मरके भी कब तक निगाहे-शौक को रुसवा करें जिंदगी तुझको कहां फैंक आएं, आखिर क्या करें जख्मे-दिल मुमकिन नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें वो हमें देखें न देखें हम उन्हें देखा करें ऐ मैं कुर्बां मिल गया अर्जे-मोहब्बत का सिला हां उसी अंदाज से कह दो, तो फिर हम क्या करें देखिए क्या शोर उठता है हरीमे-नाज से सामने आईना रख कर खुद को इक सिज्दा करें हाए ये मजबूरियां, महरूमियां, नाकामियां इश्क आखिर इश्क है, तुम क्या करो, हम क्या करें प्रेम का आनंद है, प्रेम की पीड़ा भी। प्रेम समाधि है, प्रेम संताप भी। संताप से सीढ़ियां बनती हैं समाधि के मंदिर की। प्रेम की पीड़ाओं पर ही पग धर-धर कर प्रेम के आनंद तक पहुंचना होता है। जो कीमत चुकाने को राजी नहीं है, वह मंदिर तक नहीं पहुंच पाएगा। और मंदिर की सीढ़ियां पत्थरों से नहीं बनी हैं, पीड़ाओं से बनी हैं। तुम्हारा धन, तुम्हारा पद, तुम्हारी प्रतिष्ठा, कोई भी तुम्हें उसके मंदिर तक न ले जाएगी, जब तक कि तुम हृदय को जला कर राख करने को राजी न हो जाओ। लेकिन उसके मार्ग पर झेली गई पीड़ा भी अहोभाग्य है! उसके विपरीत सुख भी मिले तो दुर्भाग्य, उसकी खोज में दुख भी मिले तो सौभाग्य। उसे गंवा कर जिंदगी फूलों से भी भर जाए तो आज नहीं कल गंदगी और बदबू के सिवा कुछ भी न पाओगे। उसे खोजते हुए जिंदगी कांटों से भी भर जाए तो हर कांटा फूल हो जाएगा--अंततः फूल हो जाएगा। उसके मार्ग पर फूल ही हैं। कांटे जैसे जो मालूम होते हैं, वे भी अंततः फूल ही सिद्ध होते हैं। प्रेम की पीड़ा के लिए जो तत्पर है झेलने को, वही प्रेम के मंदिर में छिपे परमात्मा को खोज पाता है। त्यागी, व्रती भी दुख झेलता है, मगर उसके दुख में गणित है। प्रेमी भी दुख झेलता है, पर उसके दुख में गणित नहीं, काव्य है। त्यागी दुख झेलता है, मगर उसका दुख रूखा-सूखा है। प्रेमी भी दुख झेलता है, मगर उसके दुख में हृदय की रसधार बहती है। प्रेमी का दुख हरा-भरा है। ज्ञानी का दुख आरोपित है। ऊपर से थोपा गया है। प्रेमी का दुख हृदय से उमगता है। और वही भेद है। और भेद बड़ा है। ऐसा भेद जिससे फिर सारे भेद पड़ जाते हैं। त्यागी, ज्ञानी दुख झेलता है, वे दुख सतह पर होते हैं। कोई कांटों की सेज पर सोया है, तो देह पर कांटे चुभते हैं। और किसी ने उपवास किया है, तो पेट भूख की आग से झुलसता है। और कोई रात भर जागता रहा है, तो उसकी आंखें थकी हैं। लेकिन यह सब ऊपर-ऊपर है। प्रेमी का दुख हार्दिक है। कांटा हृदय में चुभता है, भूख हृदय में अनुभव होती है। उदासी, विषाद हृदय के केंद्र में उमगता है। प्रेमी का दुख आत्मिक है। और निश्चित ही जो आत्मिक दुख उठाने को तैयार है, उसने कीमत चुकाई, उसने अपने जीवन को यज्ञ बनाया। जो जीवन को यज्ञ बना लेते हैं, वे ही पहुंचते हैं। वो काफिर आशना, नाआशना यूं भी है और यूं भी हमारी इब्तिदा-ता-इंतिहा यूं भी है और यूं भी तअज्जुब क्या अगर रस्मे-वफा यूं भी है और यूं भी कि हुस्नो-इश्क का हर एक मसलआ यूं भी है और यूं भी कहीं जर्रा कहीं सहरा कहीं कतरा कहीं दरिया मोहब्बत और उसका सिलसिला यूं भी है और यूं भी वो मुझसे पूछते हैं, एक मकसद मेरी हस्ती का बताऊं क्या कि मेरा मुद्दआ यूं भी है और यूं भी हम उनसे क्या कहें? वो जानें उनकी मसलहत जाने हमारा हाले-दिल तो बरमला यूं भी है और यूं भी न पा लेना तिरा आसां न खो देना तिरा मुश्किल मुसीबत में ये जाने-मुब्तला यूं भी है और यूं भी उसे पाना बड़ा कठिन है। और उसे खो देना बड़ा आसान है। उसकी तरफ चलना बड़ा कठिन, उससे दूर जाना बड़ा आसान। उसके पास तक चलो, उसके करीब बढ़ो, तो भी दुख है और उससे दूर जाओ तो भी दुख है। हमारी इब्तिदा-ता-इंतिहा यूं भी है और यूं भी उससे दूर जाओ तो दुख है--मगर कोरा दुख, नपुंसक दुख, कांटे ही कांटे--जिनमें फूल कभी नहीं लगते--उसके पास चलो तो भी दुख है। लेकिन बड़ा विधायक दुख। उसी दुख की भूमि में आनंद के फूल खिलते हैं। उसे चूको तो भी संताप है, तो भी अंधेरी रात है और उसे खोजने चलो तो भी अंधेरी रात है। पर एक भेद है। उसकी तरफ पीठ करो तो अंधेरी रात का फिर कोई अंत नहीं, उसकी तरफ मुंह करके चल पड़ो, अंधेरा कितना ही घना होता जाए--जितना अंधेरा घना होता है, उतनी ही सुबह करीब आती है। कहीं जर्रा कहीं सहरा कहीं कतरा कहीं दरिया मोहब्बत और उसका सिलसिला यूं भी है और यूं भी न पा लेना तिरा आसां न खो देना तिरा मुश्किल मुसीबत में ये जाने-मुब्तला यूं भी है और यूं भी दुख तो ऐसे भी है, दुख वैसे भी है। लेकिन दुखों-दुखों में भेद है। व्यर्थ के लिए भी आदमी दुख झेलता है, सार्थक के लिए भी दुख झेलता है। इसलिए सभी दुखों को एक ही तराजू पर मत तौल लेना। कोई धन के लिए भी रोता है। और कोई ध्यान के लिए रोता है। दोनों के आंसुओं का एक ही मूल्य मत समझ लेना। यद्यपि विज्ञान के तराजू पर दोनों के आंसू एक जैसे ही हैं। और अगर रसायनविद से पूछोगे तो दोनों के आंसुओं का विश्लेषण भी एक जैसा है। दोनों का स्वाद भी एक जैसा है--खारा। कुछ भेद न बता पाएगा। अगर रसायनविद के पास ले गए किसी भक्त के आंसू, किसी प्रेमी के आंसू और जो धन के लिए रोया था और जो पद के लिए रोया था, उसके आंसू ले गए, तो भेद न बता पाएगा कि कौन से आंसू प्रेमी के हैं और कौन से पद के दीवाने के हैं। लेकिन अंतर तो है। रसायनशास्त्र न पकड़ पाए तो रसायनशास्त्र की सीमा सिद्ध होती है, अंतर तो है। पद के रास्ते पर भी आदमी रोता है, लेकिन तब उसके आंसुओं की कोई गहराई नहीं है, कोई मूल्य नहीं। उसके आंसुओं में कोई सुगंध नहीं, सुवास नहीं। क्योंकि उसके आंसुओं में कोई प्रार्थना नहीं। उसके आंसू नीचे की तरफ जाने वाले आंसू हैं। उसके आंसू नरक की यात्रा पर चले हैं। और जब कोई उस प्यारे के प्रेम में रोता है, तो आंसू तो आंसू ही जैसे हैं लेकिन यात्रा का पूरा का पूरा रूप बदल गया, आयाम बदल गया। अब ये आंसू आकाश की तरफ उठ रहे हैं। अब इन आंसुओं को पंख लग गए हैं। अब ये आंसू स्वर्गीय हैं। अब ये आंसू ऊर्ध्वगामी हैं। भक्त भी रोता है, आसक्त भी रोता है, मगर भेद खयाल रखना। वासनाग्रस्त भी नाचता है, प्रभु के प्रेम में डूबा हुआ भी नाचता है; वासना का भी नशा है, प्रार्थना का भी नशा है, पर भेद खयाल रखना। दुख और दुख एक जैसे ही नहीं होते। लेकिन एक बात तो है ही--परमात्मा के रास्ते पर भी बहुत पीड़ाएं हैं; यद्यपि वे सभी पीड़ाएं धन्यभागियों को उपलब्ध होती हैं। जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय। जगजीवन कहते हैं: जोगन हो गई हूं। रोती हूं, पुकारती हूं, कोई उत्तर भी आता मालूम पड़ता नहीं, पीड़ा सघन होती जाती है, देह पर भस्म चढ़ा ली है--यह प्रतीक है। भस्म है प्रतीक मृत्यु का। कोई मर जाता है तो राख पड़ी रह जाती है। ऐसे जीते जी मुर्दा हो गई हूं। देह को तो जान ही लिया कि आज नहीं कल राख हो जाएगी। हो ही जाना है राख तो हो ही गया। जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय। प्रतीक को शब्दशः मत पकड़ लेना। कुछ नासमझों ने यही किया है। वे भस्म चढ़ा कर बैठ गए हैं। वे सोचते हैं, भस्म चढ़ा ली, काम पूरा हो गया। भस्म चढ़ाना बड़ा गहरा प्रतीक है। उसका अर्थ है: इस देह को मुर्दा मान लिया। तेरे बिना यह देह मुर्दा है। तेरे बिना यह संसार मुर्दा है। तू आए तो रस आए, तू आए तो जीवन आए, तू आए तो हरियाली हो, तू आए तो फूल खिलें। तेरे बिना सब मौत है। तेरे बिना जीवन नहीं है, मरघट है। और दूसरी बात खयाल रखना। जैसे ही परमात्मा की तरफ कोई प्रेम से भरता है, पुरुष मिट जाता है, स्त्री का आविर्भाव हो जाता है। जगजीवन पुरुष हैं, लेकिन भाषा स्त्री की बोलने लगे हैं--जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय--कि मैं जोगन हो गई हूं, अंग भस्म चढ़ा ली है। प्रेम की भाषा स्त्रैण है। पुरुष आक्रामक है। वह परमात्मा की खोज पर भी निकलता है तो ऐसे ही जैसे युद्ध के लिए निकला हो। बैंड-बाजा बजा कर, भाले इत्यादि उठा कर। परमात्मा की यात्रा पर भी योद्धा की तरह जाता है। जैसे परमात्मा से कोई जूझना है। पुरुष की भाषा विजय की भाषा है, स्त्री की भाषा समर्पण की भाषा है। और मजा यह है कि जो समर्पण करना जानते हैं, जीत उनकी है। जो जीतने चले हैं, हार उनकी निश्चित है। सौ प्रतिशत निश्चित है। परमात्मा से लड़ोगे--हारोगे। परमात्मा से हारोगे--जीत जाओगे। प्रेम का सूत्र है: जीत, हार से उपलब्ध होती है। और परमात्मा के साथ तो हमारा अगर कोई भी संबंध हो सकता है, तो प्रेम का ही हो सकता है। और प्रेम का गणित खयाल रखना, कभी भूल मत जाना। हारना है वहां; अगर जीतना हो, तो हारना होगा। जिस समग्रता से हार जाओगे, उसी परिपूर्णता से जीत का सेहरा तुम्हारे सिर बंधेगा। जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय। कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय।। खंड-खंड हो गया है मेरा हृदय। टुकड़े-टुकड़े हो गया है। जैसे दर्पण किसी ने पटक दिया हो पत्थर पर। कब आओगे? कब मेरे इस खंड-खंड हृदय को जोड़ दोगे पुनः, कब मुझे फिर एक कर दोगे। मनुष्य अनेक हो गया है। अनेक उसकी वासनाएं हैं, इसलिए अनेक हो गया है। अनेक उसकी आकांक्षाएं हैं, हर आकांक्षा अलग दिशा में खींचती है। कोई पूरब, कोई पश्चिम, कोई दक्षिण, कोई उत्तर। मनुष्य एक ऐसी बैलगाड़ी है जिसमें सब तरफ बैल जुते हैं। इसीलिए तो जीवन में कोई यात्रा नहीं हो पाती। यात्रा हो तो कैसे हो? एक हिस्सा पश्चिम जा रहा, एक पूरब जा रहा, एक उत्तर, एक दक्षिण। सब एक-दूसरे के विपरीत संघर्ष में रत हैं। ऐसी बैलगाड़ी कहीं चलेगी जिसमें सब तरफ बैल जुते हों! घसिट जाएगी थोड़ी-बहुत, अस्थिपंजर टूट जाएंगे, मंजिल नहीं मिलेगी। मगर ऐसा ही आदमी है। तुमने अपने मन को कभी जांचा, परखा; कभी जाग कर थोड़ा देखते हो? कैसी-कैसी इच्छाएं हैं! और एक-दूसरे के विपरीत! इच्छाओं में एक तारतम्य भी नहीं है। एक संगति भी नहीं है, बड़ी विपरीत इच्छाएं हैं। जैसे एक आदमी चाहता है कि मुझे सम्मान मिले, मेरे अहंकार की प्रतिष्ठा हो, दुनिया कहे कि मैं कुछ विशिष्ट हूं। एक आकांक्षा। दूसरी तरफ आदमी यह भी चाहता है, लोग समझें कि मैं विनम्र हूं। लोग कहें कि यह है साधुपुरुष। ऐसा विनम्र कभी देखा नहीं गया। अहंकार का भाव ही नहीं छू गया है। अब ये दोनों इच्छाओं में कशमकश जारी रहेगी। ये एक-दूसरे के विपरीत चलती रहेंगी। एक इच्छा है कि दान दूं, बांटूं। लेकिन दूसरी इच्छा है: खूब इकट्ठा करूं, संपदा हो, सुरक्षा हो। अड़चन होगी। एक इच्छा है कि जीवन में नित-नूतन नये का आविर्भाव हो क्योंकि ऊब हो जाती है पुराने से, थक जाता है आदमी पुराने से, तो रोज कुछ नई घटना घटे, कुछ नई संवेदना जगे, कुछ नई प्रतीति हो--एक इच्छा, और दूसरी इच्छा है: सुरक्षा रहे, सुरक्षा न खो जाए। सुरक्षा पुराने के साथ रहती है। नये के साथ असुरक्षा है। कौन जाने नया कैसा होगा, क्या होगा? नये का क्या भरोसा? पुराना जाना-माना है, परिचित है, बहुत दिन साथ रहना हुआ है। पुराने के साथ रहो तो सुरक्षा है, लेकिन ऊब पैदा होती है। नये के साथ रहो तो उत्तेजना होती है, लेकिन खतरा पैदा होता है। और ऐसी अनंत-अनंत इच्छाएं हैं जो एक-दूसरे के विपरीत खड़ी हैं। तुम अपने मन को ठीक से देखोगे तो तुम ठीक वैसी ही दशा पाओगे जैसा महाभारत के युद्ध में कौरव और पांडव एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। तुम्हारे भीतर महाभारत का युद्ध चल रहा है। इस तरफ भी अपने हैं, उस तरफ भी अपने हैं। एक ही व्यक्ति अनेक-अनेक खंडों में बंट गया है। अखंड कैसे होओगे? वासनाओं में जीकर कोई अखंड नहीं होता। प्रार्थना अखंड करती है क्योंकि प्रार्थना एक है। परमात्मा अखंड करता है क्योंकि परमात्मा एक है। एक की आकांक्षा परमात्मा की आकांक्षा है। उस एक का पदार्पण हो जाए...जगजीवन ठीक कहते हैं: कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय। मैं तो टूट गया, मैं तो पारे जैसा छितर-बितर हो गया हूं, तुम्हारा परस-स्पर्श न मिले तो मैं फिर इकट्ठा होऊं, इसकी आशा दुराशा मालूम होती है। लागत आषाढ़ बाढ़ी विरहा की बाढ़ उए अंजनी पहाड़ बही नैनन सौं नदिया ह्वै गई निपूती तै सपूती धरती की गोद वारे वैस आंकुर पै रीझि गई बुंदिया पिया परदेश लागै सूनो-सूनो वेष-- रोवै हीरामनि चूनरी पै धानी रंग अंगिया हेरि हारो अंगना री टेरि हारो कंगना निहारि हारो कजरा बुलाय हारी बिंदिया। पुकारते-पुकारते बहुत देर हो गई है। जन्मों-जन्मों से खोज रहे हैं। हेरि हारो अंगना री टेरि हारो कंगना निहारि हारो कजरा बुलाय हारी बिंदिया बुरी हार हो गई है। पराजय में खड़े हैं। टूटे-बिखरे, खंड-खंड, अस्त-व्यस्त, एक खंडहर हो गए हैं। आओ तुम, तो फिर मंदिर बने। उतरो तुम, तो तुम्हारी मौजूदगी फिर टूटे खंडों को निकट ले आए, संघटित कर दे। अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय। मन में ललक तो बहुत है कि मिल जाऊं तुमसे आकर, पर तुम्हारी कृपा न हो तो क्या हो? मैं तो बहुत चाहूं कि खोज लूं तुम्हें, लेकिन दूसरी तरफ से हाथ न फैलाया जाए तो मेरे हाथ बड़े छोटे हैं। ललक तो उठती है बहुत, पर मेरी सीमा है--मेरी ललक की भी सीमा है। छोटा सा दीया है, लपट उठती भी है तो कितनी बड़ी उठेगी? दीये का तेल भी थोड़ा है, बाती भी छोटी है। अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय। होती तो बहुत ललक है, यह मेरा मन बार-बार प्रज्वलित हो उठता है, क्योंकि दिखाई पड़ रही है सारी व्यर्थता और दिखाई पड़ रहा है सारा अपना विक्षिप्त रूप--टूट गया, खंड-खंड, बिखर गया सब भांति--यह सब दिखाई पड़ रहा है; यह खंडहर हो गया हूं, यह मुझे मालूम पड़ रहा है, तुम आओ तो फिर घर बसे; ललक तो उठती है, पुकारता भी हूं, लेकिन मेरी सीमा है। घर-आंगन मोहिं कछु न सुहाय। अब कुछ भला भी नहीं लगता--न कोई घर है, न कोई आंगन बचा है--रहने वाला ही टूट गया, रहने वाला ही मुर्दा है, मरघट हो गया है सब। किसी तरह ढो रहे हैं। तुम जिंदगी को ढो रहे हो, जी नहीं रहे। जीने की ललक कहां? जीने की पुलक कहां? जीने का उत्साह कहां? जीने की उमंग कहां? तुम्हारे पैरों में नृत्य तो नहीं। और न तुम्हारे प्राणों में गीत है। बांसुरी कब की नहीं बजी! कब से स्वर खो गए हैं! कब से तुम्हारा अपने मूल रूप से मिलन नहीं हुआ! परदेश भटकते-भटकते, भीख मांगते-मांगते तुम भूल ही गए हो अपनी बादशाहत। घर आंगन मोहिं कछु न सुहाय।। अस मैं ब्याकुल भइउं अधिकाय। जैसे नीर बिन मीन सुखाय।। और अधिक से अधिक मेरी पीड़ा होती जाती है। पीड़ा का अंत तो दूर, पीड़ा बढ़ रही है। खंड संगठित हों, यह तो दूर, छोटे-छोटे खंड और छोटे-छोटे खंडों में टूटते जा रहे हैं। विमुक्ति आए, इसका तो सपना भी देखना मुश्किल है, विक्षिप्तता बढ़ती चली जाती है। कभी बैठ कर घड़ी भर अपने मन में झांकना और तुम पागल भीड़ पाओगे वहां विचारों की, वासनाओं की, आकांक्षाओं की। तुम खुद ही चौंकोगे कि मैं कैसा पागल हूं! यह भी कोई होना है? यह शोरगुल भीतर, यह बाजार भीतर, यह कोलाहल भीतर, क्या इस कोलाहल के रहते जीवन के रस का कोई अनुभव हो सकेगा? क्या उस कोलाहल के चलते जीवन के सौंदर्य से कुछ संबंध हो सकेगा? सत्य से कोई मिलन हो सकेगा? हालत वैसी ही है जैसे नीर बिन मीन सुखाय! जैसे किसी ने खींच ली हो सागर से मछली और डाल दी हो सूखे तट पर, जलती हो धूप, बरसती हो आग सूरज से और मीन तड़फती हो और मीन चाहती हो कि वापस सागर मिल जाए। जगजीवन कहते: ऐसी मेरी दशा है। ऐसी प्रत्येक की दशा है। तुम चाहे मानो भी न--क्योंकि मानने में भी तकलीफ होती है; क्योंकि मानने का मतलब होता है, फिर सागर की तलाश करनी होगी। तुमने तो इस जलती हुई रेत में ही घर बना लिया है। तुमने तो इस सूरज से बरसती आग को ही अपना अस्तित्व समझ लिया है। तुम तो मान ही लिए हो कि यही है होने का ढंग, और कोई ढंग होता नहीं। अधार्मिक आदमी मैं उसको ही कहता हूं, जो मानता है कि जैसी जिंदगी चल रही है, बस जिंदगी की यही एक शैली है, यही एक उपाय है, और कोई जिंदगी होती नहीं। धार्मिक मैं उसे कहता हूं, जो कहता है: यह अगर जिंदगी है, तो जिंदगी व्यर्थ है। जिंदगी का कोई और ढंग होना ही चाहिए। जिंदगी की कोई और शैली होनी ही चाहिए। मुझे भले पता न हो--तो खोजूंगा। अधार्मिक कहता है: कोई ईश्वर नहीं है। उसका क्या प्रयोजन है कहने से कि ईश्वर नहीं है? उसका इतना ही प्रयोजन है कि जैसा जीवन है, बस ऐसा ही जीवन है, इससे अन्यथा कोई जीवन नहीं है। मत उठाओ आंखें ऊपर, ऊपर कुछ भी नहीं है, कोरा आकाश है। और मत पुकारो किसी को, कोई उत्तर न कभी आया है और न आएगा। मत खोजो कुछ और, जगत में कुछ भी रहस्य नहीं है। बस यही कूड़ा-करकट, यही जिंदगी है। इसी घास-फूस में किसी तरह जी लो, गुजार लो चार दिन, यह जिंदगी एक दुर्घटना है, मिट्टी-मिट्टी में गिर जाएगी। यहां न कुछ पाने को है, न कुछ खोने को है, एक दुख-स्वप्न है, भोग लो, गुजार लो--अच्छे कि बुरे। जो आदमी कहता है: ईश्वर नहीं है, वह यही कह रहा है कि जैसी जिंदगी है, इससे अन्यथा जिंदगी की बात मत उठाओ! क्योंकि तुम अन्यथा जिंदगी की बात उठाते हो, तो फिर मुझे परिवर्तित होना पड़े। अगर सागर कहीं है, तो फिर मछली कैसे रेत में घर बनाए? अगर सागर कहीं है और सागर की शीतलता कहीं है, तो फिर कैसे मछली सूरज की तपती धूप को अंगीकार करे? फिर घर-आंगन कुछ भी सुहाएगा नहीं। फिर एक खोज पकड़ लेगी प्राणों को, मथ डालेगी। फिर एक प्रचंड झंझावात आएगा, जीवन में अन्वेषण का जन्म होगा, अनुसंधान शुरू होगा। नेह की बूंद झरी बदरी पसुरी-पसुरी सब देह पिरानी। भीजत खीजत छोड़ि गयो कर मीजति हौं मेरी बात न मानी। सूनी अटारी कटारी लगै सुनि कोयल कीर मयूर की बानी। गाज गिरै ऐसे मौसम पे जामै भीतर आगि औ बाहर पानी। जिंदगी अभी ऐसी है। गाज गिरै ऐसे मौसम पे जामै भीतर आगि औ बाहर पानी बाहर ही बाहर सब रोशनी है, भीतर अंधेरा। बाहर-बाहर सब थोथे आयोजन शीतलता के, भीतर जलती प्रचंड अग्नि। सूनी अटारी कटारी लगै सुनि कोयल कीर मयूर की बानी और जब तक परमात्मा से, प्यारे से मिलन नहीं हुआ है--सूनी अटारी कटारी लगै--तब तक सब सूना है। समझा लो, बुझा लो, झूठे सपने देख लो--यह मेरी पत्नी, यह मेरा पति, यह मेरा बेटा, यह मेरा भाई--किसी तरह भुलाए रखो अपने को संग-साथ में, समझाए रखो, मगर यह सब समझ मौत आएगी उखाड़ जाएगी। ये कागज की नावें डूब जाएंगी। इनके सहारे कोई कभी पार नहीं हुआ है। सूनी अटारी कटारी लगै सुनि कोयल कीर मयूर की बानी और जिसको याद आनी शुरू हो गई सागर की, उसे कोयल की पुकार, कुहू-कुहू की पुकार अनंत से आती अपने प्यारे की पुकार मालूम होने लगी। कटारी जैसी लगेगी! और जब पपीहा पुकारेगा: ‘पी कहां!’ तो उसके प्राणों में भी पुकार उठेगी कि ‘पी कहां!’ प्यारे को खोकर हम जी रहे हैं। सागर को खोकर मछली पड़ी है। जैसे नीर बिन मीन सुखाय! ऐसे हम सूख रहे हैं। जिसको तुम जिंदगी कहते हो, यह धीमे-धीमे मरने के अतिरिक्त और क्या है? आहिस्ता-आहिस्ता आत्मघात! और क्या है? सत्संग में अगर कभी तुम्हें एकाध बूंद का अनुभव हो जाए, तो तुम्हें सागर की याद आने लगे। इसलिए सत्संग सरोवर है, भक्ति स्नान। नेह की बूंद झरी बदरी पसुरी-पसुरी सब देह पिरानी एकाध बूंद तुम्हारे भीतर उतर जाए तो तुम्हें पता चले कि जल भी है और प्यासा रहना नियति नहीं है। अगर तुम प्यासे हो, तो तुम्हारा ही उत्तरदायित्व है। तुमने तलाश सरोवर की नहीं की है। यहीं इसी जमीन पर, यहीं तुम्हारे बीच ऐसे लोग सदा रहे हैं, सदा हैं, सदा रहेंगे, जो तृप्त हो गए हैं। जो सूख नहीं रहे हैं, जो रोज हरे हो रहे हैं। जिन्हें परम जीवन मिल गया है। जिन्हें ऐसा जीवन मिल गया है जिसका कोई अंत नहीं आता। जिन्होंने शाश्वत को पहचाना है। जिनके हाथ परमात्मा के हाथ में पड़ गए हैं। और जिन्होंने अपने हृदय को उसके हृदय में डुबा दिया है। जिन्होंने अपनी बूंद को उसके सागर में उतर जाने दिया है। आपन केहि तें कहौं सुनाय। जो समुझौं तौ समुझि न आय।। जगजीवन कहते हैं: मैं रोऊं भी तो किसके सामने रोऊं? समझेगा कौन? लोग हंसेंगे। क्योंकि लोगों ने तो जिंदगी बना ली है, घर-आंगन में ही सब समाप्त हो गया है; सारा आकाश उन्होंने अपना आंगन समझ लिया है। और अपने घर को सारा अस्तित्व मान लिया है। तड़प रहे हैं, सड़ रहे हैं, गल रहे हैं, सूख रहे हैं, लेकिन यही उनकी जिंदगी की परिभाषा है। आपन केहि तैं कहौं सुनाय। मैं किसी से कहने भी जाऊं अपनी पीड़ा तो किससे कहूं? इसीलिए तो भक्त ने प्रार्थना खोजी। प्रार्थना की खोज के बुनियादी कारणों में एक कारण यह है कि किसी और से कहने का कोई अर्थ नहीं मालूम होता, तो परमात्मा से ही कहने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। तो भक्त उसी से कह लेता है, उसी के सामने रो लेता है। आंसू बहा लेता है, निवेदन कर लेता है। उत्तर आए या न आए, यह सवाल नहीं है। एक बात तो कम से कम ठीक है कि परमात्मा सुने या न सुने, कम से कम हंसेगा तो नहीं, पागल तो न समझेगा। उत्तर न भी आएगा तो चलेगा। लेकिन इस जगत में किसी से अगर कहो, तो लोग हंसेंगे। धार्मिक आदमी को देख कर लोग सदा हंसे हैं। हंसी उनकी आत्म-रक्षा है। हंसते हैं, क्योंकि उन्हें डर पैदा होता है कि हो न हो, कौन जाने यह आदमी सही हो! अगर यह आदमी सही है, तो उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। इस आदमी को गलत होना ही चाहिए; तो ही उनके पैर के नीचे जमीन थिर रहती है। अगर बुद्ध सही हैं, तो तुम गलत हो गए। अगर कृष्ण सही हैं, तो तुम्हारा भवन गिरा। तुम दोनों सही नहीं हो सकते साथ-साथ। बुद्ध के और तुम्हारे सही होने में कोई समझौता नहीं हो सकता। इसलिए लोग जब बुद्ध जीवित होते हैं तो बुद्ध से बचते हैं, और जब बुद्ध मर जाते हैं तो उनकी पूजा करते हैं। दोनों तरकीबें बचने की हैं। जिंदा होते हैं तो बचते हैं। क्योंकि सुनने में खतरा है। कौन जाने कोई बूंद कंठ में उतर ही जाए! तुम्हारे बावजूद उतर जाए। तुम चाहते भी न हो और उतर जाए। कोई बात समझ में पड़ ही जाए, तो फिर मुश्किल हो जाएगी। इसलिए बचते हैं, विरोध करते हैं। और जब बुद्ध मर जाते हैं, तो बचने की और भी अच्छी तरकीब मिल जाती है। फिर पूजा करते हैं, फिर उनकी मूर्ति बना लेते हैं। लेकिन समझते कभी भी नहीं। या तो गाली देते हैं या पूजा करते हैं। और खयाल रखना, दोनों में कुछ भेद नहीं है। जिंदा हों तो गाली देते हैं, मर जाएं तो पूजा करते हैं। मरे को तो वैसे भी कोई गाली नहीं देता न! बुरा से बुरा आदमी भी मर जाए, तो भी गांव के लोग प्रशंसा करने लगते हैं। एक आदमी ने मुल्ला नसरुद्दीन को फोन किया कि भाई, ठीक तो हो? नसरुद्दीन ने कहा कि ऐसा पूछने का कारण? और उस आदमी ने फिर पूछा कि कहां से बोल रहे हो? नसरुद्दीन ने पूछा कि बात क्या है, मामला क्या है? उस आदमी ने कहा: कुछ नहीं, गांव में लोगों को तुम्हारी प्रशंसा करते सुना। तो मुझे शक हुआ कि कहीं मर तो नहीं गए! क्योंकि यहां जब कोई मर जाता है तभी लोग प्रशंसा करते हैं। मैंने सुना है, एक गांव में एक आदमी मरा--उस गांव का बड़ा उपद्रवी आदमी था। ऐसे तो नेता था, ‘नेताजी’ कहलाता था--मगर ‘नेताजी’ जैसे होते हैं! बड़ा उपद्रवी था, गांव उससे परेशान था। मरा तो सारा गांव प्रसन्न हुआ। दिल ही दिल लोग खुश हुए। लेकिन नेता था, उसके शागिर्द भी थे--‘दादा’ था, गांव में उसके और मानने वाले भी थे--तो सारे गांव को जाना तो पड़ा ही मरघट! क्योंकि मर कर भी उसकी ताकत तो थी ही। उल्लू भी मर जाएं तो औलाद तो छोड़ ही जाते हैं! अब बड़ी मुसीबत वहां यह आई कि गांव के लोगों से कहा गया कि कुछ प्रशंसा में बोलो नेताजी की, अब नेताजी मर गए हैं तो उनकी समाधि पर...तो लोग एक-दूसरे का मुंह ताकें। लोग बहुत सोचें कि बोलें क्या इसकी प्रशंसा में? ऐसा तो कभी इसने कुछ किया ही नहीं था जिसकी प्रशंसा की जा सके। आखिर जब कोई उपाय न हुआ तो गांव के एक पंडित जी को लोगों ने कहा: अब आप ही कुछ...आप शास्त्र के ज्ञाता हैं, वेद-पुराण के ज्ञाता हैं, आप ही कुछ ऐसी बात कहो कि मामला टले--कुछ तो कहना ही पड़ेगा! मर गया आदमी तो उसकी प्रशंसा में कुछ दो शब्द तो कहो! पंडित ने खड़े होकर कहा कि नेताजी चले गए, पांच भाई और छोड़ गए हैं पीछे, उन पांच भाइयों की तुलना में वे देवतातुल्य थे। और तो कुछ उसको भी नहीं सूझा कि अब वह कहे क्या? यह बात गांव के लोगों को भी जंची कि यह बात सच है, वे पांच भाई तो और पहुंचे हुए हैं। कोई मर जाए तो प्रशंसा करनी ही होती है। फिर कुछ निंदा का कारण भी नहीं रहा। और जब बुद्ध जैसे व्यक्तियों की हम बहुत निंदा करते हैं उनके जीवन में, तो हमारे भीतर एक अपराध-भाव भी पैदा हो जाता है, क्योंकि कहीं प्राणों के किसी अंतस्तल में कोई कहता तो है कि हम गलत कर रहे हैं। हमारे प्राणों के प्राण में कोई स्वर गूंजता तो है कि हम गलत कर रहे हैं। करना पड़ता है, क्योंकि हमारे जीवन की सुरक्षा इसमें है। नहीं तो हमारी दुकान क्या हो, हमारा बाजार क्या हो, हमारे संबंधों का क्या हो? अगर बुद्ध की सुनें, तो हमारी जिंदगी का सारा का सारा इंतजाम अस्त-व्यस्त हो जाता है। जिसको हमने जिंदगी कहा है, वह तो अस्त-व्यस्त हो जाती है। तो विरोध तो करना पड़ता है। लेकिन कहीं प्राण के किसी गहन तल पर सत्य को एकदम इनकार कर भी तो नहीं सकते हो। तो बुद्धों के मरने के बाद हमें पश्चात्ताप घेरता है, अपराध-भाव घेरता है। उस अपराध-भाव के कारण फिर हम पूजा शुरू करते हैं कि चलो ठीक है, जो जिंदगी में हुआ, हुआ, अब तो दो फूल चढ़ाओ! अब किसी तरह अपने मन को हलका कर लो। तो जीसस को सूली दी और फिर दो हजार साल से पूजा चल रही है। सुकरात को जहर पिलाया और ढाई हजार साल से सम्मान, और सुकरात की प्रशंसा में इतने गीत लिखे जा रहे हैं। बुद्ध को पत्थर मारे, महावीर के कानों में सलाखें ठोंक दीं, जिंदा रहना मुश्किल कर दिया--और फिर मंदिर खड़े हो रहे हैं, और पूजा के थाल उतारे जा रहे हैं। यहां तो सच बात किसी से कहनी मुश्किल है। क्योंकि लोगों की जिंदगी झूठ पर खड़ी है। सच का जरा सा धक्का, जरा सा झोंका और उनके ताशों के महल गिर जाते हैं। कौन सुनने को राजी है? और किसी से कहो भी, कोई सुनने को राजी भी हो जाए, तो भी कौन सहानुभूति तुम्हें दिखलाएगा? आपन केहि ते कहौं सुनाय। जगजीवन कहते हैं: किसी से अपने दिल की, अपने दुख की बात भी कह सको, ऐसा भी कोई संगी-साथी नहीं दिखाई पड़ता। जो समुझौं तौ समुझि न आए। न किसी दूसरे से कह सकते, खुद समझने की कोशिश करो तो कुछ समझ में आता नहीं, इतना सब बेबूझ है। क्यों मैं आया, क्यों जन्मा, क्यों हूं, किसलिए, किस तरफ चल रही है यह यात्रा, कौन खींचे लिए जाता है, कौन चलाता है इस जीवन के विराट उपक्रम को, कौन छिपा है इस सारे रहस्य के भीतर, किसके हाथ, किसके हस्ताक्षर इस विस्तार में हैं? खुद समझो तो भी कुछ समझ में नहीं आता। यह बात समझने की नहीं। यह बात बुद्धि की नहीं। यह बात हृदय की है। चूंकि समझ में नहीं आती बात, इसलिए भक्त समझ के केंद्र से हट जाता है और प्रीति के केंद्र में उतर जाता है। ज्ञानी वहीं उलझा रहता है। और समझने की ही कोशिश करता रहता है। समझने की कोशिश परमात्मा को वैसे ही है जैसे कोई आंख से संगीत सुनने की कोशिश करे। हां, आंख से वीणा दिखाई पड़ेगी और संगीतज्ञ वीणा के तार छेड़ता हुआ भी दिखाई पड़ेगा, लेकिन सुनाई कुछ भी न पड़ेगा। या जैसे कोई कान से देखने की कोशिश शुरू करे तो वीणा के तार दिखाई नहीं पड़ेंगे, न वीणा, न वीणावादक, लेकिन स्वर सुनाई पड़ेगा। आंख देखती है, सुनती नहीं। कान सुनता है, देखता नहीं। बुद्धि क्षुद्र पर समर्थवान है, विराट पर नहीं। विराट पर हृदय का अधिकार है। जो बुद्धि से समझने चलते हैं सत्य को, उनके हाथ में क्षुद्र सिद्धांत लगते हैं, सत्य नहीं। जो हृदय से सत्य को समझने चलते हैं, वे समझ पाते हैं। लेकिन हृदय की भाषा समझने की भाषा नहीं है, प्रेम की भाषा है। प्रेम एक तरह के ज्ञान को जन्म देता है, उसी ज्ञान का नाम भक्ति है। भक्त यह नहीं कह सकता कि मैं भगवान को समझता हूं, लेकिन भक्त यह कहता है कि मुझे उसका स्वाद मिला। भक्त यह नहीं कह सकता कि मैं सिद्धांततः समझा सकता हूं कि भगवान क्या है, भक्त इतना ही कह सकता है कि मैंने डुबकी मारी, मैं जीया, मैंने उसे अनुभव किया। मैं उसके ही रूप में डूब गया, वह मेरे रूप में डूब गया। मैं उसके साथ एकात्म हो गया हूं। भक्त यही कह सकता है कि मैं हूं प्रमाण उसका और कोई प्रमाण नहीं दे सकता। जो समझौं तौ समुझि न आय।। संभरि-संभरि दुख आवै रोय। और बहुत अपने को सम्हालता हूं, मगर रह-रह कर, रह-रह कर बड़े दुख का आंदोलन उठता है। कि और कितनी देर! और कितना तड़पाओगे? और कितनी देर दूर-दूर रखोगे? संभरि-संभरि दुख आवै रोय। रो-रो उठता हूं। यह भक्त की पीड़ा समझो। किसी से कह नहीं सकता--कोई समझेगा नहीं। कहे, तो लोग हंसेंगे, पागल समझेंगे। अपने ही भीतर गुपचुप सम्हाल कर रखना होगा। खुद भी समझना चाहे, समझ में आता नहीं। क्योंकि बुद्धि बड़ी छोटी है, सत्य उसमें समाता नहीं। तर्क काम नहीं पड़ते। सब तर्क गिर जाते हैं। शास्त्र, शब्द, सिद्धांत, सब थोथे मालूम होते हैं। कोई अनुभव की तरफ ले जाता मालूम नहीं होता। विधि-विधान, औपचारिक क्रियाकांड, सब ऊपर-ऊपर मालूम होते हैं। अंतस्तल नहीं छूता। अंतस्तल नहीं आंदोलित होता। भीतर ऊर्जा नहीं उठती, उमंग नहीं जगती। उत्साह का आविर्भाव नहीं होता। फिर करे क्या भक्त? रह-रह के रोने लगता है। सम्हालता है। क्योंकि कौन उसके आंसुओं को समझेगा? उसके आंसू उसे व्यर्थ ही विक्षिप्त सिद्ध करवा देंगे। कौन उसके भाव को पहचानेगा? भाव को पहचानने वाले समृद्ध लोग कहां? उसके भाव को सम्मान दे सकें, ऐसे शालीन लोग कहां? जहां कौड़ी-कौड़ी के लिए लोग टूटे मर रहे हैं, जहां क्षुद्र-क्षुद्र पदों के लिए संघर्ष चल रहा है, वहां परमात्मा के लिए कोई रोएगा--कौन समझेगा इसे? लोग कहेंगे: गया काम से! होश सम्हालो! लोग कहेंगे: यह क्या कर रहे हो? भटक जाओगे। अपने को वापस दुनिया में लाओ। किन कल्पनाओं के जाल में खोए जाते हो? कह भी नहीं सकता। रो भी नहीं सकता। पराए तो पराए, अपने भी पराए हो जाते हैं। पत्नी को परमात्मा का भाव जगे, पति से नहीं कह सकती। पति को जगे, पत्नी से नहीं कह सकता। अपने जो हैं, इतने निकट जो हैं, वे भी ऐसी बातें नहीं समझेंगे। मेरे पास रोज घटनाएं घट जाती हैं। कोई पति आ जाता है, कि आपने मेरी पत्नी को क्या कर दिया? अकारण हंसती है, रोती है--अकारण! पास-पड़ोस में खबरें फैलने लगीं हैं कि कुछ गड़बड़ हो गया। कोई कारण हो तो हंसो, कोई कारण हो तो रोओ, लेकिन अकारण, बैठे-बैठे! तो तुम भी सोचोगे, तुम्हारी पत्नी एकदम बैठी रहे कुर्सी पर, एकदम खिलखिला कर हंसने लगे, तुम्हें भी शक होगा कि बात क्या है? और पति कहते हैं कि अगर मैं समझाता हूं तो वह और हंसती है। मैं कहूं कि चुप रह, कोई मोहल्ला-पड़ोस के लोग सुन लेंगे, तो उसे और हंसी आती है। कभी-कभी बैठे-बैठे रोने लगती है--कोई कारण ही नहीं है। और इससे भी ज्यादा अड़चन होती है कभी-कभी कि दोनों काम एक साथ करने लगती है। हंसना, रोना--दोनों। यह तो सिर्फ पागल ही करते हैं। तो मुझसे पूछते हैं वे कि क्या करें? किसी चिकित्सक को दिखाएं? और चिकित्सक क्या करेगा ऐसे व्यक्ति को? दे देगा, इलेक्ट्रिक शॉक दे देगा। इलेक्ट्रिक शॉक ऐसा ही है जैसे कभी-कभी तुम करते हो--कोई नई बात नहीं है। तुम्हारी घड़ी बंद हो गई, एक दिया झटका जोर से! कभी-कभी चल पड़ती है, यह बात भी सच है। मगर यह कोई तरकीब है घड़ी चलाने की! कोई घड़ीसाज, तुम कोई घड़ीसाज नहीं हो। कभी-कभी हो जाता है कि चल पड़ती है--कभी कोई तेल अटक गया था, कि कभी कोई एक धूल का कण अटक गया था, दे दिया झटका! मगर यह संयोग की बात है, यह कोई कला नहीं है, यह कोई विज्ञान नहीं है। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि इलेक्ट्रिक का शॉक...मस्तिष्क बड़ी सूक्ष्म घड़ी-जैसी चीज है...कभी-कभी ठीक चलने लगता है। तो लोग समझते हैं, यह कोई कला है। यह कला नहीं है। इससे तुम कुछ वैज्ञानिक उपक्रम नहीं कर रहे हो, सिर्फ असमर्थता घोषित कर रहे हो कि हमारी समझ में कुछ नहीं आता, चलो कोशिश करके देख लें--दें एक जोर का धक्का, शायद चल जाए! और जिन-जिन के पास घड़ी हैं, सभी को यह अनुभव होगा कि आदमी जरा ठोक-पीट कर सोचता है कि अगर चल जाए तो बचें घड़ीसाज के पास जाने से। और कभी-कभी चलती भी है। मगर कभी-कभी चलना अनायास है। सौ में निन्यानबे मौकों पर नहीं चलेगी। और खतरा भी है, कि जैसे कभी-कभी चल जाती है, कभी-कभी झटका देने से और भी बिगड़ जाएगी। जितनी बिगड़ी थी, उससे ज्यादा बिगड़ जाएगी। क्या करेगा चिकित्सक? कोई इलाज नहीं है। भक्ति का कोई इलाज नहीं है। नानक बीमार पड़े थे भक्ति में, वैद्य ने आकर नाड़ी पकड़ी तो नानक हंसने लगे और कहा कि नाहक मेहनत न करो, यह मरीज तुम्हारी दवा से ठीक न होगा। यह बीमारी इलाज हो सके, ऐसी नहीं है। यह तो परम चिकित्सक जब आएगा, तभी ठीक हो सकेगी। यह तो औषधि जब समाधि की उतरेगी, तभी यह व्याधि जाएगी, उसके बिना नहीं। समाधि ही इस व्याधि के लिए औषधि है--और कुछ नहीं। किससे कहो, कोई समझेगा नहीं। रोओ भी तो भी अकेले में रोना पड़ेगा। सम्हाल-सम्हाल कर भक्त को चलना पड़ता है। क्योंकि संसार भक्त के बिलकुल ही प्रतिकूल है। यहां तुम यह बात खयाल रखना कि यहां संसार ज्ञानी के इतने प्रतिकूल नहीं है; क्योंकि ज्ञानी की भाषा और संसार की भाषा में एक तारतम्य है। ज्ञानी गणित और तर्क की भाषा बोलता है। वही भाषा बाजार की है। ज्ञानी बाजार की भाषा से भिन्न भाषा नहीं बोलता। उसकी तर्कसरणी वही है। दो और दो चार जैसे बाजार में होते हैं, वैसे ही ज्ञानी की भाषा में दो और दो चार होते हैं। अड़चन तो भक्त की है। वहां पुराना कोई गणित काम नहीं करता। वहां एक और एक मिल कर दो नहीं होते, एक और एक मिल कर एक ही होता है। प्रेम में एक और एक मिल कर एक ही होता है, दो नहीं होते। गणित में एक और एक मिल कर दो होते हैं। तो ज्ञानी को इतनी अड़चन नहीं है। और त्यागी को भी अड़चन नहीं है; क्योंकि उसकी भी भाषा संसार की भाषा है। तुम भलीभांति जानते हो कि अगर धन कमाना है तो बहुत से त्याग करने पड़ते हैं। धन कमाने वाला कम त्यागी नहीं होता। अगर दुकान पर ग्राहक हैं, छोड़ देता है उस दिन भोजन, उपवास कर जाता है। अगर धंधा जोर से चल रहा है तो रात देर तक जागा रहता है। अगर रात भर भी जाग कर हिसाब-किताब करना पड़े तो वह भी कर लेता है। तुम जानते हो कि दुकानदार भी एक तरह की तपश्चर्या करता है। तुम जानते हो, पद का खोजी भी बड़ी चेष्टाएं करता है, बड़े उपक्रम करता है। सब तरह के त्याग करता है, जेल इत्यादि भी जाना पड़ता है--कि जेल वगैरह नहीं गए तो सर्टिफिकेट नहीं है। किसी से कहो कि भई, वोट दो, वह पूछता है: कितनी दफे जेल गए? तो सर्टिफिकेट चाहिए कि इतनी दफे जेल गए। कोई भी बहाने से सही, मगर दो-चार दफा जेल जाना ही चाहिए, नहीं तो नेता कैसे? त्यागी की भाषा भी संसार की भाषा से भिन्न नहीं है। सबसे ज्यादा कठिनाई है भक्त की। क्योंकि उसकी भाषा में और संसार की भाषा में कोई तालमेल नहीं है। वे अलग ही भाषाएं हैं। उनका एक-दूसरे में अनुवाद भी नहीं हो सकता। संसार की भाषा है गणित की और तर्क की, भक्त की भाषा है भाव की और प्रेम की। संभरि-संभरि दुख आवै रोय। कस पापी कहं दरसन होय।। और मैं जानता हूं कि तेरा क्या कसूर, मैं पापी ऐसा हूं कि तेरा दर्शन भी हो तो कैसे हो? यह भक्त की भाव-दशा समझना। भक्त दोष नहीं देता भगवान को। यह नहीं कहता कि तू नाराज है, कि तेरी कृपा की कमी है, कि तू रहीम नहीं, रहमान नहीं, कि तू करुणावान नहीं, इतना ही कहता है: कस पापी कहं दरसन होय! मैं पापी हूं, अज्ञानी हूं, मूढ़ हूं, दर्शन हो भी तो कैसे हो? और यह भी भलीभांति जानता हूं कि मेरे रोने से कोई मेरी पात्रता थोड़े ही हो गई कि दर्शन होना चाहिए। मैंने तुझे प्रेम किया, इतना ही तो काफी नहीं है। मुझमें अभी हजार-हजार रोग हैं और हजार-हजार विशुद्धियां आने की अभी संभावनाएं हैं, हजार-हजार अशुद्धियां अभी मुझ में हैं, अभी मैं पवित्र कहां, अभी तू आए इस योग्य मेरा घर कहां? तन मन सुखित भयो मोर आय। लेकिन इतनी जैसे ही तैयारी कोई कर लेता है--यही तैयारी है--सम्हल-सम्हल कर रोना, संसार से छिपा-छिपा कर प्रार्थना करना, अपने मन के भाव को अपने मन के भाव के जैसा ही रखना, उसकी अभिव्यक्ति भी न करना, एकांत में बहा लेना आंसू और जानते रहना कि परमात्मा की अनुकंपा तो अपार है, मेरे ही पापों के कारण बाधा पड़ती होगी, वह तो सामने है, मेरी आंखों पर ही पर्दा होगा; वह तो आया ही हुआ है, मैं ही नहीं देख पा रहा हूं, कहीं मेरी ही भूल-चूक है, ऐसी ही भाव-दशा तो तैयार करती भक्त को, यही तो उसकी पात्रता का निर्माण है। और तब घटना घटती है। तन मन सुखित भयो मोर आय। तुम आ गए! ऐसे ही अचानक आना होता है। मेरा तन-मन दोनों आनंद से भर गए हैं। तिरे जल्वों में गुम होकर औ’ खुद से बेखबर होकर तमन्ना है कि रह जाऊं जसरतापा नजर होकर हिजाब अंदर हिजाबो-जल्वा अंदर जल्वा क्या कहिए बला में फंस गए उश्शाक पाबंदे-नजर होकर कहां जाती है मिल कर ओ निगाहे-नाज बेपर्दा मिरे पहलू में रह जा लज्जते-दर्दे-जिगर होकर लताफत मानए-नज्जारा-ए-सूरत सही लेकिन धड़कना दिल का कहता है वो गुजरे हैं इधर होकर पहले साफ-साफ समझ में आता भी नहीं। मगर गंध तो आ जाती है। स्पष्ट दिखाई भी नहीं पड़ता, पर धुंधली छाया तो अनुभव में आ जाती है। पैर दिखाई न भी पड़ें, पगध्वनि तो सुनाई पड़ जाती है। लताफत मानए-नज्जारा-ए-सूरत सही लेकिन धड़कना दिल का कहता है वो गुजरे हैं इधर होकर और दिल एक नई गति से, एक नई लय से, एक नये छंद से धड़कने लगता है। वही पहचान है। और भक्त और चाहता क्या है! तिरे जल्वों में गुम होकर औ’ खुद से बेखबर होकर तमन्ना है कि रह जाऊं जसरतापा नजर होकर बस तुझमें खो जाऊं, मिट जाऊं। तन-मन सुखित भयो मोर आय। जब इन नैनन दरसन पाय।। आ गए तुम! भरोसा नहीं आता। अनंत-अनंत प्रतीक्षा के बाद अचानक। ज्ञानी को तो भरोसा आ जाता है। निश्चित ही। क्योंकि उसने सारे उपाय किए हैं। उसे तो कठिनाई अगर कोई थी तो एक थी कि परमात्मा अभी तक आया क्यों नहीं? क्योंकि मैंने सब तो किया जो करना चाहिए। उसको शिकायत थी। ज्ञानी के सामने जब परमात्मा आए तो उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह तो मानता है कि मैं दावेदार हूं। होना ही चाहिए था। भक्त आश्चर्यचकित होता है। अवाक होता है। क्योंकि भक्त जानता है, मैं तो पापी था। मेरी सामर्थ्य क्या? मेरा बल क्या? और तुम आए। तुम मेरी नजर में आए! हजारों कुर्बंतों पर यूं मिरा महजूर हो जाना जहां से चाहना उनका वहीं से दूर हो जाना निकाबे-रूए-नादीदा का अजखुद दूर हो जाना मुबारक अपने हाथों हुस्न का मजबूर हो जाना सरापा दीद होकर गर्क मौजे-नूर हो जाना तिरा मिलना है खुद हस्ती से अपनी दूर हो जाना मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना यकायक दिल की हालत देख कर मेरा तड़प उठना उसी आलम में फिर कुछ सोच कर मसरूर हो जाना ‘जिगर’ वो हुस्ने-यकसूई का मंजर याद है अब तक निगाहों का सिमटना और हुजूने-नूर हो जाना क्या है भक्त की यह अनुभूति? मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना भक्त दावेदार नहीं है। भक्त तो सदा जानता है कि जब भी तुम मिलोगे, मैं अपात्र ही था। मिले तो तुम अपने प्रसाद से मिले, अपनी अनुकंपा से मिले, मेरी पात्रता से नहीं। तुमने मुझे मजबूर कर दिया। तुमने मुझे झुका ही दिया। मुझे तो अपनी तरफ से झुकना होता तो शायद मैं झुकता भी नहीं। मेरी अकड़ ऐसी! मेरा अहंकार ऐसा! मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना यह मेरे बस की बात नहीं थी कि मैं झुक जाता। तूने मजबूर कर दिया। तू आया और तूने मुझे अपने में डुबा लिया। तन-मन सुखित भयो मोर आय। और खयाल रखना, जगजीवन कह रहे हैं: मन तो आनंदित हुआ ही है, तन भी आनंदित हुआ है। भक्त के मन में तन और मन में भेद नहीं है। भीतर तो आनंद उमगा ही है, बाहर भी आनंद बरसा है। बाहर और भीतर में भेद नहीं है। चैतन्य तो नाच ही उठा है, लेकिन पदार्थ भी आंदोलित हुआ है। भक्त के मन में चेतना और पदार्थ में भेद नहीं है। जगजीवन चरनन लपटाय। रहै संग अब छूटि न जाय।। बस अब इतनी कृपा और करो; मैं तो तुम्हारे चरणों में लिपट जाऊंगा, मगर मुझ पर मुझे भरोसा नहीं है, यह भी तुम्हारी ही कृपा हो तो ही बात बने, नहीं तो संग फिर छूट सकता है। मुझे अपनी भूल-चूकों का भलीभांति पता है। मुझे अपनी नासमझियों का भलीभांति बोध है। ज्ञानी को अपनी पात्रता का अहंकार होता है, भक्त को अपनी अपात्रता का बोध होता है। इसलिए भक्त की विनम्रता असीम है। जगजीवन चरनन लपटाय। मैं तो चाहता हूं कि तुम्हारे चरणों में लिपटूं तो फिर कभी छूटूं नहीं। अब तुम्हारे चरण मिल गए, लिपट जाऊं? सदा लिपटा रहूं। लेकिन खयाल रखना, रहै संग अब छूटि न जाय! यह मेरे बस के बाहर है। तुम्हीं ध्यान रखना कि कहीं यह संग जो बना है, छूट न जाए। तुम्हारी कृपा से बना, तुम्हारी कृपा से बना रहे। कहां-कहां उड़के शो’ले पहुंचे ये होश किसको ये कौन जाने हमें बस इतना है याद अब तक लगी थी आग अपने घर से पहले कहां ये शोरिश कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम जमाना ख्वाबो-खयाल-सा था, तिरे फुसूने-नजर से पहले उठा जो चेहरे से पर्दा-ए शब, सिमट के मर्कज पे आ गए सब तमाम जल्वे जो मुन्तशिर थे, तुलूए-हुस्ने-बशर से पहले वो यादे-आगाजे-इश्क अब तक अनीसे-जानो-दिले-हजी है वो इक झिझक-सी वो इक झपक-सी हर इल्तिफाते-नजर से पहले हमीं थे क्या जुस्तजू का हासिल, हमीं थे क्या आप अपनी मंजिल वहीं पे आकर ठहर गया दिल, चले थे जिस रहगुजर से पहले कहां थी ये रूह में लताफत, कहां थी कौनेन में ये वुसअत हयात ही सो रही थी जैसे किसी की पहली नजर से पहले उसकी एक नजर और जो छिपा था, प्रकट हो जाता है। और जो फूल दबे पड़े थे, खिल जाते हैं। और जो चांद-तारे दिखाई न पड़ते थे, दिखाई पड़ने लगते हैं। कहां थी ये रूह में लताफत,... यह हमारे प्राणों में प्रसाद कहां था? यह आनंद कहां था? यह उत्सव कहां था? कहां थी ये रूह में लताफत, कहां थी कौनेन में ये वुसअत यह दुनिया का विस्तार इसके पहले कभी दिखा नहीं था। यह विराटता कहां छिपी थी? यह रहस्य-पर-रहस्य, हम कैसे अंधे थे! हयात ही सो रही थी जैसे किसी की पहली नजर से पहले तेरी आंख जब तक हमारी आंख में न पड़ी, तब तक सारा अस्तित्व जैसे सोया हुआ था। जैसे हम बेहोश थे। कहां ये शोरिश, कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम कहां था यह सब रहस्य?--यह सतरंगी अस्तित्व, यह आनंद-उत्सव, यह प्रतिपल बरसता हुआ अमृत? कहां ये शोरिश, कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम जमाना ख्वाबो-खयाल-सा था,... हम तो जैसे सपने ही देख रहे थे नींद में। ...तिरे फुसूने नजर से पहले वह तेरी आंख जब आंख में पड़ी तो सपने गए, सत्य प्रकट हुआ। उठा जो चेहरे से पर्दा-ए-शब, सिमट के मर्कज पे आ गए सब तमाम जल्वे जो मुन्तशिर थे, तुलूए-हुस्ने-बशर से पहले जो-जो छिपा था, प्रकट हो गया। जो अदृश्य था, दृश्य हो गया। नहीं जो कभी सुने थे स्वर, वे सुनाई पड़ने लगे। सारे गीत बज उठे। सारे नृत्य सजग हो गए। आज तेरी नजर की रोशनी में, आज तेरी मौजूदगी के अमृत में अब यह बात समझ में आती है, भरोसा आज भी नहीं आता। हमीं थे क्या जुस्तजू का हासिल,... क्या हमीं थे लक्ष्य जीवन का? हमीं थे क्या आप अपनी मंजिल,... वहीं पे आकर ठहर गया दिल, चले थे जिस रहगुजर से पहले और यह क्या चमत्कार है कि हम तो समझ रहे थे कि गंतव्य की तलाश कर रहे हैं और आज जब पहुंचे हैं तेरी नजर में और आज जब तुझसे मिलना हुआ है, तो पता चलता है कि स्रोत और गंतव्य दो नहीं, एक ही हैं। पहली जो हमारी यात्रा की शुरुआत थी, वहीं हम वापस लौट आए। वर्तुल पूरा हो गया है। जहां से चले थे, वहीं वापस आ गए हैं। इस अवस्था का नाम मोक्ष है, या निर्वाण, या जो भी नाम तुम देना चाहो। अब की बार तारु मोरे प्यारे, विनती करिकै कहौं पुकारे। जगजीवन कहते हैं कि बस, अब बहुत हो चुका, अब और नहीं। अब तेरे चरण मिल गए, अब छूटें न। अब प्रार्थना है कि अब मुझे तार लो। अब फिर मत फेंक देना इस विराट जंजाल में। अब फिर मत चले जाने देना भटकन की राहों पर। अब की बार तारु मोरे प्यारे, विनती करिकै कहौं पुकारे। और तो मैं क्या कर सकता हूं; दावा तो नहीं कर सकता, अधिकार मेरा कोई भी नहीं, विनती कर सकता हूं। पुकार कर सकता हूं। पुकारूंगा, विनती करूंगा। नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे,... मैं तो बहुत करके हार चुका था, और बहुत हैं जो कर-कर के हार चुके हैं, और कुछ भी न हुआ। नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे, तुम्हारे अब सब बनहि संवारे। लेकिन तुमने संवार दिया, बिगड़ी को बना दिया। मुझसे तो बिगड़ती ही चली जाती थी बात। जितना खोजता था, उतना दूर निकल जाता था। जितना करता था, उतना अनकिया हो जाता था। दान भी करता था तो भीतर लोभ संगृहीत होता था। विनम्र बनता था तो अहंकार पीछे के द्वार से आता था। त्याग करता था तो वह भी भोग की आकांक्षा में करता था कि बैकुंठ का भोग मिलेगा। मेरे किए तो कुछ होता ही नहीं था--उल्टा ही होता था। नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे,... मैं तो हार ही चुका था। खयाल रखना, जब खोज-खोज कर कोई हार जाता है, तभी उससे मिलन है। हारे को हरिनाम! जीतने वालों को नहीं मिलता। हारों को मिलता है। जब तक तुम्हें जरा सी भी आशा लगी है कि जीत लेंगे, तब तक अहंकार जारी है। जब तक तुम्हें थोड़ा सा भी भरोसा है कि कुछ और कर लेंगे--ऐसा नहीं तो वैसा, वैसा नहीं तो वैसा; नई विधि, नया विधान, नया मार्ग खोजेंगे मगर पहुंच कर रहेंगे--जब तक तुम्हें थोड़ी सी भी संभावना है अपने पहुंच जाने की, तब तक तुम चूकते रहोगे। तब तक भक्ति का उदय न होगा। जिस दिन तुम समग्ररूपेण जानोगे हार गए, पूरे हार गए, सौ प्रतिशत हार गए, गिर पड़ोगे हार में--हारे को हरिनाम--उसी क्षण अहंकार गया। अहंकार जीता है आशा में। आशा अहंकार का भोजन है। इसलिए बुद्ध ने कहा है: धन्यभागी हैं वे जो परिपूर्ण रूप से निराश हो गए, हताश हो गए। बड़ा उलटा वचन है। क्योंकि आमतौर से तो हम कहते हैं: निराश आदमी, बेचारा। हताश आदमी, बेचारा। बुद्ध कहते हैं: धन्यभागी है वह जो परिपूर्ण रूप से हताश हो गया, निराश हो गया। जिसकी आशा जड़-मूल से मर गई, कुम्हला गई। क्योंकि जैसे ही आशा जड़-मूल से कुम्हला जाती है, अहंकार मर जाता है। अहंकार आशा का ही फूल है। और जहां अहंकार नहीं, वहीं परमात्मा का आविर्भाव है। नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे, तुम्हरे अब सब बनहि संवारे। लेकिन अब देख लिया राज हमने। जगजीवन कहते हैं: अब, अब हम पहचान गए, तुम संवारते हो तो संवरता है। अब संवार लिया, अब छोड़ मत देना हाथ। अब गह लिया हाथ, अब छोड़ मत देना हाथ। तुम्हरे हाथ अहै अब सोई,... अब सब तुम्हारे हाथ में है। सब बेशर्त तुम्हारे हाथ में है। ...और दूसरो नाहीं कोई। अब कोई आशा नहीं किसी और की; न अपना भरोसा है, न किसी और का भरोसा है, अब सारा भरोसा तुम पर है। इस भाव-दशा का नाम श्रद्धा है। श्रद्धा सुवास है भक्त के हृदय की। जो तुम चहत करत सो होई,... तुम जो चाहो, हो जाता है। हमारे चाहने से तो सब बिगड़ जाता है। जो तुम चहत करत सो होई, जल थल महं रहि जोति समोई। अब मैं देख रहा हूं कि जल में, थल में, सब तरफ तुम्हारी ही ज्योति समाई हुई है। कैसा अंधा था, अब तक यह क्यों मुझे नहीं दिखाई पड़ा? और ऐसा भी नहीं है कि ये वचन मैंने सुने नहीं थे। शास्त्र यही तो कहते हैं; सबमें वही समाया है। कंठस्थ थे ये वचन मुझे। लेकिन बस दोहराता था तोते की भांति। तुमने दिखाया तो दिखा। तुमने नहीं दिखाया तो शब्द तो मुझे याद रहे, शब्द तो मैं दोहराता रहा, लेकिन दिखा मुझे कुछ भी नहीं। जैसे अंधा रोशनी की बातें करता रहा और बहरा संगीत की चर्चाएं छेड़ता रहा। जो तुम चहत करत सो होई, जल थल महं रहि जोति समोई। अब मैं देखता हूं कि सब तरफ तुम्हीं हो, सारी ज्योतियां तुम्हारी ज्योतियां हैं, कण-कण में तुम्हीं व्याप्त हो, मगर यह तुमने दिखाया तो मुझे दिखा। इश्क की हद से निकलते, फिर ये मंजर देखते काश हुस्ने-यार को, हम हुस्न बन कर देखते गुंचा-ओ-गुल देखते या माहो-अख्तर देखते तुम नजर आते हमें, हम कोई मंजर देखते फितरते-मजबूरी पे काबू ही कुछ चलता नहीं वर्ना हम तो तुझसे भी तुझको छुपा कर देखते फिर वही हसरत है साकी फिर उसी अंदाज से फिर सिवा सागर के सब-कुछ गर्के-सागर देखते तिश्नगाने-दीदे-जल्वा, हमें समझा है क्या तुम अगर सूरत दिखाते जान देकर देखते मर मिटा इक बात पर किस आन से किस शान से आप अगर ऐसे में होते दिल के तेवर देखते मिट कर ही जाना जाता है। हार कर ही पाया जाता है। खोकर ही मिलन है। मर मिटा इक बात पर किस आन से किस शान से आप अगर ऐसे में होते दिल के तेवर देखते तिश्नागाने-दीदे-जल्वा, हमें समझा है क्या तुम अगर सूरत दिखाते जान देकर देखते हम तैयार थे, जान भी देने को तैयार थे--तुम अगर सूरत दिखाते। मगर वह हमारी शर्तबंदी थी। वह हमारा सौदा था। लेकिन जिस क्षण हमने अपने को गंवाया, तुमने सूरत दिखाई। हम तो तैयार थे सब-कुछ गंवाने को भी। लेकिन जब कोई गंवाने को तैयार होता है, तो भी अहंकार शेष रहता है। कहता है: मैं सब गंवाने को तैयार हूं, दिखाओ, दर्शन दो! प्रत्यक्ष हो जाओ! मगर, पहले प्रत्यक्ष हो जाओ, तो मैं सब देने को तैयार हूं। हालत उलटी है। तुम सब दे दो, प्रत्यक्ष हो जाता है। इसलिए भक्त बड़े से बड़ा जुआरी है। दांव पर लगा देता है, भरोसा कुछ भी नहीं कि कुछ मिलेगा कि नहीं मिलेगा। भक्त बड़ी से बड़ी जोखम उठाता है। तुमसे साधारणतः लोग कहते हैं--तुम्हारे पंडित-पुरोहित, साधु-महात्मा--कि भक्ति सरल है। उनकी बातों में मत आ जाना। भक्ति बड़ी जोखम है। ज्ञान सरल है, त्याग भी सरल है, प्रेम सबसे बड़ी जोखम है। क्योंकि ज्ञान में और त्याग में अहंकार मालिक रहता है, प्रेम में अहंकार को विदा देनी होती है। इश्क की हद से निकलते, फिर ये मंजर देखते काश हुस्ने-यार को, हम हुस्न बन कर देखते तुम उसे तभी देख पाओगे जब तुम उसमें परिपूर्ण लीन हो जाओगे, वही हो जाओगे, तभी देख पाओगे। सागर को जानने का एक ही उपाय है, सागर हो जाना। मगर सागर होने के पहले बूंद को मिटना पड़ेगा। बूंद यह नहीं कह सकती कि पहले मैं सागर हो जाऊं, फिर मैं मिटने को तैयार हूं। बूंद को तो मिटना पहले होगा। और मिटने के पहले कोई गारंटी कहां? कौन गारंटी देगा कि मिटने से सागर हो ही जाओगे। जब बीज टूटता है और मिटता है तो गारंटी क्या है कि वृक्ष बनेगा ही? हिम्मत चाहिए। बड़ी हिम्मत चाहिए। दुस्साहस चाहिए। मगर बीज दुस्साहस करता है और वृक्ष हो जाता है। बूंद दुस्साहस करती है और सागर हो जाती है। भक्त दुस्साहस करता है और भगवान हो जाता है। काहुक देत हौ मंत्र सिखाई, सो भजि अंतर भक्ति दृढ़ाई।। सब तुम्हारे हाथ में है। चाहो तो किसी को राजों का राज दे देते हो--मंत्र दे देते हो। चाहो, तुम्हारी अनुकंपा हो, तो वर्षा हो जाती है, सब कल्मष धुल जाता है। काहुक देत हौ मंत्र सिखाई, सो भजि अंतर भक्ति दृढ़ाई।। और किसी के भीतर तुम्हारी अनुकंपा से मंत्र का जन्म होता है और अंतर-भजन शुरू हो जाता है। अंतर-भजन, बाहर से सीखा हुआ नहीं। जैसे परमात्मा किसी के हृदय को छेड़ देता है, तारों को छेड़ देता है, उसके हाथ तुम्हारे हृदय को गुदगुदा जाते हैं। कहौं तो कछु कहा नहिं जाई,... जगजीवन कहते: ऐसा तुमने मेरे साथ किया, अब मैं यह लोगों से कहना भी चाहता हूं तो कह नहीं पाता। मैं कहता हूं: उसी ने मंत्र दिया। कोई मेरी मानता नहीं। मैं कहता हूं: वही आया, उसी ने मेरे हृदय को गुदगुदाया। कोई मेरी मानता नहीं। मैं कहता हूं: वही आया, उसने मेरी हृदय-तंत्री के तार छेड़ दिए; यह वही गा रहा है। कोई मेरी मानता नहीं। कहौं तो कछु कहा नहिं जाई, तुम जानत, तुम देत जनाई।। तुम्हीं जानते हो और तुम्हीं जब जना देते हो, तब कोई जानता है। शेष सब व्यर्थ ही भटकते हैं। बड़े से बड़े पंडित भी अज्ञानी ही हैं। जब तक तुम नहीं जना देते तब तक कोई भी कुछ नहीं जानता। जो अपने से ही जानने की चेष्टा में लगे हैं, वे अंबार लगा लेंगे सूचनाओं के, शास्त्रों के पहाड़ों के नीचे दब जाएंगे, मगर पहाड़ खोद कर उनको चूहा भी मिल जाए, इसकी संभावना नहीं। उनके हाथ कुछ भी न लगेगा--राख ही राख। तुम जानत, तुम देत जनाई! इस प्यारे वचन को हृदय में सम्हाल कर रख लेना। यह मंत्र है। ...तुम जानत, तुम देत जनाई। मेरे जानने से नहीं। तुम जनाओ। तुम जगाओ। तुम चेताओ। तुम चैतन्य हो, तुम चेता सकते हो। तुम जानते हो, तुम जना सकते हो। तुम पूर्ण हो, तुम मेरे भीतर पूर्ण को भर सकते हो। मैं शून्य हूं, मैं शून्य की भांति कितना ही दौड़ता रहूं, कुछ भी न होगा। आदमी अकेला रहे, रिक्त है; परमात्मा साथ हो, भरा है। यक मय-ए-बेनाम जो इस दिल के पैमाने में है वो किसी शीशे में है साकी न मयखाने में है यूं तो साकी हर तरह की तेरे मयखाने में है वो भी थोड़ी सी जो इन आंखों के पैमाने में है एक ऐसा राज भी दिल के निहांखाने में है लुत्फ जिसका कुछ समझने में न समझाने में है एक कैफे-नातमामे दर्द की लज्जत ही क्या दर्द की लज्जत सरापा दर्द बन जाने में है फिर निकाब उसने उलट कर रूह ताजा फूंक दी अब न काबे में है सन्नाटा, न बुतखाने में है एक बार वह अपना पर्दा खुद उघाड़ दे--‘घूंघट के पट खोल’--एक बार वह खुद ही अपना घूंघट खोल दे... फिर निकाब उसने उलट कर रूह ताजा फूंक दी अब न काबे में है सन्नाटा, न बुतखाने में है फिर सब तरफ गीतों की झनकार पैदा हो जाती है। काबा भी गा उठता है, मस्जिद भी गुनगुना उठती है, मंदिर भी पुनरुज्जीवित हो जाते हैं; मिट्टी में अमृत की धुन आने लगती है। यक मय-ए-बेनाम जो इस दिल के पैमाने में है वो किसी शीशे में है साकी न मयखाने में है और एक मदिरा तुम्हारे दिल के भीतर है। वह किसी भी मधुशाला में नहीं मिलेगी। मगर उस मदिरा तक तुम्हारे हाथ पहुंच नहीं सकते, तुम्हारे हाथ तो बाहर ही बाहर पहुंचते हैं। उस मदिरा तक तो परमात्मा के हाथ ही पहुंच सकते हैं। उसने ही रखी है तुम्हारे हृदय में, वही तुम्हें पिलाए तो पीना हो! एक ऐसा राज भी दिल के निहांखाने में है लुत्फ जिसका कुछ समझने में न समझाने में है न तो समझा जा सकता, न समझाया जा सकता। लेकिन जाना जा सकता है, वही जना दे, तो जाना जा सकता है। भक्ति का सार-सूत्र है कि परमात्मा के किए ही कुछ होता है, मनुष्य के किए कुछ भी नहीं होता है। जगत भगत केते तुम तारा,... और कितने लोगों को तुमने तार दिया। ...मैं अजान केतान बिचारा। मैं भी एक छोटा-मोटा...मैं कुछ बहुत बड़ा भगत भी नहीं हूं। मेरी भक्ति भी कोई ऐसी नहीं कि तुम मुझे तारो ही। मुझे मेरी भक्ति पर भी कोई ऐसा भरोसा नहीं है, क्योंकि जगत में बड़े-बड़े भक्त हुए हैं, जगत में बड़े-बड़े भक्त हैं। जगत भगत केते तुम तारा, मैं अजान केतान बिचारा लेकिन मैं, मेरी कौन गिनती? फिर भी तुम आए। फिर भी तुमने दर्शन दिए? फिर भी तुमने मेरे तन-मन को आनंद से सरोबोर किया। फिर भी तुमने मेरे हृदय में मदिरा उंडेली। फिर भी तुमने अपनी नकाब पलटी। इससे भरोसा आता है कि अगर मुझे हो सकता है, तो सबको हो सकता है। मैं तो ना-कुछ, मेरी कोई बिसात नहीं। हुआ होगा बड़े भक्तों को, वे बड़े थे, मेरी तो कोई बिसात नहीं, मैं अजान केतान बिचारा, लेकिन जब तुम मेरे सामने प्रकट हो गए तो एक बात पक्की हो गई, एक बात निश्चित हो गई कि अब तुम किसी के भी सामने प्रकट हो सकते हो। मैं तो अंतिम से अंतिम हूं, अगर मैं तुम्हारी अनुकंपा का अधिकारी हूं, तो प्रत्येक व्यक्ति तुम्हारी अनुकंपा का अधिकारी है। चरन सीस मैं नाहीं टारौं,... अब मैं तुम्हारे चरणों से अपने सीस को नहीं हटाऊंगा। ...निर्मल मूरत निरत निहारौं। अब तो देखता रहूंगा यह तुम्हारा प्यारा रूप, यह तुम्हारे सौंदर्य में नहाता रहूंगा। जगजीवन का अब विस्वास, राखहु सतगुरु अपने पास। अब मुझे भरोसा हो गया है, अब मुझे श्रद्धा उमगी है--जगजीवन को अब विस्वास--अब तक मुझे विश्वास नहीं था कि मैं भी पार हो सकूंगा। अब तक मुझे विश्वास नहीं था कि कभी मैं भी इस योग्य हो सकूंगा कि तुम्हारे दर्शन होंगे। जब यह अपूर्व घटना घट गई--अनायास, अनपेक्षित--तो अब एक घटना और भी घटेगी इसका भी भरोसा बैठता है: राखहु सतगुरु अपने पास! अब तुम मुझे अपने पास रखो। अब यह भी श्रद्धा बनती है कि जब इतना हुआ, तो इतना भी होगा। एक श्रद्धा दूसरी श्रद्धा में ले जाती है। एक श्रद्धा दूसरी श्रद्धा के लिए द्वार बन जाती है। निगाहों का मर्कज बना जा रहा हूं मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूं मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं वही हुस्न जिसके हैं ये सब मजाहिर उसी हुस्न में हल हुआ जा रहा हूं न जाने कहां से न जाने किधर को बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूं न इद्राके-हस्ती न एहसासे-मस्ती जिधर चल पड़ा हूं चला जा रहा हूं न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं उसके चरणों पर हाथ पड़ते ही--न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां--फिर कुछ सूझ-बूझ नहीं रह जाती। होश-हवाश नहीं रह जाता। न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां न कोई अर्थ, न कोई अभिप्राय, न कोई हेतु। ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं और यह किस सौंदर्य में डूबता जा रहा हूं? निगाहों का मर्कज बना जा रहा हूं मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूं धन्यभागी हैं वे जो प्रेम के हाथ लुट जाएं! मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया हूं तो एक छोटी सी बूंद, एक कतरा, लेकिन सागर ने मुझे अपनी गोद में ले लिया है। मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं अब तो शाश्वतता मेरी है। प्रारंभ से अंत तक सब मेरा है। अनंतता मेरी है। मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया हूं तो बूंद, लेकिन यह सागर की गोद में जो पड़ गया हूं तो अब सीमा नहीं है मेरी, अब असीम हूं। मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं वही हुस्न जिसके हैं ये सब मजाहिर उसी हुस्न में हल हुआ जा रहा हूं और जिस सौंदर्य से यह सारा अस्तित्व परिव्याप्त है, उसी में डूबता जा रहा हूं, उसी में पिघलता जा रहा हू, उसी में लीन होता जा रहा हूं। न जाने कहां से न जाने किधर को बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूं न इद्राके-हस्ती न एहसासे-मस्ती जिधर चल पड़ा हूं चला जा रहा हूं न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं भक्त की पराकाष्ठा है: गुम हो जाना। भक्त की पराकाष्ठा है: लीन हो जाना, तल्लीन हो जाना। जैसे बूंद सागर में लीन हो जाती है। जरा भी भिन्न नहीं रह जाती। कोई सीमा का भेद नहीं रह जाता। उस अभेद में ही भक्त भगवान हो जाता है। अनलहक! अहं ब्रह्मास्मि! आज इतना ही।
Osho's Commentary
जिंदगी तुझको कहां फैंक आएं, आखिर क्या करें
जख्मे-दिल मुमकिन नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें
वो हमें देखें न देखें हम उन्हें देखा करें
ऐ मैं कुर्बां मिल गया अर्जे-मोहब्बत का सिला
हां उसी अंदाज से कह दो, तो फिर हम क्या करें
देखिए क्या शोर उठता है हरीमे-नाज से
सामने आईना रख कर खुद को इक सिज्दा करें
हाए ये मजबूरियां, महरूमियां, नाकामियां
इश्क आखिर इश्क है, तुम क्या करो, हम क्या करें
प्रेम का आनंद है, प्रेम की पीड़ा भी। प्रेम समाधि है, प्रेम संताप भी। संताप से सीढ़ियां बनती हैं समाधि के मंदिर की। प्रेम की पीड़ाओं पर ही पग धर-धर कर प्रेम के आनंद तक पहुंचना होता है। जो कीमत चुकाने को राजी नहीं है, वह मंदिर तक नहीं पहुंच पाएगा। और मंदिर की सीढ़ियां पत्थरों से नहीं बनी हैं, पीड़ाओं से बनी हैं। तुम्हारा धन, तुम्हारा पद, तुम्हारी प्रतिष्ठा, कोई भी तुम्हें उसके मंदिर तक न ले जाएगी, जब तक कि तुम हृदय को जला कर राख करने को राजी न हो जाओ।
लेकिन उसके मार्ग पर झेली गई पीड़ा भी अहोभाग्य है! उसके विपरीत सुख भी मिले तो दुर्भाग्य, उसकी खोज में दुख भी मिले तो सौभाग्य। उसे गंवा कर जिंदगी फूलों से भी भर जाए तो आज नहीं कल गंदगी और बदबू के सिवा कुछ भी न पाओगे। उसे खोजते हुए जिंदगी कांटों से भी भर जाए तो हर कांटा फूल हो जाएगा--अंततः फूल हो जाएगा। उसके मार्ग पर फूल ही हैं। कांटे जैसे जो मालूम होते हैं, वे भी अंततः फूल ही सिद्ध होते हैं। प्रेम की पीड़ा के लिए जो तत्पर है झेलने को, वही प्रेम के मंदिर में छिपे परमात्मा को खोज पाता है।
त्यागी, व्रती भी दुख झेलता है, मगर उसके दुख में गणित है। प्रेमी भी दुख झेलता है, पर उसके दुख में गणित नहीं, काव्य है। त्यागी दुख झेलता है, मगर उसका दुख रूखा-सूखा है। प्रेमी भी दुख झेलता है, मगर उसके दुख में हृदय की रसधार बहती है। प्रेमी का दुख हरा-भरा है। ज्ञानी का दुख आरोपित है। ऊपर से थोपा गया है। प्रेमी का दुख हृदय से उमगता है। और वही भेद है। और भेद बड़ा है। ऐसा भेद जिससे फिर सारे भेद पड़ जाते हैं।
त्यागी, ज्ञानी दुख झेलता है, वे दुख सतह पर होते हैं। कोई कांटों की सेज पर सोया है, तो देह पर कांटे चुभते हैं। और किसी ने उपवास किया है, तो पेट भूख की आग से झुलसता है। और कोई रात भर जागता रहा है, तो उसकी आंखें थकी हैं। लेकिन यह सब ऊपर-ऊपर है। प्रेमी का दुख हार्दिक है। कांटा हृदय में चुभता है, भूख हृदय में अनुभव होती है। उदासी, विषाद हृदय के केंद्र में उमगता है। प्रेमी का दुख आत्मिक है।
और निश्चित ही जो आत्मिक दुख उठाने को तैयार है, उसने कीमत चुकाई, उसने अपने जीवन को यज्ञ बनाया। जो जीवन को यज्ञ बना लेते हैं, वे ही पहुंचते हैं।
वो काफिर आशना, नाआशना यूं भी है और यूं भी
हमारी इब्तिदा-ता-इंतिहा यूं भी है और यूं भी
तअज्जुब क्या अगर रस्मे-वफा यूं भी है और यूं भी
कि हुस्नो-इश्क का हर एक मसलआ यूं भी है और यूं भी
कहीं जर्रा कहीं सहरा कहीं कतरा कहीं दरिया
मोहब्बत और उसका सिलसिला यूं भी है और यूं भी
वो मुझसे पूछते हैं, एक मकसद मेरी हस्ती का
बताऊं क्या कि मेरा मुद्दआ यूं भी है और यूं भी
हम उनसे क्या कहें? वो जानें उनकी मसलहत जाने
हमारा हाले-दिल तो बरमला यूं भी है और यूं भी
न पा लेना तिरा आसां न खो देना तिरा मुश्किल
मुसीबत में ये जाने-मुब्तला यूं भी है और यूं भी
उसे पाना बड़ा कठिन है। और उसे खो देना बड़ा आसान है। उसकी तरफ चलना बड़ा कठिन, उससे दूर जाना बड़ा आसान। उसके पास तक चलो, उसके करीब बढ़ो, तो भी दुख है और उससे दूर जाओ तो भी दुख है।
हमारी इब्तिदा-ता-इंतिहा यूं भी है और यूं भी
उससे दूर जाओ तो दुख है--मगर कोरा दुख, नपुंसक दुख, कांटे ही कांटे--जिनमें फूल कभी नहीं लगते--उसके पास चलो तो भी दुख है। लेकिन बड़ा विधायक दुख। उसी दुख की भूमि में आनंद के फूल खिलते हैं।
उसे चूको तो भी संताप है, तो भी अंधेरी रात है और उसे खोजने चलो तो भी अंधेरी रात है। पर एक भेद है। उसकी तरफ पीठ करो तो अंधेरी रात का फिर कोई अंत नहीं, उसकी तरफ मुंह करके चल पड़ो, अंधेरा कितना ही घना होता जाए--जितना अंधेरा घना होता है, उतनी ही सुबह करीब आती है।
कहीं जर्रा कहीं सहरा कहीं कतरा कहीं दरिया
मोहब्बत और उसका सिलसिला यूं भी है और यूं भी
न पा लेना तिरा आसां न खो देना तिरा मुश्किल
मुसीबत में ये जाने-मुब्तला यूं भी है और यूं भी
दुख तो ऐसे भी है, दुख वैसे भी है। लेकिन दुखों-दुखों में भेद है। व्यर्थ के लिए भी आदमी दुख झेलता है, सार्थक के लिए भी दुख झेलता है। इसलिए सभी दुखों को एक ही तराजू पर मत तौल लेना। कोई धन के लिए भी रोता है। और कोई ध्यान के लिए रोता है। दोनों के आंसुओं का एक ही मूल्य मत समझ लेना। यद्यपि विज्ञान के तराजू पर दोनों के आंसू एक जैसे ही हैं। और अगर रसायनविद से पूछोगे तो दोनों के आंसुओं का विश्लेषण भी एक जैसा है। दोनों का स्वाद भी एक जैसा है--खारा। कुछ भेद न बता पाएगा। अगर रसायनविद के पास ले गए किसी भक्त के आंसू, किसी प्रेमी के आंसू और जो धन के लिए रोया था और जो पद के लिए रोया था, उसके आंसू ले गए, तो भेद न बता पाएगा कि कौन से आंसू प्रेमी के हैं और कौन से पद के दीवाने के हैं।
लेकिन अंतर तो है। रसायनशास्त्र न पकड़ पाए तो रसायनशास्त्र की सीमा सिद्ध होती है, अंतर तो है। पद के रास्ते पर भी आदमी रोता है, लेकिन तब उसके आंसुओं की कोई गहराई नहीं है, कोई मूल्य नहीं। उसके आंसुओं में कोई सुगंध नहीं, सुवास नहीं। क्योंकि उसके आंसुओं में कोई प्रार्थना नहीं। उसके आंसू नीचे की तरफ जाने वाले आंसू हैं। उसके आंसू नरक की यात्रा पर चले हैं। और जब कोई उस प्यारे के प्रेम में रोता है, तो आंसू तो आंसू ही जैसे हैं लेकिन यात्रा का पूरा का पूरा रूप बदल गया, आयाम बदल गया। अब ये आंसू आकाश की तरफ उठ रहे हैं। अब इन आंसुओं को पंख लग गए हैं। अब ये आंसू स्वर्गीय हैं। अब ये आंसू ऊर्ध्वगामी हैं।
भक्त भी रोता है, आसक्त भी रोता है, मगर भेद खयाल रखना। वासनाग्रस्त भी नाचता है, प्रभु के प्रेम में डूबा हुआ भी नाचता है; वासना का भी नशा है, प्रार्थना का भी नशा है, पर भेद खयाल रखना। दुख और दुख एक जैसे ही नहीं होते। लेकिन एक बात तो है ही--परमात्मा के रास्ते पर भी बहुत पीड़ाएं हैं; यद्यपि वे सभी पीड़ाएं धन्यभागियों को उपलब्ध होती हैं।
जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय।
जगजीवन कहते हैं: जोगन हो गई हूं। रोती हूं, पुकारती हूं, कोई उत्तर भी आता मालूम पड़ता नहीं, पीड़ा सघन होती जाती है, देह पर भस्म चढ़ा ली है--यह प्रतीक है। भस्म है प्रतीक मृत्यु का। कोई मर जाता है तो राख पड़ी रह जाती है। ऐसे जीते जी मुर्दा हो गई हूं। देह को तो जान ही लिया कि आज नहीं कल राख हो जाएगी। हो ही जाना है राख तो हो ही गया।
जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय।
प्रतीक को शब्दशः मत पकड़ लेना। कुछ नासमझों ने यही किया है। वे भस्म चढ़ा कर बैठ गए हैं। वे सोचते हैं, भस्म चढ़ा ली, काम पूरा हो गया। भस्म चढ़ाना बड़ा गहरा प्रतीक है। उसका अर्थ है: इस देह को मुर्दा मान लिया। तेरे बिना यह देह मुर्दा है। तेरे बिना यह संसार मुर्दा है। तू आए तो रस आए, तू आए तो जीवन आए, तू आए तो हरियाली हो, तू आए तो फूल खिलें। तेरे बिना सब मौत है। तेरे बिना जीवन नहीं है, मरघट है।
और दूसरी बात खयाल रखना। जैसे ही परमात्मा की तरफ कोई प्रेम से भरता है, पुरुष मिट जाता है, स्त्री का आविर्भाव हो जाता है। जगजीवन पुरुष हैं, लेकिन भाषा स्त्री की बोलने लगे हैं--जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय--कि मैं जोगन हो गई हूं, अंग भस्म चढ़ा ली है। प्रेम की भाषा स्त्रैण है। पुरुष आक्रामक है। वह परमात्मा की खोज पर भी निकलता है तो ऐसे ही जैसे युद्ध के लिए निकला हो। बैंड-बाजा बजा कर, भाले इत्यादि उठा कर। परमात्मा की यात्रा पर भी योद्धा की तरह जाता है। जैसे परमात्मा से कोई जूझना है।
पुरुष की भाषा विजय की भाषा है, स्त्री की भाषा समर्पण की भाषा है। और मजा यह है कि जो समर्पण करना जानते हैं, जीत उनकी है। जो जीतने चले हैं, हार उनकी निश्चित है। सौ प्रतिशत निश्चित है। परमात्मा से लड़ोगे--हारोगे। परमात्मा से हारोगे--जीत जाओगे। प्रेम का सूत्र है: जीत, हार से उपलब्ध होती है।
और परमात्मा के साथ तो हमारा अगर कोई भी संबंध हो सकता है, तो प्रेम का ही हो सकता है। और प्रेम का गणित खयाल रखना, कभी भूल मत जाना। हारना है वहां; अगर जीतना हो, तो हारना होगा। जिस समग्रता से हार जाओगे, उसी परिपूर्णता से जीत का सेहरा तुम्हारे सिर बंधेगा।
जोगिन भइउं अंग भसम चढ़ाय।
कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय।।
खंड-खंड हो गया है मेरा हृदय। टुकड़े-टुकड़े हो गया है। जैसे दर्पण किसी ने पटक दिया हो पत्थर पर। कब आओगे? कब मेरे इस खंड-खंड हृदय को जोड़ दोगे पुनः, कब मुझे फिर एक कर दोगे।
मनुष्य अनेक हो गया है। अनेक उसकी वासनाएं हैं, इसलिए अनेक हो गया है। अनेक उसकी आकांक्षाएं हैं, हर आकांक्षा अलग दिशा में खींचती है। कोई पूरब, कोई पश्चिम, कोई दक्षिण, कोई उत्तर। मनुष्य एक ऐसी बैलगाड़ी है जिसमें सब तरफ बैल जुते हैं। इसीलिए तो जीवन में कोई यात्रा नहीं हो पाती। यात्रा हो तो कैसे हो? एक हिस्सा पश्चिम जा रहा, एक पूरब जा रहा, एक उत्तर, एक दक्षिण। सब एक-दूसरे के विपरीत संघर्ष में रत हैं। ऐसी बैलगाड़ी कहीं चलेगी जिसमें सब तरफ बैल जुते हों! घसिट जाएगी थोड़ी-बहुत, अस्थिपंजर टूट जाएंगे, मंजिल नहीं मिलेगी। मगर ऐसा ही आदमी है।
तुमने अपने मन को कभी जांचा, परखा; कभी जाग कर थोड़ा देखते हो? कैसी-कैसी इच्छाएं हैं! और एक-दूसरे के विपरीत! इच्छाओं में एक तारतम्य भी नहीं है। एक संगति भी नहीं है, बड़ी विपरीत इच्छाएं हैं।
जैसे एक आदमी चाहता है कि मुझे सम्मान मिले, मेरे अहंकार की प्रतिष्ठा हो, दुनिया कहे कि मैं कुछ विशिष्ट हूं। एक आकांक्षा। दूसरी तरफ आदमी यह भी चाहता है, लोग समझें कि मैं विनम्र हूं। लोग कहें कि यह है साधुपुरुष। ऐसा विनम्र कभी देखा नहीं गया। अहंकार का भाव ही नहीं छू गया है। अब ये दोनों इच्छाओं में कशमकश जारी रहेगी। ये एक-दूसरे के विपरीत चलती रहेंगी। एक इच्छा है कि दान दूं, बांटूं। लेकिन दूसरी इच्छा है: खूब इकट्ठा करूं, संपदा हो, सुरक्षा हो। अड़चन होगी। एक इच्छा है कि जीवन में नित-नूतन नये का आविर्भाव हो क्योंकि ऊब हो जाती है पुराने से, थक जाता है आदमी पुराने से, तो रोज कुछ नई घटना घटे, कुछ नई संवेदना जगे, कुछ नई प्रतीति हो--एक इच्छा, और दूसरी इच्छा है: सुरक्षा रहे, सुरक्षा न खो जाए।
सुरक्षा पुराने के साथ रहती है। नये के साथ असुरक्षा है। कौन जाने नया कैसा होगा, क्या होगा? नये का क्या भरोसा? पुराना जाना-माना है, परिचित है, बहुत दिन साथ रहना हुआ है। पुराने के साथ रहो तो सुरक्षा है, लेकिन ऊब पैदा होती है। नये के साथ रहो तो उत्तेजना होती है, लेकिन खतरा पैदा होता है। और ऐसी अनंत-अनंत इच्छाएं हैं जो एक-दूसरे के विपरीत खड़ी हैं।
तुम अपने मन को ठीक से देखोगे तो तुम ठीक वैसी ही दशा पाओगे जैसा महाभारत के युद्ध में कौरव और पांडव एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। तुम्हारे भीतर महाभारत का युद्ध चल रहा है। इस तरफ भी अपने हैं, उस तरफ भी अपने हैं। एक ही व्यक्ति अनेक-अनेक खंडों में बंट गया है। अखंड कैसे होओगे? वासनाओं में जीकर कोई अखंड नहीं होता। प्रार्थना अखंड करती है क्योंकि प्रार्थना एक है। परमात्मा अखंड करता है क्योंकि परमात्मा एक है। एक की आकांक्षा परमात्मा की आकांक्षा है। उस एक का पदार्पण हो जाए...जगजीवन ठीक कहते हैं:
कब मोरा जियरा जुड़इहौ आय।
मैं तो टूट गया, मैं तो पारे जैसा छितर-बितर हो गया हूं, तुम्हारा परस-स्पर्श न मिले तो मैं फिर इकट्ठा होऊं, इसकी आशा दुराशा मालूम होती है।
लागत आषाढ़ बाढ़ी विरहा की बाढ़
उए अंजनी पहाड़ बही नैनन सौं नदिया
ह्वै गई निपूती तै सपूती धरती की गोद
वारे वैस आंकुर पै रीझि गई बुंदिया
पिया परदेश लागै सूनो-सूनो वेष--
रोवै हीरामनि चूनरी पै धानी रंग अंगिया
हेरि हारो अंगना री टेरि हारो कंगना
निहारि हारो कजरा बुलाय हारी बिंदिया।
पुकारते-पुकारते बहुत देर हो गई है। जन्मों-जन्मों से खोज रहे हैं।
हेरि हारो अंगना री टेरि हारो कंगना
निहारि हारो कजरा बुलाय हारी बिंदिया
बुरी हार हो गई है। पराजय में खड़े हैं। टूटे-बिखरे, खंड-खंड, अस्त-व्यस्त, एक खंडहर हो गए हैं। आओ तुम, तो फिर मंदिर बने। उतरो तुम, तो तुम्हारी मौजूदगी फिर टूटे खंडों को निकट ले आए, संघटित कर दे।
अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय।
मन में ललक तो बहुत है कि मिल जाऊं तुमसे आकर, पर तुम्हारी कृपा न हो तो क्या हो? मैं तो बहुत चाहूं कि खोज लूं तुम्हें, लेकिन दूसरी तरफ से हाथ न फैलाया जाए तो मेरे हाथ बड़े छोटे हैं। ललक तो उठती है बहुत, पर मेरी सीमा है--मेरी ललक की भी सीमा है। छोटा सा दीया है, लपट उठती भी है तो कितनी बड़ी उठेगी? दीये का तेल भी थोड़ा है, बाती भी छोटी है।
अस मन ललकै, मिलौं मैं धाय।
होती तो बहुत ललक है, यह मेरा मन बार-बार प्रज्वलित हो उठता है, क्योंकि दिखाई पड़ रही है सारी व्यर्थता और दिखाई पड़ रहा है सारा अपना विक्षिप्त रूप--टूट गया, खंड-खंड, बिखर गया सब भांति--यह सब दिखाई पड़ रहा है; यह खंडहर हो गया हूं, यह मुझे मालूम पड़ रहा है, तुम आओ तो फिर घर बसे; ललक तो उठती है, पुकारता भी हूं, लेकिन मेरी सीमा है।
घर-आंगन मोहिं कछु न सुहाय।
अब कुछ भला भी नहीं लगता--न कोई घर है, न कोई आंगन बचा है--रहने वाला ही टूट गया, रहने वाला ही मुर्दा है, मरघट हो गया है सब। किसी तरह ढो रहे हैं। तुम जिंदगी को ढो रहे हो, जी नहीं रहे। जीने की ललक कहां? जीने की पुलक कहां? जीने का उत्साह कहां? जीने की उमंग कहां? तुम्हारे पैरों में नृत्य तो नहीं। और न तुम्हारे प्राणों में गीत है। बांसुरी कब की नहीं बजी! कब से स्वर खो गए हैं! कब से तुम्हारा अपने मूल रूप से मिलन नहीं हुआ! परदेश भटकते-भटकते, भीख मांगते-मांगते तुम भूल ही गए हो अपनी बादशाहत।
घर आंगन मोहिं कछु न सुहाय।।
अस मैं ब्याकुल भइउं अधिकाय।
जैसे नीर बिन मीन सुखाय।।
और अधिक से अधिक मेरी पीड़ा होती जाती है। पीड़ा का अंत तो दूर, पीड़ा बढ़ रही है। खंड संगठित हों, यह तो दूर, छोटे-छोटे खंड और छोटे-छोटे खंडों में टूटते जा रहे हैं। विमुक्ति आए, इसका तो सपना भी देखना मुश्किल है, विक्षिप्तता बढ़ती चली जाती है।
कभी बैठ कर घड़ी भर अपने मन में झांकना और तुम पागल भीड़ पाओगे वहां विचारों की, वासनाओं की, आकांक्षाओं की। तुम खुद ही चौंकोगे कि मैं कैसा पागल हूं! यह भी कोई होना है? यह शोरगुल भीतर, यह बाजार भीतर, यह कोलाहल भीतर, क्या इस कोलाहल के रहते जीवन के रस का कोई अनुभव हो सकेगा? क्या उस कोलाहल के चलते जीवन के सौंदर्य से कुछ संबंध हो सकेगा? सत्य से कोई मिलन हो सकेगा? हालत वैसी ही है जैसे नीर बिन मीन सुखाय! जैसे किसी ने खींच ली हो सागर से मछली और डाल दी हो सूखे तट पर, जलती हो धूप, बरसती हो आग सूरज से और मीन तड़फती हो और मीन चाहती हो कि वापस सागर मिल जाए। जगजीवन कहते: ऐसी मेरी दशा है।
ऐसी प्रत्येक की दशा है। तुम चाहे मानो भी न--क्योंकि मानने में भी तकलीफ होती है; क्योंकि मानने का मतलब होता है, फिर सागर की तलाश करनी होगी। तुमने तो इस जलती हुई रेत में ही घर बना लिया है। तुमने तो इस सूरज से बरसती आग को ही अपना अस्तित्व समझ लिया है। तुम तो मान ही लिए हो कि यही है होने का ढंग, और कोई ढंग होता नहीं। अधार्मिक आदमी मैं उसको ही कहता हूं, जो मानता है कि जैसी जिंदगी चल रही है, बस जिंदगी की यही एक शैली है, यही एक उपाय है, और कोई जिंदगी होती नहीं। धार्मिक मैं उसे कहता हूं, जो कहता है: यह अगर जिंदगी है, तो जिंदगी व्यर्थ है। जिंदगी का कोई और ढंग होना ही चाहिए। जिंदगी की कोई और शैली होनी ही चाहिए। मुझे भले पता न हो--तो खोजूंगा।
अधार्मिक कहता है: कोई ईश्वर नहीं है। उसका क्या प्रयोजन है कहने से कि ईश्वर नहीं है? उसका इतना ही प्रयोजन है कि जैसा जीवन है, बस ऐसा ही जीवन है, इससे अन्यथा कोई जीवन नहीं है। मत उठाओ आंखें ऊपर, ऊपर कुछ भी नहीं है, कोरा आकाश है। और मत पुकारो किसी को, कोई उत्तर न कभी आया है और न आएगा। मत खोजो कुछ और, जगत में कुछ भी रहस्य नहीं है। बस यही कूड़ा-करकट, यही जिंदगी है। इसी घास-फूस में किसी तरह जी लो, गुजार लो चार दिन, यह जिंदगी एक दुर्घटना है, मिट्टी-मिट्टी में गिर जाएगी। यहां न कुछ पाने को है, न कुछ खोने को है, एक दुख-स्वप्न है, भोग लो, गुजार लो--अच्छे कि बुरे। जो आदमी कहता है: ईश्वर नहीं है, वह यही कह रहा है कि जैसी जिंदगी है, इससे अन्यथा जिंदगी की बात मत उठाओ! क्योंकि तुम अन्यथा जिंदगी की बात उठाते हो, तो फिर मुझे परिवर्तित होना पड़े। अगर सागर कहीं है, तो फिर मछली कैसे रेत में घर बनाए? अगर सागर कहीं है और सागर की शीतलता कहीं है, तो फिर कैसे मछली सूरज की तपती धूप को अंगीकार करे? फिर घर-आंगन कुछ भी सुहाएगा नहीं। फिर एक खोज पकड़ लेगी प्राणों को, मथ डालेगी। फिर एक प्रचंड झंझावात आएगा, जीवन में अन्वेषण का जन्म होगा, अनुसंधान शुरू होगा।
नेह की बूंद झरी बदरी
पसुरी-पसुरी सब देह पिरानी।
भीजत खीजत छोड़ि गयो
कर मीजति हौं मेरी बात न मानी।
सूनी अटारी कटारी लगै
सुनि कोयल कीर मयूर की बानी।
गाज गिरै ऐसे मौसम पे
जामै भीतर आगि औ बाहर पानी।
जिंदगी अभी ऐसी है।
गाज गिरै ऐसे मौसम पे
जामै भीतर आगि औ बाहर पानी
बाहर ही बाहर सब रोशनी है, भीतर अंधेरा। बाहर-बाहर सब थोथे आयोजन शीतलता के, भीतर जलती प्रचंड अग्नि।
सूनी अटारी कटारी लगै
सुनि कोयल कीर मयूर की बानी
और जब तक परमात्मा से, प्यारे से मिलन नहीं हुआ है--सूनी अटारी कटारी लगै--तब तक सब सूना है। समझा लो, बुझा लो, झूठे सपने देख लो--यह मेरी पत्नी, यह मेरा पति, यह मेरा बेटा, यह मेरा भाई--किसी तरह भुलाए रखो अपने को संग-साथ में, समझाए रखो, मगर यह सब समझ मौत आएगी उखाड़ जाएगी। ये कागज की नावें डूब जाएंगी। इनके सहारे कोई कभी पार नहीं हुआ है।
सूनी अटारी कटारी लगै
सुनि कोयल कीर मयूर की बानी
और जिसको याद आनी शुरू हो गई सागर की, उसे कोयल की पुकार, कुहू-कुहू की पुकार अनंत से आती अपने प्यारे की पुकार मालूम होने लगी। कटारी जैसी लगेगी! और जब पपीहा पुकारेगा: ‘पी कहां!’ तो उसके प्राणों में भी पुकार उठेगी कि ‘पी कहां!’ प्यारे को खोकर हम जी रहे हैं। सागर को खोकर मछली पड़ी है। जैसे नीर बिन मीन सुखाय! ऐसे हम सूख रहे हैं।
जिसको तुम जिंदगी कहते हो, यह धीमे-धीमे मरने के अतिरिक्त और क्या है? आहिस्ता-आहिस्ता आत्मघात! और क्या है? सत्संग में अगर कभी तुम्हें एकाध बूंद का अनुभव हो जाए, तो तुम्हें सागर की याद आने लगे।
इसलिए सत्संग सरोवर है, भक्ति स्नान।
नेह की बूंद झरी बदरी
पसुरी-पसुरी सब देह पिरानी
एकाध बूंद तुम्हारे भीतर उतर जाए तो तुम्हें पता चले कि जल भी है और प्यासा रहना नियति नहीं है। अगर तुम प्यासे हो, तो तुम्हारा ही उत्तरदायित्व है। तुमने तलाश सरोवर की नहीं की है। यहीं इसी जमीन पर, यहीं तुम्हारे बीच ऐसे लोग सदा रहे हैं, सदा हैं, सदा रहेंगे, जो तृप्त हो गए हैं। जो सूख नहीं रहे हैं, जो रोज हरे हो रहे हैं। जिन्हें परम जीवन मिल गया है। जिन्हें ऐसा जीवन मिल गया है जिसका कोई अंत नहीं आता। जिन्होंने शाश्वत को पहचाना है। जिनके हाथ परमात्मा के हाथ में पड़ गए हैं। और जिन्होंने अपने हृदय को उसके हृदय में डुबा दिया है। जिन्होंने अपनी बूंद को उसके सागर में उतर जाने दिया है।
आपन केहि तें कहौं सुनाय।
जो समुझौं तौ समुझि न आय।।
जगजीवन कहते हैं: मैं रोऊं भी तो किसके सामने रोऊं? समझेगा कौन? लोग हंसेंगे। क्योंकि लोगों ने तो जिंदगी बना ली है, घर-आंगन में ही सब समाप्त हो गया है; सारा आकाश उन्होंने अपना आंगन समझ लिया है। और अपने घर को सारा अस्तित्व मान लिया है। तड़प रहे हैं, सड़ रहे हैं, गल रहे हैं, सूख रहे हैं, लेकिन यही उनकी जिंदगी की परिभाषा है।
आपन केहि तैं कहौं सुनाय।
मैं किसी से कहने भी जाऊं अपनी पीड़ा तो किससे कहूं? इसीलिए तो भक्त ने प्रार्थना खोजी। प्रार्थना की खोज के बुनियादी कारणों में एक कारण यह है कि किसी और से कहने का कोई अर्थ नहीं मालूम होता, तो परमात्मा से ही कहने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। तो भक्त उसी से कह लेता है, उसी के सामने रो लेता है। आंसू बहा लेता है, निवेदन कर लेता है। उत्तर आए या न आए, यह सवाल नहीं है। एक बात तो कम से कम ठीक है कि परमात्मा सुने या न सुने, कम से कम हंसेगा तो नहीं, पागल तो न समझेगा। उत्तर न भी आएगा तो चलेगा।
लेकिन इस जगत में किसी से अगर कहो, तो लोग हंसेंगे। धार्मिक आदमी को देख कर लोग सदा हंसे हैं। हंसी उनकी आत्म-रक्षा है। हंसते हैं, क्योंकि उन्हें डर पैदा होता है कि हो न हो, कौन जाने यह आदमी सही हो! अगर यह आदमी सही है, तो उनके पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। इस आदमी को गलत होना ही चाहिए; तो ही उनके पैर के नीचे जमीन थिर रहती है। अगर बुद्ध सही हैं, तो तुम गलत हो गए। अगर कृष्ण सही हैं, तो तुम्हारा भवन गिरा। तुम दोनों सही नहीं हो सकते साथ-साथ। बुद्ध के और तुम्हारे सही होने में कोई समझौता नहीं हो सकता।
इसलिए लोग जब बुद्ध जीवित होते हैं तो बुद्ध से बचते हैं, और जब बुद्ध मर जाते हैं तो उनकी पूजा करते हैं। दोनों तरकीबें बचने की हैं। जिंदा होते हैं तो बचते हैं। क्योंकि सुनने में खतरा है। कौन जाने कोई बूंद कंठ में उतर ही जाए! तुम्हारे बावजूद उतर जाए। तुम चाहते भी न हो और उतर जाए। कोई बात समझ में पड़ ही जाए, तो फिर मुश्किल हो जाएगी। इसलिए बचते हैं, विरोध करते हैं। और जब बुद्ध मर जाते हैं, तो बचने की और भी अच्छी तरकीब मिल जाती है। फिर पूजा करते हैं, फिर उनकी मूर्ति बना लेते हैं। लेकिन समझते कभी भी नहीं। या तो गाली देते हैं या पूजा करते हैं। और खयाल रखना, दोनों में कुछ भेद नहीं है। जिंदा हों तो गाली देते हैं, मर जाएं तो पूजा करते हैं। मरे को तो वैसे भी कोई गाली नहीं देता न! बुरा से बुरा आदमी भी मर जाए, तो भी गांव के लोग प्रशंसा करने लगते हैं।
एक आदमी ने मुल्ला नसरुद्दीन को फोन किया कि भाई, ठीक तो हो? नसरुद्दीन ने कहा कि ऐसा पूछने का कारण? और उस आदमी ने फिर पूछा कि कहां से बोल रहे हो? नसरुद्दीन ने पूछा कि बात क्या है, मामला क्या है? उस आदमी ने कहा: कुछ नहीं, गांव में लोगों को तुम्हारी प्रशंसा करते सुना। तो मुझे शक हुआ कि कहीं मर तो नहीं गए! क्योंकि यहां जब कोई मर जाता है तभी लोग प्रशंसा करते हैं।
मैंने सुना है, एक गांव में एक आदमी मरा--उस गांव का बड़ा उपद्रवी आदमी था। ऐसे तो नेता था, ‘नेताजी’ कहलाता था--मगर ‘नेताजी’ जैसे होते हैं! बड़ा उपद्रवी था, गांव उससे परेशान था। मरा तो सारा गांव प्रसन्न हुआ। दिल ही दिल लोग खुश हुए। लेकिन नेता था, उसके शागिर्द भी थे--‘दादा’ था, गांव में उसके और मानने वाले भी थे--तो सारे गांव को जाना तो पड़ा ही मरघट! क्योंकि मर कर भी उसकी ताकत तो थी ही। उल्लू भी मर जाएं तो औलाद तो छोड़ ही जाते हैं!
अब बड़ी मुसीबत वहां यह आई कि गांव के लोगों से कहा गया कि कुछ प्रशंसा में बोलो नेताजी की, अब नेताजी मर गए हैं तो उनकी समाधि पर...तो लोग एक-दूसरे का मुंह ताकें। लोग बहुत सोचें कि बोलें क्या इसकी प्रशंसा में? ऐसा तो कभी इसने कुछ किया ही नहीं था जिसकी प्रशंसा की जा सके। आखिर जब कोई उपाय न हुआ तो गांव के एक पंडित जी को लोगों ने कहा: अब आप ही कुछ...आप शास्त्र के ज्ञाता हैं, वेद-पुराण के ज्ञाता हैं, आप ही कुछ ऐसी बात कहो कि मामला टले--कुछ तो कहना ही पड़ेगा! मर गया आदमी तो उसकी प्रशंसा में कुछ दो शब्द तो कहो! पंडित ने खड़े होकर कहा कि नेताजी चले गए, पांच भाई और छोड़ गए हैं पीछे, उन पांच भाइयों की तुलना में वे देवतातुल्य थे। और तो कुछ उसको भी नहीं सूझा कि अब वह कहे क्या? यह बात गांव के लोगों को भी जंची कि यह बात सच है, वे पांच भाई तो और पहुंचे हुए हैं।
कोई मर जाए तो प्रशंसा करनी ही होती है। फिर कुछ निंदा का कारण भी नहीं रहा। और जब बुद्ध जैसे व्यक्तियों की हम बहुत निंदा करते हैं उनके जीवन में, तो हमारे भीतर एक अपराध-भाव भी पैदा हो जाता है, क्योंकि कहीं प्राणों के किसी अंतस्तल में कोई कहता तो है कि हम गलत कर रहे हैं। हमारे प्राणों के प्राण में कोई स्वर गूंजता तो है कि हम गलत कर रहे हैं। करना पड़ता है, क्योंकि हमारे जीवन की सुरक्षा इसमें है। नहीं तो हमारी दुकान क्या हो, हमारा बाजार क्या हो, हमारे संबंधों का क्या हो? अगर बुद्ध की सुनें, तो हमारी जिंदगी का सारा का सारा इंतजाम अस्त-व्यस्त हो जाता है। जिसको हमने जिंदगी कहा है, वह तो अस्त-व्यस्त हो जाती है। तो विरोध तो करना पड़ता है। लेकिन कहीं प्राण के किसी गहन तल पर सत्य को एकदम इनकार कर भी तो नहीं सकते हो। तो बुद्धों के मरने के बाद हमें पश्चात्ताप घेरता है, अपराध-भाव घेरता है। उस अपराध-भाव के कारण फिर हम पूजा शुरू करते हैं कि चलो ठीक है, जो जिंदगी में हुआ, हुआ, अब तो दो फूल चढ़ाओ! अब किसी तरह अपने मन को हलका कर लो।
तो जीसस को सूली दी और फिर दो हजार साल से पूजा चल रही है। सुकरात को जहर पिलाया और ढाई हजार साल से सम्मान, और सुकरात की प्रशंसा में इतने गीत लिखे जा रहे हैं। बुद्ध को पत्थर मारे, महावीर के कानों में सलाखें ठोंक दीं, जिंदा रहना मुश्किल कर दिया--और फिर मंदिर खड़े हो रहे हैं, और पूजा के थाल उतारे जा रहे हैं।
यहां तो सच बात किसी से कहनी मुश्किल है। क्योंकि लोगों की जिंदगी झूठ पर खड़ी है। सच का जरा सा धक्का, जरा सा झोंका और उनके ताशों के महल गिर जाते हैं। कौन सुनने को राजी है? और किसी से कहो भी, कोई सुनने को राजी भी हो जाए, तो भी कौन सहानुभूति तुम्हें दिखलाएगा?
आपन केहि ते कहौं सुनाय।
जगजीवन कहते हैं: किसी से अपने दिल की, अपने दुख की बात भी कह सको, ऐसा भी कोई संगी-साथी नहीं दिखाई पड़ता।
जो समुझौं तौ समुझि न आए।
न किसी दूसरे से कह सकते, खुद समझने की कोशिश करो तो कुछ समझ में आता नहीं, इतना सब बेबूझ है। क्यों मैं आया, क्यों जन्मा, क्यों हूं, किसलिए, किस तरफ चल रही है यह यात्रा, कौन खींचे लिए जाता है, कौन चलाता है इस जीवन के विराट उपक्रम को, कौन छिपा है इस सारे रहस्य के भीतर, किसके हाथ, किसके हस्ताक्षर इस विस्तार में हैं? खुद समझो तो भी कुछ समझ में नहीं आता। यह बात समझने की नहीं। यह बात बुद्धि की नहीं। यह बात हृदय की है।
चूंकि समझ में नहीं आती बात, इसलिए भक्त समझ के केंद्र से हट जाता है और प्रीति के केंद्र में उतर जाता है। ज्ञानी वहीं उलझा रहता है। और समझने की ही कोशिश करता रहता है। समझने की कोशिश परमात्मा को वैसे ही है जैसे कोई आंख से संगीत सुनने की कोशिश करे। हां, आंख से वीणा दिखाई पड़ेगी और संगीतज्ञ वीणा के तार छेड़ता हुआ भी दिखाई पड़ेगा, लेकिन सुनाई कुछ भी न पड़ेगा। या जैसे कोई कान से देखने की कोशिश शुरू करे तो वीणा के तार दिखाई नहीं पड़ेंगे, न वीणा, न वीणावादक, लेकिन स्वर सुनाई पड़ेगा। आंख देखती है, सुनती नहीं। कान सुनता है, देखता नहीं। बुद्धि क्षुद्र पर समर्थवान है, विराट पर नहीं। विराट पर हृदय का अधिकार है। जो बुद्धि से समझने चलते हैं सत्य को, उनके हाथ में क्षुद्र सिद्धांत लगते हैं, सत्य नहीं। जो हृदय से सत्य को समझने चलते हैं, वे समझ पाते हैं।
लेकिन हृदय की भाषा समझने की भाषा नहीं है, प्रेम की भाषा है। प्रेम एक तरह के ज्ञान को जन्म देता है, उसी ज्ञान का नाम भक्ति है। भक्त यह नहीं कह सकता कि मैं भगवान को समझता हूं, लेकिन भक्त यह कहता है कि मुझे उसका स्वाद मिला। भक्त यह नहीं कह सकता कि मैं सिद्धांततः समझा सकता हूं कि भगवान क्या है, भक्त इतना ही कह सकता है कि मैंने डुबकी मारी, मैं जीया, मैंने उसे अनुभव किया। मैं उसके ही रूप में डूब गया, वह मेरे रूप में डूब गया। मैं उसके साथ एकात्म हो गया हूं। भक्त यही कह सकता है कि मैं हूं प्रमाण उसका और कोई प्रमाण नहीं दे सकता।
जो समझौं तौ समुझि न आय।।
संभरि-संभरि दुख आवै रोय।
और बहुत अपने को सम्हालता हूं, मगर रह-रह कर, रह-रह कर बड़े दुख का आंदोलन उठता है। कि और कितनी देर! और कितना तड़पाओगे? और कितनी देर दूर-दूर रखोगे?
संभरि-संभरि दुख आवै रोय।
रो-रो उठता हूं। यह भक्त की पीड़ा समझो। किसी से कह नहीं सकता--कोई समझेगा नहीं। कहे, तो लोग हंसेंगे, पागल समझेंगे। अपने ही भीतर गुपचुप सम्हाल कर रखना होगा। खुद भी समझना चाहे, समझ में आता नहीं। क्योंकि बुद्धि बड़ी छोटी है, सत्य उसमें समाता नहीं। तर्क काम नहीं पड़ते। सब तर्क गिर जाते हैं। शास्त्र, शब्द, सिद्धांत, सब थोथे मालूम होते हैं। कोई अनुभव की तरफ ले जाता मालूम नहीं होता। विधि-विधान, औपचारिक क्रियाकांड, सब ऊपर-ऊपर मालूम होते हैं। अंतस्तल नहीं छूता। अंतस्तल नहीं आंदोलित होता। भीतर ऊर्जा नहीं उठती, उमंग नहीं जगती। उत्साह का आविर्भाव नहीं होता।
फिर करे क्या भक्त?
रह-रह के रोने लगता है। सम्हालता है। क्योंकि कौन उसके आंसुओं को समझेगा? उसके आंसू उसे व्यर्थ ही विक्षिप्त सिद्ध करवा देंगे। कौन उसके भाव को पहचानेगा? भाव को पहचानने वाले समृद्ध लोग कहां? उसके भाव को सम्मान दे सकें, ऐसे शालीन लोग कहां? जहां कौड़ी-कौड़ी के लिए लोग टूटे मर रहे हैं, जहां क्षुद्र-क्षुद्र पदों के लिए संघर्ष चल रहा है, वहां परमात्मा के लिए कोई रोएगा--कौन समझेगा इसे? लोग कहेंगे: गया काम से! होश सम्हालो! लोग कहेंगे: यह क्या कर रहे हो? भटक जाओगे। अपने को वापस दुनिया में लाओ। किन कल्पनाओं के जाल में खोए जाते हो? कह भी नहीं सकता। रो भी नहीं सकता। पराए तो पराए, अपने भी पराए हो जाते हैं। पत्नी को परमात्मा का भाव जगे, पति से नहीं कह सकती। पति को जगे, पत्नी से नहीं कह सकता। अपने जो हैं, इतने निकट जो हैं, वे भी ऐसी बातें नहीं समझेंगे।
मेरे पास रोज घटनाएं घट जाती हैं। कोई पति आ जाता है, कि आपने मेरी पत्नी को क्या कर दिया? अकारण हंसती है, रोती है--अकारण! पास-पड़ोस में खबरें फैलने लगीं हैं कि कुछ गड़बड़ हो गया। कोई कारण हो तो हंसो, कोई कारण हो तो रोओ, लेकिन अकारण, बैठे-बैठे! तो तुम भी सोचोगे, तुम्हारी पत्नी एकदम बैठी रहे कुर्सी पर, एकदम खिलखिला कर हंसने लगे, तुम्हें भी शक होगा कि बात क्या है? और पति कहते हैं कि अगर मैं समझाता हूं तो वह और हंसती है। मैं कहूं कि चुप रह, कोई मोहल्ला-पड़ोस के लोग सुन लेंगे, तो उसे और हंसी आती है। कभी-कभी बैठे-बैठे रोने लगती है--कोई कारण ही नहीं है। और इससे भी ज्यादा अड़चन होती है कभी-कभी कि दोनों काम एक साथ करने लगती है। हंसना, रोना--दोनों। यह तो सिर्फ पागल ही करते हैं। तो मुझसे पूछते हैं वे कि क्या करें? किसी चिकित्सक को दिखाएं?
और चिकित्सक क्या करेगा ऐसे व्यक्ति को? दे देगा, इलेक्ट्रिक शॉक दे देगा। इलेक्ट्रिक शॉक ऐसा ही है जैसे कभी-कभी तुम करते हो--कोई नई बात नहीं है। तुम्हारी घड़ी बंद हो गई, एक दिया झटका जोर से! कभी-कभी चल पड़ती है, यह बात भी सच है। मगर यह कोई तरकीब है घड़ी चलाने की! कोई घड़ीसाज, तुम कोई घड़ीसाज नहीं हो। कभी-कभी हो जाता है कि चल पड़ती है--कभी कोई तेल अटक गया था, कि कभी कोई एक धूल का कण अटक गया था, दे दिया झटका! मगर यह संयोग की बात है, यह कोई कला नहीं है, यह कोई विज्ञान नहीं है।
कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि इलेक्ट्रिक का शॉक...मस्तिष्क बड़ी सूक्ष्म घड़ी-जैसी चीज है...कभी-कभी ठीक चलने लगता है। तो लोग समझते हैं, यह कोई कला है। यह कला नहीं है। इससे तुम कुछ वैज्ञानिक उपक्रम नहीं कर रहे हो, सिर्फ असमर्थता घोषित कर रहे हो कि हमारी समझ में कुछ नहीं आता, चलो कोशिश करके देख लें--दें एक जोर का धक्का, शायद चल जाए! और जिन-जिन के पास घड़ी हैं, सभी को यह अनुभव होगा कि आदमी जरा ठोक-पीट कर सोचता है कि अगर चल जाए तो बचें घड़ीसाज के पास जाने से। और कभी-कभी चलती भी है। मगर कभी-कभी चलना अनायास है। सौ में निन्यानबे मौकों पर नहीं चलेगी। और खतरा भी है, कि जैसे कभी-कभी चल जाती है, कभी-कभी झटका देने से और भी बिगड़ जाएगी। जितनी बिगड़ी थी, उससे ज्यादा बिगड़ जाएगी।
क्या करेगा चिकित्सक? कोई इलाज नहीं है। भक्ति का कोई इलाज नहीं है।
नानक बीमार पड़े थे भक्ति में, वैद्य ने आकर नाड़ी पकड़ी तो नानक हंसने लगे और कहा कि नाहक मेहनत न करो, यह मरीज तुम्हारी दवा से ठीक न होगा। यह बीमारी इलाज हो सके, ऐसी नहीं है। यह तो परम चिकित्सक जब आएगा, तभी ठीक हो सकेगी। यह तो औषधि जब समाधि की उतरेगी, तभी यह व्याधि जाएगी, उसके बिना नहीं। समाधि ही इस व्याधि के लिए औषधि है--और कुछ नहीं।
किससे कहो, कोई समझेगा नहीं। रोओ भी तो भी अकेले में रोना पड़ेगा। सम्हाल-सम्हाल कर भक्त को चलना पड़ता है। क्योंकि संसार भक्त के बिलकुल ही प्रतिकूल है।
यहां तुम यह बात खयाल रखना कि यहां संसार ज्ञानी के इतने प्रतिकूल नहीं है; क्योंकि ज्ञानी की भाषा और संसार की भाषा में एक तारतम्य है। ज्ञानी गणित और तर्क की भाषा बोलता है। वही भाषा बाजार की है। ज्ञानी बाजार की भाषा से भिन्न भाषा नहीं बोलता। उसकी तर्कसरणी वही है। दो और दो चार जैसे बाजार में होते हैं, वैसे ही ज्ञानी की भाषा में दो और दो चार होते हैं। अड़चन तो भक्त की है। वहां पुराना कोई गणित काम नहीं करता। वहां एक और एक मिल कर दो नहीं होते, एक और एक मिल कर एक ही होता है। प्रेम में एक और एक मिल कर एक ही होता है, दो नहीं होते। गणित में एक और एक मिल कर दो होते हैं।
तो ज्ञानी को इतनी अड़चन नहीं है। और त्यागी को भी अड़चन नहीं है; क्योंकि उसकी भी भाषा संसार की भाषा है। तुम भलीभांति जानते हो कि अगर धन कमाना है तो बहुत से त्याग करने पड़ते हैं। धन कमाने वाला कम त्यागी नहीं होता। अगर दुकान पर ग्राहक हैं, छोड़ देता है उस दिन भोजन, उपवास कर जाता है। अगर धंधा जोर से चल रहा है तो रात देर तक जागा रहता है। अगर रात भर भी जाग कर हिसाब-किताब करना पड़े तो वह भी कर लेता है।
तुम जानते हो कि दुकानदार भी एक तरह की तपश्चर्या करता है। तुम जानते हो, पद का खोजी भी बड़ी चेष्टाएं करता है, बड़े उपक्रम करता है। सब तरह के त्याग करता है, जेल इत्यादि भी जाना पड़ता है--कि जेल वगैरह नहीं गए तो सर्टिफिकेट नहीं है। किसी से कहो कि भई, वोट दो, वह पूछता है: कितनी दफे जेल गए? तो सर्टिफिकेट चाहिए कि इतनी दफे जेल गए। कोई भी बहाने से सही, मगर दो-चार दफा जेल जाना ही चाहिए, नहीं तो नेता कैसे?
त्यागी की भाषा भी संसार की भाषा से भिन्न नहीं है। सबसे ज्यादा कठिनाई है भक्त की। क्योंकि उसकी भाषा में और संसार की भाषा में कोई तालमेल नहीं है। वे अलग ही भाषाएं हैं। उनका एक-दूसरे में अनुवाद भी नहीं हो सकता। संसार की भाषा है गणित की और तर्क की, भक्त की भाषा है भाव की और प्रेम की।
संभरि-संभरि दुख आवै रोय।
कस पापी कहं दरसन होय।।
और मैं जानता हूं कि तेरा क्या कसूर, मैं पापी ऐसा हूं कि तेरा दर्शन भी हो तो कैसे हो?
यह भक्त की भाव-दशा समझना।
भक्त दोष नहीं देता भगवान को। यह नहीं कहता कि तू नाराज है, कि तेरी कृपा की कमी है, कि तू रहीम नहीं, रहमान नहीं, कि तू करुणावान नहीं, इतना ही कहता है: कस पापी कहं दरसन होय! मैं पापी हूं, अज्ञानी हूं, मूढ़ हूं, दर्शन हो भी तो कैसे हो? और यह भी भलीभांति जानता हूं कि मेरे रोने से कोई मेरी पात्रता थोड़े ही हो गई कि दर्शन होना चाहिए। मैंने तुझे प्रेम किया, इतना ही तो काफी नहीं है। मुझमें अभी हजार-हजार रोग हैं और हजार-हजार विशुद्धियां आने की अभी संभावनाएं हैं, हजार-हजार अशुद्धियां अभी मुझ में हैं, अभी मैं पवित्र कहां, अभी तू आए इस योग्य मेरा घर कहां?
तन मन सुखित भयो मोर आय।
लेकिन इतनी जैसे ही तैयारी कोई कर लेता है--यही तैयारी है--सम्हल-सम्हल कर रोना, संसार से छिपा-छिपा कर प्रार्थना करना, अपने मन के भाव को अपने मन के भाव के जैसा ही रखना, उसकी अभिव्यक्ति भी न करना, एकांत में बहा लेना आंसू और जानते रहना कि परमात्मा की अनुकंपा तो अपार है, मेरे ही पापों के कारण बाधा पड़ती होगी, वह तो सामने है, मेरी आंखों पर ही पर्दा होगा; वह तो आया ही हुआ है, मैं ही नहीं देख पा रहा हूं, कहीं मेरी ही भूल-चूक है, ऐसी ही भाव-दशा तो तैयार करती भक्त को, यही तो उसकी पात्रता का निर्माण है। और तब घटना घटती है।
तन मन सुखित भयो मोर आय।
तुम आ गए! ऐसे ही अचानक आना होता है। मेरा तन-मन दोनों आनंद से भर गए हैं।
तिरे जल्वों में गुम होकर औ’ खुद से बेखबर होकर
तमन्ना है कि रह जाऊं जसरतापा नजर होकर
हिजाब अंदर हिजाबो-जल्वा अंदर जल्वा क्या कहिए
बला में फंस गए उश्शाक पाबंदे-नजर होकर
कहां जाती है मिल कर ओ निगाहे-नाज बेपर्दा
मिरे पहलू में रह जा लज्जते-दर्दे-जिगर होकर
लताफत मानए-नज्जारा-ए-सूरत सही लेकिन
धड़कना दिल का कहता है वो गुजरे हैं इधर होकर
पहले साफ-साफ समझ में आता भी नहीं। मगर गंध तो आ जाती है। स्पष्ट दिखाई भी नहीं पड़ता, पर धुंधली छाया तो अनुभव में आ जाती है। पैर दिखाई न भी पड़ें, पगध्वनि तो सुनाई पड़ जाती है।
लताफत मानए-नज्जारा-ए-सूरत सही लेकिन
धड़कना दिल का कहता है वो गुजरे हैं इधर होकर
और दिल एक नई गति से, एक नई लय से, एक नये छंद से धड़कने लगता है। वही पहचान है। और भक्त और चाहता क्या है!
तिरे जल्वों में गुम होकर औ’ खुद से बेखबर होकर
तमन्ना है कि रह जाऊं जसरतापा नजर होकर
बस तुझमें खो जाऊं, मिट जाऊं।
तन-मन सुखित भयो मोर आय।
जब इन नैनन दरसन पाय।।
आ गए तुम! भरोसा नहीं आता। अनंत-अनंत प्रतीक्षा के बाद अचानक। ज्ञानी को तो भरोसा आ जाता है। निश्चित ही। क्योंकि उसने सारे उपाय किए हैं। उसे तो कठिनाई अगर कोई थी तो एक थी कि परमात्मा अभी तक आया क्यों नहीं? क्योंकि मैंने सब तो किया जो करना चाहिए। उसको शिकायत थी। ज्ञानी के सामने जब परमात्मा आए तो उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह तो मानता है कि मैं दावेदार हूं। होना ही चाहिए था। भक्त आश्चर्यचकित होता है। अवाक होता है। क्योंकि भक्त जानता है, मैं तो पापी था। मेरी सामर्थ्य क्या? मेरा बल क्या? और तुम आए। तुम मेरी नजर में आए!
हजारों कुर्बंतों पर यूं मिरा महजूर हो जाना
जहां से चाहना उनका वहीं से दूर हो जाना
निकाबे-रूए-नादीदा का अजखुद दूर हो जाना
मुबारक अपने हाथों हुस्न का मजबूर हो जाना
सरापा दीद होकर गर्क मौजे-नूर हो जाना
तिरा मिलना है खुद हस्ती से अपनी दूर हो जाना
मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं
तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना
यकायक दिल की हालत देख कर मेरा तड़प उठना
उसी आलम में फिर कुछ सोच कर मसरूर हो जाना
‘जिगर’ वो हुस्ने-यकसूई का मंजर याद है अब तक
निगाहों का सिमटना और हुजूने-नूर हो जाना
क्या है भक्त की यह अनुभूति?
मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं
तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना
भक्त दावेदार नहीं है। भक्त तो सदा जानता है कि जब भी तुम मिलोगे, मैं अपात्र ही था। मिले तो तुम अपने प्रसाद से मिले, अपनी अनुकंपा से मिले, मेरी पात्रता से नहीं। तुमने मुझे मजबूर कर दिया। तुमने मुझे झुका ही दिया। मुझे तो अपनी तरफ से झुकना होता तो शायद मैं झुकता भी नहीं। मेरी अकड़ ऐसी! मेरा अहंकार ऐसा!
मोहब्बत क्या है, तासीरे-मोहब्बत किसको कहते हैं
तिरा मजबूर कर देना, मिरा मजबूर हो जाना
यह मेरे बस की बात नहीं थी कि मैं झुक जाता। तूने मजबूर कर दिया। तू आया और तूने मुझे अपने में डुबा लिया।
तन-मन सुखित भयो मोर आय।
और खयाल रखना, जगजीवन कह रहे हैं: मन तो आनंदित हुआ ही है, तन भी आनंदित हुआ है। भक्त के मन में तन और मन में भेद नहीं है। भीतर तो आनंद उमगा ही है, बाहर भी आनंद बरसा है। बाहर और भीतर में भेद नहीं है। चैतन्य तो नाच ही उठा है, लेकिन पदार्थ भी आंदोलित हुआ है। भक्त के मन में चेतना और पदार्थ में भेद नहीं है।
जगजीवन चरनन लपटाय।
रहै संग अब छूटि न जाय।।
बस अब इतनी कृपा और करो; मैं तो तुम्हारे चरणों में लिपट जाऊंगा, मगर मुझ पर मुझे भरोसा नहीं है, यह भी तुम्हारी ही कृपा हो तो ही बात बने, नहीं तो संग फिर छूट सकता है। मुझे अपनी भूल-चूकों का भलीभांति पता है। मुझे अपनी नासमझियों का भलीभांति बोध है। ज्ञानी को अपनी पात्रता का अहंकार होता है, भक्त को अपनी अपात्रता का बोध होता है। इसलिए भक्त की विनम्रता असीम है।
जगजीवन चरनन लपटाय।
मैं तो चाहता हूं कि तुम्हारे चरणों में लिपटूं तो फिर कभी छूटूं नहीं। अब तुम्हारे चरण मिल गए, लिपट जाऊं? सदा लिपटा रहूं। लेकिन खयाल रखना, रहै संग अब छूटि न जाय! यह मेरे बस के बाहर है। तुम्हीं ध्यान रखना कि कहीं यह संग जो बना है, छूट न जाए। तुम्हारी कृपा से बना, तुम्हारी कृपा से बना रहे।
कहां-कहां उड़के शो’ले पहुंचे ये होश किसको ये कौन जाने
हमें बस इतना है याद अब तक लगी थी आग अपने घर से पहले
कहां ये शोरिश कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम
जमाना ख्वाबो-खयाल-सा था, तिरे फुसूने-नजर से पहले
उठा जो चेहरे से पर्दा-ए शब, सिमट के मर्कज पे आ गए सब
तमाम जल्वे जो मुन्तशिर थे, तुलूए-हुस्ने-बशर से पहले
वो यादे-आगाजे-इश्क अब तक अनीसे-जानो-दिले-हजी है
वो इक झिझक-सी वो इक झपक-सी हर इल्तिफाते-नजर से पहले
हमीं थे क्या जुस्तजू का हासिल, हमीं थे क्या आप अपनी मंजिल
वहीं पे आकर ठहर गया दिल, चले थे जिस रहगुजर से पहले
कहां थी ये रूह में लताफत, कहां थी कौनेन में ये वुसअत
हयात ही सो रही थी जैसे किसी की पहली नजर से पहले
उसकी एक नजर और जो छिपा था, प्रकट हो जाता है। और जो फूल दबे पड़े थे, खिल जाते हैं। और जो चांद-तारे दिखाई न पड़ते थे, दिखाई पड़ने लगते हैं।
कहां थी ये रूह में लताफत,...
यह हमारे प्राणों में प्रसाद कहां था? यह आनंद कहां था? यह उत्सव कहां था?
कहां थी ये रूह में लताफत, कहां थी कौनेन में ये वुसअत
यह दुनिया का विस्तार इसके पहले कभी दिखा नहीं था। यह विराटता कहां छिपी थी? यह रहस्य-पर-रहस्य, हम कैसे अंधे थे!
हयात ही सो रही थी जैसे किसी की पहली नजर से पहले
तेरी आंख जब तक हमारी आंख में न पड़ी, तब तक सारा अस्तित्व जैसे सोया हुआ था। जैसे हम बेहोश थे।
कहां ये शोरिश, कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम
कहां था यह सब रहस्य?--यह सतरंगी अस्तित्व, यह आनंद-उत्सव, यह प्रतिपल बरसता हुआ अमृत?
कहां ये शोरिश, कहां ये मस्ती, कहां ये रंगीनियों का आलम
जमाना ख्वाबो-खयाल-सा था,...
हम तो जैसे सपने ही देख रहे थे नींद में।
...तिरे फुसूने नजर से पहले
वह तेरी आंख जब आंख में पड़ी तो सपने गए, सत्य प्रकट हुआ।
उठा जो चेहरे से पर्दा-ए-शब, सिमट के मर्कज पे आ गए सब
तमाम जल्वे जो मुन्तशिर थे, तुलूए-हुस्ने-बशर से पहले
जो-जो छिपा था, प्रकट हो गया। जो अदृश्य था, दृश्य हो गया। नहीं जो कभी सुने थे स्वर, वे सुनाई पड़ने लगे। सारे गीत बज उठे। सारे नृत्य सजग हो गए। आज तेरी नजर की रोशनी में, आज तेरी मौजूदगी के अमृत में अब यह बात समझ में आती है, भरोसा आज भी नहीं आता।
हमीं थे क्या जुस्तजू का हासिल,...
क्या हमीं थे लक्ष्य जीवन का?
हमीं थे क्या आप अपनी मंजिल,...
वहीं पे आकर ठहर गया दिल, चले थे जिस रहगुजर से पहले
और यह क्या चमत्कार है कि हम तो समझ रहे थे कि गंतव्य की तलाश कर रहे हैं और आज जब पहुंचे हैं तेरी नजर में और आज जब तुझसे मिलना हुआ है, तो पता चलता है कि स्रोत और गंतव्य दो नहीं, एक ही हैं। पहली जो हमारी यात्रा की शुरुआत थी, वहीं हम वापस लौट आए। वर्तुल पूरा हो गया है। जहां से चले थे, वहीं वापस आ गए हैं। इस अवस्था का नाम मोक्ष है, या निर्वाण, या जो भी नाम तुम देना चाहो।
अब की बार तारु मोरे प्यारे, विनती करिकै कहौं पुकारे।
जगजीवन कहते हैं कि बस, अब बहुत हो चुका, अब और नहीं। अब तेरे चरण मिल गए, अब छूटें न। अब प्रार्थना है कि अब मुझे तार लो। अब फिर मत फेंक देना इस विराट जंजाल में। अब फिर मत चले जाने देना भटकन की राहों पर।
अब की बार तारु मोरे प्यारे, विनती करिकै कहौं पुकारे।
और तो मैं क्या कर सकता हूं; दावा तो नहीं कर सकता, अधिकार मेरा कोई भी नहीं, विनती कर सकता हूं। पुकार कर सकता हूं। पुकारूंगा, विनती करूंगा।
नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे,...
मैं तो बहुत करके हार चुका था, और बहुत हैं जो कर-कर के हार चुके हैं, और कुछ भी न हुआ।
नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे, तुम्हारे अब सब बनहि संवारे।
लेकिन तुमने संवार दिया, बिगड़ी को बना दिया। मुझसे तो बिगड़ती ही चली जाती थी बात। जितना खोजता था, उतना दूर निकल जाता था। जितना करता था, उतना अनकिया हो जाता था। दान भी करता था तो भीतर लोभ संगृहीत होता था। विनम्र बनता था तो अहंकार पीछे के द्वार से आता था। त्याग करता था तो वह भी भोग की आकांक्षा में करता था कि बैकुंठ का भोग मिलेगा। मेरे किए तो कुछ होता ही नहीं था--उल्टा ही होता था।
नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे,...
मैं तो हार ही चुका था।
खयाल रखना, जब खोज-खोज कर कोई हार जाता है, तभी उससे मिलन है। हारे को हरिनाम! जीतने वालों को नहीं मिलता। हारों को मिलता है। जब तक तुम्हें जरा सी भी आशा लगी है कि जीत लेंगे, तब तक अहंकार जारी है। जब तक तुम्हें थोड़ा सा भी भरोसा है कि कुछ और कर लेंगे--ऐसा नहीं तो वैसा, वैसा नहीं तो वैसा; नई विधि, नया विधान, नया मार्ग खोजेंगे मगर पहुंच कर रहेंगे--जब तक तुम्हें थोड़ी सी भी संभावना है अपने पहुंच जाने की, तब तक तुम चूकते रहोगे। तब तक भक्ति का उदय न होगा। जिस दिन तुम समग्ररूपेण जानोगे हार गए, पूरे हार गए, सौ प्रतिशत हार गए, गिर पड़ोगे हार में--हारे को हरिनाम--उसी क्षण अहंकार गया। अहंकार जीता है आशा में। आशा अहंकार का भोजन है।
इसलिए बुद्ध ने कहा है: धन्यभागी हैं वे जो परिपूर्ण रूप से निराश हो गए, हताश हो गए। बड़ा उलटा वचन है। क्योंकि आमतौर से तो हम कहते हैं: निराश आदमी, बेचारा। हताश आदमी, बेचारा। बुद्ध कहते हैं: धन्यभागी है वह जो परिपूर्ण रूप से हताश हो गया, निराश हो गया। जिसकी आशा जड़-मूल से मर गई, कुम्हला गई। क्योंकि जैसे ही आशा जड़-मूल से कुम्हला जाती है, अहंकार मर जाता है। अहंकार आशा का ही फूल है। और जहां अहंकार नहीं, वहीं परमात्मा का आविर्भाव है।
नहिं बसि अहै केतौ कहि हारे, तुम्हरे अब सब बनहि संवारे।
लेकिन अब देख लिया राज हमने। जगजीवन कहते हैं: अब, अब हम पहचान गए, तुम संवारते हो तो संवरता है। अब संवार लिया, अब छोड़ मत देना हाथ। अब गह लिया हाथ, अब छोड़ मत देना हाथ।
तुम्हरे हाथ अहै अब सोई,...
अब सब तुम्हारे हाथ में है। सब बेशर्त तुम्हारे हाथ में है।
...और दूसरो नाहीं कोई।
अब कोई आशा नहीं किसी और की; न अपना भरोसा है, न किसी और का भरोसा है, अब सारा भरोसा तुम पर है। इस भाव-दशा का नाम श्रद्धा है। श्रद्धा सुवास है भक्त के हृदय की।
जो तुम चहत करत सो होई,...
तुम जो चाहो, हो जाता है। हमारे चाहने से तो सब बिगड़ जाता है।
जो तुम चहत करत सो होई, जल थल महं रहि जोति समोई।
अब मैं देख रहा हूं कि जल में, थल में, सब तरफ तुम्हारी ही ज्योति समाई हुई है। कैसा अंधा था, अब तक यह क्यों मुझे नहीं दिखाई पड़ा? और ऐसा भी नहीं है कि ये वचन मैंने सुने नहीं थे। शास्त्र यही तो कहते हैं; सबमें वही समाया है। कंठस्थ थे ये वचन मुझे। लेकिन बस दोहराता था तोते की भांति। तुमने दिखाया तो दिखा। तुमने नहीं दिखाया तो शब्द तो मुझे याद रहे, शब्द तो मैं दोहराता रहा, लेकिन दिखा मुझे कुछ भी नहीं। जैसे अंधा रोशनी की बातें करता रहा और बहरा संगीत की चर्चाएं छेड़ता रहा।
जो तुम चहत करत सो होई, जल थल महं रहि जोति समोई।
अब मैं देखता हूं कि सब तरफ तुम्हीं हो, सारी ज्योतियां तुम्हारी ज्योतियां हैं, कण-कण में तुम्हीं व्याप्त हो, मगर यह तुमने दिखाया तो मुझे दिखा।
इश्क की हद से निकलते, फिर ये मंजर देखते
काश हुस्ने-यार को, हम हुस्न बन कर देखते
गुंचा-ओ-गुल देखते या माहो-अख्तर देखते
तुम नजर आते हमें, हम कोई मंजर देखते
फितरते-मजबूरी पे काबू ही कुछ चलता नहीं
वर्ना हम तो तुझसे भी तुझको छुपा कर देखते
फिर वही हसरत है साकी फिर उसी अंदाज से
फिर सिवा सागर के सब-कुछ गर्के-सागर देखते
तिश्नगाने-दीदे-जल्वा, हमें समझा है क्या
तुम अगर सूरत दिखाते जान देकर देखते
मर मिटा इक बात पर किस आन से किस शान से
आप अगर ऐसे में होते दिल के तेवर देखते
मिट कर ही जाना जाता है। हार कर ही पाया जाता है। खोकर ही मिलन है।
मर मिटा इक बात पर किस आन से किस शान से
आप अगर ऐसे में होते दिल के तेवर देखते
तिश्नागाने-दीदे-जल्वा, हमें समझा है क्या
तुम अगर सूरत दिखाते जान देकर देखते
हम तैयार थे, जान भी देने को तैयार थे--तुम अगर सूरत दिखाते। मगर वह हमारी शर्तबंदी थी। वह हमारा सौदा था। लेकिन जिस क्षण हमने अपने को गंवाया, तुमने सूरत दिखाई। हम तो तैयार थे सब-कुछ गंवाने को भी। लेकिन जब कोई गंवाने को तैयार होता है, तो भी अहंकार शेष रहता है। कहता है: मैं सब गंवाने को तैयार हूं, दिखाओ, दर्शन दो! प्रत्यक्ष हो जाओ! मगर, पहले प्रत्यक्ष हो जाओ, तो मैं सब देने को तैयार हूं। हालत उलटी है। तुम सब दे दो, प्रत्यक्ष हो जाता है।
इसलिए भक्त बड़े से बड़ा जुआरी है। दांव पर लगा देता है, भरोसा कुछ भी नहीं कि कुछ मिलेगा कि नहीं मिलेगा। भक्त बड़ी से बड़ी जोखम उठाता है। तुमसे साधारणतः लोग कहते हैं--तुम्हारे पंडित-पुरोहित, साधु-महात्मा--कि भक्ति सरल है। उनकी बातों में मत आ जाना। भक्ति बड़ी जोखम है। ज्ञान सरल है, त्याग भी सरल है, प्रेम सबसे बड़ी जोखम है। क्योंकि ज्ञान में और त्याग में अहंकार मालिक रहता है, प्रेम में अहंकार को विदा देनी होती है।
इश्क की हद से निकलते, फिर ये मंजर देखते
काश हुस्ने-यार को, हम हुस्न बन कर देखते
तुम उसे तभी देख पाओगे जब तुम उसमें परिपूर्ण लीन हो जाओगे, वही हो जाओगे, तभी देख पाओगे। सागर को जानने का एक ही उपाय है, सागर हो जाना। मगर सागर होने के पहले बूंद को मिटना पड़ेगा। बूंद यह नहीं कह सकती कि पहले मैं सागर हो जाऊं, फिर मैं मिटने को तैयार हूं। बूंद को तो मिटना पहले होगा। और मिटने के पहले कोई गारंटी कहां? कौन गारंटी देगा कि मिटने से सागर हो ही जाओगे। जब बीज टूटता है और मिटता है तो गारंटी क्या है कि वृक्ष बनेगा ही? हिम्मत चाहिए। बड़ी हिम्मत चाहिए। दुस्साहस चाहिए। मगर बीज दुस्साहस करता है और वृक्ष हो जाता है। बूंद दुस्साहस करती है और सागर हो जाती है। भक्त दुस्साहस करता है और भगवान हो जाता है।
काहुक देत हौ मंत्र सिखाई, सो भजि अंतर भक्ति दृढ़ाई।।
सब तुम्हारे हाथ में है। चाहो तो किसी को राजों का राज दे देते हो--मंत्र दे देते हो। चाहो, तुम्हारी अनुकंपा हो, तो वर्षा हो जाती है, सब कल्मष धुल जाता है।
काहुक देत हौ मंत्र सिखाई, सो भजि अंतर भक्ति दृढ़ाई।।
और किसी के भीतर तुम्हारी अनुकंपा से मंत्र का जन्म होता है और अंतर-भजन शुरू हो जाता है। अंतर-भजन, बाहर से सीखा हुआ नहीं। जैसे परमात्मा किसी के हृदय को छेड़ देता है, तारों को छेड़ देता है, उसके हाथ तुम्हारे हृदय को गुदगुदा जाते हैं।
कहौं तो कछु कहा नहिं जाई,...
जगजीवन कहते: ऐसा तुमने मेरे साथ किया, अब मैं यह लोगों से कहना भी चाहता हूं तो कह नहीं पाता। मैं कहता हूं: उसी ने मंत्र दिया। कोई मेरी मानता नहीं। मैं कहता हूं: वही आया, उसी ने मेरे हृदय को गुदगुदाया। कोई मेरी मानता नहीं। मैं कहता हूं: वही आया, उसने मेरी हृदय-तंत्री के तार छेड़ दिए; यह वही गा रहा है। कोई मेरी मानता नहीं।
कहौं तो कछु कहा नहिं जाई, तुम जानत, तुम देत जनाई।।
तुम्हीं जानते हो और तुम्हीं जब जना देते हो, तब कोई जानता है। शेष सब व्यर्थ ही भटकते हैं। बड़े से बड़े पंडित भी अज्ञानी ही हैं। जब तक तुम नहीं जना देते तब तक कोई भी कुछ नहीं जानता। जो अपने से ही जानने की चेष्टा में लगे हैं, वे अंबार लगा लेंगे सूचनाओं के, शास्त्रों के पहाड़ों के नीचे दब जाएंगे, मगर पहाड़ खोद कर उनको चूहा भी मिल जाए, इसकी संभावना नहीं। उनके हाथ कुछ भी न लगेगा--राख ही राख।
तुम जानत, तुम देत जनाई! इस प्यारे वचन को हृदय में सम्हाल कर रख लेना। यह मंत्र है।
...तुम जानत, तुम देत जनाई।
मेरे जानने से नहीं। तुम जनाओ। तुम जगाओ। तुम चेताओ। तुम चैतन्य हो, तुम चेता सकते हो। तुम जानते हो, तुम जना सकते हो। तुम पूर्ण हो, तुम मेरे भीतर पूर्ण को भर सकते हो। मैं शून्य हूं, मैं शून्य की भांति कितना ही दौड़ता रहूं, कुछ भी न होगा। आदमी अकेला रहे, रिक्त है; परमात्मा साथ हो, भरा है।
यक मय-ए-बेनाम जो इस दिल के पैमाने में है
वो किसी शीशे में है साकी न मयखाने में है
यूं तो साकी हर तरह की तेरे मयखाने में है
वो भी थोड़ी सी जो इन आंखों के पैमाने में है
एक ऐसा राज भी दिल के निहांखाने में है
लुत्फ जिसका कुछ समझने में न समझाने में है
एक कैफे-नातमामे दर्द की लज्जत ही क्या
दर्द की लज्जत सरापा दर्द बन जाने में है
फिर निकाब उसने उलट कर रूह ताजा फूंक दी
अब न काबे में है सन्नाटा, न बुतखाने में है
एक बार वह अपना पर्दा खुद उघाड़ दे--‘घूंघट के पट खोल’--एक बार वह खुद ही अपना घूंघट खोल दे...
फिर निकाब उसने उलट कर रूह ताजा फूंक दी
अब न काबे में है सन्नाटा, न बुतखाने में है
फिर सब तरफ गीतों की झनकार पैदा हो जाती है। काबा भी गा उठता है, मस्जिद भी गुनगुना उठती है, मंदिर भी पुनरुज्जीवित हो जाते हैं; मिट्टी में अमृत की धुन आने लगती है।
यक मय-ए-बेनाम जो इस दिल के पैमाने में है
वो किसी शीशे में है साकी न मयखाने में है
और एक मदिरा तुम्हारे दिल के भीतर है। वह किसी भी मधुशाला में नहीं मिलेगी। मगर उस मदिरा तक तुम्हारे हाथ पहुंच नहीं सकते, तुम्हारे हाथ तो बाहर ही बाहर पहुंचते हैं। उस मदिरा तक तो परमात्मा के हाथ ही पहुंच सकते हैं। उसने ही रखी है तुम्हारे हृदय में, वही तुम्हें पिलाए तो पीना हो!
एक ऐसा राज भी दिल के निहांखाने में है
लुत्फ जिसका कुछ समझने में न समझाने में है
न तो समझा जा सकता, न समझाया जा सकता। लेकिन जाना जा सकता है, वही जना दे, तो जाना जा सकता है। भक्ति का सार-सूत्र है कि परमात्मा के किए ही कुछ होता है, मनुष्य के किए कुछ भी नहीं होता है।
जगत भगत केते तुम तारा,...
और कितने लोगों को तुमने तार दिया।
...मैं अजान केतान बिचारा।
मैं भी एक छोटा-मोटा...मैं कुछ बहुत बड़ा भगत भी नहीं हूं। मेरी भक्ति भी कोई ऐसी नहीं कि तुम मुझे तारो ही। मुझे मेरी भक्ति पर भी कोई ऐसा भरोसा नहीं है, क्योंकि जगत में बड़े-बड़े भक्त हुए हैं, जगत में बड़े-बड़े भक्त हैं।
जगत भगत केते तुम तारा, मैं अजान केतान बिचारा
लेकिन मैं, मेरी कौन गिनती? फिर भी तुम आए। फिर भी तुमने दर्शन दिए? फिर भी तुमने मेरे तन-मन को आनंद से सरोबोर किया। फिर भी तुमने मेरे हृदय में मदिरा उंडेली। फिर भी तुमने अपनी नकाब पलटी। इससे भरोसा आता है कि अगर मुझे हो सकता है, तो सबको हो सकता है। मैं तो ना-कुछ, मेरी कोई बिसात नहीं। हुआ होगा बड़े भक्तों को, वे बड़े थे, मेरी तो कोई बिसात नहीं, मैं अजान केतान बिचारा, लेकिन जब तुम मेरे सामने प्रकट हो गए तो एक बात पक्की हो गई, एक बात निश्चित हो गई कि अब तुम किसी के भी सामने प्रकट हो सकते हो। मैं तो अंतिम से अंतिम हूं, अगर मैं तुम्हारी अनुकंपा का अधिकारी हूं, तो प्रत्येक व्यक्ति तुम्हारी अनुकंपा का अधिकारी है।
चरन सीस मैं नाहीं टारौं,...
अब मैं तुम्हारे चरणों से अपने सीस को नहीं हटाऊंगा।
...निर्मल मूरत निरत निहारौं।
अब तो देखता रहूंगा यह तुम्हारा प्यारा रूप, यह तुम्हारे सौंदर्य में नहाता रहूंगा।
जगजीवन का अब विस्वास, राखहु सतगुरु अपने पास।
अब मुझे भरोसा हो गया है, अब मुझे श्रद्धा उमगी है--जगजीवन को अब विस्वास--अब तक मुझे विश्वास नहीं था कि मैं भी पार हो सकूंगा। अब तक मुझे विश्वास नहीं था कि कभी मैं भी इस योग्य हो सकूंगा कि तुम्हारे दर्शन होंगे। जब यह अपूर्व घटना घट गई--अनायास, अनपेक्षित--तो अब एक घटना और भी घटेगी इसका भी भरोसा बैठता है: राखहु सतगुरु अपने पास! अब तुम मुझे अपने पास रखो। अब यह भी श्रद्धा बनती है कि जब इतना हुआ, तो इतना भी होगा। एक श्रद्धा दूसरी श्रद्धा में ले जाती है। एक श्रद्धा दूसरी श्रद्धा के लिए द्वार बन जाती है।
निगाहों का मर्कज बना जा रहा हूं
मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूं
मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया
अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं
वही हुस्न जिसके हैं ये सब मजाहिर
उसी हुस्न में हल हुआ जा रहा हूं
न जाने कहां से न जाने किधर को
बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूं
न इद्राके-हस्ती न एहसासे-मस्ती
जिधर चल पड़ा हूं चला जा रहा हूं
न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां
ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं
उसके चरणों पर हाथ पड़ते ही--न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां--फिर कुछ सूझ-बूझ नहीं रह जाती। होश-हवाश नहीं रह जाता।
न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां
न कोई अर्थ, न कोई अभिप्राय, न कोई हेतु।
ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं
और यह किस सौंदर्य में डूबता जा रहा हूं?
निगाहों का मर्कज बना जा रहा हूं
मोहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूं
धन्यभागी हैं वे जो प्रेम के हाथ लुट जाएं!
मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया
हूं तो एक छोटी सी बूंद, एक कतरा, लेकिन सागर ने मुझे अपनी गोद में ले लिया है।
मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया
अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं
अब तो शाश्वतता मेरी है। प्रारंभ से अंत तक सब मेरा है। अनंतता मेरी है।
मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया
हूं तो बूंद, लेकिन यह सागर की गोद में जो पड़ गया हूं तो अब सीमा नहीं है मेरी, अब असीम हूं।
मैं कतरा हूं लेकिन ब-आगोशे-दरिया
अजल से अबद तक बहा जा रहा हूं
वही हुस्न जिसके हैं ये सब मजाहिर
उसी हुस्न में हल हुआ जा रहा हूं
और जिस सौंदर्य से यह सारा अस्तित्व परिव्याप्त है, उसी में डूबता जा रहा हूं, उसी में पिघलता जा रहा हू, उसी में लीन होता जा रहा हूं।
न जाने कहां से न जाने किधर को
बस इक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूं
न इद्राके-हस्ती न एहसासे-मस्ती
जिधर चल पड़ा हूं चला जा रहा हूं
न सूरत न मानी न पैदा न पिन्हां
ये किस हुस्न में गुम हुआ जा रहा हूं
भक्त की पराकाष्ठा है: गुम हो जाना। भक्त की पराकाष्ठा है: लीन हो जाना, तल्लीन हो जाना। जैसे बूंद सागर में लीन हो जाती है। जरा भी भिन्न नहीं रह जाती। कोई सीमा का भेद नहीं रह जाता। उस अभेद में ही भक्त भगवान हो जाता है। अनलहक! अहं ब्रह्मास्मि!
आज इतना ही।