Mahaveer Vani #23
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Questions in this Discourse
एक मित्र ने पूछा है:
ओशो, यदि कामवासना जैविक, बायोलॉजिकल है, केवल जैविक है, तब तो तंत्र की पद्धति ही ठीक होगी। लेकिन यदि मात्र आदतन, हैबिचुअल है, तब महावीर की विधि से श्रेष्ठ और कुछ नहीं हो सकता। क्या है--जैविक या आदतन?
ओशो, यदि कामवासना जैविक, बायोलॉजिकल है, केवल जैविक है, तब तो तंत्र की पद्धति ही ठीक होगी। लेकिन यदि मात्र आदतन, हैबिचुअल है, तब महावीर की विधि से श्रेष्ठ और कुछ नहीं हो सकता। क्या है--जैविक या आदतन?
दोनों हैं और इसीलिए जटिलता है। ऊर्जा तो जैविक है, बायोलॉजिकल है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति बड़ी मात्रा में आदत पर निर्भर होती है।
पशु और आदमी में जो बड़े से बड़ा अंतर है, वह यही है, कि पशु की आदत भी बायोलॉजिकल है, उसकी आदत भी जैविक है। इसलिए पशुओं में सेक्सुअल परवर्शन, कोई काम विकृतियां दिखाई नही पड़तीं। आदमी के साथ सभी कुछ स्वतंत्र हो जाता है। आदमी के साथ कामवासना की जैविक-ऊर्जा भी स्वतंत्र अभिव्यक्तियां लेनी शुरू कर देती है।
जैसे, पशुओं में समलिंगी-यौन, होमोसेक्सुअलिटी नहीं पाई जाती--उन पशुओं को छोड़ कर, जो अजायबघरों में रहते हैं या आदमियों के पास रहते हैं। पशु यह सोच भी नहीं सकते अपनी निसर्ग अवस्था में कि पुरुष पुरुष के प्रति कामातुर हो सकता है, या स्त्री स्त्री के प्रति कामातुर हो सकती है। आदमी इंस्टिंक्ट से, उसकी जो निसर्ग के द्वारा दी गई आदतें हैं, उनसे ऊपर उठ जाता है। वह बदलाहट कर सकता है। उसकी जो ऊर्जा है, वह नये मार्गों पर बह सकती है। तो एक पुरुष पुरुष के प्रेम में पड़ सकता है, एक स्त्री स्त्री के प्रेम में पड़ सकती है। और यह मात्रा बढ़ती जाती है।
किन्से ने वर्षों के अध्ययन के बाद अमरीका में जो रिपोर्ट दी है वह यह है कि कम से कम साठ प्रतिशत लोग एकाध बार तो जरूर ही समलिंगी यौन का व्यवहार करते हैं। और करीब-करीब पच्चीस प्रतिशत लोग जीवन भर समलिंगी यौन में उत्सुक होते हैं। यह बहुत बड़ी घटना है।
स्त्री का पुरुष के प्रति आकर्षण, पुरुष का स्त्री के प्रति आर्कषण स्वाभाविक है; लेकिन पुरुष का पुरुष के प्रति, स्त्री का स्त्री के प्रति अस्वाभाविक है। पर अस्वाभाविक, पशुओं को सोचें तो, आदमी के लिए कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। आदमी जड़ आदतों से मुक्त हो गया है, इसलिए ब्रह्मचर्य पशुओं के लिए अस्वाभाविक है, आदमी के लिए नहीं। आदमी चाहे तो ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकता है। कोई पशु ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। क्योंकि पशु की कोई स्वतंत्रता नहीं है अपनी ऊर्जा को रूपांतरित करने की, पर आदमी स्वतंत्र है।
तंत्र या योग दोनों ही मनुष्य की काम-ऊर्जा को रूपांतरित करना चाहते हैं। यह रूपांतरण दो तरह से हो सकता है, या तो काम-ऊर्जा के गहन अनुभव में जाया जाए--होशपूर्वक, या फिर सारी आदत बदल दी जाए, ताकि काम ऊर्जा नई आदत के मार्ग को पकड़ कर उर्ध्वगामी हो जाए। रूपांतरण सदा ही अति से होता है, एक्सट्रीम से होता है।
अगर आप एक पहाड़ से कूदना चाहते हैं तो आपको किनारे से ही कूदना पड़ेगा, आप पहाड़ के मध्य से नहीं कूद सकते हैं। कूदने का अर्थ ही होता है कि जहां खाई निकट है वहां से आप कूद सकते हैं।
जीवन में जो भी छलांग होती हैं, वे अति से होती हैं। मध्य से कोई छालांग नहीं हो सकती। अति, छोर से आदमी कूद सकता है। काम-ऊर्जा की दो अतियां हैं--या तो काम-ऊर्जा में इतने समग्रभाव से, पूरी तरह उतर जाए व्यक्ति कि छोर पर पहुंच जाए काम के अनुभव के, तो वहां से छलांग हो सकती है। और या फिर इतना अस्पर्शित रहे, बाहर रहे, काम के अनुभव में प्रवेश ही न करे, द्वार पर ही खड़ा रहे, तो वहां से भी छलांग हो सकती है। मध्य से कोई छलांग नहीं है। सिर्फ बुद्ध ने कहा है कि मध्य मार्ग है। महावीर मध्य को मार्ग नहीं कहते, तंत्र भी मध्य को मार्ग नहीं कहता। बुद्ध ने कहा है कि ‘मध्य मार्ग’ है। लेकिन अगर बुद्ध की बात को भी हम ठीक से समझें तो वह मध्य को इतनी अति तक ले जाते हैं कि मध्य मध्य नहीं रह जाता, अति हो जाता। वे कहते हैं: इंच भर बाएं भी नहीं, इंच भर दाएं भी नहीं, बिलकुल मध्य। बिलकुल मध्य का मतलब है, नई अति। अगर कोई बिलकुल मध्य में रहने की कोशिश करे तो वह नये छोर को उपलब्ध हो जाता है।
मध्य में... जैसा मैंने कल कहा, अगर पानी को हम शून्य डिग्री के नीचे ले जाएं तो वह बर्फ बन जाए, छलांग हो गई। अगर हम उसे भाप बनाना चाहें तो सौ डिग्री गर्मी तक ले जाएं तो छलांग हो गई। लेकिन कुनकुना पानी कोई छलांग नहीं ले सकता। न इस तरफ, न उस तरफ, वह मध्य में है।
अधिक लोग कुनकुने पानी की तरह हैं, ल्युकवार्म। न वे बर्फ बन सकते हैं, न वे भाप बन सकते हैं। वे छोर पर नहीं हैं कहीं से जहां से छलांग हो सके। प्रत्येक व्यक्ति को छोर पर जाना पड़ेगा, एक अति पर जाना पड़ेगा।
ये दो अतियां हैं, योग और तंत्र की। योग अभिव्यक्ति को बदलता है, तंत्र अनुभूति को बदलता है। दोनों तरफ से यात्रा हो सकती है।
पशु और आदमी में जो बड़े से बड़ा अंतर है, वह यही है, कि पशु की आदत भी बायोलॉजिकल है, उसकी आदत भी जैविक है। इसलिए पशुओं में सेक्सुअल परवर्शन, कोई काम विकृतियां दिखाई नही पड़तीं। आदमी के साथ सभी कुछ स्वतंत्र हो जाता है। आदमी के साथ कामवासना की जैविक-ऊर्जा भी स्वतंत्र अभिव्यक्तियां लेनी शुरू कर देती है।
जैसे, पशुओं में समलिंगी-यौन, होमोसेक्सुअलिटी नहीं पाई जाती--उन पशुओं को छोड़ कर, जो अजायबघरों में रहते हैं या आदमियों के पास रहते हैं। पशु यह सोच भी नहीं सकते अपनी निसर्ग अवस्था में कि पुरुष पुरुष के प्रति कामातुर हो सकता है, या स्त्री स्त्री के प्रति कामातुर हो सकती है। आदमी इंस्टिंक्ट से, उसकी जो निसर्ग के द्वारा दी गई आदतें हैं, उनसे ऊपर उठ जाता है। वह बदलाहट कर सकता है। उसकी जो ऊर्जा है, वह नये मार्गों पर बह सकती है। तो एक पुरुष पुरुष के प्रेम में पड़ सकता है, एक स्त्री स्त्री के प्रेम में पड़ सकती है। और यह मात्रा बढ़ती जाती है।
किन्से ने वर्षों के अध्ययन के बाद अमरीका में जो रिपोर्ट दी है वह यह है कि कम से कम साठ प्रतिशत लोग एकाध बार तो जरूर ही समलिंगी यौन का व्यवहार करते हैं। और करीब-करीब पच्चीस प्रतिशत लोग जीवन भर समलिंगी यौन में उत्सुक होते हैं। यह बहुत बड़ी घटना है।
स्त्री का पुरुष के प्रति आकर्षण, पुरुष का स्त्री के प्रति आर्कषण स्वाभाविक है; लेकिन पुरुष का पुरुष के प्रति, स्त्री का स्त्री के प्रति अस्वाभाविक है। पर अस्वाभाविक, पशुओं को सोचें तो, आदमी के लिए कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। आदमी जड़ आदतों से मुक्त हो गया है, इसलिए ब्रह्मचर्य पशुओं के लिए अस्वाभाविक है, आदमी के लिए नहीं। आदमी चाहे तो ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो सकता है। कोई पशु ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। क्योंकि पशु की कोई स्वतंत्रता नहीं है अपनी ऊर्जा को रूपांतरित करने की, पर आदमी स्वतंत्र है।
तंत्र या योग दोनों ही मनुष्य की काम-ऊर्जा को रूपांतरित करना चाहते हैं। यह रूपांतरण दो तरह से हो सकता है, या तो काम-ऊर्जा के गहन अनुभव में जाया जाए--होशपूर्वक, या फिर सारी आदत बदल दी जाए, ताकि काम ऊर्जा नई आदत के मार्ग को पकड़ कर उर्ध्वगामी हो जाए। रूपांतरण सदा ही अति से होता है, एक्सट्रीम से होता है।
अगर आप एक पहाड़ से कूदना चाहते हैं तो आपको किनारे से ही कूदना पड़ेगा, आप पहाड़ के मध्य से नहीं कूद सकते हैं। कूदने का अर्थ ही होता है कि जहां खाई निकट है वहां से आप कूद सकते हैं।
जीवन में जो भी छलांग होती हैं, वे अति से होती हैं। मध्य से कोई छालांग नहीं हो सकती। अति, छोर से आदमी कूद सकता है। काम-ऊर्जा की दो अतियां हैं--या तो काम-ऊर्जा में इतने समग्रभाव से, पूरी तरह उतर जाए व्यक्ति कि छोर पर पहुंच जाए काम के अनुभव के, तो वहां से छलांग हो सकती है। और या फिर इतना अस्पर्शित रहे, बाहर रहे, काम के अनुभव में प्रवेश ही न करे, द्वार पर ही खड़ा रहे, तो वहां से भी छलांग हो सकती है। मध्य से कोई छलांग नहीं है। सिर्फ बुद्ध ने कहा है कि मध्य मार्ग है। महावीर मध्य को मार्ग नहीं कहते, तंत्र भी मध्य को मार्ग नहीं कहता। बुद्ध ने कहा है कि ‘मध्य मार्ग’ है। लेकिन अगर बुद्ध की बात को भी हम ठीक से समझें तो वह मध्य को इतनी अति तक ले जाते हैं कि मध्य मध्य नहीं रह जाता, अति हो जाता। वे कहते हैं: इंच भर बाएं भी नहीं, इंच भर दाएं भी नहीं, बिलकुल मध्य। बिलकुल मध्य का मतलब है, नई अति। अगर कोई बिलकुल मध्य में रहने की कोशिश करे तो वह नये छोर को उपलब्ध हो जाता है।
मध्य में... जैसा मैंने कल कहा, अगर पानी को हम शून्य डिग्री के नीचे ले जाएं तो वह बर्फ बन जाए, छलांग हो गई। अगर हम उसे भाप बनाना चाहें तो सौ डिग्री गर्मी तक ले जाएं तो छलांग हो गई। लेकिन कुनकुना पानी कोई छलांग नहीं ले सकता। न इस तरफ, न उस तरफ, वह मध्य में है।
अधिक लोग कुनकुने पानी की तरह हैं, ल्युकवार्म। न वे बर्फ बन सकते हैं, न वे भाप बन सकते हैं। वे छोर पर नहीं हैं कहीं से जहां से छलांग हो सके। प्रत्येक व्यक्ति को छोर पर जाना पड़ेगा, एक अति पर जाना पड़ेगा।
ये दो अतियां हैं, योग और तंत्र की। योग अभिव्यक्ति को बदलता है, तंत्र अनुभूति को बदलता है। दोनों तरफ से यात्रा हो सकती है।
इन मित्र ने पूछा है कि ‘अगर तंत्र थोड़े ही लोगों के लिए है तो आप उसकी चर्चा न ही करते तो अच्छा था। वह खतरनाक हो सकता है।’
जो चीज खतरनाक हो, उसकी चर्चा ठीक से कर लेनी चाहिए। क्योंकि खतरे से बचने का एक ही उपाय है कि हम उसे जानते हों, दूसरा कोई उपाय नहीं है। लेकिन जब मैं कहता हूं, तंत्र बहुत थोड़े लोगों के लिए है, तो आप यह मत समझ लेना कि योग बहुत ज्यादा लोगों के लिए है। बहुत थोड़े लोग ही छलांग लेते हैं, चाहे योग से, चाहे तंत्र से, अधिक लोग तो कुनकुने ही रहते हैं जीवन भर, न कभी उबलते, न कभी ठंडे होते। यह जो मीडियाकर, यह जो मध्य में रहने वाला बड़ा वर्ग है, यह कोई छलांग नहीं लेता, और यह छलांग ले भी नहीं सकता। दोनों छोर से छलांग होती है। छोर पर हमेशा थोड़े से लोग पहुंच पाते हैं। छोर पर पहुंचने का अर्थ है, कुछ त्यागना पड़ता है।
ध्यान रहे, किसी भी छोर पर जाना हो तो कुछ त्यागना पड़ता है। अगर तंत्र की तरफ जाना हो, तो भी बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। अगर योग की तरफ जाना हो, तो भी बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। अलग-अलग चीजें त्यागनी पड़ती हैं, लेकिन त्यागना तो पड़ता ही है। छोर पर पहुंचने का मतलब ही यह है कि मध्य में रहने की जो सुविधा है, वह त्यागनी पड़ती है। मध्य में कभी कोई खतरा नहीं है। वह जो सुरक्षा है, वह त्यागनी पड़ती है।
जैसे-जैसे आदमी छोर पर जाता है, वैसे-वैसे खतरे के करीब आता है। जहां परिवर्तन हो सकता है, वहां खतरा भी होता है। जहां विस्फोट होगा, जहां क्रांति होगी, वहां हम खतरे के करीब पहुंच रहे हैं। इसीलिए अधिक लोग बीच में, भीड़ के बीच में जीते हैं। खतरे से सुरक्षा रहती है। दोनों ही खतरनाक हैं। लेकिन जिंदगी केवल वे ही लोग अनुभव कर पाते हैं, जो असुरक्षा में उतरने की हिम्मत रखते हैं।
तंत्र भी साहस है, योग भी। कोई महावीर भी बहुत लोग नहीं हो पाते। वह भी आसान नहीं है। आसान कुछ भी नहीं है। आसान है सिर्फ क्रमशः मरते जाना, जीना तो कठिन है। कठिनाई असुरक्षा में उतरने की है, अज्ञात में उतरने की है।
कुछ लोग तंत्र से पहुंच सकते हैं, कुछ लोग योग से पहुंच सकते हैं। यह व्यक्ति को खोज करनी पड़ती है कि वह किस मार्ग से पहुंच सकता है। लेकिन कुछ सूचनाएं दी जा सकती हैं--एक, अपने अचेतन को थोड़ा टटोलना चाहिए। अगर अचेतन ऐसा कहता है कि तंत्र तो बड़ा मजेदार होगा, कि इसमें तो कुछ छोड़ना भी नहीं है, भोग ही भोग है, यही रास्ता ठीक है, तो समझना कि यह रास्ता आपके लिए ठीक नहीं है। यह आप अपने को धोखा दे रहे हैं।
हर आदमी अपने अचेतन वृत्ति को थोड़े से ही निरीक्षण से जान सकता है। बड़ी जटिल बात नहीं है। भीतरी रस आपको पता ही रहता है कि आप किसलिए कर रहे हैं। अपने को धोखा देना बहुत कठिन है, असंभव है। थोड़ा सा होश रखें तो आपको जाहिर रहेगा कि आप यह किसलिए कर रहे हैं। अगर आपको रस मालूम पड़ रहा हो तंत्र में तो तंत्र आपके लिए मार्ग नहीं है। अगर आपको योग में रस मालूम पड़ रहा हो तो योग भी आपके लिए मार्ग नहीं है।
कुछ लोगों को योग में रस मालूम पड़ता है। आत्मपीड़क, खुद को सताने वाले लोग, मैसोचिस्ट जिनको मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जो अपने को सताने में मजा लेते हैं, ऐसे लोगों को योग में बड़ा रस मालूम पड़ता है। उपवास में, तप में, धूप में खड़े होने में, नग्न होने में उन्हें बड़ा रस मालूम पड़ता है। किसी भी तरह अपने को सताने में उन्हें रस मालूम पड़ता है।
अगर आपको अपने आपको सताने में रस मालूम पड़ रहा हो, तो आप समझना, योग आपके लिए मार्ग नहीं है। योग आपके लिए बीमारी है। अगर आपको भोग में रस मालूम पड़ रहा हो, इसलिए तंत्र के बहाने आप भोग में उतर रहे हों, तो तंत्र आपके लिए खतरनाक है, बीमारी है।
एक बात ठीक से समझ लेनी चाहिए: चित्त की अस्वस्थता को किसी भी चीज से सहारा देना खतरनाक है। फिर रस न पड़ रहा हो, तो क्या उपाय है? कैसे हम जानें कि इसमें हमें रस नहीं पड़ रहा है? एक बात ध्यान में रखनी जरूरी है--जब भी हम किसी मार्ग से, किसी अंत की तरफ जा रहे हों, तो अंत में रस होना चाहिए, मार्ग में रस नहीं होना चाहिए।
आप एक मंजिल पर जा रहे हैं एक रास्ते से, तो आपको मंजिल में रस होना चाहिए, रास्ते में रस नहीं होना चाहिए। अगर आपको रास्ते में रस है, इसीलिए मंजिल को आपने चुन लिया है कि रास्ता सुखद है, सुंदर छाया है, वृक्ष हैं, फूल हैं, इसलिए इस मंजिल को चुन लें तो खतरा है। रास्ता कभी मत चुनें, मंजिल चुनें और मंजिल के अनुकूल रास्ता चुनें, और रास्ते पर बहुत रस न लें। रास्ते में रस जो लेगा वह अटक जाएगा। हम सारे लोग रास्ते में रस लेते हैं, हम रास्ता ही ऐसा चुनते हैं।
फ्रायड ने कहा है कि आदमी इतना कुशल है कि वह सब तरह के रेशनेलाइजेशन कर लेता है, सब तरह की तर्कबद्ध व्यवस्था कर लेता है। वह जो चुनना चाहता है, वही चुनता है और चारों तरफ तर्क का आवरण खड़ा कर लेता है, और अपने को समझा लेता है कि यह मैंने किसी अंतर-वृत्ति के कारण नहीं, किसी वासना के कारण नहीं, बड़े विवेकपूर्वक चुना है। यह धोखा बहुत आसान है। लेकिन अगर कोई सजग हो, तो इसे तोड़ना कठिन नहीं है। हम... हम हमेशा ही जान सकते हैं, देख सकते हैं कि हमारे भीतर दो तल तो नहीं हैं! दो तल का मतलब यह होता है कि ऊपर से आप कुछ समझा रहे हैं अपने को, भीतर से बात कुछ और है।
एक आदमी उपवास कर रहा है, ऊपर से समझा रहा है कि यह साधना है। लेकिन उसे जांचना चाहिए, कहीं उसे खुद को भूखा मारने में किसी तरह का गर्हित रस तो नहीं आ रहा है!
ऐसे लोग हैं जो खुद को सताने में रस लेते हैं। और जब तक वे अपने को न सताएं उन्हें किसी तरह का आनंद नहीं आता। खुद को सताने में उन्हें ऐसे ही मजा आने लगता है, जैसे कुछ लोगों को दूसरों को सताने में मजा आता है। वे खुद के साथ एक फासला कर लेते हैं।
मेसोच एक बड़ा लेखक हुआ। वह जब तक अपने को कोड़े न मार ले रोज, कांटे न चुभा ले, तब तक उसको रस ही न आए। इसलिए उसी के नाम पर मैसोचिज्म, आत्मपीड़न सिद्धांत का निर्माण हो गया।
कोई आदमी कांटे बिछा कर उस पर लेटा हुआ है, वह अपने को कितना ही कहे कि हम कोई साधना कर रहे हैं, लेकिन कांटों पर यह लेटने में उसे जांच करनी चाहिए कि कहीं कुल रस इतना ही तो नहीं है कि मैं अपने को सता सकता हूं।
जब आप अपने को सताते हैं तो आपको लगता है, आप अपने मालिक हो गए हैं। जब आप अपने को सताते हैं तो आपको लगता है, कि अब, अब यह शरीर आपके ऊपर मालिक नहीं रहा। और अगर इस सताने में भीतरी सुख मिलने लगे, जैसे कि कोई खाज को खुजलाता है और सुख मिलता है, ऐसा इस सताने में भी सुख मिलने लगे, तो समझना कि आप पैथोलॉजिकल, रुग्ण दिशाओं में यात्रा कर रहे हैं।
यही तंत्र के बाबत भी सच है। आदमी कह सकता है कि मैं तो सिर्फ इसलिए कामवासना में उतर रहा हूं, ताकि कामवासना से मुक्त हो सकूं।लेकिन यह दूसरों को धोखा देने में कोई अ़डचन नहीं है, खुद तो जानता ही रहेगा कि मैं सच में कामवासना से मुक्त होने के लिए उतर रहा हूं या यह सिर्फ एक बहाना है, एक एक्सक्यूज है, और मैं उतरना चाहता हूं कामवासना में। यह खुद के सामने निरीक्षण सदा बना रहे, तो आज नहीं कल, थोड़ी बहुत भूल-चूक करके आदमी उस रास्ते को पा जाता है, जो मंजिल तक पहुंचाने वाला है।
कौन सा रास्ता आपके लिए मंजिल तक पहुंचाने वाला है, आपके अतिरिक्त निर्णय करना दूसरे को कठिन होगा। अड़चन होगी। लेकिन आप अगर अपने को धोखा ही देते चले जाएं तो आपको भी बहुत अड़चन होगी। लेकिन जो अपने को धोखा देने में लगा है, उसका धर्म से कोई संबंध ही नहीं है। अभी साधना से उसका कोई, कोई जोड़ नहीं बैठा है।
आदत भी तोड़ी जा सकती है, अनुभूति भी बदली जा सकती है--ये दो छोर हैं--आदत, अभिव्यक्ति मार्ग; अनुभूति, भीतर बहने वाली ऊर्जा।
ऐसा समझें कि यह बिजली का बल्ब जल रहा है। यहां अंधेरा करना हो तो दो उपाय हैं--या तो बिजली बल्ब तक न आने दी जाए, बटन बंद कर दी जाए, तो अंधेरा हो जाए, या बटन चलती भी रहे तो बल्ब तोड़ दिया जाए, तो भी अंधेरा हो जाए।
तंत्र का प्रयोग, वह जो भीतर ऊर्जा बह रही है, उसको बदलने का है। महावीर का प्रयोग--वह जो बाहर अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया, उसे तोड़ देने का है। दोनों से पहुंचा जा सका है। लेकिन जब भी एक मार्ग की कोई बात करेगा, तो दूसरे मार्ग के विपरीत उसे बोलना पड़ता है, अन्यथा समझाना बिलकुल कठिन और असंभव हो जाए। अगर तंत्र पढ़ेंगे तो लगेगा कि महावीर जैसा व्यक्ति कभी नहीं पहुंच सकता। अगर महावीर को पढ़ेंगे तो लगेगा कि तांत्रिक कभी नहीं पहुंचे होंगे। जो जिस मार्ग की बात कर रहा है वह उस मार्ग के लिए पूरा स्पष्ट कर रहा है। और सभी मार्ग अपने आप में पूरे हैं। उनसे पहुंचा जा सकता है। लेकिन उससे यह सिद्ध नहीं होता कि विपरीत से नहीं पहुंचा जा सकता है।
ध्यान रहे, किसी भी छोर पर जाना हो तो कुछ त्यागना पड़ता है। अगर तंत्र की तरफ जाना हो, तो भी बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। अगर योग की तरफ जाना हो, तो भी बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। अलग-अलग चीजें त्यागनी पड़ती हैं, लेकिन त्यागना तो पड़ता ही है। छोर पर पहुंचने का मतलब ही यह है कि मध्य में रहने की जो सुविधा है, वह त्यागनी पड़ती है। मध्य में कभी कोई खतरा नहीं है। वह जो सुरक्षा है, वह त्यागनी पड़ती है।
जैसे-जैसे आदमी छोर पर जाता है, वैसे-वैसे खतरे के करीब आता है। जहां परिवर्तन हो सकता है, वहां खतरा भी होता है। जहां विस्फोट होगा, जहां क्रांति होगी, वहां हम खतरे के करीब पहुंच रहे हैं। इसीलिए अधिक लोग बीच में, भीड़ के बीच में जीते हैं। खतरे से सुरक्षा रहती है। दोनों ही खतरनाक हैं। लेकिन जिंदगी केवल वे ही लोग अनुभव कर पाते हैं, जो असुरक्षा में उतरने की हिम्मत रखते हैं।
तंत्र भी साहस है, योग भी। कोई महावीर भी बहुत लोग नहीं हो पाते। वह भी आसान नहीं है। आसान कुछ भी नहीं है। आसान है सिर्फ क्रमशः मरते जाना, जीना तो कठिन है। कठिनाई असुरक्षा में उतरने की है, अज्ञात में उतरने की है।
कुछ लोग तंत्र से पहुंच सकते हैं, कुछ लोग योग से पहुंच सकते हैं। यह व्यक्ति को खोज करनी पड़ती है कि वह किस मार्ग से पहुंच सकता है। लेकिन कुछ सूचनाएं दी जा सकती हैं--एक, अपने अचेतन को थोड़ा टटोलना चाहिए। अगर अचेतन ऐसा कहता है कि तंत्र तो बड़ा मजेदार होगा, कि इसमें तो कुछ छोड़ना भी नहीं है, भोग ही भोग है, यही रास्ता ठीक है, तो समझना कि यह रास्ता आपके लिए ठीक नहीं है। यह आप अपने को धोखा दे रहे हैं।
हर आदमी अपने अचेतन वृत्ति को थोड़े से ही निरीक्षण से जान सकता है। बड़ी जटिल बात नहीं है। भीतरी रस आपको पता ही रहता है कि आप किसलिए कर रहे हैं। अपने को धोखा देना बहुत कठिन है, असंभव है। थोड़ा सा होश रखें तो आपको जाहिर रहेगा कि आप यह किसलिए कर रहे हैं। अगर आपको रस मालूम पड़ रहा हो तंत्र में तो तंत्र आपके लिए मार्ग नहीं है। अगर आपको योग में रस मालूम पड़ रहा हो तो योग भी आपके लिए मार्ग नहीं है।
कुछ लोगों को योग में रस मालूम पड़ता है। आत्मपीड़क, खुद को सताने वाले लोग, मैसोचिस्ट जिनको मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जो अपने को सताने में मजा लेते हैं, ऐसे लोगों को योग में बड़ा रस मालूम पड़ता है। उपवास में, तप में, धूप में खड़े होने में, नग्न होने में उन्हें बड़ा रस मालूम पड़ता है। किसी भी तरह अपने को सताने में उन्हें रस मालूम पड़ता है।
अगर आपको अपने आपको सताने में रस मालूम पड़ रहा हो, तो आप समझना, योग आपके लिए मार्ग नहीं है। योग आपके लिए बीमारी है। अगर आपको भोग में रस मालूम पड़ रहा हो, इसलिए तंत्र के बहाने आप भोग में उतर रहे हों, तो तंत्र आपके लिए खतरनाक है, बीमारी है।
एक बात ठीक से समझ लेनी चाहिए: चित्त की अस्वस्थता को किसी भी चीज से सहारा देना खतरनाक है। फिर रस न पड़ रहा हो, तो क्या उपाय है? कैसे हम जानें कि इसमें हमें रस नहीं पड़ रहा है? एक बात ध्यान में रखनी जरूरी है--जब भी हम किसी मार्ग से, किसी अंत की तरफ जा रहे हों, तो अंत में रस होना चाहिए, मार्ग में रस नहीं होना चाहिए।
आप एक मंजिल पर जा रहे हैं एक रास्ते से, तो आपको मंजिल में रस होना चाहिए, रास्ते में रस नहीं होना चाहिए। अगर आपको रास्ते में रस है, इसीलिए मंजिल को आपने चुन लिया है कि रास्ता सुखद है, सुंदर छाया है, वृक्ष हैं, फूल हैं, इसलिए इस मंजिल को चुन लें तो खतरा है। रास्ता कभी मत चुनें, मंजिल चुनें और मंजिल के अनुकूल रास्ता चुनें, और रास्ते पर बहुत रस न लें। रास्ते में रस जो लेगा वह अटक जाएगा। हम सारे लोग रास्ते में रस लेते हैं, हम रास्ता ही ऐसा चुनते हैं।
फ्रायड ने कहा है कि आदमी इतना कुशल है कि वह सब तरह के रेशनेलाइजेशन कर लेता है, सब तरह की तर्कबद्ध व्यवस्था कर लेता है। वह जो चुनना चाहता है, वही चुनता है और चारों तरफ तर्क का आवरण खड़ा कर लेता है, और अपने को समझा लेता है कि यह मैंने किसी अंतर-वृत्ति के कारण नहीं, किसी वासना के कारण नहीं, बड़े विवेकपूर्वक चुना है। यह धोखा बहुत आसान है। लेकिन अगर कोई सजग हो, तो इसे तोड़ना कठिन नहीं है। हम... हम हमेशा ही जान सकते हैं, देख सकते हैं कि हमारे भीतर दो तल तो नहीं हैं! दो तल का मतलब यह होता है कि ऊपर से आप कुछ समझा रहे हैं अपने को, भीतर से बात कुछ और है।
एक आदमी उपवास कर रहा है, ऊपर से समझा रहा है कि यह साधना है। लेकिन उसे जांचना चाहिए, कहीं उसे खुद को भूखा मारने में किसी तरह का गर्हित रस तो नहीं आ रहा है!
ऐसे लोग हैं जो खुद को सताने में रस लेते हैं। और जब तक वे अपने को न सताएं उन्हें किसी तरह का आनंद नहीं आता। खुद को सताने में उन्हें ऐसे ही मजा आने लगता है, जैसे कुछ लोगों को दूसरों को सताने में मजा आता है। वे खुद के साथ एक फासला कर लेते हैं।
मेसोच एक बड़ा लेखक हुआ। वह जब तक अपने को कोड़े न मार ले रोज, कांटे न चुभा ले, तब तक उसको रस ही न आए। इसलिए उसी के नाम पर मैसोचिज्म, आत्मपीड़न सिद्धांत का निर्माण हो गया।
कोई आदमी कांटे बिछा कर उस पर लेटा हुआ है, वह अपने को कितना ही कहे कि हम कोई साधना कर रहे हैं, लेकिन कांटों पर यह लेटने में उसे जांच करनी चाहिए कि कहीं कुल रस इतना ही तो नहीं है कि मैं अपने को सता सकता हूं।
जब आप अपने को सताते हैं तो आपको लगता है, आप अपने मालिक हो गए हैं। जब आप अपने को सताते हैं तो आपको लगता है, कि अब, अब यह शरीर आपके ऊपर मालिक नहीं रहा। और अगर इस सताने में भीतरी सुख मिलने लगे, जैसे कि कोई खाज को खुजलाता है और सुख मिलता है, ऐसा इस सताने में भी सुख मिलने लगे, तो समझना कि आप पैथोलॉजिकल, रुग्ण दिशाओं में यात्रा कर रहे हैं।
यही तंत्र के बाबत भी सच है। आदमी कह सकता है कि मैं तो सिर्फ इसलिए कामवासना में उतर रहा हूं, ताकि कामवासना से मुक्त हो सकूं।लेकिन यह दूसरों को धोखा देने में कोई अ़डचन नहीं है, खुद तो जानता ही रहेगा कि मैं सच में कामवासना से मुक्त होने के लिए उतर रहा हूं या यह सिर्फ एक बहाना है, एक एक्सक्यूज है, और मैं उतरना चाहता हूं कामवासना में। यह खुद के सामने निरीक्षण सदा बना रहे, तो आज नहीं कल, थोड़ी बहुत भूल-चूक करके आदमी उस रास्ते को पा जाता है, जो मंजिल तक पहुंचाने वाला है।
कौन सा रास्ता आपके लिए मंजिल तक पहुंचाने वाला है, आपके अतिरिक्त निर्णय करना दूसरे को कठिन होगा। अड़चन होगी। लेकिन आप अगर अपने को धोखा ही देते चले जाएं तो आपको भी बहुत अड़चन होगी। लेकिन जो अपने को धोखा देने में लगा है, उसका धर्म से कोई संबंध ही नहीं है। अभी साधना से उसका कोई, कोई जोड़ नहीं बैठा है।
आदत भी तोड़ी जा सकती है, अनुभूति भी बदली जा सकती है--ये दो छोर हैं--आदत, अभिव्यक्ति मार्ग; अनुभूति, भीतर बहने वाली ऊर्जा।
ऐसा समझें कि यह बिजली का बल्ब जल रहा है। यहां अंधेरा करना हो तो दो उपाय हैं--या तो बिजली बल्ब तक न आने दी जाए, बटन बंद कर दी जाए, तो अंधेरा हो जाए, या बटन चलती भी रहे तो बल्ब तोड़ दिया जाए, तो भी अंधेरा हो जाए।
तंत्र का प्रयोग, वह जो भीतर ऊर्जा बह रही है, उसको बदलने का है। महावीर का प्रयोग--वह जो बाहर अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया, उसे तोड़ देने का है। दोनों से पहुंचा जा सका है। लेकिन जब भी एक मार्ग की कोई बात करेगा, तो दूसरे मार्ग के विपरीत उसे बोलना पड़ता है, अन्यथा समझाना बिलकुल कठिन और असंभव हो जाए। अगर तंत्र पढ़ेंगे तो लगेगा कि महावीर जैसा व्यक्ति कभी नहीं पहुंच सकता। अगर महावीर को पढ़ेंगे तो लगेगा कि तांत्रिक कभी नहीं पहुंचे होंगे। जो जिस मार्ग की बात कर रहा है वह उस मार्ग के लिए पूरा स्पष्ट कर रहा है। और सभी मार्ग अपने आप में पूरे हैं। उनसे पहुंचा जा सकता है। लेकिन उससे यह सिद्ध नहीं होता कि विपरीत से नहीं पहुंचा जा सकता है।
Osho's Commentary
‘शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श इन पांच प्रकार के काम गुणों को भिक्षु सदा के लिए त्याग दे।’
तंत्र कहता है: समस्त इंद्रियों का पूरा अनुभव। महावीर कहते हैं: समस्त इंद्रियों का अवरोध, समस्त इंद्रियों का निषेध।
कामवासना सिर्फ कामवासना ही नहीं है, और कामेंद्रिय सिर्फ कामेंद्रिय नहीं है, सभी इंद्रियां कामेंद्रिय हैं।
जब आप किसी को हाथ से छूते हैं किसी के शरीर को, तभी छूते हैं, ऐसा नहीं। जब आप आंख से छूते हैं, तब भी छूते हैं। आंख भी छूती है किसी के शरीर को, हाथ भी छूता है। और जब किसी की आवाज आपको प्रीतिकर और मधुर लगती है, उत्तेजक लगती है, तब कान भी छूता है, और जब पास से गुजर जाते किसी के शरीर की गंध आपको आंदोलित कर जाती है, तो नाक भी छूती है।
हाथ बहुत स्थूल रूप से छूते हैं, आंख बहुत सूक्ष्म रूप से छूती है, लेकिन स्पर्श सभी इंद्रियां करती हैं। जननेंद्रिय गहनतम स्पर्श करती है, लेकिन सभी स्पर्श हैं।
तो महावीर कहते हैं: अगर वासना से पूरी तरह छूटना है, तो स्पर्श की जो कामना है अनेक-अनेक रूपों में, वह सभी त्याग देनी चाहिए। आंख से भी भोग न हो, कान से भी भोग न हो, स्वाद से भी भोग न हो। भोग की वृत्ति इंद्रियों के द्वार से बाहर यात्रा न करे। जब आप किसी को देखना चाहते हैं, कामवासना शुरू हो गई। किसी की आवाज सुनना चाहते हैं, कामवासना शुरू हो गई।
कामवासना यौन ही नहीं है, यह खयाल में ले लें।
और जिसने यह समझा हो कि यौन ही कामवासना है, वह गलती में पड़ेगा। यौन तो उसकी चरम निष्पत्ति है, लेकिन यात्रा का प्रारंभ तो दूसरी इंद्रियों से शुरू हो जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आंख जब देखना चाहे, तब भीतर से ध्यान को आंख से हटा लेना। आंख को देखने देना, लेकिन भीतर जो रस ध्यान लेता है देखने का, उसे हटा लेना, यह... यह संभव है। इसकी पूरी साधना है।
आप एक फूल को देख रहे हैं, फूल सुंदर है। अगर महावीर को ठीक से समझना हो, तो आप बड़े हैरान होंगे जान कर कि जहां-जहां सौंदर्य दिखाई पड़ता है, वहां-वहां यौन उपस्थित होता है।
फूल है क्या? वृक्ष का यौन है, वृक्ष का सेक्स है। कोयल गीत गा रही है, कान को मधुर लगता है, लेकिन कोयल का गीत है क्या? कोयल का यौन है। मोर नाच रहा है, उसके पंख आकाश में छाता बन कर फैल गए हैं, इंद्रधनुष बना दिया है, सुंदर लगता है। लेकिन मोर के पंख हैं क्या? यौन है।
जहां-जहां आपने सौंदर्य देखा है, वहां-वहां यौन छिपा है। इसलिए जब आप किसी स्त्री के चेहरे की प्रशंसा करते हैं, तो शायद मन में थोड़ा संकोच भी होता हो कि करें न करें। लेकिन जब आप कहते हैं: कितना सुंदर मोर है, तब आपको जरा भी खयाल नहीं होता कि भेद कुछ भी नहीं है। वह जो मोर पंख फैला कर नाच रहा है वह यौन-आकर्षण का निमंत्रण है। वह जो कोयल कुहुक रही है, वह साथी की तलाश है, वह जो फूल सुगंध फेंक रहा है और खिल गया है आकाश में, वह निमंत्रण है कि उस फूल में छिपे हुए वीर्यकण हैं, मधुमक्खियां आएं, तितलियां आएं, उन वीर्यकणों को ले जाएं और छितरा दें दूसरे फूलों पर।
अगर हम चारों तरफ जगत में गहरी खोज करें, तो जहां-जहां हमें सौंदर्य का अनुभव होता है वहां-वहां छिपी हुई कामवासना होगी। सुगंध अच्छी लगती है, लेकिन आपको अंदाजा नहीं होगा, बायोलॉजिस्ट कहते हैं कि सुगंध का जो बोध है वह यौन से जुड़ा हुआ है।
पशु गंध से ही आकर्षित होते हैं, इसलिए पशु, एक मादा... नर-मादा एक-दूसरे की योनि की गंध लेते हुए दिखाई पड़ेंगे। वे गंध से आकर्षित होते हैं। गंध ही निर्णायक है। जब मादाएं पशुओं की कामातुर होती हैं तो उनकी योनि से विशेष गंध फैलनी शुरू हो जाती है। वही गंध निमंत्रण है, वह गंध दूर तक फैल जाती है। और नर को आकर्षित करती है। जैसे ही वह गंध मिलती है, नर आकर्षित हो जाता है।
आदमी भी गंध का बहुत उपयोग करता है। स्त्रियां जानती हैं कि गंध कीमती है और गंध आकर्षण निर्मित कर लेती है। गंध का आदमी दो तरह से उपयोग करता है--एक तो आकर्षित करने को, एक शरीर की गंध को छिपाने के लिए। क्योंकि शरीर की गंध भी यौन निमंत्रण है। उसे छिपाना जरूरी है।
संभोग के क्षण में स्त्री-पुरुषों के शरीर की गंध बदल जाती है, क्रोध के क्षण में स्त्री-पुरुषों के शरीर की गंध बदल जाती है। प्रेम के क्षण में स्त्री-पुरुषों के शरीर की गंध बदल जाती है। आपके शरीर में एक सी गंध नहीं रहती चौबीस घंटे। आपका मन बदलता है, शरीर की गंध बदल जाती है।
गंध है, स्वाद है, रस है, ध्वनि है, वे सभी के सब कामवासना से जुड़े हुए हैं। अगर हम ऐसा समझें तो कुछ कठिनाई न होगी कि जननेंद्रिय केंद्रीय इंद्रिय है और सारी इंद्रियां उसके उपांग हैं। उसकी शाखाएं हैं। जैसे जननेंद्रिय ने आंख को निर्मित किया है कि खोजो मेरे लिए रूप। जैसे जननेंद्रिय ने कान को निर्मित किया है कि खोजो मेरे लिए ध्वनि। जैसे जननेंद्रिय ने सारी इंद्रियों को निर्मित किया है, वे उसके द्वार हैं। जहां से वह जगत में प्रवेश करती है। जहां से वह जगत में तलाश करती है, जहां से वह जगत में खोजती है।
कामवासना इंद्रियों के द्वार से जगत में फैलती है, हर इंद्रिय काम-इंद्रिय है। यह महावीर की बात ठीक से खयाल में ले लेनी जरूरी है। इसलिए महावीर कहते हैं: भिक्षु, वह जो साधना में लीन हुआ है--साधक, वह समस्त इंद्रियों से अपने ध्यान को हटा ले। अगर समस्त इंद्रियों से ध्यान को हटा लिया जाए तो कामेंद्रिय का नब्बे प्रतिशत द्वार अवरुद्ध हो जाता है, वह बाहर नहीं बह सकती। आप थोड़ा सोचें। आपकी आंखें बंद हों, तो सौंदर्य का कितना अर्थ समाप्त हो जाएगा!
अंधा आदमी भी सौंदर्य का अनुभव करता है, लेकिन हाथ से छूकर ही कर पाता है। लेकिन हाथ से जो छुएगा, उसके सौंदर्य का हिसाब बदल जाएगा। आंख से देखे हुए सौंदर्य की बात और है। आपकी सारी इंद्रियां बंद हो गई हों, तो आपके लिए सौंदर्य का क्या अर्थ होगा? कोई भी अर्थ नहीं रह जाएगा। सारा अर्थ इंद्रियों का अनुदान है।
महावीर कहते हैं: अपने को सिकोड़ लेना, केंद्र पर रोक लेना, किसी इंद्रिय से बाहर नहीं जाना। इंद्रियां जबरदस्ती किसी को बाहर नहीं ले जातीं। हम जाना चाहते हैं, इसलिए जाते हैं। जब हम नहीं जाना चाहते, इंद्रियां व्यर्थ हो जाती हैं।
आपके घर में आग लगी है और एक सुंदर स्त्री सामने से निकलती है, बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। आंख देखेगी, आंख का काम देखना है, लेकिन आप आंख के पीछे मौजूद नहीं हैं अभी, ध्यान मकान में लगी आग की तरफ चला गया है। कोई दिखाई नहीं पड़ेगा। कोई सुंदर गीत गा रहा हो, सुनाई नहीं पड़ेगा। कोई आकर चारों तरफ गुलाब की सुगंध छिड़क दे, नाक को पता नहीं चलेगा। क्या हुआ है? सारा ध्यान आग की तरफ आकर्षित हो गया है। अभी आग इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि ध्यान बंट नहीं सकता, और इंद्रियों की तरफ ध्यान नहीं जा सकता।
महावीर कहते हैं: जिसे ब्रह्मचर्य इतना महत्वपूर्ण हो गया हो कि वही उसे मुक्ति का मार्ग है, ऐसी प्रतीति हो रही हो, उसे कठिन नहीं होगा कि वह अपने ध्यान को इंद्रियों से अलग कर ले। हमें कठिन होगा, बहुत कठिन होगा, क्योंकि इंद्रियां ही हमारा जीवन है। इंद्रियों के अतिरिक्त हमारा कोई अनुभव नहीं है। जो हमने जाना है, जो हमने जीया है वह इंद्रियों से ही जाना और जीया है। और बड़ा अदभुत है इंद्रियों का लोभ। क्योंकि इंद्रियों से हम जो जानते हैं, वह स्वप्नवत है।
फूल को आपने देखा है? लेकिन फूल तो बहुत दूर है, आप देखते क्या हैं? वैज्ञानिक से पूछें, या महावीर से पूछें, फूल में आप देखते क्या हैं? फूल को तो देख नहीं सकता कोई आदमी, क्योंकि फूल कभी आंख के भीतर जाता नहीं। आप देखते क्या हैं? फूल से सूरज की किरणें आती हैं लौट कर। वे किरणें आपकी आंख पर पड़ती हैं। वे किरणें भी भीतर नहीं जा सकतीं, सिर्फ आंख की सतह को स्पर्श करती हैं। आंख की सतह के भीतर जो रासायनिक द्रव्य हैं वे उन किरणों से संचलित हो जाते हैं। वे रासायनिक द्रव्य आपकी आंखों के पीछे छिपे हुए जो तंतुओं का जाल है, उसको कंपित करते हैं। वे कंपन आप तक पहुंचते हैं। उन्हीं कंपनों को आपने देखा है।
इसीलिए तो एक बड़ी अदभुत घटना घटती है। एक नग्न स्त्री को आप देखें तो जैसे तंतु कंपते हैं, वैसे एक नग्न स्त्री का चित्र देख कर भी कंपते हैं। इसीलिए तो पोरनोग्राफी, अश्लील साहित्य का इतना मूल्य है। क्योंकि तंतु तो उसी तरह हिलने लगते हैं, मजा उसी तरह आने लगता है। बल्कि सच तो यह है कि नग्न स्त्री को देख कर उतना मजा कभी नहीं आता, जितना नग्न स्त्री के चित्र को देख कर आता है। उसके कई कारण हैं।
स्त्री की वास्तविक मौजूदगी आपके ध्यान में बाधा बनती है। चित्र में कोई मौजूद नहीं होता, आप अकेले होते हैं, ध्यानस्थ हो जाते हैं, और भीतर आपको रस आने लगता है। उतना ही रस आने लगता है, शायद ज्यादा भी आने लगता है। क्योंकि वास्तविक स्त्री के साथ कल्पना का उपाय नहीं रह जाता। वास्तविक स्त्री सामने मौजूद है, अब कल्पना करने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन चित्र आपको कल्पना देता है और चित्र कहता है: जब चित्र इतना सुंदर है तो वास्तविक स्त्री कितनी सुंदर न होगी और आपके कल्पना के पंख फैल जाते हैं।
इसलिए जो लोग चित्रों में रस लेने लगते हैं, उनको वास्तविक स्त्री फीकी मालूम पड़ने लगती है। इस लिहाज से स्त्रियां बहुत होशियार हैं। उन्होंने चित्रों में कभी रस नहीं लिया। वास्तविक पुरुष के प्रेम में भी वे आंख बंद कर लेती हैं, क्योंकि कल्पना वास्तविक से सदा ज्यादा सुंदर है। स्त्रियां होशियार हैं। आप उन्हें आलिंगन में लें, वे आंख बंद कर लेंगी। आंख बंद करने का मतलब यह है कि अब
आप वास्तविक पुरुष कम, काल्पनिक, देवता ज्यादा हो गए। अब उनके भीतर एक कल्पना का देव खड़ा है। इसलिए पुरुष जल्दी स्त्रियों से ऊब जाते हैं, स्त्रियां उतनी जल्दी पुरुषों से नहीं ऊबतीं। यह बड़े मजे की बात है।
फ्रायड ने गहन विश्लेषणों से यह कहा है कि स्त्री और पुरुष हमेशा परिपूरक हैं, हर चीज में। फ्रायड ने दो शब्दों का उपयोग किया है, एक को वह कहता है: वयूर, जो देखने में उत्सुक है, पुरुष को वह कहता है: वयूर। वह देखने में उत्सुक है। स्त्री को वह कहता है: एक्झिबीशनिस्ट, जो दिखाने में उत्सुक है। दोनों परिपूरक हैं। क्योंकि कोई तो दिखाने वाला चाहिए, तब देखने वाले को कोई रस हो; और कोई देखने वाला चाहिए, तब दिखाने वाले को कोई रस हो। स्त्री-पुरुष सब दिशाओं में परिपूरक हैं। इसलिए पुरुष सदा चाहता है कि प्रेम अंधेरे में न हो, प्रकाश में हो। स्त्री सदा चाहती है, प्रेम अंधेरे में हो, प्रकाश में न हो।
पुरुष देखना चाहता है, स्त्री देखना नहीं चाहती। इसलिए पुरुषों ने नग्न स्त्रियों के बहुत चित्र निर्मित किए, लेकिन स्त्रियों ने नग्न पुरुषों में कोई रस... कोई रस लिया ही नहीं कभी। स्त्री को थोड़ी परेशानी ही होती है नग्न पुरुष को देख कर, कोई सुख नहीं मिलता। लेकिन पुरुष के सामने स्त्री कपड़े भी पहने खड़ी हो तो कल्पना में वह उसे नग्न करना शुरू कर देता है।
यह जो हमारे चित्त की कल्पना है, यह जब हम कल्पना करते हैं, तब तो कल्पना होती ही है, जब हम वास्तविक कुछ अनुभव करते हैं, तब भी कल्पना से ज्यादा क्या होता है? एक फूल को देखें, स्त्री को देखें, पुरुष को देखें, आपको भीतर मिलता क्या है? वास्तविक तो कुछ नहीं मिलता, कुछ कंपन उपलब्ध होते हैं। उन्हीं कंपनों के लोक को हम संसार कहते हैं।
जब आपको अच्छी सुगंध मालूम पड़ती है तो होता क्या है? कंपन, वाइब्रेशंस। जब आपको अच्छा स्वाद आता है तो होता क्या है? जीभ में कंपन, वाइब्रेशंस।
हमारा सारा सुख वाइब्रेशंस हैं। और बड़े मजे की बात है, अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि ये वाइब्रेशंस बिना किसी बाहरी, वास्तविक चीज के पैदा किए जा सकते हैं। जैसे आपके मस्तिष्क में एक इलेक्ट्रोड लगाया जा सकता है, एक बिजली का तार जोड़ा जा सकता है और जिस तरह सुंदर स्त्री को देख कर आपके मन के तंतु कंपते हैं, बिजली से कंपाए जा सकते हैं। और जब वे तंतु बिजली से कंपेंगे, आपको वही मजा आना शुरू हो जाएगा जो आपको सुंदर स्त्री को देख कर आएगा।
अभी एक वैज्ञानिक सॉल्टर ने चूहों के साथ बहुत से प्रयोग किए। उसका एक प्रयोग बहुत हैरानी का है। और कभी न कभी आदमी को उस प्रयोग से बहुत कुछ सीखना पड़ेगा। उसने एक प्रयोग किया कि चूहे को जब चूही मादा को देख कर सुख मिलना शुरू होता है, तो उसके मस्तिष्क में क्या होता है, कौन से कंपन होते हैं? चूहों के सारे कंपन उसने अध्ययन किए वर्षों तक। फिर उन कंपनों की सूक्ष्मतम विधि उसने खोज ली, फिर बिजली से उन कंपनों को पैदा करने का उपाय निर्मित कर लिया। फिर एक चूहे को इलेक्ट्रोड लगा दिया, न केवल इलेक्ट्रोड लगा दिया, बल्कि चूहे के पंजे के पास बिजली का बटन भी लगा दिया कि जब भी वह चाहे उन कंपनों को, बटन को दबा दे। भीतर उसके कंपन शुरू हो जाएं और उसे वही मजा आने लगे जो मादा के साथ संभोग में आता है।
आप जान कर हैरान होंगे कि चूहे ने फिर खाना-पीना बिलकुल छोड़ दिया। मादाएं आस-पास घूमती रहें, उनमें भी रस छोड़ दिया। फिर तो वह एक ही काम करता रहा, बटन को दबाना। चौबीस घंटे चूहा सोया नहीं। उसने हजारों दफे बटन दबाई, वह बिलकुल... जब तक बिलकुल थक कर चूर होकर गिर नहीं गया तब तक वह एक ही काम करता रहा, बटन दबाना। जैसे ही वह बटन दबाता, भीतर कंपन शुरू होते हैं, वे ही कंपन, जो उसको संभोग में होते हैं।
संभोग में पुरुष को... आपको भी क्या होता है, स्त्री को भी क्या होता है? कुछ वाइब्रेशंस, कुछ कंपन। उन कंपनों के सिवाय कुछ भी नहीं है। वे जो कंपन हैं, अगर बिजली के बटन से पैदा हो जाएं तो आपको पता लगेगा कि आप किस लोक में जी रहे हैं। वह चूहा ही बटन दबा कर जी रहा हो, ऐसा मत सोचना आप, आप भी उन्ही बटनों को दबा कर जी रहे हैं। बटन आपके प्राकृतिक हैं, चूहे के लिए कृत्रिम थे।
आज नहीं कल आदमी अपने लिए भी कृत्रिम बटन बना लेगा। और मैं मानता हूं कि जिस दिन आदमी ने अपने आंतरिक कंपनों को पैदा करने के लिए छोटे उपाय कर लिए, उस दिन स्त्री-पुरुष के बीच कोई रस नहीं रह जाएगा। क्योंकि तब आप ज्यादा बेहतर ढंग से उन्हीं कंपनों को पैदा कर सकते हैं। तब दूसरे पर निर्भर रहने की कोई जरुरत नहीं। अपने खीसे में एक छोटी सी बैटरी लिए आप चल सकते हैं। जब आपका मन हो, आप बटन दबा लें और भीतर आपके संभोग के कंपन शुरू हो जाएं। और जो बात बैटरी से हो सके, और ज्यादा सुगमता से हो सके और कभी भी हो सके, उसके लिए कौन पति-पत्नी का उपद्रव लेने जाता है!
सॉल्टर की खोज भविष्य के लिए बड़ी महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाली है। पर मैं आपसे इसलिए सॉल्टर की खोज की बात कर रहा हूं, ताकि आप महावीर को समझ सकें।महावीर कहते हैं: किस बचपन में उलझे हो? जो भी तुम अनुभव कर रहे हो सुख, वे सिर्फ छोटे से कंपन हैं। उन कंपनों का क्या मूल्य है? स्वप्नवत!
और आदमी जन्मों-जन्मों, जीवन-जीवन उन्हीं कंपनों में अपने को गवां देता है। उन्हीं में अपने को खो देता है। कोई स्वाद के लिए जीता है, कोई सुगंध के लिए जीता है, कोई रूप के लिए जीता है, कोई ध्वनि के लिए जीता है। लेकिन यह जीना क्या है? क्या हम कुछ कंपनों से तृप्त हो जाएंगे? होता तो यह है, जितना पुनरुक्त करते हैं इन कंपनों को, उतनी ऊब बढ़ती चली जाती है। फंसते भी जाते हैं, आदत भी बनती जाती है, ऊबते भी चले जाते हैं, कुछ मिलता भी नहीं मालूम पड़ता। और फिर भी एक मजबूरी, एक ऑब्सेशन, और हम वही करते चले जाते हैं, जिससे कुछ मिलता दिखाई नहीं पड़ता। धीरे-धीरे सब कंपन बोथले हो जाते हैं। फिर उनसे कुछ भी पैदा नहीं होता, लेकिन न उन कंपनों को करें, तो उदासी मालूम पड़ती है, खालीपन मालूम पड़ता है, एंप्टीनेस मालूम पड़ती है। इसलिए करना भी पड़ता है।
महावीर कहते हैं: जो व्यक्ति कंपनों में उलझा है, वह संसार में उलझा है। इन कंपनों से ऊपर उठे बिना कोई व्यक्ति आत्मा को उपलब्ध नहीं होता।
कैसे ऊपर उठेंगे?
तो वे कहते हैं: ‘शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श इन पांच प्रकार के काम गुणों को भिक्षु सदा के लिए त्याग दे।’
क्या करेंगे त्याग में आप? क्या पानी न पीएंगे? क्या भोजन न करेंगे? और जब पानी पीएंगे, भोजन करेंगे तो स्वाद आएगा। क्या आखें न खोलेंगे? रास्ते पर चलेंगे, आंख खोलनी पड़ेगी। आवाज होगी, कोई गीत गाएगा। कोई मधुर स्वर सुनाई पड़ेगा, कान सुनेंगे। त्याग कैसे करेंगे?
त्याग का एक ही गहन अर्थ है, और वह कि जब भी कोई चीज सुनाई पड़े, स्वाद में आए, दिखाई पड़े तो ध्यान को उससे तोड़ लेना, भीतर ध्यान को तोड़ लेना। आंखें चाहे देखें, तुम मत देखना। जीभ स्वाद ले, तुम स्वाद मत लेना।
जनक को किसी ने पूछा था, किसी संन्यासी ने: कि आप इस महल में, इन रानियों के बीच, इतने वैभव में रह कर किस प्रकार ज्ञानी हैं? तो जनक ने कहा: कुछ दिन रुको, समय पर उत्तर मिल जाएगा। और उत्तर समय पर ही मिल सकते हैं, समय के पहले दिए गए उत्तर किसी अर्थ के नहीं होते।
संन्यासी जनक के पास रुका--एक दिन, दो दिन, तीन दिन। चौथे दिन सुबह ही सुबह भोजन के लिए संन्यासी आ रहा था, जनक खुद बैठ कर उसे भोजन कराते थे। सिपाहियों की एक टुकड़ी आई, संन्यासी को घेर लिया और संन्यासी को कहा कि महाराज ने कहा है कि आज सांझ आपको सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।
उस संन्यासी ने कहा: लेकिन मेरा अपराध, मेरा कसूर?
सिपाहियों ने कहा: यह आप महाराज से ही पूछ लेना। हमें जितनी आज्ञा है, वह इतनी है।
फिर वे उसे लेकर भोजन के लिए आए, फिर वह भोजन के लिए थाली पर बैठा। महाराज बैठ कर पंखा झलते रहे। वह भोजन भी करता रहा। लेकिन उस दिन स्वाद नहीं आया। सांझ मौत थी, ध्यान हट गया।
भोजन के बाद जनक ने पूछा कि सब ठीक तो था! कोई कमी तो न थी!
उसने कहा: क्या ठीक था? क्या कमी न थी?
सम्राट ने पूछा कि रसोइए ने अभी-अभी खबर दी कि वह नमक डालना भूल गया आपको पता नहीं चला?
उस संन्यासी ने कहा: कुछ भी पता नहीं चला, भोजन किया भी या नहीं किया। यह भी ऐसा लगता है, जैसे कोई स्वप्न--सांझ मौत। पूछना चाहता हूं कि क्या है मेरा कसूर?
जनक ने कहा: कोई कसूर नहीं, न कोई मौत होने को है। इतना ही कहना था कि अगर मौत का स्मरण बना रहे तो इंद्रियां भोगों में रहकर भी दूर हट जाती हैं।
तब जीभ पर कंपन होते हैं, लेकिन स्वाद नहीं आता। तब कान पर कंपन होते हैं, लेकिन रस पैदा नहीं होता।
रस पैदा होता है कंपन और ध्यान के जोड़ से।
जीभ पर स्वाद आता है, कंपन पैदा होते हैं। आत्मा ध्यान भेजती है जीभ तक, दोनों का जोड़ होता है, तब रस पैदा होता है।
आंख देखती है रूप को, कंपन होते हैं। भीतर से आत्मा ध्यान को भेजती है, कंपन और ध्यान का मिलन होता है, तब सौंदर्य का बोध होता है। तब रस पैदा होता है।
रस दो चीजों का जोड़ है--बाहर से आए कंपन और भीतर से आए ध्यान। ध्यान + कंपन = रस। अगर ध्यान हट जाए कंपन से तो रस विलीन हो जाता है। इसी को महावीर ने त्याग कहा है। यह त्याग अत्यंत भीतरी घटना है। इस त्याग के दो रूप हैं। जो व्यर्थ के कंपन हों उन्हें छोड़ ही देना उचित है। जो अनिवार्य कंपन हों उनसे ध्यान को अलग कर लेना चाहिए। जो अनिवार्य कंपन हों उनसे ध्यान तोड़ लेना, जो गैर-अनिवार्य कंपन हों उन कंपनों का त्याग कर देना। तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे इंद्रियां अलग और आत्मा अलग हो जाती है। जब सब जगह से ध्यान का रस विलीन हो जाता है तो हमें पता चलता है कि शरीर अलग और मैं अलग हूं। हमें पता नहीं चलता, शरीर अलग और मैं अलग हूं, उसका एक ही कारण है कि हमारा ध्यान निरंतर ही बाहर से आए हुए कंपनों से जुड़ जाता है। उस जोड़ के कारण ही हम शरीर से जुड़े हैं। वह जोड़ टूट जाए, हम शरीर से टूट जाते हैं।
आत्म अनुभव रस परित्याग के बिना संभव नहीं है।
‘देव लोक सहित समस्त संसार के शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुख का मूल काम-भोगों की वासना है। जो साधक इस संबंध में वीतराग हो जाता है वह शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के दुखों से छूट जाता है।’
हमारा जानना कुछ और है, हमारा जानना यह है कि समस्त सुखों का मूल इंद्रियों का आनंद है। आपने कोई ऐसा सुख जाना है जो इंद्रियों के अतिरिक्त जाना हो? नहीं जाना होगा। सभी सुखों के मूल में इंद्रियां मालूम पड़ती हैं। कभी भोजन में कुछ आनंद आ जाता है, कभी आंख देख लेती है किसी दृश्य को--जरूरी नहीं है कि वह दृश्य स्त्री-पुरुष का हो, वह कश्मीर का हो, डल झील का हो--इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आंख देख लेती है किसी झील को, आंख देख लेती है किसी चांद को, रस आ जाता है, सुख आ जाता है।
आपने कभी कोई ऐसा सुख जाना है, जो इंद्रियों के बिना आपको आया हो? अगर वैसे सुख का आपको अनुभव हो जाए, तो उसी को महावीर ने आनंद कहा है। लेकिन हमारा कोई ऐसा अनुभव नहीं है। पर महावीर कहते हैं: समस्त दुखों का मूल वासना है, और हम सोचते हैं समस्त सुखों का आधार। तो थोड़ा सोचना पड़े।
आपने कोई ऐसा दुख जाना है जो इंद्रियों के बिना आपको मिला हो? न आपने ऐसा कोई सुख जाना है, जो इंद्रियों के बिना मिला हो; न ऐसा कोई दुख जाना है, जो इंद्रियों के बिना मिला हो। महावीर कहते हैं कि इंद्रियों के बिना भी एक सुख मिल सकता है जिसका नाम आनंद है। इंद्रियों के बिना कोई दुख नहीं मिल सकता, इसलिए उसका कोई नाम नहीं है। आनंद के विपरीत कोई नाम नहीं है।
इसलिए महावीर कहते हैं कि इंद्रियों का सुख भ्रांति है, इंद्रियों का दुख ही वास्तविकता है। फिर जिसे हम सुख कहते हैं, उसके कारण ही हमें दुख मिलता है। आज स्वाद में सुख मिलता है, तो क्या होगा इसका परिणाम? इसके दो परिणाम होंगे। अगर यह स्वाद कल न मिले तो दुख मिलेगा। अगर यह स्वाद कल भी मिले, परसों भी मिले, तो भी दुख मिलेगा। स्वाद न मिले, तो पीड़ा अनुभव होगी न पाने की। स्वाद मिलता रहे, तो बोथला हो जाएगा, ऊब पैदा हो जाएगी। इसलिए जिनको रोज अच्छा भोजन मिलता है उनका स्वाद खो जाता है, उनको फिर स्वाद नहीं आता। जिनको अच्छे बिस्तर पर रोज सोने को मिलता है, उन्हें फिर बिस्तर का पता चलना बंद हो जाता है।
जो भी आपके पास है, उसका आपको पता नहीं चलता। तो सुख अगर मिलता रहे तो विलीन हो जाता है। न मिले तो दुख देता है। सुख हर हालत में दुख देता है। मिले तो, न मिले तो। जिसे हम सुख कहते हैं, वह दुख के लिए एक द्वार ही है, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। जो सुख की तरफ आकर्षित हुआ वह दुख में गिरेगा।
दुख दो तरह के हो सकते हैं--मिलने का दुख हो सकता है, न मिलने का दुख हो सकता है। ज्यादा से ज्यादा हम दुख बदल सकते हैं। इससे ज्यादा संसार में कोई उपाय नहीं है। एक दुख को छोड़ कर दूसरे दुख पर जा सकते हैं। एक दुख को छोड़ कर दूसरे दुख पर जाने में बीच में थोड़ा अंतराल पड़ता है उसे ही लोक सुख कहते हैं। जितनी देर को वे दुख में नहीं होते, उतनी देर को सुख कहते हैं। हमारा सुख नकारात्मक है, निगेटिव है।
इसलिए महावीर कहते हैं: समस्त दुखों का मूल इंद्रियां हैं। जब तक यह हमें दिखाई न पड़ जाए, तब तक हम इंद्रियों से ऊपर उठने की चेष्टा में भी संलग्न न होंगे। अगर हमें यही दिखाई पड़ता रहे, कि समस्त सुखों का मूल इंद्रियां हैं, तो स्वभावतः हम अपने संसार को फैलाए चले जाएंगे।
पुनर्जन्म का एक ही मूल कारण है कि इंद्रियां सुख का आधार हैं। मोक्ष का एक ही कारण है कि इंद्रियां दुख का आधार हैं।
तो हम अपने सुख की थोड़ी तलाश करें। जब भी आपको सुख मिले, आप थोड़ी खोज करना। पहले तो यह देखना कि यह सुख क्या है! जैसे ही आप देखेंगे, निन्यानबे प्रतिशत सुख तिरोहित हो जाएगा। जिसे आप प्रेम करते हैं, उसका हाथ आपके हाथ में आ गया, तो फिर आंख बंद करके जरा ध्यान करना कि क्या सुख मिल रहा है, तब सिर्फ हाथ-हाथ में रह जाएगा। और थोड़ा ध्यान करेंगे तो वजन हाथ में रह जाएगा। और थोड़ा ध्यान करेगें तो सिर्फ पसीना हाथ में छूट जाएगा।
कौन सा सुख मिल रहा था, उसको जरा गौर से देखना। जब मुंह में भोजन डाला हो और रस आ रहा हो, स्वाद मालूम पड़ रहा हो तब जरा आंख भी बंद कर लेना और उस पर ध्यान करना कि कौन सा सुख मिल रहा है। निन्यानबे प्रतिशत सुख तत्काल तिरोहित हो जाएगा। थोड़ी देर में आप पाएंगे कि मुंह सिर्फ एक यांत्रिक काम कर रहा है चबाने का। जीभ एक यांत्रिक काम कर रही है खबर देने का कि कौन सा भोजन ले जाने योग्य है, कौन सा भोजन नहीं ले जाने योग्य है। स्वाद का उतना जीवन के लिए उपयोग है कि कहीं जहर न खा लिया जाए, कि कहीं कड़वी चीज न खा ली जाए, कहीं कुछ व्यर्थ भीतर न चला जाए। उतना तो अस्तित्वगत उपयोग है। उतनी ही जीभ की खबर है। जीभ सचेतन रूप से उतनी खबर देती रहेगी। कान खबर दे रहे हैं, आंखें खबर दे रही हैं। ये जीवन के सरवाइवल मेजर्स हैं, बचने के उपाय हैं। इससे ज्यादा मूल्य खतरनाक हैं। सुख ज्यादा मूल्य देने की बात है।
इसे ठीक से जो आदमी खोज करेगा अपने भीतर, वह पाएगा कि जब सुख होता है तब कुछ होता नहीं, सिर्फ खयाल होता है, सिर्फ कल्पना होती है। सिर्फ माना हुआ खयाल होता है--सिर्फ माना हुआ, एक सम्मोहित खयाल होता है।
आपको कोई एक चमकदार पत्थर लाकर दे दे और कहे कि बहुमूल्य हीरा है। और आपको भरोसा हो जाए उस आदमी का या उस आदमी पर आपको भरोसा रहा हो, तो उस रात... उस रात आप सो न सकेंगे, इतने सुख से भर जाएंगे। सुबह पता चले कि वह पत्थर का ही टुकड़ा है, हीरा नहीं है, सिर्फ कांच है चमकता हुआ, सब सुख तिरोहित हो जाएगा। रात जो सुख आपने लिया वह हीरे के कारण नहीं था क्योंकि हीरा तो वहां था नहीं। आपकी मान्यता के कारण था। आपका प्रोजेक्शन था, आपका प्रक्षेपण था। आपने एक धारणा हीरे पर फैला ली, वह आपको सुख दे गई। जिस स्त्री में आपको सौंदर्य दिखता है, जिस पुरुष में सौंदर्य दिखता है, जहां आपको रस दिखता है, वह आपकी फैली हुई धारणा है। उस धारणा के कारण ही सारा उपद्रव है।
इस धारणा को ही ठीक से देख ले कोई व्यक्ति तो सुख तिरोहित हो जाता है। और तब दुख का एक सागर दिखाई पड़ता है। तब वास्तविकता दिखाई पड़ती है सुख की छाया के नीचे छिपी हुई, कि हम सिर्फ दुख झेल रहे हैं। अनेक-अनेक प्रकार के दुख झेल रहे हैं, अभाव के, भाव के; होने के, न होने के; गरीबी के, समृद्धि के; यश के, अपयश के; न मालूम कितने दुख झेल रहे हैं!
इतना दुख का यह उदघाटन... पश्चिम में लोगों को लगा कि ये महावीर, ये बुद्ध, से सब दुखवादी हैं। ये क्यों इतना दुख को उघाड़ते हैं? क्यों घाव को उघाड़ते हैं? अच्छा हो कि घाव हो तो पलस्तर करके ढांक देना चाहिए। गंदी नाली हो तो थोड़ी सी सुगंध ऊपर छिड़क कर फूल लगा देना चाहिए।
ये क्यों सारे घावों को उघाड़ कर भीतर की पीड़ा को, भीतर की दुर्गंध को बाहर लाना चाहते हैं? ये बड़े खतरनाक लोग मालूम पड़ते हैं। ये तो जीवन को नष्ट कर देंगे, ये तो जीवन के प्रति एक विरक्ति, जीवन के प्रति एक अलगाव पैदा कर देंगे।
लेकिन नहीं, महावीर और बुद्ध का वैसा प्रयोजन नहीं है। वे चाहते हैं कि जो सत्य है वह दिखाई पड़ जाए। जीवन की जो भ्रांति है वह टूट जाए, तो शायद हम किसी और गहरे जीवन की खोज में जा सकें। वह जो हमने ढांक-ढांक कर एक झूठा जीवन बना रखा है उसकी पर्त-पर्त उखड़ जानी चाहिए। वे जो हमने झूठे मुखौटे लगा रखे हैं, वे जो हमने झूठी धारणाएं अपने चारों तरफ फैला रखी हैं, वे सब गिर जानी चाहिए। वे गिर जाएं तो शायद हमारी जीवन-ऊर्जा व्यर्थ कामों में संलग्न न रहे और सार्थक की खोज पर निकल जाए।
इसलिए महावीर कहते हैं कि ‘जो मनुष्य इस प्रकार दुष्कर ब्रह्मचर्य का पालन करता है, इंद्रियों से अपने को खींच लेता है भीतर, तोड़ देता है रस, उसे देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर सभी नमस्कार करते हैं।’
महावीर और बुद्ध पहले व्यक्ति हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में--और निश्चित ही महावीर पहले, क्योंकि बद्ध महावीर से थोड़े बाद में पैदा हुए--महावीर पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा कि एक ऐसा क्षण भी है मनुष्य की चेतना का, जब देवता भी उसे नमस्कार करते हैं, नहीं तो दुनिया के सारे धर्म मानते हैं कि मनुष्य सदा देवताओं को नमस्कार करता है।
देवता मनुष्य को नमस्कार करते हैं, इससे ज्यादा मनुष्य के प्रति महिमा की बात और कुछ और नहीं हो सकती। महावीर ने कहा है कि ऐसा भी क्षण है मनुष्य के जीवन में, जब देवता उसे नमस्कार करते हैं। इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ कि देवता भ्रांति में हैं। चेतना जब पूरी जागती है मनुष्य की और सुख का भ्रम टूट जाता है, तो स्वर्ग का भ्रम भी टूट जाता है। देवता स्वर्ग के वासी हैं। उसका अर्थ है: सुख के वासी हैं। देवता इंद्रियों में ही जीते हैं। बड़ा मजा है! इसीलिए हमने इंद्र नाम दिया है देवताओं के सम्राट को। वह इंद्रियां ही इंद्रियां है। इसलिए इंद्र है। देवता सुख में ही जीते हैं। देवता का अर्थ है: जो सुख में ही जी रहा है। लेकिन इसका तो मतलब यह हुआ महावीर के हिसाब से कि जो इंद्रियों में और सुख में जी रहा है, वह बड़ी गहन भ्रांति में जी रहा है। वह एक लंबे स्वप्न में डूबा है। वह स्वप्न सुखद होगा, प्रीतिकर होगा, दुखद न होगा, लेकिन एक लंबा स्वप्न है। अगर महावीर को हम ठीक से समझें तो नरक, एक नाइट मेयर है; एक दुख स्वप्न, लंबा दुख स्वप्न है। स्वर्ग एक सुख स्वप्न है, एक अच्छा सपना है, लंबा।
इसलिए महावीर ने कहा है कि देवता को भी मोक्ष पाना हो, तो उसे वापस मनुष्य के जन्म में आ जाना पड़ता है। मनुष्य चौराहा है। देवता को भी मोक्ष पाना हो तो मनुष्य तक वापस लौट आना पड़ता है। मनुष्य के अतिरिक्त मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन जरूरी नहीं है कि कोई मनुष्य होने से ही मुक्त हो जाए। मनुष्य होने से केवल मुक्ति की संभावना है, लेकिन अगर आप भी स्वप्न में डूबे रहते हैं तो आप उस अवसर को खो देते हैं।
मनुष्य का अर्थ है: जहां हम जाग सकते हैं, जहां हम चाहें तो इंद्रियों से अपने को तोड़ ले सकते हैं, जहां हम चाहें तो रस समाप्त हो सकता है और चेतना रसमुक्त हो सकती है। इस स्थिति को महावीर ने वीतराग कहा है। चेतना जब ऐसी स्थिति में होती है तो उसका बाहर कोई भी रस नहीं है, कोई भी। बाहर जाने की कोई आकांक्षा शेष न रही। किसी से भी कुछ मिल सकता है, यह भाव गिर गया। कहीं से कोई मांगना न रहा, कोई प्रार्थना न रही, कोई अभीप्सा न रही। इस चेतना की अवस्था को महावीर कहते हैं: वीतराग।
‘जो वीतराग है वह शारीरिक और मानसिक सभी दुखों से छूट जाता है।’
‘यह ब्रह्मचर्य धर्म ध्रुव है, नित्य है, शाश्र्वत है और जिनोपदिष्ट है।’
यह शब्द ‘जिनोपदिष्ट’ थोड़ा समझ लेने जैसा है।
हिंदू कहते हैं, वेद ईश्र्वर के वचन हैं, इसलिए सत्य हैं। मुसलमान कहते हैं कि कुरान ईश्र्वर का संदेश है, इसलिए सत्य है। ईसाई कहते हैं कि बाइबिल ईश्र्वर के निजी संदेशवाहक, उनके अपने बेटे जीसस के वचन हैं, ईश्र्वर से आया हुआ संदेश है आदमी के लिए, इसलिए सत्य है।
महावीर एकदम अशास्त्रीय हैं। वे किसी शास्त्र को प्रमाण नहीं मानते। वे वेद को प्रमाण नहीं मानते। इसलिए हिंदुओं ने तो महावीर को नास्तिक कहा। क्योंकि जो वेद को न माने, वह नास्तिक।
महावीर जैसे परम आस्तिक को भी नास्तिक कहना पड़ा, क्योंकि वेद के प्रति उनकी कोई श्रद्धा नहीं है, शास्त्र के प्रति उनकी कोई श्रद्धा नहीं है। उनकी श्रद्धा अजीब है, अनूठी है। उनकी श्रद्धा उस आदमी में है, जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो--उसके वचन में।
जिनोपदिष्ट का अर्थ होता है, उस आदमी का वचन जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है। कोई परमात्मा नहीं, कोई ऊपरी शक्ति नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की शक्ति ही परम प्रमाण है जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है। इसलिए महावीर कहते हैं: जिनोपदिष्ट--जिसने अपने को जीता हो। जिन का अर्थ होता है: जिसने अपने को जीता हो। जिसकी सारी इंद्रियों की गुलामी टूट गई हो, जो अपने भीतर स्वतंत्र हो गया हो, जो अपने भीतर मुक्त हो गया हो; इस व्यक्ति के वचन का मूल्य है। देवताओं के वचन का, महावीर कहते हैं: कोई मूल्य नहीं, क्योंकि वे अभी वासना से ग्रस्त हैं।
अगर हम वेद के देवताओं को देखें, तो इंद्र को आप फुसला ले सकते हैं, जरा सी खुशामद और स्तुति से। राजी कर ले सकते हैं, जो भी आपको करवाना हो। नाराज भी हो सकता है इंद्र अगर आप ठीक-ठीक प्रार्थना, उपासना न करें नियम से, आदर, स्तुति न करें तो इंद्र नाराज भी हो सकता है। अगर हम यहूदी ईश्र्वर को देखें, तो वह खतरनाक बातें कहता हुआ मालूम पड़ता है कि अगर मुझे नहीं माना तो मैं तुम्हें नष्ट कर दूंगा। आग में जलाऊंगा, सड़ाऊंगा।
महावीर कहते हैं कि इन वचनों का क्या मूल्य हो सकता है! वे कहते हैं: वही चेतना परम शास्त्र है, जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो। उसकी बात भरोसे योग्य है।
क्यों?
जो अभी इंद्रियों के धोखे में पड़ता है, उसकी बात का भरोसा कुछ भी नहीं। जो अभी इंद्रियों के सपने से नहीं जाग सका, उसकी बात का कुछ भी भरोसा नहीं है। महावीर को ज्ञात है, उस समय जो भी देवताओं की चारों तरफ चर्चा थी, उनमें महावीर को कोई भी देवता स्तुति के योग्य नहीं लगा। क्योंकि बड़ी अजीब कहानियां हैं।
कहानी है कि ब्रह्मा ने पृथ्वी को बनाया, अर्थात पृथ्वी ब्रह्मा की बेटी हुई, और बेटी को देख कर ब्रह्मा एकदम कामातुर हो गए तो बेटी के पीछे कामातुर होकर भागे। बेटी घबड़ा गई तो वह गाय बन गई, तो ब्रह्मा बैल हो गए और गाय के पीछे भागे। महावीर को बड़ी कठिनाई मालूम पड़ेगी कि ऐसे ब्रह्मा के वचन का क्या मूल्य हो सकता है! यह तो साधारण पिता भी अपने को रोकता है, ब्रह्मा न रोक सके! कहानी में मूल्य तो बहुत है, पर मूल्य मनोवैज्ञानिक है।
फ्रायड ने कहा है कि हर पिता के मन में अपनी जवान बेटी को भोगने की कामना कहीं न कहीं सरक उठती है। क्योंकि जवान बेटी को देख कर फिर एक बार उसको अपनी पत्नी जब जवान थी, उसका स्मरण सघन हो आता है।
यह कहानी तो बड़ी मनोवैज्ञानिक है कि अगर ब्रह्मा ने अपनी बेटी को पैदा किया और वह इतनी सुंदर थी कि ब्रह्मा खुद आकर्षित हो गए, तो यह बात तो बताती है कि बाप भी बेटी के प्रति कामातुर हो सकता है--ब्रह्मा तक हो गए! लेकिन महावीर के लिए इसमें दूसरी सूचना है। वह सूचना यह है कि जो देवता कामातुर हैं, उनकी स्तुति का कोई भी अर्थ न रहा। इसलिए महावीर बड़े हिम्मतवर आदमी हैं। वे कहते हैं: जब कोई व्यक्ति इस वीतरागता को उपलब्ध होता है, तो देवता उसके चरणों में सिर रख देते हैं। यही बात कष्टपूर्ण भी लगी हिंदू मन को। क्योंकि कहानियां हैं कि जब महावीर ज्ञान को उपब्लध हुए तो इंद्र और ब्रह्मा सब उनके चरणों में सिर रख दिए। यह बहुत कठिन मालूम पड़ती है... यह बात कठिन मालूम पड़ती है।
बुद्ध जब ज्ञान को उपब्लध हुए तो सारा देवलोक उतरा और चारों तरफ उनके चरणों में साष्टांग लेट गया।
हिंदू मन को चोट लगी कि जिन देवताओं की हम पूजा करते, प्रार्थना करते, वे इस गौतम बुद्ध के सामने या इस वर्द्धमान महावीर के सामने आकर चरणों में सिर रख दिए! यह बात ही अपवित्र मालूम पड़ती है। लेकिन महावीर और बुद्ध को हम समझें तो इस बात की बड़ी महिमा है। मनुष्य को पहली दफा देवताओं के ऊपर रखने का प्रयास--बड़ा गहन प्रयास है। मनुष्य को पहली दफा वासना के परम छुटकारे की तरफ इशारा है।
महावीर कहते हैं: देवता भी तुम हो जाओ, स्वर्ग भी तुम्हारे हाथ में आ जाए और अगर इंद्रियां तुम्हारी, तुम्हारे नियंत्रण में नहीं, और तुम उनके मालिक नहीं हो, तो तुम गुलाम हो, कीड़े-मकोड़ों जैसे ही गुलाम हो। कीड़ा-मकोड़ा भी क्यों कीड़ा-मकोड़ा है? क्योंकि इंद्रियों का गुलाम है। और देवता भी कीड़ा-मकोड़ा है, क्योंकि वह भी इंद्रियों का गुलाम है।
आदमी जाग सकता है। क्यों? देवता क्यों नहीं जाग सकता? सुख में जागना बहुत मुश्किल है। दुख में जागना आसान है। सुख में नींद सघन हो जाती है, दुख में नींद टूट जाती है। पीड़ा हो तो निखारती है, सुख हो, सब धुंधला-धुंधला कर जाता है। सुख में जंग लग जाती है।
दुख में आदमी प्रखर होता है।
इसलिए बहुत मजे की बात है, सुखी परिवारों में कभी प्रखर चेतनाएं मुश्किल से पैदा हो पाती हैं। प्रखर बुद्धि, प्रखर प्रतिभा, अगर सब सुख हो तो क्षीण हो जाती मालूम पड़ती है। जंग लग जाती है। कुछ करने जैसा नहीं लगता। रॉकफेलर के घर में लड़का पैदा हो, तो सब पहले से ही मौजूद होता है, कुछ करने जैसा नहीं मालूम पड़ता। पाने को कुछ दिखाई नहीं पड़ता। जब तक कि रॉकफेलर के लड़के में बुद्ध या महावीर की चेतना न हो कि इस संसार में पाने योग्य कुछ नहीं, तो चलो दूसरे संसार को पाने निकल पड़ें। जब इस संसार में कुछ पाने योग्य नहीं लगता तो आप बैठ जाते हैं मुर्दे की तरह, आपकी सब चेतना बैठ जाती है।
दुनिया में अधिकतम प्रतिभाएं संघर्षशील घरों से आती हैं, दुख से आती हैं। दुख निखारता है, उत्तेजित करता है, चुनौती देता है। देवता सो जाएंगे, क्योंकि वहां सुख ही सुख है--कल्पवृक्ष, सुख, अप्सराएं, सब यौवन, सब सुगंध।
इंद्रियों की जो वासना है, वह परिपूर्ण रूप से तृप्त हो, ऐसी स्वर्ग की हमारी धारणा है। इंद्रियों की कोई वासना तृप्त न हो, दुख ही दुख भर जाए, ऐसी हमारी नरक की धारणा है। लेकिन महावीर अगर यह कहते हैं कि दुख में आदमी जागता है इसलिए मनुष्य देवता के भी पार जा सकता है तब तो नरक में और भी जाग जाना चाहिए। क्योंकि नरक में और भी सघन दुख है।
लेकिन एक बड़ी गहरी बात है। अगर पूरा-पूरा सुख हो, तो भी आदमी नहीं जाग पाता। अगर एकदम दुख ही दुख हो, तो भी आदमी नहीं जाग पाता। क्योंकि दुख ही दुख हो तो भी चेतना दब जाती है। जहां सुख और दुख दोनों के अनुभव होते हैं वहां चेतना सदा जगी रहती है। सुख ही सुख हो तो भी सो जाता है मन, दुख ही दुख हो तो भी सो जाता है मन। संघर्ष तो पैदा होता है जहां दोनों हों, तुलना हो, चुनाव हो।
एक बड़े मजे की बात है, मनुष्य के इतिहास से भी साबित होती है। जब तक कोई समाज बिलकुल ही गरीब रहता है तब तक बगावत नहीं करता। हजारों साल से दुनिया गरीब है, लेकिन बगावत नहीं होती थी। शायद हम सोचते होंगे कि इसलिए बगावत नहीं होती थी कि लोग बड़े सुखी थे। नहीं, सुख का कोई अनुभव ही नहीं था। दुख शाश्र्वत था। बगावत नहीं होती थी। अब बगावत सारी दुनिया में हो रही है। और बगावत वहीं होती है जहां आदमी को दोनों अनुभव शुरू हो जाते हैं--सुख के भी और दुख के भी। तब वह और सुख पाना चाहता है, तब वह पूरा सुख पाना चाहता है, तब वह बगावत करता है।
दुखी आदमी, बिलकुल दुखी आदमी बगावत नहीं करता। ऐसा दुखी आदमी बगावत करता है जिसे सुख की आशा मालूम पड़ने लगती है। नहीं तो बगावत नहीं होती। दुनिया में जितने बगावती स्वर पैदा हुए हैं, वे सब मध्य-वर्ग से आते हैं--चाहे मार्क्स हो, और चाहे एंजिल्स हो और चाहे लेनिन हो और चाहे माओ हो, चाहे स्टैलिन हो, ये सब मध्यवर्गीय बेटे हैं।
मध्य-वर्ग का मतलब है जो दुख भी जानता है और सुख भी जानता है। जिसकी एक टांग गरीबी में उलझी है और एक हाथ अमीरी तक पहुंच गया है। मध्य-वर्ग का अर्थ है: जो दोनों के बीच में अटका है। जो जानता है कि एक धक्का लगे तो मैं अभी गरीब हो जाऊं, और अगर एक मौका लग जाए तो अभी मैं अमीर हो जाऊं। जो बीच में है। यह बीच का आदमी बगावत का खयाल देता है दुनिया को। क्योंकि यह खयाल देता है, सुख मिल सकता है। सुख पाया जा सकता है। इसके हाथ के भीतर मालूम पड़ता है। मिल न गया हो लेकिन संभावना निकट मालूम पड़ती है। थोड़ा और यह लंबा हो जाए तो सुख मिल जाए। और दुख भी इससे छूटता मालूम पड़ता है। अगर थोड़ी हिम्मत जुटा ले तो दुख छूट जाए। करीब-करीब मनुष्य स्वर्ग और नरक के बीच में मध्यवर्गीय है। देवता हैं ऊपर, नारकीय हैं नीचे, बीच में है मनुष्य। मनुष्य का एक पैर तो नरक में खड़ा ही रहता है पूरे वक्त दुख में, और एक हाथ सुख को छूता रहता है।
इसलिए महावीर कहते हैं कि मनुष्य संक्रमण, ट्रांजिटरी अवस्था है। और जहां संक्रमण है वहां क्रांति हो सकती है। जहां संक्रमण है वहां बदलाहट हो सकती है। नीचे है नरक, ऊपर है स्वर्ग, बीच में है मनुष्य। मनुष्य चाहे तो नरक में गिरे, चाहे तो स्वर्ग में और चाहे तो दोनों से छूट जाए। नरक का पैर भी बाहर खींच ले, स्वर्ग का हाथ भी नीचे खींच ले। यह जो बीच में आदमी खड़ा हो जाए--महावीर कहते हैं, इस आदमी के देवता भी चरणों में गिर जाते हैं। लेकिन कब आप नरक का पैर खींच पाएंगे?
महावीर कहते हैं: जब तक तुम्हारा एक हाथ स्वर्ग को पकड़ता है, तब तक तुम्हारा एक पैर नरक में रहेगा। वह स्वर्ग पकड़ने की चेष्टा से ही नरक पैदा हो रहा है। सुख पाने की आकांक्षा दुख बन रही है। स्वर्ग की अभीप्सा नरक का कारण बन रही है। जब तुम एक हाथ स्वर्ग से नीचे खींच लोगे, तुम अचानक पाओगे, तुम्हारा नीचे का पैर भी नरक से मुक्त हो गया। वह उस बढ़े हुए हाथ का ही दूसरा अंग था।
और जब आदमी न स्वर्ग, न नरक ... महावीर ने कहा है: स्वर्ग मत चाहना। क्योंकि स्वर्ग की चाहना नरक की ही चाहना है। इसलिए महावीर ने एक नया शब्द गढ़ा। हिंदू-विचार में उसके लिए पहले कोई जगह न थी। हिंदू-विचार स्वर्ग और नरक में सोचता था। महावीर ने एक नया शब्द दिया ‘मोक्ष।’ मोक्ष का अर्थ है: न स्वर्ग, न नरक; दोनों से छुटकारा।
अगर हम वैदिक ऋषियों की प्रार्थना देखें, तो वे प्रार्थना कर रहे हैं स्वर्ग की, सुख की। महावीर की अगर हम धारणा समझें, तो वे स्वर्ग की और सुख की कामना नहीं कर रहे हैं। क्योंकि महावीर कहते हैं: सुख और स्वर्ग की कामना ही तो दुख और नरक का आधार है। महावीर कहते हैं: मैं सुख और दुख से कैसे मुक्त हो जाऊं। वैदिक ऋषि गाता है कि मैं कैसे दुख से मुक्त हो जाऊं और सुख को पा लूं। महावीर कहते हैं: मैं कैसे सुख और दुख दोनों से मुक्त हो जाऊं? यह बड़ी गहन मनोवैज्ञानिक खोज है। यह अन्वेषण गहरा है।
महावीर मोक्ष की बात करते हैं। बुद्ध निर्वाण की बात करते हैं। यह बात द्वंद्व के बाहर ले जाने वाली बात है, कैसे दोनों के पार हो जाऊं।यह जो ब्रह्मचर्य है, यह जो यात्रा-पथ है, दोनों के बाहर हो जाने का; यह जो ऊर्जा को भीतर ले जाना है, ताकि सुख और दुख--बाहर हैं दोनों, उनसे छुटकारा हो जाए, यह ध्रुव है, नित्य है, शाश्र्वत है, जिनोपदिष्ट है।
‘इसके द्वारा पूर्वकाल में अनेक जीव सिद्ध हो गए, वर्तमान में हो रहे हैं, महावीर कहते हैं, और भविष्य में होंगे।’
यह शाश्र्वत है मार्ग। इस विधि से पहले भी लोग जागे, जिन हुए। महावीर कहते हैं: आज भी हो रहे हैं। और महावीर कहते हैं: भविष्य में भी होते रहेंगे। यह मार्ग सदा ही सहयोगी रहेगा।
लेकिन हम बड़े अदभुत लोग हैं। महावीर के साधु-संन्यासी भी लोगों को समझाते हैं कि यह पंचमकाल है, इसमें कोई मुक्त नहीं हो सकता! जैसा हिंदू मानते हैं, कलिकाल है, कलियुग है, ऐसा जैन मानते है, पंचमकाल है। इसमें कोई मुक्त नहीं हो सकता! इससे हमको राहत भी मिलती है कि जब कोई हो ही नहीं सकता, तो हम भी अगर न हुए तो कोई हर्ज नहीं है। इससे साधु-संन्यासियों को भी सुख रहता है, क्योंकि आप उनसे भी नहीं पूछ सकते कि आप मुक्त हुए! पंचमकाल है, कोई मुक्त नहीं हो सकता।
महावीर की ऐसी दृष्टि हो नहीं सकती। क्योंकि महावीर कहते हैं: चेतना कभी भी मुक्त हो सकती है। समय कोई बंधन नहीं है। इसलिए वे कहते हैं: यह मार्ग शाश्र्वत है। पीछे भी लोग मुक्त हुए, आज भी हो रहे हैं, महावीर कहते हैं: और भविष्य में भी होते रहेंगे। जो भी इस मार्ग पर जाएगा वह मुक्त हो जाएगा। इस मार्ग पर जाने की जो कुंजी है, जो सीक्रेट की है, वह इतनी ही है कि हम सुख और दुख दोनों को छोड़ने को राजी हो जाएं। इंद्रियां जो हमें संवाद देती हैं उनके साथ हमारा ध्यान जुड़ कर रस का निर्माण न करे। यह रस बिखर जाए भीतर तो शरीर और आत्मा अलग-अलग हो जाते हैं। सेतु गिर जाता है, संबंध टूट जाता है।
और जिस दिन हम जान लेते हैं कि मैं अलग हूं, इस शरीर से; ध्यान अलग है, इंद्रियों से; चेतना अलग है, पार्थिव आवरण से; उसी दिन नरक और स्वर्ग दोनों विलीन हो जाते हैं। वे दोनों स्वप्न थे। उस दिन हम पहली बार अपने भीतर छिप
ी हुई आत्यंतिक स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं। महावीर इस अवस्था को सिद्ध अवस्था कहते हैं।
सिद्ध का अर्थ है--वह चेतना जो अपनी संभावना की परिपूर्णता को उपलब्ध हो गई। जो हो सकती थी, हो गई। जो खिल सकता था फूल, पूरा खिल गया। इसकी कोई निर्भरता बाहर न रही। यह सब भांति स्वतंत्र हो गई। इसका सारा आनंद अब भीतर से आता है। आंतरिक निर्झर बन गया है। अब इसका कोई आनंद बाहर से नहीं आता, और जिसका कोई आनंद बाहर से नहीं आता उसके लिए कोई भी दुख नहीं है।
आज इतना ही।
पांच मिनट रुकें, फिर जाएं...!