दो-तीन बातें हैं। एक तो राग-द्वेष से हलके होने में हमने यह मान लिया कि राग-द्वेष से हम भारी हैं। कल भी रात मैंने वह कहा, सुबह भी वह मैंने कहा। यह बिलकुल भ्रांति है। और इसको मान कर अगर आप मिटाने चलिएगा, तो आप कभी नहीं मिटा पाएंगे। तो मेरा कहना यह नहीं है कि राग-द्वेष से कैसे हलके हों। मेरा कहना यह है कि पहले यह जानें कि राग-द्वेष और आप एक हैं या दो हैं? बस इसकी खोज करें, इसका पूरा विश्लेषण करें अपने मन में कि राग और मैं एक हूं कि अलग-अलग हूं? और जितना आपको साफ होता चला जाएगा कि मैं अलग हूं--राग वह रहा, द्वेष वह रहा, मैं यह रहा--जितना यह भाव गहरा होगा, राग-द्वेष क्षीण होते चले जाएंगे। जिस दिन यह बात पूरी स्पष्ट हो जाएगी कि मैं सबसे पृथक हूं--न कोई राग है, न कोई द्वेष है--उस दिन आप बाहर हो गए। यानी सच में तो कोई राग-द्वेष के भीतर नहीं है, जो बात मैं कहना चाहता हूं। और उसको मान लिया कि हम राग-द्वेष में हैं! फिर बड़ी कठिनाई हो गई। फिर उससे निकलने का उपाय करना पड़ेगा। इसका साक्षीभाव भर एकमात्र उपाय है। राग के भी साक्षी बनिए, द्वेष के भी साक्षी बनिए। सिर्फ साक्षी बनिए। बचने की कोशिश मत करिए, न भागने की कोशिश करिए। जब राग आए, तब साक्षी बनिए कि राग आया, मैं देख रहा हूं कि राग आया--मैं यह अलग हूं, राग यह रहा। जब द्वेष आए, तो देखिए कि द्वेष आया--यह द्वेष आ रहा है, मैं अलग हूं। ऐसे ही जैसे अंधेरा आता है तो देखते हैं हम, उजाला आता है तो देखते हैं हम। अभी यहां उजाला है। बैठे रहें, सांझ होगी, अंधेरा आ जाएगा। तब हम यह नहीं कहेंगे कि मैं अंधेरा हो गया। तब हम कहेंगे, अब अंधेरा आ गया। फिर सुबह होगी, हम कहेंगे, उजाला आ गया। और मैं? मैं तो अलग हूं। अंधेरा आता है, उजाला आता है; आता है, चला जाता है। राग और द्वेष भी ऐसे ही आ और जा रहे हैं। उनके पीछे मैं अकेला खड़ा हूं, अलग खड़ा हूं। भ्रांति यह हो रही है कि राग आता है, तो उसको पकड़ लेता हूं कि यह मैं हूं। द्वेष आता है, तो पकड़ लेता हूं कि यह मैं हूं। यह जो आइडेंटिटी हो जाती है, बस इसको ही तोड़ देना है। और तोड़ने के लिए आप कुछ करेंगे नहीं। तोड़ने के लिए सिर्फ इसको देखना काफी है। जैसे, जब क्रोध आए, तो यह देखें कि क्रोध आ गया है। और आप हैरान हो जाएंगे, जैसे ही यह पता चला कि क्रोध आ गया है और मैं अलग खड़ा हूं, तो आप देखेंगे कि क्रोध धुएं की तरह क्षीण होकर उड़ गया। आप खड़े रह गए हैं, क्रोध अब नहीं है। तो जो भी वृत्ति आती हो, सिर्फ साक्षी हो जाएं, एक विटनेस हो जाएं। प्रश्र्न: व्यक्तियों के संपर्क में आते ही उभर तो जाता है। उभरने का अभी मैं कुछ कह नहीं रहा कि नहीं उभरेगा। यह मैं कहां कह रहा हूं। मैं यह कह ही नहीं रहा कि नहीं उभरना चाहिए। यह भी नहीं कह रहा हूं। मैं तो यह कह रहा हूं: जो हो जाता है, उसके साक्षी बनें। साक्षी बनने से वह धीरे-धीरे नहीं हो जाएगा। तब व्यक्ति के संपर्क में आएंगे आप, लेकिन बीच में कुछ नहीं उभरेगा। तब उधर एक व्यक्ति होगा, इधर एक व्यक्ति होगा। बीच में कुछ भी नहीं होगा। न राग होगा, न द्वेष होगा। यानी अगर इसे ठीक से समझें, तो हमारी अमूर्च्छा. हमारी अमूर्च्छा ही राग-द्वेष से मुक्ति का उपाय है। और हमारी मूर्च्छा ही राग-द्वेष में गिर जाना है। बेहोश हैं हम, और इसलिए पकड़ लेते हैं एकदम, जो भी आ जाता है। जब क्रोध आता है, तो ऐसा नहीं लगता है कि मुझे क्रोध आ रहा है, ऐसा लगता है कि मैं क्रोध हो गया हूं! अगर बहुत गौर से देखें, तो ऐसा लगता है मैं क्रोध हो गया! आग जल गई, मैं ही आग हो गया हूं! उस वक्त ऐसा थोड़े ही है कि हम क्रोध में आकर किसी को मार रहे हैं; हम क्रोध हो गए हैं और मार रहे हैं! इसलिए तो क्रोध के बाद ऐसा लगता है कि अरे, यह मैंने कैसा कर दिया! मैं तो कभी नहीं कर सकता था, फिर यह कैसे हुआ! आप थे ही नहीं मौजूद, आप बिलकुल सो गए थे, क्रोध ही सब-कुछ हो गया था। अब वह सब करवा रहा है। फिर पछताते हैं। लेकिन जो भूल क्रोध करने में की थी, वही भूल पछताने में कर रहे हैं। उस वक्त मान लिया था कि मैं क्रोध हूं, अब मान रहे हैं कि मैं पछतावा हूं। बुनियादी भूल वही है। अब आप यह समझ रहे हैं कि मैं पश्र्चात्ताप कर रहा हूं, मैं पश्र्चात्ताप हो गया हूं। रो रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि क्या हो गया! यह नहीं होना चाहिए था। अब आप कहते हैं, मैं छोडूंगा। पहले आपने पकड़ने की भूल की, अब आप कहते हैं, छोडूंगा। इसलिए मैं कहता हूं: पकड़ना भी नासमझी है, छोड़ना भी नासमझी है। यह जानना समझदारी है कि मैं अलग हूं और यह अलग है। न पकड़ना है, न छोड़ना है। तो इसकी तो क्रमिक जागरूकता चाहिए, चौबीस घंटे। जब भी कोई घटना घटती हो, तब इतना होश रखें कि क्या हो रहा है, मैं अलग हूं या नहीं? और यह अलग होने का भाव बढ़ता चला जाए। जैसे, अभी आप सुन रहे हैं, आप चाहें तो रागाविष्ट होकर सुन सकते हैं और चाहें तो द्वेष-आविष्ट होकर सुन सकते हैं। और चाहें तो सिर्फ सुन सकते हैं। ये तीनों बातें संभव हैं। सुनते वक्त अगर आप यह सोच रहे हैं कि हां, यह बात ठीक है, इसको पकड़ लें और करें, तो राग शुरू हो गया। अगर सुनते वक्त आप यह सोच रहे हैं कि हमारी किताब के यह बात खिलाफ है, हमारे शास्त्र में जो लिखा है, उससे यह गड़बड़ बात है, यह हम नहीं सुन सकते, यह नहीं सुनना चाहिए, यह बिलकुल गलत है, तो आप द्वेष-आविष्ट हो गए, फिर भी आप नहीं सुन रहे हैं। तीसरा उपाय यह है कि आप सिर्फ सुन रहे हैं, और पीछे जो खड़ा है, उसे न कोई राग है, न द्वेष है; न वह यह कहता है कि यह गलत है, न वह यह कहता कि यह सही है--वह सिर्फ सुनता है, सुन लेता है। और इस सुनने से जो समझ पैदा होती है वह राग-द्वेष से मुक्त होगी। मगर ऐसा हम कभी नहीं सुनते हैं। और ऐसा प्रत्येक क्रिया में प्रयोग करें, तो धीरे-धीरे राग-द्वेष से छूटते नहीं हैं, पाते हैं कि कभी बंधे ही नहीं थे। यानी जो मेरा जोर है बहुत. ऐसा नहीं होता कि किसी दिन आपको पता चलेगा कि राग-द्वेष से छूट गए आप। अगर ऐसा पता चला तो गलती जारी है। पता चलेगा, मैं कभी बंधा ही नहीं था। जैसे एक आदमी रात सोया है एक घाट पर, नींद लग गई है और सपना देखता है कि कलकत्ते में है, या टोकियो में है। अब वह सपने में बड़ा बेचैन होता है कि मैं कितने दूर निकल आया उदयपुर से, और किसी से पूछता है कि मैं उदयपुर कैसे वापस जाऊं? अब क्या होगा? टोकियो निकल आया, घर हजार काम पड़े हैं। मैं तो घर सोया था उदयपुर में और टोकियो आ गया! सुबह मुझे उदयपुर होना है। अब मैं कैसे पहुंचूं? कौन सा हवाई जहाज पकडूं? कौन सा जहाज पकडूं? पहुंच पाऊंगा सुबह तक कि नहीं? ठीक पूछ रहा है, क्योंकि जहां तक उसके माइंड का संबंध है, वह टोकियो में पहुंच गया है। बाकी वह कहीं गया नहीं है, वह यहीं पड़ा हुआ है। सुबह आंख खुलती है, अब वह हैरान होता है कि मैं कैसे वापस आ गया! टोकियो चला गया था, टोकियो से वापस कैसे आया! लेकिन जागते ही वह पाएगा कि न मैं गया था और न मैं आया। मैं यहीं था। जाने का भ्रम हुआ था, फिर आने का भ्रम भी हुआ। क्योंकि जाने के भ्रम से आने का भ्रम पैदा होता है। तो राग से पकड़े होने का एक भ्रम है, राग छूट जाने का दूसरा भ्रम है। और जो दोनों भ्रम से छूटता है, उसको हम वीतराग कहते हैं। वीतराग का मतलब है कि जिसने यह जाना कि मैं दोनों के पार हूं। वीत का मतलब बियांड। वीत का मतलब यह नहीं है कि छोड़ दिया। वीत का मतलब यह नहीं है कि छोड़ दिया! वीत का यह मतलब है कि मैंने कभी न पकड़ा था, न कभी छोड़ा। आइ वा़ज बियांड। और इस भ्रम में पड़ गया था कि उलझा हूं। प्रश्र्न: एम बियांड या वा़ज बियांड? वा़ज बियांड। एम बियांड तो हैं ही। वह तो जब जानेंगे आप--तो जब आपको लग रहा था कि भीतर हूं, जब आप जानेंगे तब आप पाएंगे कि तब भी भीतर नहीं था। और भीतर नहीं हूं, यह तो साफ ही है। तो इसलिए छोड़ने की भाषा में मुझसे मत पूछिए। छोड़ने की भाषा को ही मैं अज्ञान की भाषा मानता हूं। क्योंकि वह पकड़ने के अज्ञान की बाइ-प्रॉडक्ट है छोड़ना। किसी ने पकड़ा है, कोई छोड़ता है। कोई अपनी पत्नी को पकड़े हुए है, हालांकि जब वह पकड़े हुए तब भी पत्नी अलग है और वह अलग है। और कोई लाख उपाय करे तो भी पकड़े हुए नहीं है। कोई पकड़े हुए नहीं है! कितना ही पत्नी को पकड़ो, क्या पकड़ोगे? जिसको पकड़े हो वह पत्नी नहीं है और जो पत्नी है वह हाथ के बाहर है, बिलकुल मुट्ठी के बाहर है। इसलिए तो रोज कलह है कि पकड़े भी हुए हैं, लेकिन पूरा पाते हैं कि पकड़ नहीं है। जो कह रहा है कि पकड़े हुए हैं, वह एक भ्रम में है। फिर एक दूसरा कहता है, मैं पत्नी को छोड़ कर जा रहा हूं। लेकिन वह छोड़ने का भ्रम पकड़ने की बाइ-प्रॉडक्ट है। अब वह कहता है कि हम पत्नी के पास नहीं आएंगे, हम पत्नी को देखेंगे नहीं, हम जंगल जाते हैं! हमने पत्नी को छोड़ दिया! एक जैन मुनि बीस साल पहले छोड़े। उनकी मैं जीवनी पढ़ता था, तो बहुत दंग रह गया। बीस साल पहले कभी उन्होंने पत्नी को छोड़ा। बीस साल बाद पत्नी मरी। वे काशी में थे, उनको खबर पहुंची। तो उनकी जीवन-कथा में, जिसने लिखी है जीवन-कथा, उसने लिखा है कि अदभुत घटना घटी। जैसे ही खबर पहुंची, उन्होंने कहा कि चलो झंझट छूटी! तो उसने तारीफ में लिखा है यह कि कैसा त्याग कि पत्नी मर गई, तब भी उन्होंने कहा कि झंझट छूटी! मैंने उस लेखक को लिखा कि तुम निहायत पागल हो। और अगर उन्होंने यह कहा हो, तो तुमसे भी ज्यादा पागल वह मुनि है। क्योंकि जिसको बीस साल पहले छोड़ आए थे, अब भी झंझट बाकी थी? जो तुम कहते हो झंझट छूटी! अब यह बड़े मजे की बात है। बीस साल पहले उस पत्नी को छोड़ कर चले आए थे। लेकिन जिसको छोड़ कर चले आए थे, वह अपनी थी, यह भ्रम कायम है। क्योंकि छोड़ा तभी था, क्योंकि अपनी थी! वह अब भी अपनी है! छोड़ी हुई अपनी है! और उसकी झंझट जारी रही होगी कहीं इनर, किसी तल पर मन के झंझट जारी रही होगी कि पत्नी वहां है जिसको छोड़ दिया है। उसको कभी पकड़ा था! अब यह छोड़ दिया, यह दूसरा भ्रम। बीस साल बाद अब वह मर गई है, तो वे कहते हैं, चलो झंझट छूटी! मतलब झंझट बीस साल चलती थी? जो पत्नी छोड़ने से नहीं छूटी, पत्नी मरने से छूटी! इसको थोड़ा सोचना पड़ेगा। और जो पत्नी छोड़ने से नहीं छूटी थी, वह पत्नी के मरने से कैसे छूट जाएगी? यानी पत्नी तो एक अर्थ में मर चुकी थी। अब बीस साल से इसके लिए कोई मतलब न था आदमी के लिए। वह अब भी नहीं छूटी थी। तो मेरा कहना यह है कि छोड़ने-पकड़ने की भाषा नहीं है। जो हो रहा है उसे देखने कि भाषा कि क्या हो रहा है, बस। और हम उसमें कितने डूबे हैं कि बाहर हैं। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) .और जिसके पैर में कांटा लग गया है उससे हम कहें कि एक दूसरा कांटा ले आओ, कांटा निकालें। वह आदमी कहे, मैं एक से ही परेशान हूं और आप दूसरा किसलिए बुलाते हैं? मैं तो कांटे से ही मरा जा रहा हूं, आप दूसरा बुलाते हैं! और हम उससे कहें कि तू ठहर जरा। पहले कांटे को हम दूसरे से निकाल लेंगे। हम कांटा ले आएं, बामुश्किल वह दूसरे को पैर में डालने दे। वह कहे कि एक से हम परेशान हैं, तुम दूसरा डालते हो! फिर हम दूसरे से निकाल लें पहले वाले को। और तब वह कहने लगे, अब हम दूसरे कांटे को सम्हाल कर अपने पैर में रखेंगे, क्योंकि इसने पहले वाले कांटे को निकलवा दिया। यह बड़ी कृपा है इसकी। हम इसको रखेंगे। तो हम उससे कहेंगे कि नहीं, दूसरे कांटे को भी फेंक दो। दूसरे का उपयोग इतना था कि वह पहले को निकाल दे। फिर इसका कोई उपयोग नहीं है। समझे न? तो मैं विश्र्वास को निकालने को कहता हूं विचार की क्रांति से। और जब विश्र्वास जड़मूल से फिंक जाए, अंधापन जड़मूल से फिंक जाए, तो फिर विचार को भी फेंक देना है। इसलिए फिर निर्विचार--वह तीसरी सीढ़ी है। विश्र्वास एक सीढ़ी है, वह सबसे नीची सीढ़ी है। दूसरी सीढ़ी विचार है। और तीसरी सीढ़ी निर्विचार है। समझे मेरा मतलब? तल हैं। जो अभी विचार में ही क्रांति नहीं कर सकता, वह निर्विचार क्या होगा? क्योंकि निर्विचार तो विचारमात्र को छोड़ना है। और ‘विचार में क्रांति’--गलत विचार को छोड़ कर ठीक विचार को पकड़ना है। और ‘विचार की क्रांति’--तो विचार को ही छोड़ देना है। वह तो आत्यंतिक क्रांति है। वह आखिरी क्रांति है। मेरा मतलब समझ रहे हैं न? हम सब विश्र्वास से घिरे हुए हैं, तो इनसे मैं कहता हूं कि विश्र्वास को छोड़ो, विचार को लाओ। और जब विचार आता है, तो मैं कहता हूं, अब विचार की भी कोई जरूरत नहीं है, इसे भी जाने दो। अब निर्विचार हो जाओ। और ऊपर है उसकी गति। दोनों बातें कहता हूं। दो तल पर बातें हैं। विरोध उसमें नहीं है। विरोध उसमें नहीं है! जैसे एक आदमी ऊपर चढ़ रहा है मकान पर। वह एक सीढ़ी पर पैर रखता है। हम कहते हैं, अब पहली सीढ़ी को छोड़ो, ताकि तुम दूसरी पर पैर रख सको। अगर तुम पहली को पकड़े हो, तो दूसरी पर पैर नहीं रख सकोगे। वह दूसरी पर रखता है। फिर हम उससे कहते हैं, अब तुम दूसरी भी छोड़ो, ताकि तीसरी पर रख सको। वह कहेगा कि यह क्या गड़बड़ है? पहले आपने कहा था कि पहली को छोड़ो, ताकि दूसरी को पकड़ सको। हमने दूसरी को पकड़ लिया। आप कहते हैं, दूसरी को छोड़ो। हम उससे कहते हैं कि हमें पकड़ने-छोड़ने का सवाल नहीं है, हम तो तुम्हें आखिर में वहां ले जाना चाहते हैं, जहां कोई सीढ़ी न रह जाएगी--न पकड़ने को होगा, न छोड़ने को होगा। लेकिन सीढ़ी पार तो करनी पड़ेगी। ये सब सीढ़ियां हैं। निर्विचार तो आखिरी है, वहां सीढ़ियां खत्म हो जाती हैं, वहां कोई सीढ़ियां नहीं हैं। प्रश्र्न: फिर उसके बाद की क्या परिस्थिति नहीं है? उसके बाद की परिस्थिति बिना जाए नहीं पता चलने वाली। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) नहीं-नहीं। फिर अपन सांझ को मिलेंगे। और कुछ जरूरी रह जाए तो वह लिख कर रख दें। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) आप आत्मा हो ही नहीं। और जो आप हो, जब तक न मिटोगे, तब तक आत्मा का कोई पता न चलेगा। आप तो बिलकुल मन हो, और वह परछाईं है। प्रश्र्न: अपन किस चीज की परछाईं में घूम रहे हैं? इसकी ही खोज करनी चाहिए। इसकी ही खोज करनी चाहिए! और खोज करते से ही पता चलेगा कि अजीब बात है, कि हम घूम रहे हैं यह निपट पागलपन है। जब आप आईने में देखते हो तो किसकी परछाईं देखते हो? प्रश्र्न: कोई चीज होती है उसकी ही देखते हैं। किसकी? आपकी ही न! और देखने वाले भी आप ही होते हो। और परछाईं भी अपनी ही देखते हो। जैसे हम आईने में अपनी परछाईं देख रहे हैं, तो आईना तो मुर्दा है, लेकिन आईना तक खुश करता है! अगर अच्छा आईना हो तो आप प्रसन्न लौटते हो परछाईं देख कर, उसमें सुंदर अगर आप दिखाई पड़ते हों। और अगर कुरूप दिखाई पड़ते हों, तो नाराज लौटते हो देख कर। और आईने को बेचारे को कुछ पता ही नहीं है, न आपको खूबसूरत बनाने की फिकर है, न आपको कुरूप बनाने की फिकर है। लेकिन आईना अगर सुंदर दिखा देता है आपको। और इतने सुंदर कोई भी नहीं हैं जितने आईने बता रहे हैं। वह तो आईना दुकानदार बना रहा है, जिसमें आप सुंदर दिखाई पड़ते हैं, और वह बेच रहा है। और आप देख कर बड़े प्रसन्न होते हो। कौन प्रसन्न होता है? किसको देख कर प्रसन्न होते हो? और आईना तो मुर्दा है। दूसरों की आंखें एक जीवित आईना है, जिसमें हम अपनी परछाईं देखते हैं। चार आदमी आपको कह देते हैं, आप बड़े अच्छे आदमी हैं, आप फूले हुए लौटते हो। किसी के अच्छे कह देने से क्या हो गया? एक परछाईं है। और चार आदमियों ने कह दिया कि तुम बिलकुल गंवार हो, बुद्धू हो, बुरे हो, तो आप दुखी लौटते और रात भर सो नहीं पाते, करवट बदलते हो, परेशानी मालूम होती है। क्या हो गया चार आदमियों के कहने से? परछाईं सुखद न बनी। जो हमने उनकी आंख में देखना चाहा था वह न दिखा! मुश्किल में पड़ गए। इसको मैं कह रहा हूं। यह जो कह रहा हूं कि हम अपनी परछाईं में जी रहे हैं पूरे वक्त। देख रहे हैं कौन क्या कहता है, कौन क्या सोचता है, किसको हम कैसे दिखाई पड़ते हैं! और जो आदमी इस तरह परछाईं में जीएगा, वह आदमी सत्य की खोज में नहीं जा सकता। क्योंकि सत्य वहां हैं, जहां हम परछाईं से हटेंगे और पीछे जाएंगे, परछाईं छोड़ेंगे। फिकर छोड़ेंगे परछाईं की। संन्यासी को हम कहते हैं आमतौर से कि संन्यासी वह है जो समाज छोड़ कर चला गया। लेकिन संन्यासी भी पूरे वक्त समाज में परछाईं देख रहा है अपनी। तो छोड़ कर गया कहां? एक साधु अभी मुझे मिले। वे मुंह पर पट्टी बांधे हुए हैं। मैंने कहा: इसे क्यों नहीं छोड़ देते, इसमें क्या अर्थ है? उन्होंने कहा: छोड़ तो आज दूं, लेकिन कल कोई साधु नहीं मानेगा। तो मैंने कहा: साधु मनवाने का आग्रह क्या है? साधु होने का आग्रह होना चाहिए। मनवाने का क्या आग्रह? मनवाना दूसरे से, होना खुद है। लेकिन मनवाए बिना मजा नहीं है। क्योंकि वह परछाईं नहीं बनेगी। फिर वे लोग कहेंगे कि अरे, यह कुछ भी नहीं है आदमी। इसको कह रहा हूं परछाईं। और आत्मा-वात्मा की तो बात ही मत करिए। क्योंकि ये शब्द हमने सीख लिए हैं। और बड़े खतरनाक हैं। शब्द भर हमारे हाथ में अच्छे-अच्छे हैं। और बातचीत और व्याख्या और विश्लेषण भी बहुत अच्छे हैं। और जहां हम रहते हैं, वहां इन शब्दों का कोई संबंध नहीं है। वह जहां हम रहते हैं, वह मन से ऊपर तल कभी जाता नहीं, और बातें हमारी आत्मा से नीचे कभी नहीं उतरती हैं! इसलिए हमारी बातों में और हमारे जीने में कहीं कोई तालमेल नहीं है। रहते हैं मन के तल पर, बातें करते हैं आत्मा के तल पर। दोनों में कोई तालमेल नहीं है। एक आदमी रहता है अंधेरे में और बातें प्रकाश की करता है! एक आदमी है बीमार और बातें स्वास्थ्य की करता है! और सच तो यह है कि बीमार ही अक्सर स्वास्थ्य की बातें करते हैं। स्वस्थ आदमी करता भी नहीं। क्योंकि क्या मतलब है? बीमार आदमी चौबीस घंटे बीमारी की वजह से पीड़ित होने के कारण स्वास्थ्य, स्वास्थ्य, स्वास्थ्य की बातें करता है। गरीब आदमी धन की बात करता है। और कोई आदमी धन की बात करे तो समझ लेना कि गरीब है--चाहे कितना ही धन हो उसके पास। धनी आदमी क्यों धन की बात करेगा? जो हमारे पास नहीं होता है, उसकी हम बात करते हैं। और जो हमारे पास होता है, उसको हम छिपाते हैं। तो जो हम हैं, उसको तो हम छिपाए हुए हैं; और जो हम नहीं हैं, उसकी किताबों में से बातें पढ़ ली हैं: कि आत्मा है और आत्मा की परछाईं नहीं है और आत्मा का यह नहीं है। वह आत्मा है कहां? उससे मतलब क्या है आपका, या किसी का भी? मतलब तो इससे है, जो है। और जो है, वह बड़ा परछाईं वाला ही खेल है। बिलकुल रिफ्लेक्शन का खेल चल रहा है। हमारे सुख-दुख बिलकुल ही ऐसे हैं। अब हिंदुस्तान में एक चपटी नाक की लड़की पैदा हो जाए, वह दुखी रहेगी जिंदगी भर। क्योंकि जो परछाईं बनेगी वह असुंदर की बनेगी हर आंख में। वही लड़की चीन में पैदा हो जाए, वह दुखी नहीं रहेगी, क्योंकि चपटी नाक सुंदर है। अब वह दुख काहे का है, चपटी नाक का? तो वह चीन में भी होना चाहिए। क्योंकि वहां चपटी नाक से कोई दुख नहीं है। और कल अगर हम भी तय कर लें कि चपटी नाक सुंदर है, और तय करने में कोई हर्जा नहीं है, कोई कठिनाई नहीं है। क्योंकि नाक का काम चपटी नाक भी कर देती है और लंबी नाक भी कर देती है। असली काम काम का है। वह जो काम हो रहा है भीतर वह तो सिर्फ. जैसे कि मोटरगाड़ी के पीछे अगर समझो कि साइलेंसर लगा हुआ धुआं फेंकने का, वह चपटा है कि गोल है कि लंबा है, इससे कोई मतलब नहीं है, वह धुआं फेंकने का काम करता है। नाक केवल श्र्वास को ले जाने, लाने के लिए मार्ग से ज्यादा नहीं है, पैसेज से ज्यादा नहीं है। पैसेज चपटी है कि लंबी है, इससे कोई मतलब नहीं है। काम पूरा हो जाता है। तो चाहें तो चपटी नाक को सुंदर मान सकते हैं, चाहें तो लंबी नाक को। यह मान्यता है सिर्फ। और लंबे दिन तक मानते रहें तो आदमी भूल जाता है कि जो हम मान रहे हैं वह उसमें कोई मतलब है? मगर जहां ऐसी मान्यता है, वहां रिफ्लेक्शन दूसरा बनता है। चपटी नाक है तो आदमी कुरूप हो गया! अब वह चौबीस घंटे नाक के लिए कांशस रहेगा। सब उपाय करेगा कि उसकी नाक पर आपका ध्यान न चला जाए, उसकी नाक पर। और क्या मतलब क्या है? समझ लो, एक चपटी नाक का आदमी एक जंगल में है, जहां कोई दूसरा आदमी नहीं है, क्या कभी भी वह अपनी चपटी नाक के लिए दुखी होगा? दुखी नहीं होगा। क्योंकि कोई प्रतिबिंब नहीं बनता, कोई परछाईं नहीं बनती। तो परछाईं दिक्कत देती है। राहुल पहली दफा रूस गए। तो राहुल के हाथ बहुत खूबसूरत थे, बहुत मुलायम थे। और जिन लोगों ने कभी कुछ काम नहीं किया उनके हाथ मुलायम और खूबसूरत हो जाएंगे, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। तो जो भी उनका हाथ देखता था, वही कहता था, बहुत बढ़िया, बिलकुल स्त्रैण, स्त्रियों जैसा सुंदर कोमल हाथ है! रूस गए, पहले आदमी ने जिसने स्टेशन पर स्वागत किया, उसने हाथ मिला कर खींच लिया! और उसने कहा कि आप अपना हाथ सम्हाल कर रखना, जिससे भी मिलाएंगे वही आपको नफरत करेगा। क्योंकि हमारे मुल्क में ऐसे हाथ को हम मुफ्तखोर का हाथ मानते हैं। इसमें गट्ठे नहीं हैं मजदूर के। आपने कभी कुछ किया नहीं, आप मुफ्तखोर हैं। तो राहुल ने कहा कि यह तो बड़ी मुश्किल हो गई। और राहुल ने कहा कि फिर पूरे रूस में, मैं हमेशा सचेत रहा कि किसी से हाथ मिलाऊं, तो बस मन ऐसा होने लगे कि. और जैसे ही हाथ मिलाया वह दूसरे आदमी की आंख पर असर बदला, वह फौरन समझा कि यह आदमी मुफ्तखोर है। अब यह जो यह मामला है न। अभी हमको खयाल में नहीं आया कि सुंदर हाथ से हाथ मिलाने में अच्छा लगना चाहिए। लेकिन वह जो आंख में तस्वीर बनती है, अगर वह तय कर ले कि यह गलत है, तो ब़हुत मुश्किल हो जाती है। हम सब परछाईं में जी रहे हैं, बहुत-बहुत तरह की परछाईं में जी रहे हैं। (प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) इस परछाईं से, इस परछाईं के लिए बात कर रहा हूं। इस परछाईं के लिए बात कर रहा हूं! मेरी तो पूरी चेष्टा यह है कि मेरी बात सोचनी चाहिए, गलत लगे फेंक देना चाहिए, ठीक लगे उपयोग कर लेना चाहिए। मेरा मतलब समझे आप? प्रश्र्न: ऐसा है कि अगर मस्तिष्क में कोई उथल-पुथल हो.। न-न, उथल-पुथल नहीं हुई है। आपका मस्तिष्क बड़ा ठोस है, मजबूत है। उथल-पुथल होती तो आप संदेह से भरे हुए आते। आप तो उत्तर से भरे हुए आए हैं। उथल-पुथल नहीं हुई है। उथल-पुथल बड़ी और चीज है। आप मेरी बात समझ रहे हैं न? आप तो उत्तर लेकर आए हैं, उथल-पुथल कहां हुई है। प्रश्र्न: नहीं, उधेड़बुन के बाद जो है अपना भी कुछ.। उधेड़बुन थोड़ी-बहुत भी हुई है? प्रश्र्न: हां, हुई है। क्या उधेड़बुन हुई? प्रश्र्न: तब उसके बाद मैंने सोचा कि अंधकार जो है क्या अनंत रह सकता है? अभी आप जरा भी नहीं सोचे। सोचते तो उनमें से एक शब्द लेकर नहीं आते। सुनिए फिर उसको, थोड़ा समझने की कोशिश करिए। असल में किसी भी चीज का जिसका अस्तित्व है, वह सदा सीमित होगी। अस्तित्व सीमित ही होगा। अस्तित्व की सदा सीमा होगी। सिर्फ शून्य असीम हो सकता है, अनस्तित्व, नॉन-एक्झिस्टेंस असीम हो सकता है। हम जब कहते हैं, कोई चीज है, तो ‘है’ उसकी सीमा बन जाती है। वह कहीं होगी, कभी होगी; वह किसी स्थान में होगी, किसी सीमा में होगी; उसका होना कहीं पूरा होता होगा और किसी चीज का न होना शुरू होता होगा। अस्तित्व सदा सीमित होगा। इसलिए जो लोग कहते हैं, ‘ईश्र्वर है’, वे लोग ईश्र्वर को सीमित बना देते हैं। इसलिए जो जानते हैं, वे कहते हैं, ईश्र्वर न तो है और न न है। उसको सीमा के बाहर डालने के लिए जरूरी हो जाता है कि ‘न है’ भी उसमें जोड़ दिया जाए। समझ लें, इस कमरे में, अगर यह कमरा है, तो इसकी दीवालें होंगी, नहीं तो यह कमरा नहीं हो सकता है। अगर यह कमरा नहीं है, तब तो दीवालों का कोई सवाल नहीं है। तो कमरे का होना तो हमेशा सीमित होगा। न होना ही असीम हो सकता है। अब वह जो मैं कहता हूं, अंधकार असीम है, उसका कारण है कि मूलतः अंधकार नहीं है, वह नॉन-एक्झिस्टेंस है। और प्रकाश एक्झिस्टेंस है, प्रकाश है। प्रकाश की सत्ता है और अंधकार की असत्ता है। तो आप प्रकाश को जला सकते हैं और प्रकाश को बुझा सकते हैं। न तो आप अंधकार को जला सकते हैं और न बुझा सकते हैं। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) समझने की कोशिश करिए पहले। आप प्रकाश को ला सकते हैं, ले जा सकते हैं। अंधकार को न आप ला सकते हैं, न ले जा सकते हैं। अगर इस कमरे में हम कहें कि मित्रो, जाओ थोड़ा अंधकार ले आओ, तो आप कहेंगे, हम असमर्थ हैं। लेकिन आपसे कहें कि जाओ थोड़ा प्रकाश ले आओ, तो आप कहेंगे, हम अभी ले आते हैं। यानी प्रकाश चूंकि सीमित है, आप उठा कर ले आते हैं। अंधकार को उठा कर कैसे लाइएगा? और दूसरी मजे की बात है कि प्रकाश है, इसलिए लाया भी जा सकता है, हटाया भी जा सकता है। अंधकार नहीं है। अंधकार का मतलब है न होना। प्रश्र्न: काले पर्दे लगा देंगे, अंधकार हो जाएगा। तो काले पर्दे आपको लगाने पड़ेंगे और प्रकाश को रोकना पड़ेगा। आप अंधकार के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। सिर्फ प्रकाश को आने से रोक रहे हैं। अगर गौर करेंगे, तो जब भी आप कुछ करेंगे, वह प्रकाश के साथ होगा। अंधकार के साथ आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप एकदम ही इंपोटेंट हैं अंधकार के सामने। थोड़ा समझना इसको आप। आप जो भी कर सकते हैं--जब आप कहते हैं, हम पर्दे लटका देंगे, तो पर्दे लटका कर आप अंधकार नहीं ला रहे हैं, पर्दे लटका कर सिर्फ प्रकाश को आने से आप रोक रहे हैं। आप दीया बुझा देंगे, तो आप अंधकार नहीं ला रहे हैं; दीया बुझाने से सिर्फ प्रकाश बुझा रहे हैं आप। आप तो अंधकार के साथ कुछ भी नहीं कर सकते हैं, जो भी करेंगे प्रकाश के साथ करेंगे। क्योंकि प्रकाश है और सीमित है, और प्रकाश के साथ कुछ किया जा सकता है। अंधकार के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता। तो जो मैंने कहा जिस अर्थ में, अगर बहुत गौर से देखें तो परमात्मा के सामने आप बिलकुल इंपोटेंट होने चाहिए कि आप कुछ भी न कर सकें। परमात्मा के समक्ष आप कुछ भी न कर सकें। अगर आप कुछ भी कर सकते हैं उसके समक्ष, तो आप उससे ज्यादा बड़े हो गए हैं। यह तो प्रतीक की बात है। इसको पागलों की तरह नहीं पकड़ लेना चाहिए, नहीं तो शब्द बड़ी मुश्किल में डाल देते हैं। जब मैंने रात को कहा, अगर आपने सुना हो, यह तो सिर्फ प्रतीक की बात है। जो आदमी कहता है, परमात्मा प्रकाश है, वह भी एक प्रतीक का उपयोग कर रहा है। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) समझ तो लें पहले पूरी बात। समझ तो लें पूरी बात। इसलिए मैंने कहा कि समझना बहुत मुश्किल होगा। जब मैं बोल रहा हूं, तब आपकी खोपड़ी में कुछ जोर से चलता रहेगा। तो फिर मेरी बात आप तक पहुंचेगी ही नहीं। और मैं यह कह नहीं रहा हूं कि मेरी बात से राजी हो जाएं, इसलिए डर कुछ है नहीं। मेरी बात गलत लगे, उसे बिलकुल कचरे में फेंक कर अपने घर चले गए। मैं न किसी को अनुयायी बनाता, न किसी संप्रदाय में दीक्षा देता, न कोई मेरा शिष्य है, न कोई मेरा किसी से संबंध है। मेरी बात मैंने कह दी, आपने सुन ली, बड़ी कृपा है। बात खत्म हो गई, इससे ज्यादा कोई आग्रह नहीं है। अगर गलत हो, तो मेरी कोई जिद नहीं है कि उसे सही मानना ही चाहिए। यह जो मैंने कल कहा, अगर उसको समझने की कोशिश करें. आप देखें, प्रकाश कभी होता है, कभी नहीं हो जाता है। अंधकार सदा है। उसके होने न होने का कोई सवाल नहीं है। जब प्रकाश हो जाता है, तब आपको अंधकार दिखाई नहीं पड़ता। जब प्रकाश नहीं हो जाता, तब आपको अंधकार दिखाई पड़ने लगता है। दिन में सुबह सूरज निकलता है, और आप सोचते होंगे आकाश के तारे कहीं खो गए। वे कहीं खो नहीं जाते हैं, वे अपनी जगह हैं। सिर्फ सूरज के प्रकाश में आपको वे दिखाई नहीं पड़ते हैं। अब यह बड़े मजे की बात है, कुछ चीजें प्रकाश में दिखाई पड़ती हैं और कुछ चीजें प्रकाश में नहीं दिखाई पड़ती हैं! आकाश के तारे नहीं दिखाई पड़ते दिन में। फिर रात सूरज ढल जाता है, फिर वे दिखाई पड़ने लगते हैं। सूरज यहां ढला और वहां वे दिखाई पड़ने शुरू हुए। वे वहीं थे, सारा आकाश भरा था उन्हीं से। सूरज की रोशनी ने आपकी आंख को ढंक लिया, वे नहीं दिखाई पड़ते हैं। रोशनी एक झलक है, अंधकार एक स्थायित्व है। और जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं कुछ प्रकाश के खिलाफ कुछ भी नहीं कह रहा। यह आप भूल कर मत समझ लेना कि मैं कोई प्रकाश के खिलाफ कुछ कह रहा हूं। और जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं उन लोगों के खिलाफ भी कुछ नहीं कह रहा हूं जो प्रकाश को परमात्मा कहते हैं। जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि हम परमात्मा को समझने जब जाते हैं, तो सिवाय इसके कोई रास्ता नहीं है कि हम कुछ प्रतीकों का उपयोग करें। प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। और प्रतीकों का उपयोग का मतलब होता है कि हम विशिष्ट निर्देश कर रहे हैं, कि इस अर्थ में हम इस प्रतीक का उपयोग कर रहे हैं। चूंकि मैं परमात्मा को ऐसा कहना चाहता हूं कि जो न कभी जाता है, न कभी आता है--जो सदा है। कभी छिप जाता है, कभी प्रकट हो जाता है, दूसरी बात है, लेकिन आता-जाता नहीं है। तो इसे मैं अंधकार से ज्यादा अच्छी तरह से कह सकता हूं, बजाय प्रकाश के। जब मैं यह कह रहा हूं कि परमात्मा असीम है, तो मेरा मतलब यह है कि परमात्मा शून्य है। क्योंकि जो भी चीज शून्य होगी, वही असीम हो सकती है। सिर्फ शून्य की कोई सीमा नहीं है। बाकी सब चीजों की सीमाएं हैं। तो ‘परमात्मा असीम है’, अगर इसे कहना है, तो यह कहना पड़ेगा कि परमात्मा शून्य है। और शून्य को बताने के लिए प्रकाश सार्थक उतना नहीं है, जितना अंधकार सार्थक है। जब मैं यह कह रहा हूं कि परमात्मा परिपूर्ण शांति है, तो मैं यह कह रहा हूं कि प्रकाश एक तनाव है। प्रकाश की प्रत्येक किरण आपके ऊपर एक तनाव पैदा करती है। इसलिए सुबह आप जगते हैं। प्रकाश के साथ सारा जगत जगता है। अंधकार हो गया, सारा जगत सो जाता है। अंधकार एक गहरी निद्रा में विश्राम है। प्रकाश एक गहरे जीवन में सतत हलचल है। प्रकाश एक हलचल है, एक मूवमेंट है। अंधकार नो-मूवमेंट है, अ-गति है; निद्रा है, खो जाना है, विलीन हो जाना है। परमात्मा को समझना हो, तो परमात्मा एक हलचल कम है, एक अ-गति, एक विश्राम ज्यादा है। यह सिर्फ प्रतीक की बात है। किसी को दिक्कत होती हो, वह न कहे अंधकार। उससे कोई झगड़ा नहीं है। यह सिर्फ समझने की बात है कि परमात्मा की तरफ जो हम इशारे डाल रहे हैं, वे हम क्या इशारे डाल रहे हैं। फिर मैं कहता हूं कि जीवन आज है, कल नहीं था। आप आज हैं, कल नहीं थे। कल नहीं होंगे। पृथ्वी पर जीवन है। अनंत-अनंत तारा, उपग्रह हैं, उन पर कोई जीवन नहीं है। इस पृथ्वी पर भी कोई दस लाख, बीस लाख वर्ष पहले जीवन नहीं था। कल यह हो सकता है कि पृथ्वी फिर सूख जाए, फिर जीवन न हो। आज अनंत-अनंत ताराओं पर, उपग्रहों पर कोई जीवन नहीं है। जीवन एक झलक है। लेकिन जीवन का न होना एक शाश्र्वत क्रम है। उसमें कभी जीवन झलकता है, फिर खो जाता है। वह जिसमें खो जाता है वह ज्यादा मूल्यवान है, जिससे आता है वह ज्यादा मूल्यवान है। एक सागर है, उस पर एक लहर उठी। लहर नहीं थी, तब भी सागर था; लहर नहीं रह जाएगी, तब भी सागर होगा। लहर के होने या न होने से सागर के होने या न होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई आदमी यह कहे कि लहर सागर है, तो गलत नहीं कहता है। कोई आदमी यह कहे कि लहर सागर है, तो गलत नहीं कहता है! लेकिन बहुत गहरे में सत्य भी नहीं कहता है। इससे उलटा सत्य है। सागर लहर है, क्योंकि लहर मिट जाए, तो भी सागर है। सागर लहर बनता है, नहीं भी बनता है। परमात्मा जीवन की तरह प्रकट होता है, नहीं भी होता है। परमात्मा प्रकाश की तरह आविर्भूत होता है, नहीं भी होता है। लेकिन वह जो न होना है, बहुत लंबा क्रम है; उसमें होना कभी झलकता है और खो जाता है। यह जो मैंने कहा, यह जो मैंने कहा, यह न होना और होना एक ही चीज के दो पहलू हैं। लेकिन इन दोनों पहलुओं में गहरा और ज्यादा फाउंडेशनल न होना है। क्योंकि होना तो थोड़ी देर को दिखाई पड़ता है, न होना अनंत मालूम होता है। फिर मैंने जो यह कहा कि जीवन अंधेरे में है, उसका मेरा मतलब आप नहीं समझ पाए। क्योंकि असल में प्रतीकों को समझना और पकड़ना थोड़ा मुश्किल होता है। और तब और मुश्किल हो जाता है जब हमारी कोई बंधी हुई धारणाएं हों। तब बहुत मुश्किल हो जाता है। असल में जीवन अंधेरे में है, इसका मतलब क्या है? इसका मतलब केवल इतना है कि जीवन की सारी जड़ें मिस्ट्री में हैं, रहस्य में हैं, जहां एकदम अंधकार है, जहां कुछ भी प्रकाश नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने कह दिया कि सूरज की रोशनी में जीवन नहीं है। सूरज की रोशनी में जीवन है। उससे जीवन प्रकट हो रहा है--फूलों में, पत्तों में, हममें, सब सूरज की रोशनी से हो रहा है। लेकिन सूरज की रोशनी से क्यों हो रहा है यह जीवन प्रकट? यह जड़ बिलकुल अंधेरे में है। समझे कि नहीं? अंधेरे का मतलब है: दि मिस्टीरियस। वह जो रहस्यपूर्ण है, जहां सब खोया है। जहां कुछ साफ नहीं है, जहां सब धुंधला होता चला गया है। प्रकाश में सब साफ है, अंधेरे में सब खोया है। परमात्मा सबसे बड़ी मिस्ट्री है, सबसे बड़ा रहस्य है। निश्र्चित ही वह रहस्य बिलकुल अंधेरे में है। उदाहरण के लिए जो मैंने कहा कि वृक्ष की जड़ें हैं, वे नीचे अंधेरे में काम कर रही हैं। आप खाना खाते हैं, खाना तो आप रोशनी में खाते हैं। खाना आप खाते हैं, लेकिन खाना किसने पचाया है, यह आपको पता भी नहीं है! और खाना कौन पचा रहा है भीतर, यह भी पता नहीं है! वह सब अंधकार में चुपचाप हो रहा है। वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर एक आदमी के पेट में जितना काम हो रहा है, अगर उतना काम हमें फैक्ट्री में लेना पड़े--यानी रोटी को खून बनाने का--तो इतनी बड़ी फैक्ट्री बनानी पड़ेगी कि कई वर्गमील की जगह घेरे और कई हजार लोग काम करें। और अभी भी हम पूरी तरह नहीं जानते कि रोटी खून कैसे बने? नहीं तो मामला खत्म हो जाए भोजन का। अभी भी हम जानते नहीं कि मामला क्या है? यह होता कैसे है--रोटी को खून में कनवर्ट करना? एक पौधा है, वह मिट्टी खाता है और फूल बना देता है। मिट्टी कैसे फूल में कनवर्ट होती है, कहां कनवर्ट होती है, अभी रहस्य है। और किसी अंधकार में हो रहा है, जिसका कुछ पता नहीं है। पौधे को काट-पीट डालो, कुछ पता नहीं चलता कि मिट्टी कब फूल बन जाती है! किस क्षण पर वह कनवर्सन होता है! आप कब खाना खाते हैं, वह कब खून-मांस-मज्जा बन जाता है! और कितना अदभुत है मामला: एक ही रोटी आप खाते हैं, उसी रोटी में से कुछ हिस्सा खून बनता है, कुछ हिस्सा हड्डी बनता है, कुछ हिस्सा बाल बनता है, कुछ हिस्सा आंख बनता है, कुछ हिस्सा चमड़ा बनता है, कुछ हिस्सा मज्जा बनता है! एक ही रोटी से वह सब बनता है! वह कहां हो रहा है? वह किस लोक में हो रहा है? वह किसी बहुत गहन अंधकार में चुपचाप हो रहा है और बिलकुल साइलेंटली हो रहा है। और अभी वैज्ञानिक कहते हैं कि जब से हमने उसे जानने की बहुत कोशिश की, तो डिस्टरबेंस पैदा हुए हैं। अभी वैज्ञानिक कहते हैं। जितना हम उसे जानने की कोशिश करते हैं, उतना आदमी डिस्टर्ब हो रहा है। उतनी परेशानी हो रही है। उतनी जड़ें उखड़ रही हैं और मुश्किल होती चली जा रही है। तो जो मैंने कहा उसको समझने की कोशिश करना। मैं कोई प्रकाश का विरोधी नहीं हूं। जो अंधकार तक का विरोधी नहीं है, वह प्रकाश का विरोधी कैसे होगा? और जो परमात्मा को अंधकार तक कहने को राजी है, उसके उसमें प्रकाश का होना समाविष्ट है। और जो यह कहने को राजी है कि अंधकार से जीवन निकलता है, वह यह थोड़े ही कहेगा कि प्रकाश से जीवन नहीं निकलता है? प्रकाश से तो निकलता ही है। वह मेरी बात समझने की कोशिश करना। और समझने की कोशिश आसान होगी, अगर मानने और न मानने की जल्दी न की। दोनों की जल्दी की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि मेरा आग्रह ही नहीं है। न तो इसकी फिकर करना कि यह बात माननी है कि नहीं माननी है, सिर्फ सोच लेना, एक निवेदन है। सोच लेना, लगा ठीक, ठीक; नहीं लगा, मुक्त हुए, उससे झंझट छूटी। वह आदमी गलत था, बात खत्म हो गई। सोचने भर का आग्रह है, इससे ज्यादा नहीं। प्रश्र्न: जीवन को प्रकट होने की क्यों जरूरत पड़ी? यह आदमी से नहीं उत्तर हो पाएगा। वह तो परमात्मा कभी मिल जाए, तो पूछना कि जीवन को प्रकट होने की क्यों जरूरत पड़ी? हालांकि उससे भी आप राजी न हो सकोगे। वह बहुत मुश्किल पड़ेगा राजी होना। प्रश्र्न: मेरा यह खयाल है.। नहीं, आपका खयाल क्या है.। प्रश्र्न: .यह तो आदान-प्रदान है। न-न, आदान-प्रदान बिलकुल नहीं है। या तो मैं लेने को राजी हूं, या देने को। आदान-प्रदान होता ही नहीं। मेरी आप बात समझ रहे हैं न? (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) मेरी आप बात समझ लीजिए। मैं तो आदान के लिए राजी हूं। अगर आप देना चाहते हैं, बिलकुल राजी हूं। फिर मैं मौन बैठ कर समझने की कोशिश करूं, समझाने की फिकर छोड़ दूं। मेरी बात समझे न आप? एक काम ही मुझे करने दें, और या फिर एक काम आप करें। दोनों काम एक साथ चले--आदान-प्रदान, तो इधर से.। प्रश्र्न: दोनों ही काम एक साथ.। हां, इसलिए तो दुनिया की यह हालत है। इसलिए यह हालत है। यानी आदान-प्रदान अगर एक साथ चलते हैं, तो उसका परिणाम यह होता है कि एक गाड़ी वहां से इधर को चलती है, एक गाड़ी यहां से वहां को चलती है। कहीं क्रॉसिंग होता है, लेकिन मिलना नहीं होता है। हो ही नहीं सकता। मैं तो राजी हूं हमेशा। मुझे इसमें कोई सुख ही नहीं है कि मैं आपको समझाऊं। मुझे समझने में इससे भी ज्यादा सुख है। वह तो कभी आ जाएं, बैठ जाएं घंटे भर, मैं सुनूंगा आपकी बात, समझूंगा। लेकिन फिर उस वक्त मैं नहीं समझाऊंगा। फिर उसकी कोई जरूरत नहीं है। प्रश्र्न: नहीं, पर उसके पश्र्चात अपना विवेचन.। कोई जरूरत नहीं है, वह तो आपके जीवन के लिए है। विवेचन की कोई जरूरत नहीं है। मैंने आपकी बात सुन ली, मेरे काम की होगी, पकड़ लूंगा; नहीं होगी, नहीं पकडूंगा। बात खत्म हो जाती है, विवेचन का कहां सवाल है? विवेचन तो कई जन्मों के बाद आखिर में भगवान के ही सामने करना चाहिए। उसके पहले कोई मतलब नहीं है। प्रश्र्न: इसका मतलब वह वस्तु कहीं और है, उसे जिसको कि हम भगवान कहें? वह तो सुबह आप थे? प्रश्र्न: नहीं, मैं सुबह नहीं आ सका। सुबह नहीं थे आप। सुबह की टॉक जरा रिकॉर्ड है, पूरी सुन लें। अभी कोई भी मित्र सुना देगा। इस बाबत ही पूरी बात की थी। पूरी तीन दिन की बात सुन लें। फिर कुछ भी खयाल मुझे बताने का हो, जबलपुर आ जाएं। दो-चार दिन आपकी सुनूंगा बैठ कर। और मैं आपसे कहता हूं कि मैं जितना बोल कर आपको नहीं समझा सकता, उतना आपकी सुन कर मैं आपको समझा सकूंगा। आपका पूरा निकल जाए तो बड़ी आसानी होती है। बहुत आसानी होती है। प्रश्र्न: यह अनंत जोत है, यह कभी खत्म नहीं हुआ आज तक। तब फिर बड़ा मुश्किल है। प्रश्र्न: निकलता रहा है, निकलता रहेगा। फिर निकलने दीजिए, कोई हर्जा नहीं। कोई हर्जा नहीं। प्रश्र्न: क्या अध्यात्म के लिए योग सीखना चाहिए? अगर आप शरीर के स्वास्थ्य के लिए सीखना चाहते हैं, तो अदभुत है। उनका उपयोग बड़ा कीमत का है। शरीर के स्वास्थ्य के लिए अदभुत है। लेकिन शरीर के स्वास्थ्य का कोई सीधे अध्यात्म से वास्ता नहीं है, सिवाय इतना कि स्वस्थ शरीर अध्यात्म की यात्रा में आसानी से जाता है। अस्वस्थ शरीर को थोड़ी बाधा पड़ती है। और कुछ जो और दूसरी प्रक्रियाएं हैं, वे मानसिक सिद्धियों की हैं। और उनका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। अगर आपको टेलीपैथी साधनी है, हिप्नोटिज्म साधना है, और कुछ साधना है, तो भी वे उपयोगी हैं। लेकिन उनका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। मौलिक अध्यात्म का तो, जो मैं कह रहा हूं, वही बात है। और वह सब कर लें, तो भी आखिर में न करने पर उतरना पड़ेगा। प्रश्र्न: तो यह सब फिजूल की बात है? इस अर्थ में फिजूल की बात है--इस अर्थ में। जैसे एक आदमी कॉलेज में पढ़ने जाता है। और मैं कहता हूं कि अध्यात्म के लिए कॉलेज में पढ़ना बिलकुल फिजूल है। वह आदमी आकर कहे, तो कॉलेज में पढ़ना फिजूल है क्या? तो मैं उसको कहूंगा कि नहीं, कॉलेज में पढ़ने के दूसरे अर्थ हैं और दूसरे उपयोग हैं। अगर तुम्हें डॉक्टर बनना है तो कॉलेज में पढ़ो। लेकिन डॉक्टर या इंजीनियर बनने से कोई अध्यात्म का वास्ता नहीं है। वह तुम बिना डॉक्टर-इंजीनियर बने भी बन सकते हो। और डॉक्टर और इंजीनियर बन कर भी नहीं बन सकते हो। उससे कोई वास्ता नहीं है। तो जब मैं कहता हूं कि कोई भी विधि, कोई भी योग अध्यात्म के लिए व्यर्थ है, तो मैं यह नहीं कहता हूं कि योग व्यर्थ है। मैं यह कह रहा हूं कि ‘अध्यात्म के लिए’, वह कंडीशन खयाल में रखनी चाहिए। नहीं तो मुश्किल हो जाती है। प्रश्र्न: उसके दूसरे उपयोग हैं। हां, उसके दूसरे उपयोग हैं। उसके बहुत दूसरे उपयोग हैं। प्रश्र्न: हर जगह यही बताया गया कि अध्यात्म के मार्ग के लिए योग है। हां-हां, बिलकुल ही बताया गया है। प्रश्र्न: वही सोच से सब गड़बड़ी हुई है। बिलकुल ही बताया गया है। और उसकी गड़बड़ी हुई है। उसकी गड़बड़ी हुई है! जिस देश में सबसे ज्यादा योग की चर्चा है, उस देश में अध्यात्म कहां है? और कितने आसन और कितने योगासन चलते हैं, वह सब चलता है, लेकिन अध्यात्म कहां है? प्रश्र्न: जैसे परकाया प्रवेश से वह हुआ और वह हुआ और वह हुआ। इन सबका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। (प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) जरा भी नहीं। जरा भी नहीं। बल्कि कई अर्थों में बाधक हैं, क्योंकि ये आपको दूसरी डायरेक्शन में ले जाती हैं। बाधक इसलिए हैं, जैसे कि मैं जा रहा हूं, मुझे सीधे उदयपुर के स्टेशन पहुंचना है। बीच में कई रास्ते निकलते हैं, जो बाजार में जाते हैं--कोई प्रदर्शनी में जाता है, कोई सिनेमागृह में जाता है। वे अलग-अलग चले जाते हैं। और जब मैं सिनेमागृह की तरफ जाता हूं, तब स्टेशन के मार्ग पर बाधा पड़ती है, क्योंकि सिनेमा अटकाएगा। अगर मुझे सीधे ही जाना है, तो सिनेमा के सामने से नमस्कार करते हुए निकलना चाहिए कि मैं अभी स्टेशन जा रहा हूं, मैं नहीं आता कहीं। हालांकि ये सब रास्ते में पड़ते हैं और बगल में कट जाते हैं। अब जैसे, एक राममूर्ति जैसा आदमी है, पहलवान है। जितने राममूर्ति के शरीर में जो तत्व हैं, वे हम सबके शरीर में हैं। और हममें से कोई भी राममूर्ति बनना चाहे, तो प्रयास करने से बन सकता है। कोई बाधा नहीं है। लेकिन राममूर्ति इतना श्रम करके जब शरीर को बनाता है, तो हम चकित हो जाते हैं, चमत्कृत हो जाते हैं। कार निकल जाती है छाती पर से, उसे पता न चले! पत्थर तोड़ो उसकी छाती पर, उसको चोट न आए! पीछे से कार को पकड़ ले हाथ से, तो कार भनभनाती रहे, लेकिन आगे न बढ़ सके! यह हम सबके शरीर में छिपी हुई ताकतें हैं। लेकिन इन पर काम करने से कोई अध्यात्म का संबंध नहीं है। कोई कहे कि राममूर्ति बनना पड़ेगा, तब अध्यात्म में जा सकोगे, तो बड़ा मुश्किल मामला है। राममूर्ति से कोई लेना-देना नहीं है। यानी इसका मतलब हुआ कि शरीर है। शरीर में दो रास्ते हैं: एक शरीर को पार करके मन की तरफ जाता है और एक शरीर में ही भीतर जाता है, मन में नहीं जाता। इसको समझ लेना। ऐसा हम समझ लें कि यह शरीर है, यह मन है, यह आत्मा है। तो एक रास्ता तो शरीर से मन की तरफ जाता है, मन से आत्मा की तरफ जाता है। एक रास्ता शरीर से और शरीर की गहरी मिस्ट्री में जाता है। एक रास्ता मन से और मन की गहरी मिस्ट्री में जाता है। एक रास्ता आत्मा से और आत्मा की गहरी मिस्ट्री में जाता है। यानी वर्टिकल रास्ते हैं और हॉरिजंटल रास्ते हैं। तो राममूर्ति हॉरिजंटल जा रहा है--शरीर में। तो वह शरीर के सारे रहस्यों को खोज ला सकता है। और हो सकता है कि आगे आने वाले खोजी राममूर्ति को पीछे कर दें, और भी खोज लाएं। शरीर खुद एक अनंतता है। उसमें भी बड़े रहस्य भरे हैं, जो हमें हो सकता है पता भी न हों अभी--बिलकुल पता नहीं हैं। तो हठयोग शरीर में घुस जाता है--सीधा। तो जन्मों-जन्मों तक आप जा सकते हैं। और अदभुत रहस्य अनुभव करेंगे, अदभुत शक्तियां पा लेंगे। लेकिन अध्यात्म से कोई लेना-देना नहीं है। ये शरीर के ही रहस्य हैं। लंबी उम्र हो जाएगी, लोहकाया हो जाएगी। क्या हो जाए, वह सब हो सकता है। उससे कोई लेना-देना नहीं है। वर्षों तक मृत्यु भी टाली जा सकती है, वह सब हो सकता है। इससे कोई प्रयोजन नहीं है। जहां तक ऊपर प्रवेश के लिए तो सामान्य स्वस्थ शरीर पर्याप्त है, उसमें इतने गहरे जाने की कोई जरूरत नहीं है। यानी वह मामला ऐसे ही है, जैसे एक कार आदमी चलाता है। आप कार चलाते हैं। आप सिर्फ व्हील भर चला लेते हैं और एक्सेलेरेटर दबा लेते हैं और गाड़ी मोड़ लेते हैं। बस काम हो गया। कार के भीतर घुसने की आपको कभी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी कि वह कैसे काम करती है, क्या नहीं करती है। वह एक मैकेनिक है, वह उस दुनिया में जाता है। आप बिना जाने कार चला लेते हैं। बस, आपके लिए इतना काफी है, पर्याप्त है कार को चला लेने के लिए। मैकेनिक के लिए इतना काफी नहीं है। हो सकता है, अधिक कार चलाने वालों ने भीतर झांक कर भी न देखा हो कि कार में होता क्या है। या आप उनसे पूछें कि कार कैसे चल जाती है, तो वे न बता सकेंगे। वे कहेंगे, हम इतना जानते हैं कि हम पैर दबाते हैं, व्हील चलाते हैं, इससे ज्यादा हमें कुछ पता नहीं है। फिर जो आदमी शरीर से मन पर जाता है, तो मन में भी हॉरिजंटल रास्ता है। अगर मन में हॉरिजंटल चले जाएं, तो सिद्धियां हैं, रिद्धियां हैं, उन सबकी दुनिया है; चमत्कार है, वह सारी दुनिया है। क्या नहीं किया जा सकता--वह सब होता हुआ वहां मालूम पड़ेगा। लेकिन वह फिर आप अंदर घुस गए मन में। ऊपर जाने के लिए तो मन शांत हो, इतना काफी है। इससे ज्यादा भीतर जाने की कोई जरूरत नहीं है। और वह तीसरा आत्मा का है। अब अगर आत्मा में भीतर प्रविष्ट हो जाएं, तो फिर दूसरी बातें मिलना शुरू हो जाएंगी। जो लोग आत्मा में ऐसे हॉरिजंटल प्रविष्ट हो गए, उनको दूसरी बातें मिलीं। लेकिन जो आत्मा में वर्टिकल गए, उनको परमात्मा मिल गया। इसलिए जो लोग. जैसे मैं कहूं, जैसे जैन हैं, वे आत्मा में सीधे चले गए, इसलिए परमात्मा उनकी धारणा में नहीं आ सका। उसका कुल कारण इतना है कि वे ऐसा वर्टिकल नहीं गए। आत्मा के और ऊपर नहीं गए, आत्मा के भीतर चले गए, तो वहां कहीं परमात्मा नहीं मिला। उन्होंने कहा, परमात्मा नहीं है। अभी पश्र्चिम का मनोविज्ञान है, वह मन में सीधा चला गया। वह कहता है, आत्मा नहीं है। पश्र्चिम की फिजियोलॉजी है, मेडिकल साइंस है, वह शरीर में सीधी चली गई। वह कहती है, कहां की आत्मा, कहां का मन, कुछ नहीं है! सिर्फ शरीर है, सब शरीर का मैकेनिज्म है। मेरा मतलब समझे न आप? तो यह सारी मिस्ट्री है, इसलिए सारी दिक्कत है। और मैं जो बात कर रहा हूं, वह सिर्फ उतनी बात कर रहा हूं, जिसमें वर्टिकल आप सीधे चले जाएं। जहां से--आप हैं, वहां से वहां चले जाएं, जहां प्रभु है। इसके बीच में जो और रास्ते कटते हैं, उनकी मैं बात ही नहीं कर रहा। लेकिन वे सब रास्ते हैं, उन पर जाया जा सकता है, जाने की साइंस है। इसलिए पतंजलि व्यर्थ नहीं हैं; पश्र्चिम का विज्ञान व्यर्थ नहीं है, मनोविज्ञान व्यर्थ नहीं है। सब सार्थक हैं। लेकिन सीधे जाने वाले के लिए सब उपद्रव हैं। क्योंकि वह आड़े गया--कि आड़े भी जाने में इतना लंबा है कि शायद कभी न लौटे, या जन्म-जन्म लग जाएं और न लौटे। तो नाक सीधी रख कर ही जाने की बात है। इसलिए बिलकुल मुद्दे की बात कर रहा हूं, जिसमें नाक जरा भी इधर-उधर न हो जाए। पर, वह कोई व्यर्थ है, ऐसा नहीं कह रहा हूं, इस दृष्टि से व्यर्थ है। सिनेमा की अपनी सार्थकता है, अस्पताल की अपनी सार्थकता है; लेकिन जिसको स्टेशन जाना है, वह सिनेमा को भी छोड़ता है, अस्पताल को भी छोड़ता है, स्टेशन की तरफ सीधा भागता है। इतना ही सार्थक है। प्रश्र्न: मैं संन्यास लेने के संबंध में आपकी गाइडेंस लेना चाहती हूं? एक तो यह है, जब तक संन्यास लेने के लिए किसी से सलाह लेने का खयाल उठे, तब तक संन्यास मत लेना। जब वह ऐसी भाव-दशा बन जाए कि सारी दुनिया कहे कि मत लो और फिर भी लेना पड़े, तभी लेना। उसके पहले नहीं। नहीं तो बहुत तकलीफ में पड़ोगी। प्रश्र्न: तकलीफ का मतलब.? तकलीफ का मतलब यह. क्योंकि जब हमारा मन किसी से पूछता है, तो उसका मतलब है कि हम खुद बहुत साफ नहीं हैं, तब तक हम पूछते हैं। प्रश्र्न: नो, दि क्वेश्चन अराइजे़ज ओनली बिकॉ़ज आइ हैव टु बी इन दि वर्ल्ड, एंड लुक ऑफ्टर माइसेल्फ, एंड आइ हैव टु वर्क। दैट मे टेक टाइम। आइ डोंट माइंड टेकिंग दिस मूमेंट। न, न, न। समझा मैं। मैं यह कह रहा हूं कि जब तक हमारे मन में कोई खुद स्थिति साफ नहीं होती है, तभी तक गाइडेंस का खयाल होता है। गाइडेंस--टु आस्क फॉर गाइडेंस, मीन्स टु बी कंफ्यूज्ड। मेरा मतलब समझी तू? गाइडेंस के लिए जब भी हम कहीं पूछने जाते हैं, तो उसका मतलब हम कंफ्यूज्ड हैं। और इसलिए दो तरह के संन्यासी हैं इस दुनिया में। एक वे, जिन्होंने किसी से मार्ग-दर्शन लेकर संन्यास ले लिया। और एक वे, जो संन्यासी हैं। जो संन्यासी हैं, उन्होंने कभी किसी से पूछा ही नहीं। उनका तो मजा और है। तो जिस दिन तुझे ऐसा लगे कि एक बात खत्म हो गई है, संन्यासी होना ही मेरा आनंद है। ठीक, बात खत्म हो गई, किसी से पूछना ही मत। किसी से भी मत पूछना! किसी से पूछा, उसका मतलब यह है कि तू अभी भी कंफ्यूज्ड है कि लेना कि नहीं लेना--और डिसीजन लेने में किसी का सहारा लेना है। फिर तुझे दोनों उत्तर मिलेंगे। प्रश्र्न: दि डिसिजन आइ वांट टु टेक, बिकॉ़ज आइ एम कंफ्यूज्ड, बिकॉ़ज आइ डोंट नो दि वर्ल्ड, आइ डोंट नो वेयर टु एडज्वाइन एट प्रेजेंट। हां-हां, इसीलिए तो। इसलिए तुझे दोनों एडवाइज देने वाले मिलेंगे। कोई कहेगा कि मत लो, कोई कहेगा कि लो। फिर भी तुझे आखिर में खुद डिसाइड करने पड़ेगा। प्रश्र्न: ईवन इफ इट इ़ज पॉसिबल ऑफ्टर टेकिंग संन्यास, एज यू से, कंटीन्यु वर्क। बट आइ से वॉट इ़ज दि यूज? इट इ़ज ओनली फॉर दि सोसाइटी। आइ टोल्ड वन ऑफ दि स्वामीज हूम आइ मेट, आइ सैड, वॉट डिफरेंस इट मेक्स.? हां, और दूसरी बात यह खयाल रखना कि जैसे तुझे यह दिखाई पड़ता है कि संसारी लोग हैं, तो वे तुझे दिखाई पड़ते हैं, वैसे ही संन्यासियों को भी देख लेना कि उनकी क्या हालत है। आमतौर से आदमी सोचता है कि भई शादी करने से कोई खास सुखी तो कोई दिखाई पड़ता नहीं है, तो क्यों शादी करना है। प्रश्र्न: बट आइ डोंट हैव अनहैप्पीनेस इन माइ लाइफ.। समझ गया, मैं तेरी बात समझ गया। इसी तरह यह भी सोच लेना चाहिए कि संन्यास लेने से कौन-कौन आनंदित दिखाई पड़ता है। प्रश्र्न: बट देन यू से दैट ब्लिस इ़ज इटरनल। न, न, न। ये सब बातें तो ठीक हैं, इन सब बातों से क्या मतलब है तेरी प्रॉब्लम का। प्रश्र्न: सपोजिंग दे आर नॉट हैप्पी, मीन्स दे डोंट सी दि हैप्पीनेस इन देम। हां, तो फिर तू कहीं भी देख सकती है। फिर क्या सवाल है लेने-देने का? फिर तो जहां भी हो, देखो। जब यह मामला है कि हमारे देखने का सवाल है, तो फिर यह पूछना ही क्यों कि इस कमरे में बैठे हैं कि उस कमरे में? फिर तो जहां बैठ गए वहीं बैठे रहें और देखते रहें। फिर तो नर्स रहे तो भी देख हैप्पीनेस, संन्यासी हो जाओ तो देखो हैप्पीनेस। फिर तो कोई झगड़ा ही नहीं है। अगर देखने का ही मामला है, तो झगड़ा ही नहीं है। लेकिन इतना मामला नहीं है, देखने का ही मामला नहीं है, दिखनी चाहिए। देखोगी कैसे? देखोगी कैसे? देखोगी तो गड़बड़ रहेगा मामला। फिर झंझट रहेगी, फिर लगेगा उस कमरे में चले जाएं, शायद वहां ज्यादा दिखाई पड़ती हो; उस कमरे में चले जाएं। यह सवाल नहीं है। और दूसरा मामला यह है कि तू कहती है कि हम फ्रस्ट्रेटेड नहीं हैं। यह तो अच्छा है। यह बहुत अच्छा है! और तू यह कहती है कि हमें इसकी भी फिकर नहीं है कि कौन क्या कहता है। यह भी बहुत अच्छा है। तब किसी तरह के गाइडेंस की फिकर छोड़ दो। और जैसा जीने में मौज आए जीओ। एक ही बात ध्यान रखना कि संसारी से संन्यासी होना बहुत आसान है। फिर संन्यासी से संसारी होना बहुत मुश्किल पड़ जाता है। क्योंकि अभी अगर तू संन्यासी होना चाहेगी, तो सब कहेंगे, बहुत बढ़िया है। शोरगुल मचाएंगे, ताली बजाएंगे, आशीर्वाद देंगे। स्वामी मिल जाएंगे, सब मिल जाएंगे। फिर अगर तूने कहा कि हम वापस लौटते हैं, तो सब द्वार बंद हो जाएंगे। सब तरह की निंदा, अपमान और गाली-गलौज होगी। तो यह जो समाज है, बहुत चालाक है। यह जाने का तो छोड़ता है रास्ता, लौटने का नहीं छोड़ता है। तो मेरा कहना है, हमेशा वह चुनाव करना चाहिए जो आगे भी स्वतंत्र रखे, बांध न दे। नहीं तो फिर तकलीफ शुरू होती है। अभी तेरे को नर्स होने में कोई नहीं बांध रहा है। तू मुक्त है ज्यादा। संन्यासिनी होकर तब मुक्त होगी. क्योंकि नर्स होना तू इसी वक्त छोड़ दे, दुनिया कुछ भी नहीं कहेगी। लेकिन कल अगर संन्यासी होना छोड़ा, तो बहुत मुसीबत में पड़ जाएगी। इसलिए मैं कहता हूं कि नर्स होना ज्यादा फ्रीडम की स्थिति है, बजाय संन्यासी होने के। एक चमार होना भी ज्यादा स्वतंत्र स्थिति है, बजाय एक मुनि होने के। क्योंकि चमारी कभी भी छोड़ सकते हैं। यह मुनि का धंधा कभी भी नहीं छोड़ सकते। यह मुश्किल मामला है। प्रश्र्न: बट दिस पाथ इ़ज ए पाथ ऑफ एवोल्यूशन। सब पाथ एवोल्यूशन के हैं। कोई पाथ ऐसा नहीं है जो एवोल्यूशन का न हो। एवोल्यूशन करना चाहिए, तो किसी भी पाथ से होती है। और इसलिए जिस पाथ पर ज्यादा से ज्यादा फ्रीडम हो, उस पर ही ज्यादा से ज्यादा एवोल्यूशन होती है। बांधना नहीं चाहिए। यानी संन्यास का मतलब भी क्या होता है? जब कोई मुझसे पूछता है कि संन्यास ले लें, तभी मुझे हैरानी होती है। संन्यास का मतलब होता है: ऐसा आदमी जो कोई नियम-वियम नहीं मानता। कुछ बंधन नहीं मानता। जो किसी की कोई फिकर नहीं करता। जिसको जो मौज में आता है करता है। संन्यास का यह मतलब होता है। लेकिन जब कोई कहता है कि संन्यास ले लें, तो वह यह कहता है कि हम उस फलानी तरह के बंधन में बंध जाएं, उस तरह की पर्टीकुलर बांडेज को स्वीकार कर लें? तो बड़े मजे की बात है। संन्यासी का तो मतलब है: फ्रीडम। संन्यासी का मतलब है: मौज से रहो। जो ठीक लगे, करो। और बंधो मत। समझी न? बंधो मत। लेकिन बिना बंधे काम नहीं चलता है। या तो कोई कहता है शादी करो इसमें बंधो, या कोई कहता है शादी न करो तो संन्यास में बंधो। लेकिन गैर-बंधे मत रहो! कहीं न कहीं बंधो! बीच में नहीं टिकने देंगे! और स्त्री को तो बिलकुल नहीं टिकने देंगे, क्योंकि पूरी की पूरी समाज की व्यवस्था पुरुष की बनाई हुई है। स्त्री की दुश्मन है वह पूरी व्यवस्था। वह कहती है, गुलाम बनो! या तो पत्नी बनो, या साध्वी बनो! स्वतंत्र नहीं रहने देंगे! और मेरा मतलब है, संन्यासी का मतलब होता है: स्वतंत्र रहना। स्वतंत्र रहो। जब तक नर्स रहना है नर्स रहो, तुम्हें कुछ और बनना है और बनो। लेकिन किसी से दीक्षा-वीक्षा मत लेना। वह सब नालायकी, वह गंवारी है। किसी से क्या दीक्षा लेनी है? स्वतंत्रता की किसी से दीक्षा लेनी पड़ती है? परतंत्रता की लेनी पड़ती है। स्वतंत्र रहो, बस ठीक है। खोजो अपना आनंद, जहां तुम्हें मिले। और किसी से डरो मत, यही संन्यासी का मतलब होता है। किसी से डरो मत। अभी तुम संन्यास भी लोगी, तो डरना पड़ेगा। जिनसे लोगी, उनसे डरना पड़ेगा। जिस सोसाइटी के चक्कर में पड़ोगी, उनसे डरना पड़ेगा। वे कहेंगे, यह खाओ, यह पीओ; इस वक्त उठो, इस वक्त सोओ; यहां जाओ, वहां मत जाओ। मुश्किल हो जाएगी। फिर तुम पाओगी कि बहुत मुसीबत हो गई। यह तो नर्स होने से ज्यादा बदतर हो गया है। एक बात ध्यान में रखो, हमारा किस तरफ आनंद बढ़ता है वह करते रहो, करते रहो। जिस दिन तुम पूरी स्वतंत्र हो जाती हो, उस दिन तुम संन्यासिनी हो गई। किसी से लेना-देना थोड़े ही है। मेरा मतलब समझी न? नर्स रहते-रहते हो जा सकती हो, छोड़ कर भी हो सकती हो। प्रश्र्न: नो, बट स्प्रिचुअल नॉलेज. अरे, स्प्रिचुअल नॉलेज कौन रोक रहा है? प्रश्र्न: माइ कैपिसिटी इ़ज लिमिटेड। सबकी लिमिटेड है। सबकी लिमिटेड है। संन्यासी की भी लिमिटेड है। तुम क्या समझती हो, संन्यासी को कोई फिकर नहीं है। लेकिन उसको भी सुबह-शाम फिकर करनी पड़ रही है कि कहां से खाना मिलेगा, कहां ठहरना मिलेगा। तुम्हारा तो ज्यादा निश्र्चिंत है। मेरी अपनी मान्यता यह है कि जो आदमी छह घंटे, आठ घंटे मेहनत कर रहा है, उसके बाकी घंटे तो मुक्त हैं। संन्यासी चौबीस घंटे नौकर है। और निपट गंवारों का नौकर है। जिनमें कोई बुद्धि भी नहीं उनका भी। तुम तो छह घंटे दफ्तर से लौट आईं, तो मुक्त तो हो, फिर तुम्हें जो करना हो। नाचना हो नाचो, गाना हो गाओ, जो करना हो करो। फिर नहीं कर सकतीं। क्योंकि गंवार चारों तरफ से देख रहे हैं कि क्या कर रही हो--किससे बात कर रही थी, किससे मिल रही है, कहां जा रही है। और अगर गड़बड़ की, तो खाना बंद, इज्जत बंद। सब मुश्किल हो जाता है। कुल इतनी फिकर करो कि दो-चार घंटे; दो घंटे, तीन घंटे कर लिया काम, उससे तुम्हारा खाने लायक निकल आता है, बाकी बीस घंटे तुम मुक्त हो। उस बीस घंटे की मुक्ति का जो भी तुम्हें करना हो करो। उपयोग करो। और नॉलेज से कौन रोकता है। और नॉलेज तो सब तरफ बंटी है, खोजो। बंधो मत। संन्यासी होने का मतलब है, बंधो मत। तो मैं कहता हूं, संन्यासी हो जाओ, तो उसका मतलब ही सिर्फ इतना होता है कि बंधो मत। मुक्त रहो, बस ठीक है। और वे जो कहते हैं कि संन्यासी हो जाओ, उनका मतलब दूसरा है। उनका मतलब है कि बंधो, मुक्त मत रहो। हमसे बंधो, खास ढांचे में बंधो। बिलकुल बुद्धूपन है। इसमें कुछ मतलब नहीं है। मुक्त रहो, जिससे सीखना है सीखो, कोई हर्जा नहीं है। जल्दी क्या, बंधने की क्यों जल्दी करती हो। प्रश्र्न: आइ विजिटेड टू-थ्री प्लेसेस एंड देन आइ ऑब्जर्व्ड एवरीथिंग। आइ सैड, माइ ऐम इ़ज टु प्रोग्रेस ऑन दि स्प्रिचुअल पाथ, एंड आइ डू नॉट फाइंड इट.। हां-हां, करो न। कुछ भी, कुछ भी करो। मजे से मुक्त रह कर करो। और तुम्हें लगे कि संन्यासी होने में ज्यादा मुक्ति है, तो संन्यासी हो जाओ। मुझे कोई अड़चन नहीं है किसी बात की। मुझे तो कोई स्त्री आकर कहे कि मुझे वेश्या होने में ज्यादा स्वतंत्रता है, मैं तो कहूंगा, वह हो जाओ। तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारी खोज, तुम्हें जहां जैसा--कोई तुम्हें बांधने वाला नहीं होना चाहिए। तुम अपनी मालिक हो, अपनी जिंदगी को बसो। जो तुम्हें लगे, वह करो। मगर बंधना-वंधना कहीं भी नहीं। बंधना-वंधना कहीं भी नहीं! और यह गुरुडम से बचना। सब गुरु घूम रहे हैं इसी तलाश में! यह एक संन्यासिनी बैठी है होने वाली पहले से। फिर यह असली में हो गई है। इसने सोचा कि अब जाने दो। प्रश्र्न: सच्चा संन्यास हो गया क्या? हूं-हूं। (प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।) कर सकती हो बराबर, क्योंकि अभी पूरा ज्ञान तो नहीं है न! और कल ज्यादा ज्ञान होगा, आज की बजाय। इसलिए लौटने का हमेशा उपाय रखना चाहिए। क्योंकि कल तुम ज्यादा ज्ञानवान होगी, आज की बजाय। और आज से अगर तुम कल को बांधती हो, तो तुम गलती में हो। जितना मैं आज जानता हूं, कल और ज्यादा जानूंगा। और मैं आज कसम खाता हूं कि मैं पीछे नहीं लौटूंगा, और कल मैंने जाना कि यह सब गड़बड़ था, फिर? इसलिए लौटना, नहीं लौटना, सब स्वतंत्र रखो। और कोई कहीं बंधने की जरूरत नहीं है। स्थान-विस्थान देश की भी कोई जरूरत नहीं है। प्रश्र्न: बट वॉय वी शुड थिंक दैट वी हैव टु कम बैक एंड वी वांट टु.? यह सवाल ही नहीं है न। यह सवाल ही नहीं है। यह सब हो सकता है। आज तुम जिस रास्ते पर जाती हो कल पा सकती हो कि वह आगे जाता ही नहीं है, फिर तुम क्या करोगी? फिर लौटोगी नहीं, कसम खाकर उसी पर खड़ी रहोगी? प्रश्र्न: बट इट विल बी सो कांप्लिकेटेड टु थिंक नाउ.। कांप्लिकेशन से जो डरता है, जो कांप्लिकेशन से डरता है वह जिंदगी से डरता है। उसको सुसाइड करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। प्रश्र्न: दैट्स वॉय आइ से वॉय आइ शुड थिंक मोर एंड मोर, बिकॉ़ज एज आइ थिंक, मोर एंड मोर कांप्लिकेशंस.। कांप्लिकेशंस से जो डरता है, वह जिंदगी से ही डरता है। उसको कुछ सत्य कभी नहीं मिलेगा। प्रश्र्न: सो ऑल दीज थिंग्स आइ नेवर थॉट ऑफ। बिलकुल कांप्लिकेशंस बढ़ाओ अच्छी तरह से। प्रश्र्न: बढ़ाना है? बिलकुल। तभी तो जिंदगी का अनुभव होगा, नहीं तो अनुभव नहीं होगा। अगर एक स्त्री वेश्या होकर साध्वी हो, तो मैं जानता हूं कि जो वह जानेगी, वह वह लड़की कभी भी नहीं जान सकती जो कभी किसी के प्रेम में नहीं गई। बुरे से बुरे रास्ते पर गया हुआ आदमी भी जब अच्छे से अच्छे रास्ते पर जाता है, तो उसका जो जानना है वह रिच होता है, समृद्ध होता है। उसकी जिंदगी और गहरी होती है। कांप्लिकेशंस तो गहरा करते हैं। उससे डरना क्या है! और कांप्लिकेशंस से डरना है, तो दरवाजा बंद करके अपने बैठ जाओ और मर जाओ। सुसाइडल है। प्रश्र्न: बट व्हेन डिफिकल्टी अराइज, सपोज आइ गो ऑन वन पाथ, व्हेन दि डिफिकल्टी अराइज देन आइ सी दि डिफिकल्टी इमिजिएटली। वॉय शुड आइ फील दि डिफिकल्टी बिफोर आइ स्टार्ट? मत सोचो, जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करो। यह भी तो सब सोचना ही है न! प्रश्र्न: नो, दैट इ़ज आइ एम जस्ट टाकिंग टु यू। यह सब सोचना ही है। तो बचोगी कहां? जाओगी कहां? मत सोचो। बस एक ही बात ध्यान रखो कि बचो मत जिंदगी से। भगवान जिंदगी में धक्का देता है कि जाओ जानने को और महात्मा समझाते हैं कि बचो! ये महात्मा जो हैं, परमात्मा के सबसे बड़े दुश्मन हैं। महात्माओं से बचना, बस और कुछ नहीं, अगर परमात्मा पाना हो। महात्माओं को तो परमात्मा मिलते नहीं, चंद्रेस जी। देखा आपने कभी किसी महात्मा को परमात्मा मिला? कभी नहीं मिला। पापी को भी मिल जाए, पंडितों को नहीं मिलता।
Osho's Commentary
तो मेरा कहना यह नहीं है कि राग-द्वेष से कैसे हलके हों। मेरा कहना यह है कि पहले यह जानें कि राग-द्वेष और आप एक हैं या दो हैं? बस इसकी खोज करें, इसका पूरा विश्लेषण करें अपने मन में कि राग और मैं एक हूं कि अलग-अलग हूं? और जितना आपको साफ होता चला जाएगा कि मैं अलग हूं--राग वह रहा, द्वेष वह रहा, मैं यह रहा--जितना यह भाव गहरा होगा, राग-द्वेष क्षीण होते चले जाएंगे। जिस दिन यह बात पूरी स्पष्ट हो जाएगी कि मैं सबसे पृथक हूं--न कोई राग है, न कोई द्वेष है--उस दिन आप बाहर हो गए।
यानी सच में तो कोई राग-द्वेष के भीतर नहीं है, जो बात मैं कहना चाहता हूं। और उसको मान लिया कि हम राग-द्वेष में हैं! फिर बड़ी कठिनाई हो गई। फिर उससे निकलने का उपाय करना पड़ेगा।
इसका साक्षीभाव भर एकमात्र उपाय है। राग के भी साक्षी बनिए, द्वेष के भी साक्षी बनिए। सिर्फ साक्षी बनिए। बचने की कोशिश मत करिए, न भागने की कोशिश करिए। जब राग आए, तब साक्षी बनिए कि राग आया, मैं देख रहा हूं कि राग आया--मैं यह अलग हूं, राग यह रहा। जब द्वेष आए, तो देखिए कि द्वेष आया--यह द्वेष आ रहा है, मैं अलग हूं। ऐसे ही जैसे अंधेरा आता है तो देखते हैं हम, उजाला आता है तो देखते हैं हम।
अभी यहां उजाला है। बैठे रहें, सांझ होगी, अंधेरा आ जाएगा। तब हम यह नहीं कहेंगे कि मैं अंधेरा हो गया। तब हम कहेंगे, अब अंधेरा आ गया। फिर सुबह होगी, हम कहेंगे, उजाला आ गया। और मैं? मैं तो अलग हूं। अंधेरा आता है, उजाला आता है; आता है, चला जाता है।
राग और द्वेष भी ऐसे ही आ और जा रहे हैं। उनके पीछे मैं अकेला खड़ा हूं, अलग खड़ा हूं। भ्रांति यह हो रही है कि राग आता है, तो उसको पकड़ लेता हूं कि यह मैं हूं। द्वेष आता है, तो पकड़ लेता हूं कि यह मैं हूं। यह जो आइडेंटिटी हो जाती है, बस इसको ही तोड़ देना है। और तोड़ने के लिए आप कुछ करेंगे नहीं। तोड़ने के लिए सिर्फ इसको देखना काफी है।
जैसे, जब क्रोध आए, तो यह देखें कि क्रोध आ गया है। और आप हैरान हो जाएंगे, जैसे ही यह पता चला कि क्रोध आ गया है और मैं अलग खड़ा हूं, तो आप देखेंगे कि क्रोध धुएं की तरह क्षीण होकर उड़ गया। आप खड़े रह गए हैं, क्रोध अब नहीं है।
तो जो भी वृत्ति आती हो, सिर्फ साक्षी हो जाएं, एक विटनेस हो जाएं।
प्रश्र्न:
व्यक्तियों के संपर्क में आते ही उभर तो जाता है।
उभरने का अभी मैं कुछ कह नहीं रहा कि नहीं उभरेगा। यह मैं कहां कह रहा हूं। मैं यह कह ही नहीं रहा कि नहीं उभरना चाहिए। यह भी नहीं कह रहा हूं। मैं तो यह कह रहा हूं: जो हो जाता है, उसके साक्षी बनें। साक्षी बनने से वह धीरे-धीरे नहीं हो जाएगा। तब व्यक्ति के संपर्क में आएंगे आप, लेकिन बीच में कुछ नहीं उभरेगा। तब उधर एक व्यक्ति होगा, इधर एक व्यक्ति होगा। बीच में कुछ भी नहीं होगा। न राग होगा, न द्वेष होगा।
यानी अगर इसे ठीक से समझें, तो हमारी अमूर्च्छा. हमारी अमूर्च्छा ही राग-द्वेष से मुक्ति का उपाय है। और हमारी मूर्च्छा ही राग-द्वेष में गिर जाना है।
बेहोश हैं हम, और इसलिए पकड़ लेते हैं एकदम, जो भी आ जाता है। जब क्रोध आता है, तो ऐसा नहीं लगता है कि मुझे क्रोध आ रहा है, ऐसा लगता है कि मैं क्रोध हो गया हूं! अगर बहुत गौर से देखें, तो ऐसा लगता है मैं क्रोध हो गया! आग जल गई, मैं ही आग हो गया हूं! उस वक्त ऐसा थोड़े ही है कि हम क्रोध में आकर किसी को मार रहे हैं; हम क्रोध हो गए हैं और मार रहे हैं!
इसलिए तो क्रोध के बाद ऐसा लगता है कि अरे, यह मैंने कैसा कर दिया! मैं तो कभी नहीं कर सकता था, फिर यह कैसे हुआ! आप थे ही नहीं मौजूद, आप बिलकुल सो गए थे, क्रोध ही सब-कुछ हो गया था। अब वह सब करवा रहा है। फिर पछताते हैं। लेकिन जो भूल क्रोध करने में की थी, वही भूल पछताने में कर रहे हैं। उस वक्त मान लिया था कि मैं क्रोध हूं, अब मान रहे हैं कि मैं पछतावा हूं। बुनियादी भूल वही है। अब आप यह समझ रहे हैं कि मैं पश्र्चात्ताप कर रहा हूं, मैं पश्र्चात्ताप हो गया हूं। रो रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि क्या हो गया! यह नहीं होना चाहिए था। अब आप कहते हैं, मैं छोडूंगा। पहले आपने पकड़ने की भूल की, अब आप कहते हैं, छोडूंगा।
इसलिए मैं कहता हूं: पकड़ना भी नासमझी है, छोड़ना भी नासमझी है। यह जानना समझदारी है कि मैं अलग हूं और यह अलग है। न पकड़ना है, न छोड़ना है।
तो इसकी तो क्रमिक जागरूकता चाहिए, चौबीस घंटे। जब भी कोई घटना घटती हो, तब इतना होश रखें कि क्या हो रहा है, मैं अलग हूं या नहीं? और यह अलग होने का भाव बढ़ता चला जाए। जैसे, अभी आप सुन रहे हैं, आप चाहें तो रागाविष्ट होकर सुन सकते हैं और चाहें तो द्वेष-आविष्ट होकर सुन सकते हैं। और चाहें तो सिर्फ सुन सकते हैं। ये तीनों बातें संभव हैं। सुनते वक्त अगर आप यह सोच रहे हैं कि हां, यह बात ठीक है, इसको पकड़ लें और करें, तो राग शुरू हो गया। अगर सुनते वक्त आप यह सोच रहे हैं कि हमारी किताब के यह बात खिलाफ है, हमारे शास्त्र में जो लिखा है, उससे यह गड़बड़ बात है, यह हम नहीं सुन सकते, यह नहीं सुनना चाहिए, यह बिलकुल गलत है, तो आप द्वेष-आविष्ट हो गए, फिर भी आप नहीं सुन रहे हैं। तीसरा उपाय यह है कि आप सिर्फ सुन रहे हैं, और पीछे जो खड़ा है, उसे न कोई राग है, न द्वेष है; न वह यह कहता है कि यह गलत है, न वह यह कहता कि यह सही है--वह सिर्फ सुनता है, सुन लेता है। और इस सुनने से जो समझ पैदा होती है वह राग-द्वेष से मुक्त होगी। मगर ऐसा हम कभी नहीं सुनते हैं।
और ऐसा प्रत्येक क्रिया में प्रयोग करें, तो धीरे-धीरे राग-द्वेष से छूटते नहीं हैं, पाते हैं कि कभी बंधे ही नहीं थे। यानी जो मेरा जोर है बहुत. ऐसा नहीं होता कि किसी दिन आपको पता चलेगा कि राग-द्वेष से छूट गए आप। अगर ऐसा पता चला तो गलती जारी है। पता चलेगा, मैं कभी बंधा ही नहीं था।
जैसे एक आदमी रात सोया है एक घाट पर, नींद लग गई है और सपना देखता है कि कलकत्ते में है, या टोकियो में है। अब वह सपने में बड़ा बेचैन होता है कि मैं कितने दूर निकल आया उदयपुर से, और किसी से पूछता है कि मैं उदयपुर कैसे वापस जाऊं? अब क्या होगा? टोकियो निकल आया, घर हजार काम पड़े हैं। मैं तो घर सोया था उदयपुर में और टोकियो आ गया! सुबह मुझे उदयपुर होना है। अब मैं कैसे पहुंचूं? कौन सा हवाई जहाज पकडूं? कौन सा जहाज पकडूं? पहुंच पाऊंगा सुबह तक कि नहीं? ठीक पूछ रहा है, क्योंकि जहां तक उसके माइंड का संबंध है, वह टोकियो में पहुंच गया है। बाकी वह कहीं गया नहीं है, वह यहीं पड़ा हुआ है। सुबह आंख खुलती है, अब वह हैरान होता है कि मैं कैसे वापस आ गया! टोकियो चला गया था, टोकियो से वापस कैसे आया! लेकिन जागते ही वह पाएगा कि न मैं गया था और न मैं आया। मैं यहीं था। जाने का भ्रम हुआ था, फिर आने का भ्रम भी हुआ। क्योंकि जाने के भ्रम से आने का भ्रम पैदा होता है।
तो राग से पकड़े होने का एक भ्रम है, राग छूट जाने का दूसरा भ्रम है। और जो दोनों भ्रम से छूटता है, उसको हम वीतराग कहते हैं। वीतराग का मतलब है कि जिसने यह जाना कि मैं दोनों के पार हूं। वीत का मतलब बियांड। वीत का मतलब यह नहीं है कि छोड़ दिया। वीत का मतलब यह नहीं है कि छोड़ दिया! वीत का यह मतलब है कि मैंने कभी न पकड़ा था, न कभी छोड़ा। आइ वा़ज बियांड। और इस भ्रम में पड़ गया था कि उलझा हूं।
प्रश्र्न:
एम बियांड या वा़ज बियांड?
वा़ज बियांड। एम बियांड तो हैं ही। वह तो जब जानेंगे आप--तो जब आपको लग रहा था कि भीतर हूं, जब आप जानेंगे तब आप पाएंगे कि तब भी भीतर नहीं था। और भीतर नहीं हूं, यह तो साफ ही है।
तो इसलिए छोड़ने की भाषा में मुझसे मत पूछिए। छोड़ने की भाषा को ही मैं अज्ञान की भाषा मानता हूं। क्योंकि वह पकड़ने के अज्ञान की बाइ-प्रॉडक्ट है छोड़ना। किसी ने पकड़ा है, कोई छोड़ता है। कोई अपनी पत्नी को पकड़े हुए है, हालांकि जब वह पकड़े हुए तब भी पत्नी अलग है और वह अलग है। और कोई लाख उपाय करे तो भी पकड़े हुए नहीं है। कोई पकड़े हुए नहीं है! कितना ही पत्नी को पकड़ो, क्या पकड़ोगे? जिसको पकड़े हो वह पत्नी नहीं है और जो पत्नी है वह हाथ के बाहर है, बिलकुल मुट्ठी के बाहर है। इसलिए तो रोज कलह है कि पकड़े भी हुए हैं, लेकिन पूरा पाते हैं कि पकड़ नहीं है।
जो कह रहा है कि पकड़े हुए हैं, वह एक भ्रम में है। फिर एक दूसरा कहता है, मैं पत्नी को छोड़ कर जा रहा हूं। लेकिन वह छोड़ने का भ्रम पकड़ने की बाइ-प्रॉडक्ट है। अब वह कहता है कि हम पत्नी के पास नहीं आएंगे, हम पत्नी को देखेंगे नहीं, हम जंगल जाते हैं! हमने पत्नी को छोड़ दिया!
एक जैन मुनि बीस साल पहले छोड़े। उनकी मैं जीवनी पढ़ता था, तो बहुत दंग रह गया। बीस साल पहले कभी उन्होंने पत्नी को छोड़ा। बीस साल बाद पत्नी मरी। वे काशी में थे, उनको खबर पहुंची। तो उनकी जीवन-कथा में, जिसने लिखी है जीवन-कथा, उसने लिखा है कि अदभुत घटना घटी। जैसे ही खबर पहुंची, उन्होंने कहा कि चलो झंझट छूटी! तो उसने तारीफ में लिखा है यह कि कैसा त्याग कि पत्नी मर गई, तब भी उन्होंने कहा कि झंझट छूटी!
मैंने उस लेखक को लिखा कि तुम निहायत पागल हो। और अगर उन्होंने यह कहा हो, तो तुमसे भी ज्यादा पागल वह मुनि है। क्योंकि जिसको बीस साल पहले छोड़ आए थे, अब भी झंझट बाकी थी? जो तुम कहते हो झंझट छूटी! अब यह बड़े मजे की बात है।
बीस साल पहले उस पत्नी को छोड़ कर चले आए थे। लेकिन जिसको छोड़ कर चले आए थे, वह अपनी थी, यह भ्रम कायम है। क्योंकि छोड़ा तभी था, क्योंकि अपनी थी! वह अब भी अपनी है! छोड़ी हुई अपनी है! और उसकी झंझट जारी रही होगी कहीं इनर, किसी तल पर मन के झंझट जारी रही होगी कि पत्नी वहां है जिसको छोड़ दिया है। उसको कभी पकड़ा था! अब यह छोड़ दिया, यह दूसरा भ्रम। बीस साल बाद अब वह मर गई है, तो वे कहते हैं, चलो झंझट छूटी! मतलब झंझट बीस साल चलती थी? जो पत्नी छोड़ने से नहीं छूटी, पत्नी मरने से छूटी! इसको थोड़ा सोचना पड़ेगा। और जो पत्नी छोड़ने से नहीं छूटी थी, वह पत्नी के मरने से कैसे छूट जाएगी? यानी पत्नी तो एक अर्थ में मर चुकी थी। अब बीस साल से इसके लिए कोई मतलब न था आदमी के लिए। वह अब भी नहीं छूटी थी।
तो मेरा कहना यह है कि छोड़ने-पकड़ने की भाषा नहीं है। जो हो रहा है उसे देखने कि भाषा कि क्या हो रहा है, बस। और हम उसमें कितने डूबे हैं कि बाहर हैं।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
.और जिसके पैर में कांटा लग गया है उससे हम कहें कि एक दूसरा कांटा ले आओ, कांटा निकालें। वह आदमी कहे, मैं एक से ही परेशान हूं और आप दूसरा किसलिए बुलाते हैं? मैं तो कांटे से ही मरा जा रहा हूं, आप दूसरा बुलाते हैं! और हम उससे कहें कि तू ठहर जरा। पहले कांटे को हम दूसरे से निकाल लेंगे। हम कांटा ले आएं, बामुश्किल वह दूसरे को पैर में डालने दे। वह कहे कि एक से हम परेशान हैं, तुम दूसरा डालते हो! फिर हम दूसरे से निकाल लें पहले वाले को। और तब वह कहने लगे, अब हम दूसरे कांटे को सम्हाल कर अपने पैर में रखेंगे, क्योंकि इसने पहले वाले कांटे को निकलवा दिया। यह बड़ी कृपा है इसकी। हम इसको रखेंगे। तो हम उससे कहेंगे कि नहीं, दूसरे कांटे को भी फेंक दो। दूसरे का उपयोग इतना था कि वह पहले को निकाल दे। फिर इसका कोई उपयोग नहीं है। समझे न?
तो मैं विश्र्वास को निकालने को कहता हूं विचार की क्रांति से। और जब विश्र्वास जड़मूल से फिंक जाए, अंधापन जड़मूल से फिंक जाए, तो फिर विचार को भी फेंक देना है। इसलिए फिर निर्विचार--वह तीसरी सीढ़ी है।
विश्र्वास एक सीढ़ी है, वह सबसे नीची सीढ़ी है। दूसरी सीढ़ी विचार है। और तीसरी सीढ़ी निर्विचार है। समझे मेरा मतलब? तल हैं। जो अभी विचार में ही क्रांति नहीं कर सकता, वह निर्विचार क्या होगा? क्योंकि निर्विचार तो विचारमात्र को छोड़ना है। और ‘विचार में क्रांति’--गलत विचार को छोड़ कर ठीक विचार को पकड़ना है। और ‘विचार की क्रांति’--तो विचार को ही छोड़ देना है। वह तो आत्यंतिक क्रांति है। वह आखिरी क्रांति है।
मेरा मतलब समझ रहे हैं न?
हम सब विश्र्वास से घिरे हुए हैं, तो इनसे मैं कहता हूं कि विश्र्वास को छोड़ो, विचार को लाओ। और जब विचार आता है, तो मैं कहता हूं, अब विचार की भी कोई जरूरत नहीं है, इसे भी जाने दो। अब निर्विचार हो जाओ। और ऊपर है उसकी गति। दोनों बातें कहता हूं। दो तल पर बातें हैं। विरोध उसमें नहीं है। विरोध उसमें नहीं है!
जैसे एक आदमी ऊपर चढ़ रहा है मकान पर। वह एक सीढ़ी पर पैर रखता है। हम कहते हैं, अब पहली सीढ़ी को छोड़ो, ताकि तुम दूसरी पर पैर रख सको। अगर तुम पहली को पकड़े हो, तो दूसरी पर पैर नहीं रख सकोगे। वह दूसरी पर रखता है। फिर हम उससे कहते हैं, अब तुम दूसरी भी छोड़ो, ताकि तीसरी पर रख सको। वह कहेगा कि यह क्या गड़बड़ है? पहले आपने कहा था कि पहली को छोड़ो, ताकि दूसरी को पकड़ सको। हमने दूसरी को पकड़ लिया। आप कहते हैं, दूसरी को छोड़ो। हम उससे कहते हैं कि हमें पकड़ने-छोड़ने का सवाल नहीं है, हम तो तुम्हें आखिर में वहां ले जाना चाहते हैं, जहां कोई सीढ़ी न रह जाएगी--न पकड़ने को होगा, न छोड़ने को होगा। लेकिन सीढ़ी पार तो करनी पड़ेगी। ये सब सीढ़ियां हैं। निर्विचार तो आखिरी है, वहां सीढ़ियां खत्म हो जाती हैं, वहां कोई सीढ़ियां नहीं हैं।
प्रश्र्न:
फिर उसके बाद की क्या परिस्थिति नहीं है?
उसके बाद की परिस्थिति बिना जाए नहीं पता चलने वाली।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
नहीं-नहीं। फिर अपन सांझ को मिलेंगे। और कुछ जरूरी रह जाए तो वह लिख कर रख दें।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
आप आत्मा हो ही नहीं। और जो आप हो, जब तक न मिटोगे, तब तक आत्मा का कोई पता न चलेगा। आप तो बिलकुल मन हो, और वह परछाईं है।
प्रश्र्न:
अपन किस चीज की परछाईं में घूम रहे हैं?
इसकी ही खोज करनी चाहिए। इसकी ही खोज करनी चाहिए! और खोज करते से ही पता चलेगा कि अजीब बात है, कि हम घूम रहे हैं यह निपट पागलपन है। जब आप आईने में देखते हो तो किसकी परछाईं देखते हो?
प्रश्र्न:
कोई चीज होती है उसकी ही देखते हैं।
किसकी? आपकी ही न! और देखने वाले भी आप ही होते हो। और परछाईं भी अपनी ही देखते हो। जैसे हम आईने में अपनी परछाईं देख रहे हैं, तो आईना तो मुर्दा है, लेकिन आईना तक खुश करता है! अगर अच्छा आईना हो तो आप प्रसन्न लौटते हो परछाईं देख कर, उसमें सुंदर अगर आप दिखाई पड़ते हों। और अगर कुरूप दिखाई पड़ते हों, तो नाराज लौटते हो देख कर। और आईने को बेचारे को कुछ पता ही नहीं है, न आपको खूबसूरत बनाने की फिकर है, न आपको कुरूप बनाने की फिकर है। लेकिन आईना अगर सुंदर दिखा देता है आपको। और इतने सुंदर कोई भी नहीं हैं जितने आईने बता रहे हैं। वह तो आईना दुकानदार बना रहा है, जिसमें आप सुंदर दिखाई पड़ते हैं, और वह बेच रहा है। और आप देख कर बड़े प्रसन्न होते हो। कौन प्रसन्न होता है? किसको देख कर प्रसन्न होते हो?
और आईना तो मुर्दा है। दूसरों की आंखें एक जीवित आईना है, जिसमें हम अपनी परछाईं देखते हैं।
चार आदमी आपको कह देते हैं, आप बड़े अच्छे आदमी हैं, आप फूले हुए लौटते हो। किसी के अच्छे कह देने से क्या हो गया? एक परछाईं है। और चार आदमियों ने कह दिया कि तुम बिलकुल गंवार हो, बुद्धू हो, बुरे हो, तो आप दुखी लौटते और रात भर सो नहीं पाते, करवट बदलते हो, परेशानी मालूम होती है। क्या हो गया चार आदमियों के कहने से? परछाईं सुखद न बनी। जो हमने उनकी आंख में देखना चाहा था वह न दिखा! मुश्किल में पड़ गए। इसको मैं कह रहा हूं।
यह जो कह रहा हूं कि हम अपनी परछाईं में जी रहे हैं पूरे वक्त। देख रहे हैं कौन क्या कहता है, कौन क्या सोचता है, किसको हम कैसे दिखाई पड़ते हैं! और जो आदमी इस तरह परछाईं में जीएगा, वह आदमी सत्य की खोज में नहीं जा सकता। क्योंकि सत्य वहां हैं, जहां हम परछाईं से हटेंगे और पीछे जाएंगे, परछाईं छोड़ेंगे। फिकर छोड़ेंगे परछाईं की।
संन्यासी को हम कहते हैं आमतौर से कि संन्यासी वह है जो समाज छोड़ कर चला गया। लेकिन संन्यासी भी पूरे वक्त समाज में परछाईं देख रहा है अपनी। तो छोड़ कर गया कहां?
एक साधु अभी मुझे मिले। वे मुंह पर पट्टी बांधे हुए हैं। मैंने कहा: इसे क्यों नहीं छोड़ देते, इसमें क्या अर्थ है? उन्होंने कहा: छोड़ तो आज दूं, लेकिन कल कोई साधु नहीं मानेगा। तो मैंने कहा: साधु मनवाने का आग्रह क्या है? साधु होने का आग्रह होना चाहिए। मनवाने का क्या आग्रह? मनवाना दूसरे से, होना खुद है। लेकिन मनवाए बिना मजा नहीं है। क्योंकि वह परछाईं नहीं बनेगी। फिर वे लोग कहेंगे कि अरे, यह कुछ भी नहीं है आदमी। इसको कह रहा हूं परछाईं।
और आत्मा-वात्मा की तो बात ही मत करिए। क्योंकि ये शब्द हमने सीख लिए हैं। और बड़े खतरनाक हैं। शब्द भर हमारे हाथ में अच्छे-अच्छे हैं। और बातचीत और व्याख्या और विश्लेषण भी बहुत अच्छे हैं। और जहां हम रहते हैं, वहां इन शब्दों का कोई संबंध नहीं है। वह जहां हम रहते हैं, वह मन से ऊपर तल कभी जाता नहीं, और बातें हमारी आत्मा से नीचे कभी नहीं उतरती हैं! इसलिए हमारी बातों में और हमारे जीने में कहीं कोई तालमेल नहीं है। रहते हैं मन के तल पर, बातें करते हैं आत्मा के तल पर। दोनों में कोई तालमेल नहीं है।
एक आदमी रहता है अंधेरे में और बातें प्रकाश की करता है! एक आदमी है बीमार और बातें स्वास्थ्य की करता है! और सच तो यह है कि बीमार ही अक्सर स्वास्थ्य की बातें करते हैं। स्वस्थ आदमी करता भी नहीं। क्योंकि क्या मतलब है? बीमार आदमी चौबीस घंटे बीमारी की वजह से पीड़ित होने के कारण स्वास्थ्य, स्वास्थ्य, स्वास्थ्य की बातें करता है। गरीब आदमी धन की बात करता है। और कोई आदमी धन की बात करे तो समझ लेना कि गरीब है--चाहे कितना ही धन हो उसके पास। धनी आदमी क्यों धन की बात करेगा? जो हमारे पास नहीं होता है, उसकी हम बात करते हैं। और जो हमारे पास होता है, उसको हम छिपाते हैं।
तो जो हम हैं, उसको तो हम छिपाए हुए हैं; और जो हम नहीं हैं, उसकी किताबों में से बातें पढ़ ली हैं: कि आत्मा है और आत्मा की परछाईं नहीं है और आत्मा का यह नहीं है। वह आत्मा है कहां? उससे मतलब क्या है आपका, या किसी का भी? मतलब तो इससे है, जो है। और जो है, वह बड़ा परछाईं वाला ही खेल है। बिलकुल रिफ्लेक्शन का खेल चल रहा है। हमारे सुख-दुख बिलकुल ही ऐसे हैं।
अब हिंदुस्तान में एक चपटी नाक की लड़की पैदा हो जाए, वह दुखी रहेगी जिंदगी भर। क्योंकि जो परछाईं बनेगी वह असुंदर की बनेगी हर आंख में। वही लड़की चीन में पैदा हो जाए, वह दुखी नहीं रहेगी, क्योंकि चपटी नाक सुंदर है। अब वह दुख काहे का है, चपटी नाक का? तो वह चीन में भी होना चाहिए। क्योंकि वहां चपटी नाक से कोई दुख नहीं है। और कल अगर हम भी तय कर लें कि चपटी नाक सुंदर है, और तय करने में कोई हर्जा नहीं है, कोई कठिनाई नहीं है। क्योंकि नाक का काम चपटी नाक भी कर देती है और लंबी नाक भी कर देती है। असली काम काम का है। वह जो काम हो रहा है भीतर वह तो सिर्फ. जैसे कि मोटरगाड़ी के पीछे अगर समझो कि साइलेंसर लगा हुआ धुआं फेंकने का, वह चपटा है कि गोल है कि लंबा है, इससे कोई मतलब नहीं है, वह धुआं फेंकने का काम करता है। नाक केवल श्र्वास को ले जाने, लाने के लिए मार्ग से ज्यादा नहीं है, पैसेज से ज्यादा नहीं है। पैसेज चपटी है कि लंबी है, इससे कोई मतलब नहीं है। काम पूरा हो जाता है।
तो चाहें तो चपटी नाक को सुंदर मान सकते हैं, चाहें तो लंबी नाक को। यह मान्यता है सिर्फ। और लंबे दिन तक मानते रहें तो आदमी भूल जाता है कि जो हम मान रहे हैं वह उसमें कोई मतलब है? मगर जहां ऐसी मान्यता है, वहां रिफ्लेक्शन दूसरा बनता है। चपटी नाक है तो आदमी कुरूप हो गया! अब वह चौबीस घंटे नाक के लिए कांशस रहेगा। सब उपाय करेगा कि उसकी नाक पर आपका ध्यान न चला जाए, उसकी नाक पर। और क्या मतलब क्या है? समझ लो, एक चपटी नाक का आदमी एक जंगल में है, जहां कोई दूसरा आदमी नहीं है, क्या कभी भी वह अपनी चपटी नाक के लिए दुखी होगा? दुखी नहीं होगा। क्योंकि कोई प्रतिबिंब नहीं बनता, कोई परछाईं नहीं बनती। तो परछाईं दिक्कत देती है।
राहुल पहली दफा रूस गए। तो राहुल के हाथ बहुत खूबसूरत थे, बहुत मुलायम थे। और जिन लोगों ने कभी कुछ काम नहीं किया उनके हाथ मुलायम और खूबसूरत हो जाएंगे, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। तो जो भी उनका हाथ देखता था, वही कहता था, बहुत बढ़िया, बिलकुल स्त्रैण, स्त्रियों जैसा सुंदर कोमल हाथ है! रूस गए, पहले आदमी ने जिसने स्टेशन पर स्वागत किया, उसने हाथ मिला कर खींच लिया! और उसने कहा कि आप अपना हाथ सम्हाल कर रखना, जिससे भी मिलाएंगे वही आपको नफरत करेगा। क्योंकि हमारे मुल्क में ऐसे हाथ को हम मुफ्तखोर का हाथ मानते हैं। इसमें गट्ठे नहीं हैं मजदूर के। आपने कभी कुछ किया नहीं, आप मुफ्तखोर हैं।
तो राहुल ने कहा कि यह तो बड़ी मुश्किल हो गई। और राहुल ने कहा कि फिर पूरे रूस में, मैं हमेशा सचेत रहा कि किसी से हाथ मिलाऊं, तो बस मन ऐसा होने लगे कि. और जैसे ही हाथ मिलाया वह दूसरे आदमी की आंख पर असर बदला, वह फौरन समझा कि यह आदमी मुफ्तखोर है।
अब यह जो यह मामला है न। अभी हमको खयाल में नहीं आया कि सुंदर हाथ से हाथ मिलाने में अच्छा लगना चाहिए। लेकिन वह जो आंख में तस्वीर बनती है, अगर वह तय कर ले कि यह गलत है, तो ब़हुत मुश्किल हो जाती है।
हम सब परछाईं में जी रहे हैं, बहुत-बहुत तरह की परछाईं में जी रहे हैं।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
इस परछाईं से, इस परछाईं के लिए बात कर रहा हूं। इस परछाईं के लिए बात कर रहा हूं! मेरी तो पूरी चेष्टा यह है कि मेरी बात सोचनी चाहिए, गलत लगे फेंक देना चाहिए, ठीक लगे उपयोग कर लेना चाहिए। मेरा मतलब समझे आप?
प्रश्र्न:
ऐसा है कि अगर मस्तिष्क में कोई उथल-पुथल हो.।
न-न, उथल-पुथल नहीं हुई है। आपका मस्तिष्क बड़ा ठोस है, मजबूत है। उथल-पुथल होती तो आप संदेह से भरे हुए आते। आप तो उत्तर से भरे हुए आए हैं। उथल-पुथल नहीं हुई है। उथल-पुथल बड़ी और चीज है। आप मेरी बात समझ रहे हैं न? आप तो उत्तर लेकर आए हैं, उथल-पुथल कहां हुई है।
प्रश्र्न:
नहीं, उधेड़बुन के बाद जो है अपना भी कुछ.।
उधेड़बुन थोड़ी-बहुत भी हुई है?
प्रश्र्न:
हां, हुई है।
क्या उधेड़बुन हुई?
प्रश्र्न:
तब उसके बाद मैंने सोचा कि अंधकार जो है क्या अनंत रह सकता है?
अभी आप जरा भी नहीं सोचे। सोचते तो उनमें से एक शब्द लेकर नहीं आते। सुनिए फिर उसको, थोड़ा समझने की कोशिश करिए।
असल में किसी भी चीज का जिसका अस्तित्व है, वह सदा सीमित होगी। अस्तित्व सीमित ही होगा। अस्तित्व की सदा सीमा होगी। सिर्फ शून्य असीम हो सकता है, अनस्तित्व, नॉन-एक्झिस्टेंस असीम हो सकता है।
हम जब कहते हैं, कोई चीज है, तो ‘है’ उसकी सीमा बन जाती है। वह कहीं होगी, कभी होगी; वह किसी स्थान में होगी, किसी सीमा में होगी; उसका होना कहीं पूरा होता होगा और किसी चीज का न होना शुरू होता होगा। अस्तित्व सदा सीमित होगा।
इसलिए जो लोग कहते हैं, ‘ईश्र्वर है’, वे लोग ईश्र्वर को सीमित बना देते हैं। इसलिए जो जानते हैं, वे कहते हैं, ईश्र्वर न तो है और न न है। उसको सीमा के बाहर डालने के लिए जरूरी हो जाता है कि ‘न है’ भी उसमें जोड़ दिया जाए।
समझ लें, इस कमरे में, अगर यह कमरा है, तो इसकी दीवालें होंगी, नहीं तो यह कमरा नहीं हो सकता है। अगर यह कमरा नहीं है, तब तो दीवालों का कोई सवाल नहीं है। तो कमरे का होना तो हमेशा सीमित होगा। न होना ही असीम हो सकता है।
अब वह जो मैं कहता हूं, अंधकार असीम है, उसका कारण है कि मूलतः अंधकार नहीं है, वह नॉन-एक्झिस्टेंस है। और प्रकाश एक्झिस्टेंस है, प्रकाश है। प्रकाश की सत्ता है और अंधकार की असत्ता है। तो आप प्रकाश को जला सकते हैं और प्रकाश को बुझा सकते हैं। न तो आप अंधकार को जला सकते हैं और न बुझा सकते हैं।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
समझने की कोशिश करिए पहले। आप प्रकाश को ला सकते हैं, ले जा सकते हैं। अंधकार को न आप ला सकते हैं, न ले जा सकते हैं। अगर इस कमरे में हम कहें कि मित्रो, जाओ थोड़ा अंधकार ले आओ, तो आप कहेंगे, हम असमर्थ हैं। लेकिन आपसे कहें कि जाओ थोड़ा प्रकाश ले आओ, तो आप कहेंगे, हम अभी ले आते हैं।
यानी प्रकाश चूंकि सीमित है, आप उठा कर ले आते हैं। अंधकार को उठा कर कैसे लाइएगा? और दूसरी मजे की बात है कि प्रकाश है, इसलिए लाया भी जा सकता है, हटाया भी जा सकता है। अंधकार नहीं है। अंधकार का मतलब है न होना।
प्रश्र्न:
काले पर्दे लगा देंगे, अंधकार हो जाएगा।
तो काले पर्दे आपको लगाने पड़ेंगे और प्रकाश को रोकना पड़ेगा। आप अंधकार के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। सिर्फ प्रकाश को आने से रोक रहे हैं। अगर गौर करेंगे, तो जब भी आप कुछ करेंगे, वह प्रकाश के साथ होगा। अंधकार के साथ आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप एकदम ही इंपोटेंट हैं अंधकार के सामने।
थोड़ा समझना इसको आप। आप जो भी कर सकते हैं--जब आप कहते हैं, हम पर्दे लटका देंगे, तो पर्दे लटका कर आप अंधकार नहीं ला रहे हैं, पर्दे लटका कर सिर्फ प्रकाश को आने से आप रोक रहे हैं। आप दीया बुझा देंगे, तो आप अंधकार नहीं ला रहे हैं; दीया बुझाने से सिर्फ प्रकाश बुझा रहे हैं आप। आप तो अंधकार के साथ कुछ भी नहीं कर सकते हैं, जो भी करेंगे प्रकाश के साथ करेंगे। क्योंकि प्रकाश है और सीमित है, और प्रकाश के साथ कुछ किया जा सकता है। अंधकार के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता।
तो जो मैंने कहा जिस अर्थ में, अगर बहुत गौर से देखें तो परमात्मा के सामने आप बिलकुल इंपोटेंट होने चाहिए कि आप कुछ भी न कर सकें। परमात्मा के समक्ष आप कुछ भी न कर सकें। अगर आप कुछ भी कर सकते हैं उसके समक्ष, तो आप उससे ज्यादा बड़े हो गए हैं। यह तो प्रतीक की बात है। इसको पागलों की तरह नहीं पकड़ लेना चाहिए, नहीं तो शब्द बड़ी मुश्किल में डाल देते हैं। जब मैंने रात को कहा, अगर आपने सुना हो, यह तो सिर्फ प्रतीक की बात है। जो आदमी कहता है, परमात्मा प्रकाश है, वह भी एक प्रतीक का उपयोग कर रहा है।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
समझ तो लें पहले पूरी बात। समझ तो लें पूरी बात। इसलिए मैंने कहा कि समझना बहुत मुश्किल होगा। जब मैं बोल रहा हूं, तब आपकी खोपड़ी में कुछ जोर से चलता रहेगा। तो फिर मेरी बात आप तक पहुंचेगी ही नहीं। और मैं यह कह नहीं रहा हूं कि मेरी बात से राजी हो जाएं, इसलिए डर कुछ है नहीं। मेरी बात गलत लगे, उसे बिलकुल कचरे में फेंक कर अपने घर चले गए। मैं न किसी को अनुयायी बनाता, न किसी संप्रदाय में दीक्षा देता, न कोई मेरा शिष्य है, न कोई मेरा किसी से संबंध है। मेरी बात मैंने कह दी, आपने सुन ली, बड़ी कृपा है। बात खत्म हो गई, इससे ज्यादा कोई आग्रह नहीं है। अगर गलत हो, तो मेरी कोई जिद नहीं है कि उसे सही मानना ही चाहिए।
यह जो मैंने कल कहा, अगर उसको समझने की कोशिश करें. आप देखें, प्रकाश कभी होता है, कभी नहीं हो जाता है। अंधकार सदा है। उसके होने न होने का कोई सवाल नहीं है। जब प्रकाश हो जाता है, तब आपको अंधकार दिखाई नहीं पड़ता। जब प्रकाश नहीं हो जाता, तब आपको अंधकार दिखाई पड़ने लगता है।
दिन में सुबह सूरज निकलता है, और आप सोचते होंगे आकाश के तारे कहीं खो गए। वे कहीं खो नहीं जाते हैं, वे अपनी जगह हैं। सिर्फ सूरज के प्रकाश में आपको वे दिखाई नहीं पड़ते हैं। अब यह बड़े मजे की बात है, कुछ चीजें प्रकाश में दिखाई पड़ती हैं और कुछ चीजें प्रकाश में नहीं दिखाई पड़ती हैं! आकाश के तारे नहीं दिखाई पड़ते दिन में। फिर रात सूरज ढल जाता है, फिर वे दिखाई पड़ने लगते हैं। सूरज यहां ढला और वहां वे दिखाई पड़ने शुरू हुए। वे वहीं थे, सारा आकाश भरा था उन्हीं से। सूरज की रोशनी ने आपकी आंख को ढंक लिया, वे नहीं दिखाई पड़ते हैं।
रोशनी एक झलक है, अंधकार एक स्थायित्व है।
और जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं कुछ प्रकाश के खिलाफ कुछ भी नहीं कह रहा। यह आप भूल कर मत समझ लेना कि मैं कोई प्रकाश के खिलाफ कुछ कह रहा हूं। और जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं उन लोगों के खिलाफ भी कुछ नहीं कह रहा हूं जो प्रकाश को परमात्मा कहते हैं। जब मैं यह कह रहा हूं, तो मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि हम परमात्मा को समझने जब जाते हैं, तो सिवाय इसके कोई रास्ता नहीं है कि हम कुछ प्रतीकों का उपयोग करें। प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। और प्रतीकों का उपयोग का मतलब होता है कि हम विशिष्ट निर्देश कर रहे हैं, कि इस अर्थ में हम इस प्रतीक का उपयोग कर रहे हैं। चूंकि मैं परमात्मा को ऐसा कहना चाहता हूं कि जो न कभी जाता है, न कभी आता है--जो सदा है। कभी छिप जाता है, कभी प्रकट हो जाता है, दूसरी बात है, लेकिन आता-जाता नहीं है। तो इसे मैं अंधकार से ज्यादा अच्छी तरह से कह सकता हूं, बजाय प्रकाश के।
जब मैं यह कह रहा हूं कि परमात्मा असीम है, तो मेरा मतलब यह है कि परमात्मा शून्य है। क्योंकि जो भी चीज शून्य होगी, वही असीम हो सकती है। सिर्फ शून्य की कोई सीमा नहीं है। बाकी सब चीजों की सीमाएं हैं। तो ‘परमात्मा असीम है’, अगर इसे कहना है, तो यह कहना पड़ेगा कि परमात्मा शून्य है। और शून्य को बताने के लिए प्रकाश सार्थक उतना नहीं है, जितना अंधकार सार्थक है।
जब मैं यह कह रहा हूं कि परमात्मा परिपूर्ण शांति है, तो मैं यह कह रहा हूं कि प्रकाश एक तनाव है। प्रकाश की प्रत्येक किरण आपके ऊपर एक तनाव पैदा करती है। इसलिए सुबह आप जगते हैं। प्रकाश के साथ सारा जगत जगता है। अंधकार हो गया, सारा जगत सो जाता है।
अंधकार एक गहरी निद्रा में विश्राम है। प्रकाश एक गहरे जीवन में सतत हलचल है।
प्रकाश एक हलचल है, एक मूवमेंट है। अंधकार नो-मूवमेंट है, अ-गति है; निद्रा है, खो जाना है, विलीन हो जाना है।
परमात्मा को समझना हो, तो परमात्मा एक हलचल कम है, एक अ-गति, एक विश्राम ज्यादा है। यह सिर्फ प्रतीक की बात है। किसी को दिक्कत होती हो, वह न कहे अंधकार। उससे कोई झगड़ा नहीं है। यह सिर्फ समझने की बात है कि परमात्मा की तरफ जो हम इशारे डाल रहे हैं, वे हम क्या इशारे डाल रहे हैं।
फिर मैं कहता हूं कि जीवन आज है, कल नहीं था। आप आज हैं, कल नहीं थे। कल नहीं होंगे। पृथ्वी पर जीवन है। अनंत-अनंत तारा, उपग्रह हैं, उन पर कोई जीवन नहीं है। इस पृथ्वी पर भी कोई दस लाख, बीस लाख वर्ष पहले जीवन नहीं था। कल यह हो सकता है कि पृथ्वी फिर सूख जाए, फिर जीवन न हो। आज अनंत-अनंत ताराओं पर, उपग्रहों पर कोई जीवन नहीं है।
जीवन एक झलक है। लेकिन जीवन का न होना एक शाश्र्वत क्रम है। उसमें कभी जीवन झलकता है, फिर खो जाता है। वह जिसमें खो जाता है वह ज्यादा मूल्यवान है, जिससे आता है वह ज्यादा मूल्यवान है।
एक सागर है, उस पर एक लहर उठी। लहर नहीं थी, तब भी सागर था; लहर नहीं रह जाएगी, तब भी सागर होगा। लहर के होने या न होने से सागर के होने या न होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई आदमी यह कहे कि लहर सागर है, तो गलत नहीं कहता है। कोई आदमी यह कहे कि लहर सागर है, तो गलत नहीं कहता है! लेकिन बहुत गहरे में सत्य भी नहीं कहता है। इससे उलटा सत्य है। सागर लहर है, क्योंकि लहर मिट जाए, तो भी सागर है। सागर लहर बनता है, नहीं भी बनता है।
परमात्मा जीवन की तरह प्रकट होता है, नहीं भी होता है। परमात्मा प्रकाश की तरह आविर्भूत होता है, नहीं भी होता है। लेकिन वह जो न होना है, बहुत लंबा क्रम है; उसमें होना कभी झलकता है और खो जाता है।
यह जो मैंने कहा, यह जो मैंने कहा, यह न होना और होना एक ही चीज के दो पहलू हैं। लेकिन इन दोनों पहलुओं में गहरा और ज्यादा फाउंडेशनल न होना है। क्योंकि होना तो थोड़ी देर को दिखाई पड़ता है, न होना अनंत मालूम होता है।
फिर मैंने जो यह कहा कि जीवन अंधेरे में है, उसका मेरा मतलब आप नहीं समझ पाए। क्योंकि असल में प्रतीकों को समझना और पकड़ना थोड़ा मुश्किल होता है। और तब और मुश्किल हो जाता है जब हमारी कोई बंधी हुई धारणाएं हों। तब बहुत मुश्किल हो जाता है।
असल में जीवन अंधेरे में है, इसका मतलब क्या है? इसका मतलब केवल इतना है कि जीवन की सारी जड़ें मिस्ट्री में हैं, रहस्य में हैं, जहां एकदम अंधकार है, जहां कुछ भी प्रकाश नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने कह दिया कि सूरज की रोशनी में जीवन नहीं है। सूरज की रोशनी में जीवन है। उससे जीवन प्रकट हो रहा है--फूलों में, पत्तों में, हममें, सब सूरज की रोशनी से हो रहा है। लेकिन सूरज की रोशनी से क्यों हो रहा है यह जीवन प्रकट? यह जड़ बिलकुल अंधेरे में है। समझे कि नहीं? अंधेरे का मतलब है: दि मिस्टीरियस। वह जो रहस्यपूर्ण है, जहां सब खोया है। जहां कुछ साफ नहीं है, जहां सब धुंधला होता चला गया है। प्रकाश में सब साफ है, अंधेरे में सब खोया है।
परमात्मा सबसे बड़ी मिस्ट्री है, सबसे बड़ा रहस्य है। निश्र्चित ही वह रहस्य बिलकुल अंधेरे में है। उदाहरण के लिए जो मैंने कहा कि वृक्ष की जड़ें हैं, वे नीचे अंधेरे में काम कर रही हैं।
आप खाना खाते हैं, खाना तो आप रोशनी में खाते हैं। खाना आप खाते हैं, लेकिन खाना किसने पचाया है, यह आपको पता भी नहीं है! और खाना कौन पचा रहा है भीतर, यह भी पता नहीं है! वह सब अंधकार में चुपचाप हो रहा है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर एक आदमी के पेट में जितना काम हो रहा है, अगर उतना काम हमें फैक्ट्री में लेना पड़े--यानी रोटी को खून बनाने का--तो इतनी बड़ी फैक्ट्री बनानी पड़ेगी कि कई वर्गमील की जगह घेरे और कई हजार लोग काम करें। और अभी भी हम पूरी तरह नहीं जानते कि रोटी खून कैसे बने? नहीं तो मामला खत्म हो जाए भोजन का। अभी भी हम जानते नहीं कि मामला क्या है? यह होता कैसे है--रोटी को खून में कनवर्ट करना?
एक पौधा है, वह मिट्टी खाता है और फूल बना देता है। मिट्टी कैसे फूल में कनवर्ट होती है, कहां कनवर्ट होती है, अभी रहस्य है। और किसी अंधकार में हो रहा है, जिसका कुछ पता नहीं है। पौधे को काट-पीट डालो, कुछ पता नहीं चलता कि मिट्टी कब फूल बन जाती है! किस क्षण पर वह कनवर्सन होता है! आप कब खाना खाते हैं, वह कब खून-मांस-मज्जा बन जाता है! और कितना अदभुत है मामला: एक ही रोटी आप खाते हैं, उसी रोटी में से कुछ हिस्सा खून बनता है, कुछ हिस्सा हड्डी बनता है, कुछ हिस्सा बाल बनता है, कुछ हिस्सा आंख बनता है, कुछ हिस्सा चमड़ा बनता है, कुछ हिस्सा मज्जा बनता है! एक ही रोटी से वह सब बनता है! वह कहां हो रहा है? वह किस लोक में हो रहा है? वह किसी बहुत गहन अंधकार में चुपचाप हो रहा है और बिलकुल साइलेंटली हो रहा है।
और अभी वैज्ञानिक कहते हैं कि जब से हमने उसे जानने की बहुत कोशिश की, तो डिस्टरबेंस पैदा हुए हैं। अभी वैज्ञानिक कहते हैं। जितना हम उसे जानने की कोशिश करते हैं, उतना आदमी डिस्टर्ब हो रहा है। उतनी परेशानी हो रही है। उतनी जड़ें उखड़ रही हैं और मुश्किल होती चली जा रही है।
तो जो मैंने कहा उसको समझने की कोशिश करना। मैं कोई प्रकाश का विरोधी नहीं हूं। जो अंधकार तक का विरोधी नहीं है, वह प्रकाश का विरोधी कैसे होगा? और जो परमात्मा को अंधकार तक कहने को राजी है, उसके उसमें प्रकाश का होना समाविष्ट है। और जो यह कहने को राजी है कि अंधकार से जीवन निकलता है, वह यह थोड़े ही कहेगा कि प्रकाश से जीवन नहीं निकलता है? प्रकाश से तो निकलता ही है। वह मेरी बात समझने की कोशिश करना।
और समझने की कोशिश आसान होगी, अगर मानने और न मानने की जल्दी न की। दोनों की जल्दी की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि मेरा आग्रह ही नहीं है। न तो इसकी फिकर करना कि यह बात माननी है कि नहीं माननी है, सिर्फ सोच लेना, एक निवेदन है। सोच लेना, लगा ठीक, ठीक; नहीं लगा, मुक्त हुए, उससे झंझट छूटी। वह आदमी गलत था, बात खत्म हो गई। सोचने भर का आग्रह है, इससे ज्यादा नहीं।
प्रश्र्न:
जीवन को प्रकट होने की क्यों जरूरत पड़ी?
यह आदमी से नहीं उत्तर हो पाएगा। वह तो परमात्मा कभी मिल जाए, तो पूछना कि जीवन को प्रकट होने की क्यों जरूरत पड़ी? हालांकि उससे भी आप राजी न हो सकोगे। वह बहुत मुश्किल पड़ेगा राजी होना।
प्रश्र्न:
मेरा यह खयाल है.।
नहीं, आपका खयाल क्या है.।
प्रश्र्न:
.यह तो आदान-प्रदान है।
न-न, आदान-प्रदान बिलकुल नहीं है। या तो मैं लेने को राजी हूं, या देने को। आदान-प्रदान होता ही नहीं। मेरी आप बात समझ रहे हैं न?
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
मेरी आप बात समझ लीजिए। मैं तो आदान के लिए राजी हूं। अगर आप देना चाहते हैं, बिलकुल राजी हूं। फिर मैं मौन बैठ कर समझने की कोशिश करूं, समझाने की फिकर छोड़ दूं। मेरी बात समझे न आप? एक काम ही मुझे करने दें, और या फिर एक काम आप करें। दोनों काम एक साथ चले--आदान-प्रदान, तो इधर से.।
प्रश्र्न:
दोनों ही काम एक साथ.।
हां, इसलिए तो दुनिया की यह हालत है। इसलिए यह हालत है। यानी आदान-प्रदान अगर एक साथ चलते हैं, तो उसका परिणाम यह होता है कि एक गाड़ी वहां से इधर को चलती है, एक गाड़ी यहां से वहां को चलती है। कहीं क्रॉसिंग होता है, लेकिन मिलना नहीं होता है। हो ही नहीं सकता। मैं तो राजी हूं हमेशा। मुझे इसमें कोई सुख ही नहीं है कि मैं आपको समझाऊं। मुझे समझने में इससे भी ज्यादा सुख है। वह तो कभी आ जाएं, बैठ जाएं घंटे भर, मैं सुनूंगा आपकी बात, समझूंगा। लेकिन फिर उस वक्त मैं नहीं समझाऊंगा। फिर उसकी कोई जरूरत नहीं है।
प्रश्र्न:
नहीं, पर उसके पश्र्चात अपना विवेचन.।
कोई जरूरत नहीं है, वह तो आपके जीवन के लिए है। विवेचन की कोई जरूरत नहीं है। मैंने आपकी बात सुन ली, मेरे काम की होगी, पकड़ लूंगा; नहीं होगी, नहीं पकडूंगा। बात खत्म हो जाती है, विवेचन का कहां सवाल है? विवेचन तो कई जन्मों के बाद आखिर में भगवान के ही सामने करना चाहिए। उसके पहले कोई मतलब नहीं है।
प्रश्र्न:
इसका मतलब वह वस्तु कहीं और है, उसे जिसको कि हम भगवान कहें?
वह तो सुबह आप थे?
प्रश्र्न:
नहीं, मैं सुबह नहीं आ सका।
सुबह नहीं थे आप। सुबह की टॉक जरा रिकॉर्ड है, पूरी सुन लें। अभी कोई भी मित्र सुना देगा। इस बाबत ही पूरी बात की थी। पूरी तीन दिन की बात सुन लें। फिर कुछ भी खयाल मुझे बताने का हो, जबलपुर आ जाएं। दो-चार दिन आपकी सुनूंगा बैठ कर। और मैं आपसे कहता हूं कि मैं जितना बोल कर आपको नहीं समझा सकता, उतना आपकी सुन कर मैं आपको समझा सकूंगा। आपका पूरा निकल जाए तो बड़ी आसानी होती है। बहुत आसानी होती है।
प्रश्र्न:
यह अनंत जोत है, यह कभी खत्म नहीं हुआ आज तक।
तब फिर बड़ा मुश्किल है।
प्रश्र्न:
निकलता रहा है, निकलता रहेगा।
फिर निकलने दीजिए, कोई हर्जा नहीं। कोई हर्जा नहीं।
प्रश्र्न:
क्या अध्यात्म के लिए योग सीखना चाहिए?
अगर आप शरीर के स्वास्थ्य के लिए सीखना चाहते हैं, तो अदभुत है। उनका उपयोग बड़ा कीमत का है। शरीर के स्वास्थ्य के लिए अदभुत है। लेकिन शरीर के स्वास्थ्य का कोई सीधे अध्यात्म से वास्ता नहीं है, सिवाय इतना कि स्वस्थ शरीर अध्यात्म की यात्रा में आसानी से जाता है। अस्वस्थ शरीर को थोड़ी बाधा पड़ती है।
और कुछ जो और दूसरी प्रक्रियाएं हैं, वे मानसिक सिद्धियों की हैं। और उनका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। अगर आपको टेलीपैथी साधनी है, हिप्नोटिज्म साधना है, और कुछ साधना है, तो भी वे उपयोगी हैं। लेकिन उनका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है।
मौलिक अध्यात्म का तो, जो मैं कह रहा हूं, वही बात है। और वह सब कर लें, तो भी आखिर में न करने पर उतरना पड़ेगा।
प्रश्र्न:
तो यह सब फिजूल की बात है?
इस अर्थ में फिजूल की बात है--इस अर्थ में। जैसे एक आदमी कॉलेज में पढ़ने जाता है। और मैं कहता हूं कि अध्यात्म के लिए कॉलेज में पढ़ना बिलकुल फिजूल है। वह आदमी आकर कहे, तो कॉलेज में पढ़ना फिजूल है क्या? तो मैं उसको कहूंगा कि नहीं, कॉलेज में पढ़ने के दूसरे अर्थ हैं और दूसरे उपयोग हैं। अगर तुम्हें डॉक्टर बनना है तो कॉलेज में पढ़ो। लेकिन डॉक्टर या इंजीनियर बनने से कोई अध्यात्म का वास्ता नहीं है। वह तुम बिना डॉक्टर-इंजीनियर बने भी बन सकते हो। और डॉक्टर और इंजीनियर बन कर भी नहीं बन सकते हो। उससे कोई वास्ता नहीं है।
तो जब मैं कहता हूं कि कोई भी विधि, कोई भी योग अध्यात्म के लिए व्यर्थ है, तो मैं यह नहीं कहता हूं कि योग व्यर्थ है। मैं यह कह रहा हूं कि ‘अध्यात्म के लिए’, वह कंडीशन खयाल में रखनी चाहिए। नहीं तो मुश्किल हो जाती है।
प्रश्र्न:
उसके दूसरे उपयोग हैं।
हां, उसके दूसरे उपयोग हैं। उसके बहुत दूसरे उपयोग हैं।
प्रश्र्न:
हर जगह यही बताया गया कि अध्यात्म के मार्ग के लिए योग है।
हां-हां, बिलकुल ही बताया गया है।
प्रश्र्न:
वही सोच से सब गड़बड़ी हुई है।
बिलकुल ही बताया गया है। और उसकी गड़बड़ी हुई है। उसकी गड़बड़ी हुई है! जिस देश में सबसे ज्यादा योग की चर्चा है, उस देश में अध्यात्म कहां है? और कितने आसन और कितने योगासन चलते हैं, वह सब चलता है, लेकिन अध्यात्म कहां है?
प्रश्र्न:
जैसे परकाया प्रवेश से वह हुआ और वह हुआ और वह हुआ।
इन सबका भी अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
जरा भी नहीं। जरा भी नहीं। बल्कि कई अर्थों में बाधक हैं, क्योंकि ये आपको दूसरी डायरेक्शन में ले जाती हैं। बाधक इसलिए हैं, जैसे कि मैं जा रहा हूं, मुझे सीधे उदयपुर के स्टेशन पहुंचना है। बीच में कई रास्ते निकलते हैं, जो बाजार में जाते हैं--कोई प्रदर्शनी में जाता है, कोई सिनेमागृह में जाता है। वे अलग-अलग चले जाते हैं। और जब मैं सिनेमागृह की तरफ जाता हूं, तब स्टेशन के मार्ग पर बाधा पड़ती है, क्योंकि सिनेमा अटकाएगा। अगर मुझे सीधे ही जाना है, तो सिनेमा के सामने से नमस्कार करते हुए निकलना चाहिए कि मैं अभी स्टेशन जा रहा हूं, मैं नहीं आता कहीं। हालांकि ये सब रास्ते में पड़ते हैं और बगल में कट जाते हैं।
अब जैसे, एक राममूर्ति जैसा आदमी है, पहलवान है। जितने राममूर्ति के शरीर में जो तत्व हैं, वे हम सबके शरीर में हैं। और हममें से कोई भी राममूर्ति बनना चाहे, तो प्रयास करने से बन सकता है। कोई बाधा नहीं है। लेकिन राममूर्ति इतना श्रम करके जब शरीर को बनाता है, तो हम चकित हो जाते हैं, चमत्कृत हो जाते हैं। कार निकल जाती है छाती पर से, उसे पता न चले! पत्थर तोड़ो उसकी छाती पर, उसको चोट न आए! पीछे से कार को पकड़ ले हाथ से, तो कार भनभनाती रहे, लेकिन आगे न बढ़ सके! यह हम सबके शरीर में छिपी हुई ताकतें हैं। लेकिन इन पर काम करने से कोई अध्यात्म का संबंध नहीं है।
कोई कहे कि राममूर्ति बनना पड़ेगा, तब अध्यात्म में जा सकोगे, तो बड़ा मुश्किल मामला है। राममूर्ति से कोई लेना-देना नहीं है।
यानी इसका मतलब हुआ कि शरीर है। शरीर में दो रास्ते हैं: एक शरीर को पार करके मन की तरफ जाता है और एक शरीर में ही भीतर जाता है, मन में नहीं जाता।
इसको समझ लेना।
ऐसा हम समझ लें कि यह शरीर है, यह मन है, यह आत्मा है। तो एक रास्ता तो शरीर से मन की तरफ जाता है, मन से आत्मा की तरफ जाता है। एक रास्ता शरीर से और शरीर की गहरी मिस्ट्री में जाता है। एक रास्ता मन से और मन की गहरी मिस्ट्री में जाता है। एक रास्ता आत्मा से और आत्मा की गहरी मिस्ट्री में जाता है। यानी वर्टिकल रास्ते हैं और हॉरिजंटल रास्ते हैं।
तो राममूर्ति हॉरिजंटल जा रहा है--शरीर में। तो वह शरीर के सारे रहस्यों को खोज ला सकता है। और हो सकता है कि आगे आने वाले खोजी राममूर्ति को पीछे कर दें, और भी खोज लाएं। शरीर खुद एक अनंतता है। उसमें भी बड़े रहस्य भरे हैं, जो हमें हो सकता है पता भी न हों अभी--बिलकुल पता नहीं हैं।
तो हठयोग शरीर में घुस जाता है--सीधा। तो जन्मों-जन्मों तक आप जा सकते हैं। और अदभुत रहस्य अनुभव करेंगे, अदभुत शक्तियां पा लेंगे। लेकिन अध्यात्म से कोई लेना-देना नहीं है। ये शरीर के ही रहस्य हैं। लंबी उम्र हो जाएगी, लोहकाया हो जाएगी। क्या हो जाए, वह सब हो सकता है। उससे कोई लेना-देना नहीं है। वर्षों तक मृत्यु भी टाली जा सकती है, वह सब हो सकता है। इससे कोई प्रयोजन नहीं है। जहां तक ऊपर प्रवेश के लिए तो सामान्य स्वस्थ शरीर पर्याप्त है, उसमें इतने गहरे जाने की कोई जरूरत नहीं है।
यानी वह मामला ऐसे ही है, जैसे एक कार आदमी चलाता है। आप कार चलाते हैं। आप सिर्फ व्हील भर चला लेते हैं और एक्सेलेरेटर दबा लेते हैं और गाड़ी मोड़ लेते हैं। बस काम हो गया। कार के भीतर घुसने की आपको कभी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी कि वह कैसे काम करती है, क्या नहीं करती है। वह एक मैकेनिक है, वह उस दुनिया में जाता है। आप बिना जाने कार चला लेते हैं। बस, आपके लिए इतना काफी है, पर्याप्त है कार को चला लेने के लिए। मैकेनिक के लिए इतना काफी नहीं है। हो सकता है, अधिक कार चलाने वालों ने भीतर झांक कर भी न देखा हो कि कार में होता क्या है। या आप उनसे पूछें कि कार कैसे चल जाती है, तो वे न बता सकेंगे। वे कहेंगे, हम इतना जानते हैं कि हम पैर दबाते हैं, व्हील चलाते हैं, इससे ज्यादा हमें कुछ पता नहीं है।
फिर जो आदमी शरीर से मन पर जाता है, तो मन में भी हॉरिजंटल रास्ता है। अगर मन में हॉरिजंटल चले जाएं, तो सिद्धियां हैं, रिद्धियां हैं, उन सबकी दुनिया है; चमत्कार है, वह सारी दुनिया है। क्या नहीं किया जा सकता--वह सब होता हुआ वहां मालूम पड़ेगा। लेकिन वह फिर आप अंदर घुस गए मन में।
ऊपर जाने के लिए तो मन शांत हो, इतना काफी है। इससे ज्यादा भीतर जाने की कोई जरूरत नहीं है।
और वह तीसरा आत्मा का है। अब अगर आत्मा में भीतर प्रविष्ट हो जाएं, तो फिर दूसरी बातें मिलना शुरू हो जाएंगी। जो लोग आत्मा में ऐसे हॉरिजंटल प्रविष्ट हो गए, उनको दूसरी बातें मिलीं। लेकिन जो आत्मा में वर्टिकल गए, उनको परमात्मा मिल गया। इसलिए जो लोग. जैसे मैं कहूं, जैसे जैन हैं, वे आत्मा में सीधे चले गए, इसलिए परमात्मा उनकी धारणा में नहीं आ सका। उसका कुल कारण इतना है कि वे ऐसा वर्टिकल नहीं गए। आत्मा के और ऊपर नहीं गए, आत्मा के भीतर चले गए, तो वहां कहीं परमात्मा नहीं मिला। उन्होंने कहा, परमात्मा नहीं है।
अभी पश्र्चिम का मनोविज्ञान है, वह मन में सीधा चला गया। वह कहता है, आत्मा नहीं है। पश्र्चिम की फिजियोलॉजी है, मेडिकल साइंस है, वह शरीर में सीधी चली गई। वह कहती है, कहां की आत्मा, कहां का मन, कुछ नहीं है! सिर्फ शरीर है, सब शरीर का मैकेनिज्म है।
मेरा मतलब समझे न आप?
तो यह सारी मिस्ट्री है, इसलिए सारी दिक्कत है। और मैं जो बात कर रहा हूं, वह सिर्फ उतनी बात कर रहा हूं, जिसमें वर्टिकल आप सीधे चले जाएं। जहां से--आप हैं, वहां से वहां चले जाएं, जहां प्रभु है। इसके बीच में जो और रास्ते कटते हैं, उनकी मैं बात ही नहीं कर रहा। लेकिन वे सब रास्ते हैं, उन पर जाया जा सकता है, जाने की साइंस है।
इसलिए पतंजलि व्यर्थ नहीं हैं; पश्र्चिम का विज्ञान व्यर्थ नहीं है, मनोविज्ञान व्यर्थ नहीं है। सब सार्थक हैं। लेकिन सीधे जाने वाले के लिए सब उपद्रव हैं। क्योंकि वह आड़े गया--कि आड़े भी जाने में इतना लंबा है कि शायद कभी न लौटे, या जन्म-जन्म लग जाएं और न लौटे।
तो नाक सीधी रख कर ही जाने की बात है। इसलिए बिलकुल मुद्दे की बात कर रहा हूं, जिसमें नाक जरा भी इधर-उधर न हो जाए। पर, वह कोई व्यर्थ है, ऐसा नहीं कह रहा हूं, इस दृष्टि से व्यर्थ है। सिनेमा की अपनी सार्थकता है, अस्पताल की अपनी सार्थकता है; लेकिन जिसको स्टेशन जाना है, वह सिनेमा को भी छोड़ता है, अस्पताल को भी छोड़ता है, स्टेशन की तरफ सीधा भागता है। इतना ही सार्थक है।
प्रश्र्न:
मैं संन्यास लेने के संबंध में आपकी गाइडेंस लेना चाहती हूं?
एक तो यह है, जब तक संन्यास लेने के लिए किसी से सलाह लेने का खयाल उठे, तब तक संन्यास मत लेना। जब वह ऐसी भाव-दशा बन जाए कि सारी दुनिया कहे कि मत लो और फिर भी लेना पड़े, तभी लेना। उसके पहले नहीं। नहीं तो बहुत तकलीफ में पड़ोगी।
प्रश्र्न:
तकलीफ का मतलब.?
तकलीफ का मतलब यह. क्योंकि जब हमारा मन किसी से पूछता है, तो उसका मतलब है कि हम खुद बहुत साफ नहीं हैं, तब तक हम पूछते हैं।
प्रश्र्न:
नो, दि क्वेश्चन अराइजे़ज ओनली बिकॉ़ज आइ हैव टु बी इन दि वर्ल्ड, एंड लुक ऑफ्टर माइसेल्फ, एंड आइ हैव टु वर्क। दैट मे टेक टाइम। आइ डोंट माइंड टेकिंग दिस मूमेंट।
न, न, न। समझा मैं। मैं यह कह रहा हूं कि जब तक हमारे मन में कोई खुद स्थिति साफ नहीं होती है, तभी तक गाइडेंस का खयाल होता है। गाइडेंस--टु आस्क फॉर गाइडेंस, मीन्स टु बी कंफ्यूज्ड। मेरा मतलब समझी तू? गाइडेंस के लिए जब भी हम कहीं पूछने जाते हैं, तो उसका मतलब हम कंफ्यूज्ड हैं।
और इसलिए दो तरह के संन्यासी हैं इस दुनिया में। एक वे, जिन्होंने किसी से मार्ग-दर्शन लेकर संन्यास ले लिया। और एक वे, जो संन्यासी हैं। जो संन्यासी हैं, उन्होंने कभी किसी से पूछा ही नहीं। उनका तो मजा और है।
तो जिस दिन तुझे ऐसा लगे कि एक बात खत्म हो गई है, संन्यासी होना ही मेरा आनंद है। ठीक, बात खत्म हो गई, किसी से पूछना ही मत। किसी से भी मत पूछना! किसी से पूछा, उसका मतलब यह है कि तू अभी भी कंफ्यूज्ड है कि लेना कि नहीं लेना--और डिसीजन लेने में किसी का सहारा लेना है। फिर तुझे दोनों उत्तर मिलेंगे।
प्रश्र्न:
दि डिसिजन आइ वांट टु टेक, बिकॉ़ज आइ एम कंफ्यूज्ड, बिकॉ़ज आइ डोंट नो दि वर्ल्ड, आइ डोंट नो वेयर टु एडज्वाइन एट प्रेजेंट।
हां-हां, इसीलिए तो। इसलिए तुझे दोनों एडवाइज देने वाले मिलेंगे। कोई कहेगा कि मत लो, कोई कहेगा कि लो। फिर भी तुझे आखिर में खुद डिसाइड करने पड़ेगा।
प्रश्र्न:
ईवन इफ इट इ़ज पॉसिबल ऑफ्टर टेकिंग संन्यास, एज यू से, कंटीन्यु वर्क। बट आइ से वॉट इ़ज दि यूज? इट इ़ज ओनली फॉर दि सोसाइटी। आइ टोल्ड वन ऑफ दि स्वामीज हूम आइ मेट, आइ सैड, वॉट डिफरेंस इट मेक्स.?
हां, और दूसरी बात यह खयाल रखना कि जैसे तुझे यह दिखाई पड़ता है कि संसारी लोग हैं, तो वे तुझे दिखाई पड़ते हैं, वैसे ही संन्यासियों को भी देख लेना कि उनकी क्या हालत है। आमतौर से आदमी सोचता है कि भई शादी करने से कोई खास सुखी तो कोई दिखाई पड़ता नहीं है, तो क्यों शादी करना है।
प्रश्र्न:
बट आइ डोंट हैव अनहैप्पीनेस इन माइ लाइफ.।
समझ गया, मैं तेरी बात समझ गया। इसी तरह यह भी सोच लेना चाहिए कि संन्यास लेने से कौन-कौन आनंदित दिखाई पड़ता है।
प्रश्र्न:
बट देन यू से दैट ब्लिस इ़ज इटरनल।
न, न, न। ये सब बातें तो ठीक हैं, इन सब बातों से क्या मतलब है तेरी प्रॉब्लम का।
प्रश्र्न:
सपोजिंग दे आर नॉट हैप्पी, मीन्स दे डोंट सी दि हैप्पीनेस इन देम।
हां, तो फिर तू कहीं भी देख सकती है। फिर क्या सवाल है लेने-देने का? फिर तो जहां भी हो, देखो। जब यह मामला है कि हमारे देखने का सवाल है, तो फिर यह पूछना ही क्यों कि इस कमरे में बैठे हैं कि उस कमरे में? फिर तो जहां बैठ गए वहीं बैठे रहें और देखते रहें। फिर तो नर्स रहे तो भी देख हैप्पीनेस, संन्यासी हो जाओ तो देखो हैप्पीनेस। फिर तो कोई झगड़ा ही नहीं है। अगर देखने का ही मामला है, तो झगड़ा ही नहीं है।
लेकिन इतना मामला नहीं है, देखने का ही मामला नहीं है, दिखनी चाहिए। देखोगी कैसे? देखोगी कैसे? देखोगी तो गड़बड़ रहेगा मामला। फिर झंझट रहेगी, फिर लगेगा उस कमरे में चले जाएं, शायद वहां ज्यादा दिखाई पड़ती हो; उस कमरे में चले जाएं। यह सवाल नहीं है।
और दूसरा मामला यह है कि तू कहती है कि हम फ्रस्ट्रेटेड नहीं हैं। यह तो अच्छा है। यह बहुत अच्छा है! और तू यह कहती है कि हमें इसकी भी फिकर नहीं है कि कौन क्या कहता है। यह भी बहुत अच्छा है। तब किसी तरह के गाइडेंस की फिकर छोड़ दो। और जैसा जीने में मौज आए जीओ। एक ही बात ध्यान रखना कि संसारी से संन्यासी होना बहुत आसान है। फिर संन्यासी से संसारी होना बहुत मुश्किल पड़ जाता है।
क्योंकि अभी अगर तू संन्यासी होना चाहेगी, तो सब कहेंगे, बहुत बढ़िया है। शोरगुल मचाएंगे, ताली बजाएंगे, आशीर्वाद देंगे। स्वामी मिल जाएंगे, सब मिल जाएंगे। फिर अगर तूने कहा कि हम वापस लौटते हैं, तो सब द्वार बंद हो जाएंगे। सब तरह की निंदा, अपमान और गाली-गलौज होगी। तो यह जो समाज है, बहुत चालाक है। यह जाने का तो छोड़ता है रास्ता, लौटने का नहीं छोड़ता है।
तो मेरा कहना है, हमेशा वह चुनाव करना चाहिए जो आगे भी स्वतंत्र रखे, बांध न दे। नहीं तो फिर तकलीफ शुरू होती है। अभी तेरे को नर्स होने में कोई नहीं बांध रहा है। तू मुक्त है ज्यादा। संन्यासिनी होकर तब मुक्त होगी. क्योंकि नर्स होना तू इसी वक्त छोड़ दे, दुनिया कुछ भी नहीं कहेगी। लेकिन कल अगर संन्यासी होना छोड़ा, तो बहुत मुसीबत में पड़ जाएगी।
इसलिए मैं कहता हूं कि नर्स होना ज्यादा फ्रीडम की स्थिति है, बजाय संन्यासी होने के। एक चमार होना भी ज्यादा स्वतंत्र स्थिति है, बजाय एक मुनि होने के। क्योंकि चमारी कभी भी छोड़ सकते हैं। यह मुनि का धंधा कभी भी नहीं छोड़ सकते। यह मुश्किल मामला है।
प्रश्र्न:
बट दिस पाथ इ़ज ए पाथ ऑफ एवोल्यूशन।
सब पाथ एवोल्यूशन के हैं। कोई पाथ ऐसा नहीं है जो एवोल्यूशन का न हो। एवोल्यूशन करना चाहिए, तो किसी भी पाथ से होती है। और इसलिए जिस पाथ पर ज्यादा से ज्यादा फ्रीडम हो, उस पर ही ज्यादा से ज्यादा एवोल्यूशन होती है। बांधना नहीं चाहिए।
यानी संन्यास का मतलब भी क्या होता है? जब कोई मुझसे पूछता है कि संन्यास ले लें, तभी मुझे हैरानी होती है। संन्यास का मतलब होता है: ऐसा आदमी जो कोई नियम-वियम नहीं मानता। कुछ बंधन नहीं मानता। जो किसी की कोई फिकर नहीं करता। जिसको जो मौज में आता है करता है। संन्यास का यह मतलब होता है।
लेकिन जब कोई कहता है कि संन्यास ले लें, तो वह यह कहता है कि हम उस फलानी तरह के बंधन में बंध जाएं, उस तरह की पर्टीकुलर बांडेज को स्वीकार कर लें? तो बड़े मजे की बात है। संन्यासी का तो मतलब है: फ्रीडम। संन्यासी का मतलब है: मौज से रहो। जो ठीक लगे, करो। और बंधो मत। समझी न? बंधो मत।
लेकिन बिना बंधे काम नहीं चलता है। या तो कोई कहता है शादी करो इसमें बंधो, या कोई कहता है शादी न करो तो संन्यास में बंधो। लेकिन गैर-बंधे मत रहो! कहीं न कहीं बंधो! बीच में नहीं टिकने देंगे! और स्त्री को तो बिलकुल नहीं टिकने देंगे, क्योंकि पूरी की पूरी समाज की व्यवस्था पुरुष की बनाई हुई है। स्त्री की दुश्मन है वह पूरी व्यवस्था। वह कहती है, गुलाम बनो! या तो पत्नी बनो, या साध्वी बनो! स्वतंत्र नहीं रहने देंगे! और मेरा मतलब है, संन्यासी का मतलब होता है: स्वतंत्र रहना।
स्वतंत्र रहो। जब तक नर्स रहना है नर्स रहो, तुम्हें कुछ और बनना है और बनो। लेकिन किसी से दीक्षा-वीक्षा मत लेना। वह सब नालायकी, वह गंवारी है। किसी से क्या दीक्षा लेनी है? स्वतंत्रता की किसी से दीक्षा लेनी पड़ती है? परतंत्रता की लेनी पड़ती है।
स्वतंत्र रहो, बस ठीक है। खोजो अपना आनंद, जहां तुम्हें मिले। और किसी से डरो मत, यही संन्यासी का मतलब होता है। किसी से डरो मत। अभी तुम संन्यास भी लोगी, तो डरना पड़ेगा। जिनसे लोगी, उनसे डरना पड़ेगा। जिस सोसाइटी के चक्कर में पड़ोगी, उनसे डरना पड़ेगा। वे कहेंगे, यह खाओ, यह पीओ; इस वक्त उठो, इस वक्त सोओ; यहां जाओ, वहां मत जाओ। मुश्किल हो जाएगी। फिर तुम पाओगी कि बहुत मुसीबत हो गई। यह तो नर्स होने से ज्यादा बदतर हो गया है।
एक बात ध्यान में रखो, हमारा किस तरफ आनंद बढ़ता है वह करते रहो, करते रहो। जिस दिन तुम पूरी स्वतंत्र हो जाती हो, उस दिन तुम संन्यासिनी हो गई। किसी से लेना-देना थोड़े ही है। मेरा मतलब समझी न? नर्स रहते-रहते हो जा सकती हो, छोड़ कर भी हो सकती हो।
प्रश्र्न:
नो, बट स्प्रिचुअल नॉलेज.
अरे, स्प्रिचुअल नॉलेज कौन रोक रहा है?
प्रश्र्न:
माइ कैपिसिटी इ़ज लिमिटेड।
सबकी लिमिटेड है। सबकी लिमिटेड है। संन्यासी की भी लिमिटेड है। तुम क्या समझती हो, संन्यासी को कोई फिकर नहीं है। लेकिन उसको भी सुबह-शाम फिकर करनी पड़ रही है कि कहां से खाना मिलेगा, कहां ठहरना मिलेगा। तुम्हारा तो ज्यादा निश्र्चिंत है।
मेरी अपनी मान्यता यह है कि जो आदमी छह घंटे, आठ घंटे मेहनत कर रहा है, उसके बाकी घंटे तो मुक्त हैं। संन्यासी चौबीस घंटे नौकर है। और निपट गंवारों का नौकर है। जिनमें कोई बुद्धि भी नहीं उनका भी। तुम तो छह घंटे दफ्तर से लौट आईं, तो मुक्त तो हो, फिर तुम्हें जो करना हो। नाचना हो नाचो, गाना हो गाओ, जो करना हो करो। फिर नहीं कर सकतीं। क्योंकि गंवार चारों तरफ से देख रहे हैं कि क्या कर रही हो--किससे बात कर रही थी, किससे मिल रही है, कहां जा रही है। और अगर गड़बड़ की, तो खाना बंद, इज्जत बंद। सब मुश्किल हो जाता है।
कुल इतनी फिकर करो कि दो-चार घंटे; दो घंटे, तीन घंटे कर लिया काम, उससे तुम्हारा खाने लायक निकल आता है, बाकी बीस घंटे तुम मुक्त हो। उस बीस घंटे की मुक्ति का जो भी तुम्हें करना हो करो। उपयोग करो। और नॉलेज से कौन रोकता है। और नॉलेज तो सब तरफ बंटी है, खोजो। बंधो मत। संन्यासी होने का मतलब है, बंधो मत।
तो मैं कहता हूं, संन्यासी हो जाओ, तो उसका मतलब ही सिर्फ इतना होता है कि बंधो मत। मुक्त रहो, बस ठीक है। और वे जो कहते हैं कि संन्यासी हो जाओ, उनका मतलब दूसरा है। उनका मतलब है कि बंधो, मुक्त मत रहो। हमसे बंधो, खास ढांचे में बंधो। बिलकुल बुद्धूपन है। इसमें कुछ मतलब नहीं है। मुक्त रहो, जिससे सीखना है सीखो, कोई हर्जा नहीं है। जल्दी क्या, बंधने की क्यों जल्दी करती हो।
प्रश्र्न:
आइ विजिटेड टू-थ्री प्लेसेस एंड देन आइ ऑब्जर्व्ड एवरीथिंग। आइ सैड, माइ ऐम इ़ज टु प्रोग्रेस ऑन दि स्प्रिचुअल पाथ, एंड आइ डू नॉट फाइंड इट.।
हां-हां, करो न। कुछ भी, कुछ भी करो। मजे से मुक्त रह कर करो। और तुम्हें लगे कि संन्यासी होने में ज्यादा मुक्ति है, तो संन्यासी हो जाओ। मुझे कोई अड़चन नहीं है किसी बात की। मुझे तो कोई स्त्री आकर कहे कि मुझे वेश्या होने में ज्यादा स्वतंत्रता है, मैं तो कहूंगा, वह हो जाओ। तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारी खोज, तुम्हें जहां जैसा--कोई तुम्हें बांधने वाला नहीं होना चाहिए। तुम अपनी मालिक हो, अपनी जिंदगी को बसो। जो तुम्हें लगे, वह करो।
मगर बंधना-वंधना कहीं भी नहीं। बंधना-वंधना कहीं भी नहीं! और यह गुरुडम से बचना। सब गुरु घूम रहे हैं इसी तलाश में! यह एक संन्यासिनी बैठी है होने वाली पहले से। फिर यह असली में हो गई है। इसने सोचा कि अब जाने दो।
प्रश्र्न:
सच्चा संन्यास हो गया क्या?
हूं-हूं।
(प्रश्र्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं है।)
कर सकती हो बराबर, क्योंकि अभी पूरा ज्ञान तो नहीं है न! और कल ज्यादा ज्ञान होगा, आज की बजाय। इसलिए लौटने का हमेशा उपाय रखना चाहिए। क्योंकि कल तुम ज्यादा ज्ञानवान होगी, आज की बजाय। और आज से अगर तुम कल को बांधती हो, तो तुम गलती में हो। जितना मैं आज जानता हूं, कल और ज्यादा जानूंगा। और मैं आज कसम खाता हूं कि मैं पीछे नहीं लौटूंगा, और कल मैंने जाना कि यह सब गड़बड़ था, फिर? इसलिए लौटना, नहीं लौटना, सब स्वतंत्र रखो। और कोई कहीं बंधने की जरूरत नहीं है। स्थान-विस्थान देश की भी कोई जरूरत नहीं है।
प्रश्र्न:
बट वॉय वी शुड थिंक दैट वी हैव टु कम बैक एंड वी वांट टु.?
यह सवाल ही नहीं है न। यह सवाल ही नहीं है। यह सब हो सकता है। आज तुम जिस रास्ते पर जाती हो कल पा सकती हो कि वह आगे जाता ही नहीं है, फिर तुम क्या करोगी? फिर लौटोगी नहीं, कसम खाकर उसी पर खड़ी रहोगी?
प्रश्र्न:
बट इट विल बी सो कांप्लिकेटेड टु थिंक नाउ.।
कांप्लिकेशन से जो डरता है, जो कांप्लिकेशन से डरता है वह जिंदगी से डरता है। उसको सुसाइड करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है।
प्रश्र्न:
दैट्स वॉय आइ से वॉय आइ शुड थिंक मोर एंड मोर, बिकॉ़ज एज आइ थिंक, मोर एंड मोर कांप्लिकेशंस.।
कांप्लिकेशंस से जो डरता है, वह जिंदगी से ही डरता है। उसको कुछ सत्य कभी नहीं मिलेगा।
प्रश्र्न:
सो ऑल दीज थिंग्स आइ नेवर थॉट ऑफ।
बिलकुल कांप्लिकेशंस बढ़ाओ अच्छी तरह से।
प्रश्र्न:
बढ़ाना है?
बिलकुल। तभी तो जिंदगी का अनुभव होगा, नहीं तो अनुभव नहीं होगा। अगर एक स्त्री वेश्या होकर साध्वी हो, तो मैं जानता हूं कि जो वह जानेगी, वह वह लड़की कभी भी नहीं जान सकती जो कभी किसी के प्रेम में नहीं गई। बुरे से बुरे रास्ते पर गया हुआ आदमी भी जब अच्छे से अच्छे रास्ते पर जाता है, तो उसका जो जानना है वह रिच होता है, समृद्ध होता है। उसकी जिंदगी और गहरी होती है।
कांप्लिकेशंस तो गहरा करते हैं। उससे डरना क्या है! और कांप्लिकेशंस से डरना है, तो दरवाजा बंद करके अपने बैठ जाओ और मर जाओ। सुसाइडल है।
प्रश्र्न:
बट व्हेन डिफिकल्टी अराइज, सपोज आइ गो ऑन वन पाथ, व्हेन दि डिफिकल्टी अराइज देन आइ सी दि डिफिकल्टी इमिजिएटली। वॉय शुड आइ फील दि डिफिकल्टी बिफोर आइ स्टार्ट?
मत सोचो, जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करो। यह भी तो सब सोचना ही है न!
प्रश्र्न:
नो, दैट इ़ज आइ एम जस्ट टाकिंग टु यू।
यह सब सोचना ही है। तो बचोगी कहां? जाओगी कहां? मत सोचो। बस एक ही बात ध्यान रखो कि बचो मत जिंदगी से। भगवान जिंदगी में धक्का देता है कि जाओ जानने को और महात्मा समझाते हैं कि बचो! ये महात्मा जो हैं, परमात्मा के सबसे बड़े दुश्मन हैं। महात्माओं से बचना, बस और कुछ नहीं, अगर परमात्मा पाना हो।
महात्माओं को तो परमात्मा मिलते नहीं, चंद्रेस जी। देखा आपने कभी किसी महात्मा को परमात्मा मिला? कभी नहीं मिला। पापी को भी मिल जाए, पंडितों को नहीं मिलता।