही लकड़ियां हैं। बड़ी सस्ती उनकी कीमत है।
थोड़े निर्विचार में चलो: चंदन के वन हैं।
बड़ी सुगंध है वहां!
और थोड़े गहरे चलो, तो समाधि की खदानें हैं!
और गहरे चलो, तो निर्बीज समाधि, निर्विकल्प समाधि की खदानें हैं!
और गहरे चलो, तो स्वयं परमात्मा है!
योगी कदम-कदम जाता है, रुक-रुक कर जाता है, कई पड़ाव बनाता है। भक्त सीधा जाता है, नाचता हुआ जाता है, रुकता नहीं, पड़ाव भी नहीं बनाता। वह सीधा तल्लीनता में डूब जाता है।
योगी से भी ज्यादा हिम्मत भक्त की है। नास्तिक से ज्यादा हिम्मत आस्तिक की है। योगी से भी ज्यादा हिम्मत भक्त की है। क्योंकि भक्त सीढ़ियां भी नहीं बनाता; एक गहरी छलांग लेता है। जिसमें अपने को डुबा देता है, मिटा देता है।
इस अनुभव पर आना अत्यंत जरूरी है कि जीवन व्यर्थ है।
अंधेरी रात तूफाने तलातुम नाखुदा गाफिल
यह आलम है तो फिर किश्ती, सरे मौजेरवां कब तक?
‘अंधेरी रात!’ सब तरफ अंधेरा है। कुछ सूझता नहीं है। हाथ को हाथ नहीं सूझता। ‘तूफाने तलातुम!’ बड़ी आंधियां हैं, बड़े तूफान हैं; सब उखड़ा जाता है; कुछ ठहरा नहीं मालूम पड़ता; बड़ी अराजकता है। ‘नाखुदा गाफिल!’ और जिसके हाथ में किश्ती है, वह जो मांझी है, वह सोया हुआ है, बेहोश है। ‘यह आलम है!’ ऐसी हालत है। ‘तो फिर किश्ती सरे मौजेरवां कब तक?’ तो इस किश्ती का भविष्य क्या है? यह नाव अब डूबी तब डूबी! इस नाव में आशा बांधनी उचित नहीं। इस नाव के साथ बंधे रहना उचित नहीं।
लेकिन जाओगे कहां? भागोगे कहां? यही किश्ती तो जीवन है। तुम सोए हो मूर्च्छित, तूफान भयंकर है, अंधेरी रात है, डूबने के सिवाय कोई जगह दिखाई नहीं पड़ती।
लेकिन डूबना दो ढंग का हो सकता है। एक: किश्ती डुबाए तब तुम डुबो और एक कि किश्ती में बैठे-बैठे तुम डूबने के लिए कोई सागर खोज लो। उस सागर को ही हम परमात्मा कहते हैं।
अच्छा यकीं नहीं है तो किश्ती डुबो के देख
एक तू ही नाखुदा नहीं, जालिम! खुदा भी है।
तो फिर हिम्मत आ जाती है, फिर आदमी कहता है कि ठीक है। तो अगर मांझी! तू चाहता ही है कि किश्ती डुबानी है तो डुबा कर देख! तू ही अकेला नहीं है, मांझी! तुझसे ऊपर खुदा भी है।
एक तू ही नाखुदा नहीं जालिम! खुदा भी है।
फिर अंधेरी रात, तूफान, किश्ती का अब डूबा तब डूबा होना, सब दूर की बातें हो जाती हैं। तुम भीतर कहीं एक ऐसी जगह लंगर डाल देते हो, जहां तूफान छूते ही नहीं, जहां रात का अंधेरा प्रवेश ही नहीं करता। और जहां किसी नाखुदा की, किसी मांझी की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहां परमात्मा ही मांझी है।
जरूरी है कि जीवन की व्यर्थता दिखाई पड़ जाए। बहुत हैं जो जीवन की व्यर्थता बिना देखे आस्तिकता में अपने को डुबाने की चेष्टा करते हैं, वे कभी न डूब पाएंगे। वे चुल्लू भर पानी में डूबने की चेष्टा कर रहे हैं। वे अपने को धोखा दे रहे हैं।
जब तक तुम्हारे जीवन की जड़ें उखड़ न गई हों, जब तक तुमने गहन झंझावात नास्तिकता के न झेले हों, जब तक तुम्हारा रोआं-रोआं कंप न गया हो जीवन के अंधकार से, जब तक तुम्हारी छाती भयभीत न हो गई हो--तब तक तुम जिस आस्तिकता की बातें करते हो, वह सांत्वना होगी, सत्य नहीं; तब तक तुम जिन मंदिरों और मस्जिदों में पूजा-उपासना करते हो, वह पूजा-उपासना धोखाधड़ी है। वह तुम्हारा औपचारिक व्यवहार है। वह संस्कारवशात है। उससे तुम्हारे जीवन का सीधा कोई संबंध नहीं है। वह मंदिर तुमने अपनी प्रज्ञा से नहीं खोजा है, उधार है। उधार परमात्मा असली परमात्मा नहीं है। उसे तो तुम्हें अपने को चुका कर ही, अपने को दान में देकर ही, अपना सर्वस्व लुटा कर ही पाना होगा। वह तो तुम जब तक सूली पर न लटक जाओ, तब तक उस सिंहासन तक न पहुंच पाओगे।
तो पहली तो स्मरण रखने की बात यह है कि कहीं जल्दी में आस्तिक मत हो जाना। यह कोई जल्दी का काम नहीं है। बड़ी गहन प्रतीक्षा चाहिए। और यह कोई सांत्वना नहीं है कि तुम ओढ़ लो, संक्रांति है। सांत्वना नहीं है परमात्मा, संक्रांति है, महाक्रांति है। तुम जो हो, मिटोगे; और तुम जो होने चाहिए वह प्रकट होगा।
तो सस्ती आस्तिकता कहीं नहीं ले जाती। सस्ती आस्तिकता से तो असली नास्तिकता बेहतर है; कम से कम उस परिधि पर तो खड़ा कर देती है, जहां से आगे कदम चाहो तो उठा सकते हो।
झूठी आस्तिकता से तो कोई कभी नहीं गया है, जा ही नहीं सकता। झूठी प्रार्थना कभी नहीं सुनी गई है। तुम कितने ही जोर से चिल्लाओ, तुम्हारी आवाज के जोर से प्रार्थना का कोई संबंध नहीं है; तुम्हारे हृदय की सच्चाई से, तुम्हारी विनम्रता से, तुम्हारे निर-अहंकार भाव से, तुम्हारे असहाय-भाव से, जब तुम्हारी प्रार्थना उठेगी तो पहुंच जाती है, तो ़जर्रा-़जर्रा, कण-कण अस्तित्व का तुम्हारा सहयोगी हो जाता है।
तो पहले तो झूठी आस्तिकता से बचना, फिर नास्तिकता में मत उलझ जाना। नास्तिक होना जरूरी है, बने रहना जरूरी नहीं है। एक ऐसी घड़ी आएगी जब अंधेरा ही अंधेरा दिखाई पड़ेगा, तूफान ही तूफान होंगे, कहीं कोई सहारा न मिलेगा, सब सहारे झूठ मालूम होंगे, राह भटक जाएगी, तुम बिलकुल अजनबी की तरह खड़े रह जाओगे, जिसका कोई सहारा नहीं, जो एकाकी है--तब घबड़ा कर बैठ मत जाना; यहीं से शुरुआत होती है। यहीं से अगर तुमने आगे कदम उठाया, तो उपासना, भक्ति! यहीं से आगे कदम उठाया तो संसार के पार परमात्मा की शुरुआत होती है।
झूठी नास्तिकता से बचना है, झूठी आस्तिकता से बचना है। नास्तिकता सच्ची हो तो भी उसको घर नहीं बना लेना है। असली नास्तिकता के दुख को झेलना है ताकि उस पीड़ा के बाहर असली आस्तिकता का जन्म हो सके।
दूसरा प्रश्न:
ओशो, इस विराट अस्तित्व में मैं ना-कुछ हूं, यह अप्रिय तथ्य स्वीकारने में बहुत भय पकड़ता है। इस भय से कैसे ऊपर उठा जाए?
‘अप्रिय’ कहोगे तो शुरू से ही व्याख्या गलत हो गई, फिर भय पकड़ेगा। ‘अप्रिय’ कहना ही गलत है।
फिर से सोचो: ना-कुछ होने में अप्रिय क्या है? वस्तुतः कुछ होने में अप्रिय है। क्योंकि जीवन के सारे दुख तुम्हारे ‘कुछ होने’ के कारण पैदा होते हैं।
अहंकार घाव की तरह है। और जब तुम्हारे भीतर घाव होता है--और अहंकार से बड़ा कोई घाव नहीं, नासूर है--तो हर चीज की चोट लगती है, हर चीज से चोट लगती है, हर चीज से पीड़ा आती है; जरा कोई टकरा जाता है और पीड़ा आती है; हवा का झोंका भी लग जाता है तो पीड़ा आती है; अपना ही हाथ छू जाता है तो पीड़ा आती है।
अहंकार का अर्थ है: मैं कुछ हूं।
अगर तुम जीवन की सारी पीड़ाओं की फेहरिश्त बनाओ तो तुम पाओगे कि वे सब अहंकार से ही पैदा होती हैं। लेकिन तुमने कभी गौर से इसे देखा नहीं। तुम तो सोचते हो कि पीड़ा तुम्हें दूसरे लोग देते हैं।
किसी ने तुम्हें गाली दी, तो तुम सोचते हो, यह आदमी गाली देकर मुझे पीड़ा दे रहा है। व्याख्या की भूल है। विश्लेषण की चूक है। दृष्टि का अभाव है। आंख खोल कर फिर से देखो। इस आदमी की गाली में अगर कोई भी पीड़ा है तो इसीलिए है कि तुम्हारे भीतर अहंकार उस गाली से छूकर दुखी होता है। अगर तुम्हारे भीतर अहंकार न हो तो इस आदमी की गाली तुम्हारा कुछ भी न बिगाड़ पाएगी। तुम उस आदमी की गाली को सुन लोगे और अपने मार्ग पर चल पड़ोगे। हो सकता है, इस आदमी की गाली तुम्हारे मन में करुणा को भी जगाए कि बेचारा नाहक ही व्यर्थ की बातों में पड़ा है। लेकिन गाली उसकी तुम्हें पीड़ा दे जाती है, क्योंकि तुम्हारे पास एक बड़ा मार्मिक स्थल है, जो तैयार ही है पीड़ा पकड़ने को। बड़ा संवेदनशील है! बड़ा नाजुक है! और हर घड़ी तैयार है कि कहीं से पीड़ा आए तो वह... पीड़ा पर ही जीता है।
तो जरूरी नहीं कि कोई गाली ही दे, राह पर कोई बिना नमस्कार किए निकल जाए तो भी पीड़ा आ जाती है। कोई तुम्हें देखे और अनदेखा कर दे तो भी पीड़ा आ जाती है। राह पर दो आदमी हंस रह हों तो भी पीड़ा आ जाती है कि शायद मुझ पर ही हंस रहे हैं। दो आदमी एक-दूसरे के कान में खुसर-फुसर कर रहे हों तो पीड़ा आ जाती है कि शायद मेरे लिए ही...।
यह जो ‘मैं’ है, बड़ा रुग्ण है! इसको लेकर तुम कभी भी स्वस्थ और सुखी न हो पाओगे।
तो अगर ‘अप्रिय’ कहना हो, तो अहंकार को कहना।
और यही अहंकार तुमसे कहता है, डरो, प्रेम से डरो, क्योंकि प्रेम में इसे छोड़ना पड़ेगा। भक्ति से डरो, क्योंकि भक्ति में तो यह बिलकुल ही डूब जाएगा; प्रेम में क्षण भर को डूबेगा, भक्ति में शाश्वत, सदा के लिए डूब जाएगा। बचो!
यह अहंकार कहता है, ऐसी जगह जाओ ही मत जहां डूबने का डर हो। बच कर चलो! सम्हल कर चलो।
और यही अहंकार तुम्हारी पीड़ा का कारण है!
ऐसा समझो कि नासूर लिए चलते हो और चिकित्सक से बचते हो।
‘इस विराट अस्तित्व में मैं ना-कुछ हूं, यह अप्रिय तथ्य स्वीकारने में बहुत भय पकड़ता है।’
यह भय तुम्हें नहीं पकड़ रहा है; यह भय उसी अहंकार को पकड़ रहा है जो कि डूबने से, तल्लीन होने से भयभीत है। क्योंकि तल्लीनता का अर्थ मौत है--अहंकार की मौत, तुम्हारी नहीं! तुम्हारे लिए तो जीवन का नया द्वार खुलेगा। उसी मृत्यु से तुम्हारे लिए परम जीवन की उपलिब्ध होगी। उसी मृत्यु से तुम पहली बार अमृत का दर्शन करोगे। लेकिन तुम्हारे लिए, अहंकार के लिए नहीं!
यह जो तुम्हारे भीतर ‘मैं’ की गांठ है, यह गांठ दुख दे रही है। इस अप्रिय ‘मैं’ को पहचानो, तो तुम पाओगे कि निरहंकारिता से ज्यादा प्रीतिकर और कुछ भी नहीं।
और जिसे निर-अहंकारिता आ गई, सब आ गया! फिर उसे किसी मंदिर में जाने की जरूरत नहीं। निर-अहंकारिता का मंदिर जिसे मिल गया, वह पत्थरों के मंदिर में जाए भी क्यों!
निर-अहंकारिता का मंदिर जिसे मिल गया, उसके तो अपने ही भीतर के मंदिर के द्वार खुल गए!
अदब-आमोज है मैखाने का ज़र्रा-ज़र्रा
सैकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना।
इश्क पाबंदेवफा है, न कि पाबंदे-रसूम
सर झुकाने को नहीं कहते हैं सिजदा करना।
‘अदब-आमोज है मैखाने का ़जर्रा-़जर्रा।’ अगर तुम गौर से देखो तो अस्तित्व का कण-कण विनम्रता सिखा रहा है। पूछो वृक्षों से, पूछो पर्वतों से, पहाड़ों से, पूछो झरनों से, पक्षियों से, पशुओं से; कहीं अहंकार नहीं है!
अदब-आमोज है मैखाने का ज़र्रा-ज़र्रा
एक कण-कण पूरा अस्तित्व एक ही बात सिखा रहा है: ना-कुछ हो जाओ!
सैकड़ों तरह से आ जाता है सिजदा करना।
और अगर तुम इन बातों को सुनो जो अस्तित्व में गूंज रही हैं सब तरफ से, सब दिशाओं से, तो सैकड़ों रास्ते हैं जिनसे उपासना का सूत्र तुम्हारे हाथ में आ जाएगा, सिजदा करना आ जाएगा, झुकने की कला आ जाएगी।
जरूरी नहीं है कि तुम शास्त्र ही पढ़ो; अस्तित्व के शास्त्र से बड़ा कोई और शास्त्र नहीं है। जरूरी नहीं है कि तुम ज्ञानियों से ही सीखो; तुम अगर आंख खोल कर देखो तो सारा अस्तित्व तुम्हें सिखाने को तत्पर है।
यहां आदमी के सिवाय कोई अहंकार से पीड़ित नहीं है और इसलिए सिवाय आदमी के यहां कोई भी पीड़ित नहीं है। आदमी ही परेशान है, चिंतित है; वृक्ष परेशान नहीं; सिजदा में खड़े हैं। सतत चल रही है पूजा!
आदमी की पूजा घड़ी दो घड़ी की होती है; अस्तित्व की पूजा सतत है। तुम कभी आरती उतारते हो; तारे, चांद, सूरज उतारते ही रहते हैं आरती! चौबीस घंटे! सतत!