Main Kahta Akhan Dekhi #2

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Questions in this Discourse

ओशो, आपने कहा कि यदि शरीर की बात करोगे तो मैं कहूंगा, मरणधर्मा है; और आत्मा की बात करोगे तो मैं कहूंगा, तुम कभी जन्मे ही नहीं हो। फिर जब बुद्ध कहते हैं कि ‘बस एक बबूला था, जो मिट गया है; मैं था ही नहीं तो जाऊंगा कहां?’ तो फिर चिन्मय कौन? और अजन्मा क्या?
एक तो सागर है, लहरें आती हैं और चली जाती हैं। और सागर बना रहता है। लहरें सागर से जरा भी अलग नहीं हैं, फिर भी लहरें सागर नहीं हैं। लहरें सिर्फ सागर में उठे रूप हैं, आकार हैं, बनेंगे, मिटेंगे। जो लहर बनी ही रहे, उसको लहर कहना बेकार है। लहर का मतलब यह है कि आई भी नहीं और गई। लहर शब्द का भी मतलब यही है, उठी भी नहीं कि जा चुकी। जिसमें उठती है वह सदा है; जो उठती है वह सदा नहीं है। तो सदा की छाती पर परिवर्तनशील का नृत्य है। सागर तो अजन्मा है, लहर का जन्म होता है। सागर की कोई मृत्यु नहीं है, लहर की मृत्यु होती है। लेकिन लहर भी अगर यह जान ले कि मैं सागर हूं तो जन्मने और मरने के बाहर हो गई। जब तक लहर समझती है कि मैं लहर हूं, तभी तक जन्मने और मरने के भीतर है।
जो भी है, वह अजन्मा है, उसकी कोई मृत्यु नहीं है। क्योंकि जन्म होगा कहां से? शून्य से कुछ पैदा नहीं होता। मृत्यु होगी कहां? शून्य में कुछ खोता नहीं। तो जो भी है--अस्तित्व--वह तो सदा है। समय कुछ भी अंतर नहीं कर पाता। काल से कोई रेखा नहीं पड़ती। लेकिन यह जो अस्तित्व है, यह अस्तित्व हमारी पकड़ में नहीं आता। क्योंकि हमारी इंद्रियों की पकड़ में सिर्फ रूप आता है, आकार आता है। नाम-रूप के अतिरिक्त हमारी इंद्रियां कुछ भी पकड़ नहीं पातीं।
यह बहुत मजे की बात है कि सागर के किनारे आप सैकड़ों बार खड़े हुए होंगे और अनेक बार कहा होगा कि मैं सागर देख कर लौटा हूं। लेकिन देखी आपने सिर्फ लहरें हैं, सागर आपने कभी देखा नहीं। सागर कभी दिखाई पड़ सकता नहीं। आप जो भी देखेंगे वह लहर है।
इंद्रियां, सिर्फ ऊपर जो है, उसे पकड़ पाती हैं, भीतर जो है वह छूट जाता है। ऊपर भी आकार भर को पकड़ पाती हैं, आकार के भीतर जो निराकार है, वह छूट जाता है। तो नाम-रूप का जो जगत है वह इंद्रियों के देखने की वजह से पैदा हुआ है। वह कहीं है नहीं। जो भी नाम-रूप में है वह सब जन्मा है और मरेगा। जो उसके पार है वह सदा है--न वह जन्मा है, न वह मरेगा।
तो जब बुद्ध कहते हैं कि बबूले की भांति मैं उठा, तो वे दो बातें कर रहे हैं। सच पूछा जाए तो बबूले में होता क्या है? अगर बबूले में हम प्रवेश करें तो हवा का थोड़ा सा आयतन बबूले के भीतर होता है, उसी हवा का, जो बबूले के बाहर अनंत होकर फैली है। इस विराट हवा के और बबूले के भीतर की हवा के बीच पानी की एक पतली सी दीवाल होती है, एक फिल्म की दीवाल। जरा सी पानी की पतली दीवाल। जिसको दीवाल कहना भी ठीक नहीं है, सिर्फ पानी की पतली फिल्म है। वह पानी की जरा सी पतली फिल्म हवा के एक छोटे से हिस्से को कैद कर लेती है। पानी की पतली फिल्म और हवा का छोटा सा हिस्सा कैद होकर बबूला बन जाता है।
स्वभावतः सब चीजें बड़ी होती हैं, बबूला भी बड़ा होता है; और बड़े होने में ही टूटता है और फूट जाता है। फिर हवा बाहर की हवा से मिल जाती है, फिर पानी पानी में मिल जाता है। बीच में जो निर्मित हुआ था वह इंद्रधनुषी अस्तित्व था--रेनबो एक्झिस्टेंस। कहीं कुछ अंतर नहीं पड़ा था शाश्वत प्राणों में, सब वैसे का वैसा था। लेकिन एक रूप निर्मित हुआ, वह रूप जन्मा और मरा।
हम भी अपने को बबूले की तरह देखें, तो एक रूप का बनना और मिटना है। भीतर जो है, वह सदा से है। लेकिन हमारी आइडेंटिटी, हमारा तादात्म्य होता है बबूले से। तो मैं कहता हूं कि अगर आपके शरीर को देख कर कहूं तो कहूंगा कि आप मरणधर्मा हैं, मर ही रहे हैं। जन्मे, उसी दिन से मर रहे हैं। मरने के सिवाय आपने कोई काम ही नहीं किया है। बबूले को फूटने में सात क्षण लग जाएंगे, आपको फूटने में सत्तर वर्ष लगेंगे। समय की अनंत धारा पर सात क्षण और सत्तर वर्ष में कोई भी फर्क नहीं है।
सब फर्क हमारी छोटी आंखों के फर्क हैं। अगर समय अनंत है, न उसका कोई प्रारंभ है और न कोई अंत है, तो सत्तर साल में और सात क्षण में कौन सा फर्क होगा? हां, समय अगर सीमित हो, सौ ही साल का हो, तो फिर सत्तर साल में और सात क्षण में फर्क होगा। सात क्षण बहुत छोटे होंगे, सत्तर साल बहुत बड़े होंगे। लेकिन अगर दोनों तरफ कोई सीमा नहीं है, न इस तरफ कोई प्रारंभ है, न उस तरफ कोई अंत है, तो सात क्षण में और सत्तर साल में क्या फर्क है? हमें फिर भी भ्रम हो सकता है कि सात क्षण में और सत्तर साल में फर्क है। लेकिन अगर हम समय की पूरी धारा को देखें तो क्या फर्क है? अनंत की तुलना में सात क्षण भी उतने ही हैं, सत्तर वर्ष भी उतने ही हैं। कितनी देर में फूट जाता है बबूला, यह बड़ा सवाल नहीं है। बनता है तभी से फूटना शुरू हो जाता है।
इसलिए मैंने कहा कि शरीर को देख कर कहें। शरीर से मेरा मतलब है, नाम-रूप से निर्मित जो दिखाई पड़ रहा है। और आत्मा से मेरा मतलब है, नाम-रूप के गिर जाने पर भी जो होगा, नाम-रूप नहीं थे तब भी था। आत्मा से मेरा मतलब है सागर और शरीर से मेरा मतलब है लहर। और ये दोनों ही बातें एक साथ समझनी जरूरी हैं। नहीं तो इन दोनों के बीच अगर भ्रम पैदा हो तो जगत की सारी कठिनाइयां खड़ी होती हैं।
भीतर हमारे तो वह है जो कभी मर नहीं सकता। इसलिए गहरे में हमें सदा ही ऐसा लगता है, मैं कभी न मरूंगा। लाखों लोगों को हम मरते हुए देख लें, फिर भी भीतर यह प्रतीति नहीं होती कि मैं मरूंगा। इसकी गहरे में कहीं कोई ध्वनि पैदा नहीं होती कि मैं मरूंगा। सामने ही लोग मरते रहें और फिर भी हमारे भीतर न मरने का भाव कहीं सजग होता है। किसी गहरे तल में ‘मैं नहीं मरूंगा’ यह बात हमें जाहिर ही होती है। माना कि बाहर के तथ्य झुठलाते हैं। और बाहर की घटनाएं कहती हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं न मरूंगा! तर्क कहते हैं कि जब सब मरेंगे तो तुम भी मरोगे। लेकिन सारे तर्कों को काट कर भी भीतर कोई स्वर कहे ही चला जाता है कि मैं नहीं मरूंगा।
इसलिए इस जगत में कोई आदमी कभी भरोसा नहीं करता कि वह मरेगा। इसीलिए तो हम इतनी मृत्यु के बीच जी पाते हैं, नहीं तो इतनी मृत्यु के बीच तत्काल मर जाएं। जहां सब मर रहा है, जहां प्रतिपल हर चीज मर रही है, वहां हम किस भरोसे जीते हैं? आस्था क्या है जीने की? ट्रस्ट कहां है जीने का? किसी परमात्मा में नहीं है। आस्था इस आधार पर खड़ी है भीतर कि हम कितना ही मृत्यु कहे कि मरते हैं, भीतर कोई कहे ही चला जाता है कि मर कैसे सकते हैं? कोई आदमी अपनी मृत्यु को कंसीव नहीं कर सकता। उसकी धारणा नहीं बना सकता कि मैं मरूंगा। कैसी ही धारणा बनाए, वह पाएगा कि वह तो बचा हुआ है। अगर वह अपने को मरा हुआ भी कल्पना करे और देखे, तो भी पाएगा कि मैं देख रहा हूं, मैं बाहर खड़ा हूं। मृत्यु के भीतर हम अपने को कभी नहीं रख पाते, सदा ही बाहर खड़े हो जाते हैं। मृत्यु के भीतर कल्पना में भी रखना असंभव है। सत्य में रखना तो बहुत मुश्किल है, हम कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसी जिसमें मैं मर गया। क्योंकि उस कल्पना में भी मैं बाहर खड़ा देखता रहूंगा। वह कल्पना करने वाला बाहर ही रह जाएगा, वह मर नहीं पाएगा।
यह जो भीतर का स्वर है वह उस सागर का स्वर है, जो कहता है: मौत कहां? मौत कभी जानी नहीं! लेकिन फिर भी हम मौत से डरते हैं--यह हमारे शरीर का स्वर है। और इन दोनों के बीच कनफ्यूजन है। भीतर के स्वर को हम शरीर का स्वर जिस दिन समझ लेते हैं, उसी दिन प्राण कंपने लगते हैं, उसी दिन हम घबड़ाने लगते हैं, क्योंकि शरीर तो मरेगा। इसे हम कितना ही झुठलाएं, और कितना ही विज्ञान खड़ा करें, और कितनी ही चिकित्सा के शास्त्र बनाएं, और कितनी ही दवाइयों को घेर कर बैठ जाएं, और कितने ही चिकित्सकों को चारों तरफ खड़ा कर लें, फिर भी शरीर एक क्षण को भी नहीं कहता कि मैं बचूंगा। शरीर के पास कोई स्वर नहीं है अमृतत्व का। वह जानता है कि मैं मरूंगा।
शरीर जानता है कि वह बबूला है; और हम जानते हैं कि हम बबूले नहीं हैं। जिस दिन हम समझते हैं कि हम बबूले हैं, हमारे जीवन का सारा उपद्रव शुरू हो जाता है। वह जो शाश्वत है हमारे भीतर, जैसे ही लहर के साथ तादात्म्य कर लेता है वैसे ही कठिनाई में पड़ जाता है। इस तादात्म्य का नाम अज्ञान है। इस तादात्म्य के टूट जाने का नाम ज्ञान है। कुछ फर्क नहीं होता, सब चीजें फिर भी वैसी ही होती हैं। शरीर अपनी जगह होता है, आत्मा अपनी जगह होती है। एक भ्रांति टूट गई होती है। तब हम जानते हैं कि शरीर मरेगा, इससे हम भयभीत नहीं होते। क्योंकि इसमें भयभीत होने का उपाय नहीं है, शरीर मरेगा ही। भयभीत भी होने का वहां उपाय है जहां बचने की संभावना होती है। आप ऐसी स्थिति में कभी भयभीत नहीं होते, जहां बचने की संभावना ही नहीं होती। बचने की संभावना से ही भय है।
युद्ध के मैदान पर सैनिक जाता है। तो घर से जब तक जाता है तब तक डरा रहता है। युद्ध के मैदान पर भी कंपा रहता है। लेकिन जब बचाव का सब उपाय समाप्त हो जाता है और बम उसके ऊपर ही गिरने लगते हैं तब वह निर्भय हो जाता है। तब वह आदमी, जो कि जरा सी गोली चल जाती तो घबड़ा जाता, वह बम गिरते रहते हैं, गोलियां चलती रहती हैं और बैठ कर ताश भी खेलता रहता है। एक बिलकुल साधारण आदमी, कुछ विशेष आदमी नहीं है वह। स्थिति विशेष है। स्थिति ऐसी है कि जिसमें मौत से अब डरने का कोई अर्थ नहीं है, मीनिंगलेस है। मौत इतनी प्रकट है कि अब बचने का कोई सवाल नहीं है।
फिर भी युद्ध के मैदान पर भी बचने की संभावना है, क्योंकि कोई मरता है, कोई बचता है। इसलिए थोड़ा भय सरकता है। लेकिन मृत्यु के मैदान पर तो बचने की कोई संभावना नहीं होती, कोई भी नहीं बचता। इसलिए अगर यह भ्रांति हमारी टूट जाए कि मैं शरीर हूं, तो उसी के साथ मृत्यु का भय चला जाता है। क्योंकि शरीर मरेगा, यह एक सुनिश्चितता हो जाती है। यह नियति, डेस्टिनी हो जाती है। इसका उपाय नहीं है, यह भाग्य है शरीर का, इसमें रत्ती भर हेर-फेर नहीं है।
एक तरफ यह स्पष्ट हो जाए कि शरीर मरेगा ही, मृत्यु शरीर का स्वभाव है। मरेगा, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। वह मरा हुआ ही है। और जैसे एक तरफ यह स्पष्ट हो वैसे ही दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह जो शरीर के पार है, वह कभी जन्मा ही नहीं है, इसलिए मरने का कोई सवाल नहीं। वहां से भी भय तिरोहित हो जाता है। क्योंकि जो नहीं मरेगा, उसके लिए भय का क्या कारण! और जो मरेगा ही, उसके लिए भी भय का कोई कारण नहीं है। भय इन दोनों के मेल से पैदा होता है। भय इससे पैदा होता है कि भीतर कोई कहता है कि बचूंगा और बाहर कोई कहता है कैसे बचोगे? और ये दोनों चीजें मिश्रित हो जाती हैं। ये दो स्वर अलग-अलग वीणाओं से उठ रहे हैं, यह पता नहीं चलता। ये स्वर एक-दूसरे में खो जाते हैं। हम इसे एक ही संगीत समझ लेते हैं।
अज्ञान में निरंतर भय है मृत्यु का, फिर भी ऐसे जीए जाने की चेष्टा है जैसे मौत नहीं है। अज्ञानी जीता ऐसे ही है जैसे मौत नहीं है, यद्यपि प्रतिपल डरा हुआ जीता है कि मौत है। ज्ञानी ऐसे जीता है जैसे मौत नहीं है। और प्रतिपल जान कर जीता है कि किसी भी क्षण मौत हो सकती है, और मौत नहीं है। लेकिन तल का फासला हो गया है--दो तलों पर अस्तित्व टूट गया। परिधि अलग हो गई, केंद्र अलग हो गया। लहर अलग हो गई, सागर अलग हो गया। रूप अलग हो गया, अरूप अलग हो गया। फिर ऐसा नहीं कि वह रूप से भाग जाता है। यह भी एक बहुत अदभुत बात है कि जीवन की जो भ्रांतियां हैं वे हमारे जानने से मिटने वाली भ्रांतियां नहीं हैं। जानने से सिर्फ हमारी पीड़ा मिटती है।
जैसे शंकर ने निरंतर उदाहरण लिया है कि राह पर पड़ी है रस्सी और अंधेरे में दिखाई पड़ जाती है कि सांप है। लेकिन वह उदाहरण बहुत ठीक नहीं है। क्योंकि उसके पास आ जाने पर पता चल जाता है कि रस्सी है। और एक दफा पता चल जाए तो फिर आप कितने ही दूर चले जाएं, फिर आपको सांप दिखाई नहीं पड़ सकता। लेकिन जीवन का भ्रम इस तरह का नहीं है। जीवन का भ्रम ऐसे है जैसे आप सीधी लकड़ी को पानी में डाल दें, वह तिरछी दिखाई पड़ती है। आप बाहर निकाल कर फिर देख लें कि सीधी है, फिर पानी में डाल दें, वह फिर तिरछी दिखाई पड़ती है। हाथ डाल कर पानी में टटोल लें, पाएंगे कि सीधी है, लेकिन फिर भी तिरछी दिखाई पड़ती है। आपके ज्ञान से उसके तिरछे होने का रूप नहीं मिटता। हां, लेकिन तिरछी है, इसका भ्रम मिट जाता है।
तो जीवन का जो हमारा भ्रम है वह सांप और रस्सी वाला भ्रम नहीं है, वह हमारा पानी में डाली गई सीधी लकड़ी का तिरछा दिखाई देने वाला भ्रम है। भलीभांति जानते हैं कि लकड़ी तिरछी नहीं है, फिर भी तिरछी दिखाई पड़ती है। बड़े से बड़ा वैज्ञानिक जो सब तरह से जांच-परख कर चुका है कि पानी में जाने से लकड़ी तिरछी नहीं होती है, फिर भी उसको भी लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ती है। वह तिरछी दिखाई पड़ना इंद्रियगत है, वह आपके ज्ञान से उसका कोई लेना-देना नहीं है।
हां, अब आप तिरछा मान कर व्यवहार नहीं करेंगे। अब आप तिरछा मान कर व्यवहार नहीं करेंगे, अब आप मान कर चलेंगे कि लकड़ी सीधी है, और देखते रहेंगे कि लकड़ी तिरछी है। यह दो तल पर बंट जाएंगी बातें--जानने के तल पर लकड़ी सीधी होगी, देखने के तल पर लकड़ी तिरछी होगी। इन दोनों में कोई भ्रांति नहीं रह जाएगी।
जीने के तल पर शरीर होगा, बाहर के तल पर शरीर होगा, अस्तित्व के तल पर आत्मा होगी। खो नहीं जाएगा; ऐसा नहीं कि ज्ञानी को संसार खो जाता है। ज्ञानी को संसार नहीं खो जाता। ज्ञानी को संसार ठीक वैसा ही होता है जैसा आपको होता है। शायद और भी प्रगाढ़ होकर और साफ होकर होता है, और स्पष्ट होता है। रोआं-रोआं अस्तित्व का साफ उसकी दृष्टि में होता है। खो नहीं जाता। लेकिन अब वह भ्रम में नहीं पड़ता। अब वह जानता है कि रूप उसकी इंद्रियों से पैदा हुए हैं, जैसे लकड़ी पानी के भीतर तिरछी दिखाई पड़ती है, क्योंकि किरणों का रूपांतरण हो जाता है।
पानी में किरणों की यात्रा बदल जाती है। किरणें थोड़ी झुक जाती हैं, उनके झुकाव की वजह से लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ती है। हवा में किरणें एक तरह से चलती हैं, झुकती नहीं हैं, इसलिए लकड़ी तिरछी दिखाई नहीं पड़ती। लकड़ी तिरछी नहीं होती है, लकड़ियां जिस किरण के आधार पर दिखाई पड़ती हैं, वह तिरछी हो जाती है। लेकिन वह तो दिखाई नहीं पड़ती। किरण तिरछी हो जाती है, तो किरण के तिरछे होने की वजह से लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ती है।
अस्तित्व तो जैसा है वैसा है, लेकिन इंद्रियों से गुजर कर जो ज्ञान की किरण है वह थोड़ी तिरछी हो जाती है। जानने का जो ढंग है, वह बदल जाता है, माध्यम की वजह से। जैसे कि मैंने एक नीला चश्मा लगा लिया, अब चीजें नीली दिखाई पड़ने लगीं। मैं चश्मा उतार कर नीचे देखता हूं, देखता हूं चीजें सफेद हैं। फिर चश्मा लगाता हूं, वे फिर नीली दिखाई पड़ती हैं। अब मैं जानता हूं कि चीजें सफेद हैं, लेकिन फिर भी चश्मे से नीली दिखाई पड़ती हैं। अब मैं यह भी जानता हूं कि यह चश्मे की वजह से नीली दिखाई पड़ती हैं, बात खत्म हो गई। चीजें सफेद हैं। अब मैं भ्रम में पड़ने वाला नहीं हूं। अब मैं चश्मा नीला लगाए रहूं, चीजें नीली दिखाई पड़ती रहेंगी, और मैं जानूंगा भलीभांति कि चीजें सफेद हैं।
ठीक ऐसा ही, आत्मा अमृत है, ऐसा जान कर भी शरीर का मरणधर्मा होना चलता रहता है। अस्तित्व सनातन है, ऐसा जान कर भी लहरों का खेल चलता रहता है। लेकिन अब मैं जानता हूं कि वह चश्मे से दिखाई पड़ता है। वह आंख है इंद्रिय की, जो ऐसा देखती है।
इसलिए बुद्ध या महावीर या क्राइस्ट जैसे लोगों के वक्तव्य दो तलों पर हैं। और हमारी कठिनाई यह है कि हम चूंकि दोनों तलों को अपने भीतर भी सम्मिश्रित कर लेते हैं, हम उनके वक्तव्यों को भी सम्मिश्रित कर लेते हैं--स्वभावतः। कभी बुद्ध इस तरह बोल रहे हैं कि जैसे वे शरीर हैं। जैसे बुद्ध कहते हैं कि आनंद, मुझे प्यास लगी है, तू पानी ले आ।
अब आत्मा को कोई प्यास नहीं लगती। प्यास शरीर को लगती है। बुद्ध कह रहे हैं, मुझे प्यास लगी है आनंद, तू पानी ले आ। अब आनंद सोच सकता है कि बुद्ध कहते हैं कि शरीर तो है ही नहीं--नाम-रूप है, बबूला है। फिर इनको कैसे प्यास लगी? जब जान लिया आपने कि शरीर है नहीं, तो अब कैसी प्यास! फिर बुद्ध दूसरे दिन कहते हैं कि मैं तो कभी पैदा हुआ नहीं, मैं कभी मरूंगा नहीं! तो अब सुनने वाले की कठिनाइयां शुरू होती हैं। सुनने वाले की कठिनाइयां ये हैं कि वह सोचता है कि ज्ञान में अस्तित्व बदल जाएगा।
ज्ञान में अस्तित्व नहीं बदलता, सिर्फ दृष्टि बदलती है। और जब बुद्ध कह रहे हैं कि आनंद, मुझे प्यास लगी, तब भी वे यह कह रहे हैं कि आनंद, इस शरीर को प्यास लगी है। तब भी वे यही कह रहे हैं कि यह जो नाम-रूप का बबूला है, इसे प्यास लगी है, अगर नहीं पानी डालेगा तो यह जल्दी फूट जाएगा। वे इतना ही कह रहे हैं। लेकिन सुनने वाले की कठिनाई यह है कि जिस तरह वह अपने अस्तित्व को मिला-जुला कर जी रहा है दोनों बातों को, कभी नहीं समझ पाता कि कौन स्वर कहां से है, वैसे ही वह अर्थ वहां से भी निकालना शुरू करता है।
इसलिए मैंने वैसा कहा। और अगर ये दोनों तलों पर दोनों बातें साफ हो जाएं...।
सिमोन वेल ने एक किताब लिखी है: ग्रेड्‌स ऑफ सिग्निफिकेंस। ऐसे ही महत्ता के तल हैं। और जितना महान व्यक्ति है उतनी अनेक महत्ताओं के तलों पर वह एक साथ जीता है। जीना ही पड़ता है। क्योंकि जब जिस तल का व्यक्ति उसके सामने आता है, उसी तल पर उसे बात करनी पड़ती है। या फिर बात बेमानी हो जाती है। बुद्ध अगर बुद्ध की तरह आपसे बात करें, तो बेकार होगी। आप समझेंगे पागल हैं।
और ऐसा अक्सर हुआ है कि इस तरह के लोगों को हमने पागल समझा है। पागल समझने का कारण था। क्योंकि जो बात उन्होंने की, वह बिलकुल पागलपन की मालूम पड़ी। तो या तो वे पागल हो जाएंगे अगर अपने तल पर बोलें, या आपके तल पर बोलें तो उनको ग्रेड नीचे लाना पड़ेगा। उस तल पर आना चाहिए उन्हें जहां आप समझ पाएंगे, जहां वे पागल नहीं मालूम पड़ेंगे। फिर जितने तलों के लोग उनके पास आते हैं उतने तल की बात उनको बोलनी पड़ेगी।
करीब-करीब बात ऐसी है कि बुद्ध जैसे व्यक्ति को, जितने लोगों से उन्होंने बात कही, ऐसा समझ लेना चाहिए कि उतने दर्पण बुद्ध के सामने आए। और सब दर्पणों ने अपनी-अपनी तस्वीर बना ली। कोई दर्पण तिरछा था तो तिरछी तस्वीर बनी। नहीं तो दर्पण नाराज होता। दर्पणों से मेल खानी चाहिए तस्वीर। कोई दर्पण लंबा करके दिखाता था तो लंबी तस्वीर बनी, कोई छोटा करके दिखाता था तो छोटी तस्वीर बनी। अन्यथा दर्पण नाराज होते हैं। और या फिर दर्पणों को तोड़ना पड़ता और ठीक करना पड़ता।
तो इसलिए बहुत तलों पर वक्तव्य हैं। और कई बार तो एक ही वक्तव्य में बहुत तल होते हैं। क्योंकि ऐसा व्यक्ति बोलना शुरू करता है तब वह अक्सर वहीं से शुरू करता है जहां वह होता है। और जब वह बोलना अंत करता है तब वह अक्सर वहीं होता है जहां आप होते हैं। कई दफे तो एक ही वाक्य में भी लंबी यात्रा हो जाती है। क्योंकि जब वह बोलना शुरू करता है तो वह वहीं से शुरू करता है जहां वह होता है। आपसे बड़ी अपेक्षाएं रख कर शुरू करता है। फिर धीरे-धीरे अपेक्षा उसे नीचे उतारनी पड़ती है। आखिरी वक्तव्य तक वह वहां होता है जहां आप होते हैं।
और ये दो गहरे खाई विभाजन हैं। इनसे जो आखिरी खतरा खयाल में ले लेना चाहिए वह यह कि इसका यह मतलब नहीं है कि ये दोनों बहुत अलग हैं, कि भिन्न हैं, कि पृथक हैं। जैसा मैंने कहा, सागर और लहर जैसे हैं। यह और मजे की बात है कि सागर तो बिना लहर के कभी हो सकता है, लेकिन लहर कभी बिना सागर के नहीं हो सकती। तो निराकार तो आकार के बिना हो सकता है, लेकिन आकार कभी निराकार के बिना नहीं हो सकता। लेकिन हम अपनी भाषा में देखें तो उलटा मजा है। भाषा में ‘निराकार’ शब्द में आकार है, ‘आकार’ शब्द में निराकार नहीं है। भाषा में निराकार में तो आकार को होना ही पड़ेगा, आकार में निराकार न हो तो चल जाएगा। भाषा हमने बनाई है। अस्तित्व की हालत उलटी है। वहां निराकार हो सकता है बिना आकार के। आकार कभी बिना निराकार के नहीं हो सकता।
पूरे हमारे शब्द ऐसे हैं! पूरे शब्द हमारे ऐसे हैं--अहिंसा हो कि हिंसा हो। ‘अहिंसा’ शब्द में हमारे हिंसा जरूरी है। ‘हिंसा’ शब्द में अहिंसा आवश्यक नहीं है। लेकिन यह बड़े मजे की बात है कि हिंसा बिना अहिंसा के नहीं हो सकती है। हिंसा के होने के लिए अहिंसा बिलकुल ही अनिवार्य तत्व है। नहीं तो हिंसा का अस्तित्व नहीं हो सकता। हालांकि अहिंसा बिना हिंसा के हो सकती है, उसके लिए हिंसा का होना कोई जरूरी नहीं है। भाषा हम बनाते हैं और हम अपने हिसाब से बनाते हैं। हमारे लिए संसार हो सकता है बिना परमात्मा के, परमात्मा कैसे बिना संसार के हो सकता है?
ये दो चीजें अलग नहीं हैं। इसलिए इसमें जो विराट है वह क्षुद्र के बिना हो सकता है। लहर के बिना सागर के होने में कोई भी बाधा नहीं है। लेकिन लहर कैसे होगी सागर के बिना? लहर इतनी छोटी है--और अपने होने के लिए चारों तरफ सागर से बंधी है। सब तरफ सागर उसको पकड़े हुए है, तो ही वह है। सब तरफ सागर ने उसको उठाया है, तो ही वह है। सब तरफ सागर उसको सम्हाले है, तो ही वह है। सागर छोड़ दे तो वह गई। सागर हो सकता है। उसे किसी लहर ने नहीं सम्हाला हुआ है। इसलिए लहर के होने का कोई सवाल नहीं है।
ये दो अलग नहीं हैं, लेकिन फिर भी मैं कहता हूं अलग हैं। अलग इसलिए कहता हूं कि लहर को भ्रम न हो जाए, कि वह अपने को अमृत और निराकार और शाश्वत न समझ ले। अलग है, तो भ्रम हो सकता है, भ्रम की कठिनाई पैदा हो सकती है। अगर एक ही है तो भ्रम नहीं होगा। और अगर एक का ऐसा अनुभव हो तब तो फिर वह कहेगी कि मैं हूं ही नहीं, सागर ही है।
जैसे जीसस बार-बार कहते हैं कि मैं कहां हूं, वही है पिता जो ऊपर है। मैं नहीं हूं; वही है।
हमें दिक्कत होती है। हमें बहुत कठिनाई होती है। क्योंकि या तो हम ऊपर पिता को खोजना चाहते हैं कि वह कौन है ऊपर? कहां है? और या फिर इस आदमी को हम पागल समझते हैं कि यह आदमी क्या कह रहा है! तुम्हीं तो हो, और कौन है?
पर जीसस यही कह रहे हैं कि लहर मैं नहीं हूं, सागर ही है। पर हमें लहरों के सिवाय किसी चीज का कभी कोई दर्शन नहीं हुआ। इसलिए सागर हमारे लिए सिर्फ शब्द है। जो है वस्तुतः वह हमारे लिए केवल शब्द है और जो मात्र दिखाई पड़ता है वह हमारे लिए सत्य है।
इसलिए मैंने कहा कि शरीर मरणधर्मा है, मृत्यु है। चैतन्य, चिन्मय मरणधर्मा नहीं है, वरन अमृतत्व है। और उस अमृतत्व के ऊपर ही सारी मृत्यु का खेल है।
सागर और लहर को तो हमें समझने में कठिनाई नहीं होती, क्योंकि हमने कभी सागर और लहर में इतनी दुश्मनी नहीं मानी। लेकिन मृत्यु और अमृत में हमें बड़ी मुश्किल होती है, क्योंकि हमने बड़ी दुश्मनी मान रखी है। दुश्मनी हमारी मानी हुई है। सागर और लहर जब मैं कहता हूं तो आपको कठिनाई नहीं होती। आप कहते हैं कि बड़े निकट के अस्तित्व हैं, ठीक कहते हैं। लेकिन मृत्यु और अमृत तो बड़े विपरीत हैं। पदार्थ और परमात्मा तो बड़े विपरीत हैं। जन्म और मृत्यु तो बड़े विपरीत हैं। ये तो एक नहीं हो सकते।
ये भी ही एक हैं। मृत्यु को भी जितना गहरे जाकर जानेंगे, पाएंगे, परिवर्तन से ज्यादा नहीं है। लहर भी परिवर्तन से ज्यादा नहीं है। अमृत को भी जितना खोजेंगे, पाएंगे, वह शाश्वतता, इटरनिटी है, और कुछ भी नहीं है।
इस जगत में जो-जो हमें विपरीत दिखाई पड़ता है वह अपने विपरीत पर ही निर्भर होता है। हमारे दिखाई पड़ने में विपरीत के कारण बड़ी अड़चन है। हम मृत्यु को और अमृत को बिलकुल अलग रख देते हैं। लेकिन मृत्यु जी नहीं सकती अमृत के बिना। उसको भी होने के लिए अमृत से ही थोड़ा सहारा उधार लेना पड़ता है। जितनी देर होती है उतनी देर भी अमृत के ही कंधे पर हाथ रखना पड़ता है। झूठ को भी थोड़ी देर चलना हो तो सत्य के कंधे पर थोड़ा हाथ रखना पड़ता है। झूठ को भी थोड़े कदम रखने हों तो उसको कहना पड़ता है, मैं सत्य हूं।
सत्य शायद दावा नहीं करता कि मैं सत्य हूं, लेकिन झूठ सदा दावा करता है कि मैं सत्य हूं। बिना दावे के वह चल नहीं सकता इंच भर, चला कि गिरा! उसको चिल्ला कर घोषणा करनी पड़ती है कि सम्हल जाओ, मैं आ रहा हूं, मैं सत्य हूं। वह सब प्रमाण लेकर साथ चलता है कि मैं सत्य क्यों हूं। सत्य कोई प्रमाण लेकर नहीं चलता। उसके लिए झूठ के सहारे की कोई भी जरूरत नहीं है। वह सहारा लेगा तो दिक्कत में पड़ेगा, झूठ सहारा न लेगा तो दिक्कत में पड़ जाएगा।
अमृत के लिए मृत्यु के सहारे की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन मृत्यु की घटना तो अमृत के सहारे ही घटती है। शाश्वत के लिए परिवर्तन की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन परिवर्तन की घटना शाश्वत के बिना नहीं घट सकती। इतना जरूर तय है कि वह जो परिवर्तनशील है, वह हमारी जो स्थिति है, हमारी जो स्थिति है, हम सिर्फ परिवर्तनशील को ही जानते हैं। इसलिए जब भी शाश्वत के संबंध में सोचते हैं तो हम परिवर्तनशील से ही कुछ अनुमान लगाते हैं। और कोई उपाय नहीं है।
हमारी हालत ऐसी है जैसे कि अंधेरे में खड़ा आदमी अंधेरे से ही प्रकाश का अनुमान लगाए। उसके पास और कोई उपाय नहीं है। यद्यपि अंधकार भी प्रकाश का ही धीमा रूप है, अंधकार भी प्रकाश के बहुत कम होने की स्थिति है। कोई अंधकार ऐसा नहीं है जहां प्रकाश न हो। क्षीण होगा। और क्षीण भी कहना ठीक नहीं है, सिर्फ हमारी इंद्रियों की पकड़ के लिए क्षीण है। हमारी इंद्रियां नहीं पकड़ पातीं। अन्यथा हमारे पास से इतने बड़े प्रकाश के बवंडर निकल रहे हैं जिसका कोई हिसाब नहीं, कि हम देख लें तो हम अंधे हो जाएं। लेकिन हमारी इंद्रियां उनको नहीं पकड़ पातीं। अंधेरा हो जाता है।
जब तक एक्सरे नहीं थी, हम सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी के भीतर भी किरणें आर-पार हो रही हैं। हम सोच भी नहीं सकते थे कि आदमी के भीतर की हड्डी की तस्वीर भी किसी दिन बाहर आ जाएगी। आज नहीं कल और गहरी किरण खोज ली जाएगी और हम एक बच्चे के, मां के पेट में जो पहला अणु है, उसके आर-पार किरण को डाल सकेंगे किसी दिन तो हम उसकी पूरी जिंदगी देख लेंगे कि वह क्या-क्या हो जाएगा। इसकी सारी संभावनाएं हैं।
हमारे पास से बहुत तरह का प्रकाश गुजर रहा है, हमारी आंख नहीं पकड़ती। नहीं पकड़ती यानी हमारे लिए अंधेरा है। जिसे हम अंधेरा कहते हैं, उसका कुल मतलब इतना ही है कि ऐसा प्रकाश जिसे हम नहीं पकड़ रहे हैं, इससे ज्यादा नहीं। लेकिन फिर भी अंधेरे में खड़े होकर कोई आदमी प्रकाश के बाबत जो भी अनुमान लगाएगा वे गलत होंगे। माना कि अंधेरा प्रकाश का ही एक रूप है, फिर भी अंधेरे से प्रकाश के बाबत जो भी अनुमान लगाए जाएंगे वे गलत होंगे। माना कि मृत्यु भी अमृत का एक रूप है, फिर भी मृत्यु से अमृत के बाबत जो भी अनुमान लगाए जाएंगे वे गलत होंगे। हम अमृत को जान लें तो ही कुछ होता है, अन्यथा कुछ भी नहीं होता।
मृत्यु से घिरे हुए व्यक्ति अमृत से जो मतलब लेते हैं उनका मतलब इतना ही होता है केवल कि हम नहीं मरेंगे, जो कि बिलकुल गलत है। मृत्यु से घिरा हुआ व्यक्ति अमृत से एक ही मतलब लेता है कि मैं नहीं मरूंगा। अमृत का मतलब है अमर--मृत्यु से घिरे आदमी को--कि मैं मरूंगा नहीं। जो जानता है अमृत को, उसका मतलब है कि मैं कभी था ही नहीं। जो नहीं जानता है वह कहता है, मैं कभी होऊंगा ही, सदा रहूंगा, कभी भी ‘नहीं’ नहीं होऊंगा। देखते हैं उन दोनों का फर्क बुनियादी है, गहरा है। मरने को जानने वाला आदमी कहता है कि ठीक पक्का हो गया न कि आत्मा अमर है? फिर मैं कभी नहीं मरूंगा। वह हमेशा फ्यूचर ओरिएंटेड होगा। उसका जो मतलब होगा वह भविष्य में होगा कि फिर मैं कभी नहीं मरूंगा। जो आदमी जान लेगा अमृत को वह कहेगा, मैं कभी था ही नहीं, मैं कभी हुआ ही नहीं। वह हमेशा पास्ट ओरिएंटेड होगा।
इसलिए चूंकि सारा विज्ञान हमारा मृत्यु के हाथ में घिरा हुआ है, इसलिए सारा विज्ञान भविष्य की बात करता है। और सारा धर्म चूंकि अमृत के आस-पास घिरा था, इसलिए वह अतीत की बात करता है--ओरिजिन की, एंड की नहीं। स्रोत, मूल-स्रोत क्या है? धर्म कहता है, जगत कहां से पैदा हुआ? कहां से हम आए? क्योंकि धर्म कहता है कि जब हम अगर इस बात को ठीक से जान लें कि जहां से हम आए हैं वह स्रोत क्या है, तो हम निश्ंिचत हो जाएंगे कि कहां हम जाएंगे। क्योंकि जहां से हम आए हैं उससे अन्यथा हम जा नहीं सकते। जो हमारा मूल है वही हमारी डेस्टिनी है, वही हमारी नियति है, वही हमारा अंत है। जो हमारा आदि है, वही हमारा अंत है।
इसलिए सारे धर्म की चिंतना ‘आदि’ की खोज में है: वॉट इज़ दि ओरिजिन? जगत आया कहां से है? अस्तित्व कहां से पैदा हुआ? आत्मा कहां से आई? सृष्टि कहां हुई? सारी चिंतना धर्म की पीछे की खोज है, आखिर की। और सारा विज्ञान आगे की खोज है: कि हम जा कहां रहे हैं? हम पहुंचेंगे कहां? हम हो क्या जाएंगे? कल क्या होगा? अंत क्या है? उसका कारण यह है कि विज्ञान की सारी खोज मरणधर्मा कर रहा है। धर्म की सारी खोज उनकी है जिनको मृत्यु की बात समाप्त हो गई।
अब मजे की बात यह है कि मृत्यु सदा भविष्य में है। मृत्यु का अतीत से कोई लेना-देना नहीं है। जब भी आप मृत्यु के संबंध में सोचेंगे, अतीत का कोई सवाल ही नहीं है, बात ही खत्म हो गई। मृत्यु सदा आने वाले कल में है। और जीवन जहां से आया है वह सदा कल था। जहां से जीवन आ रहा है। जहां से गंगा आ रही है वह तो गंगोत्री से आ रही है, जहां गिरेगी वह सागर है। जहां मिटेगी वह कल है। जहां बनी है वह कल था।
मृत्यु से घिरा आदमी जो भी अर्थ निकालेगा वह मृत्यु के ही अनुमान होंगे। इसलिए दूसरे तल की बात पहले तल का अनुमान नहीं है। दूसरे तल की बात दूसरे तल का अनुभव है। यह भी बहुत मजे की बात है कि जो दूसरे तल को जान लेता है वह पहले को तो जानता ही है, लेकिन जो पहले को जानता है वह जरूरी रूप से दूसरे को नहीं जानता है।
इसलिए अगर हमने बुद्ध और महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट को प्रज्ञावान कहा, बुद्धिमान कहा, तो हमारा उन्हें बुद्धिमान कहने का कारण दूसरा है। वे दो तलों को जानते हैं, हम एक तल को जानते हैं। इसलिए उनकी बात हमसे ज्यादा अर्थपूर्ण है। क्योंकि जितना हम जानते हैं उतना तो वे जानते ही हैं। इसमें तो अड़चन नहीं है। उन्होंने भी मृत्यु को जाना है, उन्होंने भी दुख जाना है, उन्होंने भी क्रोध जाना है, उन्होंने भी हिंसा जानी है। उतना तो वे जानते हैं जितना हम जानते हैं। लेकिन वे कुछ और भी जानते हैं जो हम नहीं जानते। इसलिए पूरब के मुल्कों में सदा ही विज़डम जो है, प्रज्ञा जो है, वह जिसको कहना चाहिए तल-परिवर्तन है।
पश्चिम के मुल्कों में ज्ञान जो है वह उसी तल पर एक्यूमुलेशन है, उसी तल पर। आइंस्टीन कितना ही जानता हो, हम जो जानते हैं, हममें और उसमें क्वांटिटेटिव अंतर है। कितना ही जानता हो! हम इस टेबल को ही नाप पाते हैं, उसने सारे विश्व को नाप लिया। बाकी यह जो अंतर है यह परिमाण का है, मात्रा का है। कोई गुणात्मक अंतर नहीं है। यानी कुछ ऐसा वह नहीं जानता है जो कि मुझसे भिन्न है। हां, मेरे का ही विस्तार है। मैं कम जानता हूं, वह ज्यादा जानता है। मेरे पास रुपया है, उसके पास करोड़ रुपये हैं। लेकिन जो मेरे पास है, उससे भिन्न उसके पास नहीं है। उसकी ही और-और ज्यादा राशि है।
बुद्ध या महावीर को जब हम कहते हैं ज्ञानी, तो हमारा मतलब यह नहीं है। यह भी हो सकता है कि हमारे तल पर हम ही उनसे ज्यादा जानते हों। नहीं, लेकिन हमारा ज्ञान का मतलब है कि वे दूसरे तल पर कुछ जानते हैं, जिसमें हम कुछ भी नहीं जानते। एक नई यात्रा उन्होंने शुरू की है, क्वालिटेटिव अंतर है। इसलिए ऐसा हो सकता है कि महावीर को और आइंस्टीन को सामने खड़ा करें तो आइंस्टीन जो जानता है उस मामले में महावीर बहुत ज्यादा ज्ञानी सिद्ध न हों; उतना एक्यूमुलेशन उनके पास नहीं होगा। वे कहेंगे, भई मैं तो टेबल ही नाप सकता हूं, तुम सारे संसार को नाप लेते हो। तुम दूर चांद-तारों की भी लंबाई बता देते हो, बाकी मैं नहीं बता सकता। मैं तो इस कमरे को भी नाप लूं तो बहुत है। लेकिन फिर भी मैं तुमसे कहता हूं कि तुम मुझसे ज्यादा ज्ञानी नहीं हो। क्योंकि तुम जो जानते हो, वह कंसीवेबल है। उसमें कुछ ऐसा मामला नहीं है। अगर कमरा नापा जा सकता है तो तारे भी नापे जा सकते हैं। इसमें कहीं कोई क्रांति घटित नहीं हो गई है।
आइंस्टीन के भीतर कोई म्यूटेशन नहीं हो गया है। यह कोई दूसरा आदमी नहीं है। यह आदमी वही है। हां, उसमें ही ज्यादा कुशल है, जिसमें हम अकुशल हैं। उसमें ही ज्यादा गतिमान है, जिसमें हम मंद-गति हैं। उसमें ही दूर तक गया, जिसमें हम थोड़ी दूर गए हैं। उसमें ही गहरा गया, जिसमें हम बाहर से ही लौट आए हैं। लेकिन कहीं और नहीं है इसका कोई प्रवेश।
बुद्ध और महावीर या उस तरह के लोग जिनको हमने बुद्धिमान कहा, उनसे हमारा प्रयोजन है कि वह जो तल है जानने का, मृत्यु का, उसके पार वे वहां गए जहां अमृत है। और उनकी बात का मूल्य है, उनकी बात का मूल्य है। एक आदमी जिसने कभी शराब नहीं पी है, उसकी बात का बहुत मूल्य नहीं है कि वह क्या कह रहा है। एक आदमी जिसने शराब पी है, उसकी बात का भी बहुत मूल्य नहीं है। लेकिन एक आदमी जिसने शराब पी, और शराब के पार भी गया, उसकी बात का बहुत मूल्य है। जिसने शराब पी ही नहीं, वह बचपन में है, उसने कोई प्रौढ़ता नहीं पाई। उसका वक्तव्य चाइल्डिश है। इसीलिए शराब नहीं पीने वाले कभी भी शराब पीने वालों को समझा नहीं पाते हैं। क्योंकि नहीं पीने वाले चाइल्डिश मालूम होते हैं, बचकाने। शराब पीने वाला जानता है कि हम तुमसे ज्यादा जानते हैं। तुम तो जो जानते हो वह हमने भी जाना है। हम तुमसे ज्यादा जानते हैं। अगर तुम भी पीकर देखो तभी तुम कुछ कह सकते हो। लेकिन जिसने शराब पी और छोड़ी, शराब पीने वाला उसकी बात का मूल्य करता है।
यूरोप और अमरीका में एक संगठन है शराब पीने वालों का--अल्कोहल्स अनॉनिमस। एक बहुत व्यापक आंदोलन है। इसमें सिर्फ वे ही लोग सम्मिलित हो सकते हैं जो शराब में गहरे गए हैं। सिर्फ वे ही लोग सम्मिलित हो सकते हैं। और यह शराब छुड़ाने वालों का आंदोलन है, लेकिन सिर्फ शराब पीने वाले ही सम्मिलित हो सकते हैं।
और यह हैरानी की बात है कि शराब पीने वालों की ये मंडलियां किसी भी नये शराब पीने वाले की फौरन शराब छुड़वा देती हैं। क्योंकि वह मैच्योर्ड है। शराब पीने वाला उसकी बात समझ पाता है; क्योंकि जो कह रहा है वह अनुभवी है। वह गैर-अनुभव से नहीं कह रहा है, उसने भी पीया है, वह भी इसी तरह गिरा है, वह भी इन्हीं कठिनाइयों से गुजरा है और पार हुआ है। उसकी बात का कोई मूल्य है।
पर फिर भी यह मैंने उदाहरण के लिए कहा--क्योंकि शराब पीओ, कि न पीओ, कि पीने के बाद छोड़ दो, बहुत तल का फर्क नहीं है। हां, एक तल के भीतर ही सीढ़ियों का फर्क है। लेकिन एक बार अमृत का अनुभव हो जाए तो सारा तल परिवर्तित हुआ। अगर बुद्ध और महावीर और क्राइस्ट जैसे लोगों की बात का इतना गहरा परिणाम हुआ तो उसका कारण यह था। उसका कारण यह था: हम जो जानते थे, वे जानते ही हैं; हम जो नहीं जानते, वह भी वे जानते हैं। और जो उन्होंने नया जाना है उस नये जानने से वे कह रहे हैं कि हमारे जानने में कहीं बुनियादी भूलें हैं।
ओशो, महावीर पर हुई चर्चा में आपने बताया था कि महावीर पूर्व-जन्म में ही परम उपलब्धि को प्राप्त हो चुके थे। केवल अभिव्यक्ति के लिए करुणावश उन्होंने पुनः जन्म धारण किया था। इसी प्रकार कृष्ण के बारे में आपका कहना था कि वे तो जन्म से ही सिद्ध थे। अब, जब जबलपुर में आपकी और मेरी जो वार्ता हुई थी, उससे मुझे ऐसा आभास हुआ था कि जो बात महावीर और कृष्ण के बारे में आपने बताई थी वही बात आप पर भी घटित होती है। अतएव प्रश्न उठता है, यदि ऐसी बात है तो आपको किस करुणावश जन्म लेना पड़ा? इस संबंध में अपने पूर्व-जन्मों और पूर्व-जन्मों की उपलब्धियों पर भी प्रकाश डालने की कृपा करें, ताकि वे साधक के लिए उपयोगी हो सकें। और यह भी कि पिछले जन्म और इस जन्म में समय का कितना अंतराल रहा?
इसमें बहुत सी बातें खयाल में लेनी पड़ेंगी। पहला तो, ऐसे व्यक्तियों के जन्म के संबंध में दो-तीन बातें खयाल में रखनी चाहिए। एक जन्म में ज्ञान की यात्रा पूरी हो गई हो तो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह चाहे तो एक जन्म और ले सके और चाहे तो न ले। बिलकुल स्वतंत्रता की स्थिति है। सच तो यह है कि वही एक जन्म स्वतंत्रता से लिया गया होता है। अन्यथा तो कोई जन्म स्वतंत्रता का नहीं है। चुनाव नहीं है बाकी जन्मों में। बाकी जन्म तो हमारे वासना के पाश में बहुत मजबूरियां हैं, लेने पड़े हैं। जैसे धकाए गए हैं, या खींचे गए हैं, या दोनों ही बातें एक साथ हुई हैं। धकाए गए हैं पिछले कर्मों से, खींचे गए हैं आगे की आकांक्षाओं से। तो हमारा जन्म साधारणतः बिलकुल ही परतंत्र घटना है। उसमें चुनाव का मौका नहीं है।
सचेतन रूप से हम चुनते नहीं कि हम जन्म लें। सचेतन रूप से सिर्फ एक ही मौका आता है चुनने का, वह तब आता है जब पूरी तरह व्यक्ति स्वयं को जान लिया होता है। वह घटना घट गई होती है जिसके आगे पाने को कुछ नहीं होता। ऐसा क्षण आ जाता है जब वह व्यक्ति कह सकता है कि अब मेरे लिए कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि मेरे लिए कोई वासना नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं न पाऊं तो मेरी कोई पीड़ा है। यह बहुत ही शिखर का क्षण है--पीक। इस शिखर पर ही पहली दफा स्वतंत्रता मिलती है।
अब यह बड़े मजे की बात है और जीवन के रहस्यों में से एक कि जो चाहेंगे कि स्वतंत्र हों वे स्वतंत्र नहीं हो पाते हैं और जिसकी अब कोई चाह नहीं रही वे स्वतंत्र हो जाते हैं। जो चाहते हैं कि यहां जन्म ले लें, वहां जन्म ले लें, उनके लिए कोई उपाय नहीं है। और जो अब इस स्थिति में है कि कहीं जन्म लेने का कोई सवाल न रहा, अब वह इस सुविधा में है कि वह चाहे तो कहीं ले ले। लेकिन यह भी एक ही जन्म के लिए संभव हो सकता है। इसलिए नहीं कि एक जन्म के बाद उसे स्वतंत्रता नहीं रह जाएगी, इसलिए नहीं कि एक जन्म के बाद उसे स्वतंत्रता नहीं रह जाएगी जन्म लेने की। स्वतंत्रता तो सदा होगी। लेकिन एक जन्म के बाद स्वतंत्रता का उपयोग करने का भाव भी खो जाएगा। वह अभी रहेगा।
स्वतंत्रता मिलते ही, इस जन्म में यदि आपको घटना घट गई परम अनुभव की, तो स्वतंत्रता तो मिल गई आपको। लेकिन जैसा कि सदा होता है, स्वतंत्रता मिलने के साथ ही स्वतंत्रता का उपयोग करने की जो भाव-दशा है वह एकदम नहीं खो जाएगी। उसका अभी उपयोग किया जा सकता है। जो बहुत गहरे जानते हैं वे कहेंगे, यह भी एक बंधन है। यह भी एक बंधन है।
इसलिए जैनों ने, जिन्होंने इस दिशा में सर्वाधिक गहरी खोज की--इस दिशा में जैनों की खोज की कोई भी तुलना नहीं है सारे जगत में--इसलिए उन्होंने तीर्थंकर-गोत्रबंध इसको नाम दिया। यह आखिरी बंधन है--स्वतंत्रता का बंधन है। आखिरी, कि इसका भी उपयोग कर लेने का एक मन है। वह भी मन ही है। इसलिए सिद्ध तो बहुत होते हैं, तीर्थंकर सभी नहीं होते। परम ज्ञान को कई लोग उपलब्ध होते हैं, लेकिन तीर्थंकर सभी नहीं होते। तीर्थंकर होने के लिए, यानी इस स्वतंत्रता का उपयोग करने के लिए, एक विशेष तरह के कर्मों का जाल अतीत में होना चाहिए। शिक्षक होने का, वह टीचरहुड का एक लंबा जाल होना चाहिए। अगर वह पीछे है, तो वह आखिरी धक्का देगा। और जो जाना गया है, वह कहा जाएगा। जो पाया गया है, वह बताया जाएगा। जो मिला है, वह बांटा जाएगा।
तो इस स्थिति के बाद सारे लोग ही दूसरा जन्म यानी एक जन्म और लेते हैं, ऐसा नहीं है। कभी करोड़ में एकाध! इसलिए जैनों ने तो करीब-करीब औसत तय कर रखी है कि एक सृष्टि-कल्प में सिर्फ चौबीस। वह बिलकुल औसत है। पर औसत की वजह से हमको...जैसे कि हम कह सकते हैं कि आज बंबई की सड़कों पर कितने एक्सीडेंट होंगे। पिछले तीस साल का सारा औसत निकाल लेंगे तो आज हम कह सकते हैं कि बंबई में कितने एक्सीडेंट होंगे। और वह करीब-करीब सही होने वाले हैं। बस ऐसे ही चौबीस का जो औसत है, वह औसत है। वह अनेक कल्पों के स्मरण का औसत है--अनेक कल्पों के! अनेक बार सृष्टि के बनने और मिटने का जो सारा का सारा स्मरण है, उस स्मरण में अंदाजन जो सबका हम भाग दें, तो वह चौबीस है। यानी एक पूरी सृष्टि के बनने और मिटने के बीच चौबीस व्यक्ति ऐसा बंध कर पाते हैं कि वे एक जन्म का और उपयोग करें।
इसमें दूसरी बात भी खयाल रख लेनी चाहिए कि जब हम कहते हैं कि बंबई में कितने एक्सीडेंट होंगे आज, तो हम लंदन के एक्सीडेंट की बात नहीं कर रहे हैं। या हम कहते हैं कि मरीन ड्राइव के रास्ते पर कितने एक्सीडेंट होंगे, तो फिर हम बंबई के और रास्तों की भी बात नहीं कर रहे हैं।
तो जैनों का जो हिसाब है वह उनके अपने रास्ते का है, उसमें जीसस की गणना नहीं होगी। और कृष्ण और बुद्ध की भी गणना नहीं होगी। लेकिन यह बहुत मजे की बात है कि जब हिंदुओं ने भी गणना की तो वह चौबीस अनुपात पड़ा, उनके रास्ते पर भी और जब बुद्धों ने गणना की तब भी चौबीस अनुपात पड़ा, उनके रास्ते पर भी। इसलिए चौबीस अवतारों का खयाल हिंदुओं में आ गया; चौबीस तीर्थंकरों का जैनों में था ही; और चौबीस बुद्धों का खयाल बौद्धों को आ गया।
इसका कभी बहुत गहरा हिसाब ईसाइयत ने और इस्लाम ने लगाया नहीं। लेकिन इस्लाम ने यह जरूर कहा कि मोहम्मद पहले आदमी नहीं, पहले और लोग हो गए। और जिन चार लोगों के लिए मोहम्मद ने इशारे किए कि मुझसे पहले चार लोग हुए, वे इशारे दो कारणों से अधूरे और धुंधले हैं। वे इसलिए अधूरे और धुंधले हैं कि मोहम्मद के पीछे मोहम्मद का रास्ता नहीं है। मोहम्मद का रास्ता मोहम्मद से शुरू होता है। महावीर जितनी स्पष्टता से गिना सके अपने पीछे के चौबीस आदमी, उतना दूसरा नहीं गिना सका दुनिया में। क्योंकि महावीर पर वह रास्ता करीब-करीब पूरा होता है। तो अतीत के बाबत बहुत साफ हुआ जा सकता था। मोहम्मद के आगे मामला था, उसके बाबत साफ होना बहुत कठिन था।
जीसस ने भी पीछे के लोगों की गणना करवाई। लेकिन वह भी धुंधली है, क्योंकि जीसस का भी रास्ता नया शुरू होता है। बुद्ध ने पीछे के लोगों की कोई साफ गणना नहीं करवाई, सिर्फ कभी-कभी बात की। इसलिए चौबीस बुद्धों की बात है, पीछे के नाम एक भी नहीं हैं। इस मामले में जैनों की खोज भी गहरी है और बहुत प्रामाणिक रूप से बहुत मेहनत की है उस मामले में। इसलिए एक-एक व्यक्ति का पूरा ठिकाना, हिसाब सारा रखा है।
प्रत्येक रास्ते पर अंदाजन चौबीस लोग एक जन्म और लेंगे ज्ञान के बाद। यह जन्म, मैंने कहा, करुणा से होगा। इस जगत में बिना कारण कुछ भी नहीं हो सकता। और कारण केवल दो ही हो सकते हैं--या तो कामना हो, या करुणा हो। तीसरा कोई कारण नहीं हो सकता। या तो मैं कुछ लेने आपके घर आऊं, या कुछ देने आऊं। और तीसरा कोई उपाय क्या हो सकता है? आपके घर या तो लेने कुछ आऊं तो कामना हो, या कुछ देने आऊं तो करुणा हो। तीसरा आपके घर आने का कोई अर्थ नहीं है, कोई कारण भी नहीं है, कोई प्रयोजन भी नहीं है।
कामना से जितने जन्म होंगे वे सब परतंत्र होंगे। क्योंकि आप मांगने के संबंध में स्वतंत्र कभी भी नहीं हो सकते। भिखमंगा कैसे स्वतंत्र हो सकता है? भिखमंगे के स्वतंत्र होने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि सारी स्वतंत्रता देने वाले पर निर्भर है, लेने वाले पर क्या निर्भर हो सकती है! लेकिन देने वाला स्वतंत्र हो सकता है। तुम न भी लो, तो भी दे सकता है। लेकिन तुम न दो, तो ले नहीं सकता।
महावीर और बुद्ध का सारा का सारा जो दान है, वह हमने लिया, यह जरूरी नहीं है। वह दिया उन्होंने, इतना निश्चित है। लेना अनिवार्य रूप से नहीं निकलता, लेकिन दिया। जो मिला, वह बांटने की इच्छा स्वाभाविक है। पर वह भी अंतिम इच्छा है। इसलिए उसको भी बंध ही कहा है, जो जानते हैं उन्होंने उसको भी कर्म-बंध ही कहा है। वह भी बंधन है आखिर। आना तो मुझे आपके घर तक पड़ेगा ही--चाहे मैं मांगने आऊं और चाहे देने आऊं। आपके घर से बंधा तो रहूंगा ही। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके घर से नहीं बंधा रहूं, आना तो पड़ेगा ही आपके घर तक। और बड़ी जो कठिनाई है वह यह है कि चूंकि आपके घर सदा मांगने वाले ही आते रहे हैं और आप भी सदा कहीं मांगने ही गए हैं, इसलिए जो देने आएगा उसको समझने की कठिनाई स्वाभाविक है।
और यह भी मैं आपसे कहूं, और इसलिए एक और भी बहुत जटिल चीज पैदा हुई है कि चूंकि आप देने को समझ ही नहीं सकते, इसलिए बहुत बार ऐसे आदमी को आपसे लेने का भी ढोंग करना पड़ा। क्योंकि आप कभी समझ ही नहीं सकते। आपके लिए यह बात बिलकुल ही समझ के परे है कि कोई आदमी आपके घर देने आया हो, तो वह आपके घर रोटी मांगने आ गया है।
इसलिए महावीर के सारे उपदेश जो हैं, वे किसी घर में भोजन मांगने के बाद दिए गए उपदेश हैं--वे सिर्फ धन्यवाद हैं। आपने जो भोजन दिया उसके लिए धन्यवाद। अगर महावीर भोजन मांगने आए तो आपकी समझ में आ जाता है। फिर वे पीछे धन्यवाद देने में दो शब्द कह कर चले जाते हैं। आप इसी प्रसन्नता में होते हैं कि दो रोटी हमने दी हैं, बड़ा काम किया है। करुणा में आप इसको भी न समझ पाएंगे, क्योंकि करुणा की दृष्टि को यह भी देखना पड़ता है कि आप ले भी सकेंगे? और अगर आपको देने का कोई भी उपाय न दिया जाए तो आपका अहंकार इतनी कठिनाई पाएगा कि बिलकुल न ले सकेगा।
इसलिए यह अकारण नहीं है कि महावीर और बुद्ध भिक्षा मांगते रहे। यह अकारण नहीं है। क्योंकि आप उस आदमी को बर्दाश्त ही नहीं कर सकते जो सिर्फ दिए चला जाए। आप उसके दुश्मन हो जाएंगे। आप उसके बिलकुल दुश्मन हो जाएंगे। अब यह बहुत उलटा लगेगा देखने में कि जो आदमी आपको दिए ही चला जाए, आप उसके दुश्मन हो जाएंगे। क्योंकि आपको तो देने का वह कोई मौका ही नहीं देता। आपसे वह कुछ मांगता ही नहीं है। तो कठिनाई हो जाती है।
इसलिए वे छोटी-मोटी चीजें आपसे मांग लेते हैं। कभी भोजन मांग गया आपके घर पर, कभी उसने कहा कि चीवर नहीं है, कभी उसने कहा कि ठहरने की जगह नहीं है, कभी उसने कुछ और कहा। उसने आपसे कुछ मांग लिया, आप बिलकुल निश्ंिचत हो गए। आप बराबर हो गए। हमने तो एक मकान दे दिया, कि हमने एक दुकान दे दी, कि हमने एक थैली भेंट कर दी--हमने कुछ दिया! उसने क्या दिया, उसने दो बातें कह दीं। इसलिए बुद्ध ने तो अपने संन्यासी को भिक्षु ही नाम दे दिया कि तू भिक्षु के साथ ही चल, तू भिखारी होकर ही दे सकेगा जो तुझे देना है। ढंग तू रखना मांगने का, और देने का इंतजाम करना।
करुणा की अपनी कठिनाइयां हैं। और उस तल पर जीने वाले आदमी की बड़ी मुसीबतें हैं। उसकी मुसीबतें हम समझ ही नहीं सकते। वह ऐसे लोगों के बीच जी रहा है जो न उसकी भाषा समझ सकते हैं, जो सदा ही उसे मिसअंडरस्टैंड करेंगे, जो कि उसे कभी समझ ही नहीं सकते। और यह अनिवार्यता है। इसमें उसको कोई हैरानी नहीं होती। जब आप उसे गलत समझते हैं तब कोई हैरानी नहीं होती, क्योंकि यह माना ही जाता है कि स्वाभाविक है यह, यह होगा ही। आप अपनी जगह से ही अनुमान लगाएंगे।
तो जिन लोगों के जीवन में, पिछले जन्मों में, अगर बहुत ज्यादा बांटने की क्षमता का विकास न हुआ हो, तो वे तो उनको ज्ञान हुआ और वे तत्काल तिरोहित हो जाते हैं। तत्काल तिरोहित हो जाते हैं, दूसरा जन्म उनका नहीं बनता।
इस संबंध में यह भी खयाल ले लेने जैसा है कि बुद्ध और महावीर और इन सबका सम्राटों के घर में पैदा होना एक और गहरे अर्थ से जुड़ा हुआ है। एक और गहरे अर्थ से जुड़ा हुआ है। जैनों ने तो स्पष्ट धारणा बना रखी थी कि तीर्थंकर का जो जन्म हो वह सम्राट के घर में ही हो। आैर इसीलिए मैंने पीछे बात भी की है कि महावीर का गर्भ तो हुआ था एक ब्राह्मणी के गर्भ में, लेकिन कथा है कि देवताओं ने उस गर्भ को निकाल कर क्षत्रिय के गर्भ में पहुंचाया। उसे बदला। क्योंकि तीर्थंकर को सम्राट के घर में ही पैदा होना चाहिए। कारण?
कारण सिर्फ इसलिए कि सम्राट के द्वार पर पैदा होकर अगर वह भिखारी हो जाएगा तो लोग उसे ज्यादा समझ सकेंगे, लोग ज्यादा समझ सकेंगे। और सम्राट से उनकी सदा ही लेने की आदत रही है। शायद उस आदत की वजह से, थोड़ा सा जो यह देने आया है, वह भी इससे ले सकेंगे। सम्राट की तरफ सदा ही ऊपर देखने की आदत रही है। यह सड़क पर भीख मांगने भी खड़ा हो जाएगा तो बिलकुल ही इसे नीचे नहीं देख लेंगे, वह पुरानी आदत थोड़ा सहारा देगी। इसलिए टेक्नीकल, तकनीकी खयाल था कि उसे ऐसे घर से ही पैदा करके लाना चाहिए। और चूंकि चुनाव उसके हाथ में था इसलिए इसमें कठिनाई न थी। ऐसे इसमें बहुत कठिनाई है। लेकिन चूंकि चुनाव उसके हाथ में है इसलिए बहुत कठिनाई नहीं है, चुना जा सकता है।
ये सारे महावीर या बुद्ध का सारा ज्ञान पिछले जन्म का है। वह सारा का सारा इस जन्म में बंटता है। पूछा जा सकता है कि यह ज्ञान अगर पिछले जन्म का है तो महावीर और बुद्ध इस जन्म में भी साधना करते हुए दिखाई पड़ते हैं! इससे ही सारी भ्रांति पैदा हुई है। इससे सारी भ्रांति पैदा हुई है, क्योंकि महावीर फिर साधना क्यों करते हैं? बुद्ध फिर साधना क्यों करते हैं? कृष्ण ने ऐसी कोई साधना नहीं की; महावीर और बुद्ध ने इस तरह की साधना की।
यह साधना सत्य को पाने के लिए नहीं है। सत्य को पाने के लिए नहीं है। सत्य तो पा लिया गया है। लेकिन उस सत्य को बांटना, पाने से कोई कम कठिन बात नहीं है। थोड़ी ज्यादा ही कठिन है। और अगर एक विशेष तरह के सत्य देने हैं...।
जैसे कि कृष्ण का सत्य जो है, वह विशेष तरह का नहीं है। कृष्ण का सत्य बिलकुल निर्विशेष है। इसलिए कृष्ण जैसी जिंदगी में हैं, वहीं से उसको देने की कोशिश में सफल हो सके। महावीर और बुद्ध के सत्य बहुत ही स्पेशलाइज्ड हैं। वे जिस मार्ग की बात कर रहे हैं, वह मार्ग बहुत ही विशिष्ट है। और वह मार्ग इस भांति विशिष्ट है कि अगर महावीर किसी से कहें कि तू तीस दिन उपवास कर ले और उसे पता हो कि महावीर ने कभी उपवास नहीं किया, वह सुनने के लिए राजी नहीं हो सकता। वह यह सुनने के लिए राजी ही नहीं हो सकता। यह बात ही नहीं हो सकती। महावीर को बारह साल लंबे उपवास, सिर्फ जिनको उन्हें कहना है, उनके लिए करने पड़े हैं। अन्यथा इनको उपवास की बात ही नहीं कही जा सकती। महावीर को बारह वर्ष मौन उनके लिए रहना पड़ा है जिनके लिए बारह दिन मौन रखवाना हो। नहीं तो महावीर की बात ये सुनने वाले नहीं हैं।
बुद्ध की तो और भी एक मजेदार घटना है। चूंकि बुद्ध एक बिलकुल ही नई साधना-परंपरा को शुरू कर रहे थे। महावीर कोई नई साधना-परंपरा को शुरू नहीं कर रहे थे। महावीर के पास तो पूर्ण विकसित विज्ञान था एक, जिसमें वे अंतिम थे, प्रथम नहीं। शिक्षकों की एक लंबी परंपरा थी, बड़ी शानदार परंपरा थी। और बहुत सुश्र्ृंखलित परंपरा थी, जिसमें श्र्ृंखला इतनी साफ थी कि जो कभी नहीं खोई। जिसमें परंपरा से जो मिली हुई धरोहर थी वह कभी भी खोई नहीं। महावीर तक तो वह इतनी ही सातत्यपूर्ण थी कि जिसका कोई हिसाब नहीं। इसलिए महावीर के लिए कोई नया सत्य नहीं देना था। एक सत्य देना था जो चिर-पोषित था, और चिर-परंपरा से जिसके लिए बल था। लेकिन महावीर को अपना व्यक्तित्व तो खड़ा करना ही था कि इस व्यक्तित्व से लोग सुन सकें। नहीं तो लोग सुन नहीं सकेंगे।
इसलिए मजे की बात है कि महावीर को सर्वाधिक जैन याद रखे और बाकी तेईस को सर्वाधिक भूल गए। यह भी बहुत आश्चर्यजनक है! क्योंकि महावीर आखिरी हैं; न तो पायोनियर हैं, न तो प्रथम हैं। न ही कोई नया अनुदान है महावीर का। जो जाना हुआ था, बिलकुल परखा हुआ था, उसको ही प्रकट किया है। फिर भी महावीर सर्वाधिक याद रहे और बाकी तेईस बिलकुल ही पौराणिक जैसे हो गए, माइथोलॉजिकल हो गए। और अगर महावीर न होते तो तेईस का आपको नाम भी पता नहीं होता। उसका गहरा कारण, महावीर ने बारह साल जो अपने व्यक्तित्व को निर्मित करने का प्रयास किया, वह है। बाकी इनमें से कोई व्यक्तित्व को निर्माण नहीं किया था। ये अपनी साधना से गुजर रहे थे।
महावीर का बहुत व्यवस्थित उपक्रम था। साधना में कभी व्यवस्थित उपक्रम नहीं होता। महावीर के लिए साधना का एक अभिनय था, जिसको उन्होंने बहुत सुचारु रूप से पूरा किया। इसलिए महावीर की प्रतिमा जितनी निखर कर प्रकट हुई उतनी प्रतिमा बाकी तेईस की कोई की नहीं निखरी। वे सब फीके हो गए और खो गए। महावीर ने बिलकुल कलाकार की तरह व्यक्तित्व को खड़ा किया। सुनियोजित था मामला। क्या उन्हें करना है इस व्यक्तित्व से, उसकी पूरी तैयारी थी। उस पूरी तैयारी के साथ वे प्रकट हुए।
बुद्ध पहले हैं, इस अर्थ में कि वे एक नया सूत्र साधना का लेकर आए। इसलिए बुद्ध को एक दूसरे ढंग से गुजरना पड़ा। यह बहुत मजे की बात है, और उससे भ्रांति पैदा हुई कि बुद्ध साधना कर रहे हैं। बुद्ध को भी पहले ही जन्म में अनुभव हो चुका है। इस जन्म में उन्हें अनुभव बांटना है। लेकिन बुद्ध के पास कोई सुनियोजित परंपरा नहीं है। बुद्ध की खोज निजी, वैयक्तिक खोज है। उन्होंने एक नया मार्ग तोड़ा है। उसी पहाड़ पर एक नई पगडंडी तोड़ी है, जिस पर राजपथ भी है। महावीर के पास बिलकुल राजपथ है। जिसकी चाहे उदघोषणा करनी हो, जिसे चाहे लोग भूल गए हों, लेकिन जो बिलकुल तैयार है। बुद्ध के लिए एक रास्ता तोड़ना है।
इसलिए बुद्ध ने एक दूसरी तरह की व्यवस्था की इस जन्म में। उन्होंने पहले सब तरह की साधनाओं में वे गए। और प्रत्येक साधना से गुजर कर उन्होंने कहा बेकार है। यह बहुत मजे की घटना है। सब तरह की साधना में गए और हर साधना से गुजर कर उन्होंने कहा बेकार है, इससे कोई कहीं नहीं पहुंचता। और अंत में अपनी साधना की घोषणा की कि इससे मैं पहुंचा हूं, और इससे पहुंचा जा सकता है।
यह बहुत ही जिसको कहना चाहिए मैनेज्ड थी बात, यह भी बहुत व्यवस्थित थी। जिसको भी नई साधना की घोषणा करनी हो उसे पुरानी साधनाओं को गलत कहना ही पड़ेगा। और अगर बुद्ध बिना गुजरे कहते गलत, जैसा कि कृष्णमूर्ति कहते हैं, तो इतना ही परिणाम होता जितना कृष्णमूर्ति का हो रहा है। क्योंकि जिस बात से आप गुजरे नहीं हैं, उसको आप गलत कहने के भी हकदार नहीं रह जाते।
अभी कोई यहां से गया होगा कृष्णमूर्ति के पास, उसने कुंडलिनी के लिए पूछा होगा, उन्होंने कहा, सब बेकार है। तो मैंने उसको कहा कि तुम्हें उनसे पूछना था कि आप अनुभव से कह रहे हैं या बिना अनुभव के? कुंडलिनी के प्रयोग से आप गुजरे हैं? या बिना गुजरे कह रहे हैं? अगर बिना गुजरे कह रहे हैं तो बिलकुल बेकार बात कह रहे हैं। अगर गुजर कर कह रहे हैं तब तो दो सवाल पूछने चाहिए, कि गुजरने में आप सफल हुए हैं कि असफल होकर कह रहे हैं? अगर सफल हुए हैं तो नॉनसेंस कहना गलत है। अगर असफल हुए हैं तो ऐसा मान लेना जरूरी नहीं है कि आप असफल हुए हैं इसलिए और लोग भी असफल हो जाएंगे।
तो बुद्ध को सारी साधनाओं से गुजर कर लोगों को दिखा देना पड़ा कि यह भी गलत है, यह भी गलत है, यह भी गलत है। इनसे कोई कहीं नहीं पहुंचता। फिर जिससे मैं पहुंचा हूं वह मैं तुमसे कहता हूं। जिससे मैं पहुंचा वह मैं तुमसे कहता हूं। महावीर उन्हीं साधनाओं से गुजर कर घोषणा किए कि ये सही हैं जो परंपरा से तैयार थीं। बुद्ध ने घोषणा की कि वे सब गलत हैं, और एक नई दिशा खोजी। मगर ये दोनों ही व्यक्ति पिछले जन्मों से उपलब्ध हैं।
कृष्ण भी पिछले जन्म से उपलब्ध हैं। लेकिन कृष्ण कोई विशेष मार्ग साधना का नहीं दे रहे हैं। कृष्ण जीवन को ही साधना बनाने का मार्ग दे रहे हैं। इसलिए किसी तपश्चर्या में जाने की उन्हें कोई जरूरत नहीं रही; बल्कि वह बाधा बनेगी। अगर महावीर यह कहें कि दुकान पर बैठ कर भी मोक्ष मिल सकता है, तो महावीर का खुद का व्यक्तित्व बाधा बन जाएगा। महावीर अगर यह कहें कि दुकान पर बैठ कर मोक्ष मिल सकता है, तो महावीर से खुद लोग पूछेंगे कि फिर तुमने क्यों छोड़ दिया? कृष्ण अगर जंगल में तपश्चर्या करने जाएं और फिर युद्ध के मैदान पर खड़े होकर कहें कि यहां युद्ध में भी मिल सकता है, तो फिर यह बात नहीं सुनी जा सकती। फिर तो अर्जुन भी कहता कि क्यों धोखा देते हैं मुझे? आप खुद जंगल में जाते हैं और मुझे जंगल जाने नहीं देते।
तो यह प्रत्येक शिक्षक के ऊपर निर्भर करता है कि वह क्या देने वाला है। इसके अनुकूल उसे सारी जिंदगी खड़ी करनी पड़ेगी। बहुत बार उसे ऐसी व्यवस्थाएं जिंदगी में करनी पड़ेंगी जो कि बिलकुल ही आर्टिफीशियल हैं। मगर जो उसे देना है उसे देने के लिए उनके बिना मुश्किल है, वह नहीं दिया जा सकता।
अब इसमें मेरे बाबत पूछते हैं, जो थोड़ा कठिन है। मुझे सरल पड़ता है बुद्ध या कृष्ण की या महावीर की बात पूछने में। दो-तीन बातें खयाल में लेकिन ली जा सकती हैं।
एक तो पिछला जन्म कोई सात सौ साल के फासले पर है। इसलिए बहुत कठिनाई भी है। महावीर का पिछला जन्म केवल ढाई सौ साल के फासले पर है। बुद्ध का पिछला जन्म केवल अठहत्तर साल के फासले पर है। बुद्ध के तो इस जन्म में वे लोग भी मौजूद थे जो पिछले जन्म की गवाही दे सके। महावीर के जन्म में भी इस तरह के लोग मौजूद थे जो अपने पिछले जन्मों में महावीर के जन्म का स्मरण कर सके। कृष्ण का जन्म कोई दो हजार साल बाद हुआ। इसलिए कृष्ण ने जितने नाम लिए हैं वे सब नाम अति प्राचीन हैं और उनका कोई स्मरण नहीं जुटाया जा सकता।
सात सौ साल इसलिए लंबा फासला है। जो व्यक्ति सात सौ साल बाद पैदा होता है, उसके लिए लंबा फासला नहीं है। क्योंकि जब हम शरीर के बाहर हैं तब एक क्षण और सात सौ साल में कोई फर्क नहीं है। सब, जो टाइम-स्केल है हमारा, शरीर के साथ शुरू होता है। शरीर के बाहर तो कोई अंतर नहीं पड़ता है कि आप सात सौ साल रहे कि सात हजार साल रहे। लेकिन शरीर में आते ही अंतर पड़ता है।
और यह भी बड़े मजे की बात है कि यह जो पता लगाने का उपाय है कि एक व्यक्ति, जैसे मैं अपना कहता हूं कि मैं सात सौ साल नहीं था, तो यह सात सौ साल का मुझे कैसे पता लगेगा? यह भी मुझे सीधा पता लगाना बहुत कठिन है। यह भी मैं उन लोगों की तरफ देख कर पता लगा सकता हूं जो इस बीच में कई दफे जन्मे हैं। समझिए कि एक व्यक्ति मुझ से सात सौ साल पहले परिचित था मेरे पिछले जन्म में। बीच में मेरा तो गैप है, लेकिन वह दस दफे जन्म गया। और उसके दस जन्मों की स्मृतियों का संग्रह है। वही संग्रह से मैं हिसाब लगा सकता हूं कि मैं बीच में कितनी देर तिरोहित था। नहीं तो नहीं हिसाब लगा सकता। हिसाब लगाना कठिन हो जाता है। क्योंकि हमारा जो टाइम-स्केल है, जो नाप का हमारा पैमाना है, वह शरीर के पार जो टाइम है उसका नहीं है, शरीर के इस तरफ जो टाइम है उसका है।
करीब-करीब ऐसा है, जैसे मैं एक क्षण को झपकी लग जाए और सो जाऊं और एक सपना देखूं। और सपने में मैं देखूं कि वर्षों बीत गए--ऐसा सपना देखूं। और क्षण भर बाद आप मुझे उठा दें और कहें कि आपकी झपकी लग गई। और मैं आपसे पूछूं कि कितना समय गुजरा? और आप कहें कि अभी तो क्षण भर भी नहीं बीता होगा। और मैं कहूं कि यह कैसे हो सकता है? क्योंकि मैंने तो वर्षों लंबा सपना देखा है।
सपने में, एक क्षण में वर्षों लंबा सपना देखा जा सकता है। टाइम-स्केल अलग है। और सपने से लौट कर अगर उस आदमी को इस जगत में कोई भी उपाय न मिले जानने का कि मैं कब सोया था, तो पता लगाना मुश्किल है कि वह कितनी देर सपना देखा उसने। वह तो यहां जो घड़ी रखी है वह बताती है कि जब मैं अभी जाग रहा था तब बारह बजे थे और अभी सोया हूं और अभी उठा तो बारह बज कर एक ही मिनट हुआ है। वह आपकी तरफ देखता है। आप अभी यहीं बैठे हैं, तो ही पता लगता है, अन्यथा पता नहीं लगता। ये जो सात सौ साल का पार होना है।
और दूसरी बात आपने पूछी कि ‘क्या मैं पूरे ज्ञान को लेकर पैदा हुआ?’
तो इसमें दो बातें समझनी पड़ेंगी जो थोड़ी भिन्न हैं। कहना चाहिए करीब-करीब पूरे ज्ञान को लेकर पैदा हुआ। करीब-करीब इसलिए कहता हूं कि जान कर कुछ चीजें बचा ली गई हैं। जान कर भी बचाई जा सकती हैं।
इस संबंध में भी जैनों का हिसाब बहुत वैज्ञानिक है। जैनों ने ज्ञान के चौदह हिस्से तोड़ दिए हैं। तेरह इस जगत में, और चौदहवां अंदर चला जाएगा। तो वे तेरह गुण-स्थान कहते हैं उनको। तेरह लेयर्स हैं। इनमें कुछ ऐसे गुण-स्थान हैं जिनकी छलांग लगाई जा सकती है, जिनसे बच कर निकला जा सकता है। जिन्हें छोड़ा जा सकता है, जो ऑप्शनल हैं। जरूरी नहीं है कि उनसे गुजरा जाए। उनको पार किया जा सकता है। लेकिन उनको पार करने वाला व्यक्ति तीर्थंकर-बंध को कभी उपलब्ध नहीं हो सकता। वह जो ऑप्शनल है, शिक्षक को तो वह भी जानना चाहिए।
समझ रहे हैं न? जो वैकल्पिक है, शिक्षक को वह भी जानना चाहिए। जो अनिवार्य है, साधक के लिए तो पर्याप्त है, लेकिन शिक्षक के लिए पर्याप्त नहीं है। वैकल्पिक भी जानना चाहिए। तो इनमें तेरह में कुछ गुण-स्थान वैकल्पिक हैं। ऐसी कुछ ज्ञान की दिशाएं हैं जो कि सिद्ध के लिए आवश्यक नहीं हैं, वह सीधा मोक्ष जा सकता है। लेकिन शिक्षक के लिए जरूरी हैं।
दूसरी बात, इसमें एक सीमा के बाद, जैसे बारहवें गुण-स्थान के बाद, वह जो दो शेष अवस्थाएं रह जाती हैं, उनको लंबाया जा सकता है। उनको एक जन्म में पूरा किया जा सकता है, दो जन्म में पूरा किया जा सकता है, तीन जन्म में पूरा किया जा सकता है। और उनको लंबाने का उपयोग किया जा सकता है।
जैसा मैंने कहा कि पूरे ज्ञान हो जाने के बाद तो एक जन्म के बाद कोई उपाय नहीं है। एक जन्म से ज्यादा सहयोगी नहीं हो सकता व्यक्ति। लेकिन बारहवें गुण-स्थान के बाद अगर दो गुण-स्थानों को रोक लिया जाए तो वह बहुत जन्मों तक सहयोगी हो सकता है। और वह रोकने की संभावना है। बारहवें गुण-स्थान पर करीब-करीब बात पूरी हो जाती है, लेकिन मैं कहता हूं करीब-करीब। जैसे कि सब दीवालें गिर जाती हैं और सिर्फ एक पर्दा रह जाता है, जिसके आर-पार भी दिखाई पड़ता है। लेकिन फिर भी पर्दा होता है। जिसको हटा कर उस तरफ जाने की कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन अब उस तरफ जाकर भी जो देखने को मिलेगा, वह यहां से भी देखने को मिल रहा है। यानी इससे कोई अंतर भी नहीं पड़ता।
इसीलिए मैं कहता हूं करीब-करीब। एक कदम हटा कर उस तरफ चला जाया जाए तो एक जन्म और लिया जा सकता है। लेकिन उस पर्दे के इस पार खड़ा रहा जाए तो कितने ही जन्म लिए जा सकते हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन पार जाने के बाद एक बार से ज्यादा इस तरफ आने का कोई उपाय नहीं है।
पूछा जा सकता है कि महावीर और बुद्ध को भी यह खयाल था?
यह सबको साफ रहा है। तो इसका तो और उपयोग किया जा सकता था उनका! लेकिन बहुत सी स्थितियों में बुनियादी फर्क पड़े हैं। महावीर और बुद्ध जिन लोगों के साथ कई जन्मों से काम कर रहे थे, यह बड़े मजे की बात है कि परम ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद केवल बहुत ही एडवांस्ड साधकों पर उपयोग किया जा सकता है उसके ज्ञान का, और कोई उपयोग किया नहीं जा सकता। जिन लोगों पर बुद्ध और महावीर काम कर रहे थे जन्मों से, जो उनके साथ चल रहे थे बहुत रूपों में, उनके लिए एक जन्म काफी था। कई बार तो ऐसा हुआ कि एक जन्म भी जरूरी नहीं रहा। इस जन्म में ज्ञान हो गया अगर बीस साल की उम्र में एक आदमी को, और साठ साल उसको जिंदा रहना है, और चालीस साल में ही काम हो सका, तो बात समाप्त हो गई। कोई लौटने की जरूरत न रही।
लेकिन अब हालतें बिलकुल अजीब हैं। अब जिसको हम कह सकें कि बहुत विकसित साधक, वे न के बराबर हैं। अगर उन पर भी काम करना हो तो भविष्य के शिक्षकों को अनेक जन्मों के लिए तैयारी रखनी पड़ेगी। तभी उन पर काम किया जा सकता है, नहीं तो काम नहीं किया जा सकता।
और एक मजे की बात थी कि महावीर या बुद्ध को, जब भी वे छोड़ते थे अपना आखिरी जीवन, तब सदा उनके पास कुछ लोग थे जिनको आगे का काम सौंपा जा सके। आज वह हालत बिलकुल नहीं है।
दैट मीन्स यू हैव टेकेन टू?
न! आदमी जो है आज, आदमी का पूरा का पूरा ध्यान बाह्यमुखी है। और इसलिए आज शिक्षक के लिए ज्यादा कठिनाई है जो उस वक्त कभी भी नहीं थी। बहुत ज्यादा कठिनाई है। क्योंकि एक तो उसे ज्यादा मेहनत करनी पड़े, ज्यादा अविकसित लोगों के साथ मेहनत करनी पड़े, और हर बार मेहनत के खो जाने का डर है। और कभी भी ऐसे आदमी मिलने मुश्किल होते हैं जिनको काम सौंपा जा सके।
जैसे कि नानक के मामले में हुआ। गोविंदसिंह तक, दस गुरुओं तक काम सौंपने वाला आदमी मिलता गया। गोविंदसिंह को सिलसिला तोड़ देना पड़ा। बहुत कोशिश की। यानी गोविंदसिंह ने इतनी कोशिश की है इस जमीन पर जैसी कभी किसी को नहीं करनी पड़ी कि एक आदमी मिल जाए जो ग्यारहवां सिलसिला जारी रखने के लिए। लेकिन एक आदमी नहीं मिल सका। क्लोज कर देना पड़ा इस बात को। ग्यारहवां आदमी अब नहीं होगा। क्योंकि यह जो होना है यह इस कंटिन्युटी में ही हो सकता है, इसमें जरा सा भी ब्रेक हो तो यह नहीं हो सकता। इसमें जरा सा भी अंतराल हो जाए तो कठिनाई है। फिर यह नहीं हो सकता। वह जो दिया जाना है वह कठिन हो जाएगा।
बोधिधर्म को हिंदुस्तान से चीन जाना पड़ा, क्योंकि चीन में आदमी उपलब्ध था जिसको दिया जा सकता था। लोग समझते हैं कि हिंदुस्तान से कोई बौद्ध धर्म का प्रचार करने बौद्ध भिक्षु चीन गए, गलत है खयाल। यह हम ऊपर से जो इतिहास को देखते हैं उनकी समझ है। हुईनेन नाम का आदमी चीन में उपलब्ध था जिसको कि दिया जा सकता था। और बड़े मजे की बात है कि हुईनेन आने को राजी नहीं था। यानी जो कठिनाई है इस जगत की वह बहुत अदभुत है। हुईनेन आने को राजी नहीं था। क्योंकि उसे भी अपनी संभावनाओं का कोई पता नहीं था। बोधिधर्म को यहां से यात्रा करनी पड़ी। और एक वक्त आया कि चीन से भी हटा देना पड़ा और जापान में जाकर देना पड़ा।
यह जो सात सौ साल का फासला कई लिहाज से कठिनाई का है। दो लिहाज से कठिनाई का है। एक तो जन्म लेने की कठिनाई रोज बढ़ती जाएगी। जो भी व्यक्ति किसी स्थिति को उपलब्ध हो जाएगा, उसे जन्म खोजना कठिन होता जाएगा। बुद्ध और महावीर के वक्त कोई कठिनाई नहीं थी। रोज ऐसे गर्भ उपलब्ध थे जहां ऐसे व्यक्ति पैदा हो सकते थे। खुद महावीर के वक्त में आठ परम ज्ञानी बिहार में थे, ठीक महावीर की स्थिति के। अलग-अलग आठ मार्गों से वे काम कर रहे थे। और निकटतम स्थिति को तो हजारों लोग थे। थोड़े-बहुत लोग नहीं थे, हजारों लोग थे, जिनको काम कभी भी सौंपा जा सकता है। जो सम्हालेंगे, आगे बढ़ा देंगे।
आज तो किसी को जन्म लेना हो तो आगे और हजारों साल प्रतीक्षा करनी पड़े तब वह दूसरा जन्म ले सके। इस बीच उसने जो काम किया था वह सब खो जाए। इस बीच जिन आदमियों पर काम किया था उनके दस जन्म हो जाएं, दस जन्मों की पर्तें उनके ऊपर हो जाएं, जिनको काटना कठिन हो जाए।
तो अब तो किसी भी शिक्षक को पर्दे के पार होने में काफी समय लेना पड़ेगा। उसे रुकना पड़ेगा। और अगर कोई पर्दे के पार हो गया तो वह दूसरा जन्म लेने को, एक भी जन्म चुनने को राजी नहीं होगा, क्योंकि वह बेकार है। उसका कारण है। अब वह एक जन्म भी लेना बेकार है। क्योंकि किसके लिए लेना है? वह एक में अब काम नहीं हो सकता। यानी मुझे पता हो कि इस कमरे में आकर घंटे भर में काम हो जाएगा तो आने का मतलब है। और अगर काम हो ही नहीं सकता तो उचित नहीं है।
उचित एक कारण से और नहीं है। करुणा इस संबंध में दोहरे अर्थ रखती है। एक तो आपको जो देना है, वह भी करुणा चाहती है। लेकिन वह यह भी जानती है कि अगर सिर्फ आपसे कुछ छीन लिया जाए और दिया न जा सके तो आपको और खतरे में डाल दे। आपका खतरा कम नहीं होता, बढ़ जाता है। अगर मैं आपको कुछ दिखा सकता हूं तो दिखा दूं, और न दिखा सकूं और जो आपको दिखाई पड़ता था उसमें भी आप अंधे हो जाएं तो और कठिनाई हो जाती है।
इस सात सौ साल में दो-तीन बातें और आपको खयाल में लेनी चाहिए। एक, कभी मेरे खयाल में नहीं था कि उसकी बात उठेगी, लेकिन अभी अचानक पूना में बात उठ गई। मेरी मां आई होगी, तो उसको रामलाल पुंगलिया ने पूछा होगा कि मेरा पहले से पहला उनको कोई खयाल हो तो मुझे बताएं। तो मैं तो सोचता था कि इसकी बात कभी उठने की बात नहीं होगी। हैरानी मुझे हुई क्योंकि मुझे तो पता ही नहीं था कि कब उनकी बात हुई। अभी उन्होंने मीटिंग में वहां इसको कहा। तो मेरी मां ने उनको कहा कि मैं तीन दिन तक रोया नहीं और तीन दिन तक मैंने दूध नहीं पीया। यह मुझे पहला स्मरण है। फिर मैं कुछ बात नहीं किया, वह अभी आई बात गई हो गई। लेकिन यह ठीक है।
सात सौ वर्ष पहले, पिछला मेरा जो जन्म था, उसमें मरने के पहले इक्कीस दिन के एक अनुष्ठान की व्यवस्था थी। इक्कीस दिन पूर्ण उपवास रह कर मैं वह शरीर छोड़ दूंगा। उससे कुछ प्रयोजन थे। लेकिन वे इक्कीस दिन पूरे नहीं हो सके। तीन दिन बाकी रह गए। वे तीन दिन इस बार पूरे करने पड़े। वह कंटिन्युटी है वहां से। वहां बीच का समय नहीं अर्थ रखता कोई भी। वह जो मैं कह रहा हूं बीच के समय का कोई अर्थ नहीं होता। तीन दिन पहले हत्या ही कर दी गई पिछले जन्म में। वे इक्कीस दिन पूरे नहीं हो सके, तीन दिन पहले हत्या ही कर दी गई। वे तीन दिन छूट गए। वे तीन दिन इस जन्म में पूरे हुए। वे इक्कीस दिन अगर पूरे हो जाते उस जन्म में, तो शायद एक जन्म से दूसरा ज्यादा जन्म लेना कठिन हो जाता। अब इसमें बहुत सी बातें खयाल में लेने जैसी हैं। वे इक्कीस दिन अगर पूरे हो जाते तो एक जन्म से ज्यादा लेना कठिन हो जाता। क्योंकि उस पर्दे के पास खड़े होना और पार न होना बड़ा कठिन है। उस पर्दे से देखना और पर्दे को न उठा लेना बहुत कठिन है। यह कब उठ जाता है इसका ठीक होश रखना भी कठिन है। उस पर्दे के पास खड़े रहना और पर्दे को न उठाना करीब-करीब असंभव मामला है। वह संभव हो सका, क्योंकि तीन दिन पहले हत्या कर दी गई।
इसीलिए निरंतर इधर मैंने बहुत बार कई सिलसिलों में कहा है कि जैसे जीसस की हत्या के लिए जुदास की कोशिश जीसस से दुश्मनी नहीं है। वैसे ही जिस आदमी ने मेरी हत्या कर दी उसमें भी दुश्मनी नहीं है। हालांकि वह दुश्मन की तरह ही लिया गया। दुश्मन की तरह ही लिया जाएगा। वह हत्या कीमती हो गई। वे तीन दिन जो चूक गए, मृत्यु के क्षण में, उस जीवन की पूरी साधना के बाद वे तीन दिन जो कर सकते थे, इस जन्म में इक्कीस वर्षों में हो पाया। एक-एक दिन के लिए सात-सात वर्ष चुकाने पड़े।
तो उस जन्म से पूरा ज्ञान लेकर मैं नहीं आया, करीब-करीब! पर्दा उठ सकता था, लेकिन तब एक जन्म होता। अभी एक जन्म और ले सकता हूं। अभी एक जन्म की संभावना और है। लेकिन वह इस पर निर्भर करेगा कि मुझे लगे कि कुछ उपयोग हो सकेगा कि नहीं। पहले इस जन्म भर पूरी मेहनत करके देख लेने से पता लगेगा कि कुछ उपयोग हो सकता है तो ठीक है, अन्यथा वह बात समाप्त हो जाती है, उसका कोई प्रयोजन नहीं है।
हत्या उपयोगी हो गई। क्योंकि जैसा मैंने कहा कि समय का स्केल बदलता है, वैसा चित्त की दशाओं में भी समय का स्केल भिन्न होता है। जन्म के वक्त समय बहुत मंद गति होता है। मृत्यु के वक्त बहुत तीव्र गति होता है। अब समय की गति का हमें कभी कोई खयाल नहीं है, क्योंकि हम तो समझते हैं कि समय की कोई गति नहीं होती है। हम तो समझते हैं कि समय में सब गति होती है। अभी तक बड़े से बड़े वैज्ञानिक को भी समय में भी गति होती है, टाइम विलॉसिटी भी है, इसका कोई खयाल नहीं है। और इसलिए खयाल नहीं है कि टाइम विलॉसिटी अगर हम बना लें, समय की गति बना लें, तो बाकी गति को नापना मुश्किल हो जाएगा।
समय को हमने थिर रखा है। हम कहते हैं कि एक घंटे में मैं तीन मील चला। लेकिन अगर घंटा भी तीन मील में कुछ चला हो तब तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। तो हमने घंटे को थिर किया है। उसको हमने स्टैटिक मान लिया है। उसको हमने थिर कर लिया है कि भई यह तय है। नहीं तो सब अस्तव्यस्त हो जाएगा। तो समय को हमने स्टैटिक बनाया हुआ है। अब यह बड़े मजे की बात है, समय जो कि सबसे ज्यादा नॉन-स्टैटिक है, समय जो कि सबसे ज्यादा तरल है और गतिमान है। समय यानी परिवर्तन! उसको हमने बिलकुल फिक्स्ड खड़ा कर रखा है, खूंटे की तरह गाड़ दिया है। उसको गाड़ा इसलिए है नहीं तो हमारी सारी गतियों को नापना मुश्किल हो जाएगा।
यह जो समय की गति है, यह भी चित्त-दशा के अनुसार कम और ज्यादा होती है। बच्चे की समय की गति बहुत धीमी होती है, बूढ़े की समय की गति बहुत तीव्र होती है, बहुत कॉम्पैक्ट हो जाती है, सिकुड़ जाती है। थोड़े स्थान में समय ज्यादा गति करता है बूढ़े के लिए। बच्चे के लिए ज्यादा स्थान में समय बहुत धीमी गति करता है।
प्रत्येक पशु के लिए भी अलग-अलग होती है। आदमी का बच्चा चौदह साल में जितनी गति कर पाता है, कुत्ते का बच्चा बहुत थोड़े महीनों में ही उतनी गति कर लेता है। और पशुओं के बच्चे और भी जल्दी गति कर लेते हैं। कुछ पशुओं के बच्चे करीब-करीब पूरे पैदा होते हैं। जमीन पर उन्होंने पैर रखा कि उनमें और उनके एडल्ट में कोई फर्क नहीं होता। वे पूरे होते हैं। इसीलिए पशुओं को समय का बहुत बोध नहीं है। गति बहुत तीव्र होती है। इतनी तीव्रता से हो जाती है कि बच्चा पैदा हुआ घोड़े का और चलने लगा। उसे पता ही नहीं चलता कि पैदा होने और चलने के बीच में समय का फासला है। आदमी के बच्चे को समय का फासला पता चलता है। इसलिए आदमी समय से पीड़ित प्राणी है। समय से बहुत परेशान है, एकदम कंपित है। समय जा रहा है। समय भागा जा रहा है।
तो उस जन्म के आखिरी क्षण में तीन दिन में जितना काम हो सकता था, क्योंकि समय कॉम्पैक्ट था। कोई एक सौ छह वर्ष की उम्र थी। और वह समय बिलकुल कॉम्पैक्ट था। तो तीव्रता से हो सकती थी जो बात तीन दिन में, वह इस जन्म के बचपन से शुरू होगा, वह तो अंत था, वह इक्कीस वर्ष उसको पूरा होने में लगे। कई बार, अवसर चूका जाए, तो एक-एक दिन के लिए सात-सात साल चुकाने पड़ सकते हैं।
तो इस जन्म में पूरा लेकर नहीं आया, करीब-करीब पूरा लेकर। लेकिन अब मेरी सारी व्यवस्था मुझे और करनी पड़ेगी। जैसा मैंने कहा कि महावीर को एक व्यवस्था करनी पड़ी। एक तपश्चर्या, जिसके माध्यम से वह दे सकें। बुद्ध को दूसरी व्यवस्था करनी पड़ी--एक-एक तपश्चर्या को गलत करके, एक तपश्चर्या। मुझे बिलकुल व्यर्थ ही, जो महावीर-बुद्ध को कभी नहीं करना पड़ा, वह करना पड़ा। मुझे व्यर्थ ही सारे जगत में जो भी है, वह पढ़ना पड़ा--बिलकुल व्यर्थ, उसका कोई प्रयोजन नहीं है मुझे। क्योंकि आज के जगत को अगर कोई भी मैसेज दी जा सकती है, तो न तो उपवास करने वाले की आज के जगत को कोई फिकर है, न आंखें बंद करके बैठे आदमी की कोई फिकर है, आज के जगत को अगर कोई भी मैसेज जा सकती है, अगर कोई भी तपश्चर्या जा सकती है, तो वह आज के जगत के पास जो एक बौद्धिक ज्ञान का विराट अंबार लग गया है, उस सबको आत्मसात करके ही जा सकती है। दूसरा कोई उपाय नहीं है।
इसलिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी किताब के साथ लगाई। और मैं आपसे कहता हूं कि महावीर को उतनी तकलीफ भूखे रहने में नहीं हुई; उतनी तकलीफ नहीं हुई। क्योंकि जिससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है, उस पर मुझे व्यर्थ ही श्रम करना पड़ा। लेकिन उस श्रम के बाद ही आज के युग के लिए बात सार्थक हो सकती है, अन्यथा नहीं हो सकती। और कोई उपाय नहीं है। आज का युग उस बात को ही समझ सकेगा, अन्यथा नहीं समझ पाएगा।
और यह अगर खयाल में आ जाए तो कठिन नहीं है बहुत कि आपको अपने पिछले जीवन का भी थोड़ा-थोड़ा खयाल आने लगे। और मैं चाहूंगा कि जल्दी वह खयाल आपको लाऊं। क्योंकि वह खयाल आने लगे तो एक बड़ी समय की और शक्ति की बचत हो जाती है। क्योंकि अक्सर यह होता है कि आप हर बार वहां से शुरू करते हैं जहां से आपने छोड़ा नहीं था। यानी करीब-करीब आप हर बार अ ब स से शुरू करते हैं। अगर आपको पिछला स्मरण आ जाए तो आपको अ ब स से शुरू नहीं करना होता, जहां आपने छोड़ा था उसके आगे आप शुरू करते हैं। और तब कोई गति हो पाती है, नहीं तो गति नहीं हो पाती।
अब यह समझने जैसा है। पशुओं की कोई गति नहीं हो पाई है। वैज्ञानिक बहुत परेशान हैं कि पशु वहीं के वहीं रिपीट करते रहते हैं। बंदर के पास करीब-करीब आदमी से थोड़ा ही कम विकसित मस्तिष्क है। मगर विकास का अंतर बहुत भारी है, जितना मस्तिष्क में अंतर नहीं है। बात क्या है? क्या कठिनाई है? यह वर्तुल में बंदर आगे क्यों नहीं बढ़ते? वे ठीक वहीं हैं जहां दस लाख साल पहले थे। और अभी तक हम सोचते थे कि विकास हो रहा है सबमें, लेकिन यह अब संदिग्ध है बात। डार्विन की यह बात बहुत संदिग्ध है। क्योंकि लाखों साल से बंदर वहीं के वहीं है। वह विकसित नहीं हो रहा है। गिलहरी गिलहरी है, वह विकसित नहीं हो रही है। गाय गाय है, वह विकसित नहीं हो रही है। तो विकास, सिर्फ होने से नहीं हो रहा है, कहीं कोई और बात में फर्क पड़ रहा है।
हर बंदर को अपना प्रारंभ वहीं से करना पड़ता है जहां उसके बाप को करना पड़ा था। वह बाप ने जहां अंत किया वहां से बंदर प्रारंभ नहीं कर पाता। बाप कम्युनिकेट नहीं कर पाता। जो सारी कठिनाई है, बाप ने जहां तक पाया अपनी जिंदगी में, वह अपने बेटे को वहां से शुरू नहीं करवा पाता। बेटा फिर वहीं शुरू करता है जहां बाप ने शुरू किया था। फिर विकास होगा कैसे? हर बार हर बेटा फिर वहीं से शुरू करता है। तो एक वर्तुल है जिसमें घूम कर फिर शुरू हो जाता है।
करीब-करीब ऐसी ही स्थिति जीवन के आत्मिक विकास की भी है। आप अगर इस जन्म को फिर वहीं से शुरू करते हैं जहां आपने पिछला जन्म शुरू किया था, तो आप कभी विकसित नहीं हो पाएंगे, आध्यात्मिक अर्थों में आपका कभी कोई इवोल्यूशन नहीं हो पाएगा। फिर अगले जन्म में आप वहीं से शुरू करेंगे जहां यहां से शुरू किया था। हर बार अंत करेंगे, हर बार शुरू करेंगे। शुरुआत का बिंदु अगर वही रहा जो पिछला था तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा।
विकास का मतलब है, पिछला अंतिम बिंदु इस जन्म का पहला बिंदु बन जाए। नहीं तो विकास नहीं हो सकता। मनुष्य ने विकास कर लिया, क्योंकि उसने भाषा खोज ली कम्युनिकेट करने को। बाप जो कुछ जान पाता है वह अपने बेटे को दे जाता है, शिक्षा दे जाता है। एजुकेशन का मतलब ही इतना है कि बाप की पीढ़ी ने जो जाना, वह बेटे की पीढ़ी को सौंप देगी। बेटे को वहां से शुरू न करना पड़ेगा जहां से बाप की पीढ़ी को करना पड़ा; बेटा वहां से शुरू करेगा जहां बाप अंत कर रहा है। तो फिर गति हो जाएगी। तब यह स्पाइरल जो है सर्कुलर नहीं होगा, स्पाइरल हो जाएगा। यह फिर एक ही जगह नहीं घूमेगा, ऊपर उठने लगेगा। यह पहाड़ की तरह ऊपर की तरफ चढ़ने लगेगा।
जो मनुष्य के विकास में सही है, वह एक-एक व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में भी सही है। आपके और आपके पिछले जन्म के बीच कोई कम्युनिकेशन नहीं है। आपने अपने पिछले जन्म से अभी तक कोई बातचीत नहीं की। आपने कभी पूछा नहीं कि कहां छूटा था मैं? वहां से शुरू करूं! नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि फिर वही मकान बनाऊं जो मैंने पहले भी ईंटें भरी थीं, और बुनियाद रखी थी, और मर गया। और फिर ईंटें भरूं, और फिर बुनियाद रखूं, और फिर मर जाऊं। और हमेशा बुनियाद ही भरता रहूं, तो शिखर कब उठेगा?
इसलिए मैंने यह जो थोड़ी सी पिछले जन्म की बात की वह इसलिए नहीं कही कि मेरे बाबत आपको कुछ पता हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। वह सिर्फ इस कारण कह दी है कि शायद उससे आपको थोड़ा खयाल आना शुरू हो, पिछले जन्म की थोड़ी तलाश शुरू हो। क्योंकि उसी दिन आपके जीवन में आध्यात्मिक क्रांति होगी, उत्क्रांति होगी, जिस दिन आप पिछले जीवन के आगे इस जीवन में कदम उठाएंगे! अन्यथा अनेक जन्म भटक जाएंगे और कहीं भी नहीं पहुंचेंगे। वही पुनरुक्त होता रहेगा। पिछले जीवन और इस जीवन के बीच संवाद चाहिए। और पिछले जीवन में जो-जो आपने पाया था उसको शिक्षा करके अपने भीतर, और अपने को उसके आगे कदम उठाने की क्षमता चाहिए।
इसलिए महावीर और बुद्ध जिन्होंने कि सबसे पहले पिछले जन्मों की विराट चर्चा की है, इसके पहले शिक्षकों ने नहीं की थी। उपनिषद-वेद के शिक्षकों ने ज्ञान की बात कही थी, परम ज्ञान की बात कही, लेकिन कभी भी पिछले जन्मों के विज्ञान से उसको जोड़ने की बहुत चेष्टा नहीं की। महावीर तक आते-आते यह बात साफ हो गई। यह बहुत साफ हो गई कि सिर्फ इतना कहना काफी नहीं है कि तुम क्या हो सकते हो, यह भी बताना जरूरी है कि तुम क्या थे। क्योंकि तुम जो थे, उसके आधार के बिना तुम वह नहीं हो सकोगे जो हो सकते हो। इसलिए महावीर और बुद्ध का तो पूरा चालीस साल का समय लोगों को उनके पिछले जन्म स्मरण कराने में बीता। और जब तक एक आदमी पिछला जन्म स्मरण न कर ले तब तक वे कहते थे, आगे की फिकर मत कर। तू पहले पीछे की पूरी फिकर कर ले। साफ-साफ उस नक्शे को देख ले, तू कहां तक चल चुका है। फिर आगे हम कदम रखें। अन्यथा दौड़ होगी, व्यर्थ होगी। कहीं तू फिर उसी रास्ते पर दौड़ता रहा जिस पर तू पहले भी दौड़ चुका है, तो सार क्या होगा? इसलिए पुनर्स्मरण अत्यंत अनिवार्य कदम था।
अब आज की कठिनाई यह है, पुनर्स्मरण कराया जा सकता है, पिछले जन्मों का स्मरण कठिन जरा भी नहीं है, लेकिन साहस नाम की चीज ही खो गई है। और पिछले जन्म का स्मरण तभी कराया जा सकता है जब इस जन्म की कैसी ही कठिन स्मृतियों में भी आप शांत रह सकते हों, अन्यथा नहीं करवाया जा सकता। क्योंकि यह तो कुछ कठिन नहीं है। पिछले जन्म की स्मृतियां टूटेंगी तो बहुत कठिन होगा। और ये स्मृतियां तो इंस्टालमेंट्‌स में मिलती हैं, वे तो इकट्ठी मिलेंगी। इसमें तो आज की तकलीफ आज झेल लेते हैं, कल भूल जाते हैं। कल की तकलीफ कल झेल लेते हैं, परसों भूल जाते हैं। पिछले जन्म की स्मृति तो पूरी की पूरी इकट्ठी टूट पड़ेगी--इकट्ठी। फ्रैग्मेंट्‌स में नहीं आएगी। वह तो पूरी की पूरी आपके ऊपर आ जाएगी, एक साथ। उसको झेल पाएंगे कि नहीं झेल पाएंगे?
अब उसके झेलने की कसौटी तभी मिलती है जब इस जन्म की सारी स्थिति में आपको कोई तकलीफ नहीं मालूम पड़ती हो कि ठीक है। इससे कोई पीड़ा नहीं, कोई अड़चन नहीं। कुछ भी हो जाए, कोई अंतर नहीं पड़ता हो। इस जीवन की कोई स्मृति आपके लिए चिंता न बनती हो, फिर ही पिछले जन्म की स्मृति में उतारा जा सकता है। नहीं तो वह तो महाचिंता हो जाए। और उस महाचिंता का द्वार तभी खोला जा सकता है जब झेलने की क्षमता और पात्रता हो।