Neti Neti Shunya Ki Naon #7

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Osho's Commentary

मेरे प्रिय आत्मन्‌!
शिविर के इस अंतिम मिलन में थोड़ी सी बात मुझे और आपसे कहनी है।
तीन दिन पहले हमारी जो अंतर्यात्रा शुरू हुई थी उसका आज अंतिम चरण है। सारे जीवन की ही कथा ऐसी है--जो दो दिन पहले शुरू होता है वह दो दिन बाद समाप्त हो जाता है। हम सोच भी नहीं पाते कि अंत करीब आ जाता है। जीवन में सब-कुछ ऐसे ही समाप्त हो जाता है।
विदा की कोई तैयारी तो नहीं होती, लेकिन विदाई लेनी पड़ती है। जैसे असमय में लगता है कि अलग हो गए, ऐसा ही जीवन के अंतिम चरण में भी लगता है कि अलग होना पड़ रहा है।
लेकिन उसकी तैयारी हो सकती है।
एक-एक पल ऐसे जीए जा सकता है इस भांति कि जैसे हम विदा के लिए हमेशा तैयार हों। और जो व्यक्ति प्रत्येक पल को ऐसे जीता है कि दूसरे पल अंत संभव है, वही व्यक्ति जीवन के परिपूर्ण आनंद को, जीवन के अमृत को उपलब्ध हो पाता है।
एक यात्रा में मैं था, वर्षा के दिन थे, और बीच में एक नाला पूर पर आ गया था। सेतु डूब गया था। और गाड़ी रोक कर कोई दो घंटे वहां रुक जाना पड़ा। पानी उतरेगा तब नदी पार की जा सकेगी। और भी दो गाड़ियां मेरे पीछे आईं और रुक गईं। उन गाड़ियों में जो व्यक्ति थे, मैं उनसे अपरिचित था, लेकिन उन्होंने संभवतः मेरी बातों के संबंध में कुछ सुना होगा। नदी के किनारे पत्थर पर बैठा हुआ देख कर एक गाड़ी के तीन व्यक्ति मेरे पास आकर बैठ गए और कुछ बात करने लगे। दो घंटे वहां बैठना था, मैं उनसे कुछ बात करता रहा। फिर नदी का पानी उतर गया। वे अपनी गाड़ी उतारने को हुए, तो उन्होंने मुझसे कहा: आपकी बातें बहुत अच्छी लगीं, अब जब हम लौट कर आएंगे तब जरूर आपसे मिलेंगे और आपकी बातों पर कुछ प्रयोग करने का प्रयास करेंगे।
मैंने उनसे कहा: लौट कर आने का कोई भी भरोसा नहीं है; हो सकता है आप लौट आएं लेकिन मैं न बचूं; हो सकता है मैं बचूं आप न लौटें; हो सकता है हम दोनों बचें और मिल न सकें। सभी कुछ हो सकता है। और एक छोटी सी कहानी मैंने उनसे कही। फिर हंसते हुए हम विदा हो गए।
एक छोटी सी कहानी मैंने उनसे कही। पता नहीं था कि वह कहानी क्या परिणाम ले आएगी।
मैंने उन्हें कहा कि एक सम्राट था चीन में, अपने वजीर को उसने फांसी की सजा दे दी थी। कुछ शक हुआ, कुछ संदेह हुआ और वजीर को बंद कर दिया कारागृह में। कल सुबह उसे फांसी लग जाएगी। नियम था उस राज्य का कि फांसी के पहले सम्राट स्वयं कैदी से मिलता था, उसकी कोई अंतिम इच्छा हो तो पूरी कर दे। फिर यह तो वजीर था, सम्राट का बड़ा वजीर था।
कल सुबह फांसी होनी है, आज संध्या अपने घोड़े पर सवार होकर कारागृह के पास पहुंचा। घोड़े को बाहर बांधा, फिर भीतर गया। सींकचों के भीतर, द्वार के पास ही उसका बड़ा वजीर कैद था। सम्राट को उसने देखा और वजीर की आंखों से आंसू बहने लगे। सम्राट हैरान हुआ! वजीर एक बहादुर आदमी था। जीवन के बहुत कष्ट, जीवन में मृत्यु का बहुत बार मुकाबला किया था। आशा न थी कि वह रोने लगेगा मृत्यु के कारण। सम्राट उसे समझाने लगा कि तुम रोते हो? तुम भयभीत हो?
वह वजीर कहने लगा: मृत्यु से नहीं, किसी और बात से रोता हूं।
सम्राट ने कहा: और क्या बात है? कहो, मैं पूरी करूं। इसीलिए आया हूं कि तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो पूरी करूं।
उसने कहा: नहीं, आप न कर सकेंगे, बहुत कठिन हो गई यह बात। रोता हूं इसलिए...छोड़ दें, लेकिन जाने दें, वह आपसे नहीं हो सकेगा।
सम्राट ने कहा: फिर भी तुम कहो।
उस वजीर ने कहा: इसलिए नहीं रो रहा हूं कि कल मर जाऊंगा। मरने का तो कोई सवाल नहीं है। जिंदगी तो हमेशा दांव पर है किसी भी क्षण मरा जा सकता है। रो रहा हूं आपके घोड़े को देख कर, वह द्वार पर घोड़ा बंधा है।
सम्राट ने कहा: घोड़े को देख कर? घोड़े से क्या संबंध?
वह वजीर कहने लगा: मैंने एक कला सीखी थी घोड़े को आकाश में उड़ना सिखाने की। लेकिन जिस जाति के घोड़े को आकाश में उड़ना सिखाया जा सकता है, वह जीवन भर मुझे नहीं मिल सका। और आज जब कि कल मेरी मौत आने को है, वह घोड़ा द्वार पर खड़ा है। जिस घोड़े पर आप बैठ कर आए हैं इसी जाति के घोड़े की मैं खोज में था। इसलिए रो रहा हूं कि जीवन में एक कला सीखी थी, उसका उपयोग न कर पाया और मौत करीब आ गई।
सम्राट का लोभ आकाश छू गया। घोड़ा आकाश में उड़ सकता है! तब तो दुनिया में उस जैसा कोई सम्राट न रह जाएगा अगर उसका घोड़ा आकाश में उड़े! उसने कहा: वजीर...जंजीरें खोल दी जाएं वजीर की। और वजीर से कहा: कितने दिन में यह बात हो सकती है? धोखा मत देना।
वजीर ने कहा: कम से कम एक वर्ष लग जाएगा।
सम्राट ने कहा: कोई फिकर नहीं, अगर एक वर्ष में घोड़ा उड़ना सीख गया, तो तुम अपनी जगह वापस ले लिए जाओगे, न केवल ले लिए जाओगे बल्कि आधा राज्य तुम्हें दे दूंगा पुरस्कार में। और अगर नहीं यह हो सका, तो ठीक है, साल भर बाद फांसी दी जा सकेगी।
वजीर घोड़े पर सवार होकर अपने घर पहुंच गया। सांझ तो उसके घर में दीये भी नहीं जलाए गए थे, कल सुबह उसकी मौत होने को थी। उसकी पत्नी, उसके बच्चे, उसके प्रियजन रोते थे। उसे सामने देख कर उन्हें विश्र्वास न आया। उसकी पत्नी उससे पूछने लगी, कैसे वापस आ गए हो? उसने सारी बात बताई। उसकी पत्नी छाती पीट कर रोने लगी कि तुम कैसे पागल हो, तुमने तो कभी कोई कला नहीं सीखी घोड़े को आकाश में उड़ाने की। तुम क्यों झूठी बात बोल आए हो? और अगर झूठ ही बोला था तो एक साल के लिए बोला; तो कोई दस-बीस साल के लिए बोलना था। एक वर्ष तो ऐसे बीत जाएगा, तुम्हारी मृत्यु से भी ज्यादा कठिन हो जाएगा यह वर्ष बिताना, एक-एक पल बीतेगा और लगेगा मौत आती है, मौत आती है।
वह वजीर हंसने लगा, उसने कहा: पागल, तू जानती नहीं, एक वर्ष बहुत बड़ा है, एक पल भी बहुत बड़ा है। कौन जाने वर्ष भर में मैं मर जाऊं, राजा मर जाए, घोड़ा मर जाए। कुछ भी हो सकता है। एक वर्ष बहुत बड़ा है।
और ऐसा हुआ--वजीर ही नहीं मरा, राजा ही नहीं मरा, घोड़ा ही नहीं मरा, उस वर्ष में तीनों मर गए। उस वर्ष तीनों मर गए। वर्ष इतना बड़ा साबित हुआ। एक पल इतना बड़ा साबित हो सकता है।
तो मैं उन मित्र को विदा करने लगा उनकी गाड़ी पर और उनसे मैंने यह कहानी कही, वे हंसने लगे, मैं भी हंसने लगा, हम विदा हो गए।
वे गाड़ी निकाल गए। बड़ी गाड़ी थी। फिर थोड़े कोई दस मिनट बाद मैं भी अपनी गाड़ी निकाल कर पीछे पार किया नदी। कोई दो मील बाद ही जिन्हें मैंने जिंदा छोड़ा था, वे मुझे मृत मिले। उनकी गाड़ी तो टकरा गई थी और वे तीनों वहीं स्थान पर ही मर गए थे।
मेरा ड्राइवर कहने लगा: चलते वक्त आपने कहानी कही थी--तीन के मर जाने की। ये तीन तो...ये तो मर गए हैं! और ये तो इस खयाल में थे कि लौट कर आएंगे, आपकी बातें ठीक लगी थीं, फिर कुछ प्रयोग करेंगे।
जिंदगी ऐसी ही है, दुबारा लौट कर हम मिलेंगे, नहीं मिलेंगे, कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
राजा मर सकता है, वजीर मर सकता है, घोड़ा मर सकता है। तीनों भी मर सकते हैं। जिंदगी इतनी ही बेबूझ है।
इसलिए अंतिम विदा के क्षण में आपसे यह कहना चाहता हूं: एक-एक पल को इस भांति जीना कि दूसरे पल का कोई भी भरोसा नहीं है। यह बोध ही मनुष्य को साधक बनाता है। यह बोध ही कि एक-एक पल अंतिम हो सकता है। जैसे घास की पत्ती पर पड़ी हुई सुबह ओस की बूंद कंपती है, जरा सा हवा का झोंका और बूंद नीचे गिर जाएगी और बिखर जाएगी। वैसे ही मनुष्य का जीवन प्रतिपल किसी ओस की बूंद की तरह घास की पत्ती पर कंपता हुआ है। किसी भी क्षण बूंद गिर जाएगी और सब समाप्त हो जाएगा।
यह जो क्षण भर के लिए जीवन है, यह जो क्षण भर के लिए श्र्वास है, यह जो क्षण भर के लिए चिंतन और मनन है, और अवसर है, क्या इस अवसर से हम उस जीवन को पाने की दिशा में कोई कदम रख सकते हैं जहां कोई मृत्यु नहीं--जहां अमृत है, जहां परम जीवन है? एक ही बात स्मरण रखने की है कि जिसे हम जीवन समझते हैं वह जीवन नहीं एक क्षण भर का अवसर है। उस अवसर को हम परम जीवन को पाने की सीढ़ी बना सकते हैं, चाहें तो, अन्यथा खो भी सकते हैं।
साधक का यही अर्थ है कि उसने इस जीवन को चरम नहीं मान लिया, अंतिम नहीं मान लिया, इसे एक अवसर, एक ऑपरच्युनिटी, एक मौका बनाया है, ताकि वह और गहरे जीवन को, और परम जीवन को, और अमृत जीवन को पाने की दिशा में कदम रख सके।
एक-एक पल को इस भांति समझना कि बूंद किसी भी क्षण गिर सकती है। तो फिर एक-एक पल साधना हो जाएगी, एक-एक श्र्वास साधना बन जाए, एक-एक दिन, एक-एक रात जीवन को क्रांति में ले जाने का मार्ग बन सकता है।
यह पहली बात, जीवन की क्षणभंगुरता का स्मरण; ताकि जीवन को गंवाया न जा सके, खोया न जा सके, जीवन एक उपलब्धि बन सके।
दूसरी बात, इन तीन दिनों में साधना की जिस दिशा की और कुछ इशारे मैंने किए हैं, और आपने कुछ इशारे पकड़े हैं, पकड़े होंगे। आपने कुछ कदम चले हैं, चले होंगे, तो इन कदमों को वहीं मत रोक देना, उन कदमों को आगे भी एक सातत्य, एक कंटीन्युटी उपलब्ध होनी चाहिए, मिलनी चाहिए, तो ही किसी दिन द्वार खुल सकता है।
लेकिन हम उस किसान की तरह हैं, सुना होगा आपने, एक किसान, बड़ा खेत था उसके पास, उसने कुआं खोदना चाहा, ताकि पानी मिल सके, फसलें हो सकें । उसने एक कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन चार-छह हाथ खोदा होगा, पानी तो निकला नहीं, तो उसने सोचा कि यहां पानी नहीं निकलेगा, उसने वह गड्ढा वैसे ही छोड़ दिया। फिर दस-पांच दिन विश्राम किया और दूसरी जगह गड्ढा खोदा। फिर दस-पांच हाथ खोदा, फिर वहां भी पानी नहीं निकला, उसने सोचा कि यहां भी पानी नहीं निकलेगा। फिर कुछ दिन विश्राम किया, फिर गड्ढा खोदा। धीरे-धीरे पूरा खेत गड्ढों से भर गया, लेकिन पानी कहीं भी नहीं निकला।
तब वह रोने लगा बैठ कर अपने खेत के किनारे पर। वहां से एक फकीर गुजरता था। उसने पूछा: क्यों रोते हो?
उसने कहा: मैं थक गया, परेशान हो गया कुएं खोद-खोद कर। साल बर्बाद हो गई। सारा खेत खोद डाला है, लेकिन पानी नहीं निकलता।
वह फकीर गया और हंसने लगा, उसने कहा: पागल, काश, तूने इतने गड्ढे किए, एक ही जगह खोदता तो पानी कभी का निकल आता। लेकिन चार-छह हाथ खोदा और छोड़ दिया, चार-छह हाथ खोदा और छोड़ दिया, ऐसे तो कुएं नहीं खुदते हैं।
ध्यान स्वयं के भीतर कुआं खोदने जैसा है।
स्वयं के भीतर जो छिपा है जल-स्रोत, वह जो स्वयं के भीतर छिपी है ज्योति, वह जो स्वयं के भीतर छिपा है जीवन, वह जो स्वयं के भीतर छिपा है परमात्मा, उस तक यह कुआं खोदने का नाम ध्यान है। ध्यान--कुआं खोदना ही है स्वयं के भीतर।
लेकिन कभी हम थोड़ा सा खोद लेते हैं। वह किसान तो बहुत समझदार था, चार-छह हाथ खोदता था, हम तो स्किन डीप भी नहीं खोदते हैं। चमड़ी की मोटाई के बराबर भी नहीं खोदते हैं, फिर छोड़ देते हैं। फिर साल, दो साल में खयाल आता है, फिर थोड़ा खोदते हैं, फिर छोड़ देते हैं। ऐसे जीवन बीत जाएगा और प्राणों के खेत में परमात्मा का कुआं नहीं खोदा जा सकेगा।
खोदना है वह कुआं तो सातत्य चाहिए, श्रम चाहिए, लगातार एक ही जगह चित्त को खोदते ही चले जाना है, खोदते ही चले जाना है, तो जरूर व्यक्ति स्वयं के भीतर उसे पाने में सफल हो जाता है, जो मौजूद है, जो उसकी संपदा है, जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
लेकिन अधिकतम लोग इसी तरह करते हैं, शिविर में आएंगे आप, फिर चले जाएंगे; दिन दो दिन शायद ध्यान के लिए बैठेंगे, फिर भूल जाएंगे।
दिन दो दिन से नहीं कुछ होने का है। जीवन भर की गलत आदतें हैं, जीवन भर का गलत जीवन का ढंग है, विचार के गलत उलझाव हैं। दिन दो दिन से नहीं होगा। हाथ दो हाथ खोदने से नहीं होगा। गहरा है पानी; क्योंकि हमने ही बहुत मिट्टी की पर्तें इकट्ठी कर रखी हैं, हमने ही बहुत चट्टानें इकट्ठी कर रखी हैं, सबमें दब गया है नीचे। मिट्टी खोदनी पड़े, चट्टान काटनी पड़े, खोदते ही चला जाना पड़े, तो शायद...शायद क्यों तब तो निश्र्चित ही भीतर के जल-स्रोत पाए जा सकते हैं। जिन्हें पाए बिना हर आदमी प्यासा जीता है और प्यासा मरता है। और जिन्हें पा लेने पर वह तृप्ति मिल जाती है जिसका कोई अंत नहीं।
तो दूसरी बात यह कहनी है कि यहां से चले जाते हैं--तो जो यहां थोड़े से प्रयास किए हैं वे छूट न जाएं, वे साथ चले जाएं, उन्हें साथ लेते चले जाएं। उन पर धीरे-धीरे रोज थोड़ा-थोड़ा श्रम, धीरे-धीरे थोड़ी-थोड़ी खुदाई, धीरे-धीरे कुएं की तरफ कुछ न कुछ उपाय जारी रखें, जारी रखें...।
जिन्होंने ने भी कभी खोदा है, वे कभी असफल नहीं हुए हैं। दूर हो सकता है पानी, थोड़ी-बहुत मिट्टी की चट्टानें हो सकती हैं, पत्थर हो सकते हैं, लेकिन पानी जरूर भीतर है। थोड़े फासले हो सकते हैं, लेकिन पानी जरूर भीतर है। और अक्सर तो यह होता है कि आदमी खोदते-खोदते करीब-करीब वहां से लौट आता है जहां से जल-स्रोत बहुत ही करीब थे, बहुत ही निकट थे।
कोलरेडो में सबसे पहले जब सोने की खदानें खोज ली गई थीं, तो कोलरेडो में तो सारे दुनिया के लोभी भागने लगे, पहुंचने लगे। वहां तो सोना जैसे कंकड़-पत्थरों की तरह कोलरेडो की पहाड़ियों में बिखरा हुआ था। किसी के पास थोड़ी सी जमीन थी तो वह करोड़पति हो गया। एक आदमी ने सोचा कि छोटी-मोटी जमीन क्या खरीदनी, उसने पूरा एक पहाड़ ही खरीद लिया। लाखों रुपयों के उपकरण लगाए पहाड़ पर और खुदाई शुरू की सोने की खदानों के लिए। लेकिन खोदता गया, खोदता गया, सोने का कोई पता नहीं, पत्थर ही पत्थर हाथ आए। लाखों रुपये खर्च कर दिए थे। यंत्र लगाए थे बड़े। छोटे-मोटे लोग छोटा-मोटा टुकड़ा लेकर खोद कर खोज-बीन करके धनी हो गए थे। और वह धनी अपना सब धन लगा कर निर्धन हो गया था। वहां कोई सोने का पता न था।
फिर उसने विज्ञापन किया, अपनी पहाड़ी बेच देने के लिए, मय उपकरणों के, मशीनों के, सारी व्यवस्था के अपनी पूरी पहाड़ी बेच देने का उसने विज्ञापन किया। कई पचास लाख से ऊपर की उसने सूचना की। उसके घर के लोग कहने लगे: तुम सोचते हो, कोई पागल होगा जो खरीदेगा? सबको पता चल गया है कि तुम बर्बाद हो गए हो। और वहां से रत्ती भर सोना नहीं निकला है। तो कौन खरीदेगा पचास लाख देकर?
उस आदमी ने कहा: मैं निराश नहीं हूं, कोई न कोई, कोई न कोई मिल भी सकता है।
और एक आदमी मिल गया। उसके घर के लोगों न कहा: तुम पागल हुए हो, एक आदमी बर्बाद हो गया है और तुम बर्बादी के धंधे में पड़ना चाहते हो। वहां कुछ भी मिलने को नहीं है। लेकिन उस आदमी ने कहा: कोई ठिकाना नहीं, जहां तक उसने खोदा है वहां तक सोना न हो और आगे सोना हो, क्योंकि आगे बहुत जमीन बाकी है, कायम है।
नहीं माना, खरीद लिया। और चमत्कार तो तब हुआ जब उसने खुदाई शुरू की और पहले दिन ही सोने की खदान उपलब्ध हो गई। सिर्फ एक फीट नीचे सोने की खदान शुरू हो गई। सिर्फ एक फीट पहले से पहला मालिक छोड़ कर चला गया था।
अक्सर जिंदगी में ऐसा हो जाता है कि जहां से आप छोड़ कर चले आते हैं वहां से शायद थोड़े ही कदम उठाने की और जरूरत थी और मंजिल पूरी हो जाती।
इसलिए यह ध्यान रखना कि छोड़ कर लौट मत आना। जाते हों, तो जाना अंत तक--साहस से, आशा से, प्रतीक्षा से, श्रम से, संकल्प से। पीछा करना अपने भीतर आखिर तक। जहां तक जाना संभव हो वहां तक जाना। तब ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई भीतर गया हो और असफल लौटा हो। जो जाते ही नहीं, बाहर से ही लौट आते हैं, वे ही केवल असफल होते हैं।
परमात्मा की दिशा में असफलता होती ही नहीं। लेकिन कोई जाए ही नहीं, चले ही नहीं, तो परमात्मा भी कुछ भी नहीं कर सकता है।
हम दो कदम चलें, तो परमात्मा चार कदम चलने को हमेशा तैयार है। हम एक हाथ बढ़ाएं, तो परमात्मा हमेशा दो हाथ बढ़ाने को तैयार है। लेकिन हम पीठ किए खड़े रहें, तब तो कोई उपाय नहीं है। पीठ किए ही खड़े रहें तो भी शायद कुछ हो जाए, लेकिन हम पीठ किए भाग भी रहे हैं, तब तो फिर और भी उपाय नहीं है।
तो दूसरी बात, श्रम--साधना का, ध्यान का--सतत, प्रतिपल उस दिशा में प्राण बहते ही रहें, प्रतिदिन उस दिशा में प्रार्थना चलती ही रहे। घड़ी दो घड़ी को एकांत में अकेले होकर ध्यान में डूबते ही रहें।
तीसरी बात, किसी को पता नहीं है कि किस क्षण द्वार खुल जाएंगे। किसी को पता नहीं है।
एक करोड़पति से एक दरिद्र भिखारी ने पूछा कि आप करोड़पति कैसे हो गए हैं? उसने कहा कि मैं हमेशा अवसर की प्रतीक्षा करता रहा, और जब भी मुझे अवसर मिला, तो मैंने श्रम किया और मैं करोड़पति हो गया।
उस भिखारी ने कहा: अवसर की? जब भी अवसर मिला तब आपने श्रम किया; लेकिन अवसर कब आएगा, मैं भी श्रम करना चाहता हूं।
उस करोड़पति ने कहा: जब भी अवसर आया मैं झपट कर अवसर पर सवार हो गया; जब अवसर आए तुम भी झपट कर सवार हो जाना।
लेकिन उसने कहा: वह तो ठीक है, लेकिन अवसर कब आएगा? मुझे कैसे पता चलेगा? और जब तक मैं झपटूं तब तक निकल जाए तो क्या होगा?
तो उस करोड़पति ने कहा: यू कीप ऑन जंपिंग। तुम तो कूदते ही रहो, कूदते ही रहो, कूदते ही रहो। जब अवसर आए, तो तुम कूदते हुए तैयार रहोगे, तो तुम झपट कर उसके ऊपर सवार कर लेना। अगर तुम बैठ गए और प्रतीक्षा करने लगे कि जब अवसर आएगा तब मैं कूद कर सवार हो जाऊंगा, तो अवसर इतने जल्दी निकल जाता है कि तुम कूद भी नहीं पाओगे और वह निकल जाएगा। यू कीप ऑन जंपिंग। तुम तो कूदते ही रहो, कूदते ही रहो। जब भी आए तुम कूदते हुए ही मिलने चाहिए उसको, ताकि तुम तत्क्षण सवार हो जाओ।
प्रभु-मिलन की घड़ी किस क्षण आएगी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। कोई नियम नहीं जिनसे ज्ञात हो सके कि किस क्षण वह द्वार खुल जाएगा?
इसलिए तीसरी बात यह है कि प्रतिपल तैयारी की जरूरत है कि कभी भी वह द्वार खुल जाए तो मैं सोया हुआ न मिलूं--कीप ऑन जंपिंग--कि कहीं ऐसा न हो कि वह आए द्वार पर और मैं सोया रहूं, कि वह आए और मैं पीठ किए रहूं।
रवींद्रनाथ एक गीत गाते थे, वह उन्हें बहुत प्रीतिकर था। वे कहते थे: एक बड़ा मंदिर था एक गांव के बाहर। उस मंदिर में सौ पुजारी थे। उस मंदिर में स्वर्ण की प्रतिमाएं थीं। उस मंदिर में धन बरसता था। दूर-दूर से लोग उस मंदिर को प्रेम करने वाले आते थे। वह बड़ा तीर्थ था। एक रात बड़े पुजारी ने स्वप्न देखा कि भगवान ने कहा है कि कल मैं आ रहा हूं। कल मैं तुम्हारे मंदिर में आ रहा हूं। पुजारी ने सुबह डरते-डरते दूसरे पुजारियों को कहा कि रात मैंने एक स्वप्न देखा है। भगवान ने कहा है कि कल मैं आता हूं, तैयार रहना।
पहले तो, सपना था, पुजारी को खुद भी भरोसा नहीं था। लेकिन फिर भी कौन जाने, सपना सच हो। और भगवान आ जाए और उसकी तैयारी न हो। तो सारे मंदिर को स्वच्छ किया गया, साफ किया गया। धूप, सुगंध, दीये। सारा मंदिर सजा। दिन बीत गया, लेकिन भगवान की कोई खबर नहीं। सांझ आ गई, सूरज डूबने लगा, लेकिन उसके रथ के पहियों की कोई आवाज नहीं है। फिर पुजारी थक गए। और पुजारी कहने लगे: सपना ही था, कहां के पागलपन में पड़ गए हम, सपने भी कहीं सच होते हैं! और साधारण सपना नहीं, भगवान के आने का सपना भी कहीं सच हो सकता है!
फिर रात हो गई, द्वार बंद करके सो गए। दीये बुझ गए, सुगंधियां बुझ गईं, धूप बुझ गई। रात के कोई बारह बजे होंगे, तब एक स्वर्ण-रथ आकर मंदिर के द्वार पर रुका। अंधेरी अमावस की रात, कोई उतरा उस रथ से, सीढ़ियां चढ़ा, जाकर द्वार भड़भड़ाए, भीतर एक पुजारी की नींद खुली होगी द्वार भड़भड़ाने से, उसने कहा: मालूम होता है जिस राजा की हम प्रतीक्षा करते थे वह आ गया, मालूम होता है प्रियतम द्वार पर खड़ा है! लेकिन दूसरे पुजारियों ने कहा: नींद गड़बड़ मत करो, चुपचाप सो जाओ, हवा के झोंके हैं, कोई नहीं है। हवा के झोंके किवाड़ों को भड़भड़ाते हैं, कोई भी नहीं है, सो जाओ।
फिर वह जो अतिथि आया था, उतरा, वापस रथ में बैठ कर चलने लगा, रथ के चकों की गड़गड़ाहट हुई। फिर किसी पुजारी को सुनाई पड़ा कि कोई रथ की आवाज मालूम होती है। उसने कहा: कोई रथ आता-जाता मालूम पड़ता है! दूसरे पुजारियों ने कहा: गड़बड़ मत करो, नींद में बड़बड़ाओ मत, कोई नहीं बादलों की गड़गड़ाहट है, कहीं कोई रथ नहीं है।
फिर सुबह उनकी नींद खुली, फिर उन्होंने द्वार खोले, फिर वे सब पुजारी द्वार पर बैठ कर रोने लगे। रथ के पहियों के चिह्न सीढ़ियों तक बने थे। सीढ़ियों पर किसी के चरण-चिह्न बने थे। कोई द्वार तक चढ़ा था। कोई रथ द्वार तक आया था। किसी ने दरवाजे जरूर खटखटाए थे।
भूल हो गई। जिसे हवा का झोंका समझा था, जिसे बादलों की गड़गड़ाहट समझी थी, वह प्रभु के आगमन की खबर थी। लेकिन तब वे सोए थे। तब वे रोते रहे। गांव भर इकट्ठा हो गया और पूछने लगा: क्यों रोते हो? उन्होंने कहा: हम रोते हैं क्योंकि जिसकी जीवन भर प्रतीक्षा की, जब वह आया तो हमारे द्वार बंद थे और हम सोए थे।
कोई नहीं जानता कब उसका रथ आपके द्वार पर भी आकर ठहरे! कोई नहीं जानता कब वह आपके द्वार को खटखटाए! लेकिन अगर आप जागे हुए, सचेत, होश में नहीं हैं, तो रथ वापस लौट जाएगा। अतिथि वापस लौट जाएगा।
और अगर मुझसे पूछते हो, तो मैं कहूंगा: रोज ही उसका रथ आता है। लेकिन कभी हम कहते हैं कि बादलों की गड़गड़ाहट है; कभी हम कहते हैं, सागर का गर्जन है; कभी हम कहते हैं, हवाओं की तड़फड़ाहट है; कभी हम कुछ, कभी हम कुछ कह कर रुक जाते हैं। रोज उसका रथ आता है। रोज उसके चरण हमारे मंदिर की सीढ़ी चढ़ते हैं। रोज उसके हाथ हमारे द्वार को खटखटाते हैं। लेकिन हम कुछ कह कर समझा लेते हैं अपने को और सो जाते हैं।
कोई नहीं जानता किस पल! इसलिए प्रत्येक पल को एक जागरण का, होश का, ध्यान का पल बनाना है। प्रत्येक पल को शांति का, मौन का, साइलेंस का एक पल बनाना है, तो शायद हम जागे हुए मिलें जब उसका रथ आए।
और मैं आपसे यह भी कह देना चाहता हूं कि जिस क्षण आप जागे हुए तैयार हैं, उसका रथ उसी क्षण आ जाता है। जागरण के साथ ही वह आ जाता है। जागरण की किरण के साथ ही उसका आगमन हो जाता है।
अभी उसकी घटनाएं हमें लगती हैं हवाओं की आवाज, बादलों की गड़गड़ाहट...तब उलटा हो जाता है जब हम शांत और जागे हुए होते हैं, मौन और ध्यान में होते हैं, तब उलटा हो जाता है। तब बादलों की गड़गड़ाहट उसके रथ के पहियों की आवाज मालूम होने लगती है। तब हवाओं का शोर उसके हाथ की थपकी मालूम होने लगती है। इस तीसरी बात के लिए निरंतर, निरंतर सजग और जागरूक रहने की जरूरत है।
चौथी बात, साधना कोई ऐसी बात नहीं है कि आपने आधी घड़ी कर ली और निपट गए, मुक्त हो गए। साधना कोई ऐसी बात नहीं है कि मंदिर के कोने में बैठ कर आधी घड़ी में मुक्त हो गए, कि घर के कोने में बैठ कर मुक्त हो गए। साधना सच में तो चौबीस घंटे है।
मैंने जो कहा है, शांत बैठने को,
मौन बैठने को, बैठें, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि दिन के बाकी क्षणों में भी मन शांत रहे, मौन रहे। रास्ते पर चलते हुए मौन रहें। भोजन करते हुए मौन रहें। दुकान पर बैठे हुए मौन रहें। जितनी दूर तक, जितनी गहराई तक मन मौन, शांत, प्रेमपूर्ण, विस्मय-विमुग्ध, रस से विभोर रहे, उतनी ही साधना धीरे-धीरे चौबीस घंटे पर फैलती चली जाती है।
साधक वही है जो चौबीस घंटे साधक है। जिंदगी एक अखंड धारा है, उसमें ऐसा नहीं होता है कि आप आधी घड़ी को शांत हो गए और साढ़े तेईस घंटे अशांत रहे। साढ़े तेईस घंटे आप अपवित्र रहें और आधा घंटा पवित्र हो जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है? साढ़े तेईस घंटे आप मूढ़ रहें, आधा घंटे आप बुद्धिमान हो जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है? साढ़े तेईस घंटे आप मुर्दा रहें, आधा घंटे को जीवंत हो जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है? गंगा बहती है हिमालय से और गंगा कहे कि मैं काशी के घाट पर भर पवित्र रहूंगी, उसके पहले भी अपवित्र रहूंगी, उसके बाद भी अपवित्र रहूंगी, ऐसा कैसे हो सकता है? अगर काशी के घाट पर गंगा को पवित्र होना है तो गंगोत्री से ही पवित्र चलना होगा। और अगर काशी के घाट पर गंगा पवित्र है तो आगे भी पवित्र ही रहेगी।
जीवन एक अखंड धारा है। उसमें कहीं खंड नहीं, कहीं तोड़ नहीं। चौबीस घंटे हमारी चेतना की गंगा बही जाती है। ऐसा नहीं हो सकता कि आधा घड़ी जब आप ध्यान को बैठें तब पवित्र और मौन हो जाए और साढ़े तेईस घंटे फिर गड़बड़ हो जाए। फिर धोखा होगा। फिर स्मरण रखें कि साढ़े तेईस घंटे जो हो रहा है वही सच होगा, आधे घंटे जो हो रहा है वह झूठ होगा। तब वह आधा घंटा सेल्फ-डिसेप्शन हो जाएगा। धोखा हो जाएगा। मेरी बात सुन कर इसलिए ऐसा न सोच लेना कि पंद्रह मिनट बस बैठ गए आंख बंद करके तो काम पूरा हो गया। वह केवल काम की शुरुआत है, पूरा हो जाना नहीं है। पूरा काम तो उस दिन होता है जिस दिन आंख बंद करके बैठने की जरूरत ही न रह जाए। चौबीस घंटे--उठते, बैठते, सोते, जागते शांति की अहर्निश धारा भीतर बहने लगे।
वह बह सकती है। लेकिन तीन-चार हजार वर्षों से आदमी को ऐसा धर्म सिखाया गया जो खंड का धर्म है। कहा कि मंदिर चले जाओ, बस धार्मिक हो गए। एक पांच मिनट के लिए एक आदमी मंदिर में सिर पटक कर लौट आता है और धार्मिक हो गया। फिर वह अकड़ कर निकलता है कि मैं धार्मिक हो गया। फिर वह दूसरों को ऐसे देखता है कि ये सब पापी नरक जाएंगे। उसका स्वर्ग जाना निश्र्चित हो गया। वह पांच मिनट मंदिर हो आया, या मस्जिद हो आया, या गुरुद्वारा हो आया, या कहीं और हो आया। जीवन इतना सस्ता नहीं है। धर्म इतना सस्ता नहीं है। परमात्मा भी इतना सस्ता नहीं है।
समग्र जीवन की, आमूल-जीवन की जड़ से क्रांति करनी जरूरी है। चौबीस घंटे--जो आप पंद्रह मिनट के लिए साध रहे हैं, धीरे-धीरे उसकी सुगंध चौबीस घंटे पर फैलानी है। कोई कठिन तो नहीं। बहुत सरल है। कभी खयाल नहीं किया, इसलिए कठिन मालूम होता है।
दुकान पर बैठने में अशांत होने की कौन सी जरूरत है। अशांत होने से कोई दुकान अच्छी चलती है। अशांत होने से कोई ज्यादा व्यवसाय होता है। अशांत होने से क्या होता है। भोजन अशांत बैठ कर करने का कोई फल है, कोई हित है।
सच तो यह है जिसने शांत होकर भोजन नहीं किया, उसने भोजन के आनंद को कभी जाना नहीं। जो शांत होकर स्नान नहीं किया, उसने स्नान के आनंद को नहीं जाना। जिसने शांत होकर कपड़े नहीं पहने, उसने कभी कपड़े पहनने के आनंद को नहीं जाना। जिसने शांत होकर कभी सोया नहीं, उसे नींद की अदभुत शांति का, आनंद का कोई अनुभव नहीं है
शांत चौबीस घंटे हर कृत्य में इस बात का बोध रहे कि मैं शांत धारा बना हुआ हूं या नहीं? और सिर्फ बोध रहेगा तो आप पाएंगे कि धारा धीरे-धीरे शांत होती चली जा रही है।
लेकिन लोग सोचते हैं कि मरते वक्त आखिर में शांत हो लेंगे। आखिरी में शांत हो लेंगे। अभी क्या करना है। और बेईमानों ने इस तरह की बातें भी फैला रखी हैं कि मरते वक्त एक दफा भगवान का नाम ले लिया तो भी सब हो जाएगा। आदमी इतना चालाक हो सकता है कि भगवान को भी धोखा देना चाहे। कि एक दफा नाम ले लेंगे आखिर में मरते-मरते वक्त।
और यहां तक कथाएं गढ़ रखी हैं होशियार लोगों ने। कि एक बाप मर रहा था, उसके बेटे का नाम नारायण था। तो उसने मरते वक्त कहा, नारायण! और भगवान समझे कि मुझको बुला रहा है। मर गया और स्वर्ग चला गया! वह अपने लड़के को बुला रहा था। लड़का भी उसके धोखे में न आता, लेकिन भगवान धोखे में आ गए!
ये कथाएं हमने अपने को डिसीव करने के लिए, अपने को प्रवंचना देने के लिए गढ़ ली हैं। कि एकाध दफा आखिर में नाम ले लेंगे और निपट जाएंगे।
मैंने सुना है, एक आदमी मर रहा था, मरणशय्या पर पड़ा था। उसके कानों में मंत्र पढ़े जा रहे हैं, उसे गीता सुनाई जा रही है। पंडित-पुजारी इकट्ठे हैं। वह मर रहा है, उसे गीता के पाठ पढ़ाए जा रहे हैं, उसके कानों में मंत्र सुनाए जा रहे हैं, उसके स्वर्ग जाने का इंतजाम किया जा रहा है। सांझ हो गई, डूबने को सूरज हो गया है। घर के सब लोग इकट्ठे हैं। उसने आंख खोली और कहा: मेरा बड़ा बेटा कहां है?
उसकी पत्नी पास ही है, उसे तो बहुत आंसू आ गए खुशी के। उसने कभी अपने बेटे को नहीं पूछा आज तक, वह हमेशा पूछता था तिजोड़ी की चाबी कहां है। वह हमेशा पूछता था कि खातेबही कहां रखे हैं। वह हमेशा पूछता था कि यह, वह, धन, पैसा, यश, सब पूछता था। कभी उसने नहीं पूछा कि मेरा बेटा कहां है।
जो पैसे की दौड़ में होता है उसे प्रेम का खयाल न रह जाए तो कोई आश्र्चर्य नहीं है। आज इसने पूछा है मरते क्षण में कि मेरा बेटा कहां है? जरूर प्रेम का उदय हुआ है। शायद अंतिम घड़ी में प्रेम का जन्म हो गया है।
उसकी पत्नी ने कहा: निश्र्चिंत रहें, आपके पैर के पास ही बैठा है, मौजूद है।
उससे छोटा बेटा कहां है? उस आदमी ने और भी चिंता से पूछा।
पत्नी ने कहा: वह भी मौजूद है।
उससे छोटा कहां है? वह आदमी उठने लगा बिस्तर से...तो वह भी मौजूद है। चौथा कहां है? वह भी मौजूद है। उस आदमी की चिंता बढ़ती चली जा रही और पत्नी समझ रही कि वह अपने सब बेटों को प्रेम से याद कर रहा है। फिर वह उठ कर बैठ गया। और उसने कहा: पांचवां बेटा कहां है?
उसकी पत्नी ने कहा: आप व्यर्थ चिंता न करें, हम सब यहीं मौजूद हैं।
उसने कहा: इसका क्या मतलब फिर दुकान पर कौन बैठा हुआ है?
पत्नी भूल में थी, वह सोचती थी कि स्मरण किया जा रहा है बेटों का। बाप पता लगा रहा था कि दुकान खुली है या बंद है!
तो उसको गीता के पाठ सुनाए जा रहे थे बेचारे को, उसको मंत्र सुनाए जा रहे थे। वह जो दुकान पर बैठा हुआ था, वह आदमी वहां था ही नहीं।
लेकिन इसमें हंसने की कोई भी बात नहीं। इसमें हंसने जैसी कोई भी बात नहीं। यह बिलकुल सहज, स्वाभाविक है। जीवन भर वह जहां रहा था, मरते क्षण भी वहीं था। यह तो दो और दो गणित जैसी साफ बात है। जीवन भर जहां होंगे, चेतना अंत क्षण में भी वहीं होगी।
जीवन एक सातत्य है, एक कंटीन्युअस, एक ही धारा है, सतत एक ही धारा है। इस एक ही धारा को ध्यान में रखें, जीवन की अखंडता को, यह चौथी बात मुझे कहनी है। जीवन अखंड है।
तो अगर शांत होना है, ध्यान में जाना है, प्रेम में प्रविष्ट होना है, प्रभु के मंदिर को खोल लेना है, तो यह चौबीस घंटे का श्र्वास-श्र्वास का काम है। यह कोई काम ऐसा नहीं है कि आप पांच मिनट भागे और बैठ गए। उससे कोई संबंध नहीं है। धर्म कोई खंड नहीं है जीवन का, धर्म तो अखंड जीवन है।
तो यह चौथी बात अंत में जाते वक्त आपसे कह देनी है कि जो बात ठीक लगती हो उसे चौबीस घंटे फैलाते चलें, फैलाते चलें, उसे बढ़ाते चलें। जीवन के सब क्रम में उसको पिरोते चलें। हर चीज उसी में डूब जाए। धीरे-धीरे सब उसी में डूब जाए।
चौबीस घंटे इकट्ठे हो जाएं, तो क्रांति घटित हो सकती है। तो जिसे में जीवन-क्रांति कहता हूं, वह हो सकती है, यह चौथी बात।
और पांचवीं अंतिम बात: पांचवीं बात बहुत स्मरणीय है। पांचवीं बात के दो हिस्से हैं। पहली बात, परमात्मा की तरफ जो यात्रा है, वह बड़ी धीमी, बहुत आहिस्ता, बहुत धैर्यपूर्वक, बहुत शांत यात्रा है। क्योंकि जब परम शांति को पाना हो, तो दौड़ने की अशांति से उसे नहीं पाया जा सकता। जो प्रथम चरण में ही अशांत दौड़ चलेगा, वह कभी शांत मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। शांति की मंजिल पानी हो, तो पहले कदम से ही शांत और धैर्यपूर्ण यात्रा होनी चाहिए।
संसार पाना हो तो अधैर्यपूर्ण दौड़ चाहिए, पागलपन चाहिए, फीवर चाहिए, बुखार चाहिए। किसी को धन पाना हो, किसी को दुनिया जीतनी हो, हिटलर बनना हो, नेपोलियन बनना हो, चंगीज खान बनना हो, तो शांति से यह काम नहीं हो सकता। यह काम तो अशांत दौड़ से ही हो सकता है। टेंस और बिलकुल फीवरिस स्पीड से हो सकता है। पागल की तरह दौड़ने से हो सकता है।
ठीक इससे उलटी दुनिया: अगर प्रेम पाना हो, आनंद पाना हो, प्रभु पाना हो; तो बहुत ही शांत; जैसे कोई नदी बही जाती है, जिसमें लहर भी नहीं उठती, कहीं कोई शोरगुल भी नहीं होता, चुपचाप बही जा रही है, चुपचाप बही जा रही है...।
दो भिक्षु एक नदी पार हो रहे थे। नाव पर बैठ कर उन्होंने नाविक से कहा कि जल्दी और जल्दी उस पार पहुंचा दो। नाविक ने कहा: क्षमा करें, धार तेज है, हवाएं तेज हैं, आहिस्ता ही चल कर आपको ले चलूं, नाव छोटी है, पुरानी है, मैं बूढ़ा आदमी हूं। आहिस्ता ले चलूं तो पहुंचा भी सकता हूं। जल्दी की तो पहुंचने की उम्मीद कम है। बिलकुल न पहुंचने की उम्मीद ज्यादा है। मजबूरी थी। लेकिन वे दोनों भिक्षु बेचैन थे, जल्दी में थे। फिर बार-बार कहने लगे, जल्दी करो, जल्दी करो। लेकिन वह बूढ़ा धीरे-धीरे नदी के उस पार ले गया। उनकी जल्दी स्वाभाविक थी, उन्हें पास के गांव पहुंचना था, सूरज डूबने को हो रहा था। उस गांव का नियम था कि सूरज डूबने के बाद द्वार बंद हो जाते थे। फिर रात भर जंगल में अंधेरे में बितानी पड़ती। इसलिए बेचारे जल्दी में थे। उनकी जल्दी बिलकुल स्वाभाविक थी। जैसी हम सब लोगों की जल्दी बिलकुल स्वाभाविक है। जहां-जहां दौड़ रहे वहीं-वहीं डर है कि कहीं पहुंचने के पहले दरवाजे बंद न हो जाएं। यह भी डर है कि मैं पहुंचूं कहीं पड़ोसी पहले प्रविष्ट न हो जाए। और सब डर हैं। बहुत तरह के डर हैं। वे भी भयभीत थे।
फिर नाव से उतर कर उन्होंने अपना सामान, बोरिया-बिस्तर उठाया। बूढ़ा भिक्षु है, उसके साथ एक जवान भिक्षु है। बड़ी किताबें, ग्रंथ लिए हैं, सामान लिए हैं, वह उठाया, चलने को हुए, तब उन्होंने, बूढ़ा जो कि नाव बांध रहा था, उससे पूछा कि क्यों, हम सूरज डूबने के पहले गांव तक पहुंच जाएंगे न?
उस बूढ़े ने नाव बांधते हुए धीरे-धीरे कहा: हां, पहुंच सकते हैं अगर धीरे-धीरे गए तो। क्योंकि मैंने देख लिया आपकी जल्दी। अगर मैं न होता तो आप इस पार भी नहीं पहुंच सकते थे। फिर भी मैं आपसे कहता हूं, पहुंच सकते हैं सूरज डूबने के पहले, अगर धीरे-धीरे गए तो। अगर जल्दी की तो मैं विश्र्वास नहीं दिला सकता हूं।
उन्होंने समझा कि यह बूढ़ा पागल है। यह नाविक पागल है। इसकी बात सुनने में समय गंवाना ठीक नहीं। क्योंकि ऐसी बातें अव्यावहारिक और नासमझ लोग कहते हैं, कि धीरे-धीरे जाओगे तो पहुंच जाओगे। समझदार तो हमेशा यही कहते हैं कि जितने जल्दी जाओगे उतने ही जल्दी पहुंचने की उम्मीद है। सभी समझदारों की, प्रैक्टिकल जिनको हम कहते हैं, व्यावहारिक जिनको कहते हैं, उनका गणित यही है कि पहुंचना है तो जल्दी, जल्दी, जल्दी। लेकिन दुनिया में कुछ अव्यावहारिक लोग हैं, वे यह कहते हैं कि पहुंचना है तो धीरे, धीरे, धीरे।
वे भागे दोनों। वह बूढ़ा नाविक नाव बांधता रहा और हंसता रहा। वे दोनों भागे। सूरज नीचे उतरने लगा, जंगल अंधेरा होने लगा, गांव दूर है और वे भागे चले जा रहे हैं। उबड़खाबड़ पहाड़ी रास्ता है। फिर वह बूढ़ा भिक्षु गिर पड़ा। फिर उसके दोनों घुटने टूट गए हैं और खून बहा जा रहा है। और किताबें बिखर गई हैं और पन्ने उड़ गए। जैसा कि सभी लोगों के साथ होता है, पहुंचने के पहले गिर पड़ता आदमी, टांगें टूट जाती हैं, खून बह जाता, पन्ने बिखर जाते हैं।
फिर वह नाविक गीत गाता हुआ पतवार कंधे पर रखे हुए आ गया है पीछे से। और कहने लगा, मैंने कहा था, अगर धीरे गए तो पहुंच भी सकते हो, अगर जल्दी गए तो कोई कभी नहीं पहुंचता है। लेकिन तब बहुत देर हो गई थी। अब वह वाइ़ज एडवाइज, अब वह कीमती सलाह का कोई मतलब न था।
उस रात नाविक तो प्रविष्ट हो गया गांव में। वह बूढ़ा भिक्षु और उसका युवा साथी गांव के बाहर अंधेरी रात में ही रह गए। क्योंकि उस लंगड़े बूढ़े को अब ढोकर ले जाना पड़ा।
मैं भी आपसे यह पांचवीं सलाह में यह कहना चाहता हूं: बहुत शांति से, बहुत शांति से, बहुत शांति से प्रभु की ओर धीरे-धीरे एक-एक कदम रखना है। शांति से लेकिन सजग, शांति से लेकिन दृढ़, शांति से लेकिन सतत, यह पांचवें सूत्र का पहला हिस्सा है।
दूसरा हिस्सा और अंतिम बात, शांति से कदम जो रखता है, वह तभी रख सकता है जब उसकी प्रतीक्षा अनंत हो। जब वह अनंत तक प्रतीक्षा करने को राजी हो। जब प्रतीक्षा के लिए उसे जल्दी न हो, वह यह मांग न कर रहा हो।
छोटे-छोटे बच्चे बीज बो देते हैं, घड़ी भर बाद जाते हैं उखाड़ कर देखते हैं कि बीज अभी तक अंकुर बना कि नहीं बना। अभी भी बीज का बीज है, वे फिर गाड़ आते हैं, फिर पंद्रह मिनट बाद जाते हैं उखाड़ कर देखते हैं अभी तक अंकुर बना कि नहीं बना। फिर वह बीज अंकुर बनने की क्षमता ही खो देता है इतने बार-बार उखाड़ने से। धैर्य और प्रतीक्षा!
एक वृद्ध भिक्षु एक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ है। पुरानी कथा है। और नारद उसके पास से निकले हैं। वह अपनी माला पर हाथ फेर रहा है। और नारद ने उससे पूछा: बड़े दिन से तपश्र्चर्या कर रहे हो। उसने आंख खोली और कहा: हां, बहुत दिन से कर रहा हूं। मैंने सुना है कि तुम्हारा आवागमन भगवान के घर तक है।
वे नारद जो थे पुराने जमाने के जर्नलिस्ट, उस जमाने के पत्रकार, वे सभी जगह जाते थे। और पत्रकारों से तो सभी नेता भी डरते, भगवान भी डरता होगा। उनको कहीं कोई रोक-टोक नहीं होती। तो वह जाने देते थे भगवान उनको नारद को भीतर-बाहर सब जगह।
तो उस बूढ़े संन्यासी ने कहा कि तुम अब की बार भगवान तक जाओ, तो जरा पूछ लेना कि मेरी मुक्ति में और कितनी देर है? बहुत हो चुका, कब तक बैठा रहूं यह माला लिए? अन्याय नहीं होना चाहिए। तुम जरा खबर पहुंचा देना।
नारद ने कहा: जरूर ही। मैं उनसे पूछ लूंगा कि कितनी देर है।
और नारद आगे बढ़े हैं कि दूसरे वृक्ष के नीचे आज ही सुबह संन्यासी हुआ है एक युवा अपना तंबूरा लेकर नाच रहा है। नारद ने मजाक में ही पूछा कि मैं उन संन्यासी का पूछूंगा, तुम्हारा भी पूछ लूंगा, क्या इरादे हैं, पूछ लूं भगवान से कि मुक्ति में तुम्हारी कितनी और देर है?
लेकिन उस संन्यासी ने सुना भी नहीं, वह तो अपना तंबूरा लेकर बजाता रहा और नाचता रहा। नारद चले गए।
फिर वे वापस लौटे। उस बूढ़े संन्यासी के पास जाकर उन्होंने कहा कि मैंने पूछा था, उन्होंने कहा, अभी तीन जन्म और लग जाएंगे।
उस संन्यासी ने माला नीचे पटक दी और कहा: हद हो गई अन्याय की! मुझसे पीछे आने वाले निकल चुके हैं और अभी तीन जन्म मुझे और लग जाएंगे! जरूर वहां भी कोई रिश्र्वतखोरी शुरू हो गई मालूम होता है। तीन जन्म और! यह क्या अन्याय है?
नारद ने कहा: यह तो मुझे पता नहीं, लेकिन उन्होंने कहा, तीन जन्म और लग जाएंगे।
फिर नारद थोड़े डरे कि अब वह दूसरे संन्यासी को कहे कि न कहे। फिर भी कह देना उचित समझा। जब पूछ ही लिया था।
उसके पास पहुंचे, वह अभी भी तंबूरा लिए नाच रहा है, गीत गा रहा है। उसे रोका और कहा कि सुन भाई, अगर नाराज न हो। पूछा था मैंने, वे कहने लगे कि वह नया संन्यासी जो आज ही संन्यासी हुआ है, उसको उतने ही जन्म लग जाएंगे जितने उस वृक्ष में पत्ते हैं जिसके नीचे वह नाच रहा है।
उस युवा संन्यासी की आंखों में कृतज्ञता के आंसू आ गए। और उसने कहा: इतने से पत्तों में ही मिल जाएगा मोक्ष! इतने ही जन्मों में जितने पत्ते हैं! पृथ्वी पर कितने पत्ते हैं! इस वृक्ष में बहुत थोड़े पत्ते हैं। बड़ी कृपा है उनकी। इतने जल्दी! और वह वापस नाचने लगा। उसने कहा: फिर मिल ही गया। अगर इतने ही पत्तों के संख्या के बराबर जन्म लेने हैं, तो मिल ही गया, देर ही क्या रही फिर। वह नाचने लगा, क्योंकि पृथ्वी पर कितने पत्ते हैं। और कथा यह कहती है कि वह उसी संध्या मुक्त हो गया। क्योंकि जिसकी इतनी प्रतीक्षा है, जिसका इतना अनंत धैर्य है उसके मोक्ष में देरी कहां रही। प्रतीक्षा ही मुक्ति बन गई। वह उसी संध्या मुक्त हो गया। इस बात को कहते ही मुक्त हो गया।
तो साधक के लिए अंतिम और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात जान लेनी जरूरी है, वह है, अनंत प्रतीक्षा, अंतहीन प्रतीक्षा। कितनी ही प्रतीक्षा करने के लिए तैयारी। फिर इसी क्षण भी हो सकता है। फिर हियर एंड नाउ। अभी और यहीं हो सकता है। इसी रात। लेकिन इतनी प्रतीक्षा वाला मन हो तो।
अधैर्य और जल्दी और अभी हो जाए, अभी हो जाए, वह सब फीवर, पागलपन है, बुखार है। वह दौड़ संसार के विक्षिप्त जगत में तो ठीक, लेकिन सत्य के शांत जगत में बिलकुल भी ठीक नहीं है।
ये पांच बातें विदा होते हुए आपसे कहना चाहता हूं। इन्हें मन में किसी जगह सम्हाल कर रख लेना। हो सकता है वे वक्त-वक्त याद आती रहें और उनसे कुछ परिणाम होता रहे। इन तीन दिनों में बहुत सी बातें मैंने आपसे कहीं हैं, बहुत सी वे बातें मौन से भी कही हैं जो शब्दों से नहीं कही जा सकती थीं।
मेरी इन सब बातों को इतने प्रेम और शांति से आपने सुना है, उसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं।
क्योंकि कौन सुनने को राजी होता है सत्य की बात को? असत्य की बात को सुनने के लिए तो लोग दूर-दूर की यात्रा करते हैं। सत्य की बात सुनने को कौन राजी होता है? इसीलिए कोई राजी नहीं होता कि सत्य की बात सुननी जीवन को बदलने की शुरुआत हो जाती है। असत्य की बात सुनने पर जीवन को बदलने की कोई जरूरत नहीं होती है। सत्य की बात सुननी एक नई यात्रा की शुरुआत हो जाती है। फिर वैसा ही नहीं रहा जा सकता जैसे हम थे। फिर कुछ बदलना ही पड़ता है। कोई क्रांति लानी ही पड़ती है।
तो आपने तीन दिन तक मेरी बातें सुनीं, उनके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
अब हम रात्रि के अंतिम ध्यान के लिए दस मिनट के लिए बैठेंगे और फिर विदा हो जाएंगे।
अंतिम रात है इसलिए सब दूर हट जाएं। अपनी-अपनी जगह बना लें और लेट जाएं। बातचीत नहीं करेंगे। जरा सी बातचीत वातावरण को नष्ट करती है। बिलकुल बात न करें। चुपचाप, मौन हट जाएं।
बातचीत न करें। जरा भी बात न करें। हट जाएं।...हां, थोड़ी जगह बना लें अपने-अपने लिए।
ठीक है! मैं मान लूं कि आप जगह बना लिए हैं। बिलकुल आराम से लेट जाएं। जरा भी कोई बात नहीं करेगा।
शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर लें। मैं सुझाव देता हूं, मेरे सुझाव अनुभव करें, शरीर शिथिल हो रहा है...अनुभव करें, शरीर शिथिल हो रहा है...और शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर शिथिल हो रहा है...शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें...।
श्र्वास शांत हो रही है...श्र्वास शांत हो रही है...श्र्वास शांत हो रही है...श्र्वास शांत हो रही है...श्र्वास को भी ढीला छोड़ दें...।
मन भी मौन हो रहा है...मन मौन हो रहा है...मन मौन हो रहा है...मन मौन हो रहा है...।
शरीर शिथिल छूट गया...श्र्वास शांत छूट गई...मन मौन हो गया...अब चुपचाप पड़े हुए रात की आवाजों को सुनते रहें--हवाएं आवाज कर रही हैं, दूर सागर का गर्जन हो रहा है, वृक्ष हिलेंगे, कोई आवाज होगी, सभी आवाजें उसी परमात्मा की हैं। सुनें...उसकी आवाजों को सुनें...मौन सुनते रहें...सुनते ही सुनते मन बिलकुल शांत हो जाएगा...दस मिनट के लिए सुनते रहें...सुनें...।
रात की आवाजों को सुनते रहें...सुनें...रात के सन्नाटे को सुनें...सुनते ही सुनते मन शांत होता जाता है...मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...।
रात की भांति ही भीतर भी सन्नाटा छा जाएगा...मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...सुनते रहें...सुनते रहें...सुनते रहें...धीरे-धीरे हवाएं रह जाएंगी, रात की आवाजें रह जाएंगी, आप मिट जाएंगे।
मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...मन शांत हो रहा है...मन बिलकुल शांत हो गया...हवाएं रह गईं, रात की आवाजें रह गईं, सागर का गर्जन रह गया, आप मिट गए...मन बिलकुल शांत हो गया...इस शांति में गहरे से गहरे डूब जाएं...मन शांत हो गया...मन शांत हो गया...।
अब धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्र्वास लें...धीरे-धीरे दो-चार गहरी श्र्वास लें...फिर बहुत आहिस्ता से आंख खोलें...लेटे ही लेटे आंख खोलें...आकाश में तारे दिखाई पड़ेंगे, सरू के वृक्ष दिखाई पड़ेंगे, बाहर भी उतनी ही शांति प्रतीत होगी जितनी भीतर है। बाहर और भीतर को एक हो जाने दें। जो भीतर है वही बाहर है।
धीरे से आंख खोलें और थोड़ी देर देखते रहें...थोड़ी देर एकटक आकाश की तरफ देखते रहें...फिर धीरे-धीरे अपनी-अपनी जगह उठ कर बैठ जाएं बहुत आहिस्ता से। कोई आवाज न हो, कोई बात न हो। जिनसे उठते न बनें वे थोड़ी गहरी श्र्वास लें फिर धीरे-धीरे उठ आएं। बातचीत न हो, धीरे-धीरे उठ आएं।
रात की हमारी अंतिम बैठक समाप्त हुई।